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Wednesday, November 30, 2016

बच्चों के लिए बड़ों का बहुत बड़ा आंदोलन

नोबल पुरस्कार के लिए जब कैलाश सत्यार्थी का नाम घोषित किया गया, तो हम जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ी बात यही थी कि एक भारतीय को दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार दिया जा रहा है। ये पुरस्कार इसलिए भी अहम हो गया क्योंकि, भारत की गरीबी, मुश्किलें और असमानता को दूर करने के काम में जब भी कोई काम होता हुआ दिखता है या कहें कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जब ऐसे किसी काम की चर्चा होती है, तो वो ज्यादातर कोई विदेशी संस्था ही कर रही होती है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि भारत की धरती पर भारतीय व्यक्ति और संस्थाओं के किए काम को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कम ही महत्व मिल पाता है। इसीलिए जब नोबल पुरस्कार के लिए कैलाश सत्यार्थी को चुना गया, तो भारत के लिए ये बड़ी उपलब्धि रही। कैलाश सत्यार्थी ने बच्चों का जीवनस्तर सुधारने के लिए जिस तरह का काम किया और जिस तरह से बिना किसी साधन, संसाधन के लम्बे समय तक उसे जिया, वो काबिले तारीफ है। लेकिन, ये सब शायद दूर से अहसास करने जैसा ही रह जाता, अगर एक दिन कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउन्डेशन के कन्टेंट एडिटर अनिल पांडे का बुलावा न आता। बुलावा भी बहुत खास था। उन्होंने कहाकि कैलाश जी पत्रकारों, वेब पर काम करने वाले लोगों से मिलना चाहते हैं। कैलाश सत्यार्थी से निजी तौर पर मिलने की इच्छा भर से मैं वहां चला गया। लेकिन, वहां जाना मेरे लिए कैलाश सत्यार्थी के जीवन भर चलाए गए आंदोलन का अहसास करने का शानदार मौका बन गया। कमाल की बात ये कि अभी भी कैलाश जी पहले जैसे ही सहज, सरल हैं। एक सवाल जो मेरे मन में था कि अब नोबल पुरस्कार तो मिल ही गया। किसी भी सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति के लिए इससे बड़ा क्या यानी अब कैलाश सत्यार्थी आगे क्या करेंगे?

ये सवाल मेरे मन में था। लेकिन, हम ये सवाल पूछते उससे पहले खुद कैलाश जी ने कहाकि नोबल पुरस्कार पाने के बाद इतनी रकम और प्रतिष्ठा मिल जाती है कि कुछ न भी करे तो जीवन चल जाएगी और लगने लगता है कि आगे क्या? लेकिन, मुझे लगता है कि बच्चों के लिए अभी बहुत काम करना बचा है। और इसी बहुत काम करना बचा है वाली कैलाश जी की ललक ने भारत की धरती से दुनिया के लिए एक अनोखी मुहिम शुरू की है। वो बच्चे जिन्हें जीवन में किसी तरह से सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। वो बच्चे जो अभी भी किसी मजबूरीवश शोषित हो रहे हैं। ऐसे दुनिया के हर बच्चे को दूसरे बच्चों की तरह जीवन देने के लिए कैलाश सत्यार्थी एक बड़ी मुहिम शुरू कर रहे हैं। नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की इस मुहिम को मजबूत करने के लिए दूसरे ढेर सारे नोबल पुरस्कार विजेता और दुनिया के बड़े नेता शामिल होंगे। इसके जरिये दुनिया भर के बच्चों के हक में आवाज बुलंद की जाएगी। साथ ही बच्चों की प्रति करुणा, सहृदयता की भावना बढ़ाने की अपील भी होगी।

 राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस अभियान को शुरू करेंगे। 10-11 दिसंबर, 2016 को राष्ट्रपति भवन में Laureates and leaders For Children Summit का आयोजन कर कैलाश सत्यार्थी जी बच्चों के हित में दुनियाभर के नोबेल पुरस्कार विजेताओं और विश्व के प्रमुख नेताओं का एक नैतिक मंच तैयार करने जा रहे हैं। 100 Million For 100 Million Campaign की शुरुआत यहीं से होगी। जैसा नाम से ही जाहिर है ये अभियान दुनिया के उन 10 करोड़ बच्चों के लिए है, जिनको वो सब नहीं मिल सका, जिसके वो हकदार हैं और उन्हें ये हक दिलाने के लिए दुनिया के 10 करोड़ नौजवानों ने मन बनाया है। 10 देशों से शुरू करके अगले 5 सालों में ये अभियान दुनिया के 60 देशों में चलाने की योजना है। कैलाश सत्यार्थी कहते हैं कि दुनिया के हर बच्चे को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार दिलाने के लिए ये अभियान चलाया जा रहा है। हम सबको कैलाश जी की इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहिए। मैं इस मुहिम में कैलाश जी के साथ हूं।

Friday, October 09, 2009

ई बतकही के बड़ मनई हैं

बराक ओबामा क शांति पुरस्कार मिला है। दुनिया क सबसे बड़ा पुरस्कार है ई। अरे वही वाले का एक हिस्सा है ई पुरस्कार जिसमें हम इत्ते भर से खुश हो जाते हैं कि का भवा अमेरिका में रहि के मिला तो, भारत म पढ़ाई तो किहे रहा। अब भई तब तो बनथ भाई हम सबके खुश होएके चाही।


ई उही वाले ओबामा तो हैं जो, be the change! का जुमला हर बार बोलथैं जरूर। कर केत्ता पावथैं पता नहीं। साल भर में का भवा भइया। भवा ना दुनिया भर में घूम-घूम के कहिन be the change! औ ई बड़ मनई हैं जब बोलेन हर बार दुनिया सुनिस। ऐसा गूंजा be the change! जैसे राखी का थप्पड़ अभिषेक क गाल प। चड्ढी पहिर नहात-धोवत तस्वीरो देखके लगा कि be the change! लेकिन, का सही म कुछ चेंज भवा। इरान म तो अहमदीनेजाद से पूछो-- पाकिस्तान में आसिफ अली जरदारी, जनरल कियानी, यूसुफ रजा गिलानी-- चीनौ म पूछ लेओ। हमरे वसुधैव कुटुंबकम वाले भारत क छोड़ कउनौ से पूछे लेओ- ए भइया कहां भवा ई be the change!


be the change! बस एत्तै भवा कि गांधी के साथ ओबामा के dream date क बात सुनके हम भारतीय अइसन भाव विभोर भए। कइउ दिन तक लहराए घूमत रहे। सबके लगा कि एसे बड़ी खबर का होई औ ओबामा के गांधी के साथ dream date वाली खबर के दिन सारा मीडिया अइसा कइ दीहिस कि उम्मीद बंध गई कि भवा तो change!


ओबामा के मेहरारू मिशेल के dress sense से लैके ओबामा के दुइनौ गदेलन (बेटियों) तक की बात औ व्हाइट हाउस म कूकुर क नई नस्ल तक जमके भवा be the change! दिसंबर 10 क जब ओबामा शांति क नोबल लेइहैं तो, देखो का कहथि। पता नहीं ई याद रही कि नहीं कि दलाई लामा से मिल तक नहीं सके भइया। चीन के डर म।


ए भाई हम तो बेचारे भारतीय हैं हमार तो समझ म आवथै कि हमार जमीन कब्जाए तक बैठे हैं ई हिंदी-चीनी भाई-भाई वाले चीनी। लेकिन, भई ओबामा तुम केसे डेराए रहे हो। बताओ न। अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लैके दुनिया क कौने देश म तुम्हार be the change! वाला नारा काम कर रहा है। बताओ न सबसे बड़का वाला शांति पुरस्कार काहे मिला तुमका। सिर्फ बड़-बड़ बोलै के वजह से। सबसे बड़का देस का बड़का मनई बनै के वजह से। पता नहीं हम तो न समझ पाए रहे हैं आप समझे हों भइया तो, बताएओ जरूर। be the change

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...