दलित एक्ट में मायावती अंदर क्यों नहीं हुईं

9 अगस्त को मायावती ने अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी का एलान कर दिया। वो, भी रैली में। एलान भी कैसा कि उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुन लिया है। लेकिन, उसका नाम लोगों को तभी पता चलेगा जब वो, गंभीर रूप से बीमार हों या फिर उनकी अकस्मात मृत्यु हो जाए या फिर कुछ ऐसी ही बड़ी आपदा हो।

मायावती ने इस एलान के वक्त लखनऊ रैली में जोर देकर कहाकि उनका उत्तराधिकारी दूसरी पार्टियों की तरह उनके परिवार से नहीं बल्कि, एक खेत-खलिहान में काम करने वाली मां का बेटा होगा। अपने वोटबैंक को और पक्का करने के लिए मायावती ने भरी रैली में और आगे जाकर कहा- मेरा उत्तराधिकारी दलितों में भी खास चमार जाति का होगा। अब सवाल ये है कि क्या मायावती को सार्वजनिक मंच से ऐसे जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल की इजाजत इसलिए मिल जाती है कि वो भी उसी जाति की हैं।

दलितों को अपमान के बोध तभी होगा जब कोई उनसे ऊंची जाति का ही उन्हें जातिसूचक शब्दों से बुलाए। महेंद्र सिंह टिकैत इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करें तो, दलित एक्ट में फंसें और मायावती इस्तेमाल करें तो, कुछ चर्चा तक नहीं। कानून का यही इस्तेमाल, कानून के गलत इस्तेमाल के रास्ते तैयार कर देता है। यानी हम जिस जाति के हैं राजनीतिक फायदे के लिए अपने हिसाब से जाति का गंदा या अच्छा इस्तेमाल कर सकते हैं।