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Tuesday, April 05, 2016

देशभक्त मुसलमान नेताओं को नहीं लुभाता

मोहम्मद तंजील अहमद Mohammad Tanzil Ahmad के मां-बाप ने उनका नाम पता नहीं कितना सोचकर रखा होगा। लेकिन, जब अंग्रेजी और हिन्दी में तंजील का मतलब समझने की कोशिश में ढेर सारे शब्द मिले, तो साफ हो गया कि अल्लाह ने तंजील को किसी खास मकसद से धरती पर भेजा रहा होगा। तंजील का मतलब अंग्रेजी में Revelation रेवलेशन और हिंदी में ईश्वरावेश, इश्वरोक्ति, इलहाम, प्रकटीकरण, प्रकाश, पर्दाफाश, रहस्योद्घाटन मिलता है। और अगर इस्लाम के संदर्भ में समझें, तो जिस प्रक्रिया से पवित्र संदेश मुहम्मद साहब तक पहुंचता है, वही तंजील है। यह मूलत: अरबी भाषा का शब्द है। नाम से ही ढेर सारी विविधताओं को समेटे तंजील को हत्यारों ने पूरी योजना के साथ मौत के घाट उतार दिया है। अब तक ये साफ नहीं हो सका है कि तंजील की हत्या के पीछे कौन हैं। लेकिन, तंजील के देश की सुरक्षा एजेंसी एनआईए के अधिकारी के तौर पर काम करने की वजह से आतंकवादी घटना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है। तंजील ऐसे अधिकारी रहे हैं, जिनके लिए ये बता पाना मुश्किल है कि इस देश की किस आतंकवादी जांच में वो शामिल नहीं हैं। तंजील पचास साल के होने ही वाले थे। लेकिन, देश के दुश्मनों को तंजील जैसे देशभक्त मुसलमानों का हर लमहा भारी पड़ रहा था। इसीलिए एक शादी समारोह से लौटते समय मोटरसाइकिल सवार हत्यारों ने 22 गोलियां तंजील के शरीर में दाग दीं। इतनी बेरहमी से और ये पुख्ता करना कि गलती से भी तंजील बच न जाएं, साबित करता है कि हत्यारे किस तरह के थे। हत्यारों के बारे में अंदाजा लगाना थोड़ा आसान इसलिए भी हो जाता है कि नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी के इस जांबाज अधिकारी ने ही इंडियन मुजाहिदीन के भारत में आतंकवादी हरकतों के लिए जिम्मेदार प्रमुख यासीन भटकल को पकड़ा था और अभी भी उसकी जांच तंजील के ही पास थी। पठानकोट आतंकवादी हमले की जांच में भी तंजील प्रमुख भूमिका में थे। पाकिस्तान से आई टीम के साथ वही बात कर रहे थे। 2009 में एनआईए के बनने के बाद से बीएसएफ के असिस्टेंट कमांडेंट तंजील एजेंसी के साथ जुड़ गए थे और लगभग हर मामले में प्रमुख भूमिक में थे। तंजील की सबसे बड़ी ताकत उनके मुखबिर यानी सूत्र थे। मालदा से लेकर पठानकोट तक जहां भी आतंकवादी घटनाएं हुईं, तंजील के जिम्मे वो जांच आई। पारसी और उर्दू भाषा पर तंजील की गजब की पकड़ थी। अब एनआईए के अधिकारी की हत्या हुई है, तो जरूर वो अपने जांबाज अधिकारी की हत्या से जुड़े हर तथ्य खोजेंगे। ये मुझे पूरा भरोसा है। लेकिन, इस हत्या ने हिंदुस्तान के भयावह तौर पर सांप्रदायिक हो गए माहौल की उजागर किया है। या ये कहें कि तंजील के नाम के एक मतलब प्रकटीकरण को साबित किया है। हिंदुस्तान में इस कदर माहौल सांप्रदायिक है कि मुसलमान देशभक्त होता है, तो वो देश के नेताओं के लिए गलती से भी तवज्जो की वजह नहीं बन पाता है। तंजील की मौत नेताओं को इसीलिए नहीं लुभा रही कि वो देशभक्त मुसलमान था। इस देश में कितनी बार वीर अब्दुल हमीद की चर्चा हो पाती है। अकसर लगता है कि हिंदुस्तान में नेताओं के लिए देशभक्त मुसलमान की कदर नहीं हैं। क्योंकि, वो वोटबैंक नहीं है। मोहम्मद तंजील अहमद इसी देश के उन गंदी राजनीति करने वाले नेताओं को भी आतंकवादियों से बचाने के लिए जान पर खेल गए।

सिर्फ थोड़ा सा पीछे जाइए। ग्रेटर नोएडा के एक गांव बिसाहडा में गाय का मांस होने के भ्रम में एक मुसलमान अखलाक को मार दिया गया। जघन्य अपराध था। समाज के लिए धब्बा था। पुलिस हरकत में आई। सभी आरोपियों को पकड़ लिया गया। लेकिन, वहां ऐसे नेता पहुंच रहे थे। जैसे कोई उत्सव चल रहा हो। वजह साफ थी कि उसमें हर किसी को राजनीति की, वोटबैंक की संभावना दिख रही थी। इसीलिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार के मंत्री तक और अरविंद केजरीवाल जैसे दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री तक टूट पड़े थे। अखलाक के परिवार में एक सैनिक भी था। ये बताकर नेता से लेकर मीडिया तक ऐसे साबित कर देना चाह रहे थे। जैसे मुसलमान सैनिक के साथ देश के हिंदुओं ने ये बुरा सुलूक किया हो। गंदी राजनीति करने वाले तो मुसलमानों को भारत माता की जय कहने पर भी इबादत अल्लाह के सिवाय किसी और की नहीं, कहकर भड़काएंगे ही। लेकिन, क्या मुसलमान इसे नहीं समझेगा कि उसके साथ क्या हो रहा है। देश में गंदी राजनीति करने वाले कितने सलीके से मुसलमान को देश से काटकर अलग कर देना चाह रहे हैं। अब सवाल ये है कि क्या देशभक्त हुआ मुसलमान मुसलमान के तौर पर नहीं रह जाता है। अभी हाल ही में जावेद अख्तर ने जब भारत माता की जय बोला तो, उन्हें राज्यसभा में कहना पड़ा कि मैं जानता हूं कि इससे मेरे ढेर सारे मित्र नाराज हो जाएंगे। इस देश में मुसलमान को देशभक्त दिखने की इजाजत गंदी राजनीति नहीं दे रही है। एक छोटा सा उदाहरण और है। वैसे तो भारतीय जनता पार्टी की राजनीति करने वाले हर मुसलमान भाजपा में शामिल होने के बाद सिर्फ भाजपाई रह जाता है। जबकि, कांग्रेस में या दूसरे दलों में राजनीति करते वो बड़ा मुसलमान नेता होता है। और तो और एमजे अकबर जैसे बड़े पत्रकार को भी जब भाजपा अच्छी लगने लगती है, तो इस देश में गंदी राजनीति करने वाले अकबर के सच्चे और अच्छे मुसलमान होने को धीरे से बोलने लगते हैं। नजमा हेपतुल्ला की मुसलमानों के बीच मान्यता क्यों नहीं बन पाती। मोहम्मद तंजील की हत्या के बहाने इसका प्रकटीकरण होना जरूरी है। हिंदुस्तान दुनिया में अकेला ऐसा देश है, जहां मुसलमान पराया नहीं है। वो इबादत के लिए मक्का मदीना देखता होगा। वो उनका मंदिर हो सकता है। घर हिंदुस्तान ही है। और तंजील जैसे लाखों मुसलमान अपनी जिम्मेदारी बड़े सलीके से निभा रहे हैं। लेकिन, गंदी राजनीति के साथ खड़े होने वाले मुसलमान इन बहुतायत मुसलमानों का अपमान करते हैं। मुसलमानों के बीच घुस गए आतंकवादियों के नेटवर्क को ध्वस्त करने का काम भी मोहम्मद तंजील जैसे जांबाज मुसलमान देशभक्त अधिकारी ही कर रहे हैं। लेकिन, इस तरह से बात करने से गंदी राजनीति करने वालों का वोटबैंक नहीं बन पाता। इसलिए वो हमेशा हिंदु-मुसलमान होने पर ही राजनीति करते हैं। बाटला हाउस एनकाउंटर तो सबको याद ही होगा। वहां सिर्फ इसलिए इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा की मौत पर भी राजनीति होने लगी थी। क्योंकि, हिंदु मुसलमान उसमें मिल गया था। फिर क्या था नेता इस कदर गिरे कि मोहन चंद्र शर्मा के एनकाउंटर को ही फर्जी ठहराने की कोशिश की। हालांकि, बाद में अदालत ने आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ को असली माना था। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि कैसे सिर्फ हिंदु मुसलमान को वोटबैंक समझकर इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों को मारने दिल्ली पुलिस के उस इंस्पेक्टर को ही गलत करार देने की कोशिश की जो, खुद आतंकवादियों की गोली का शिकार हो गया। राज करने के लिए यही गंदी नीति दुनिया में हिंदुस्तान की पहचान बन गई है। हिंदु मुसलमान मिलकर अगर नेताओं की ये गंदी राजनीति बदल सके, तो मोहम्मद तंजील को असली श्रद्धांजलि यही होगी और उनका मरना भी तंजील मतलब प्रकाश बन जाएगा।

Wednesday, May 19, 2010

नक्सलियों से आखिरी लड़ाई जरूरी

सेना का इस्तेमाल करें या न करें। केंद्र सरकार नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई इस कदर भ्रम में है कि इसी साल के शुरुआती 5 महीने में ही सैकड़ों लोगों की जान जाने के बाद भी वो फैसला नहीं ले पा रही है। आखिर सरकार ये फैसला लेने में इतना संकोच क्यों कर रही है। सेना का इस्तेमाल वहीं किया जाता है जहां देश की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरा पैदा होता दिखे। फिर वो चाहे पड़ोसी मुल्क से हमला हो या फिर बाहर-भीतर से देश में दहशत फैलाने वाले आतंकवादियों का हमला हो। अब अगर नक्सलियों के मामले में देखें तो, वो ठीक उसी तरह इस देश की राज्य व्यवस्था को मानने को तैयार नहीं हैं जैसे, आतंकवादी। ये नक्सली अपने खिलाफ खड़े हर हिंदुस्तानी की जान आसानी से ले रहे हैं जैसे आतंकवादी- फिर सेना के इस्तेमाल में इतना संकोच क्यों। आखिर अर्धसैनिक बलों की पूरी ताकत झोंककर नक्सलियों के सफाए की ही कोशिश तो सरकार कर रही है। फिर ये कोशिश आधे मन से क्यों। 

ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में सैकड़ो निर्दोष जानें जाने के पहले जब दंतेवाडा़ से सुकमा जा रही बस को निशाना बनाया था तो, नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों ने नया राग शुरू कर दिया था कि कि पहली बार नक्सलियों ने आम लोगों की जान ली है। नक्सल आंदोलन की प्रबल पैरोकार अरुंधती रॉय कह रही हैं कि अगर दंतेवाड़ा से सुकमा जा रही बस में सचमुच पुलिस अधिकारियों के साथ आम लोगों की भी जान गई है तो, इसे किसी भी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। वैसे एक और विरोधी तर्क लगे हाथ ये भी पुरजोर तरीके से चलाने की कोशिश हो रही है कि पुलिस ने आम लोगों के लिए इस्तेमाल में आने वाली बस में जाने की कोशिश करके गुनाह किया है। नक्सल हत्यारों के समर्थक ये भी कह रहे हैं कि युद्ध क्षेत्र मेंCRPF को नक्सलियों के सफाए के लिए सामान्य बसों में जाना ही गलत है।

प्रचारित किए जा रहे इन दोनों ही तथ्यों को ठीक से समझने की जरूरत है। पहला ये कि नक्सलियों ने पहली बार पुलिस, अर्धसैनिक बलों के अलावा आम लोगों की हत्या की हैं। और, दूसरा युद्ध क्षेत्र में अर्धसैनिक बलों का आम लोगों की सवारी का इस्तेमाल करना युद्ध के नियमों के खिलाफ है। सबसे पहले तो यही कि पहली बार नक्सलियों ने आम लोगों की हत्या की ये पूरी तरह गलत है। सच्चाई ये है कि देश भर में पिछले 10 सालों में नक्सलियों ने करीब 6000 जानें ली हैं। जिनमें सिर्फ छत्तीसगढ़ के बस्तर में ही 1000 से ज्यादा आम लोगों की जानें गई हैं। पुलिस के साथ बस में मारे गए आम लोगों की जान जाना सुर्खियों में आया लेकिन, ज्यादातर नक्सलियों के फरमान न मानने पर जन अदालत के हुक्म पर आदिवासियों-स्थानीय निवासियों की जान जाने की खबर कभी सुर्खियां नहीं बन पातीं।

रॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, देश भर में लगभग 20 हजार नक्सली सक्रिय हैं। देश के 604 में से 160 जिलों के कई हिस्सों में आतंक के बूते इनकी समानांतर सरकार चलती है। ज्यादातर इनका असर उन इलाकों में है जहां खनिज संपदा भरपूर है जो, पूरी तरह से अपने राज्यों के बाहरी हिस्सों में हैं। जहां आवागमन, संचार के साधन ना के बराबर हैं और जो, बने उन्हें इन्होंने ध्वस्त कर दिया। छत्तीसगढ़ का बस्तर, आंध्र प्रदेश का करीमनगर, महाराष्ट्र का गढ़चिरौली और उड़ीसा का मलकानगिरि- ये ऐसे इलाके हैं जो, अपने राज्यों की राजधानियों से दूर और सीमावर्ती राज्यों से सटे हैं। इस पूरे क्षेत्र के दंडकारण्य जंगलों में पूरी तरह से नक्सलियों का राज चलता है। नेपाल और चीन के माओवादियों का समर्थन इन्हें ताकत देता है। 1967 में पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन आज सत्ता पर कब्जे के लिए कुछ अतिमहत्वाकांक्षी, भ्रमित अतिवामपंथी लोगों की निजी लड़ाई जैसा बनकर रह गया है।

माओवादी, नक्सली समर्थक बुद्धिजीवियों का इसे विकास चाहने वालों की लड़ाई बताना भी कुतर्क से ज्यादा कुछ नहीं है। थोड़ी सी बुद्धि लगाने पर ही माओवाद-नक्सववाद समर्थक बुद्धिजीवियों के इन तर्कों की पोल खुलने लगती है कि ये विकास का अपना हिस्सा मांगने वालों की लड़ाई है। ये सही है कि आदिवासी और पिछड़े इलाकों में विकास का काम बेहद कम हुआ है और यही वजह है कि नक्सलियों को वहां अपनी जमीन मजबूत करने का मौका मिल गया। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि एक बार कब्जा जमा लेने के बाद नक्सलियों ने बची-खुची सड़कों, बिजली, स्कूल, पुल और दूसरी सुविधाओं को भी ध्वस्त करना शुरू कर दिया। छत्तीसगढ़ में अपने कब्जे वाले इलाके में नक्सलियों ने 100 से ज्यादा स्कूलों, करीब 150 बिजली के खंभों और करीब 100 इलाके को जोड़ने वाली सड़कों को धवस्त कर दिया।

बार-बार आदिवासियों की जमीन छिनने की बात की जाती है। लेकिन, क्या इतने सालों से नक्सलियों के समांतर शासन में आदिवासियों का कुछ भी भला हो पाया है। क्योंकि, वो बेचारे तो दोनों ही तरफ से मारे जा रहे हैं। नक्सलियों के साथ हथियार न उठाओ तो, नक्सली मारें और मुठभेड़ में पुलिस मारे। तरक्की, अच्छी जिंदगी की चाह में सलवा जुडूम में शामिल होकर सरकार के साथ आओ तो, भी नक्सलियों के शिकार बनो। वैसे, नक्सलियों के दमन से सबसे ज्यादा प्रभावित छत्तीसगढ़ में सरकार ने अब तक दो लाख से ज्यादा आदिवासियों-स्थानीय निवासियों को जमीन के पट्टे दिए हैं।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम दोनों ही इस बात पर अब एकमत हैं कि नक्सली, आतंकवादी हैं। रमन सिंह तो विचारधारा के लिहाज से भी अतिवादी वामपंथी नक्सलियों के विरोधी हैं लेकिन, गृह मंत्री चिदंबरम की कांग्रेस उन्हें शायद एकदम से कड़े फैसले लेने की इजाजत नहीं देती। शायद इसीलिए दिग्विजय सिंह ये जोर शोर से कहते रहते हैं कि नक्सलियों को आतंकवादी नहीं माना जा सकता। अब अगर कोई ये कहता है कि राज्य सत्ता नक्सलियों को आतंकवादी बनाकर उनका सफाया करना चाहती है तो, इसमें गलत क्या है। क्योंकि, लोकतंत्र के सारे नियमों को ध्वस्त करके सिर्फ बंदूक की गोली से क्रांति की उम्मीद रखने वाले इन भटके लोगों को सुधारने का और देश के भीतर के इस सबसे बड़े डर को दूर रखने का शायद अब कोई रास्ता ही नहीं बचा है।

और, सबसे कमाल की बात तो ये कि जंगलों में गोली खाते-मारते घूम रहे इन नक्सलियों के दिमाग खराब करने वाले बुद्धिजीवियों की जमात दिल्ली से लेकर विदेशों तक बैठकर सिर्फ बतकही से काम चला ले रही है। वो, दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर और JNU जैसी जगहों पर चर्चा और जंतर-मंतर पर कुछ रस्मी धरना प्रदर्शन से ही अपना काम चला ले रही है। खुद महानगरों के संपूर्ण सुविधायुक्त जगहों पर रहकर मरने-मारने पर उतारू नक्सलियों के पक्ष में सिर्फ बयान देकर बड़े-बड़े अवॉर्ड जुहाती रहती है। और, इन अवॉर्ड्स की चमक भी न देख पाने वाले कुछ और नौजवानों को भटकाकर खून की होली खेलने के लिए तैयार कर देती है।

दूसरी प्रचारित की जा रही बात कि युद्ध क्षेत्र में सामान्य बसों से अर्धसैनिक बसों का जाना युद्ध के नियमों के खिलाफ है। ये बात साफ करती है कि ये देश के खिलाफ जंग है और जंग में सब जायज है। भले ही ये अपने ही कुछ लोग हैं जो भटक गए हैं लेकिन, ये साफ है नक्सलवाद अब सिर्फ विचारों की लड़ाई नहीं रह गई है। ये बंदूक की लड़ाई है और सिर्फ बंदूक की लड़ाई से ही इससे निपटा जा सकता है। आतंक की सारी हदें पार कर चुके इन लोगों से निपटने के लिए सरकार को अब आतंकवादियों से लड़ने जैसे असाधारण तरीके ही अपनाने होंगे। क्योंकि, इस लड़ाई के खत्म होने में जितनी देर होगी। अपने ही देश के लोग उतना ज्यादा इस लड़ाई के हवन में स्वाहा होते जाएंगे। फिर चाहे वो, अर्धसैनिक बलों के जवान हों, आदिवासी या फिर भटके हुए नक्सली। 
(this article is published on rashtriya sahara and peoples samachar's edit page)

Friday, November 27, 2009

अब कितनी सनसनी होती है


रात के करीब साढ़े दस बजे थे। दफ्तर की छत पर खुले में बैठकर हम खाना खाने जा ही रहे थे। पहला कौर उठाया ही था कि संपादक जी का फोन आ गया।
हर्ष, कोई गोलीबारी की खबर है क्या।
नहीं सर, ऐसे ही कुछ हल्की-फुल्की झगड़े की खबर थी मैंने देखा था लेकिन, शायद हमारे चैनल के लिहाज से खास नहीं थी।
नहीं देखो शायद कोई बड़ी गैंगवॉर है  या कोई आतंकवादी हमला है।
खाना छोड़कर मैं तुरंत भागकर न्यूजरूम में पहुंचा तो, हर चैनल पर वही खबर थी। कहीं पर दो माफिया गुटों के बीच भयानक गोलीबारी की खबर थी तो, कहीं कुछ और ... कोई भी चैनल एकदम से नहीं बता पा रहा था कि हुआ क्या है।


तब तक फिर संपादक जी का फोन आ गया था।
हर्ष, कौन-कौन है ऑफिस में।
अभी तो सर, गिने-चुने लोग ही बचे हैं। लगभग सब जा चुके हैं। क्या करना है सर
अच्छा देखो खबर पक्की हो जाए तो, फैसला लेते हैं नजर रखो। ये कोई बहुत बड़ी खबर हो गई है।


फोन रखते-रखते अचानक एक न्यूज चैनल पर फ्लैश आया - मुंबई पर हमला। लगा जैसे वज्रपात हो गया। फिर एक साथ गोलियों की तरह ब्रेकिंग न्यूज वाली पट्टी पर लगभग सभी न्यूज चैनलों पर मुंबई पर हमला। लियोपोल्ड कैफे पर गोलीबारी... सांताक्रूज में टैक्सी में धमाका ताज होटल में आतंकवादी घुसे ... ओबरॉय होटल में भी आतंकवादियों के घुसने की आशंका ...  ऐसे फ्लैश टीवी स्क्रीन से निकलकर जेहन को जकड़ रहे थे।


मैंने संपादक जी को फोन किया- सर, IBN7 लाइव कट कर लें क्या।
तुरंत कट करो, फिर देखते हैं। PCR के सारे लोग जा चुके थे। एंकर नहीं था। डेस्क पर भी मेरे अलावा एकाध लोग ही थे। सिर्फ टिकर पर एक साथी था। तुरंत फैसला लिया। IBN7 लाइव कट किया और ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी पर जैसे-जैसे खबरें आती गईं सूचना डालने लगे।


तब तक न्यूज चैनलों पर खबर  आ चुकी थी कि मुंबई CST पर आतंकवादी गोलीबारी करके भागे हैं। स्क्रीन पर हेमंत करकरे का गाड़ी से उतरकर बुलेटप्रूफ जैकेट और लोहे वाली टोपी पहने तस्वीरें दिखीं। ATS प्रमुख को स्क्रीन पर देखकर समझ में आ गया था ATS हरकत में आ चुकी है। भरोसा हुआ कि अब कुछ घंटे में मामला निपट जाएगा। फिर अचानक कुछ शांति सी लगी। लगा कि आतंकवादी घिनौनी वारदात को अंजाम देकर भाग चुके हैं। लेकिन, वो तूफान के पहले की शांति थी। लाल-लाल ब्रेकिंग न्यूज चमकी ATS प्रमुख हेमंत करकरे शहीद, मुंबई पुलिस के शूटर सालस्कर, डीआईजी अशोक काम्टे शहीद। तेजी में फ्लैश बनाते मेरे रोंगटे खड़े हो गए। खून खुद के शरीर पर दिखने लगा।


बुरी से बुरी खबरें अब आनी शुरू हुई थीं। पता चला ताज को आतंकवादियों ने कब्जे में कर लिया है। ओबरॉय आतंकवादियों के कब्जे में है। मुंबई CST पर भयानक खून खराबा आतंकवादियों ने किया है। नरीमन हाउस भी आतंकवादियों के कब्जे में चले जाने की खबर आई। लगा जैसे पाकिस्तान ने घुसकर हमें मसल दिया हो। खबर ये भी आई कि आतंकवादी पुलिस की एक गाड़ी लेकर उससे भी मौत बरसाते बहुत देर तक घूमते रहे। खैर, थोड़ी ही देर में खूनियों के मरीन ड्राइव पर मरने की खबर भी आई।


बॉसेज से बात की तो, तय हुआ कि सुबह आठ बजे से हम अपना बुलेटिन खोलेंगे। एक बिजनेस न्यूज चैनल सारी रात लाइव था। देश पर हमला जो हुआ था। सारी फ्लैश बनाते थक गया था। आंख में नींद पानी में बालू की तरह भरी हुई थी लेकिन, हमले की वजह से सोने का मन नहीं हो रहा था। सुबह की शिफ्ट आ गई थी लेकिन, आठ का बुलेटिन मैंने खुद ही बनाया था। पूरी रात की टाइमलाइन मुंहजुबानी याद हो गई थी। करीब ग्यारह बजे कमरे पर गया कि थोड़ा आराम कर लूं। लेकिन, फ्रेश होकर, नहा धोकर सोने की लाख कोशिश कामयाब नहीं हुई। एकाध घंटे में ही फिर से ऑफिस में था।


ह्रदयविदारक तस्वीरों को तेजी से चलने लायक बनाने के काम में मैं भी सबके साथ जुट गया। फिर तय हुआ कि हमारे अपने रिपोर्टर भी जाने चाहिए। स्वभावत: रिपोर्टर होने की वजह से वैसे तो, हमेशा रिपोर्टिंग ही करने की इच्छा होती रही। लेकिन, इस मौके पर तो ये इच्छा या यूं कहूं कि आतंकवादियों के खिलाफ जंग में अपनी सामर्थ्य भर शामिल होने की इच्छा जोर मार रही थी। लेकिन, न तो मैं बॉसेद से कह पाया और न ही वो मेरी इस इच्छा को भांप सके या भांपकर भी उन्हें लगाकि ये शो प्रोड्यूस करने, प्रोडक्शन के लिए इस समय ज्यादा उपयोगी है, मुझे नहीं भेजा गया। लगा क्या खाक पत्रकारिता कर रहे हैं हम। शायद इसी कोफ्त में मैंने 27 नवंबर 2008 को ये गुस्सा निकाला था।


खैर, सुबह तक के अखबारों में कलावा बांधे आतंकवादी की तस्वीरें क्या आईं। ATS प्रमुख के हिंदू अतिवादियों के शिकार होने की रात की अफवाह एक बार फिर जोर पकड़ने लगी। अच्छा हुआ जल्दी ही ये साफ हो गया। वरना तो, लोग करकरे की शहादत को हिंदू आतंकवाद, साध्वी प्रज्ञा और मालेगांव धमाकों की ATS जांच तक से जोड़ने लगे थे। फिर तो NSG, मार्कोस के जवानों के जिम्मे देश बचाने का काम आ चुका था। मुंबई की तीन महत्वपूर्ण इमारतों से कम से कम लोगों की जान जाए इसे समझते हुए कमांडो कार्रवाई शुरू हो गई थी। खैर, जवानों की जांबाजी के बीच टीवी की टीआरपी के खिलाड़ियों ने शुरू में जल्दी से जल्दी और कुछ हद तक लाइव तस्वीरें दिखाकर TRP बटोरने की जो कोशिश की उसने शायद आतंकवादियों को जवानों की पोजीशन बताने में भी मदद कर दी।


दुनिया के सबसे बड़े और कठिन इस तरह के आतंकवादी हमले को हमारे जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। होटलों, नरीमन हाउस में फंसे लोगों को बचाकर आतंकवादियों को मार गिराया। आतंकवादी घटना को रोक न पाने की नैतिक जिम्मेदारी थोपकर कांग्रेस ने विलासराव देशमुख को वहां से हटाकर केंद्र में बड़ा मंत्री बना दिया। अच्छा हुआ कि रस्मी कहिए, TRP की मजबूरी कहिए, पत्रकारिता कहिए या आप जो भी कहिए- देश के जख्म को साल भर बाद फिर से टीवी चैनलों ने, मीडिया ने थोड़ा कुरेदा तो सही। टीवी पर देखते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए। 26 नवंबर 2008 को याद करके। 26, 27 नवंबर की काली रात याद करके। ये दहशत मुंबई में ऐसे भर गई है कि हल्का सा खटका भी आतंकवादी हमला लगता है। रोजी-रोटी की मजबूरी है जिसे हम मुंबई SPIRIT कहते हैं और मुंबई की जिंदादिली समझते हैं लेकिन, बताइए ना ऐसी सरकारों में हम क्या कर सकते हैं गोली खाकर सिवा जिंदादिल रहने के। अच्छा है कि टीवी है, अच्छा है कि टीवी TRP के फेर में या फिर सनसनी फैलाने के लिए जख्म याद कराती रहती है वरना तो, सरकारें तो चाहती हैं जनता गोली खाकर सो जाए या फिर बची रहे तो, भी सोती रहे बस उनकी सत्ता चलती रहे। देश जाए भाड़ में ...

मैं जब ये पोस्ट लिख रहा था तो, रात 12.27 बजे पत्रकार मित्र अमोल परचुरे का ये संदेश आया
A year after 26/11, the safest person in the country is, ironically ...


kasab

Tuesday, August 11, 2009

हम हाथ मिला लिए हैं .. तुम मरो-कटो हमारी बला से

लीजिए साहब सब शांति से निपट गया। बड़ा बुरा हुआ। कोशिश तो पूरी हुई थी फिर भी न तो कोई मार पीट हुई, न दंगा। अब जब कुछ नहीं हो पाया तो, चलो भाई हाथ मिला लेते हैं। आखिर भरोसा जो मिल गया है कि शांतिपूर्वक सब काम हो जाएगा।


ई भरोसा हो गया है कि अब उन्हें घर तो मिल जाएगा। उन्हीं लोगों के भरोसे पर वो शांत हो गए हैं। जिनसे वो, टीवी चैनल पर चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे थे- क्या मैं आतंकवादी दिखता हूं? अरे मैं कोई सीरियल किलर थोड़े ना हूं, मैं तो सीरियल किसर हूं?


जवाब किसी ने दिया नहीं लेकिन, सच्चाई तो यही है कि तुम हरकत तो आतंकवादी जैसी ही कर रहे थे। परदे पर दूसरों की बीवी पर बुरी नजर रखते थे, घर तोड़ने की कोशिश करते थे। अब देश में तोड़फोड़ करने की कोशिश कर रहे हो। चिल्ला-चिल्लाकर जो बोल रहे थे कि क्या मैं आतंकवादी हूं, मुझे घर इसलिए नहीं मिल रहा है कि मैं मुसलमान हूं। ये क्या है आतंकवाद नहीं है। लगे हाथ इमरान हाशमी अपने माई बाप महेश भट्ट के साथ ये भी बताए जा रहे कि ऐसा नहीं है। मेरी पत्नी तो हिंदु है लेकिन, मैं तो सबके अधिकारों की बात कर रहा हूं। बस फिर क्या था- टीवी चैनलों पर देश की सेक्युलर जमात के इकलौते अगुवा दंपति जावेद अख्तर और शबाना आजमी की पुरानी बाइट और ग्राफिक्स प्लेट पर किसको कब मुंबई में मुसलमान होने की वजह से घर नहीं मिला। सब बैक टू बैक चलने लगा।


अब ई हाशमी और भट्ट भइया को कौन बताए कि आतंकवाद हमेशा AK 47 उठाकर गोली चलाने से ही तोड़े न आता है। जो, तुम कर रहे थे। वो, भी तो वही था। दो धर्मों के बीच कटुता फैलाने की पूरी कोशिश की। जब तुम्हारे लाख भड़काने पर भी कोई नहीं भड़का तो, तुमने हाथ मिला लिया। तर्क ये भी कि भई सब शांति से करना है तो, ये तो पहले भी कर सकते थे। औ अगर सही में तुमको सिर्फ मुसलमान होने की वजह से घर नहीं मिला तो, लड़ो। काहे चुप बैठ गए। इसीलिए कि अब तो तुमको कोई भाव भी नहीं दे रहा। सच्चाई तो यही है कि तुमने जो सवाल पूछे थे वो, करने की कोशिश तो पूरी की थी लेकिन, हाय जालिम जमाना तुम्हारे साथ खड़ा नहीं हुआ। और, सब गड़बड़ हो गया। अभी भी तुम्हारी गिनती सेक्युलर जमात के अगुवा लोगों के साथ नहीं हो पाएगी। चलो मौका मिले तो, फिर कोशिश करना। मामला बन गया तो, रील लाइफ से रियल लाइफ में भी हीरो बन जाना। न बन पाना तो, फिर हाथ मिला लेना। हिंदुस्तान में इस बात की आजादी तो सबको है कि थोड़ी कूबत हो तो, कुछ भी करके शांति से हाथ मिला लो ...

Monday, December 15, 2008

जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है


पाकिस्तान पर हमला बोल देना चाहिए। पाकिस्तान से सारे रिश्ते खत्म कर लेना चाहिए। मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले और उसके बाद इसमें पाकिस्तानी धरती के इस्तेमाल के साफ सबूत के बाद इस तरह की आवाजें तेज हो गई हैं। राजनीतिक नफा-नुकसान के लिहाज से ही सभी पार्टियों के नेता सड़क पर बयान दे रहे हैं। हां, अच्छी बात ये है कि संसद के भीतर आतंकवाद पर हुई चर्चा में बरसों बाद भारतीय नेता की ही तरह सारी पार्टियों ने बात की। कांग्रेस-भाजपा-लेफ्ट के चिन्हों से भले ही जनता उन्हें अलग नहीं कर पा रही है। अब सवाल ये है कि उस दिन की चर्चा के बाद क्या।

पाकिस्तान और भारत की सरकारें लगभग एक जैसे सुर में बात कर रही हैं। दोनों अपने देश के लोगों का भरोसा खोना नहीं चाहते। दोनों देशों की सरकारों को अब आतंकवाद नासूर बन गया दिख रहा है। और, उस नासूर का मवाद इस कदर बढ़ता जा रहा है कि शरीर का अंग कटने की नौबत आ गई है। वैसे, इस नासूर को पालने-पोसने में 1947 के बाद से दोनों देशों की सत्ता संभालने वालों ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत धार्मिक बुनियाद पर नहीं बंटा था, सब रंग मिले थे इसलिए खूनी रंग हम पर बहुत कम चढ़ा और इसकी वकालत करने वाले अकसर सामाजिक तौर पर अलग-थलग हो जाते थे। लेकिन, इसने भारत में एक ऐसी जमात खड़ी कर दी जो, सेक्युलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़कर अपने सारे दुष्कर्मों को निपटा देना चाहती है।

ऐसी जमात का काम चलता भी रहा। ये जनता के गुस्से का शिकार होते थे। लेकिन, फिर पलटी मारकर स्वभाव से शांति प्रिय भारतीय जनता की आधी-अधूरी, लूली-लंगड़ी ही सही लेकिन, लोकतांत्रिक पसंद बन जाते थे। और, उधर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का हाल ये कि चाहे तानासाह हो या फिर लोकतांत्रिक हुक्मरान- सबको ये लगता था कि बिना हिंदू-हिंदुस्तान को गरियाए, भारत में आतंकवाद फैलाए उनकी सत्ता बहुत दिनों तक नहीं चल सकती। सबको जेहाद इस्लाम का सबसे जरूरी हिस्सा लग रहा था और ये भी लगता था कि भारत के मुसलमानों से भी कम आबादी वाला ये देश ही दुनिया में इस्लाम का झंडा उठाकर चल सकेगा। इस चक्कर में पाकिस्तान में जमात ही जमात खड़ी हो गई। ये जमातें पाकिस्तानी तानाशाहों और लोकतांत्रिक सरकारों के सरदारों से बड़ी हो गईं। और, हाल ये हो गया कि अवाम की चुनी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो निपट गईं।

इसके बाद पत्नी विरह ने आसिफ अली जरदारी को शायद इतनी नजदीक से आतंकवाद का मतलब समझाया। जरदारी और उनका विदेश में पढ़ रहा बेटा पाकिस्तान के अमन पसंद लोगों के साथ ही दुनिया के लिए आतंकवाद के खिलाफ एक हथियार की तरह दिखने लगे। लेकिन, ये आतंकवाद इतना कमजोर तो था नहीं। इसे तो, अमेरिका ने ही अपना काम मजे से चलाने के लिए तैयार किया था। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मे तालिबान और दूसरे आतंकवादी कैंपों को सुहराकर-फुसलाकर-पुचकारकर अमेरिका ने ही बढ़ाया था। लेकिन, जब इसी जेहाद से अमेरिकी की फटी तो, वो विश्वशांति के बहाने इराक को बरबाद करने का लाइसेंस जबरी ले गया। अगर सबको याद हो तो, पाकिस्तान से बेहद खराब संबंधों के बावजूद भारत की हर तरह की जनता- धर्मनिरपेक्ष या राष्ट्रवादी- बुश को विलेन और सद्दाम को हीरो मानकर चल रही थी। साफ है पाकिस्तान से हमारी लड़ाई-अदावत धर्म की वजह से कम सीमा जुड़ी होने-पड़ोसी होने से ज्यादा है।

कमाल ये है कि मुंबई पर हुए हमले के बाद अपनी पश्चिमी दासता से प्रेरित मानसिकता की वजह से हम सबने इसे भारत का 9/11 बताकर तुरंत अमेरिका के इराक हमले जैसे ही एक्शन की उम्मीद करनी और उस उम्मीद को पूरा करने के लिए सरकार को दबाव में डालने की कोशिश शुरू कर दी। अब सवाल ये है कि क्या हम अमेरिका जैसे हैं। अमेरिकी जनता तो, खुद को दुनिया का दादा समझती है इसलिए उसकी इज्जत बची रहे इसके लिए 2-4 देश बरबाद कर देने वाले शासकों को वो ज्यादा महत्व देते हैं। लेकिन, क्या भारत की जनता का ये मिजाज है। क्या अमेरिका की तरह हम पाकिस्तान से लड़कर जीत सकते हैं। क्या अमेरिका और इराक की लड़ाई में जैसे इराक बरबाद हो गया और अमेरिका का नुकसान बहुत कम रहा। हम भारत-पाकिस्तान की लड़ाई में वैसे नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं।

अब जो लोग ये कह रहे हैं कि भारत को पाकिस्तान या फिर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर हमला बोल देना चाहिए। उनके बुद्धि के संतुलन पर मुझे भरोसा एकदम नहीं है। क्योंकि, वो दो तरह के लोग हैं- पहले बेहद चालाक हैं सिर्फ राजनीतिक-सामाजिक नफे-नुकसान के बयान दे रहे हैं, खुद भीतर से डरे रहते हैं कि हालात इतने न बिगड़ें। दूसरे सचमुच के भावनात्मक बेवकूफ हैं। जो, सच्चे भारतीय हैं लेकिन, आजादी के बासठ सालों में नाकारा सरकारों से इतने नाराज हैं कि उन्हें लगता है कि अब आर या पार हो ही जाना चाहिए।


फिर अगर लड़ाई नहीं तो हम करें क्या। मुझे लगता है कि हमें जरदारी पर भरोसा करना चाहिए। आंखमूंदकर नहीं। जरदारी उतना ही आतंकवाद का मारा है जितना भारत। जरदारी सीधे-सीधे भारत सरकार के सामने झुक नहीं सकता ये उसकी राजनीतिक मजबूरी और कट्टर इस्लामी ताकतों का डर भी है। लेकिन, शायद ये जरदारी का रणनीतिक साथ ही हो सकता है जो, इस समय में भारत को इस मसले पर काफी राहत दे सकता है। जरदारी दबाव में ही सही लेकिन, आतंकवादी संगठनों के ऑफिस पर ताले लगवा रहा है। उन्हें भूमिगत होना पड़ रहा है। अच्छी बात ये है कि इस समय भारत को अमेरिका का रणनीतिक समर्थन भी हासिल है। और, भारत की दुनिया के नक्शे पर बढ़ती ताकत की वजह से दुनिया की दादा संस्थाएं यूनाइटेड नेशंस, सुरक्षा परिषद, वर्ल्ड बैंक, IMF भी भारत की सुन रहे हैं। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को विपक्ष का भी समर्थन हासिल है। क्योंकि, ताजा चुनाव नतीजे बता रहे हैं कि आतंकवाद का हल जनता चाहती है इस पर राजनीति तो बिल्कुल भी नहीं।

अब बस मुश्किल एक ही है कि चुनाव का समय नजदीक है। लाख सरकार और विपक्ष संसद मे चिल्लाकर बोल चुके हैं कि सब एक साथ हैं। लेकिन, सभी इसका राजनीतिक फायदा लेना चाहेंगे। सरकार ने अगर थोड़ी कार्रवाई को अपनी कामयाबी के खाते में जोड़कर वोट बटोरने की कोशिश की तो, विपक्ष तुरंत ही सरकार के बहीखाते के आतंकवाद पर नाकामी के किस्सों को मंच से चढ़कर चिल्लाने लगेगा। तब जरदारी को भी राहत मिलेगी, आतंकवादियों को भी फिर से मौका मिलेगा। वैसा ही जैसा हम पिछले बासठ सालों से देते आ रहे हैं।

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  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...