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Monday, September 09, 2013

दंगा !


मुजफ्फरनगर का दंगा भी धर्म की लड़ाई है। ये साबित हो ही चुका है। लेकिन, क्या ये धर्म की लड़ाई है। दरअसल इस देश में एक बड़ी विचित्र बात जो हो बार-बार साबित हो चुकी है कि दंगा या फिर इस तरह का कोई तनाव हिंदु मुस्लिम वोट दिलाने में मददगार होता है। और इससे भी बड़ी बात ये साबित करने की कोशिश होती रही है कि दक्षिणपंथी पार्टियां ही इस सारे ध्रुवीकरण के लिए अकेले जिम्मेदारी निभाती हैं। ये बात कांग्रेस, बसपा, सपा, राजद और जाने कौन-कौन सी देश की पार्टियां लगातार साबित भी करती रहती हैं। दुखद ये नहीं है। देश की ज्यादातर पार्टियां धर्मनिरपेक्ष होने के नाम पर ही मुसलमान वोटों की लड़ाई लड़ती रहती हैं। और ठीक है अगर सिर्फ एकाध दक्षिणपंथी पार्टियों को पूरी तरह सांप्रदायिक बता भर देने से मुसलमान वोट मिल जा रहे हैं तो बुरा क्या है। लेकिन, दुखद बात ये है कि अब कई स्वानामधन्य संपादकों को भी एकाध दक्षिणपंथी पार्टियां उसमें भी राष्ट्रीय स्तर पर अकेली बीजेपी ही है जो देश के सारे दंगों की वजह दिखती है। जबकि, ये साबित होता रहा है कि दंगे या ऐसी किसी भी तनाव वाली स्थिति का मुसलमान वोटों के तौर पर थोक फायदा उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को ही होता रहा है। फिर भी दंगे या ऐसी धर्मों के बीच तनाव की स्थिति के लिए जिम्मेदार बीजेपी ही होती है। ये स्थिति ऐसी बिगड़ चुकी है कि अगर बीजेपी शासन वाले राज्य में दंगा हो तो राज्य सरकार कराती है और अगर किसी दूसरी पार्टी का शासन है तो मुख्य विपक्ष में या मुख्य विपक्ष से भी नीचे कहीं दिख रही बीजेपी साजिश करके कराती है।

और बीजेपी ही दंगे या हिंदु मुसलमान तनाव के लिए जिम्मेदार होती है इस बात को साबित करने में कई जिम्मेदार संपादक धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से से भी कई हाथ आगे निकलने की कोशिश करते दिखते हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य है कि हिंदु मुस्लिम के बीच के तनाव की खबर बने इससे पहले जब वो सीधे अपराध की भी खबर होती है तो भी मीडिया उसमें अल्पसंख्यक बहुसंख्यक के लिहाज से पहचान बता या छिपा रहा है। दो धर्मों से जुड़ा मसला है तो उसे बिल्कुल भी मीडिया में नहीं आना चाहिए। दंगा दिखाने से दंगा भड़कता है इस नैतिक नीति के तहत भारतीय मीडिया 2002 के बाद का कोई दंगा नहीं दिखाता #UPriots की चर्चा तो बिल्कुल नहीं। पत्रकारिता की ये नैतिक नीति काफी हद तक सही भी है। लेकिन, ये नीति जब अपनी सहूलियत के लिहाज से बदलती है तो, शायद दंगा भड़काने वालों को और आसानी हो जाती है। ये ऐसे कि कई स्वनामधन्य संपादक ऐसे मसलों पर हिंदुओं के खिलाफ लिखकर ये सोचते हैं कि वो अल्पसंख्यक मुस्लिमों का भला कर रहे हैं। अब एक उदाहरण देखिए आशुतोष की अच्छे पत्रकारों में गिनती है। देश के एक बड़े चैनल के संपादक हैं। लेकिन, मुजफ्फरनगर के मसले पर वो पहले से ही सारी गलती दक्षिणपंथियों पर थोपने लगते हैं। और एकाध उग्र दक्षिणपंथियों के ट्वीट पकड़कर सारा निष्कर्ष निकाल लेते हैं। उन्होंने मुजफ्फरनगर मसले पर ट्वीट किया - Hate tweets should be banned and  such persons should be arrested एकदम सही बात है किसी भी जिम्मेदार संपादक को यही लाइन लेनी चाहिए। लेकिन, इसके बाद की एक और ट्वीट पढ़ने पर लगा कि वो संपादकीय जिम्मेदारी निभाते-निभाते जल्दी से सहूलियत वाली दक्षिणपंथी विरोध की भूमिका चुन लेते हैं। उनका ट्वीट आता है - I repeat those who are writing anti Muslim tweets should be arrested. Unless they are put behind bars they will not change. Harmony is must. अब इस ट्वीट को देखने के बाद लगने लगता है कि वो सारी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के प्रवक्ता की जिम्मेदारी भी निभाने से चूकना नहीं चाहते। ऐसे माहौल में दंगा करना और दंगे की बात करना एक जैसा ही हो जाता है। लेकिन, किसके लिए। उनके लिए जिनके ऊपर दंगे का कोई असर नहीं होता या सकता। 

किसी भी दंगे में किसी की जान जाए ये दुखद है लेकिन, क्या दंगे और जान जाने में भी communal secular का फर्क हो जाता है। पता नहीं पत्रकार राजेश वर्मा का दंगों के कवरेज में मरना दंगा न दिखाने की नैतिक नीति में बदलाव लाता है या नहीं। हम भारतीय भी गजब हैं एक 2002 से @narendramodi कुछ के लिए राक्षस बन गए। हर दूसरे चौथे 2002 दोहराने वाले नियमित रक्षक। ऐसा क्यों? ये सवाल इसीलिए भी उठता है कि मुख्यमंत्री बनने के साथ ही दंगों को न्यौता देने वाली अखिलेश सरकार की बर्खास्तगी की मांग करने वाली पार्टियां भी सेक्युलरिज्म के नाम पर इसमें लगे हाथ बीजेपी की साजिश की जांच की मांग भी जोड़ देती हैं। ये जो दंगा हुआ ये एक अपराधिक घटना थी। जिसमें एक हिंदु लड़की के साथ छेड़खानी एक मुस्लिम लड़के ने किया। लड़की के भाइयों ने उस लड़के को मार दिया। फिर मारे गए लड़के के परिजनों ने लड़की के दोनों भाइयों को मार दिया। छेड़खानी और उसके बाद के किसी भी समय पर कानून व्यवस्था काबू करने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ राज्य सरकार की थी। इसके लिए जो खाप पंचायत बुलाई गई उसका भी आह्वान भारतीय किसान यूनियन और खापों ने मुख्य रूप से किया था। इसको समर्थन राजनीतिक वजहों से सिर्फ बीजेपी ने नहीं, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल ने भी दिया था। ये धार्मिक लड़ाई नहीं थी। न धार्मिक दंगा। ये पूरी तरह से अखिलेश सरकार की नाकामी है। 

मैं हिंदु हूं। पत्नी तीज का व्रत रखती है। उसी के साथ पूजा के लिए मंदिर गया था। दरअसल मैं पूजा तो कम ही कर रहा था। मुजफ्फरनगर की खबरें देख-पढ़ रहा था। आरती के बाद मंदिर के पुजारी ने ऊंचे स्वर में बोला और सबने दोहराया, मैंने भी। धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हो। आज ये काफी महत्वपूर्ण है।

Wednesday, October 03, 2007

आस्था पर हमले के बिना भी तो बात बन सकती है

राम का अस्तित्व था या नहीं, इसे जानने का इन दिनों भारत में महाअभियान चल रहा है। राम को भगवान मानने वाले और उनके अस्तित्व को ही नकारने वाले, दोनों ही जल्दी से जल्दी राम के होने न होने का तर्क खोज रहे हैं। और, जिससे जितना कुछ बन पड़ रहा है वो, लोगों को बता दे रहा है। इस सबके बीच में सबसे ज्यादा फंसे वो लोग हैं जो, तटस्थ हैं यानी न तो अंधभक्त हैं और न ही वो इस बात को सिरे से खारिज करते हैं कि राम थे ही नहीं।

मेरी निजी राय ये है कि भगवान राम का होना न होना एक ऐसा विषय है जो, तर्क के परे हैं। ये उस विज्ञान के आगे की आस्था जैसा ही है। विज्ञान शरीर जानता है लेकिन, ये नहीं पता लगा पाया कि शरीर का प्राण कहां से निकल जाता है। अब तर्क के परे मैं क्यों कह रहा हूं। इसकी भी खास वजह है। अब तक हम ये जान नहीं सके हैं कि आखिर हमारे जन्म से पहले और मृत्यु के बाद क्या है। मैंने देखा है कि जो, जोर-जोर से चिल्लाते हैं कि भगवान होते ही नहीं। अकेले में जब घबराते हैं तो, भदवत्भजन ही कल्याण का रास्ता दिखता है।
अब मैं अपनी ही बात करूं तो, मुझे कभी-कभी मंदिर जाना अच्छा लगता है। थोड़ी पूजा कर लेने से भी मन साफ सा होता दिखता है। लेकिन, अब मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर जाने पर पूजा के बाद मंदिर में दो चूहे के कान में अपनी मुराद को पूरी करने के लिए भगवान से अर्जी लगाना तो, मुझे भी अंधविश्वास लगता है। लेकिन, चूहे के कान में पूरे मन से मुराद मांगने पर बीबी से मैं तर्क मांगकर घर में कलह करूं ये तो, बिल्कुल ही ठीक नहीं है। ठीक है ये अपनी-अपनी आस्था का विषय है। लेकिन, सेतुसमद्रम प्रोजेक्ट पर कुछ ऐसा ही देश में हो रहा है।

छोटी-छोटी बातें हैं। 2000-2001 के महाकुंभ के दौरान मैं रिपोर्टिंग कर रहा था। मेरे घर से सभी लोग कम से कम अमावस्या और दूसरे सभी प्रमुख स्नान पर्व पर गंगा स्नान करके मुक्ति की तलाश कर रहे थे। लेकिन, पूरे तीन महीने वहीं रहने के बावजूद शायद ही एक-दो दिन मैंने गंगा में स्नान किया होगा। वजह ये कि गंगा का पानी इतने लोगों के एक साथ नहाने और जिन शहरों से गंगा गुजरती हैं, वहां के नालों का पानी मिलने से, गंदा हो गया है। गंगाजल को घरों में बोतल में अलग से रखा जाता है। और, महीनों उसमें किसी तरह की खराबी नहीं आती है। अब गंगा गंदी हो गई तो, स्वाभाविक है कि गंदे नाले से मिल रहे गंगा के पानी को बोतल में रखने पर कीड़े आएंगे ही। अब साफ है कि गंगा के पानी में तो कोई गड़बड़ तो है नहीं, गड़बड़ी तो, उसे गंदा करने वाले हम-आप में ही है। उसके बाद तो ये कुतर्क ही हुआ ना कि इतनी गंदी गंगा में स्नान करने से मुक्ति कैसे मिल सकती है।

कुंभ मेले में भी मैंने नजदीक से देखा है कि भगवान से भक्तों को मिलाने का दावा करने वाले ज्यादातर साधु सिर्फ अपनी दुकान चला रहे हैं। लेकिन, ये भी सच्चाई है कि इन ढोंगी-पाखंडी बाबाओं-साधुओं के साथ-साथ समाज कई ऐसे संत भी हैं जो, समाज कल्याण और भगवान के भजन में ही मस्त रहते हैं। और, इनके प्रभाव में समाज का एक बड़ा तबका अच्छे काम करने की कोशिश करता है। जहां तक राम को भगवान मानने वालों की बात है। राम को भगवान मानने वाले इस बहाने कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं। राम को भगवान मानने वाले उनके नाम पर अच्छे काम ही करते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम का उदाहरण देकर कुछ मर्यादित रहने की कोशिश करते हैं। अब अगर राम के अस्तित्व को सिर्फ तर्कों के आधार पर नकार दिया गया तो, समाज के उस तबके को रास्ता दिखाने के लिए कौन सा आदर्श महापुरुष होगा। जो, तर्कों के आधार पर खरा उतरता है। इतिहास के आधार पर और तर्कों से सिद्ध किया जाने वाला कोई महापुरुष तो बड़ी मुश्किल से ही दिखाई देता है।

महातमा गांधी और विवेकानंद ही ऐसे महापुरुष हैं, जिनके इतिहास हैं और जिनकी लोग मंदिर बनाकर भी पूजा करते हैं। शून्य पर विवेकानंद के दिए भाषण का हवाला मैं कई बार सुन चुका हूं लेकिन, ये भाषण क्या था ये मुझे आज तक पढ़ने को नहीं मिल सका। इनके ऊपर भी सवाल उठते है। तर्क-कुतर्क भी होते हैं। लेकिन, सवाल ये है कि किसी की आस्था पर चोट की राजनीति कैसे की जा सकती है। भारत जैसे देश में जहां सभी धर्मों-समुदायों के लिए बराबर सम्मान की बात संविधान में कही गई है। वहां किसी को भी दूसरे की आस्था पर चोट करने को क्यों कानून के दायरे से बाहर रखा जा सकता है।

राम के नाम पर देश भर में आंदोलन कर रही विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी हो या राम का होना
ही नकार रहे करुणानिधि हों। सब सिर्फ अपनी राजनीति कर रहे हैं। करुणानिधि राम को झुठलाकर दक्षिण भारत में अपने उस वोटबैंक को और मजबूत करना चाहते हैं जो, पेरियार के समय से किसी भी ऐसी बात का विरोधी हो गया है जो, ब्राह्मणों या ऊंची जातियों से जुड़ी हुई है। तो, विश्व हिंदू परिषद के राम विलास वेदांती जैसे नेता राम के खिलाफ बोलने वाले करुणानिधि का सिर लाने वाले को सोने से तौलने की बात करते हैं। जिससे फिर से उन्हें कुछ ज्यादा लोग पूछने लगें। बाद में वेदांती गीता का गलत हवाला पलट गए।
एक की आस्था पर चोट करने वाले में दूसरे की आस्था हो जाती है। मुसलमानों के खिलाफ उल्टे-सीधे बयान देकर तोगड़िया जैसे नेताओं की हिंदू समाज ज्यादा सुनने लगता है तो, एम एफ हुसैन देवी-देवताओं की गलत तस्वीरें बनाकर दुनिया में मशहूर हो जाते हैं। सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पूरा हो या नहीं। इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन, राजनीति के बहाने आस्था पर चोट करना तो किसी भी तर्क से सही साबित नहीं किया जा सकता। आज जब मैं ये लिख रहा था, उसी समय टीवी चैनल पर सीपीएम के मुखपत्र के संपादक प्रोफेसर एम एन विजयन की प्रेस कांफ्रेंस करते-करते मौत की खबर चल रही थी। अब विजयन के किए को अच्छा मानने वाले कहेंगे कि हंसते-हंसते विजयन को मिली मौत, उनके अच्छे कर्मों का फल है। और, विजयन के विरोधी कहेंगे कि कोर्ट ने भले ही विजयन को बरी कर दिया हो लेकिन, भगवान सब देखता है। उसे सजा मिल गई। कुल मिलाकर आस्था का ही विषय है। वैसे हर बात को तर्क पर कसने वाले तर्क से बता सकते हैं क्या कि अच्छे भले विजयन की प्रेस कांफ्रेंस करते-करते मौत कैसे हो गई।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

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