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Sunday, November 18, 2007

दुनिया के 200 अच्छे विश्वविद्यालयों में एक भी भारत का नहीं है

इलाहाबाद में मैं जब तक था एक बड़ी गलतफहमी थी कि भारत की पढ़ाई दुनिया के दूसरे देशों से बहुत अच्छी है। शहर में डेढ़-दो लाख लड़के-लड़कियां ज्ञान पेलते दिखते थे। साल भर में 10-20 अपने जानने वाले IAS-PCS हो जाया करते थे। तब लगता था कि दुनिया के किस देश में यहां से ज्यादा पढ़े लिखे लोग होंगे। हर दूसरे लड़के के पास डबल MA की डिग्री होती थी। सब कुछ झमाझम था। लेकिन, इलाहाबाद विश्वविद्यालय को पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था तो, मन मंछ टीस उठती थी कि किसी विदेशी विश्वविद्यालय से तुलना करके उसकी नकल भारत में इलाहाबाद विश्वविद्यालय को क्यों बताया जाता है।

इसकी साफ वजह अब समझ में आ गई है। ब्रिटेन की प्रतिष्ठित लीग टेबल में 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की इस सूची में चीन के 6 विश्वविद्यालय शामिल हैं। एशिया में चीन के अलावा जापान, सिंगापुर, हांगकांग, ताइवान और दक्षिण कोरिया के भी विश्वविद्यालयों को भी इस सूची में जगह मिल गई है।

यहां तक कि दुनिया भर में आपनी धाक जमाने वाला भारत का कोई IIT भी इस सूची में नहीं है। जबकि, इससे पहले एक साथ सारे IIT को मापने से उन्हें इस सूची में जगह मिल जाती थी। गनीमत बस इतनी है कि IIT दिल्ली और IIT मुंबई को दुनिया के 50 सबसे अच्छे तकनीकी संस्थानों में जगह मिल पाई है। लेकिन, ये दोनों भी 37वें और 33वें नंबर पर हैं। जबकि, चीन का सिंगहुआ विश्वविद्यालय 17वें नंबर पर है।

दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की इस लीग लिस्ट में हमेशा की तरह ही अंग्रेज दुनिया का दबदबा कायम है। अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालय उच्चतर शिक्षा में सबसे आगे हैं। ये बात लगातार सामने आ रही है कि भारत के अच्छे संस्थानों में पढ़ाने के लिए अच्छे अध्यापक नहीं मिल रहे हैं। देश के विश्वविद्यालयों में शोध की हालत बिल्कुल ही खराब है। ऐसे में मनमोहन जी कहां से करिएगा शिक्षा क्रांति। और, उच्चतर शिक्षा की हालत सुधारने बिना तो तरक्की सबको नहीं मिलने वाली। कुछ अंबानी, टाटा, बिड़ला को भले मिल जाए।

Saturday, October 13, 2007

मां का दूध बच्चे का पहला अधिकार

आपको लग रहा होगा ये कौन सी नई बात है। लेकिन, अब ये कानून बनने जा रहा है, बच्चे के पैदा होते देश का नागरिक होने के नाते उसे जो, पहला अधिकार मिलेगा वो, होगा मां के दूध का। नेशनल कमीशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स इसे कानून बनाने के लिए पूरी तैयारी कर चुका है। कमीशन 6 साल से छोटे बच्चों के अधिकारों के लिए ऐसे कानून बनाने का प्रस्ताव कर रहा है।

दरअसल सरकार के पास जो रिपोर्ट है उसके मुताबिक, भारत में पैदा होने वाले सिर्फ 23 प्रतिशत बच्चों को ही पैदा होने के घंटे भर में मां का दूध मिल पाता है। और, 46 प्रतिशत ही बच्चे होते हैं जिनको पहले छे महीने तक मां का दूध पीने को मिल पाता है। नेशनल कमीशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स चाहता है कि बच्चे को ज्यादा से ज्यादा समय तक मां का दूध पीने को मिले। क्योंकि, बाहर का दूध बच्चे की सेहत के लिए बहुत अच्छा नहीं होता है।

वैसे अभी के कानून के मुताबिक भी गर्भवती महिला को शिक्षित करने के लिए बच्चे के मां के दूध के फायदे बताना जरूरी है। साथ ही बच्चे को पैदा होने के घंटे भर के भीतर मां का दूध पिलाने की जिम्मेदारी नर्स की होगी। कानून में बदलाव के जरिए मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट 1961 में बदलाव करके मैटरनिटी लीव 3 महीने से बढ़ाकर 6 महीने करने का भी प्रस्ताव है। वजह ये कि बच्चे को नियमित तौर पर 6 महीने तक मां का दूध पीने को मिलेगा। ज्यादातर डॉक्टर भी बच्चे को 6 महीने तक मां का दूध पिलाने की सलाह देते हैं।
वैसे मां-बच्चे के रिश्ते में कानून की दखलंदाजी ठीक तो नहीं लगती। लेकिन, जिस तरह से आज के भागमभाग वाले युग में मां बच्चे को जन्म देने के 15 दिन बाद फिर से ऑफिस के काम में जुट जाती है। हफ्ते-हफ्ते भर मां-बाप व्यस्तता की वजह से बच्चे को समय नहीं दे पाते। बच्चे को माता-पिता की संयुक्त भारी कमाई से मोटा जेब खर्च तो मिल जाता है लेकिन, समय नहीं मिल पाता। ऐसे में शायद इस कानून की वजह से ही कम से कम 6 महीने तक मां-बच्चे का भावनात्मक रिश्ता और मजबूत होगा। साथ ही जवान भारत भी मजबूती से दुनिया का मुकाबला कर सकेगा। और, दुनिया किसी भारतीय के बच्चे को ये चैलेंज तो नहीं ही कर सकेगी कि मां का दूध पिया है तो, सामने आ जा।

Thursday, October 11, 2007

क्यों मर रहा है जवान भारत?

साठ साल का आजाद भारत दुनिया का सबसे जवान देश है। इस पर हम सबका सीना चौड़ा है। बीच-बीच में आते सर्वे ये भी बताते हैं कि जवान भारत दुनिया में सबसे ज्यादा खुश है। सबसे ज्यागा तरक्की जवान भारत ही कर रहा है। लेकिन, स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट पढ़कर मेरी भी जान निकल सी गई।
स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि देश में साल भर में एक लाख से ज्यादा लोगों ने खुद ही अपनी जान ले ली। दुनिया के सबसे खुश देशों में शामिल भारत के लोगों को क्या हो गया है। रिपोर्ट और भी ज्यादा डराती है। इसके मुताबिक, चार लाख लोगों ने अपनी जान गंवाने की कोशिश की थी जो, समय से इलाज मिल जाने से बच गए। जान गंवाने की कोशिश करने वाले 90 प्रतिशत लोग मानसिक असंतोष, डिप्रेशन और किसी तरह की बदसलूकी की वजह से जान गंवा रहे हैं।

भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश की कुल आबादी के 7.5 प्रतिशत मानसिक समस्या से जूझ रहे हैं। मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों को सलाह देने वाले डॉक्टरों की भी जबरदस्त कमी है। देश को आबादी के लिहाज से 32,000 मानसिक रोग चिकित्सक चाहिए जबकि, सिर्फ 3,300 मानसिक रोग चिकित्सक ही मौजूद हैं। इनमें से भी 3,000 सिर्फ 4 महानगरों में हैं। इन्हीं में एक आंकड़ा ये भी है कि देश की 9 लाख से ज्यादा महिलाएं किसी न किसी मानसिक बीमारी से जूझ रही हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में हर 40 सेकेंड में कोई न कोई आत्महत्या कर लेता है। लेकिन, इसमें भी भारत जैसे देशों में इस बात का खतरा सबसे ज्यादा है। क्योंकि, 15 से 44 साल के लोगों की मौत के तीन कारणों में से सबसे बड़ी वजह आत्महत्या ही है। जवानों में तनाव का खतरा भी सबसे ज्यादा है। खुद की जान गंवा रहा जवान भारत अगर अपनी परेशानियों से निजात न पा पाया तो, ये बड़ी मुश्किल बन सकती है।

Thursday, August 16, 2007

जवान भारत के जवानों नेता बनो

दुनिया के सबसे जवान देशों में से भारत के जवान तरक्की कर रहे हैं। इंजीनियर बन रहे हैं, डॉक्टर बन रहे हैं, बीपीओ में रात-रात भर जागकर अंग्रेजी बोलने की नौकरी कर रहे हैं। मैनेजमेंट कोर्स कर रहे हैं, मीडिया में किस्मत आजमा रहे हैं। सरकारी नौकरी के लिए आधा जीवन बिता दे रहे हैं। बड़े-बड़े बिजनेस कर रहे हैं। यानी वो सबकुछ कर रहे हैं जिससे उनको लग रहा है कि तरक्की की जा सकती है। लेकिन, शायद ही कोई लड़का या लड़की नेता बनना चाहता है। चाहता भी है तो, सोचता है और फिर उस रास्ते की दुश्वारियां देखकर रास्ते से ही लौट आता है।
सवाल ये कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में जहां चुने हुए लोग ही देश चलाते हैं। कायदे-कानून बनाते हैं देश में रहने वालों के लिए शर्तें तय करते हैं। सरकार, इंडस्ट्री, किसी भी बिजनेस के लिए पॉलिसी बनाते हैं, वहां कोई युवा नेता क्यों नहीं बनना चाहता है। और, ये तब है जब देश की हर समस्या के लिए नेता ही जिम्मेदार माना जाता है। यहां तक कि हर कोई ये भी दुहाई देता मिल जाता है कि अगर नेता सुधर जाएं तो, देश सुधर जाएगा। फिर कोई लड़का-लड़की नेता क्यों नहीं बनना चाहता। सुधार में खुद शामिल क्यों नहीं होना चाहता। साठ साल के आजाद भारत में आधे से भी ज्यादा नौजवान हैं यानी 30 साल से कम उम्र के हैं। इसलिए ये और भी जरूरी हो जाता है कि ये नई उम्र के लोग राजनीति में जाएं। लेकिन, शायद ही नेतागिरी करने वाले किसी लड़के-लड़की की हिम्मत घरवाले, रिश्तेदार, समाज के लोग बढ़ाते हैं।
राजनीति की शुरुआत करने वाले हर युवा को घर वालों से लेकर आसपास के लोग पहले ही एक ऐसा प्राणी घोषित कर देते हैं जिसका कोई भविष्य नहीं है। दरअसल राजनीति में किसी को तरक्की का रास्ता नहीं दिखता। इसलिए लोग तरक्की वाले करियर तो अपना लेते हैं, राजनीति में नहीं जाना चाहते हैं। मैं भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान राजनीति से जुड़ा रहा। आंदोलन भी किए, छात्र संगठन से जुड़कर हर तरह के रचनात्मक काम किए। सेमिनार कराए। लेकिन, इसके बावजूद आसपास के लोग सिर्फ ये कहकर कि ठीक है थोड़ा बहुत लोगों से जान पहचान के लिए ठीक है, किसी ने इसी में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। यहां तक कि लोगों को यही लगता था कि अब तो ये लड़का क्या कर पाएगा। इसका दबाव घर पर मेरे पिताजी पर भी पड़ता रहा होगा। ये अलग बात है कि मुझे आज भी ये लगता है कि मेरे व्यक्तित्व का बेहतर विकास छात्र राजनीति के दौरान ही हुआ।

यही समाज की वो मानसिकता है जिसकी वजह से शायद युवा पीढ़ी एकदम से ही राजनीति से दूर होती चली गई है। देश के दूसरे राज्यों के लोग तो, यूपी-बिहार के लोगों का इसलिए भी मजाक उड़ाते हैं कि इन दोनों राज्यों के लड़के-लड़कियों का राजनीति से कुछ न कुछ रिश्ता होता ही है। इसकी एक बड़ी वजह ये है कि देश में इंदिरा सरकार के खिलाफ आंदोलन में जय प्रकाश नारायण के साथ इन राज्यों के लोगों ने पूरी शिद्दत से हिस्सा लिया। और, इंदिरा की सत्ता उलट देने से इन राज्यों के युवाओं को कुछ ज्यादा भरोसा भी है कि इस रास्ते से भी बहुत कुछ हो सकता है। लेकिन, जब इंदिरा की सत्ता उलटने के बाद सत्ता में आए जेपी आंदोलन के लोग ही युवाओं को रास्ते दिखाने में असफल हो गए तो, युवाओं का राजनीति से नैतिक मनोबल टूट गया। इसके अलावा उन लोगों ने भी छात्रों-युवाओं के राजनीति में आने का रास्ता बंद कर दिया जो, इस रास्ते से लोकप्रिय हुए लेकिन, छात्र संघ की राजनीति को आगे की राजनीति का जरिया न मानकर उसे ही पैतृक व्यवसाय समझने लगे।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की राजनीति के दौरान मैंने देखा है कि 40-42 साल की उम्र तक चुनाव
लड़ना तो, अधिकार ही समझा जाता था। और, इस कैंपस में बुढ़ाते युवा नेता को पाला पोसा,
विधानसभा-लोकसभा में बैठे उन नेताओं ने। जिनको डर था कि अगर ये ताकतवर नेता विश्वविद्यालय परिसर से बाहर निकलकर विधानसभा-लोकसभा का रास्ता देखने की सोचने लगा तो, उनकी ताकत खत्म हो जाएगी। और, अगर कम उम्र में ही ये कायदे-कानून बनाने वाली जगह पहुंच गया तो, शायद सत्ता के विरोध वाली उसकी आदत की वजह से चुपचाप चल रहे सहूलियत वाले भ्रष्ट सिस्टम पर भी चोट होने लगेगी।
विश्वविद्यालयों से निकले नेताओं में से कुछ भले ही बुढ़ाते-बुढाते कुछ ऊपर की राजनीतिक पायदान पर पहुंचे। लेकिन, ज्यादातर असफल होकर आसपास समाज में असफलता की मिसाल बन गए। जमाना बदल रहा था, जरूरतें बदल रही थीं। और, युवा पीढ़ी के पास इतना समय भी नहीं कि वो, सफल होने के लिए 40-50 साल का होने का इंतजार करे। वो, मार्केटिंग मैनेजमेंट का कोर्स करके झोला उठाकर चार हजार की नौकरी करने लगा, रात-रात भर जागकर जुबान टेढ़ी-मेढ़ी करके विदेशियों से बात करके तरक्की करने लगा। लेकिन, राजनीति के जरिए तरक्की के लिए उसका धैर्य-साहस मर गया।

वैसे आजकल कहा जा रहा है जवान भारत की संसद लोकसभा में भी आने वाले जवान बढ़े हैं। प्रिया दत्त, सचिन पायलट, उमर अब्दुल्ला, मानवेंद्र सिंह, राहुल गांधी जैसे ढेरों चमकते चेहरे वाले सांसदों का नाम गिनाकर चर्चा की जाती है कि देश बदल रहा है, राजनीति बदल रही है, युवा राजनीति में दिलचस्पी ले रहा है। लेकिन, क्या ये वो युवा है जिसकी राजनीति में जरूरत है। इनके आने से किसी को गुरेज नहीं है। लोकिन, ये वो सारे नाम हैं जिनके लिए राजनीति कुछ समझने-करने का नहीं पैतृक व्यवसाय को चलाना भर है। राजनीति का ये पैतृक व्यवसाय अच्छे से चला तो, राजनीतिक विरासत आगे भी मजबूती से जाएगी नहीं तो, उसके बाद वाली पीढ़ी को थोड़ी मुश्किल झेलनी पड़ेगी। अब राजनीति में इन युवाओं की टोली कितना बदलाव कर पाएंगे जिनके लिए पिता-माता की राजनीतिक विरासत को संभालना ही सबसे बड़ी काबिलियत है।
भारत में जिन भी क्षेत्रों में बदलाव हुए हैं। वहां पैतृक घरानों के अलावा नए लोगों ने आगे बढ़कर नए क्षेत्र में जोखिम उठाया। नारायण मूर्ति, धीरूभाई अंबानी, किशोर बियानी ऐसे ही लोग थे। इन लोगों ने जिस उम्र में अपने-अपने क्षेत्रों में कुछ करने की कोशिश की थी। वहां इनके लिए कुछ नहीं था। ऐसा युवा वर्ग राजनीति में क्यों नहीं आ रहा है। कॉलेज में किसी छात्र संगठन के सदस्य छात्रों की संख्या क्यों लगातार कम होती जा रही है।वैसे बिना किसी पृष्ठभूमि के राजनीति में आना इतना आसान भी नहीं है।

उत्तर प्रदेश में आईआईटी के कुछ छात्रों ने मिलकर लोक परित्राण नाम से राजनीतिक दल भी बनाया। कुछ सीटों पर चुनाव भी लड़ा। लेकिन, सफलता हाथ नहीं लगी। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में ही बीजेपी ने भी कई सीटों पर ABVP से निकले कई युवा नेताओं को टिकट दिया था। जिनके पास कोई भी राजनीतिक विरासत नहीं थी। इन युवाओं ने अच्छे से चुनाव लड़ा। ये अलग बात है कि बीजेपी की जमीन पहले से ही खिसक चुकी थी। और, उत्तर प्रदेश में मायावती के जादुई समीकरण के आगे आईआईटी से निकले युवाओं की ही तरह बीजेपी के टिकट पर लड़े युवाओं को भी सफलता नहीं मिल पाई लेकिन, इनमें से ज्यादातर ऐसे थे जो, राजनीति को विश्वविद्यालय के दिनों से ही करियर की तरह संवार रहे हैं। बेईमान नहीं हैं। अब आगे इनका क्या भविष्य होगा मैं नहीं जानता। मुझे नहीं पता आईआईटी से निकले छात्रों की पार्टी अब क्या कर रही है। और, कितनी गंभीरता से अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही है। लेकिन, इसी तरह की कोशिश की जरूरत है। आजादी के साठ साल बाद जवान भारत के लिए ये भी जरूरी है कि वो राजनीति को भी उसी गंभीरता से ले।
जिस गंभीरता से आईटी, बीपीओ, मैनेजमेंट या फिर दूसरे किसी सेक्टर में अपना करियर बनाने की कोशिश करता है। नेताओं पर जिस तरह से लोगों का भरोसा उठ रहा है, उसमें ये और भी जरूरी हो जाता है। क्योंकि, भारत को कोई तो दिशा दे ही रहा होगा। और, अगर ये दिशा देने वाले अब भी आजादी के समय की आजाद भारत के बचपन वाली सोच के लोग ही रह गए तो, फिर देश का लोकतांत्रिक ढांचा भी कमजोर होगा।
किसी भी पार्टी में पार्टी के ही बड़े नेताओं के बेटे-बेटियों-बहुओं को छोड़ दें तो, शायद ही एक भी चमकता चेहरा ऐसा मिले जिसकी उम्र 50 साल से कम हो। इस जवान देश के लिए इस बात की सबसे ज्यादा जरूरत है। और, कैंपस में राजनीति में शामिल होने वाले दूसरे क्षेत्रों में असफल हो जाते हैं, ये मिसाल देने वालों को मैं बस इतना ही बताना चाहूंगा कि देश में बैंकिंग की सूरत बदल देने वाले ICICI बैंक के चेयरमैन के वी कामत खुद भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान यूनियन के सेक्रेटरी थे।

Wednesday, August 15, 2007

मनमोहन जी कैसे करिएगा शिक्षा क्रांति

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आजाद भारत के साठ साल पूरे होने पर लाल किले से देश में शिक्षा क्रांति की बात कही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शिक्षा पर खर्च करने के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना में 80,000 करोड़ रुपए मांगे हैं। निश्चित तौर पर अगर अगले बीस सालों में भारत को अपने मानव संसाधन यानी काबिल लोगों का इस्तेमाल दुनिया में अपनी साख बढ़ाने के लिए करना है तो, शिक्षा क्रांति बहुत जरूरी है। क्योंकि, भारत के लिए यही सबसे आसान जरिया है दुनिया पर राज करने का। लेकिन, क्या प्रधानमंत्री को इस बात का अंदाजा है कि भारत में शिक्षा क्रांति के रास्ते की असली रुकावटें क्या हैं।
हर किसी को शिक्षा जो, सबसे जरूरी है। अब भारत में इसके दो एक दूसरे एक एकदम विपरीत चेहरे जो, मैंने खुद भी देख लिए। गांव के सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए बच्चे और पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते। तो, मुबंई जैसे शहर में स्कूलों में दाखिले के फॉर्म लेने के लिए सुबह चार बजे से ही लाइन लगती है। मुंबई वाला अनुभव मुझे पिछले साल ही हुआ जब मैं दोपहर में ऑफिस पहुंचा तो, रात से ही लाइन में अभिभावकों की लाइन के विजुअल के साथ खुला पैकेज मुझे चलाने को मिला।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। सरकारी रिपोर्ट एलीमेंट्री एजुकेशन इन इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि देश के 32,000 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं पढ़ते। ये बताने की जरूरत नहीं है कि ये गांव के इलाके के सरकारी स्कूल हैं। और, उसमें भी करीब आधे 15,791 स्कूल गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल हैं। ऐसे सबसे ज्यादा 7,945 स्कूल कर्नाटक में हैं जहां एक भी बच्चे नहीं हैं। देश के करीब सात परसेंट यानी 69,353 स्कूल ऐसे हैं जिसमें 25 से कम छात्र पढ़ते हैं और 1,70,888 स्कूल ऐसे हैं जिसमें पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 25 से 50 के बीच है। बीमारू राज्यों के अगुवा बिहार और उत्तर प्रदेश दूसरे मामले में भले ही पिछड़े हों। एक स्कूल में सबसे ज्यादा छात्रों के मामले में उनके आसपास सिर्फ दिल्ली और केरल ही हैं। और, शिक्षा क्रांति की यही असली चुनौती है कि जरूरत जहां पर वहां सबको कैसे पढ़ने-बढ़ने का मौका मिले।

परेशानी सिर्फ बच्चों के स्कूल न आने तक ही नहीं है। देश के 23,000 स्कूलों में शिक्षक ही नहीं हैं। तो, 1,30,000 स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। बच्चों के स्कूल न आने और स्कूलों के लिए शिक्षक न मिलने की वजह भी साफ ही है कि देश में 1,02,227 बिना एक भी कमरे के चलने वाले स्कूल हैं। लेकिन, सिर्फ ऐसा ही नहीं है कि स्कूल में सुविधा न होने, शिक्षक न होने और बच्चों के लिए पढ़ने न आने की ही परेशानी है। भारतीय शिक्षा तंत्र में घुसा भ्रष्टाचार भी मनमोहन सिंह के लिए बहुत बड़ी चुनौती है।

UNESCO की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय शिक्षा तंत्र में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है और इस भ्रष्टाचार को बढ़ाने में सबसे ज्यादा योगदान स्कूल के शिक्षकों का है। UNESCO की करप्शन इन एजुकेशन की इस स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय स्कूलों के शिक्षक स्कूल से गायब रहने में सबसे आगे हैं। एक युगांडा ही ऐसा देश है जहां के शिक्षक इस मामले में भारतीय शिक्षकों को मात दे पाते हैं। दुनिया में 100 में से औसतन बीस शिक्षक ही स्कूल से गायब रहते हैं जबकि, भारत के 100 में 25 शिक्षक स्कूल आना पसंद नहीं करते। इसमें भी बीमारू राज्य बिहार और यूपी के शिक्षक सबसे आगे हैं। बिहार में हर पांच में से दो शिक्षक गायब रहते हैं तो, उत्तर प्रदेश में तीन में एक शिक्षक स्कूल के रास्ते से भटक जाता है।

यही शिक्षकों का स्कूल न आना शिक्षा तंत्र में भ्रष्टाचार बढ़ाता है। शिक्षा पर खर्च होने वाली रकम का साढ़े बाइस परसेंट इन शिक्षकों के गायब रहने से बरबाद हो जाता है। इतना ही नहीं ये शिक्षक महोदय स्कूल में तो नहीं पढ़ाते लेकिन, घर पर ट्यूशन करने वाले छात्र के लिए इनके पास समय ही समय होता है। ट्यूशन से शुरू हुआ भ्रष्टाचार नकल पर जाकर खत्म होता है। UNESCO की इसी रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अच्छे इंस्टिट्यूट्स में कंप्यूटर साइंस, मेडिकल और इंजीनियरिंग विषयों में गलत तरीके से दाखिले के लिए 3000 रुपए से लेकर 8 लाख रुपए तक दिए जाते हैं। ये बानगी भर है देश की शिक्षा क्रांति के रास्ते में आने वाली मुश्किलों की। तो, मनमोहन जी अब बताइए कैसे करिएगा शिक्षा क्रांति।

Tuesday, August 14, 2007

60 साल के आजाद भारत के नेता

कल दिल्ली के टाउनहॉल में बीजेपी और बीएसपी के सभासद (पार्षद) एक दूसरे से भिड़ गए। बीजेपी के सभासद संख्याबल में ज्यादा थे। इसलिए उन्होंने बीएसपी के सभासदों को पीट दिया।2009 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने हैं। उसकी ये एक बानगी भर थी। दरअसल अब नगर निगम से लेकर लोकसभा तक ऐसे नेता (बहुतायत में) चुनाव लड़ते-जीतते हैं जिनके लिए समाजसेवा कभी कोई मकसद ही नहीं होता है। उनके लिए नगर निगम, विधानसभा या फिर लोकसभा तक पहुंचना सिर्फ और सिर्फ अपनी उस हैसियत (दबंगई) को बनाए रखने या फिर उसे और बढ़ाने के लिए होता है। और, फिर जब इस हैसियत पर कोई उनकी बिरादरी की भी हमला करता है। तो, फिर वो हमलावर हो जाते हैं।ये कोई पहला मामला नहीं है। जब किसी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर लोकतंत्र के पहरेदारों ने ही लोकतंत्र की अस्मिता पर हमला किया हो। इससे पहले उत्तर प्रदेश और बिहार के ही नेता बदनाम थे कि वहां के नेता गुंडे, लुच्चे लफंगे होते हैं। और, विधानसभा तक एक दूसरे से गाली-गलौज-मारपीट पर आमादा हो जाते हैं। वैसे हाथापाई और मारपीट का दिल्ली के टाउन हॉल से कुछ मिलता-जुलता नजारा देश की राजधानी में पहले भी हो चुका है।

लोकसभा में साधु यादव और जनता दल यूनाइटेड के सांसद प्रभुनाथ सिंह के बीच मारपीट होते होते ही बची थी। लोकसभा का मामला था। दूसरे नेताओं ने शर्माशर्मी बचाव किया। अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब आंध्र प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेसी मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को मां की ऐसी गाली दी जो, शायद संभ्रांत परिवारों में गलती से भी सुन लिए जाने पर बच्चे या फिर बड़े के कान लाल कर दिए जाते हैं। लेकिन, जब राज्य के मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री का मामला हो तो, फिर भला सजा कौन देगा। हल्की-फुल्की प्रतिक्रियाओं के अलावा इस पर न तो, कांग्रेस न ही विपक्षी दलों ने संसदीय मर्यादा को लेकर हो-हल्ला किया। शायद सबको डर था कि कल उनके पार्टी ने ऐसा किया तो, दूसरे ज्यादा हल्ला मचाएंगे।
मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के बीच इस हद तक गिरने का मामला ये पहला नहीं है। इससे पहले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अब की मुख्यमंत्री मायावती के साथ एक जमाने में वीवीआईपी गेस्ट हाउस में जो घिनौना कृत्य करने की कोशिश की थी। वो, आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक कलंक की ही तरह है। मायावती के साथ दुर्व्यवहार किया गया वो तो, भला हो कि बीजेपी के कुछ नेता पहुंच गए और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर एक गहरी कालिख पुतने से बच गई। लेकिन, यही बीजेपी के नेता भी उत्तर प्रदेश की विधानसभा में हुई मारपीट शामिल हुए। माइक तोड़े गए, विधानसभा अध्यक्ष तक की कुर्सी पर माइक फेंके गए। अब तो नगर निगमों, विधानसभाओं और लोकसभा में ऐसे लोग पहुंचने लगे हैं। जिनको इन लोकतंत्र की संस्थाओं के बाहर छोड़ने या फिर लेने ले जाने के लिए बंदूकधारियों का एक पूरा अमला आता-जाता है। ऐसे में अगर लोकतंत्र की इन संस्थाओं के भीतर भी इस तरह की गुंडागर्दी शुरू हो गई तो, फिर कोई कैसे काले कारनामे करने वाले सफेदपोश नेताओं की करतूत के खिलाफ लोकतंत्र में आवाज उठा पाएगा। ये वो लोग हैं जो, कानून और नियम कायदे बनाते हैं। और, ये जिस जगह चुनकर भेजे जाते हैं मकसद यही होता है कि कम से कम वहां तो कायदे-कानून-नियमों का पालन होगा।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के ठीक पहले राज्य के ही गृह विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक तिहाई से ज्यादा वर्तमान विधायक अपराधी चरित्र वाले थे। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के पहले मैंने उत्तर प्रदेश के गृह विभाग की रिपोर्ट के बाद ये लिखा था कि पांच साल में एक ही दिन होता है जब, बैलट बुलेट पर भारी होता है। उत्तर प्रदेश, बिहार में राज तो बदला है लेकिन, बाहुबली कहे जाने वाले अपराधी विधायक अभी भी विधानसभा तक पहुंच ही रहे हैं। सभी दल इनको पाल पोस रहे हैं। 60 साल का आजाद भारत हर क्षेत्र में तरक्की पर है। दुनिया में नाम कमा रहा है। लेकिन, 60 साल के आजाद भारत के इन नेताओं की करतूतें देखकर ये समझ में आ जाता है कि भारत की कद्र को बट्टा क्यों लग जाता है। 60 साल बाद भी अगर सब कुछ होते हुए भी देश तरक्की की राह से भटक जाता है तो, उसके लिए जिम्मेदार कौन है। जरूरत इस बात की है कि सभी दलों के वो नेता जो अभी भी इससे बचे हैं वो, मिलकर इसके खिलाफ मोर्चाबंदी करें। बीजेपी और बीएसपी दोनों को ही चाहिए कि मारपीट करने वाले अपने सभासदों को पार्टी से निकाल बाहर करें। लेकिन, राजनीतिक पार्टियों के अब तक के चरित्र को देखते हुए ये मुश्किल ही लगता है। इसलिए ये काम आजाद भारत की जनता को ही करना होगा। क्योंकि, जो खुद ही कानून तोड़ने की हरसंभव कोशिश करते रहते हैं उनके हाथ देश के लोगों के लिए कानून बनाने और उन्हें न्याय देने का काम कैसे सौंपा जा सकता है।

Monday, August 13, 2007

60 साल का बूढ़ा या 60 साल का जवान देश

ये किसी च्यवनप्राश का विज्ञापन नहीं है। ये भारत के लोगों के लिए दुनिया में मौके की राह दिखाने वाली लाइन है। 2020 तक दुनिया के सभी विकसित देशों में काम करने वाले लोगों की जबरदस्त कमी होगी। यहां तक कि भारत से ज्यादा आबादी वाले देश में भी बूढ़े लोग ज्यादा होंगे। दुनिया के इन देशों में आबादी बढ़ने की रफ्तार पर काबू पाया जा चुका है। और, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से विकसित देशों में लोग ज्यादा उम्र तक जियेंगे। तब दुनिया के विकसित देशों को अपने यहां काम की जरूरतों को पूरा करने के लिए विकासशील कहे जाने वाले देशों की ही तरफ देखना होगा। और, इसमें भी भारत को सबसे ज्यादा फायदा होगा। क्योंकि, यहां पर अभी 60 प्रतिशत लोग 30 साल से कम उम्र के हैं। यानी जिन्होंने अभी काम करना कुछ पांच-आठ साल पहले ही शुरू किया है। अगर भारत के 45 साल के लोगों की उम्र तक जोड़ ली जाए तो, ये लोग कुल मिलाकर देश की जनसंख्या के 70 प्रतिशत हो जाते हैं।
दरअसल आजादी के साठ सालों में भारत अभी जवान हुआ है। और, इसी जवानी के बूते पर दुनिया भर में अपनी ताकत का लोहा मनवाने लायक भी हो गया है। लोकतंत्र और मजबूत हुआ है। लालफीताशाही खत्म हुई है। हर संस्था पर सामाजिक दबाव बढ़ा है। कुछ भी छिपाकर नहीं किया जा सकता। विकास सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं, राजनीति की जरूरत भी बन गया है। हर कोई विकसित होते भारत में अपना भी हिस्सा देने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा है। लेकिन, असली चुनौती अगले करीब दो दशकों की है। जब भारत के पढ़े-लिखे-जानकार लोगों की कद्र दुनिया में और बढ़ेगी। पिछले करीब दो दशकों में आईटी और बीपीओ सर्विसेज के बूते दुनिया में झंडा गाड़ने वाले भारत के काबिल युवाओं को हर क्षेत्र में दुनिया बुला रही है। 2020 में भारत में काम करने वाले करीब 5 करोड़ लोग ज्यादा होंगे। यानी ये दुनिया की जरूरतों को करीब-करीब पूरा करने के लायक होंगे। इनमें से ज्यादातर मौके नॉलेज प्रॉसेस आउटसोर्सिंग के ही होंगे। यानी बीपीओ में काम करने वाले सिर्फ अंग्रेजी बोलने वाले और दुनिया के लोगों को सिर्फ कस्टमर सपोर्ट देने वाले नहीं चलेंगे। चलेंगे वो, जो काम जानते हैं, जिनका दिमाग अच्छा चलता है, कुछ नया करके दे सकते हैं। इसके अलावा ऑटो, मैन्युफैक्चरिंग, फार्मा, रिसर्च, इंजीनियरिंग, मीडिया इन सभी क्षेत्रों में भारत की बढ़त की रफ्तार अगले दो दशकों में सबसे तेज रहने वाली है।

दुनिया के विकसित देशों के शहरों के मुकाबले भारत के शहर अभी भी सस्ते हैं और यहां के काम करने वाले लोग भी काफी सस्ते हैं। लेकिन, ये लोग उत्पादन क्षमता के मामले में दूसरों को मात देते हैं। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी कार कंपनियां, बड़ी कंप्यूटर-लैपटॉप बनाने वाली कंपनियां, दुनिया के बड़े रिटेलर, दुनिया की बड़ी फार्मा कंपनियां- सब भारत के दरवाजे पर लाइन लगाए खड़ी हैं। हर कोई भारत को अपना हब बनाना चाहता है। डेल और लेनोवो भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगा रही हैं। भारतीयों की जरूरत के लिहाज से लैपटॉप और पर्सनल कंप्यूटर बन रहे हैं। कभी सिर्फ आयात होकर आने वाली कारें आपके शहर के बगल में ही बन रही हैं। जो, नहीं बन रही हैं उन्होंने किसी न किसी राज्य में यूनिट लगाने की अर्जी दे रखी है। साफ है सस्ते में अच्छे काम करने वाले भारत से बेहतर शायद ही धरती के किसी कोने में मिल पा रहे हैं। बात ये भी है कि ये भारतीय जवान भी धरती के दूसरे कोनों में ज्यादा महंगे हो जाते हैं। इसलिए कंपनियां भारत में ही भारतीयों के हुनर का फायदा लेना चाहती हैं।

एविएशन और टेलीकॉम ऐसे क्षेत्र हैं। जिसमें अब दुनिया की सभी कंपनियों को भारत में ही सबसे ज्यादा मौके दिख रहे हैं। भारत में एयरलाइंस के एक दूसरे में विलय से कुछ लोग बेवजह ये अंदाजा लगाने लगे थे कि फिर 90 के दशक की तरह एयरलाइंस की लैंडिंग न शुरू हो जाए। लेकिन, भारतीय आसमान में तो रास्ते अब साफ हो रहे हैं। भारत में संभावनाएं बढ़ेंगी तो, हवाई सफर करने वाले और बढ़ेंगे। वर्जिन ग्रुप भारत के आसमान में उड़ना चाहा है और भारतीयों को वर्जिन मोबाइल पर बात भी कराना चाहता है। वर्जिन ग्रुप के चेयरमैन रिचर्ड ब्रैनसन ने तो यहां तक कहा है कि वो साल भर में ही वर्जिन मोबाइल भारत में शुरू कर देंगे। हां, एयरलाइंस आने में थोड़ा समय लग सकता है। दुनिया की बड़ी मोबाइल कंपनी वोडाफोन पहले ही हिंदुस्तान आ चुकी है।
भारत इन सबके लिए तैयार भी हो रहा है। सरकारी नीतियों में भले ही कुछ गड़बड़ियों की वजह से SEZ के अच्छे के बजाए बुरे परिणाम ही मिलते दिख रहे हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि देश आगे जा रहा है और इसमें सरकार ज्यादा दखल देने की हालत में नहीं है। सब कुछ इस जवान देश के कामकाजी जवानों के हाथ में है। सरकार के हाथ में सिर्फ इतना है कि वो कहीं रोड़ा नहीं बने तो, देश के जवानों को थोड़ा कम मेहनत करनी पड़ेगी। आजाद भारत के साठ साल पूर होने पर ये बातें इसलिए भी ज्यादा महत्व की हैं। क्योंकि, चाइनीज ड्रैगन भी बुढ़ा रहा है।

2020 तक चीन में दुनिया के सबसे ज्यादा बूढ़े होंगे। यानी दुनिया में हमारी विकास की संभावनाओं को चुनौती देने वाला अकेला देश भी तब तक हांफने लगेगा। इसलिए जरूरी है कि अगले दो दशकों में हम जवानी की तेज रफ्तार का पूरा फायदा उठा लें। क्योंक, दो दशकों के बाद आज का साठ साल का ये जवान देश साठ साल के बू़ढ़े देश में बदल जाएगा।

Saturday, August 11, 2007

ये फर्क इंडिया और भारत का है

दो दिन पहले मैंने हांगकांग की एक कंसल्टेंसी फर्म के सर्वे के लिहाज से लिखा था कि किस तरह देश के शहर तेजी से महंगे हो रहे हैं। लेकिन, इसके बाद भी दुनिया के कामकाजी लोगों के लिहाज भारत अभी एशिया के ही शहरों में भी सबसे सस्ता ही है। इस पर उम्दा सोच की टिप्पणी आई कि यहां आमदनी कम है वरना तो, दुनिया के दूसर शहरों के लिहाज से भारत के शहर अभी भी बहुत सस्ते हैं। इस पर अनिल रघुराज की टिप्पणी आई जो, ज्यादा वाजिब थी कि इस लिहाज से दुनिया के दूसरे शहरों में रहना ज्यादा सुखकर है। और, मुझे लगता है कि कहीं भी महंगाई का पैमाना वहां रहने वालों कमाई के लिहाज से ही तय होता है।
मैंने क्यों कहा कि मुंबई और दूसरे मेट्रो शहरों में रहना मुश्किल होता जा रहा है। इसको नेशनल कमीशन फॉर इंटरप्राइजेज इन अनरिकॉगनाइज्ड सेक्टर (NCEUS) का ताजा सर्वे भी पुख्ता करता है। इस सर्वे के मुताबिक, देश में 83 करोड़ 60 लाख लोग ऐसे हैं जो, हर रोज बीस रुपए यानी सिर्फ 600 रुपए महीने की कमाई कर पाते हैं। वैसे देश में गरीबी रेखा की परिभाषा में ये सभी लोग गरीबी रेखा के ऊपर ही आते हैं। क्योंकि, गरीबी रेखा के नीचे उन्हीं लोगों को रखा जाता है जो, हर रोज 12 रुपए से भी कम की कमाई करते हैं, यानी इतनी ही रकम जितने में हम-आप जैसे मेट्रोज में रहने वाले लोग प्यास लगने पर पानी पी जाते हैं। उनती ही रकम में पूरा दिन चलाने वाले ही इस देश में गरीबी रेखा के नीचे आते हैं।
अब आपको लग रहा होगा कि ये कैसे संभव है कि, देश के 77 प्रतिशत लोग सिर्फ बीस रुपए रोज कमा रहे हों जबकि, हर रोज देश और तेज रफ्तार से तरक्की कर रहा है। मनमोहन-चिदंबरम की जादुई जोड़ी मनमोहक 10 प्रतिशत की विकास दर की बात कर रही है। वैसे इसी मनमोहक आंकड़े से विश्व बैंक भी प्रभावित जो, कहता है कि भारत में एक व्यक्ति की सालाना कमाई करीब एक हजार डॉलर यानी करीब चालीस हजार रुपए है। दरअसल एक व्यक्ति की कमाई का विश्व बैंक का आंकड़ा इतना खाया पिया इसलिए दिखता है। क्योंकि, द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास और दुनिया को मुट्ठी में करते भारतीय उद्योगपतियों की जेब में इतना पैसा बढ़ गया है कि वो देश के गरीबों को भी अमीर दिखा देता है। लेकिन, जब उन अमीरों और अमीर होते लोगों को हटाकर सिर्फ खेती या फिर दूसरी ऐसी जगहों पर बिना तय रकम के काम करने वाले लोगों का सर्वे किया गया तो, निकलकर आया कि वो तो, जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खा जाते हैं। दरअसल वो कमाते ही इतना कम हैं कि खाने को भी पूरा नहीं होता।
नेशनल कमीशन फॉर इंटरप्राइजेज इन अनरिकॉगनाइज्ड सेक्टर (NCEUS) के ही आंकड़ों के मुताबिक, देश के किसानों में से 84 प्रतिशत किसान हर महीने सिर्फ 2115 रुपए कमा पाते हैं जबकि, उनका खेती पर खर्च हर महीने करीब 2770 रुपए होता है। और, यहीं से शुरू होती है किसान के कर्ज के जाल में फंसने और आतमहत्या की। ऐसा नहीं है कि सरकार ये सब जानती नहीं है। ये सर्वे सरकार से जुड़ी संस्था ने ही कराया है सरकार में बैठे लोगों को ये असलियत अच्छे से मालूम है। लेकिन, उन्हें मर्सिडीज में जाने वाला किसान ही दिखता है। जो, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रहा है। और, बड़े-बड़े व्यापारियों को भी पीछे छोड़ रहा है। वो, एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति के मालिक मुकेश अंबानी के रिलायंस फ्रेश को सीधे सब्जी, अनाज बेच रहा है। उसके पास देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी के मालिक सुनील भारती मित्तल के नुमाइंदे सौदे के लिए आ रहे होते हैं। टाटा-बिड़ला-मित्तल-गोदरेज सब बियानी के दिखाए रास्ते पर रिटेल में कूदे जा रहे हैं। और, इसलिए ज्यादातर को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का धंधा ज्यादा मुनाफे वाला दिख रहा है। इसलिए हर जगह बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर ही दिखती है। लेकिन, ये भी समझना जरूरी है कि बावजूद इसके खेती में क्यों ढाई प्रतिशत की भी विकास दर नहीं मिल पा रही है।
कुल मिलाकर मामला यही है कि देश में एक वर्ग बना है जो, अचानक मेट्रो में कारों में घूमने लगा है। जो, मॉल में खरीदारी करता है और मल्टीप्लेक्स में फिल्में देखता है। लेकिन, बड़ा वर्ग अभी भी इन लोगों को अचरज से ही देखता है। उसको लगता है कि ये कहीं दूसरे देश के लोग तो नहीं हैं। शायद उसकी समझ कुछ ठीक भी है क्योंकि, कमाई शाइनिंग इंडिया में रहने वालों की ही बढ़ रही है। भारत और इंडिया में बढ़ते फर्क की ही वजह से ही देश किसी शहर-गांव-कस्बे में 20 रुपए रोज कमाने वाला भी गरीबी रेखा के ऊपर है। और, मुंबई-दिल्ली जैसे मेट्रो में रहने वाला हर रोज 2000 रुपए की कमाई के बाद भी अमीरों के बीच में अपने को गरीबी रेखा के आसपास ही पाता है।

Thursday, August 09, 2007

हम महंगाई से मरे जा रहे हैं औ विदेशियों के लिए सबसे सस्ता भारत

दुनिया भर में घूमने वाले कामकाजी विदेशियों के लिए रहने-खाने-मस्ती करने के लिए लिहाज से भारत सबसे सस्ता है। और, ये हम पूरी दुनिया की बात नहीं कर रहे हैं। महंगाई के लिहाज से अभी तो हम एशिया के ही दूसरे कई देशों से पीछे चल रहे हैं। वैसे भारतीय शहर इस बात के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं कि वो दुनिया के महंगे शहरों में शामिल होकर जरा तो इज्जत कमा सकें। उन्हें इसमें कुछ सफलता भी हासिल हुई है। मुंबई (यहां मैं रहता हूं, जानता हूं कि यहां रहना कितना मुश्किल है), दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद और बैंगलोर के साथ पुणे भी महंगे शहरों की लिस्ट में एक से तीन नंबर तक आगे बढ़ गए हैं। ये सब बातें कही गई हैं हांगकांग की एक कंसल्टेंसी फर्म ECA इंटरनेशनल के अभी की सर्वे रिपोर्ट में। दरअसल ये सर्व ये भी जानने की कोशिश थी कि प्रोफेशनल्स के लिए अच्छी लाइफस्टाइल (जीवन शैली ) वाले शहर कौन से हैं। जाहिर है कि अच्छी लाइफस्टाइल वहीं मिल सकती है, जहां सुविधाएं-विलासिता होंगी। और, आज की सुविधा बिना महंगाई के मिलती नहीं।

दुखद ये रहा कि काफी दौड़ लगाने के बाद भी भारत के सबसे महंगे सात शहर एशिया के 41 महंगे शहरों को लिस्ट में नीचे से आधे तक भी नहीं पहुंच पाए। दक्षिण कोरिया का सियोल शहर सबसे महंगे शहर का तमगा पा रहा है। और, भारत का सबसे महंगा शहर मुंबई इस लिस्ट में 24वें और दुनिया के महंगे शहरों की लिस्ट में 192वें नंबर पर है। और, ये हाल तब है जब 50 हजार महीने की कमाई करने वाले लोग भी ये सोचते हैं कि 11 महीने का करार खत्म होने के बाद अगला कमरा कितना महंगा मिलेगा। दिल्ली भी मेहनत करके मुंबई के ठीक पीछे ही है। चेन्नई एशिया का 30वां, हैदराबाद 32वां, कोलकाता 35वां, पुणे 36वां और बैंगलोर 40वां सबसे महंगा शहर है। इतनी मेहनत के बाद भी ये महंगे भारतीय शहर बेचारे दुनिया में महंगाई के मामले मेंबहुत पीछे हैं। अब भारतीय शहरों में लाइफस्टाइल अच्छी (महंगाई ज्यादा नहीं है!) नहीं है इसलिए यहां काम करने वालों को कंपनियां विदेशी शहरों के लिहाज से पैसे भी कम देती हैं। सर्वे कहता है कि भारत के महंगे शहरों में भी रहना काफी सस्ता है। अब इन सर्व वालों को कौन बताए कि मुंबई जैसे शहरों में रहने वाले जोड़े बड़ा घर न ले पाने की वजह से दिन में सड़क किनारे या पार्क में जिंदगी बिता देते हैं। वैसे सर्वे कह रहा है कि भारतीय शहरों में महंगाई की रफ्तार अच्छी है। और, जल्दी ही वो दुनिया के नहीं तो, एशिया के शहरों को तो मात दे ही देंगे। चलिए हम भी उम्मीद करते हैं कि जब तक महंगाई इस रफ्तार तक पहुंचे। हम भारत के सबसे महंगे शहर से कुछ सस्ते शहर में आसियाना तलाश सकें। हाल ये है कि हमें महंगाई मारे डाल रही है और दुनिया वाले ये कहके हमें नीचा दिखा रहे हैं कि विदेशीशहरों के लिहाज से भारत में अभी अच्छी लाइफस्टाइल (महंगाई) नहीं है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...