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Monday, June 26, 2017

नौकरी में भागते रहने का सुख !

मेरी पहली नौकरी प्रयाग महाकुम्भ में वेबदुनिया के साथ
ये सलाह अनुभव से उपजी है और सभी के लिए है। लेकिन ख़ासकर पत्रकारों के लिए। ये सही है कि हम पत्रकार या तो दिल्ली, मुम्बई जैसी बड़ी जगह या फिर अपने राज्य की राजधानी या फिर अपने जिले के ही धाँसू पत्रकार बनना चाहते हैं। इसमें से किसी भी एक मोह से उबर पाना बेहद कठिन होता है। मैं मूलत: प्रतापगढ़ से हूँ। पैदाइश के बाद हमारी पूरी बनावट इलाहाबाद की देन है। सबसे कठिन फैसला था, इलाहाबाद छोड़ना। बहुत कड़ा मन करके ये फैसला लिया था। आज उस फैसले पर मुग्ध होने जैसा भाव रहता है। फिर कानपुर, देहरादून, मुम्बई होते अभी दिल्ली टिका हूँ। हालाँकि, मैं ठहरना दिल्ली ही चाहता था। पहली बार ११ जुलाई २००१ को दिल्ली आकर गिरा था। लेकिन, दिल्ली निरन्तर भगाती रही। उसी भागने में ऊपर लिखे शहरों में रहना हुआ। आत्मीय सम्बन्ध बने। कानपुर और मुम्बई दोनों ही शहरों को लेकर मन में अच्छा भाव नहीं था। लेकिन, कानपुर में ग़ज़ब के आत्मीय सम्बन्ध बने और समझ भी बेहतर हुई। ईमानदार विश्लेषण ये कि  हर शहर ने मुझे बेहतर होने में मदद की और सबसे बड़ी बात कि समझ का दायरा बहुत बड़ा कर दिया।
हिन्दुस्तान इतनी विविधता वाला देश है कि यहां आप एक छोटी सी 2-4 दिन की यात्रा में एक पर्यटक की तरह कहीं घूम-टहलकर तो आ जाते हैं। अपने फेसबुक पन्ने के लिए कुछ अच्छी तस्वीरें जुटा लेते हैं। लेकिन, उस जगह से जुड़ाव बहुत कम हो पाता है। हिन्दुस्तान को समझने, पक्का हिन्दुस्तानी बनने के लिए जरूरी है कि हर कोई, हर किसी की भावना को समझे। कानपुर, मुम्बई और देहरादून ने मुझे ये समझने में मदद की। मुम्बई मुझे बहुत परेशान करता था। यहां तक कि 4 साल रहने के बाद लगभग विद्रोही अन्दाज में मैंने मुम्बई छोड़ा था। लेकिन, ये भी सच है कि उन 4 सालों में मिली, सहेजी अच्छी यादों की वजह से आज भी मुम्बई जाने का मन होता है। यही हाल देहरादून और कानपुर को लेकर भी है। इस लिहाज से ज्यादा जगहों पर रहना नहीं हो सका। इसीलिए नए पत्रकारों को मेरी ये सलाह है कि पढ़ाई पूरी होते ही पहला मौका मिलते ही बैगपैक करके अपने शहर, अपनी राजधानी और देश की राजधानी से जितना दूर जा सकते हैं, चले जाइए। इससे देश के और नजदीक पहुंचेंगे। लिखने, पढ़ने, समाज को समझने के लिहाज से अद्भुत, सकारात्मक बदलाव होगा।
कम से कम, जीवनसाथी पक्का कर लेने और बच्चों के जिन्दगी में आने तक तो ये प्रक्रिया जितनी तेजी से पूरा कर सकते हों, तो करिए। सच बता रहा हूं, उस भगान लेने के दौरान के अनुभव जिन्दगी में कमाल की समझ, मिठास विकसित करते हैं। और पत्रकार के लिए तो ये जरूरी है कि वो देश के हर हिस्से के लोगों की समझ को थोड़ा बहुत तो समझ सके। वरना अपने शहर, अपनी राजधानी और देश की राजधानी के लिहाज से पूरी समझ बनाएगा। फिर मुश्किल आजीवन रहेगी। दूसरे काम करने वालों के लिए भी ये बहुत सुखद अनुभव देने वाला हो सकता है। लेकिन, पत्रकार के लिए ये सबसे जरूरी सबक के जैसा है। ये किताबी ज्ञान तो है नहीं, अपने निजी अनुभव से सीखा है, इसलिए सकारात्मक परिणाम का दावा भी पक्का है।


Saturday, February 25, 2017

रज्जू भइया, जोशी,सिंघल के घर में फिर ताकतवर होती भाजपा

चौथे चरण का मतदान कई तरह से खास रहा है। चौथे चरण में इलाहाबाद जिले में भी मतदान हुआ, जो पूर्वांचल का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। इलाहाबाद कांग्रेस की पैदाइश वाली जमीन है और यही वो जमीन है, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भइया का घर है। इतना ही नहीं, इसी शहर में विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक अशोक सिंघल का घर है और यही वो शहर है जहां से बीजेपी के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी अकेले ऐसा नेता रहे, जो लगातार 3 बार इस सीट से सांसद चुने गए। कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी भले ही लखनऊ की कैंट विधानसभा से चुनाव लड़ रही हों लेकिन, उनका घर भी इलाहाबाद में ही है। फूलपूर से सांसद और उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य का भी घर यहीं है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी भी इसी शहर में रहते हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद तिवारी भी इसी शहर में रहते हैं। देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में शामिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय भी यहीं है। इस जिले का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि चौथे चरण के प्रचार का समय खत्म होते समय भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपना रोड शो खत्म कर रहे थे। और उसी समय यूपी के दोनों लड़के (अखिलेश यादव और राहुल गांधी) भी इलाहाबाद में ही थे। चौथे चरण का प्रचार 21 तारीख को शाम 5 बजे बंद हुआ, उसके एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इलाहाबाद में रैली करके जा चुके थे। इलाहाबाद में सभी दलों की इतनी जोर आजमाइश की वजह बड़ी साफ है। इस जिले में प्रदेश की सबसे ज्यादा विधानसभा सीटें हैं। अभी भी इलाहाबाद में 12 विधानसभा सीटें हैं और अगर इस जिले का हिस्सा रहे कौशांबी को जोड़ लिया जाए, तो कुल 15 सीटों का फैसला यहां से होना है। चौथे चरण में 23 फरवरी को कुल 53 सीटों पर मतदान होना है। इसलिए भी इलाहाबाद की 12 सीटें अतिमहत्वपूर्ण हो जाती हैं। और सबसे बड़ी बात कि इन सीटों से निकाल संदेश पूरब की ओर प्रभावी भी होता है।
चौथे चरण की 53 सीटों की 2012 के परिणाम के लिहाज से बात करें, तो 24 सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में, 15 सीटें बहुजन समाज पार्टी के खाते में, 6 सीटें कांग्रेस के खाते में, 5 सीटें भाजपा के खाते में और 3 सीटें पीस पार्टी के खाते में गई थीं। इस लिहाज से सीधे तौर पर सपा-बसपा ही 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां मुख्य खिलाड़ी रहीं। यहां तक कि सीट के लिहाज से कांग्रेस बीजेपी से आगे रही और पीस पार्टी भी एकदम नजदीक खड़ी दिखी। इलाहाबाद जिले की बात करें, तो 12 में से 8 सीटें सपा ने जीत लीं। 1 सीट कांग्रेस के पास है और 3 सीटें बीएसपी के पास। बीजेपी का 2012 में यहां से खाता भी नहीं खुला। यहां तक बीजेपी की परम्परागत मानी जाने वाली शहर उत्तरी और दक्षिणी की सीट पर भी उसे हार का स्वाद चखना पड़ा। लेकिन, 2017 में स्थिति बदली दिख रही है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ की परम्परागत सीट दक्षिणी से बीजेपी ने बीएसपी से कांग्रेस के रास्ते बीजेपी में आए नंद गोपाल गुप्ता नंदी को टिकट दिया है। नंदी ने ही 2007 में केशरीनाथ त्रिपाठी को हराया था। नंदी का मुकाबला सपा विधायक हाजी परवेज अहमद से है। यहां बसपा से माशूक खान और सीपीआई से आमिर हबीब के होने से बीजेपी की राह आसान दिख रही है। शहर उत्तरी भी 1991 के बाद बीजेपी की पक्की सीट हो गई थी। लेकिन, 2007 और 12 में कांग्रेस के अनुग्रह नारायण सिंह ने ये सीट जीत ली। 2012 में बीएसपी के टिकट पर दूसरे स्थान पर रहे हर्षवर्धन बाजपेयी को बीजेपी ने इस बार प्रत्याशी बनाया है। हर्षवर्धन बाजपेयी का पारिवारिक वोट और बीजेपी का मत मिलाकर लड़ाई रोचक बना रहा है। हालांकि, कांग्रेस विधायक अनुग्रह नारायण सिंह की स्थिति यहां काफी मजबूत रहती है। मुकाबला इन्ही दोनों के बीच रहने वाला है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्ष रही ऋचा सिंह को सपा ने शहर की तीसरी पश्चिमी विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया है। विश्वविद्यालय की पहली महिला अध्यक्ष होने के नाते ऋचा को छात्रों का जबर्दस्त समर्थन है। ऋचा के पक्ष में माहौल भी अच्छा है। लेकिन, मुश्किल ये कि ऋचा को शहर उत्तरी के बजाय पश्चिमी से टिकट दे दिया गया। ज्यादातर छात्र शहर उत्तरी में ही हैं। पश्चिमी सपा के बाहुबली अतीक अहमद की सीट है। हालांकि, समाजवादी पार्टी ने अतीक को टिकट नहीं दिया है। लेकिन, चुनाव में सीधे नहीं होने के बावजूद इस सीट पर अतीक का असर देखा जा सकता है। बसपा ने विधायक पूजा पाल पर फिर से भरोसा जताया है। पूजा पाल के पति राजू पाल का हत्या के मामले में अतीक और उसके भाई अशरफ पर मुकदमा चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने यहां से राष्ट्रीय प्रवक्त सिद्धार्थनाथ सिंह को टिकट दिया है। सिद्धार्थनाथ अपने नाना लालबहादुर शास्त्री और राष्ट्रीय नेतृत्व के खास होने के नाम पर मैदान में हैं। यहां मामला त्रिकोणीय है।
इलाहाबाद में यमुनापार की मेजा विधानसभा में भी मुकाबला रोचक हो गया है। बीजेपी के पूर्व विधायक उदयभान करवरिया की पत्नी नीलम करवरिया यहां से चुनाव लड़ रही हैं। सपा विधायक विजमा यादव के पति जवाहर यादव की हत्या के आरोप में करवरिया बंधु जेल में हैं। 20 साल पुराने मामले के फिर से खुलने और करीब 2 साल से जेल में होने को सत्ता की प्रताड़ना बताने में नीलम करवरिया कामयाब दिख रही हैं। महिला होने से उन्हें सहानुभूति भी मिल रही है। मेजा से सपा से रामसेवक सिंह मैदान में हैं और बसपा ने भूमिहार ब्राह्मण एस के मिश्रा को मैदान में उतारा है। 1967 से 2007 तक मेजा विधानसभा सुरक्षित थी। 2012 में सामान्य हुई तो सपा से गामा पांडेय विधायक बने लेकिन, रेवती रमण सिंह ने अपने नजदीकी गामा पांडेय का टिकट कटवा दिया। 2012 में दूसरे स्थान पर रहे बसपा के आनंद पांडेय भाजपा में आ गए हैं। इसकी वजह से ब्राह्मण बहुल मेजा विधानसभा में ब्राह्मण बीजेपी के साथ गोलबंद होते दिख रहे हैं। शहर उत्तरी की ही तरह यमुनापार की बारा सुरक्षित सीट भी सपा-कांग्रेस गठजोड़ में कांग्रेस के पास गई है। कांग्रेस से यहां से सुरेश कुमार मैदान में हैं। ये सीट भी समाजवादी पार्टी के पास थी। लेकिन, सपा विधायक डॉक्टर अजय कुमार भाजपा के टिकट पर मैदान में हैं। बसपा से अशोक गौतम मैदान में हैं। यमुनापार की करछना विधानसभा से दिग्गज सपा नेता रेवती रमण सिंह के बेटे उज्ज्वल रमण मैदान में है। पिछले चुनाव में उज्ज्वल रमण बसपा के दीपक पटेल से हार गए थे। इस बार फिर से ये दोनों आमने-सामने हैं। भाजपा से पीयूष रंजन इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में लगे हैं। यमुनापार की कोरांव सुरक्षित 2012 में बसपा के कब्जे में थी और इस बार बसपा विधायक राजबली जैसल को सीपीएम से कांग्रेस में गए रामकृपाल कड़ी चुनौती दे रहे हैं। यहां से भाजपा ने राजमणि और सपा ने रामदेव को टिकट दिया है।
इलाहाबाद के गंगापार में 5 विधानसभा सीटें हैं। गंगापार की फूलपुर विधानसभा से बीजेपी ने प्रवीण सिंह पटेल को टिकट दिया है। प्रवीण पटेल पिछले चुनाव में बसपा से लड़े थे और दूसरे स्थान पर थे। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के विरोध के बावजूद प्रवीण पटेल ने अमित शाह की अपने विधानसभा में सभा कराई और उसी में बीजेपी में शामिल हुए। यहां से सपा के सईद अहमद विधायक थे। लेकिन, सपा से मन्सूर आलम और बसपा से मोहम्मद मसरूर शेख को टिकट मिला है। फूलपूर सीट पर मुसलमान मतदाता काफी संख्या में है लेकिन, सपा-बसपा दोनों से मुस्लिम प्रत्याशी होने से बीजेपी को फायदा मिल सकता है।

फाफामऊ सीट पर सीट पर सबसे ज्यादा मौर्य मतदाता हैं और उसके बाद ब्राह्मण और मुसलमान हैं। समाजवादी पार्टी ने यहां से विधायक अन्सार अहमद को फिर से उतार दिया है। बसपा के परम्परागत मतों के साथ मनोज पांडेय ने ब्राह्मण मतों में सेंधमारी की अच्छी कोशिश की है। हालांकि, इलाहाबाद की हर सीट पर ब्राह्मण और सवर्ण मतदाताओं के बीजेपी के साथ जाने को मनोज यहां कितना रोक पाएंगे ये बड़ा सवाल है। बीजेपी ने यहां से विक्रमजीत मौर्य को टिकट दिया है। विक्रमाजीत को मौर्य के साथ सवर्ण मतों के सहारे जीत का भरोसा है। प्रतापपुर सीट से समाजवादी पार्टी ने विधायक विजमा यादव को फिर से मैदान में उतारा है। यहां से बसपा ने मुज्तबा सिद्दीकी को टिकट दिया है। भाजपा ने ये सीट अपना दल को दी है। अपना दल से करन सिंह प्रत्याशी हैं। यहां सभी प्रत्याशी सपा की विजमा यादव से ही लड़ेंगे। हंडिया सीट भी अपना दल के खाते में गई है। यहां से पूर्व मंत्री राकेशधर त्रिपाठी की पत्नी  प्रमिलाधर त्रिपाठी चुनाव लड़ रही हैं। राकेशधर पर लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है। राकेशधर के परम्परागत मत, सवर्ण और अपना दल के मतों से प्रमिलाधर की स्थिति मजबूत है। सपा से निधि यादव और बसपा से हकीम लाल यहां मुकाबले में हैं। सोरांव सीट पर अंतिम समय तक भाजपा और अपना दल में सहमति नहीं बन सकी थी। हालांकि, बाद में ये सीट अपना दल के खाते में चली गई है। अपना दल से जमुना प्रसाद सरोज लड़ रहे हैं। लेकिन, बीजेपी से सुरेंद्र चौधरी को भी चुनाव चिन्ह मिल गया है। इसी तरह समाजवादी और कांग्रेस दोनों के ही प्रत्याशी मैदान में हैं। ऐसे में सोरांव सीट पर बसपा की गीता देवी की संभावना बेहतर दिखती है। हर पार्टी इलाहाबाद में अच्छे माहौल के भरोसे उत्तर प्रदेश का पूर्वी दुर्ग जीत लेने की मंशा रखती है। 2012 में पूरी तरह से साफ हो गई भाजपा के पक्ष में 2017 में कम से कम 5 सीटें आती दिख रही हैं। समाजवादी पार्टी 3 सीटों पर पहले स्थान की लड़ाई में है और कांग्रेस के लिए अपनी एक सीट बचाना बड़ी चुनाती साबित हो रहा है। 2 सीटों पर बसपा का हाथी सबसे मजबूत दिख रहा है। 

Friday, August 19, 2016

650 किलोमीटर बाद भी एक जैसा अहसास!

कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी। ये हिन्दुस्तान की विविधता को लेकर कहा जाता है। लेकिन, मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में चार कोस तो क्या कितना भी लंबा सफर तय कर लिया जाए, एक जैसा ही है। और ये एक जैसा पानी या बानी नहीं, उससे भी बढ़कर हर हिन्दुस्तानी की वीआईपी बनने की ललक है। और ये वीआईपी या वीवीआईपी बनने की ललक बेवजह नहीं है। इसकी बड़ी पक्की टाइप की वजह है। क्योंकि, बिना वीआईपी या वीवीआईपी बने धौंस नहीं जमती। यहां तक चौराहे पर खड़े ट्रैफिक वाला शायद नियम कानून से चलने वाले पर तो फटकार लगा देगा। लेकिन, अगर वीआईपी, वीवीआईपी टाइप का कोई बिल्ला, पट्टा स्टिकर की शक्ल में कार, SUV पर चिपका है, तो फिर कहां किसी की मजाल। यही वो अहसास है जिसने पूरे हिन्दुस्तान को एक सूत्र में बांध रखा है और इसी मसले पर देश की सारी विविधता, एकता में अद्भुत तरीके से बदल जाती है। रक्षाबंधन पर घर जाना था। 17 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से जाना और 18 की रात प्रयागराज एक्सप्रेस से आना। 16 तारीख दफ्तर से लौटते बोटैनिकल गार्डन वाले चौराहे के पहले एक स्कॉर्पियो में Press के साथ VIP का स्टिकर लगा देखा। लेकिन, जब उसी के नीचे VVIP का भी स्टिकर लगा देखा, तो मुझे लगा कि ये तो अतिमहत्वपूर्ण होने के अहसास से जितना लदे हैं, इनके इस अहसास की तस्वीर तो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचनी चाहिए। आखिर 48 घंटे से भी कम समय में ऐसा राष्ट्रव्यापी वीआईपी अहसास मिला रहा है।


18 की सुबह इलाहाबाद पहुंचे। छोटे भाई के साथ स्टेशन से घर के रास्ते में थे कि सिविललाइंस वाले हनुमान मंदिर चौराहे के आगे एक साहब की कार दिखी। पहली नजर में भारतीय जनता पार्टी के किसी विधानसभा टिकट के इच्छुक टाइप की कार लगी। थोड़ा नजदीक से देखने पर समझ आया कि कोई जनकल्याण पार्टी के महासचिव हैं। नंबर प्लेट पर नजर पड़ी, तो समझ में आया कि ये तो वकील भी हैं। हाईकोर्ट का स्टिकर जो चस्पा था। मतलब डिग्री है। साथ ही ये भी मतलब कि वकालत अच्छी चल रही होती, तो ऐसे जन कल्याण पार्टी में क्यों जाना पड़ता और असली झटका मुझे तब लगा, जब मैंने देखा कि वो कार तो OLACabs के साथ जुड़ी हुई है। वाह रे वीआईपी हिन्दुस्तान। 

Wednesday, July 13, 2016

इलाहाबादी प्रदेश अध्यक्ष की टीम से इलाहाबाद गायब

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष घोषित होने के तीन महीने से ज्यादा समय के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों का एलान हो गया। तीन दिन में घोषित होने वाली टीम को बनने में तीन महीने लग गए। आठ अप्रैल को केशव प्रसाद मौर्या प्रदेश अध्यक्ष बने थे और 12 जुलाई को भाजपा की टीम घोषित हुई है। इलाहाबाद से प्रदेश अध्यक्ष चुनने के बाद जब इलाहाबाद में राष्ट्रीय कार्यसमिति हुई तो, संदेश साफ था। कांग्रेस की बुनियाद की जमीन को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में अपना 14 साल का वनवास खत्म करना चाह रही है। लेकिन, प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या की नई टीम से दो बातें साफ हैं। पहली इसमें केशव के गृह जिले इलाहाबाद को और केशव के नजदीकियों को जगह नहीं मिल सकी है। पूरे इलाहाबाद मंडल से किसी को भी प्रदेश की टीम में जगह नहीं मिल सकी है। प्रदेश मंत्री बने अमरपाल मौर्य को छोड़ दें तो, ऐसा नाम खोजना मुश्किल है, जिस पर केशव की छाप हो। मजबूत नेता की केशव की छवि कमजोर पड़ रही है। दूसरी ये टीम भले कहने को प्रदेश अध्यक्ष की है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का मतलब सुनील बंसल है, ये और मजबूती से साबित हुआ है। सुनील बंसल उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री संगठन हैं। सुनील बंसल राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेहद नजदीकी माने जाते हैं। विद्यार्थी परिषद के रास्ते भारतीय जनता पार्टी में आए सुनील बंसल की छाप नई टीम पर साफ दिखती है। जेपीएस राठौर, अशोक कटारिया, संतोष सिंह, कामेश्वर सिंह, दयाशंकर सिंह, कौशलेंद्र सिंह पटेल विद्यार्थी परिषद से ही भाजपा में आए हैं। लक्ष्मीकांत बाजपेयी की टीम में प्रवक्ता रहे विजय बहादुर पाठक को महामंत्री बनाना साफ दिखाता है कि बंसल ने जिसे जहां चाहा, वहां बैठाया। माना जा रहा है कि पाठक ही मीडिया भी देखेंगे। इस बार बीजेपी की प्रदेश की टीम बड़ी हो गई है। 15 उपाध्यक्ष और मंत्री बनाए गए हैं। साथ ही 8 महामंत्री बनाए गए हैं। प्रदेश उपाध्यक्ष में राज्यसभा सांसद बने शिवप्रताप शुक्ला का नाम अपेक्षित था। पहले भी शिवप्रताप शुक्ला उपाध्यक्ष रहे हैं। पार्टी शिवप्रताप को ब्राह्मण चेहरे के तौर पर आगे बढ़ा रही है। कलराज मिश्र के 75 पार करने के साथ मंत्री पद से हटने की खबरों के बीच ब्राह्मणों को रिझाने के लिए शिवप्रताप शुक्ला और हालिया बदलाव में मंत्री बने महेंद्र पांडेय बेहतर विकल्प के तौर पर देखे जा रहे हैं।


नई टीम में बड़े नेताओं के बेटों को पूरा सम्मान दिया गया है। कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह राजू एटा से सांसद हैं और नई समिति में उपाध्यक्ष बने हैं। लालजी टंडन के बेटे गोपाल टंडन लखनऊ से विधायक हैं और नई समिति में उपाध्यक्ष बन गए हैं। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को फिर से महामंत्री बनाया गया है। अब सवाल ये भी उठता है कि क्या पदाधिकारी को टिकट न देने को बीजेपी लागू कर सकेगी। प्रदेश अध्यक्ष के दावेदार रहे विधायक धर्मपाल सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। बागपत से सांसद सतपाल सिंह को भी प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। केंद्र में मंत्री बनने की आस रखने वाले सतपाल को प्रदेश में पद देकर संभालने की कोशिश है। शामली के विधायक सुरेश राणा को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाने से साफ है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए कैराना जैसे मुद्दे रहेंगे ही रहेंगे। बरेली से विधायक राजेश अग्रवाल को कोषाध्यक्ष का भी जिम्मा दे दिया गया है। हालांकि, रणनीति के लिहाज से इतने सांसदों और विधायकों को ही प्रदेश में पद देना बहुत बेहतर तो नहीं कहा जा सकता। भारतीय जनता पार्टी का नया जातीय समीकरण इस टीम में भी साफ दिखता है। दलित और पिछड़ों को भरपूर जगह मिली है। कौशांबी के सांसद विनोद सोनकर को उपाध्यक्ष से हटाया गया तो, सैदपुर सुरक्षित से पूर्व सांसद रहे विद्यासागर सोनकर को वही पद दे दिया गया। इससे भी समझ में आता है कि पार्टी जातीय संतुलन को लेकर कितनी सजग है। फिलहाल मीडिया टीम और प्रवक्ताओं का एलान अभी भी बाकी है। टीम के एलान में एक बात जो सबसे ज्यादा खटकती है कि आखिर पार्टी अगले दस साल बाद प्रदेश में किन नेताओं को अगली कतार में देखना चाह रही है। 

Tuesday, June 14, 2016

इलाहाबाद में भाजपा कार्यसमिति से संदेश

उत्तर प्रदेश चुनाव के लिहाज से संदेश देने के लिए भाजपा ने इलाहाबाद अच्छी जगह चुनी। मुझे लग रहा था कि राष्ट्रीय कार्यसमिति इलाहाबाद में करने के बावजूद जो संदेश इलाहाबाद से भारतीय जनता पार्टी दे सकती थी। वो नहीं दे पा रही है। ये मुझे लगा, जब मैंने देखा कि कार्यसमिति से आ रही मंच की तस्वीरों में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अलावा लालकृष्ण आडवाणी और अरुण जेटली दिखे। इलाहाबाद ने भले डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी को चुनाव हरा दिया था और वो बनारस से होते कानपुर चले गए। लेकिन, ये भी सच है कि इलाहाबाद डॉक्टर जोशी का शहर है। एक अजीब सा प्यार-नफरत का रिश्ता यहां के लोगों का डॉक्टर जोशी के साथ है। इसलिए अच्छा होता कि इस शहर में जोशी जी को पूरा सम्मान मिलता दिखता। इसीलिए मैंने लिखा कि उम्मीद है रैली स्थल पर डॉक्टर जोशी को सही जगह मिलेगी। और मंच पर डॉक्टर जोशी को अपना प्रेरणास्रोत बताकर नरेंद्र मोदी ने ये दिखा दिया कि उनकी फीडबैक मशीनरी कितनी दुरुस्त और स्वतंत्र है। इतना ही नहीं इलाहाबाद की इस रैली ने लक्ष्मीकांत बाजपेयी के तौर पर भारतीय जनता पार्टी को एक मजबूत ताकतवर ब्राह्मण नेता दे दिया है। ये बात मोदी और अमित शाह समझते हैं कि डॉक्टर जोशी और कलराज मिश्र अब ज्यादा उम्र के हो चले हैं। जबकि, लक्ष्मीकांत बाजपेयी अगले एक दशक तो भारतीय जनता पार्टी के अगुवा बने रह सकते हैं।

इसीलिए मुझे लग रहा है कि इलाहाबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति से बीजेपी जो संदेश देना चाहती थी। वो काफी हद तक सफल रही है। ब्राह्मण यूपी में वोटबैंक बन रहा है। उसमें काफी बेचैनी है। मंच का संचालन पूर्व यूपी बीजेपी अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी से कराकर और जोशी जी के अलावा कलराज मिश्र को भी सम्मान देकर मोदी ने उस बेचैनी को कम करने की कोशिश की है। बेहद सादगी वाले नेता लेकिन, दबंग अध्यक्ष रहे बाजपेयी के लिए मोदी-शाह की जोड़ी बड़ी भूमिका देख रही है। जबकि, उत्तर प्रदेश में कुछ भाजपा नेता बाजपेयी को चुका हुआ बताने का कोई मौका छोड़ नहीं रहे थे। यही वजह रही कि बाजपेयी अध्यक्ष पद से हटने के बाद थोड़ा किनारे-किनारे ही चल रहे थे। लेकिन, फिर से इतने बड़े मंच के संचालन से बाजपेयी फिर से प्रदेश की राजनीति के अगुवा नेता हो गए हैं। मंच पर एक घटना से समझा जा सकता है कि बाजपेयी का कद अभी बीजेपी में बढ़ना ही है। मंच पर मौजूद और मंच देख रहे भाजपा के नेताओं, कार्यकर्ताओं के लिए ये बड़ी घटना थी कि केंद्रीय नेतृत्व के कहने से लक्ष्मीकांत बाजपेयी की कुर्सी दूसरी पंक्ति से पहली पंक्ति में आ गई। यूपी भाजपा के एक बड़े पदाधिकारी खुद कुर्सी आगे लेकर आए। इसी से समझा जा सकता है कि पार्टी प्रदेश में ब्राह्मण नेतृत्व अब बाजपेयी को ही बनाना चाह रही है।

इलाहाबाद की भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति से कई संदेश साफ हैं। भाजपा नेता स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिकता की बात करेंगे। लड़ेंगे। @AmitShah कैराना की बात कर सकते हैं। लेकिन, @narendramodi सबका साथ सबका विकास के अपने नारे पर कायम रहेंगे। यूपी चुनाव में भी भाजपा कतई हिंदुत्व को मुख्य मुद्दा नहीं बनाएगी। संदेश देने के मामले में प्रधानमंत्री के मुकाबले का कोई नेता नहीं है। इसका अंदाजा उससे भी लगा जब वो कार्यक्रम से इतर इलाहाबाद के कंपनी बाग में शहीद क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंच गए। आजाद के सामने झुके मोदी की ये तस्वीर बहुत कुछ कह देती है। कहते हैं कि एक तस्वीर हजार शब्दों से ज्यादा बोल देती है। राजनीति में एक श्रद्धांजलि लाखों वोट दिला सकती है। तस्वीर तो बोल ही रही है।

इलाहाबाद की भाजपा कार्यसमिति से ये बात भी लगभग तय है कि उत्तर प्रदेश में पार्टी किसी चेहरे को आगे नहीं करेगी और कम से कम उस चेहरे को तो कतई नहीं, जो दबाव बनाकर सीएम का दावेदार बन जाना चाहता है। और यही बेहतर होगा, ये बात मैंने उत्तर प्रदेश कानया प्रदेश अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद कही थी। क्योंकि, मायावती, अखिलेश के मुकाबले चेहरा नहीं लड़ सकता। हां, बीजेपी जरूर सपा, बसपा से लड़ सकती है।

Wednesday, January 21, 2015

पिताजी की बीमारी के बहाने



ये कठिन था। बेहद कठिन। पिता के किसी भी उम्र में हाथ छोड़ने की स्थिति की कल्पना भी असहज कर जाती है। इस बार जब इलाहाबाद जाना हुआ तो कुछ इसी स्थिति से मैं गुजरा। अच्छी बात ये रही कि पिताजी अब पूरी तरह स्वस्थ हैं। दिमाग में खून की बूंदों के जमने का सफलतापूर्वक ऑपरेशन हो गया। लेकिन, इस बहाने से मैंने अपने जीवन की सबसे लंबी यात्रा कर ली। वो यात्रा गिनने को तो 200 किलोमीटर की ही थी। रास्ता भी बेहद जाना-पहचाना था। इलाहाबाद से लखनऊ का रास्ता। लेकिन, जब यात्रा एंबुलेंस से हो रही हो और एंबुलेंस में बीमारी की अवस्था में पिता हो तो रास्ते से पुरानी पहचान भी जरा सा भी ढांढस नहीं बंधा पाती। इलाहाबाद के अस्पताल से जब लखनऊ के लिए निकलना हुआ तो सिर्फ दो ठिकाने बताए गए। ये था लखनऊ का पीजीआई या फिर सहारा का अस्पताल। दिमाग में खून की बूंदें जमने के ऑपरेशन के लिए वैसे तो इलाहाबाद में भी कई अच्छ डॉक्टर हैं। लेकिन, मुश्किल वही कि उसके साथ लगी सुविधाओं की कमी साफ नजर आती है। उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हर तरह से राजधानी लखनऊ के बाद सबसे बेहतर मौके वाला शहर है। वहां की ये स्थिति है। सवाल ये कि कोई भी सरकार खुद से या निजी उद्यमियों के सहयोग ये क्या ऐसा नहीं कर सकती कि अधिकतम 100 किलोमीटर की दूरी पर स्वास्थ्य लगभग सारी सुविधाओं वाला अस्पताल मिल सके।

इलाहाबाद में डॉक्टर थे। लेकिन, अच्छा अस्पताल न होने से हम लोग लखनऊ के लिए निकल पड़े। इलाहाबाद शहर से बाहर निकलते ही गंगा पुल के बाद ही लंबे जाम में हम फंस गए। करीब डेढ़ किलोमीटर लंबा जाम। कोई खास वजह नहीं। बस मामला इतना था कि दो तरफ से आने वाला यातायात वहां जुड़ रहा था। और इतना संभालने की सरकारी व्यवस्था और निजी समझ अब तक नहीं बन पाई है। एंबुलेंस को रास्ता न मिलने के ढेर सारे मौके देखे हैं। उस पर गुस्सा भी आया है। लेकिन, खुद एंबुलेंस में फंसे जब एंबुलेंस बंद करने की स्थिति आई तो गुस्से का वो अहसास भीतर तक सालने लगा कि हम खुद को सभ्य कह सकते हैं क्या। हालांकि, बात ये भी सच ही थी कि एंबुलेंस के आगे वाला बेहद संवेदनशील भी होता तो भी वो अपनी गाड़ी हटा नहीं सकता था।

इलाहाबाद से लखनऊ को जोड़ने वाली सड़क कम से कम हम लोगों के पढ़ने के वक्त तक राज्य की सबसे बेहतर सड़कों में मानी जाती थी। पिताजी को एंबुलेंस में लेकर जब हम निकले तब समझ में आया कि उत्तर प्रदेश में सड़कों का कितना बुरा हाल है। बड़े-बड़े गड्ढे हो गए हैं इलाहाबाद को लखनऊ से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क पर। उम्मीद की किरण बस यही है कि अब वो राष्ट्रीय राजमार्ग में शामिल हो गया है। इसलिए रायबरेली से लखनऊ की सड़क बेहतर हो गई है।

Saturday, August 02, 2014

हिन्दी को अपमानित करने वाले ये कौन लोग हैं?

C-SAT पर क्या जबर्दस्त राजनीति हो रही है। देखिए इसे। दिल्ली में इसके विरोध की तस्वीरें तो सब देख ही रहे हैं। इलाहाबाद में भी जमकर इसका विरोध हो रहा है। सिर्फ आईएएस नहीं पीसीएस की परीक्षा में भी उसी पैटर्न को हटाने के लिए ये विरोध हो रहा है। केंद्र में बीजेपी की सरकार है। उसी विचारधारा वाले छात्र संगठन ABVP के छात्रों ने इसके विरोध में आमरण अनशन शुरू कर दिया है। समाजवादी छात्रसभा के कुछ बच्चे सड़क पर इसके विरोध में झाड़ू लगा रहे हैं जबकि, प्रदेश में इन्हीं की पार्टी की सरकार है। वामपंथी आइसा भी इसके विरोध में जुलूस निकाल रहा है। प्रतियोगी छात्र प्रवेश पत्र जला रहे हैं। कुल मिलाकर कहें तो दक्षिणपंथी, वामपंथी, समाजवादी सबको इस पर एतराज है। फिर वो कौन लोग हैं जो इतने ताकतवर हैं कि इन सब पर हावी हैं। कौन हैं जो पूर्ण बहुमत वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ऊपर फैसले ले रहे हैं। दरअसल ये गुलाम परस्त मानसिकता से लड़ाई है। ये मामला सिर्फ सीसैट का नहीं है। देखिए प्री परीक्षा के बाद ये लड़ाई चलती है। या फिर छात्रों के अपना भविष्य सुरक्षित रखने तक ही ये हिन्दी वाली चिंता चलती है। अंग्रेजी वाले नियमित और योजनाबद्ध तरीके से खुद को स्थापित करने का और दसरों पर राज करने की योजना बनाते, चलाते रहते हैं। जबकि, हिन्दी वाले जब उनके स्वार्थ पूरे नहीं होते दिखते हैं। तब मैदान में उतरते हैं। तो, जाहिर है अंग्रेजी वाले फिर हिन्दी वालों को मैदान से मकान तक पहुंचाने वाला लॉलीपॉप फैसला दिलाकर चुप करा देते हैं। लड़ाई गुलामी वाले पूरे तंत्र से है। सिर् आईएएस या पीसीएस बनने तक ये लड़ाई नहीं है। लेकिन, इतना तो जरूर है कि अगर आईएएस और पीसीएस तक भी हिन्दी वाले पहुंचने बंद हो गए तो शायद इस तंत्र से लड़ना नामुमकिन हो जाएगा। हिन्दी के नाम पर गर्व आने वाली पीढ़ी कैसे कर पाएगी। कोई रमारमण किसी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में मुख्य अतिथि नहीं बनेगा। और बना भी तो बच्चों को हिन्दी के लिए प्रेरित नहीं कर पाएगा। 

Monday, April 07, 2014

छोटे हित, छोटी चिंता, छोटे लालच, बड़े सुख

गजब था। मस्त एकदम। अपने में और साथी पंडे की पन्नी में। पन्नी- मतलब मोटी पॉलिथिन जिससे पंडाजी ने धूप, बारिश से बचने का इंतजाम कर रखा था। हवा अच्छी चल रही थी। तेज, तेज। मोटी पॉलिथिन बार-बार तेज-तेज उड़कर फिर बांस के खोंच में लग रही थी। खोंच- मतलब सलीके से बांस जो लगाने से रह गया और ऊपर निकला हुआ था। मुंह पान, गुटका टाइप की एकदम देसी दारागंजी सामग्री से भरा था। कुछ सामग्री तो कई दिनों तक मुंह में रह जाती थी। ऐसी अहसास पंडाजी का मुंह दे रहा था। वही पंडाजी बोले। बचाए लेओ नै तो पन्नी गै तुम्हार। वा देखो दर बनाइ लिहिस। अब ऊंही से फटी औ तुम्हार ग पैसा पानी। जिस पंडे की पन्नी थी उसने ऊपर हाथ लगाकर देखा और जहां दर (निशान) गया था। वहां फटा कपड़ा लपेटा दिया। मस्त पंडे के गुटके टाइप सामग्री से भरे मुंह से फिर आवाज निकली। देखो ई कपड़ा से न रुख पाई। उतार देओ एका। निकालके धै देओ। फिर काम आई। नै तो एत्ती हवा म ग समझो। केत्ते में लिहे रहेओ। जवाब आवा। 750 क रही। औ अब निकालब न। फाट जाए तो फाट जाए। एकै कई गुना दै गइन गंगा माई। माघ म। और का चाही। फाट जाई तो अगले माघ म फिर खरीदी जाई। अब पन्नी की समस्या खत्म। तो गुटके की सुगंध के साथ फिर से नई छोटी चिंता हाजिर थी। ई का किहे हो। हमरी सइकिलिया पे ई केकर केकर सइकिल लगवाए दियेओ। खाली पंडाजी ने सारी साइकिलें और एक हीरो पुक अलग करके सलीके से खड़ा किया। हम भी नहाकर लौटे थे। कपड़े भी बदल लिए। लौट आए।

(इलाहाबाद गए थे तो एक दिन संगम नहाने चले गए। वहीं दो पंडों की बातचीत थी ये। लगा कितनी छोटी चिता, लालच, हित हैं लेकिन, इनके सुख कितने बड़े हैं। पंडाजी लोगों की तस्वीर इसलिए नहीं ले पाया क्योंकि, गंगा नहाने मोबाइल लेकर नहीं गए। )

Tuesday, April 01, 2014

अपनी लेडीज के बहाने दूसरे की लेडीज के साथ

इलाहाबाद के अलोपी देवी मंदिर में नवरात्रि के पहले दिन की कतार
इलाहाबाद के अलोपशंकरी मंदिर में नवरात्रि दर्शन के लिए अच्छी व्यवस्था थी। हमारे लिए भी ये सुखद अनुभव था कि इलाहाबाद के अलोपीदेवी मंदिर में इतने व्यवस्थित तरीके से दर्शन हो रहे हैं। महिला, पुरुष की अलग कतार थी और कतार धीरे-धीरे ही सही लेकिन, लगातार बढ़ रही थी। इसी व्यवस्था की तारीफ करते हुए 2 पुरुष महिलाओं वाली कतार के सबसे पीछे लग लिए थे। और महिलाओं की कतार में पुरुष होने का भय, लज्जा छिपाने के लिए तेजी से बात करते हुए दिख रहे थे कि एकदम गेट पर रोक देगा तो रुक जाएंगे। मुझे लगा कि शायद ये अपने से धार्मिक जगह पर सद्बुद्धि का इस्तेमाल करेंगे और पुरुषों की कतार में आ जाएंगे। लेकिन, वो तो अपनी लेडीज का साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं था। दोनों पुरुष अपनी पत्नी के पीछे महिला कतार में ही लगे रहे। आखिरकार मुझे बोलना पड़ गया। बोला तो दोनों एक साथ बोल पड़े हमारी लेडीज साथ में हैं। तो मैंने तुरंत कहाकि मेरी भी लेडीज महिला कतार में आगे हैं। और ये भी बोला मैं कि क्या आप चाहते हैं कि आपकी लेडीज के पीछे भी कतार में कोई और लग जाए। मैंने फिर जोर देकर कहाकि आप लोग व्यवस्था न बिगाड़िए पुरुष कतार में आ जाइए। इतना कहने पर भय, लज्जा के दबाव में सद्बुद्धि एक पुरुष को आई और वो अपनी लेडीज का साथ छोड़कर पुरुष कतार में लग गए। लेकिन, दूसरे वाले सज्जन पर भय, लज्जा का दबाव कम काम कर रहा था। क्योंकि, उनकी लेडीज का उनको गजब साथ मिल रहा था। इसलिए दूसरे सज्जन थोड़ा और आगे जाकर फिर वही प्रयास करने लगे। और इसमें उनकी लेडीज प्रेरक भूमिका में थी। जब मैंने जाने नहीं दिया तो देवी दर्शन को आए पुरुष कहे बहरै से माई क दरसन कई लेब कउनौ बात नाहीं।असल समस्या यही है। अच्छी खासी व्यवस्था को पहले हम खराब करते हैं। फिर अपनी लेडीज के साथ दुर्व्यवहार पर व्यवस्था को गरियाते हैं। और हम धार्मिक हैं।

Monday, February 11, 2013

हम हादसे को हराना कब सीखेंगे ?


कुंभ में इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ ने कुंभ के सारे इंतजामों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन, यहां सच यही है कि कुंभ क्षेत्र यानी गंगा की रेती पर बसा अस्थाई शहर पूरी तरह से इंतजाम से दुरुस्त था। असल गड़बड़ी रेलवे की है। और, इस एक गड़बड़ी ने दुनिया भर से इस नायाब मेले को देखने-समझने आए और इससे अभिभूत लोगों के सामने भारतीय सरकार की बदइंतजामी जाहिर कर दी। इसे बेहतर करने की जरूरत है। कम से कम इसी बहाने अगर रेलवे के देश में कम से कम एक दोहरे ट्रैक की जरूरत पूरी की जा सके। रेल बजट और बजट के महीने का भी संयोग बन रहा है।

Wednesday, December 12, 2012

12 साल में कितना बदल गया हिंदू!

विश्व हिंदू परिषद याद है ना। अरे, वही इलाहाबाद वाले अशोक सिंघल जी जिसके अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। अपना घर भी एक शोध संस्थान को दे दिया है। गजब के समर्पित व्यक्ति हैं। सिंघल  साहब के बाद गुजरात के एक डॉक्टर प्रणीण तोगड़िया उसकी कमान संभाल रहे थे। जरूरत से ज्यादा उग्रता लिए तोगड़िया साहब की अगुवाई में विहिप सबसे पहले तो, गुजरात से ही गायब हो गया। कहा जाता है कि गुजरात में हुए दंगों में मोदी सरकार से ज्यादा भूमिका विश्व हिंदू परिषद की थी। खैर, ये नरेंद्र मोदी का कमाल था। मोदी ने सिर्फ विपक्षी राजनीतिक दलों को ही नहीं। अपने विचार से जुड़े संगठनों को भी सत्ता के रास्ते में रोड़ा बनने पर उखाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन, ये अचानक मैं क्यों याद कर रहा हूं। दरअसल एक समय में राम मंदिर आंदोलन या देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीतिक हावी हुई तो, विहिप, बजरंग दल में काम करने वाले बीजेपी से भी ज्यादा उसकी राजनीति में प्रभावी दिखने लगे। कई भगवाधारी बाबा विहिप के प्रभाव से लोकसभा, विधानसभा का टिकट पाकर वहां भी धर्म ध्वजा फहराने लगे।


महाकुंभ 2013 का प्रतीक चिन्ह
दरअसल ये अचानक मुझे याद इसलिए आया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद महाकुंभ 2013 का लोगो जारी किया है। हालांकि, इसमें महाकुंभ होने जैसा कहीं से भी दिख नहीं रहा है। क्योंकि, कुंभ तो, हर साल होता है। जबकि, महाकुंभ हर 12 साल पर होता है। प्रयाग के 2001 वाले महाकुंभ से मैं शुरुआती दिनों  वाले पत्रकार के तौर पर जुड़ा था। और, मुझे याद है कि सुबह के स्नान से रात की लीला के कवरेज करने के अलावा एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था। विश्व हिंदू परिषद का पंडाल। उसी पंडाल में 2001 के महाकुंभ में धर्म संसद हुई थी। बड़ी महत्वपूर्ण धर्म संसद थी। मुझे याद है कि मैंने धर्म संसद पर दूसरे पत्रकारों की तरह नजर गड़ा कर रखी थी। महत्वपूर्ण साधु-संतों महंतों का जमावड़ा विश्व हिंदू परिषद के पंडाल में लगा रहता था। लेकिन, 2013 के महाकुंभ में शायद ही किसी को विहिप के पंडाल की उतनी फिक्र बने। शायद ही कोई धर्म संसद हो और अगर हो भी तो, शायद ही उसका कुछ असर प्रदेश, देश की राजनीति पर बन पाए। वजह क्या हो सकती है। 12 साल में इतनी जबरदस्त अप्रासंगिकता। कहा जाता है कि समय के साथ सबको चलना ही होता है अगर, समय के साथ याद रहना है तो। नरेंद्र मोदी से बेहतर उदाहरण शायद ही इस बात का कोई हो। नरेंद्र मोदी हिंदू हृदय सम्राट थे। 11-12 सालों में मोदी विकास के प्रतीक बन गए। इसका चुनावी परिणाम तो, 20 दिसंबर को ही पता चलेगा। लेकिन, सर्वे-संकेत तो, मोदी की शानदार जीत की बात कह रहे हैं। और, इलाहाबाद के अखबारों में विहिप की खबर कहीं नहीं हैं। हां, नए महामंडलेश्वरों के अलग नगर बसाने की खबर जरूर है। सही है गंगा, यमुना, सरस्वती में 12 साल में बड़ा पानी बह गया।

Thursday, April 05, 2012

उम्मीद तो, जगी है लेकिन,


दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर अन्ना

5 अप्रैल 2011 भारतीय इतिहास की कुछ उसी तरह की अहम तारीख है जैसे कि 15 अगस्त 1947 या फिर 26 जनवरी 1950। आजादी या गणतंत्र की तारीख से 5 अप्रैल 2011 की तारीख थोड़ा अलग मायने की है, अलग महत्व की है। आजादी और गणतंत्र की तारीखें ऐसी तारीखें हैं जिस दिन देश को अपनी आजादी और अपने गणतंत्र के होने का अहसास मिला। और, वो अहसास हमारा गर्व बना। क्योंकि, 15 अगस्त 1947 के बाद कम से कम सीधे तौर पर किसी विदेशी का हम पर शासन नहीं रहा और 26 जनवरी 1950 के बाद हमने खुद के बनाए संविधान के लिहाज से एक देश के तौर पर खुद को चलाना सीखा। 5 अप्रैल 2011 का भी महत्व अगर देखा जाए तो, इन दोनों ही तारीखों से कुछ कम नहीं है। लेकिन, 5 अप्रैल 2011 की तारीख अलग इस मायने में है कि इस दिन जो, उम्मीद की किरण दिखी थी वो, अब तक अहसास में नहीं बदल पाई है।
रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार मुक्त भारत की उम्मीद में जमे लोग
5 अप्रैल 2011 को, जो उम्मीद की किरण थी वो, थी भ्रष्टाचार मुक्त भारत की। 5 अप्रैल 2011 को जंतर-मंतर पर किशन बाबूराव उर्फ अन्ना हजारे जब अनशन पर बैठे तो, अंदाजा ही नहीं था कि इस नए गांधी ने भारत की बेहद कमजोर नस पर इतने सलीके से हाथ धर दिया है। नब्ज पकड़ में आई तो, भ्रष्टाचार की बीमारी से पीड़ित हर भारतीय प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इस डॉक्टर के दवा के परचे की लाइन में खड़ा हो गया। लेकिन, भ्रष्टाचार की बीमारी दूर करने का दावा करने वाले डॉक्टर अन्ना हजारे की मुश्किल ये थी कि खुद के लिए भ्रष्टाचार की बीमारी का पक्का इलाज चाहने वाले हिंदुस्तानी दूसरे हिंदुस्तानियों के लिए खुद ही भ्रष्टाचार की बीमारी बढ़ाने का हर संभव प्रयास कर रहा था। देश में भ्रष्टाचार की बीमारी से लड़ते दिख रहे अकेले इस सीनियर सर्जन के साथ कुछ जूनियर सर्जनों की टीम भी बीमार भ्रष्ट भारतीयों के लिए उम्मीद की किरण दिखी। देश जागा। भ्रष्टाचार की बीमारी में बेसुधी की नींद ही कुछ ऐसी गहरी आई थी।
विकी पीडिया पर अन्ना हजारे का पृष्ठ बताता है कि वो, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाले महारथी हैं। पद्मश्री और पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित भारतीय नागरिक सम्मान पा चुके इस शख्स की ढेरों उपलब्धियां भी विकीपीडिया के इस पेज पर मिलेंगी। लेकिन, 5 अप्रैल 2012 को सवाल वहीं का वहीं खड़ा है कि क्या 5 अप्रैल 2011 भारतीय इतिहास में 15 अगस्त 1947 या फिर 26 जनवरी 1950 जैसी निर्णायक तारीख बन पाएगी। कुछ अतिभ्रष्टाचारियों को छोड़कर, पूरे देश की तरह हम भी उम्मीद से हैं। क्योंकि, थोड़े बहुत भ्रष्टाचारी तो हम सब हैं। लेकिन, न्यूनतम भ्रष्टाचारी होने के कारण हम जैसे लोग रिपोर्टिंग करते एक्टिविस्ट की भूमिका में आ गए थे। ये अन्ना के आंदोलन की ताकत थी।
इलाहाबाद विकास प्राधिकरण में रजिस्ट्री के लिए मारामारी
लेकिन, बीते वित्तीय वर्ष के आखिरी दिन इत्तेफाक से हम इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के दफ्तर में काफी समय रहे। और, जमीन की रजिस्ट्री की पीड़ादायी प्रक्रिया और अन्ना को चुनौती देते बाबुओं की फौज से जूझते आम आदमी को देखकर मन में फिर सवाल खड़ा हुआ कि 5 अप्रैल 2011 आखिर निर्णायक तारीख कैसे बन पाएगी। यही वो, आम आदमी था जो, जंतर-मंतर, रामलीला मैदान से लेकर अपने शहर के नुक्कड़, चौराहे तक अन्ना के साथ गला फाड़कर, मैं अन्ना हूं की टोपी लगाकर खड़ा था। वही आम आदमी अपनी खरीदी जमीन की रजिस्ट्री के लिए बाबुओं के सामने रिरिया रहा था। बाबुओं की कृपादृष्टि भर से वो, प्रसन्ना हो रहा था। आजादी के 65 साल बाद भी रजिस्ट्री का वही घटिया तरीका। वही स्टैंप पेपर पर अंगूठे के निशान, हस्ताक्षर से लेकर एक बेहद घटिया पेपर की रसीद से रजिस्ट्री हो जाने की संतुष्टि।
प्राधिकरण में रिश्वत के खिलाफ लगा सूचनापट्ट
31 मार्च 2011 को ADA यानी इलाहाबाद विकास प्राधिकरण की लिफ्ट तेजी से का सातवें, आठवें तल पर ही जा रही थी। सातवें तल पर रजिस्ट्री के डीलिंग क्लर्क के पावन दर्शन होने थे। और, आठवें तल पर एक 25-30 लोगों की क्षमता वाले कमरे में एक साथ 100-150 लोग कुछ छूट की उम्मीद में आखिरी रजिस्ट्री कराने के लिए धंसे पड़े थे। हालांकि, सातवें तल पर डीलिंग क्लर्क के कक्ष के बाहर ही एक बड़ा बोर्ड लगा था जो, साफ तौर पर इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के अन्नामय होने की बात सार्वजनिक तौर पर कह रहा था। उस सार्वजनिक सूचना पट्ट पर साफ लिखा था कि प्राधिकरण के किसी भी कार्य के लिए कोई भी अधिकारी, कर्मचारी सुविधा शुल्क/ रिश्वत न लेने के लिए वचनबद्ध है। लेकिन, इसी बोर्ड पर अन्ना के साथ खड़े अन्ना के घोर विरोधी आम आदमी, कर्मचारी में से किसी ने सुविधा शुल्क/ रिश्वत न लेने के लिए वचनबद्धता को लेने की वचनबद्धता में बदलने की कोशिश की थी। वैसे, कोई इस सूचना पट्ट पर नजर भी नहीं डालता क्योंकि, इससे तो, बनी बात बिगड़ जाएगी। और, अंदर पहुंचते ही प्राधिकरण के अधिकारियों, कर्मचारियों की ईमानदारी का नमूना मिलना शुरू हो ही जाता है।
चढ़ावा डीलिंग क्लर्क से शुरू होकर आखिरी रसीद काटने वाले चपरासी बाबू तक चढ़ रहा था। कोई सरकारी खजाने में जमा होने वाली जायज राशि भर देता तो, रजिस्ट्री के लिए बैठी बाबुओं की फौज में से किसी की करकराती, डराती आवाज सुनाई दे जाती। खर्चवा देबा कि अइसेन रजिस्ट्री होइ जाई। लाखन क जमीन लेब्या औ दुई चार सौ देए म आफत होइ जाथ। किसी तरह जिसकी रजिस्ट्री हो जा रही थी। वो, जैसे अपने सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के दर्शन जैसा अहसास पा रहा था। ऐसे ही अहसास अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार मुक्त भारत के अहसास की सबसे बड़ी बाधा हैं। 5 अप्रैल 2011 ने एक उम्मीद तो, जगाई है लेकिन, ये उम्मीद भ्रष्टाचार मुक्त भारत के संपूर्ण या फिर बहुमत के अहसास में कब बदलेगी ये बता पाना तो, शायद ही किसी के वश का होगा।

Wednesday, September 14, 2011

राम धीरज (तीसरा और आखिरी हिस्सा)

राम धीरज के गांव के हर घर से लोग इलाहाबाद में थे। और, राम धीरज भी चाहता था कि इलाहाबाद में तरक्की करने वाले लोगों के आसपास ही सही वो खड़ा हो सके। राम धीरज के गांव के ही मैनेजर साहब भी थे। बैंक में मैंनेजर। दारागंज में ही अच्छा घर था। गांव के सबसे व्यवस्थित लोगों में थे। राम धीरज की पट्टीदारी के बड़े भाई लगते थे। गांव में भले ही मैनेजर साहब और राम धीरज के घर में खाबदान (यानी दावत-निमंत्रण का संबंध) बीच-बीच में टूटता रहा हो। लेकिन, राम धीरज मैनेजर भैया के यहां से कभी टूट नहीं पाया। वजह भी साफ थी वही  दो मंजिला भैया का मकान पोर्टिको में खड़ी कार दिखाकर तो, वो अपनी हीरो पुक के जरिए फरफराती इज्जत को थोड़ा ठोस आधार भी दे पाता था।
लेकिन, गजब का था राम धीरज। अपनी परेशानी, चिंता दूर करने से ज्यादा उसका समय दूसरों को परेशान, चिंतित करने में बीतता था। अब राम धीरज के गांव-देहात से हर घर से बच्चे पढ़ने इलाहाबाद ही पहुंचते थे। और, राम धीरज के समय में इलाहाबाद पढ़ने आए बच्चों के लिए वो, बड़ी मुसीबत बनता था। गांव में मां-बाप बच्चे के फेल होने पर भी उसकी तारीफ करते रहते। लेकिन, राम धीरज से ये कैसे बर्दाश्त होता। राम धीरज अपना पैसा लगाकर गांव के हर इलाहाबाद में पढ़ने वाले बच्चे की मार्कशीट की डुप्लीकेट कॉपी निकलवा लेता था। और, जिसने भी बेवजह की हवा-पानी बनाई। उसके दरवाजे के सामने मार्कशीट की डुप्लीकेट चिपक जाती थी।
इलाहाबाद में रहने वाले मैनेजर साहब को छोड़कर किसी घर का कोई बच्चा इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंच भी नहीं पाया था। सब संबद्ध कॉलेजों तक ही पहुंचते। और, उसमें भी ज्यादातर कॉलेजों से बिना पूरी डिग्री लिए ही निकलते। उन सबकी डुप्लीकेट मार्कशीट राम धीरज के पास जरूर होती। यही वजह थी कि उससे पूरा गांव चिढ़ता था। लेकिन, उसके ऊपर इस सबका कोई फर्क नहीं पड़ता था। मैनेजर साहब के अलावा वो, सबका मजाक बना देता था। चुनावी राजनीति से बड़ा बनने की महत्वाकांक्षा कुछ इस कदर उस पर हावी थी कि वो, खुद को राजनीतिक गतिविधियों से दूर नहीं रख पाता था। राम धीरज एक राजनीतिक पार्टी का वॉर्ड अध्यक्ष बन गया था। और, जब इलाहाबाद से एक राष्ट्रीय नेता चुनाव लड़ने आए तो, राम धीरज की महत्वाकांक्षा हुई कि उसे भी प्रचार के लिए गाड़ी चाहिए।
जब किसी जतन से गाड़ी प्रचार के लिए नहीं मिली तो, उसने प्रचार गाड़ी ही अपने नाम पर इश्यू करा ली। और, फिर पूरा प्रचार दारागंज में ही होता रहा। कुछ समय दारागंज में संकरी गली में उसके किचन वाले कमरे के सामने प्रचार गाड़ी खड़ी रहती तो, कभी मैनेजर साहब के घर के सामने। और, ये सब करके राम धीरज की हवा-पानी कुछ तो, बन ही गई थी। तभी तो, दारागंज की दो सड़कों- उसके घर के सामने की गली और मैनेजर साहब के घर के सामने की सड़क- की बिजली-सफाई की व्यवस्था चकाचक रहने लगी। उसके किराए के कमरे और मैनेजर साहब के दोमंजिला मकान के सामने के खंभों पर नगर निगम से इश्यू कराए गए बड़े हैलोजन भी लग गए। यहां तक कि पूरे दारागंज में सफाई के हालात चाहे जितने खराब हों उसके कमरे के सामने की गली और मैनेजर साहब के घर के सामने की सड़क चमकती रहती थी।
राम धीरज की महत्वाकांक्षा बड़ा बनने की थी। और, बड़ा बनने के लिए यूपी-बिहार में नेतागीरी से बेहतर कोई रास्ता नहीं होता। इसीलिए जब विश्वविद्यालय में उसे प्रकाशन मंत्री शॉर्ट फॉर्म में प्र मं बनने में सफलता हाथ नहीं लगी। तो, राम धीरज ने सोचा कि जब मोहल्ले में एक अपने कमरे के सामने की गली और एक मैनेजर साहब के घर के सामने की सड़क की सफाई और बिजली का इंतजाम मैं करा लेता हूं तो, और कुछ न सही सभासद का चुनाव तो जीता ही जा सकता है। और, चुनाव न भी जीते तो, कम से कम मोहल्ले का एक प्रतिष्ठित नेता तो बन ही जाऊंगा। और, यही प्रतिष्ठित होना ही उसके लिए सबसे बड़ा लक्ष्य था क्योंकि, लाख तिकड़म के बावजूद उसे कोई प्रतिष्ठा नहीं देता था। और, इसी प्रतिष्ठा को पाने के लिए उसने सभासदी का चुनाव लड़ने की तैयारी कर ली। लेकिन, मुश्किल ये कि जिस राष्ट्रीय पार्टी से वो जुड़ा था। उस पार्टी की सभासद पहले से वहां थी। जातिगत समीकरण के लिहाज से उसका टिकट कटना संभव नहीं था। इसलिए टिकट मिल ही नहीं सकता था और न मिला। लेकिन, राम धीरज को तो, चुनाव लड़ना था। प्रतिष्ठा जो, हासिल करनी थी। इसलिए राम धीरज ने निर्दल चुनाव लड़ा। चुनाव तो, लड़ा। लेकिन, चुनाव हारा क्योंकि, जीत जाता तो, राम धीरज के जीवन में एक ऐसी बात हो जाती जो, उसे असमय इस दुनिया से जाने से रोकती।
राम धीरज चुनाव तो, हारा ही। इस दौरान नियमित खर्चे बढ़े और उन नियमित तौर पर बढ़े अनियमित खर्चों को नियमित करना तो, राम धीरज को आता ही नहीं था। खर्चे बढ़ते गए और वो, इधर-उधर की दिखा-बताकर लोगों से कर्ज लेता रहा। इसमें उसका मैनेजर साहब के घर के सामने की सड़क की सफाई और हैलोजन लगवाने का निवेश बड़ा काम आता रहा। हर किसी को मैनेजर साहब दोमंजिला मकान दिखाकर वो, बैंक गारंटी टाइप की देता रहा। लेकिन, खोखली बैंक गारंटी कब तक काम आती। आखिरकार, कर्ज देने वालों को जब बैंक गारंटी के बजाए अपनी रकम की चिंता बढ़ी तो, उन्होंने राम धीरज पर दबाव बढ़ाना शुरू किया।
अचानक राम धीरज गांव में ज्यादा रहने लगा। गांव वाले सोचने लगे कि क्या हुआ राम धीरज तो, गांव में रात रुकता ही नहीं। अचानक क्यों हफ्ते भर से यहीं पर पड़ा है। राम धीरज गांव में रुकता नहीं था। तो, उसकी वजह भी थी। वही कम सुंदर अपनी पत्नी से दूर रहने की मंशा। वैसे, वो अपनी सुंदर भाभी के पास घंटों बेवजह बात बनाते-बतियाते बैठा रहता। खैर, राम धीरज के गांव में इतने दिन रुकने का भंडाफोड़ एक दिन हो ही गया। जिन लोगों ने मैनेजर साहब की अनकही बैंक गारंटी के आधार पर राम धीरज को कर्ज दिया था। वो, मैनेजर साहब के दरवाजे पहुंच गए। दारागंज में रहते मैनेजर साहब को भी समय हो गया था। और, लोगों में प्रतिष्ठा भी थी। वही प्रतिष्ठा जिसका दशांश पाने के लिए राम धीरज आजीवन तरसता रहा। इस प्रतिष्ठा की वजह से राम धीरज को कर्ज देने वालों को मैनेजर साहब के दरवाजे से जाना पड़ा।
राम धीरज ने धीरे से कमरा भी छोड़ दिया था। लेकिन, वही पत्थर की गली वाला कमरा, जिस पत्थर पर राम धीरज का नाम लिखा था। वो, कमरा उसने छोड़ दिया। न छोड़ता तो, शायद उसी वक्त दुनिया छोड़नी पड़ती। लेकिन, कमरा तो छोड़ा। लोग कैसे छोड़ पाता। कमरे के मकान मालिक की यामाहा पर बैठकर तो, वो अपने गांव तक हो आया था। बस फिर क्या था राम धीरज को कर्ज देने वाले उसी मकानमालिक के सहारे गांव तक पहुंच गए। गांव में धड़धड़ाते दो बुलेट पर 4 लोग पहुंच गए। राम धीरज छिप गया। या यूं कह लें कि गांव में 4 लोगों का इतना तो, दावा बनता नहीं था कि वो, सर्च वारंट लेके राम धीरज को गांव में खोज पाते। वो, लौट आए लेकिन, ये कहके अगर राम धीरज इलाहाबाद में दिख गया तो, खैर नहीं।
खैर, जब खैर नहीं थी तो, राम धीरज भला क्यों इलाहाबाद में दिखता। बेचारे को अपनी एकमात्र उपलब्धि वो, पत्थर वाली गली छोड़कर जाना पड़ा। उस पत्थर पर जिस पर उसका ना खुदा था। बिना कुछ हुए। और, गली ही नहीं, मोहल्ला क्या इलाहाबाद शहर ही छोड़ना पड़ गया। वो, चुपचाप नोएडा भाग गया। नोएडा, यूपी का वो, शहर जो, यूपी का अकेला शहर बना। और, यूपी के भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी कहानियां भी यहीं से निकलती हैं। खैर, रीम धीरज की तिकड़मों से वाकिफ लोगों को लगा कि अब नोएडा में जाकर तो, वो कुछ ऐसा कर ही लेगा कि उसके जीवन में थोड़ी प्रतिष्ठा तो, जुड़ ही जाए। लेकिन, बेचारा राम धीरज। न प्रतिष्ठा जुड़नी थी न जुड़ी। अब नोएडा में न तो, सभासदी का चुनाव था। न विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री का शॉर्ट फॉर्म बनने का मौका। यहां तो, उसके लिए संकट आ गया था आजीविका चलाने का। उस पर गांव में उसकी पत्नी को भी कोई रखने को तैयार नहीं था। पत्नी को भी लेकर आना था।
तो, राजनीति के जरिए प्रतिष्ठा पाने की राम धीरज की कोशिश नोएडा आकर पूरी तरह धूमिल हो गई। और, राम धीरज को नोएडा के हजारों मजदूरों की तरह एक कपड़ा कंपनी में मजदूरी करनी पड़ी। लेकिन, राम धीरज को आदत थी। इसलिए यहां भी उसने स्टोर का काम पकड़ा और धीरे-धीरे स्टोर इंचार्ज हो गया। यानी, उसके लिहाज से फिर थोड़ा प्रतिष्ठा का काम उसे मिल गया था। लेकिन, अपने नाम लिखे पत्थर वाली गली से दूरी राम धीरज को इस कदर सालती रही कि उसे धीरे-धीरे बीमारियों ने जकड़ना शुरू कर दिया।
बीमारी कोई ऐसी नहीं थी जो, इस जमाने में दूर न होती। लेकिन, उसे जो सबसे गंभीर बीमारी लगी थी। वो, थी अपने नाम लिखे पत्थर वाली गली से दूरी। आखिर वही एक पत्थर तो, उसकी जिंदगी की उपलब्धि था। खैर, टीबी की बीमारी ने धीरे-धीरे राम धीरज की शक्ल कुछ ऐसी बना दी कि कम सुंदर दिखने वाली उसकी पत्नी अब उसके मुकाबले में आ गई। लेकिन, वो भी गजब की मिट्टी का बना था। जिस बड़े भाई ने उसकी पत्नी को गांव में रहने नहीं दिया। जो, उसे नियमित तौर पर कोसता था। उसे पैसे नहीं देता था और न ही जब तक उसके पिता रहे, उन्हें देने देता था। जैसे ही राम धीरज थोड़ा कमाने लगा उसी, बड़े भाई के बेटे को नोएडा ले आया।
भाई का बेटा भी जैसे-तैसे ही था पढ़ने में। जैसे-तैसे ही रहा। मैनेजर साहब, अरे वही दारागंज वाले, उनका बेटा भी नोएडा आ गया था। नोएडा में एक बड़ी कोठी किराए पर लेकर रहता था। राम धीरज उससे भी विश्वविद्यालय के दिनों से ही इस कदर प्रभावित था कि उसे अपनी हीरो पुक अकसर देकर चला जाता था। तो, जब राम धीरज को पता लगा कि मैनेजर साहब का बेटा नोएडा आ गया है तो, एक दिन वो, मिलने आया। लेकिन, प्रतिष्ठा का उसे खूब ख्याल था। इसलिए पता नहीं किसको पटाकर उसकी फोर्ड आइकॉन से ही आया। आखिर मैनेजर साहब के बेटे से जो, मिलना था। उधारी की फोर्ड आइकॉन का दबाव था इसलिए जल्दी में भागना पड़ा। लेकिन, ये सफल कोशिश की कि किसी तरह मैनेजर साहब का बेटा बाहर आकर देख ले कि राम धीरज फोर्ड आइकॉन से आया है।
उधारी की फोर्ड आइकॉन और ऐसी ही उधारी की प्रतिष्ठा पर राम धीरज पूरे जीवन चलता रहा। मन में इच्छा थी कि किसी तरह कुछ असल प्रतिष्ठा भी हाथ लग जाए। लेकिन, असल प्रतिष्ठा उसके लिए मृग मरीचिका ही बनी रही। धीरे-धीरे राम धीरज की तबियत ज्यादा खराब होने लगी। इतनी कि उसे कपड़ा कंपनी की नौकरी छोड़नी पड़ी। फिर उसके पास पैसे ही नहीं थे कि वो, अपनी टीबी की बीमारी का इलाज करा पाता। राम धीरज के अपने कोई बच्चे भी नहीं हुए कि वो, बीमारी से लड़ने का उत्साह बना पाता। आखिरकार, उसका चक्र पूरा होता गया और एक दिन नोएडा से वापस उसे प्रतापगढ़ के अपने उसी गांव लौटना पड़ा। जहां से उसने प्रतिष्ठा की चाह में सफर शुरू किया था।
जिस गांव को उसने छोड़ा ही इसीलिए था कि उसे प्रतिष्ठा चाहिए थी। गांव में रह रहे लोगों और गांव से निकलकर बाहर बसे लोगों से ज्यादा। सारी जिंदगी वो, गांव में रह रहे लोगों का और मौका मिलने पर तो, गांव के बाहर बसे लोगों का भी मजाक उड़ाता रहा। यहां तक कि उनको भी उसने नहीं बख्शा जिन्होंने जीवन में उससे कई गुना ज्यादा प्रतिष्ठा बनाई उनका भी मजाक बनाने से वो, नहीं चूकता था। मैनेजर साहब इसमें अपवाद थे। अब जब राम धीरज को भले ही टीबी की बीमारी की वजह से फिर से उस गांव में लौटना पड़ा। और, उसने देखा कि इन दो एक डेढ़ दशकों में तो, गांव के बच्चे भी काफी आगे निकल गए हैं तो, उसकी टीबी की बीमारी लाइलाज होती गई।
टीबी की बीमारी क्या लाइलाज होती गई। दरअसल, तो वही अपने नाम लिखे पत्थर से दूरी उसे बीमार करती गई। उस पर कुछ न कर पाने की कसक। प्रधानमंत्री के शॉर्ट फॉर्म की तो, छोड़िए कुछ नहीं कर पाया। और, उसी अपने प्रतापगढ़ के गांव में लौटना पड़ा। राम धीरज अब धीरज खो रहा था। टीबी की बीमारी ने उसकी शक्ल अपनी कम सुंदर पत्नी से कई गुना बदसूरत कर दी थी। राम धीरज न तो अच्छा बेटा बन सका। न अच्छा भाई। और, सबसे महत्वपूर्ण कि न ही अच्छा पति। फिर पिता कैसे बन पाता। वैसे, जरूरी नहीं कि अच्छा पति न बन पाने वाले लोग पिता ही न बन पाएं। बनते हैं बहुत से अच्छा पति न बन पाए लोग भी खूब पिता बने हैं। लेकिन, शायद उसके जीवन में कुछ भी ऐसा दर्ज नहीं होना था। इसीलिए जब अच्छा क्या, कामचलाऊ पति बनने की कोशिश भी की तो, शायद दूसरी परिस्थितियों ने साथ नहीं दिया होगा। और, राम धीरज ऐसे ही निकल लिया, इस दुनिया से।
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