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Friday, August 22, 2014

दुनिया की सबसे कमजोर कौम है आतंकवादी

ये तस्वीर इस समय चर्चा में है। एक अमेरिकी पत्रकार जेम्स फोले को ISIS आतंकवादियों ने मारा और उसी वीडियो की एक तस्वीर है ये। पत्रकार के भगवा कपड़े पर भी सवाल खड़ा होता है। मेरा सवाल बड़ा दूसरा है। ये वीडियो दुनिया को डराने के लिए है। लेकिन, ये डराने वाला कितना डरा हुआ है। इसका अंदाजा लगाइए। निहत्था, हाथ बंधा हुआ, जिसका मरना तय है। उसके सामने भी शकल दिखाने की हिम्मत नहीं। वीडियो दुनिया को डराने के लिए और खुद इतना डरा कि जाने कौन से वीराने में भी डर रहा है शकल दिखाने से। ये दुनिया की सबसे डरपोक कौम है जो खुद की सेना बनाती है, आतंकवादी बनती है। ये गली, मोहल्ले के लंपटों से भी कमजोर लोग हैं। बेवजह जेहादी यानी जो मौत से भी नहीं डरता, इस तरह से प्रचारित करके आतंकवादियों को सबसे मजबूत दिल साबित कर दिया गया है। लेकिन, सच्चाई इसके ठीक उलट लगती है। आतंकवादी वो लोग हैं जो सबसे डरपोक हैं। दबे, छिपे, चुपके से लोगों को मारते हैं और खुद को बहुत हिम्मती साबित करने की कोशिश करते हैं। ये थके हारे लोग हैं। 

Sunday, December 21, 2008

Nawaz does an antulay on Zardari … I don’t think so .. what do u think

मेरे शीर्षक का पहला हिस्सा शनिवार को मुंबई के the free press journal की हेडलाइन थी जिस पर मुझे भयानक एतराज है। और, ये एतराज इसलिए भी बढ़ जाता है कि सिर्फ तुक ताल बिठाने के लिए फ्री प्रेस जर्नल ने ये हेडलाइन ठेल दी। वैसे तो, फ्री प्रेस जर्नल कितने लोग पढ़ते हैं इसका मुझे पता नहीं है लेकिन, फिर भी जाहिर है कुछ लोग तो ऐसे होंगे ही जिन्होंने इस हेडलाइन को पढ़कर नवाज शरीफ के साथ गैरशरीफ अंतुले को भी एक खांचे में डाल दिया होगा।

अब जरा एक नजर डालें कि आखिर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और यूपीए सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने क्या ऐसा किया कि मीडिया उनमें समानता खोजने लगा है। ऊपर से तो, दरअसल सिर्फ एक समानता दिखती है वो, ये कि ये दोनों अपने देश की सरकारों को सांसत मे डाल रहे हैं। और, इन दोनों के बयानों से- अंतुले के बयान से पाकिस्तान और शरीफ के बयान से भारत को- पड़ोसी देश को आरोप में मजबूती मिली है और इन दोनों के अपने देश का पक्ष कमजोर हुआ है।

अब सवाल ये है कि दिक्कत क्या है लोकतंत्र है और दोनों देशों में ऐसे सुर रखने वाले लोग हैं ये, क्या कम है। लेकिन, दरअसल सच्चाई बड़ी भयावह है। मैंने पिछले लेख में जब लिखा था कि जरदारी पर भरोसा करने में हर्ज क्या है तो, कई लोगों ने सवाल खड़ा किया था कि जरदारी पर भरोसा हम कैसे कर लें। लेकिन, मैंने उसी लेख के आखिर में चुनाव के समय और अंतुले जैसी जमात का भी जिक्र किया था जो, बासठ सालों से इसी तरह की बेतुकी बयानबाजी से ही अपना दानापानी चला रहे हैं और स्वस्थ मजबूत लोकतंत्र की निशानी मानकर कुछ जनता इनके बकरी से मिमियाने को शेर की दहाड़ और फिर इन्हें सवा सेर बनाती गई।

जब विपक्ष के नेता और हिंदुत्व के पुरोधा कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी और कम्युनिस्ट नेता मोहम्मद सलीम आतंकवाद को देश के खिलाफ जंग मानकर सरकार के साथ बिना किसी शर्त के खड़े थे तो, उस समय अब्दुल रहमान अंतुले को एटीएस चीफ हेमंत करकरे की हत्या मालेगांव धमाकों का सच छिपाने की साजिश के तहत की गई लगने लगी। वो, इतने से ही बस नहीं माने। उन्होंने ये भी कह डाला कि ये हिंदू आतंकवाद का हिस्सा हो सकता है। अंतुले ये बयान तब दे रहे थे जब ये साफ हो चुका है कि कितनी बड़ी साजिश के तहत मुंबई पर हमला पाकिस्तानी जमीन से तैयार हुआ। वो, सारे पाकिस्तानी थे। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि अब अंतुले इतनी बड़ी बेवकूफी को ढोल पीटकर सच करवा लेना चाहते हैं कि हिंदू आतंकवाद की साजिश का पता न चले इसके लिए पाकिस्तानी मुसलमान आतंकवादी, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और लश्कर जैसे संगठनों ने साजिश रची।

करकरे जिस तरह आतंकवादियों की गोली का निशाना बने उसमें ये साबित हो चुका है कि कोई सामान्य सिपाही भी होते तो, उन्हें आतंकवादियों की गोलियां न पहचानतीं। और, मुझे तो डर लगता है कि कहीं ये कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा न हो। क्योंकि, हर मोरचे पर पिटती सरकार जब आतंकवाद पर पिटी और उसी के साथ चुनाव हुए तो, जनता ने ये साफ कर दिया कि वो, आतंकवाद को देश की सबसे बड़ी समस्या मानते हैं लेकिन, इस पर राजनीति वो बर्दाश्त नहीं करेंगे। और, शायद यही वजह थी कि आडवाणी हों या फिर कोई और संसद में सब एकसुर में आतंकवाद को कुचलने के लिए एक साथ तेज आवाज में सरकार के साथ बोले।

लेकिन, अंतुले तब भी अलग बोल रहे थे। वो, कह रहे थे कि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी और unlawfull prevention act पास हुआ तो, इससे अल्पसंख्यकों के हित मारे जाएंगे। अब जब ये बिल आतंकवाद को कुचलने के लिए है तो, हिंदुस्तानी मुसलमान का हित कैसे मारा जाएगा। अंतुले जैसे लोग हिंदुस्तानी मुसलमानों को किस खांचे में खड़ा करना चाहते हैं मैं समझ नहीं पा रहा हूं। थोड़ा दबे-दबे में लालू प्रसाद यादव से लेकर दूसरे बासठ सालों से इसी तरह की तुष्टिकरण की राजनीति पर जिंदा लोग भी अंतुले की खिलाफत करने से बच रहे थे।

लेकिन, जब सोनिया गांधी के विश्वस्त कांग्रेसी महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहाकि कि अंतुले ने क्या गलत कह दिया। तब मेरा संदेह और पक्का हो गया कि ये कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस कड़ी बयानबाजी और पाकिस्तान के खिलाफ दबाव बनाकर देश को ये संदेश देना चाहती है कि हम आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए सबसे काबिल हैं। साथ ही अंतुले, दिग्विजय जैसों की फौज अल्पसंख्यक वोट बटोरने के अभियान में लगा दी जिससे मुलायम, माया जैसों का वोट कटे और लोकसभा में कुछ सीटें बढ़ जाएं। विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस, मीडिया और राजनीतिक विश्लेषक तीनों ये मान चुके हैं कि लोकसभा चुनावों में आतंकवाद का मुद्दा तो नहीं चलेगा।

अंतुले इतने पर भी बस नहीं हुए। अब वो कट्टरपंथी मौलाना की तरह बोलने लगे हैं। उन्होंने कहाकि वक्फ की जमीन अल्लाह की जमीन है और इस पर अगर किसी ने कब्जा किया है तो, उसके खिलाफ जेहाद जायज है। यानी अंतुले गृहयुद्ध की बुनियाद और पुख्ता कर रहे हैं। अब अगर इसकी प्रतिक्रिया में बहुसंख्यक भी उसी अंदाज में आया तो, हाल क्या होगा। जब मौका था कि मजबूरी में फंसे पाकिस्तान पर दबाव डालकर आतंकवाद की जड़ में मट्ठा डाला जा सकता था। जब मौका था कि भारत-पाकिस्तान को साथ लेकर अपनी तरक्की बेहतर कर लेता तो, अंतुले, दिग्विजय की कांग्रेस अपनी वोटबैंक पॉलिटिक्स को भुनाने में जुट गई है।

नवाज शरीफ अपने देश के राष्ट्रपति के खिलाफ बोले तो, वो सच्चाई है कि मुंबई हमले में पकड़ा गया आतंकवादी अजमल कसाब पाकिस्तान के फरीदकोट का है। नवाज शरीफ का ये इंटरव्यू जिस पाकिस्तानी जियो न्यूज चैनल पर दिखाया गया उसने वहां के गांव वालों का इंटरव्यू तक प्रसारित किया जिससे ये और पुष्ट होता है। इससे तो, अंतुले का बयान वैसे ही खारिज हो जाता है। लेकिन, अंतुले जैसी राजनीति को पालपोसकर बड़ा करने वाली कांग्रेस अब शायद अंतुले को बुढ़ापे में अपने पुनर्जीवन के लिए इस्तेमाल कर लेना चाहती है। इसीलिए मैं फिर से कह रहा हूं कि खुली आंख से जरदारी, शरीफ पर भरोसा ठीक है। आंखबंदकर देश में बैठे लोगों की कारस्तानियों पर भरोसा ठीक नहीं है।

Wednesday, December 17, 2008

मुंबई में जिंदगी की रफ्तार से तेज दौड़ रही है दहशत



मुंबई में जिंदगी की रफ्तार कुछ ऐसी है कि छोटे शहरों से आया आदमी तो यहां खो जाता है। उसे चक्कर सा आने लगता है। इस रफ्तार को समझकर इसके साथ तो बहुतेरे चल लेते हैं। लेकिन, इस रफ्तार को कोई मात दे देगा ये, मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था। पर 16 दिसंबर को रात 8 बजे की करी रोड से थाना की लोकल ट्रेन में सफर के दौरान दहशत मैंने अपने नजदीक से गुजरते देखी।

करी रोड से स्टेशन पहुंचकर रुकी तो, अचानक हवा में कुछ आवाजें सुनाई दीं कि कोई लावारिस बैग पड़ा है। 30 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे कि ठसाठस भरी ट्रेन में एक दूसरे के शरीर से चिपककर पिछले 40 मिनट से यात्रा कर रहे यात्री एक दूसरे से छिटककर प्लेटफॉर्म पर पहुंच गए। फर्स्टक्लास का पूरा कंपार्टमेंट खाली हो गया था। शायद ये मुंबई की लोकल में चलने का लोगों का अभ्यास ही था कि लोग क दूसरे से रगड़ते 30 सेकेंड में ट्रेन के डिब्बे से बाहर हो गए और कोई दुर्घटना न हुई।


4-5 मिनट रुकने और पुलिस की जांच के बाद ट्रेन चल दी और फिर ट्रेन में नशे में धुत एक आदमी की इस बात से कि- कौन साला इस मारामारी की जिंदगी को ढोना चाहता है-जब मरना होगा तो, मरेंगे ही। क्या बाहर मौत नहीं है- मुंबई स्पिरिट जिंदा हो गया। डिब्बे में ही खड़े-खड़े ताश की गड्डी भी खुल गई और सब घर भी पहुंच गए। लेकिन, दरअसल आतंक की जमात का काम बिना कुछ किए पूरा हो चुका है। अब मुंबई ऐसे ही चौंक-चौंककर अनदेखी और देखी दहशत से डरेगी।

Thursday, November 27, 2008

नपुंसक नेताओं के हाथ में कब तक रहेगा देश

खून खौल रहा है। इच्छा ये कि क्यों नहीं मैं भी किसी फोर्स में हुआ। और, क्यों नहीं ऐसा मौका मुझे भी मिला कि दो-चार आतंवादियों को मार गिराता। साथ में कुछ नपुंसक नेताओं को भी। हम टीवी वाले भले ही देश को न्यूज दिखाने के चक्कर में हर खबर को नाटकीय अंदाज में पेश करने वाले बन गए हैं। लेकिन, सच्चाई यही है कि कलेजा हमारा भी कांपता है। औऱ, खून हमारा भी खौलता है।


लगातार आतंकवादी चुनौती दे रहे हैं और जब आतंकवादी ऐसा धमाका करते हैं, सरेआम हिंदुस्तानियों की लाशें गिराते हैं, तब भले ही हम मीडिया वाले झकझोर कर देश को जगाने की कोशिश करते हों लेकिन, ये रात का धमाका सुबह की रोशनी के साथ डर भी खत्म कर देता है। और, आतंकवादियों के लिए सुबह फिर से नई तैयारी का रास्ता बना देती है। क्योंकि, हम नपुंसक नेता और उनके इशारे पर एक ही धमाके के लिए अलग-अलग मास्टरमाइंड पकड़ने वाली एटीएस और पुलिस के बताए भर से ही संतोष कर सकते हैं।


देश का आम आदमी मर रहा है। अब मैं ये सोच रहा हूं कि क्या कोई आम आदमी जागेगा नहीं। देश में घुन की तरह आतंकवादियों के हिमायती ऐसे भर गए हैं कि जाने कितने बुधवार की जरूरत है। मुझे नहीं समझ में आता कि जेल में बंद आतंकवादियों को किसके लिए बचाकर रखा हुआ है। क्या फिर किसी खूंखार आतंकवादी के लिए देश के कुछ लोगों को बंधक बनाया जाएगा तब। अब अगर मुंबई के ताज होटल, ओबरॉय होटल को कुछ घंटों के लिए ही सही बंधक बना सकते हैं। तो, साफ है कि देश बंधक है। औऱ, हमारे कमीने नेताओं को सिर्फ अपने वोटबैंक की चिंता सता रही है। उसको भड़का दूसरा इसका वोट ले लेता है। ये इसको भड़काकर उसका वोट ले लेता है।


संसद पर हमले के अलावा अब तक आतंकवादी चोरी-छिपे बम रखकर निर्दोष हिंदुस्तानियों की जान लेते थे। अब नपुंसक सरकार के राज में इनका साहस ऐसा बढ़ गया है कि ये दौड़ा-दौड़ाकर हमारी जान ले रहे हैं। इधर,हमारा नपुंसक गृहराज्य मंत्री शकील अहमद जानकारी देने के बजाए टेलीविजन चैनल पर एंकर से झगड़े कर रहा था। उधर, मुंबई में एंबुलेंस में हमारी लाशें लदकर हॉस्पिटल पहुंच रही थीं।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...