देश और शरीर में बड़ा फरक है

कश्मीर मसले को भारतीय लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाना नामुमिकन है। भारतीय लोकतंत्र की इतनी मजबूरियां हैं कि वो, कोई फैसला नहीं ले सकता। इस लोकतंत्र के 60 साल सिर्फ सहमति बनाने की चिरकुटाई में बीत गए। वो, भी सहमति बनाने की कोशिश उनसे जो सहमत तो हो ही नहीं सकते। क्योंकि, सहमत होने के बाद उनकी हैसियत ही नहीं रह जाएगी।

अब इस देश का मीडिया, मीरवाइज उमर फारुक, फारुक अब्दुल्ला के सुपुत्र उमर अब्दुल्ला, मुफ्ती की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती के साथ कांग्रेस, बीजेपी नेताओं को स्टूडियो में बैठाकर सहमति बनाने की कोशिस कर रहा है। भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को इतनी आजादी है कि वो, स्टूडियो में देश के किसी हिस्से को देश से आजादी की मजे से वकालत कर लेते हैं। वकालत नहीं तो, निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया दिखने की कोशिश में उस प्रेशर ग्रुप में शामिल हो गए हैं। जो, कश्मीर की आजादी का हिमायती है।

मैंने भी कश्मीर के हालात से दुखी होकर 14 अगस्त को ये लिख मारा था कि आज कश्मीर को आजाद कर देना चाहिए। मैंने वो, लेख दरअसल देश जबरदस्त तौर पर उबाल मार रही उस भावना के तहत लिख मारा था कि – एक छोटी सी जन्नत के लिए पूरे देश को दोजख बनाना कहां तक ठीक है। और, ये तो पाकिस्तान, अलगाववादियों-आतंकवादियों के लिए अच्छी ही होगा कि हम खुद ही अपने जन्नत को पाकिस्तानी जमीन (दोजख) में शामिल करवा दें। लेकिन, क्या देश के अहम हिस्से कश्मीर को आजाद कर देने से देश को दोजख बनाने की प्रक्रिया रुक जाएगी। क्योंकि, देश कोई शरीर तो है नहीं कि किसी हिस्से में बीमारी या सड़ांध हो जाए तो, उसका ऑपरेशन करके निकाल दीजिए। पूरा शरीर स्वस्थ रहेगा।

दरअसल, कश्मीर इस देश की ऐसी बीमारी है जिसका ऑपरेशन करके उसके अंदर भरी मवाद तो निकाली जा सकती है। लेकिन, उसे काटकर निकालने से ये बीमारी देश के दूसरे हिस्सों में और तेजी से फैल जाएगी। अब इस ऑपरेशन को करने का माद्दा ऐसे डॉक्टरों में तो नहीं ही हो सकता। जिनके हाथ इतने भर से कांपने लगते हों कि मरीज के कुछ बददिमाग (मरीज को हमेशा बीमार देखने की चाहत रखने वाले) घरवाले, नाते-रिश्तेदार ऑपरेशन असफल होने का डर दिखाकर डॉक्टर को धमका रहे हों। और, ये ऑपरेशन तो और भी मुश्किल हैं क्योंकि, कश्मीर नाम के मरीज के ऑपरेशन का जिम्मा भारतीय लोकतंत्र की मजबूरी से पैदा हुए चिरकुट नेताओं के पास है।

दरअसल, एक कश्मीरी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने करीब 62 साल पहले जो, कश्मीर में तुष्टीकरण के कांटों की खेती लगाई थी। नेहरू की उस फसल को बढ़िया खाद-पानी दिया- पाकिस्तान, अलगाववादी, देश के धर्मनिरपेक्षता के लंबरदार नेता, कश्मीर को बपौती की तरह इस्तेमाल कर रहे मुफ्ती, अब्दुल्ला परिवारों ने। फसल खूब बढ़िया हुई इतनी कि कश्मीर पंडितों की तो, कौम ही शरणार्थी शिविर के संग्रहालय भर में पाई जाती है। या कहीं-कहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में बिखरे पड़ी है ये कौम।

सवाल सिर्फ कश्मीरी पंडितों का ही नहीं है। हमारे देश में होने के बावजूद हम कश्मीर या तो जाते नहीं हैं- जाते भी हैं तो, डर-डरकर। इस पीड़ा का जवाब कहां से मिलेगा-कौन देगा। जम्मू की श्री अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति के आर्थिक नाकेबंदी को आधार पर बनाकर कश्मीर की आजादी और अलगावादियों से सहानुभूति सबको हो रही है। बासठ सालों से पूरा देश जो, पीड़ा झेल रहा है, उसका जवाब कौन देगा-उसका हल किस शांति बैठक से मिल पाएगा।

टीवी चैनलों पर सज-धजकर आए मीरवाइज, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती- चिल्लाकर कह रहे हैं कि आप घाटी में एक भी मुसलमान बताइए जो, अमरनाथ यात्रा के खिलाफ हो। ये तो, मैं भी जानता हूं। और, कश्मीर में चार दिन में मुझे ये अनुभव मिला था कि सबकी सेब बेचकर ही नहीं चल रही, जैसा- मुजफ्फराबाद चलों का नारा देने वाले साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। अरे, अब्दुल्ला, मुफ्ती और मीरवाइजों- अमरनाथ यात्री कश्मीर जाते हैं तो, कुछ लेकर नहीं आते। देकर आते हैं- कश्मीर को रोजगार-कमाई।

और, यही रोजगार-कमाई है जो, कश्मीर का हल निकाल सकता है। लेकिन, रोजगार-कमाई के लिए बाजार को कश्मीर में जगह बनाने की मौहाल बनाने देना होगा। उस माहौल के लिए अगर कुछ समय के लिए कश्मीर में खोखले लोकतंत्र की बलि चढ़ानी पड़े तो, गुरेज नहीं होना चाहिए। मेरी पहली पोस्ट में मैंने साफ लिखा था कि बाजार ही कश्मीर में बंदूक को बरबाद कर सकता है।

फिर, ये सवाल क्यों उठाकि सौ एकड़ जमीन पर बनने वाले अस्थाई इंतजामों से राज्य की डेमोग्राफी बदल जाएगी। हिंदू बढ़ जाएंगे। कश्मीर से तो, वहां के मूल निवासी कश्मीरी पंडित मारकर भगा ही दिए गए। और, बताइए ना, जहां हिंदू ही ज्यादा हैं उस जम्मू में इतने बड़े आंदोलन के बावजूद में एक भी मुसलमान को नुकसान पहुंचा हो। या देश भर में बताइए ना कहां ऐसा है कि मुसलमान होने की वजह से किसी को मारा-भगाया जा रहा हो। फिर, ये नेहरू की कांटे की फसल के खाद-पानी (मुफ्ती, अब्दुल्ला, मीरवाइज), टीवी स्टूडियो में ऐसा बोलने का साहस भी कैसे कर पाते हैं जैसे, वो दूसरे देश से आए राजनयिक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से हों।

पिछले कुछ सालों से कश्मीर में चुनी गई सरकार चल रही थी तो, पूरे देश में ये भ्रम फैल रहा था कि आतंकवादी-अलगाववादी कमजोर हो गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि कश्मीर में शांति दिख भले रही थी। पूरे देश में आतंकवादी-अलगाववादी हर रोज बरबादी की नई इबारतें लिख रहे थे। आरडीएक्स-बम धमाके-गोलियां, कश्मीर से निकलकर पूरे देश में लोगों की जान ले रहे थे। और, जब इस सरकार के जाने के दिन आए तो, फिर इन नेताओं ने कश्मीरियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया। एक टीवी चैनल पर बहस में महबूबा मुफ्ती ने उमर अब्दुल्ला पर आरोप लगाया कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने पर राज्य की डेमोग्राफी बिगड़ने का हल्ला सबसे पहले आप ही ने मचाया था।

मतलब साफ है कि देश में एक दूसरा देश बसा हुआ है जो, स्वाभाविक है मौका मिलते ही आजादी की कोशिश करेगा। इसलिए सबसे पहले तो, कश्मीर को देश का हिस्सा बनाना होगा। यानी पूरे देश के जैसे कानून लागू करने होंगे। कश्मीर के मुसलमान देश भर में बसें और मजे से बसें। कश्मीर में देश के दूसरे हिस्से के हिंदू न सही शुरू में कम से कम मुसलमान ही बसना शुरू करें। यानी कुल मिलाकर एक देश जैसा लगने लगे। तभी बात बनेगी।

और, ये दलील देने वाले चूतियापे की बात कर रहे हैं कि कश्मीरी भारत से अलग होना चाहते हैं। कश्मीर अगर अलग होना चाहता तो, वो कांग्रेस को इतनी ताकत क्यों देता कि वो, सरकार बना सके। मुफ्ती के अलावा उमर अब्दुल्ला भी कभी पाकिस्तान के खेमे में जाने की या आजादी का नारा बुलंद करने की बात नहीं करते उसे क्यों, विधानसभा में सबसे ज्यादा सीट जिताते। मतलब साफ है कि लोकतांत्रिक राय भी कश्मीरियों की यही है कि हम भारत के साथ हैं। अब अगर कश्मीरियों की इस लोकतांत्रिक राय का सम्मान करने के लिए तानाशाही की भी जरूरत पड़े तो, करनी चाहिए। और, इन गोली-बंदूक से बात करने वाले अलगाववादियों को, देश के दूसरे किसी हिस्से के अपराधी-देश द्रोहियों की ही तरह जेल में ठूंस देना चाहिए। सिर्फ इतने से बात न बने तो, जितने से बने वो करना चाहिए।