तारीख पर तारीख लेकिन, कब तक?

सभी टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आजकल खूब चल रहा है। किसी मामले में आरोपी (सजा सुनाए जाने तक अभियुक्त नहीं कह सकते) को पेश किया जाता है। और, सरकारी वकील के कुछ बोलने से पहले ही बचाव पक्ष का वकील खड़ा होकर कहता है कि गलती बैल की है। अदालत में बैल को बुलाया जाए और इसी पर जज साहब अदालत अगली सुनवाई तक के लिए मुल्तवी कर देते हैं। ये अगली सुनवाई तब तक चलती रहती है जब तक, दोनों वकील, आरोपी और खुद जज बूढ़े नहीं हो जाते हैं। वैसे आखिर में भी फैसला नहीं सुनाया जा पाता। पहली नजर में मुझे ये विज्ञापन भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित पड़े मामलों पर बनाया हुआ लगा। लेकिन, अंत में पता चलता है कि ये ग्रीन प्लाई का विज्ञापन है।

सच्चाई यही है कि, ग्रीन प्लाई का विज्ञापन भारतीय न्याय व्यवस्था में खिंच रहे मामलों की उदाहरण ही लगता है। मुंबई में फुटपाथ पर सोते लोगों को कुचल देने वाले एलिस्टर परेरा को छोड़ देने के मामले पर काफी हो हल्ला के बाद मामला फिर चला। लेकिन, परेरा को फिर से जमानत मिल गई है। 14 साल तक विशेष टाडा अदालत बनाकर मुंबई बम धमाकों में आरोपियों को फैसला सुनाया गया। लेकिन, फैसले की कॉपी न मिलने के बहाने संजय दत्त और दूसरे कई सजा पाए लोग जमानत पर है। आगे सुप्रीमकोर्ट में कब तक मामला चलेगा पता नहीं।

सलमान खान चिंकारा मामले में कुछ दिन की जेल काटकर जमानत पर फिर से लौट आए हैं। लोगों के लिए और ज्यादा हीरो बन चुके हैं। ऐसे हजारों हाई प्रोफाइल मामले अदालतों में तारीख पर तारीख पाते जा रहे हैं। लेकिन, ऐसा नहीं है कि ऐसा सिर्फ हाई प्रोफाइल मामलों में ही हो रहा है। आम लोगों के लिए भी अदालत से न्याय लेने के लिए औसतन 10-15 साल का इंतजार करना पड़ रहा है।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक, इन सभी मामलों को अभी की रफ्तार में निपटने में करीब सवा तीन सौ साल लग जाएंगे। सुप्रीमकोर्ट में हाल के दिनों में फैसले आने में थोड़ी जल्दी हुई। और, लंबित मामले जो, एक लाख से ज्यादा थे अब, घटकर कुछ बीस हजार ही रह गए हैं। लेकिन, हाईकोर्ट और उससे नीचे की अदालतों में हाल और बुरा है। राज्यों की हाईकोर्ट में 32 लाख से ज्यादा मामलों पर फैसला अंटका हुआ है। तो, निचली अदालतों में 2 करोड़ से ज्यादा मामले फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

संवेदनशील और ऐसे मामले जो, आम लोगों और मीडिया की सीधी नजर में रहते हैं। उन पर फैसले आने में भी सालों लग जाते हैं। जेसिका लाल, प्रियदर्शनी मट्टू और नीतीश कटारा हत्याकांड जैसे मामले इसके बड़े उदाहरण हैं। दिल्ली के उपहार सिनेमा हॉल में आग लगने से 59 लोग मारे गए थे। इस मामले की सुनवाई जिस रफ्तार से चल रही है, इसमें फैसला मिलने तक कम से कम बीस साल तो लग ही जाएंगे।
यहां तक कि आतंकवादियों के मामले में भी अदालतें इतने समय तक फैसला लटकाए रखती हैं कि देश को इंडियन एयरलाइंस के हाईजैक जैसा दाग झेलना पड़ा। जिसके बदले में पांच साल से जेल में बंद खूंखार आतंकवादी को छुड़ा लिया गया।

वैसे आजकल अदालतें कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं। मीडिया पर, जनता पर, नेताओं पर, केंद्र और राज्य सरकारों पर, पुलिस पर अपने से ही संज्ञान लेकर फैसले फटाफट सुना रही हैं। बंद से लेकर खराब सड़कों तक और आरक्षण से लेकर अतिक्रमण तक अदालत जागृत है। लेकिन, सवाल यही है कि खुद संज्ञान लेकर फैसला सुनाने में दो-चार दिन का समय लेने वाली अदालतें एक ही मामले में दस से बीस साल का समय क्यों लगा दे रही हैं।

अदालतों से फैसले निकलने में देरी का आलम ये है कि 1994 में गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की गोली मारकर की गई हत्या के मामले में आरोपियों को पटना की स्थानीय अदालत से अब सजा सुनाई गई है। पूर्व सांसद आनंद मोहन को इस मामले में फांसी और उनकी पत्नी लवली आनंद को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है। लेकिन, मामला अभी भी अदालत में ही रहेगा। क्योंकि, लवली आनंद ने इस फैसले के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है। अब अगले कितने सालों में ये मामला हाईकोर्ट से सुप्रीमकोर्ट पहुंचेगा और सुप्रीमकोर्ट से फैसला निकलने में कितना समय लगेगा, ये पता नहीं।

मारे गए डीएम जी कृष्णैया की पत्नी ने फैसला आने के बाद मीडिया में कहा कि फैसला आने में इतना समय लगा कि अब न्याय नहीं लगता। अदालतों की वजह से इस समय समाज में बहुत कुछ अच्छा चल रहा है। लेकिन, अदालतों से फैसले आने में हो रही देरी देश में कई बड़ी परेशानियों की वजह भी बन गई है। उम्मीद यही की जा सकती है कि अदालतें समाज की भलाई के लिए जल्दी और सही फैसले लेंगी जिससे किसी और कृष्णैया की पत्नी को न्याय व्यवस्था से निराशा न हो।