Showing posts with label china. Show all posts
Showing posts with label china. Show all posts

Monday, May 29, 2017

चीन की इस योजना का पाकिस्तान में जमकर विरोध

OBOR का सिर्फ भारत ने विरोध किया। और ये भारत के लिए ठीक नहीं है। भारत सहित दुनिया भर की मीडिया में जानकारों को पढ़कर पहली नजर में ऐसा ही लगता है। लेकिन, चीन की इस अतिमहत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर उसमें शामिल हो रहे देशों की राय भी अच्छी नहीं है। पाकिस्तान के अलावा दूसरे देशों में इस योजना को लेकर काफी सन्देह है। दिल्ली में जर्मनी के राजदूत मार्टिन ने कहा- “OBOR पुराने सिल्क रूट से बहुत अलग है। ये मुक्त व्यापार का रास्ता नहीं है। ये कारोबार बढ़ाने के लिए चीन की रणनीति है। सिर्फ जर्मनी ही नहीं दुनिया के कई देश अब OBOR सन्देह जता रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ भी इस परियोजना के जरिए देशों पर लदने वाले कर्ज को लेर चिन्तित है। पाकिस्तान में भी एक बड़ा वर्ग है, जो इस बात को लेकर आशंकित है कि चीन पाकिस्तान को अपने आर्थिक उपनिवेश के तौर पर गुलाम बना रहा है और OBOR के तहत बना रहा CPEC चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर दरअसल पाकिस्तान की गुलामी की पक्की बुनियाद साबित होगा। सांसद और पाकिस्तानी संसद की प्लानिंग और डेवलपमेंट पर बनी संसदीय स्थाई समिति के चेयरमैन ताहिर मशादी कह रहे हैं कि दूसरी ईस्ट इंडिया कम्पनी तैयार हो रही है। राष्ट्रीय हितों को दरकिनार किया जा रहा है। हमें पाकिस्तान और चीन की दोस्ती पर फक्र है लेकिन, देश का हित सबसे पहले देखा जाना चाहिए।
चीन अपने संसाधनों और अपनी क्षमता का क्षमता से ज्यादा इस्तेमाल करके लम्बे समय तक 10% की तरक्की हासिल कर चुका है। अब लगातार चीन की तरक्की की रफ्तार नीचे जाती दिख रही है। चीन की सबसे बड़ी चिन्ता तेजी से उभरता भारत है और इसीलिए पाकिस्तान में अपना आर्थिक प्रभाव बढ़ाकर भारत को सन्तुलित रखने की कोशिश चीन के नजरिए से जरूरी दिखती है। दुनिया की ज्यादातर एजेंसियां अब ये मान रही हैं कि चीन भले ही भारत से 5 गुना बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन, जिस तेजी से भारत तरक्की कर रहा है, उसमें चीन के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को बचाए रखने के लिए बाजार खोजना कठिन हो जाएगा। इसलिए चीन अब अपनी सीमा से बाहर जाकर अपनी आर्थिक तरक्की बनाए रखने के रास्ते खोज रहा है। और इसमें सबसे अच्छा और रणनीतिक रास्ता CPEC है। CPEC उस OBOR का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें रूस सहित दुनिया के करीब 60 देशों के छोटे-बड़े हित जुड़े हुए हैं। इसीलिए जब भारत ने इसकी शुरुआत के मौके पर इसका विरोध किया, तो ये सवाल उठा कि क्या भारत एक बड़ा मौका खो रहा है। और क्या भारत इसका विरोध करके अकेला पड़ रहा है। चीन के $ 56 बिलियन के निवेश वाले इस अतिमहत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को दुनिया बीजिंग की उस योजना के तौर पर ही देख रही है, जिसमें चीन आर्थिक तौर पर कई देशों को कर्ज देकर उनसे मनचाही छूट हासिल करेगा। साथ ही ऐसे देश सामरिक तौर पर भी चीन के लिए दूसरे देशों की जासूसी का बड़ा अड्डा बन सकेंगे। चीन पाकिस्तान जैसे इन देशों के जरिए मीडिया मैनेजमेंट का भी काम करेगा।
CPEC के जरिए पाकिस्तान पर धीरे-धीरे काबिज होने की योजना लीक हो गई है। इसके मुताबिक, चीन कश्मीर से सटी सीमा पर कंट्रोल सिस्टम लगाएगा और इसके जरिए इलेक्ट्रॉनिक मॉनिटरिंग करेगा। साथ ही सेफ सिटीज प्रोग्राम के तहत पाकिस्तान के बड़े शहरों की 24 घंटे लाइव मॉनिटरिंग की भी योजना है। इसकी शुरुआत पेशावर से होगी और बाद में इस्लामाबाद, लाहौर और कराची में भी इसे लागू किया जाएगा। साथ ही चीन को इस बात का भी अधिकार होगा कि वो सन्देह के आधार पर किसी इमारत में छापा मार सके और किसी गाड़ी को जब्त कर सके। चीन के टीवी मीडिया को पाकिस्तान में प्रसारण की इजाजत मिल जाएगी। पाकिस्तान में लोग इसे अपनी संस्कृति पर चीनी संस्कृति के दुष्प्रभाव के हावी होने के तौर पर देख रहे हैं। इस लीक डॉक्यूमेंट से पता चलता है कि चीन, पाकिस्तान की आर्थिक मदद अपनी राजनयिक रणनीति के तहत कर रहा है। इसका असर भी साफ दिखता है। पाकिस्तान ने लगातार भारत के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। सीमा पर होने वाली गोलीबारी और आतंकवादी घटनाओं को मदद देकर पाकिस्तान, चीन से आसानी से मदद पा रहा है। डॉन अखबार ने इस बारे में विस्तार से लिखा है।
हर पाकिस्तानी ये अच्छे से जानता है कि इस समय पाकिस्तान के आर्थिक हालात बहुत खराब हैं और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए जितने बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है, वो चीन ही कर सकता है। इसके बावजूद पाकिस्तान में CPEC को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल इस पूरे प्रोजेक्ट की पारदर्शिता को लेकर है। पाकिस्तान की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी की समीना टिप्पू ‘CPEC Conspiracy Theories of Success and Failure’ में लिखती हैं कि क्या आज के समय में इतना बड़ा प्रोजेक्ट इतने अपारदर्शी तरीके से पूरा किया जा सकता है। जबरदस्त भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी और अंडर टेबल होने वाले भुगतान से पाकिस्तान की सम्प्रभुता बुरी तरह से खतरे में है।
बीजिंग में हुए वन बेल्ट बन रोड समिट में 28 देशों के प्रमुखों ने इसकी जमकर तारीफ की। एशियाई देशों में भारत को छोड़कर सब वहां कतार से खड़े दिखे। हर किसी को भारतीय निवेश की जबरदस्त दरकार है। इसीलिए वो देश किसी भी कीमत पर चीनी निवेश का स्वागत कर रहे हैं। लेकिन, ये बात सभी को पता है कि वन बेल्ट वन रोड को दुनिया के कई देशों को जोड़ने वाली एक अंतर्राष्ट्रीय सड़क के तौर पर देखना बेवकूफी के सिवाय कुछ नहीं होगा। इसीलिए पाकिस्तान की ही तरह दूसरे देश भी रह रहकर अपनी आशंका जाहिर कर रहे हैं। जकार्ता पोस्ट अपने सम्पादकीय में लिखता है हमें बुनियादी क्षेत्रों में चीन के निवेश की जबरदस्त दरकार है। लेकिन, जरूरत इस बात की है कि चीन अपने इरादे और दृष्टिकोण को सही तरीके से समझाए, जिससे उसकी भूराजनैतिक महत्वाकांक्षा पर सन्देह न हो। कुछ ऐसा ही सन्देह सिंगापुर के स्ट्रेट्स टाइम्स में भी पढ़ने को मिला। स्ट्रेट्स टाइम्स लिखता है चीन ने हाल ही में अपनी आर्थिक ताकत के जरिए दक्षिण कोरिया पर दबाव बनाने की असफल कोशिश की है। चीन चाहता था कि दक्षिण कोरिया अमेरिकी एंटी मिसाइल तंत्र को तैनात न करे। इसके लिए चीन ने अपने नागरिकों को दक्षिण कोरिया जाने से रोका और कोरियाई म्यूजिक वीडियो की स्ट्रीमिंग भी रोक दी।
श्रीलंका, म्यांमार और कजाकिस्तान में भी OBOR को लेकर सन्देह बढ़ रहा है। CPEC को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए पाकिस्तान की हजारों हेक्टेयर खेती वाली जमीन चीन की कम्पनियों को लीज पर दी जाएगी। इन चीनी कम्पनियों को चीन के अलग-अलग मंत्रालयों और चीन विकास बैंक की तरफ से पूंजी और कर्ज दिया जाएगा। चीन पाकिस्तान को एक सस्ते कच्चे माल के बाजार के तौर पर विकसित करना चाहता है और इसका इस्तेमाल चीन के धीमे हो रहे कपड़ा उद्योग को तेज करने में करेगा। साथ ही चीन के शिनजियांग प्रान्त के मजदूरों को यहां रोजगार भी देगा। कमाल की बात ये भी है कि पाकिस्तान और चीन के बीच CPEC को लेकर हुए समझौते में चीन की कम्पनियों को जमीन, कर, सेवाओं में प्राथमिकता दी जाने की बात भी शामिल है। इसीलिए पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का आरोप ऐसे ही खारिज करना मुश्किल हो जाता है। जरदारी ने आरोप लगाया है कि शरीफ भाई ये सड़क सिर्फ इसलिए बनाना चाहते हैं जिससे उनको अच्छा कमीशन मिल जाए।” 
पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और दूसरी राजनीतिक पार्टियों के लोगों का विरोध चीन को पसन्द नहीं आ रहा है। और ये साफ होता है लीक हुई CPEC योजना से। उस योजना में CPEC के लिए सबसे बड़े खतरे के तौर पर 5 प्रमुख बिन्दु हैं। पाकिस्तान की राजनीति (जिसमें दूसरी पार्टियां शामिल हैं), धर्म, आदिवासी, आतंकवाद और पश्चिम का प्रभाव, ये वो खतरे हैं जिन्हें चीन CPEC के लिए खतरा मानता है। इसलिए पाकिस्तान में चीन की कोशिश इन पांचों को खत्म करने की होगी। भारत के लिए इसमें अच्छी खबर ये हो सकती है कि चीन पाकिस्तान के धार्मिक उन्माद और आतंकवाद को भी खत्म करने की कोशिश करेगा। लेकिन, जिस तरह से CPEC के तहत पाकिस्तान में प्रस्तावित 9 स्पेशल इकोनॉमिक जोन में सिर्फ चीन की कम्पनियों को कारोबार का प्रस्ताव है, वो डराने वाला है। कुल मिलाकर भले ही बड़े जानकार इतनी बड़ी आर्थिक गतिविधि से भारत के बाहर रहने को गलत फैसले के तौर पर देख रहे हों, सच्चाई यही है कि खुद पाकिस्तान में भी CPEC के जरिए चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर बड़ी चिन्ता और विरोध है।
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है)

Saturday, February 13, 2016

लोकप्रिय सरकार का बजट पेश करिये जेटली जी

आर्थिक मोर्चे पर सरकार कितना कुछ करती है। ये छोटे-बड़े आंकड़ों से समझ आता रहता है। लेकिन, इसकी असली समझ बनती है फरवरी महीने के आखिर में जब भारत सरकार देश का बजट पेश करती है। तब सही मायने में पता लगता है कि देश की असली स्थिति क्या है। सरकार कितना कमा रही है। कितना घाटे में है। बजट ही ये भी बताता है कि सरकार की अगले साल भर के लिए बड़ी योजनाओं को लेकर क्या सोच है। फिर से फरवरी महीना आ गया है। इस बार 29 फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली बजट पेश करेंगे। ये इस सरकार का दूसरा पूर्ण बजट होगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली पहले से ही बार-बार देश की आर्थिक स्थिति का हवाला देकर लोगों को इस बात के लिए काफी हद तक तैयार कर चुके हैं कि ज्यादा कुछ लोगों को अच्छा लगने वाला बजट में आएगा, इसकी उम्मीद न ही करें। वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा भी लगातार मीडिया से बात करने में ये बताते रहते हैं कि किस तरह से मोदी सरकार देश के खजाने को दुरुस्त करने में लगी है। ये बात बड़े-छोटे वित्त मंत्री अकसर इस सवाल के जवाब में बताते हैं कि आखिर कच्चे तेल की कीमतों में आई इतनी बड़ी कमी का फायदा क्यों लोगों को पूरी तरह से नहीं मिल पा रहा है। इसका मतलब ये हुआ कि आने वाला बजट पूरी तरह से सरकार के वित्तीय घाटे को दुरुस्त करने की सरकार की उपलब्धियों के आंकड़े के इर्द गिर्द घूमेगा। अर्थशास्त्रियों की तरफ से वित्त मंत्री को ऐसे बजट के लिए ढेर सारी वाहवाही मिल सकती है। लेकिन, यहीं वित्त मंत्री और देश के प्रधानमंत्री को ये समझना होगा कि सरकारें अर्थशास्त्री नहीं बनाते हैं और सरकारें बनाना जिनके हाथ में होता है, वो जनता 2019 तक रामराज्य आने का इंतजार नहीं कर सकती। इसीलिए जरूरी है कि वित्तमंत्री मई 2014 में मिले बहुमत के आधार पर बजट पेश करें।

अच्छी बात ये है कि बजट से ठीक पहले आए तरक्की के आंकड़े ये पक्का करते हैं कि सरकार सही रास्ते पर है। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि वित्तीय वर्ष दो हजार सोलह में जीडीपी सात दशमलव छह प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ेगी। पिछले वित्तीय वर्ष में ये रफ्तार सात दशमलव दो रही है। इससे एक तो ये कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए खास नहीं कर रही है। इस तरह की आलोचना करने वालों को जवाब मिल गया है। दूसरा ये कि आने वाला समय भारत का ही है, ये भी तय हो गया है। क्योंकि, इस रफ्तार के साथ भारत दुनिया का सबसे तेजी से तरक्की करने वाला देश बन गया है। चीन हमसे पीछे छूट गया है। लेकिन, हमारा बाजार अभी भी चीन के सामानों से भरा पड़ा है। बजट चीन की उस हिस्सेदारी को ध्वस्त करके वो हिस्सेदारी भारत के पक्ष में करने के रास्ते साफ-साफ बताए। क्योंकि, भारत की आबादी की जितनी जरूरतें हैं उसमें साढ़े सात प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार से खुश नहीं हुआ जा सकता। इसके आठ से नौ प्रतिशत के बीच लंबे समय तक रहने की जरूरत है। दस प्रतिशत की बात इसलिए नहीं करूंगा कि वो मनमोहिनी सपने जैसा नजर आने लगता है। सरकार के खजाने में करों की वसूली भी अच्छी रही है। साल के पहले आठ महीने में अप्रत्यक्ष कर वसूली चौंतीस प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी है। सरकारी खजाने में चार लाख अड़तीस हजार दो सौ इक्यानबे करोड़ रुपये आए हैं। जो सीधे-सीधे पिछले वित्तीय वर्ष के पहले आठ महीने से एक लाख करोड़ रुपये ज्यादा है। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि फिलहाल उद्योगों की तरक्की की रफ्तार सुधरी है। ग्रॉस टैक्स रेवेन्यू की बात करें, तो ये करीब इक्कीस प्रतिशत बढ़ा है। प्रत्यक्ष कर यानी सीधे-सीधे इनकम टैक्स की बात करें, तो सरकार का करीब आठ लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य हासिल होने में थोड़ी मुश्किल दिख रही है। लेकिन, सरकार ने ये लक्ष्य आठ से साढ़े आठ प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के आधार पर लगाया था। अब यहीं अर्थशास्त्रियों के बजट और जनता के बजट के बीच में साफ लकीरें खिंच जाती हैं। आर्थिक आंकड़ों को देखते हुए आयकर में ज्यादा छूट की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। लेकिन, जनता के नजरिये से आयकर की छूट सीमा ढाई लाख से पांच लाख रुपये किया जाना जरूरी है। यहां एक बात और समझने की है कि अभी भी नई नौकरियों के मौके बनने के बजाय ज्यादा नौकरियां चली गई हैं। ये भी एक बड़ी वजह है कि सरकार आयकर वसूली के तय लक्ष्य से थोड़ा पिछड़ती दिख रही है। इसलिए सरकार को अगले वित्तीय वर्ष में इस वर्ष की भरपाई करने के लिए आयकर छूट सीमा बढ़ानी चाहिए जिससे लोगों को कर चोरी न करनी पड़े। दूसरा इतने नए रोजगार के मौके तैयार करने होंगे, जिससे आसानी से आयकर का बढ़ा लक्ष्य हासिल किया जा सके। जनता के नजरिये से एक और जरूरी छूट सीमा जो बढ़नी चाहिए, वो है घर कर्ज के ब्याज पर छूट की सीमा। हालांकि, सरकार ने ब्याज पर छूट डेढ़ लाख से बढ़ाककर दो लाख रुपये कर दी है। लेकिन, ज्यादातर निजी कंपनियों के रोजगार सृजन वाले शहरों में औसत घर की कीमत चालीस-पचास लाख रुपये के आसपास है। और इस लिहाज से कम से कम इस छूट सीमा का पचास हजार रुपये और बढ़ाना जरूरी है। बच्चों की स्कूल फीस पर मिलने वाली छूट भी इसी अनुपात में बढ़ना जरूरी है। वित्त मंत्री के आर्थिक नजरिये से ये सारे सुझाव खजाने में आने वाली रकम कम करेंगे। लेकिन, ये सोच सही नहीं है। क्योंकि, जनता को इस सरकार पर भरोसा है। उसी भरोसे की वजह से वित्तीय वर्ष दो हजार सोलह में अनुमानित सात दशमलव छह प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार में निजी खर्चों के बढ़ने की रफ्तार भी सात दशमलव छह प्रतिशत ही अनुमानित है। वो भी तब जब तरक्की की रफ्तार सात दशमलव दो प्रतिशत से बढ़कर सात दशमलव छे प्रतिशत होती दिख रही है। लेकिन, जजनता की जेब जितना आया उससे ज्यादा खर्च कर रही है। पिछले वित्तीय वर्ष में निजी खर्च छह दशमलव दो प्रतिशत बढ़ा था। यानी दशमलव चार प्रतिशत जीडीपी बढ़ी, तो निजी खर्च करीब डेढ़ प्रतिशत बढ़ गया। यूपीए दो के आखिरी दिनों में जनता इस कदर घबरा गई थी कि वो खर्च करने से बचने लगी थी। जाहिर है निजी खर्च उसी जनता की कमाई रकम में से हो रहा है। जिस पर सरकार तय कर वसूल चुकी है। और दूसरे रास्तों से भी वो सरकार का खजाना भरने में मदद कर रहा है।


दरअसल असली दिक्कत सरकारी खर्च बढ़ाने की है। वित्तीय वर्ष दो हजार पंद्रह में बारह दशमलव आठ प्रतिशत सरकारी खर्च बढ़ा था। जो इस वित्तीय वर्ष में घटकर तीन दशमलव तीन प्रतिशत ही बढ़ा है। अगर सरकारी खर्च भी इस रफ्तार से बढ़ा होता, तो बड़ी आसानी से साढ़े आठ प्रतिशत के आसपास का तरक्की का लक्ष्य हासिल किया जा सकता था। सात दशमलव छह प्रतिशत की जीडीपी के बढ़ने में कंस्ट्रक्शन का हिस्सा घटा है। पिछले वित्तीय वर्ष में चार दशमलव चार प्रतिशत की रफ्तार से तरक्की करने वाले कंस्ट्रक्शन उद्योग की इस साल तरक्की की रफ्तार तीन दशनलव सात प्रतिशत ही रहने का अनुमान है। हालांकि, इससे ज्यादा चिंतित होने की जरूरत इसलिए नहीं है कि ये कमी रियल एस्टेट क्षेत्र में कमजोरी दिख रहा है। और ये कमजोरी रियल एस्टेट में काला धन पर लगी रोक का साफ नतीजा है। इसलिए काला धन से कंस्ट्रक्शन सेक्टर की रफ्तार बढ़ाने के बजाए सरकार कोशिश ये करनी चाहिए कि रियल एस्टेट प्रोजेक्ट पर अंकुश लगे। प्रोजेक्ट डिलीवरी तय समय पर हो सके। अच्छी बात है कि मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार बेहतर हुई है। मैन्युफैक्चरिंग के बढ़ने की रफ्तार साढ़े पांच प्रतिशत से बढ़कर साढ़े नौ प्रतिशत होने की उम्मीद है। मतलब मेक इन इंडिया काम कर रहा है। मेक इन इंडिया के लिए रास्ता बनाने का काम भी अच्छे तरीके से चल रहा है। सड़क निर्माण मंत्री नितिन गडकरी ने छियानबे हजजार किलोमीटर के राष्ट्रीय राजमार्ग को बढ़ाकर डेढ़ लाख किलोमीटर करने का लक्ष्य लिया था। अब उसे बढ़ाकर एक लाख पचहत्तर हजार किलोमीटर कर दिया। बिजली के मोर्चे पर भी पीयूष गोयल बेहतर काम कर रहे हैं। बिजली-सड़क की स्थिति इस सरकार में बेहतर हो रही है। रोजगार में मामले में हालात अभी भी बहुत अच्छे नहीं हैं। इस बजट में उस मोर्चे को दुरुस्त करने के साफ संकेत भी दिखने चाहिए। स्किल इंडिया बेहद महत्वाकांक्षी और वक्त की जरूरत वाली योजना है। लेकिन, इस कौशल मिशन से कितने लोगों को रोजगार मिल पाया है। ये अभी शोध का विषय है। कुल मिलाकर देखें तो अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी है कि बजट में अर्थशास्त्रियों की सकारात्मक टिप्पणी मिलनी ही चाहिए। लेकिन, उनकी सकारात्मक टिप्पणी के चक्कर में देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती में भरोसा जमा रही जनता का भरोसा नहीं टूटना चाहिए। बजट लोकप्रिय बनाने के चक्कर में लोकलुभावन योजनाओं का एलान करने की जरूरत नहीं है। हां, जनता के पूर्ण बहुमत से चुनी सरकार के पांच में से करीब ढाई साल पूरे होने को हैं। ये अहसास जनता को जरूर हो। क्योंकि, जनता को ये अहसास होना बंद हो गया तो अच्छी नीतियां लागू करने का मौका भी मिलने से रहा।

Wednesday, August 27, 2008

हम कैसा देश बनें

बड़ी भयानक ऊहापोह है। भारत इसी ऊहापोह में आजादी के बाद से ऐसा जूझ रहा है कि खुद का भी वजूद नहीं बचा रह पाया है। कुल मिलाकर ऐसे कहें कि एक बार हम जब गुलाम हुए तब से आज तक यानी सैकड़ों सालों से हम तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि हम गुलाम है या आजाद। मुगलों और अंग्रेजों ने हमें ऐसा रगड़ा है कि हम देश वासी मुंबई की रगड़ा पेटीस हो गए हैं। पता ही नहीं चलता- मटर कितनी है, पानी कितना है, कितना गरम है और गरम है तो क्या गरम है आलू की टिक्की या फिर मटर या सिर्फ मटर का पानी।

आजादी के बाद नए मापदंड बने। पहले बरसों हम नेहरूवियन मॉडल में गुटनिरपेक्ष बने- फिर उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने कहा- सोवियत संघ जैसा बनना चाहिए। उधर, इंदिरा गांधी की अकाल मौत हुई और इधर सोवियत संघ का संघ ही गायब हो गया और सिर्फ रूस (Russia) रह गया। सोचिए, अगर आज भी रूस, सोवियत संघ (united states of soviet russia) रहा होता तो, अमेरिका से आज भी आगे होता। कहां- अरे, वहीं जहां सबसे आगे निकलकर चीन ने दुनिया को पटक मारा है। वही बीजिंग ओलंपिक जो, कल खत्म हो गया लेकिन, दुनिया को बता गया कि अब दुनिया का दादा वॉशिंगटन नहीं रह गया। नया बादशाह बीजिंग से बोलेगा।

खैर, मैं देश की बात कर रहा था तो, सोवियत संघ उधर टूट और इधर हमारे देश के नेताओं का आदर्श भी नहीं रह गया। अब हम अमेरिका जैसा बनना चाहते हैं। कमाल ये कि इस पर संघी-भाजपाई से लेकर कांग्रेसी तक सब सहमत हैं। नए समाजवादियों को भी अमेरिका का ही साथ अच्छा लग रहा है। सिर्फ कम्युनिस्ट भाई चीन जैसा बनाना चाहते हैं देश को। ये अलग बात है कि कम्युनिस्ट भाइयों की जिन दो राज्यों में बपौती है उसे, चीन तो क्या चीन के पिद्दी बराबर भी नहीं बना पा रहे हैं।

अमेरिका, रूस बनने के समय तो मैं इतना जाग्रत ही नहीं था कि कुछ बनाने में अपनी बहुमूल्य राय दे पाता। लेकिन, अब देश कैसा बने इसमें मेरी बहुमूल्य राय काम आ सकती है। चीन जैसा देश बनने में मुझे जाग्रत होने के साथ ही चिढ़ होनी शुरू हो गई थी। उतनी ही जितनी कोई अगर पाकिस्तान जैसा बनने की वकालत कर दे।

इसकी सीधी-सीधी कई वजहें थीं
चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा जमा रखा है।
चीन ने तिब्बत पर जबरी कब्जा जमाया हुआ है। घिघियाए दलाई लामा भारत में हैं, उनसे अनायास सहानुभूति है।
कम्युनिस्ट चीन में तानाशाही है।
हमारे देश में जो, कम्युनिस्ट बने घूम रहे हैं वो, सिर्फ हिंदू धर्म पर हमला करके काम चला रहे हैं।
कम्युनिस्ट राज्यों के पास कोई ऐसा मॉडल नहीं है जो, बता सके कि चीन जैसा ही बनना चाहिए। एक पश्चिम बंगाल थोड़ा बहुत था वो, भ्रम भी शीशे की तरह टूटकर चुभ रहा है।


इतनी वजहें दिमाग में ऐसे घर किए हुए हैं कि जब मैं देहरादून, अमर उजाला में भारतीय सैन्य संस्थान (IMA) में पासिंग आउट परेड कवर करने गया तो, जॉर्ज फर्नांडिस से लगभग भिड़ सा गया था। जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे, पासिंग आउट परेड के मुख्य अतिथि थे। POP भाषण के दौरान उन्होंने चीन का जिक्र किया और उसकी जमकर तारीफ की। मंच से उतरते ही दूसरे पत्रकारों के साथ मैंने उन्हें घेर लिया। और, कड़े लहजे में सवाल दागा- क्या आप भारत में चीन मॉडल की वकालत कर रहे हैं। फर्नांडिस ने कहा- मैं सिर्फ चीन के विकास की बात कर रहा था। लेकिन, मैं तो भरा हुआ था। फिर से मैंने वही सवाल किया। फर्नांडिस इतने झल्ला गए कि उन्होंने प्रेस से बात करने मना कर दिया। कहा- आप मेरे मुंह में अपने शब्द डालने की कोशिश कर रहे हैं।

खैर, मैंने देहरादून छोड़ दिया। और, मुंबई आ गया-मन में कहीं न कहीं बचपन से था कि मुंबई जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। लेकिन, मायानगरी में आते ही इसकी फिल्मी छवि टूट सी गई। मरीन ड्राइव के क्वीन्स नेकलेस से मैं मुंबई को पहचानता था। जहां पुरानी-नई मॉडल की शानदार गाड़ियों में बड़े लोग घूमते हैं। यहां एयरपोर्ट (अब तो, कम से कम एयरपोर्ट शानदार हो ही गया है) से उतरते ही झुग्गियों से गुजरकर होटल तक पहुंचा। समझ में आ गया मैं अपने पैतृक प्रतापगढ़ के गांव से निकलकर देश के सबसे बड़े गांव में आ गया।

गांव में सड़कें कच्ची-पक्की हो सकती हैं लेकिन, कोई भी दूरी तय करने में साइकिल से जितना समय लगता है उससे ज्यादा समय मुंबई में ट्रैफिक के बीच फंसी कारों से लग जाता है। गांव में खेत में लोग दिशा-मैदान जाते हैं तो, यहां भी रेलवे ट्रैक के किनारे लोग लैट्रिन करते मिल जाएंगे। झुग्गियों में तो लोग गांव से भी बदतर हालात में रह रहे हैं। हां, झुग्गी में भी एयरकंडीशनर जरूर लगा है। अपने गांव देश की लंबी-चौड़ी जगह और शानदार हवा-पानी को छोड़कर लोग तरक्की तलाशते नाले के ऊपर-सड़क के किनारे-रेलवे ट्रैक के किनारे बदबूदार जगह में एक चारपाई की जगह में झुग्गी बनाकर तरक्की वाले देश में रह रहे हैं।

फिर, कभी-कभी लगता है कि दिल्ली जैसा देश हो जाए तो, मजा आ जाए। और, दिल्ली इधर जिस तेजी से बदल रही है—कि हर महीने भर पे भी दिल्ली जाओ तो, नई सी लगती है, ढेर सारे फ्लाईओवर, चमचमाती सड़कें- उससे और लगता है कि देश, दिल्ली जैसा ही हो जाए। फिर, लगा कि नहीं यार इतनी सड़कों-फ्लाई ओवरों पर दिल्ली वाले तो, मजे से चल ही नहीं पा रहे हैं। ऑफिस के टाइम में तो, मुंबई से थोड़ा ही भले रह पाते हैं। फिर भी दिल्ली देश की अकेली वर्ल्ड क्लास सिटी लगती है।

और, लीजिए कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 में होने वाला है। उसकी तैयारी की वजह से ये दिल्ली का साज-सजावट ज्यादा तेजी से हो रही है। बड़ी मुसीबत है भारत के लिए चीन और पाकिस्तान जैसे देश के बगल में होना। पाकिस्तान रोज हम पर बिना वजह गोली बरसाता रहता है-धमाके करता रहता है। निर्दोष मारे जाते हैं। तो, चीन की तरक्की से हम ऐसे ही मरे जा रहे हैं। चीन 5 SEZ बनाता है तो, हम 500 SEZ के प्रस्ताव पास कर देते हैं। जबकि, हमें ये अच्छे से पता है कि हमारे लिए SEZ मॉडल काम का नहीं है। और, देखिए हमें भी 108 साल में ओलंपिक में रिकॉर्ड बनाने के लिए चीन की राजधानी बीजिंग ही एक जगह मिली थी।

रिकॉर्ड भारत ने भी बनाया और चीन ने भी। भारत देश की अब तक की जिंदगी का पहला और अकेला निजी स्वर्ण पदक मिला। चीन के खिलाड़ी 51 स्वर्ण पदक लटकाए घूम रहे हैं। हम कुल जमा तीन गिनती में पहुंचे तो, चीन ने पदकों की सेंचुरी मार दी। लीजिए, साहब अब चीन से कुछ तुलना बची क्या। स्वर्ण पदक के लिहाज से चीन हमसे 51 गुना आगे, अपना कांसा भी मिला लें तो, भी चीन तीस गुना आगे। अब मैं सोच रहा जॉर्ज फर्नांडिस गलती से ही सही कह रहे थे हमें चीन जैसा बनना चाहिए। वो, भी उन जवानों की पासिंग आउट परेड में जो, हो सकता है चीन की उसी सीमा पर तैनात कर दिए जाएं। जहां चीन ने लंबे भारतीय क्षेत्र पर चीनी झंडे लगाकर नई सीमा बना दी है।

अब मुझे भी लगता है कि हम चीन जैसा ही देश बनें। कांग्रेसी-कम्युनिस्ट तो, खुश होंगे ही। संघी भी खुश होंगे बस उन्हें ये नहीं बताना है कि हम कम्युनिस्ट चीन जैसा बन रहे हैं। वैसे, संघियों को भी गुजरात एक देश बनाने का मॉडल मिल गया है। लेकिन, फिर वही बात कि हम चीन तो हैं नहीं थ्येन आन मेन चौक पर लोकतंत्र बहाली की मांग करने वाले छात्रों का नरसंहार करने वाली रेड आर्मी किसी को याद तक नहीं है। चीन की तरक्की सबको याद है। अब एक चुनाव विकास के मुद्दे पर जीतने वाले नरेंद्र मोदी भी शायद तरक्की से सब ढंक दें। लेकिन, गुजरात में है तो, लोकतंत्र ही ना। तानाशाही तो है नहीं कि बस एक ही पार्टी, एक ही राज। फिर, तो हम चीन भी नहीं बन पाएंगे। वैसे, मेरे स्वर्गीय बाबा श्री श्रीकांत त्रिपाठी शास्त्री मुझकों अक्सर समझाते हुए एक श्लोक सुनाते थे जो, मुझे अब याद नहीं है। लेकिन, उसका मतलब मुझे याद है कि हाथी के पैर में सबका पैर समा जाता है। यानी इतने बड़े बनो कि सारी गलतियां उसमें छिप जाएं। अब भारत की पहचान भले दुनिया में हाथी के तौर पर होती है लेकिन, हम हाथी नहीं बन पा रहे हैं।

लीजिए, मैं चीन, गुजरात जैसा बनते-बनते फिर से हाथी यानी भारत बनने लगा। दिमाग में बाप-दादाओं का दिया भरा हुआ है ना। अरे, अब तो मुझे कुछ नहीं समझ में आ रहा। क्या हम बिना चरित्र के ही देश रह जाएंगे। ए भाई, किसी को समझ में आ रहा हो तो, बताओ ना- हम कैसा देश बनें। और, देश के वीरों ये सलाह मत देना कि हमें किसी की नकल की जरूरत नहीं हम भारत हैं और भारत ही बनेंगे। क्योंकि, आजादी के करीब बासठ सालों बाद भी हम भारत जैसा बनते-बनते बिना किसी चरित्र के रह गए हैं। प्लीज, बताइएगा जरूर, हम ही नहीं देश मानसिक उलझन में है।

Saturday, February 16, 2008

चीन में भी शहरों और गांवों के विकास में बड़ा फर्क है

भारत के लिए अक्सर ये कहा जाता है कि तरक्की के साथ सामाजिक विकास के मामले में भी चीन से सीखा जा सकता है। ये भी दावा किया जाता है कि वहां के कम्युनिस्ट शासन में सभी लोगों में बराबर बंटवारा है। अभी कुछ दिन पहले जब खबर आई थी कि भारत के तीन सबसे बड़े पूंजीपतियों के पास जितना पैसा है, उससे कम पैसा वहां के सबसे बड़े 120 पूंजीपतियों के पास है। साथ ही ये भी खबर थी कि भारत में अमीर और अमीर हुआ है जबकि, गरीब और गरीब। आज एक खबर और मैंने पढ़ी जो, चीन में गांव और शहर के बीच के विकास के अंतर को दिखाती है। यहां तक कि कई मां-बाप को छोटे शहरों में अपने बच्चों को छोड़कर इसलिए बड़े शहरों में जाना पड़ता है कि अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ा सकें। और, अच्छी जिंदगी जी सकें। पूरी खबर यहां पढ़े

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...