जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है


पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिए। पाकिस्तान से सारे रिश्ते खत्म कर लेना चाहिए। मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले और उसके बाद इसमें पाकिस्तानी धरती के इस्तेमाल के साफ सबूत के बाद इस तरह की आवाजें तेज हो गई हैं। राजनीतिक नफा-नुकसान के लिहाज से ही सभी पार्टियों के नेता सड़क पर बयान दे रहे हैं। हां, अच्छी बात ये है कि संसद के भीतर आतंकवाद पर हुई चर्चा में बरसों बाद भारतीय नेता की ही तरह सारी पार्टियों ने बात की। कांग्रेस-भाजपा-लेफ्ट के चिन्हों से भले ही जनता उन्हें अलग नहीं कर पा रही है। अब सवाल ये है कि उस दिन की चर्चा के बाद क्या।

पाकिस्तान और भारत की सरकारें लगभग एक जैसे सुर में बात कर रही हैं। दोनों अपने देश के लोगों का भरोसा खोना नहीं चाहते। दोनों देशों की सरकारों को अब आतंकवाद नासूर बन गया दिख रहा है। और, उस नासूर का मवाद इस कदर बढ़ता जा रहा है कि शरीर का अंग कटने की नौबत आ गई है। वैसे, इस नासूर को पालने-पोसने में 1947 के बाद से दोनों देशों की सत्ता संभालने वालों ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत धार्मिक बुनियाद पर नहीं बंटा था, सब रंग मिले थे इसलिए खूनी रंग हम पर बहुत कम चढ़ा और इसकी वकालत करने वाले अकसर सामाजिक तौर पर अलग-थलग हो जाते थे। लेकिन, इसने भारत में एक ऐसी जमात खड़ी कर दी जो, सेक्युलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर अपने सारे दुष्कर्मों को निपटा देना चाहती है।

ऐसी जमात का काम चलता भी रहा। ये जनता के गुस्से का शिकार होते थे। लेकिन, फिर पलटी मारकर स्वभाव से शांति प्रिय भारतीय जनता की आधी-अधूरी, लूली-लंगड़ी ही सही लेकिन, लोकतांत्रिक पसंद बन जाते थे। और, उधर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का हाल ये कि चाहे तानासाह हो या फिर लोकतांत्रिक हुक्मरान- सबको ये लगता था कि बिना हिंदू-हिंदुस्तान को गरियाए, भारत में आतंकवाद फैलाए उनकी सत्ता बहुत दिनों तक नहीं चल सकती। सबको जेहाद इस्लाम का सबसे जरूरी हिस्सा लग रहा था और ये भी लगता था कि भारत के मुसलमानों से भी कम आबादी वाला ये देश ही दुनिया में इस्लाम का झंडा उठाकर चल सकेगा। इस चक्कर में पाकिस्तान में जमात ही जमात खड़ी हो गई। ये जमातें पाकिस्तानी तानाशाहों और लोकतांत्रिक सरकारों के सरदारों से बड़ी हो गईं। और, हाल ये हो गया कि अवाम की चुनी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो निपट गईं।

इसके बाद पत्नी विरह ने आसिफ अली जरदारी को शायद इतनी नजदीक से आतंकवाद का मतलब समझाया। जरदारी और उनका विदेश में पढ़ रहा बेटा पाकिस्तान के अमन पसंद लोगों के साथ ही दुनिया के लिए आतंकवाद के खिलाफ एक हथियार की तरह दिखने लगे। लेकिन, ये आतंकवाद इतना कमजोर तो था नहीं। इसे तो, अमेरिका ने ही अपना काम मजे से चलाने के लिए तैयार किया था। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मे तालिबान और दूसरे आतंकवादी कैंपों को सुहराकर-फुसलाकर-पुचकारकर अमेरिका ने ही बढ़ाया था। लेकिन, जब इसी जेहाद से अमेरिकी की फटी तो, वो विश्वशांति के बहाने इराक को बरबाद करने का लाइसेंस जबरी ले गया। अगर सबको याद हो तो, पाकिस्तान से बेहद खराब संबंधों के बावजूद भारत की हर तरह की जनता- धर्मनिरपेक्ष या राष्ट्रवादी- बुश को विलेन और सद्दाम को हीरो मानकर चल रही थी। साफ है पाकिस्तान से हमारी लड़ाई-अदावत धर्म की वजह से कम सीमा जुड़ी होने-पड़ोसी होने से ज्यादा है।

कमाल ये है कि मुंबई पर हुए हमले के बाद अपनी पश्चिमी दासता से प्रेरित मानसिकता की वजह से हम सबने इसे भारत का 9/11 बताकर तुरंत अमेरिका के इराक हमले जैसे ही एक्शन की उम्मीद करनी और उस उम्मीद को पूरा करने के लिए सरकार को दबाव में डालने की कोशिश शुरू कर दी। अब सवाल ये है कि क्या हम अमेरिका जैसे हैं। अमेरिकी जनता तो, खुद को दुनिया का दादा समझती है इसलिए उसकी इज्जत बची रहे इसके लिए 2-4 देश बरबाद कर देने वाले शासकों को वो ज्यादा महत्व देते हैं। लेकिन, क्या भारत की जनता का ये मिजाज है। क्या अमेरिका की तरह हम पाकिस्तान से लड़कर जीत सकते हैं। क्या अमेरिका और इराक की लड़ाई में जैसे इराक बरबाद हो गया और अमेरिका का नुकसान बहुत कम रहा। हम भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में वैसे नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं।

अब जो लोग ये कह रहे हैं कि भारत को पाकिस्तान या फिर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर हमला बोल देना चाहिए। उनके बुद्धि के संतुलन पर मुझे भरोसा एकदम नहीं है। क्योंकि, वो दो तरह के लोग हैं- पहले बेहद चालाक हैं सिर्फ राजनीतिक-सामाजिक नफे-नुकसान के बयान दे रहे हैं, खुद भीतर से डरे रहते हैं कि हालात इतने न बिगड़ें। दूसरे सचमुच के भावनात्मक बेवकूफ हैं। जो, सच्चे भारतीय हैं लेकिन, आजादी के बासठ सालों में नाकारा सरकारों से इतने नाराज हैं कि उन्हें लगता है कि अब आर या पार हो ही जाना चाहिए।


फिर अगर लड़ाई नहीं तो हम करें क्या। मुझे लगता है कि हमें जरदारी पर भरोसा करना चाहिए। आंखमूंदकर नहीं। जरदारी उतना ही आतंकवाद का मारा है जितना भारत। जरदारी सीधे-सीधे भारत सरकार के सामने झुक नहीं सकता ये उसकी राजनीतिक मजबूरी और कट्टर इस्लामी ताकतों का डर भी है। लेकिन, शायद ये जरदारी का रणनीतिक साथ ही हो सकता है जो, इस समय में भारत को इस मसले पर काफी राहत दे सकता है। जरदारी दबाव में ही सही लेकिन, आतंकवादी संगठनों के ऑफिस पर ताले लगवा रहा है। उन्हें भूमिगत होना पड़ रहा है। अच्छी बात ये है कि इस समय भारत को अमेरिका का रणनीतिक समर्थन भी हासिल है। और, भारत की दुनिया के नक्शे पर बढ़ती ताकत की वजह से दुनिया की दादा संस्थाएं यूनाइटेड नेशंस, सुरक्षा परिषद, वर्ल्ड बैंक, IMF भी भारत की सुन रहे हैं। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को विपक्ष का भी समर्थन हासिल है। क्योंकि, ताजा चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि आतंकवाद का हल जनता चाहती है इस पर राजनीति तो बिल्कुल भी नहीं।

अब बस मुश्किल एक ही है कि चुनाव का समय नजदीक है। लाख सरकार और विपक्ष संसद मे चिल्लाकर बोल चुके हैं कि सब एक साथ हैं। लेकिन, सभी इसका राजनीतिक फायदा लेना चाहेंगे। सरकार ने अगर थोड़ी कार्रवाई को अपनी कामयाबी के खाते में जोड़कर वोट बटोरने की कोशिश की तो, विपक्ष तुरंत ही सरकार के बहीखाते के आतंकवाद पर नाकामी के किस्सों को मंच से चढ़कर चिल्लाने लगेगा। तब जरदारी को भी राहत मिलेगी, आतंकवादियों को भी फिर से मौका मिलेगा। वैसा ही जैसा हम पिछले बासठ सालों से देते आ रहे हैं।