18 घंटे का सफर 26 घंटे में क्यों पूरा होता है?

अक्सर लालू पुराण चर्चा में रहता है। सब कह रहे हैं कि लालू ने कमाल कर दिया है। लालू ने रेलवे को पटरी पर ला दिया है। घाटा कम कर दिया है, मुनाफा ही मुनाफा हो रहा है। रेलवे आधुनिक होती जा रही है। रेलगाड़ियां, एयर लाइंस से टक्कर लेने लगी हैं। अभी मैं इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में मीडिया पर हुई एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हो कर लौटा तो, ये सब लालू की पब्लिक रिलेशन एक्सरसाइज भर लगी। जाते और आते दोनों समय रेलगाड़ी दो घंटे से ज्यादा की देरी से पहुंच पाई।

मुंबई से इलाहाबाद मैं महानगरी एक्सप्रेस से गया। महानगरी एक्सप्रेस में नए बने डिब्बे लगे हैं। तृतीय श्रेणी की वातानुकूलित बोगियों में भी बढ़िया चार्जिंग प्वाइंट लगे थे। लेकिन, अब तक इस गाड़ी में पैंट्री कार नहीं लग पाई है। मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से चली गाड़ी जबलपुर तक बड़े मजे से सफर तय करती रही लगा कि गाड़ी समय से कुछ पहले ही पहुंच जाएगी। लेकिन, मानिकपुर पहुंचते-पहुंचते उम्मीदें धूमिल होने लगी। मानिकपुर तक समय से कुछ पहले ही पहुंची गाड़ी ने इलाहाबाद स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते 2 घंटे की देरी कर दी।

मानिकपुर और नैनी के बीच गाड़ी करीब चार जगह 20-20 मिनट के लिए रुकी। नैनी पर भी गाड़ी को ज्यादा समय तक रुकना पड़ा। नैनी पार करने के बाद भी बात बनी नहीं और गाड़ी को 5 मिनट तक प्लेटफॉर्म खाली होने का इंतजार करना पड़ा। 12 बजे पहुंचने वाली महानगरी इलाहाबाद 1.45 बजे पहुंची।
इलाहाबाद से वापसी का टिकट बनारस सुपरफास्ट एक्सप्रेस में था। गाड़ी इलाहाबाद स्टेशन से एकदम सही समय पर छूटी। लेकिन, मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनल यानी कुर्ला स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते फिर 2 घंटे देर हो गई। बनारस सुपरफास्ट की रफ्तार भुसावल से पहले ही टांय-टांय फिस्स हो गई थी। रही-सही कसर नासिक के बाद पूरी हो गई। इगतपुरी से कुर्ला पहुंचने में करीब ढाई घंटे लग गए। गाड़ी जब-जब रुकी ज्यादातर बार यही होता था किसी गाड़ी के पास होने का इंतजार किया जा रहा है। अब सवाल ये है कि अगर लालू यादव की रेल ने 20 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का मुनाफा कमाया है तो, पटरी इतनी क्यों नहीं लग पा रही है कि गाड़ी उस पर अपनी रफ्तार से दौड़ सके।

बार-बार बुलेट ट्रेन और तेज रफ्तार वाली रेलगाड़ियों की योजना बनती-बिगड़ती रहती है। लेकिन, पहले अपनी रेलगाड़ियों की अभी जो ताकत है, उसी पर उनको पूरी रफ्तार से दौड़ाने की कोशिश क्यों नहीं हो पा रही। मेरे जैसे लोग जिनको बड़ी मुश्किल से इलाहाबाद (घऱ) जाने की छुट्टी मिल पाती है। अगर, सफर में दोनों तरफ 26 की बजाए 20 या 18 घंटे लगें तो, इतना लंबा सफर शायद कुछ कम पीड़ादायक लगे। ये गाड़ियां आसानी से 4-6 घंटे दोनों तरफ बचा सकती हैं। बस इन्हें पटरियां खाली मिलें। तभी ये कहना सही होगा कि लालू की रेल पटरी पर आ गई है। वैसे ये सिगनल न मिलने वाली रुकावट सिर्फ मुंबई-इलाहाबाद रूट पर ही नहीं है। मैं दिल्ली से इलाहाबाद एक बार प्रयागराज एक्सप्रेस से आ रहा था। सुबह 6.45 बजे आने वाली प्रयागराज समय से आधे घंटे पहले ही सूबेदारगंज के आउटर पर आकर खड़ी हो गई। मतलब दिल्ली से इलाहाबाद से प्रयागराज एक्सप्रेस के समय में भी आधे-आधे घंटे दोनों तरफ से हर रोज बचाए जा सकते हैं।
अभी बहुत सी एक्सप्रेस रेलगाड़ियां हैं जो, 24 घंटे से ज्यादा की दूरी तय करती हैं लेकिन, उनमें बमुश्किल ही मोबाइल या लैपटॉप के चार्जिंग प्वाइंट लग पाए हैं। साफ-सफाई का ठेका यूरेका फोर्ब्स को देने के बाद भी 27 अक्टूबर को मुंबई आ रही बनारस सुपरफास्ट एक्सप्रेस की सफाई के लिए 2 बार अनाउंसमेंट कराने पर भी कोई सफाई कर्मचारी नहीं आ पाया। इस ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे घुटन का सा अहसास देते रहते हैं। और, लालू यादव इसको बेहतर करने के बजाए उन्हीं डिब्बों में और सीटें जोड़ने की जुगत बना रहे हैं।
मुझे खबर पढ़ने को मिली थी कि इलाहाबाद से मानिकपुर एक ही ट्रैक की वजह से देरी होती है। और, 2 ट्रैक करने के इसके एक हिस्से का काम पूरा हो गया है, दूसरे हिस्से का काम दिसंबर तक पूरा हो जाएगा तो, डेढ़ से दो घंटे बचाए जा सकेंगे। लेकिन, भुसावल से कुर्ला पहुंचने में हुई देरी की वजह मैं नहीं समझ पाया। उम्मीद करता हूं की अगली बार इलाहाबाद के लिए टिकट बुक कराऊंगा तो, टाइम टेबल में 24 घंटे का समय घटकर 22 घंटे तो, हो ही जाएगा और इतने समय में ट्रेन पहुंच भी जाएगी। मेरा भरोसा कितना पूरा होगा इस पर कुछ प्रकाश तो, ज्ञानदत्तजी डाल ही सकते हैं। और, मेरे जैसे लोगों की पीड़ा कुछ ऊपर तक पहुंचा भी सकते हैं।