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Thursday, October 22, 2015

बिहारी कि बाहरी

‪#‎BiharVotes‬ के समय बिहार में रहा। लेकिन, बिहार के बारे में बिहारी ही तय करेगा, बाहरी नहीं। एक जगह भोजन पर जाना हुआ। जगह है दसरथा। दसरथा और सिपारा दोनों पुराने गांव हैं, जो 1980 आते आते शहर में शामिल होने के फेर में लोग घर बनाने लगे। पटना सचिवालय, स्टेशन से ये जगह सिर्फ 3 किलोमीटर है। अब वोट यहां किस आधार पर पड़ना चाहिए। ये बिहारियों को बताने की जरूरत है क्या। तस्वीरें देखिए इन्हीं रास्तों से हम पहुँचे। ‪#‎PrideOfBihar‬

Saturday, July 11, 2015

बिहार में बदल गए हैं जाति के नेता

बिहार विधान परिषद के चुनाव नतीजों ने राजनीतिक पंडितों के लिए पुनर्निरीक्षण की बुनियाद बना दी है। ज्यादातर राजनीतिक पंडितों, अनुमानों ने लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड के गठजोड़ के बाद बिहार में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की नैया डूबी ही मान ली है। बिहार में नीतीश का ही जनता दल यूनाइटेड है, भले इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव हों। सामान्य राजनीतिक समीकरण यही कह रहा है कि बिहार में जाति की राजनीति इस कदर हावी है कि अब  बीजेपी के लिए रामविलास का साथ होने के बावजूद चुनाव जीतना मुश्किल है। सामान्य राजनीतिक समीकरण कहता है कि यादव और दलित अगर जुड़ जाएं तो, फिर बिहार में किसी को भी सिंहासन पर बैठा सकता है। उस मुसलमान साथ आ जाएं तो, सोने पर सुहागा जैसा हो सकता है। और राजनीतिक विद्वान लालू-नीतीश के गठजोड़ से इसी सोने पर सुहागा जैसी स्थिति की कल्पना में हैं। लेकिन, ये सामान्य राजनीतिक समीकरण की बात थी। जबकि, अब बिहार का राजनीतिक समीकरण सामान्य नहीं रहा है। यादव पूरा का पूरा न लालू प्रसाद यादव के साथ है। और न ही मुसलमान। कुर्मी और दलितों में भी एनडीए ने रणनीतिक सेंध लगा दी है। रही-सही कसर खुद नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को पार्टी से निकालकर कर दी। लेकिन, राजनीतिक समीकरण सीधा जोड़, घटाना या गुणा, भाग नहीं होता। अब उसमें नया मोड़ ये है कि 23 प्रतिशत दलित और 15 प्रतिशत यादव वोट अब सीधे लालू या नीतीश के खाते में नहीं जा रहा है। बिहार विधान परिषद चुनावों ने ये साफ भी कर दिया है।

 
जीतनराम मांझी मुसहर जाति से आते हैं। ये बिहार में महादलित वर्ग है। दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी चतुराई से दलितों में भी महादलित का नारा इसलिए मजबूत किया है जिससे नीतीश कुमार के महागठजोड़ से मुकाबला किया जा सके। जीतनराम मांझी ने मुख्यमंत्री रहते कुछ बड़े शानदार फैसले किए हैं। उन्होंने महिलाओं को आरक्षण दिया। साथ ही ठेके पर नियुक्त शिक्षकों को नियमित कर दिया। विवादित बयान के लिए ज्यादा जाने गए जीतन राम मांझी कमजोर ब्राह्मण और राजपूतों को भी आरक्षण की वकालत करते हैं। ये ऐसे फैसले हैं जिसका असर मत देते समय लोगों के दिमाग में जरूर होगा। और सबसे बड़ी बात ये है कि भले ही जीतनराम मांझी अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ें, मतदाता के दिमाग में लगभग साफ है कि लालू-नीतीश एक साथ और बीजेपी-रामविलास और जीतनराम के साथ। रामविलास पासवान ने अपने जन्मदिन पर जीतनराम को केक खिलाकर ये साफ कर दिया कि कौन कहां खड़ा है।  और, सबके बाद बिहार में सारी लड़ाई जाति की ही है। लेकिन, अब इस जाति की लड़ाई में कई बड़े तथ्य जुड़ गए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिला लोकसभा चुनाव में। जब रामकृपाल यादव ने बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा को हराया तो, साफ हो गया कि बिहार गोप समीकरण बदल रहा है। सिर्फ रामकृपाल यादव ही नहीं, बीजेपी के टिकट पर सीवान, उजियारपुर, और मधुबनी से भी जीतने वाले यादव ही हैं। और उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के प्रत्याशियों को हराया है। आरजेडी के बाहुबली सांसद पप्पू यादव भी अब लालू का साथ छोड़ चुके हैं। पूर्णिया, सहरसा, मुंगेर और भागलपुर में पप्पू यादव का कितना प्रभाव है, इस पर बहस हो सकती है लेकिन, इसे नकारना संभव नहीं है। पप्पू यादव ने अपनी नई पार्टी बना ली है। और राज्य में पदयात्रा पर निकल पड़े हैं। पप्पू यादव की छवि राष्ट्रीय स्तर पर कितनी भी खराब हो लेकिन, सच्चाई यही है कि यादव जाति के लोगों में पप्पू यादव का प्रभाव कई बार लालू प्रसाद यादव से भी ज्यादा दिखा है। शायद यही वजह भी रही कि लालू प्रसाद यादव ने पप्पू यादव को पार्टी से निकाल बार किया। क्योंकि, लालू प्रसाद यादव के उत्तराधिकारियों, मीसा-तेजप्रताप-तेजस्वी, में से कोई भी पप्पू यादव के आसपास भी खड़ा नहीं होता है। ये वही पप्पू यादव हैं जिन्होंने मई 2014 के लोकसभा चुनाव में मधेपुरा से शरद यादव को हरा दिया। जबकि, लोकसबा चुनावों में मोदी लहर में खुद लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती और पत्नी राबड़ी देवी चुनाव हार गईं।
 
भूमिहार ब्राह्मण और राजपूतों को स्वाभाविक तौर पर भारतीय जनता पार्टी का वोटर माना जाता रहा है। बावजूद इसके कि बिहार की राजनीति में राजपूत और भूमिहार एक दूसरे के कट्टर विरोधी हैं। भूमिहार ज्यादा प्रभावशाली वर्ग है। और, लोकसभा चुनाव के बाद किसी भूमिहार को मंत्री न बनाने से भूमिहारों में गस्सा था। लेकिन, गिरिराज सिंह को मंत्री बनाकर नरेंद्र मोदी ने भूमिहारों को गुस्सा कम कर दिया है। इसके अलावा लालू-नीतीश के हाथ मिला लेने से इन दोनों जातियों के पास बीजेपी के पाले में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता है। कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में जाति खत्म नहीं हुई है। लेकिन, जातियों के नेता एक नहीं रह गए हैं। एक जाति के कई नेता हो गए हैं। और सबकी अपनी राजनीति है। इसलिए महागठजोड़ या महादलित कौन सा दांव इस विधानसभा चुनाव में हिट होगा। इसका अंदाजा लगाना सीधा तो नहीं है। कम से कम बिहार विधान परिषद के चुनाव ने तो ये साफ कर ही दिया है। विधान परिषद के चुनाव चाहे सीधे जनता के वोट से न चुने जाते हों। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि ये इशारा महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि ज्यादातर विधान परिषद चुनाव में सत्ता पक्ष के ही विधायक चुने जाते हैं। यहां सत्ता बदले भले न बदलने के तगड़े संकेत हैं, तभी ये परिणाम हैं।

Friday, March 20, 2015

भारतीय शिक्षा का आइना हैं बिहार से आई नकल की तस्वीरें

बिहार में नकल की तस्वीरें और वीडियो देखकर देश सोच रहा है कि बिहार ऐसे पढ़ता-बढ़ता है। तस्वीरें दिखें, सामने आती हैं तो उत्तर प्रदेश के लोगों को भी ऐसी ही लजाना पड़ता हो। मुझे बचपन में इलाहाबाद के गांव के एक स्कूल में ऐसे ही नकल कराने का वाकया बड़े अच्छे से याद है। लगभग इसी तरह खिड़कियों से नकल की पुर्ची फेंकना और बीच-बीच में, कानून व्यवस्था कायम है का अहसास दिलाने के लिए, पुलिस वालों का डंडा लेकर नकल कराने वालों को दौड़ाना। बचपन में गर्मी की छुट्टियों में हम करीब डेढ़-दो महीने के लिए गांव जाते थे। हम सभी भाई-बहन इलाहाबाद में रहते—पढ़ते थे। नकल जैसी संस्थागत व्यवस्था से परिचय नहीं था। इसका मतलब ये भी नहीं है कि कभी नकल ही नहीं किया। हां, पढ़ाई के दौरान दो बार छोड़कर कभी नकल नहीं किया। एक बार वाला परिणाम अच्छा हुआ निराशाजनक रहा। एलएलबी में दाखिले के लिए की गई नकल काम नहीं आई। दोबारा वाली नकल काम आई। लेकिन, गांव में छेउंगा में जो विद्यालय था, वहां की पढ़ाई अद्भुत तरीके से होती थी। ऐसे ही सब जिस बोरे पर बैठते थे। उसी बोरे के नीचे पेपर में लिखे प्रश्नों के उत्तर खोजने का जुगाड़ होता था। उसमें भी ज्यादा जुगाड़ी/प्रतिष्ठित जुगाड़ी लोगों की तो पूरी कॉपी बाहर जाकर अंदर आ जाती थी। हां, उत्तर प्रदेश में अब बहुतायत में ये हाल नहीं है। लेकिन, ये किसे भूला होगा कि उत्तर प्रदेश में नकल विरोधी कानून भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार की जड़ में मट्ठा डालने में अहम भूमिका में था। सवाल ये है कि कौन लोग हैं जो, अपने बच्चों को इस तरह से पास कराकर डिग्री दिला देना चाहते हैं। सवाल ये है कि कौन सी सरकार और अधिकारी हैं, जिन्हें इस संस्थागत नकल व्यवस्था का पता नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ बिहार की समस्या है। या ये यूपी-बिहार की समस्या है। अच्छा है कि मीडिया में बहुतायत उत्तर प्रदेश-बिहार के लोग हैं और वो खुद की बुराई करने में पीछे नहीं रहते। तो, देश देख रहा है कि देश कैसे पढ़ रहा है, कैसे पास हो रहा है और कैसे डिग्री ले रहा है।

लेकिन, क्या ये समस्या सिर्फ यूपी-बिहार की है। ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश-बिहार के पढ़ने में कमजोर लड़के दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, गुजरात जाकर कैसे डॉक्टर, इंजीनियर बनकर चले आते हैं। और ये आज से नहीं हो रहा है। इसीलिए जब इस तरह के पढ़ाकुओं में से ही कोई पढ़ाने वाला बन जाता है तो, क्या हाल होता है। हाल ये होता है कि नकल की तस्वीरें दिखा रहे टीवी चैनलों के कैमरे जब शिक्षकों से पूछते हैं कि गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस में अंतर क्या है तो, वो खिसिया रहे होते हैं। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक का नाम नहीं जानते। कई लोग तो राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बता देते हैं। ये बिहार की या यूपी की समस्या नहीं है। ये समस्या से आंख मूंद लेने की समस्या है। अगर ऐसा नहीं होता तो, दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, विद्यालयों में भारत क्यों नहीं है। मेरा निजी मत इस मामले में साफ है कि डिग्री के आधार पर समाज में प्रतिष्ठा पाने का पैमाना भी इसकी बड़ी वजह है। हां, सचिन का हाईस्कूल ही पास होना किसी को सताता नहीं है। लेकिन, बगल का कोई बच्चा हाईस्कूल ही पास हो तो देखिए, गजब हो जाएगा। जब बुनियाद मजबूत नहीं होगी तो, हाईस्कूल पास या फेल, किस काम का। लेकिन, इस पर कौन सी सरकार सोच रही है। राज्य सरकारों के स्कूल आर्थिक कमजोरों को पढ़ने का अहसास कराने और इसी तरह नकल करके डिग्री पाने की संस्था बनकर रह गई हैं। और कमाल तो ये सरकारी स्कूलों की इसी बुनियाद को अब निजी शिक्षण संस्थाओं में नकल कारोबार बना दिया गया है। विद्यालय विद्या के लिए नहीं डिग्री बांटकर और कारोबार बढ़ाने के लिए खुल रहे हैं। और ये सरकार की चिंता का विषय नहीं है। इसलिए बिहार की तस्वीरों पर हंसने की जरूरत नहीं है। ये तस्वीरें भारत की उस बेबुनियाद प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद का सजीव चित्रण है, जिस पर गांव के बहुतायत बच्चे अपनी डिग्री की इमारत बनाते हैं। इस डिग्री के बूते उन गांव के बच्चों का देश बनाने की व्यवस्था में हिस्सेदारी होना तो लगभग असंभव ही है। फिर कैसे गांव के उन नकल कराकर डिग्री दिलाने वाली फैक्ट्रियों को बंद कराने के बारे में कोई चिंता कर सकता है। हां, सालाना दूसरी खबरों की तरह इस तरह की तस्वीरों का भी रुदन हो सकता है। टीवी पर बैठकर शिक्षा व्यवस्था पर चिंतित हुआ जा सकता है। बिहार को गरियाया जा सकता है। लगे हाथ उत्तर प्रदेश को भी। आखिर देश की सारी अव्यवस्था की जड़ तो यूपी-बिहार ही है। ऐसे लगता है कि यूपी-बिहार देश में नहीं होता तो, देश गजब, अद्भुत, अकल्पनीय होता। बस हमारा काम हो गया है।

Monday, November 03, 2008

लतियाए, जूतियाए, काटे, गोली खाने के बाद भी हम ऐसे ही रहेंगे

हमारा पिटना, मरना देश भर की चिंता की विषय बना हुआ है। देश (कहने भर को ही है-हर मुद्दे पर तो बंटा है) पता नहीं ऐसे सोच रहा है कि नहीं लेकिन, हम ऐसे ही सोच रहे हैं। क्योंकि, हम आजादी के बाद से (और, मुझे तो लगता है कि उत्पत्ति के साथ ही) ही ये मानने लगे हैं कि हम कमजोर होते हैं तो, देश कमजोर होता है। हम मजबूत रहते हैं तो, देश मजबूत होता है। ये अलग बात है कि जब हमसे कोई पूछता है कि हमने देश की मजबूती के लिए कभी कुछ किया क्या। तो, जवाब आता है- हमहीं तो, देश चलाते हैं- दिमाग चलाते हैं। और, दिमाग चलाना तो, बड़ा काम है। अब जो, दिमाग नहीं चला पाए 60-62 सालों में अब वो सब हम पर लात-जूते गोली चला रहे हैं। फिर भी हम दिमाग चला रहे हैं- रिरिया रहे हैं थोड़ा लात कम चलाओ भाई।

हम कहते हैं कि हम देश को ढेर सारे प्रधानमंत्री, रेलमंत्री से लेकर पता नहीं कौन-कौन त मंत्री और बड़े-बड़े ब्यूरोक्रैट देते हैं। हम कहते हैं कि हम देश के हर हिस्से में जाकर वहां का उत्थान करते हैं। हम कहते हैं कि हम किसी भी हालात में रह सकते हैं किसी भी हालत तक पहुंच सकते हैं। हमारी वजह से देश के दूसरे राज्यों के उद्योग-धंधे चल रहे हैं। हम गए तो, दूसरे राज्य चौपट हो जाएंगे। हम कहते हैं कि हमने जितने बड़े आंदोलन किए उससे देश की सामाजिक दशा-दिशा सुधरी। कुल मिलाकर हम कुछ इस तरह से जीते हैं कि इस देश में जो कुछ भी हैं- हम हैं।

हमें सबकी बड़ी चिंता है। अब हम पूरे देश को अपना मानते हैं इसलिए देश भर में कहीं भी जाकर रहते हैं। हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की है- इसलिए दुनिया के किसी भी कोने में बस चार रोटी के जुगाड़ में निकल पड़ते हैं। बाकी सब जहां जाएंगे वहां हमारे भाई-बंधु तो, कुछ न कुछ चिंता करेंगे ही। हम रेलगाड़ियों-बसों में जानवरों की तरह एक के ऊपर एक लदकर सफर करते हैं। अब तक तो आप सबने हमें पहचान ही लिया होगा। हां, हम बिहारी हैं। जो, विस्तार योजना में अब उत्तर भारतीय कहे जाते हैं। वैसे इस बिहारी या उत्तर भारतीय में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भइया-बाबू को हम नहीं जोड़ पाए हैं। ई हम जो हैं ना सिर्फ बिहार से लेकर गोरखपुर के रास्ते उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़-जौनपुर तक ही पाए जाते हैं।

लेकिन, इधर थोड़ी मुश्किल हो गई है। अब हम परोपकारियों को कोई आने नहीं दे रहा है। सब हम जैसी बातें करने लगे हैं। सब कह रहे हैं कि हम खुदही बना लेंगे चलो भइया-बाबू लोगों निकल लो यहां से। लेकिन, हम तो वसुधैव कुटुंबकम वाले हैं। हम देश बाहर जाकर बसे और सूरीनाम मॉरीशस में हम लोग राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री बनके वहां के लोगों का भला कर रहे हैं तो, हम इनकी बेवकूफों की बातों में कैसे आते। इन सब बेवकूफों को क्या पता कि हम नहीं रहेंगे तो, इनके यहां की राजनीति-अर्थनीति-समाजनीति कैसे चलेगी। ये सब तो दिमाग वाले काम हैं। लेकिन, ई ससुरे सुनी नहीं रहे हैं। कह रहे हैं सीधे से नहीं मानोगे तो, मारने-पीटने लगे। राम-राम हम तो इनका भला कर रहे हैं- इनकी गारा-मजदूरी से लेकर रात भर जागके चौकीदारी और चर्चगेट से ठाणे-वाशी, मीरा-भायंदर प्रेम से हमहीं तो लेकर जाते हैं। फिर भी ई हमको मार रहे हैं। हम अब फिर रिरिया रहे हैं- सबको मना थोड़ी न है तुम भी यही सब करो। अब उनके दिमाग तो है नहीं अपने पागल नेता के बवकावे में आ गए हैं कह रहे हैं कि ये सब भागेंगे तो खुदै ज्यादा काम मिलेगा।

उनके नेता को पागल हम नहीं कहे हम तो, उनके साथ बंबई में रहते हैं (उनका नेतवा बंबई सुनेगा तो, फिर मारेगा)। लेकिन, हमारे नेता तो, पटना-बिहार-दिल्ली रहते हैं। ऊ कहे कि हमरे अलावा सबका नेता पगला है। हमरे नेता को नहीं पहचाने। अरे वही जो, करीब पंद्रह साल राज करके हमको इतना (ना)लायक बना दिए कि हमको लगा कि चलो अब वसुधैव कुटुंबकम को चरितार्थ करके ही कुछ हो पाएगा। बिहार में ई करने के बाद अब रेल में यही कर रहे हैं। अब लेकिन, रेल तो देश भर में चलती है। बस यही पंगा हो गया।

हमने बड़ा चेत के-मशक्कत करके इनको हटाए। लेकिन, हम कहे न हम दिमाग वाले हैं। तो, सोचिए हम पर राज करने वाला नेता (जो, दूसरे नेताओं को बुड़बक-पागल कहके बेईज्जती करता है और पटना युनिवर्सिटी के जमाने से उसी पागलपन-बुड़बकई को ब्रांड बनाके मेहररुवौ को मुख्यमंत्री बना दिया) कितना दिमागदार होगा। अब ऊ कह रहा है कि हम पर खतरा है यानी साफ है देश पर खतरा है। इसलिए हमारे सारे लोग राजनीति बंद करें और इस्तीफा दे दें। क्योंकि, राजनीति करने का आजीवन पट्टा तो, ऊ हमारे कान में बड़े-बड़े बाल वाले नेताजी के ही पास है। ऊ कह रहे हैं कि उनके पटना युनिवर्सिटी के दिन वाले साथी और उसके बाद से परम विरोधी (बीच-बीच में हंस बोल लेते हैं तो, गलत संदेश न समझ लीजिएगा) नेताजी देश को गलत संदेश दे रहे हैं। इस्तीफा नहीं दे रहे हैं।

काहे लिए इस्तीफा। इसलिए कि हमको बंबई में पीटा गया। हममें से एक को गोली मार दी गई। हमारे उस एक का गुनाह कोई थोड़ी न था। उ तो, बस थोड़ा गुस्सा दिखा रहा था। बेचारे के पास लाइसेंसी नहीं थी तो, देसी कट्टा टाइप रिवॉल्वर जुगाड़ करके किसी तरह मुंबई आया और गुस्से में चीखा। एकाध फायर इधर-उधर किए बेचारा बार-बार कहता रहा कि हम किसी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। बस राज ठाकरे को मारना चाहते हैं पुलिस कमिश्नर से मेरी बात करा दो। अब क्या उसे इतना भरोसा था कि कमिश्नर उसे साथ ले जा कर राज को गोली मारने में मदद करेगा।
खैर कमिश्नर की जगह कम पढ़े-लिखे दरोगा-सिपाही आए। और, बेवकूफ हममें से उस एक ज्यादा दिमाग वाले की बात नहीं समझ सके। और, उसे गोली मार दी। बस इसके बाद हमारे सारे नेता (क्योंकि, हम तो अब भी यही मानते हैं कि नेतागिरी करने का दिमाग वाला काम तो बस हमारे ही वश का है) एक साथ खड़े होकर एक सुर में दूसरे पागल नेता के खिलाफ जुटे। पीएम-मैडम के सामने रिरियाए। कान में बड़े बाल वाले नेता बाहर निकले तो, समझ में आया कि अरे अभी तो हमारी सत्ता हमारे विरोधी के पास है। बस वितंडा कर दिया।

अब उनसे कोई राज्य की बात करता है तो, ऊ साध्वी प्रज्ञा की चर्चा करने लगते हैं। बटला में आतंकवादी मारे जाते हैं। तो, उनके दूसरे फोटोकॉपी नेताजी (अरे वही जो थोड़ा तुतलाकर बोलते हैं फिर अमर सिंह विस्तार से मीडिया को बयान समझाते हैं, यहां तक कि जो, ऊ नहीं भी बोले होते हैं ऊ भी समझा देते हैं) की पार्टी के हमारे लोग प्रदर्शन करते हैं। कहते हैं नाहक अल्पसंख्यक भाई परेशान किए जा रहे हैं। नेताजी खुद रक्षामंत्री रह चुके हैं लेकिन, इनके सिपहसालार पुलिस-फौज का मनोबल तोड़ने वाला हर बयान दे डालते हैं।

लेकिन, इस सबके बाद भी हम गाना गा रहे हैं हम तो, ऐसे हैं भइया। हम न सुधरेंगे भइया। हमको समझ में नहीं आ रहा है कि हम मुंबई से सटे ठाणे स्टेशन पर जब हमको पिटते देखते हैं तो, इतना गुस्सा गए कि बंबई हत्या करने चले। लेकिन, पटना से गोरखपुर स्टेशन पर जब उससे भी गंदा करम होता है तो, किसी राहुल राज का खून नहीं खौलता। ऊ घर छोड़कर दूसरी जगह सुख-शांति तलाश लेता है। सालों से हमारे हरामखोर नेता हमारा खून चूस लिए-हमारी इज्जत फालूदा बनाके कुल्फी के साथ खा गए- हमारा खून नहीं खौला। हमें हमारे घर से निकाल बाहर किया इन कमीनों ने और हम इनके पीछे झंडा-डंडा लेकर खड़े हैं कि हम तो महान हैं हमारा काम तो, सिर्फ राज करना है। हम लात-गोली मुंबई में खा रहे हैं। हम असम में काटे जा रहे हैं। और, ई हरामखोर बुद्धिमान सबको बांटके राज करने के जतन ढूंढ़ रहे हैं। अब एक राज भी राज करने के लिए इनसे सबक सीखके उस्ताद बन रहा है।

पता नहीं किसी राहुल राज को नजदीकै में इनको मारने जितना गुस्सा क्यों नहीं आया। 2000 किलोमीटर का सफर करके आने तक गुस्सा बना रहा। 10-5 किलोमीटर की रेंज में चारो तरफ घूमते बड़े-बड़े कमीने क्यों नहीं दिखते। एक बार बाहर निकले तो, हम सड़ी-गली जिंदगी जीकर भी घर लौटना नहीं चाहते। लेकिन, हम गुस्सा हैं उनसे जिनके घर में हैं। हम उनसे गुस्सा नहीं हैं जिनकी वजह से हम बेघर हो रहे हैं। हम बंबई कट्टा लेकर किसी को डराने-धमकाने चले जाते हैं लेकिन, जहां हैं जिससे डरके रहते हैं उसके लिए गंगाजल का इस्तेमाल नहीं कर पाते। हां, फिल्म में तो हम ताली खूब बजाते हैं। यही वजह है कि राजेंद्र यादव मुंबई मिरर में बिहारी ब्रांड पर लिख मारते हैं कि बिहारी सबसे पहले बिहार से डिटैच होता है। लेकिन, जहां रहता है वहां बिहारी ही रहता है। अब ई यादवजी को कौन समझाए हम डिटैच मन से नहीं मजबूरी में हो रहे हैं। लेकिन, हम तो बस यही सोचकर डरे जा रहे हैं कि ये मजबूरी खत्म होके कभी हमारे मन का भी काम होगा या हम लतियाए, जूतियाए, काटे, गोली खाने के बाद भी ऐसे ही रहेंगे। हम गाना गाते रहेंगे हम तो, ऐसे हैं भइया। हम न सुधरेंगे भइया।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...