Thursday, October 11, 2007

भ्रष्टाचार, अपराध से बरबाद हुआ राज्य उत्तर प्रदेश

किसी राज्य में भ्रष्टाचार और अपराध की जड़ें मजबूत होने से किस तरह का नुकसान होता है, इसका उत्तर प्रदेश से बेहतर उदाहरण शायद ही कोई और राज्य है। वैसे तो, उत्तर प्रदेश पिछले दो दशकों से किसी मामले में शायद ही तरक्की कर पाया हो लेकिन, पिछले पांच सालों में रही-सही कसर भी पूरी हो गई। अपराध-भ्रष्टाचार इस राज्य में इस तरह से सिस्टम का अंग बन गए कि सरकार और अपराधियों में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया। और, इसका सीधा असर पड़ा राज्य के विकास पर। उत्तर प्रदेश ऐसा पिछड़ गया है कि रफ्तार पकड़ने में जाने कितने साल लगेंगे।

देश की 16 प्रतिशत आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश अपराध के मामले अव्वल है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, देश के 24 प्रतिशत हिंसक अपराध उत्तर प्रदेश के ही हिस्से में आ रहा है। ऐसे में प्रति व्यक्ति के आधार पर देखें तो, ज्यादा बदनाम राज्य बिहार भी इससे पीछे छूट चुका है। इस सबका असर ये है कि जब 1990 के बाद देश में तरक्की की रफ्तार सबसे तेजी है, जब ये कहा जा रहा है कि पैसा बरस रहा है कोई भी बटोर ले, उत्तर प्रदेश में व्यापार करना ज्यादातर मामलों में घाटे का सौदा साबित हो रहा है। देश जब आठ प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से तरक्की कर रहा है तो, उत्तर प्रदेश सिर्फ 5 प्रतिशत की ही रफ्तार मुश्किल से पकड़ पा रहा है।

CII यानी कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री के एक आंकड़े के मुताबिक, 2004 में देश में जब घरेलू खपत प्रति व्यक्ति 18.912 रुपए थ तो, उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति घरेलू खपत करीब आधी यानी सिर्फ 9,900 रुपए थी। साफ है इंडस्ट्री तो बरबाद हुई ही लोगों की जेब में भी पैसा नहीं है। इसकी वजह भी साफ है उत्तर प्रदेश में 2005 में हिंसक अपराध 38 प्रतिशत बढ़ गए। व्यापार करने के लिए सरकारी तंत्र के साथ ही माफियाओं-बदमाशों से भी “नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट” लेना पड़ता है। बौद्धिक-धार्मिक नगरी इलाहाबाद में ही सिर्फ 2005 में 100 से ज्यादा हत्याएं दर्ज की गई हैं जबकि 60 अपहरण के मामले पता चले।

ऐसे माहौल में कोई और व्यापार चले न चले। लोगों को सुरक्षा देने का धंधा खूब चल रहा है। सिर्फ एक एजेंसी उत्तर प्रदेश पूर्व सैनिक कल्याण निगम के 12,000 सिक्योरिटी गार्ड लोगों की निजी सुरक्षा में लगे हैं। जबकि, इस एजेंसी के पास 1999 में सिर्फ 250 सिक्योरिटी गार्ड थे। ये हाल तब है जब उत्तर प्रदेश में ज्यादातर इलाकों में निजी असलहे रखना फैशन स्टेटमेंट माना जाता है। इस राज्य में इंडस्ट्री कैसे आगे बढ़ सकती है। इसका बड़ा उदाहरण सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि इस राज्य में 2 राज्य राजमार्गों की हालत 20 साल पहले जैसी ही बुरी बनी हुई है। मुझे याद है कि एक बार मैं उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस से इलाहाबाद से गोरखपुर गया था। इस सफर के बाद मुझे अंदाजा लग गया कि जौनपुर में रहने वाले मेरे दोस्त अपने घर जाने से पहले ये क्यों कहते थे कि कॉम्बीफ्लाम (दर्द दूर करने की दवा) ले लिया है ना।

इलाहाबाद से जौनपुर का रास्ता करीब साल भर से तो, चौड़ा होने के लिए खुदा हुआ है। ऐसा ही हाल है इलाहाबाद से सुल्तानपुर को जोड़ने वाले रास्ते में प्रतापगढ़ से सुल्तानपुर का। समझ में नहीं आता कि ये रास्ते क्या किसी नेता की विधानसभा-लोकसभा में नहीं आते। आखिर इन्हीं रास्तों से तो नेताजी-अधिकारी लोगों को भी तो आना जाना पड़ता है। मायावती ने राज्य की सत्ता संभालते ही राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त, अपराध मुक्त करने का भरोसा दिलाया था। लेकिन, तीन महीने में तो कुछ तस्वीर बदलती नहीं दिखी है। अब उम्मीद यही कर सकते हैं कि अपनी सत्ता बचाए रखने और लोकसभा चुनावों में सीट बढ़ाने के लिए विधानसभा चुनाव के समय किए गए वादे मायावती पूरा करेंगी।

4 comments:

  1. hey, your blog is very interesting..keep up the good work going..i too write blog..have a look at it..

    www.missionbetterindia.blogspot.com


    lakshmi

    ReplyDelete
  2. उत्तर प्रदेश के विषय में मेरा सोचना है कि आप को सरकार वह नहीं मिलती जो आप डिज़ायर करते हैं; वरन वह मिलती है जो आप डिज़र्व करते हैं।

    ReplyDelete
  3. आपका लेख विचारशील है। मायावती का दलित उत्‍थान का लक्ष्‍य कहां खो गया। हाल ही में बसपा ने एक रैली के आयोजन में 100 करोड रूपए खर्च कर दिए। वह भी उस राज्‍य में जहां अधिकांश लोग तंगहाली में जीवन बिता रहे है।

    ReplyDelete
  4. आपकी शैली में आपके विचार पढ़ना अच्छा लगता है. और उप्र का तो क्या कहें: ईश्वर अच्छा अच्छा करे, यही प्रार्थना है. :)

    ReplyDelete

वर्धा, नागपुर यात्रा और शोधार्थियों से भेंट

हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Tripathi लंबे अंतराल के बाद इस बार की वर्धा यात्रा का सबसे बड़ा हासिल रहा , महात्मा गांधी अ...