टीवी के तिलिस्म को समझना होगा, भागने से नुकसान ही होगा

विस्फोट पर एक लेख पढ़ा - टूट रहा है टेलीविजन पत्रकारिता का तिलिस्म पढ़ा तो, मुझे लगा कि एक पक्ष है ये। टीवी के दूसरे पहलू पर चर्चा ही नहीं। मैं प्रिंट में काम करने के बाद टीवी की तरफ आया। मुझे जो लगता है वो, मैंने विस्फोट के लिए लिखा था। उसे यहां अपने ब्लॉग पर भी डाल रहा हूं।




बहस ये कि क्या टेलीविजिन अपने उद्भव के 10 सालों बाद ही भारत में चुक गया है। क्या टेलीविजन पत्रकारिता से सरोकार पूरी तरह से गायब हो गए हैं। क्या ये बात अब सही साबित हो रही है कि टेलीविजिन बुद्धू बक्से से आगे नहीं बढ़ पाया। क्या पत्रकारिता का जिम्मा सिर्फ और सिर्फ अखबारों के ही कंधों पर है। मुझे भी धीरे-धीरे 5 साल टीवी की पत्रकारिता में पूरे हो रहे हैं। कभी-कभी इन उछल रहे सवालों का जवाब मेरे अंदर भी निगेटिव एनर्जी के तौर पर ही आते हैं। लेकिन, क्या ये सच्चाई है। जब इस सवाल पर दिमाग पर थोड़ा सा जोर डालता हूं तो, लगता है कि ये टेलीविजन पत्रकारिता पर एक ऐसा फैसला सुनाया जा रहा है। जिसकी पूरी सुनवाई भी नहीं हुई और फैसला सुनाने वाले वो लोग है जो, या तो टीवी से दूर-अनजान हैं या फिर वो, जो टीवी के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं।


अब एक बात तो पक्की है कि टीवी और प्रिंट- फिर चाहे वो अखबार हो या पत्रिका- की पत्रकारिता एकदम अलग है। इन दोनों को एक तरह से काम करने की चाहत रखने वाले लोग गलत शुरुआत ही करते हैं। आजादी के आंदोलन या फिर उसके बाद इमर्जेंसी आंदोलन से निकले लोगों में से जो, राजनीतिक जीवन नहीं शुरू करना चाहते थे। उन्हें लगा कि समाज को जागरुक बनाने, आंदोलित रखने का एक बेहतर जरिया पत्रकारिता हो सकती है। वो, आए प्रिंट ही था तो, प्रिंट की ही पत्रकारिता शुरू की और अपने नियम गढ़े। आंदोलन की पृष्ठभूमि से आए लोग थे इसलिए सामाजिक सरोकार उनमें जिंदा था। लेकिन, उसके बाद जब प्रिंट की पत्रकारिता ने पांव पसारना शुरू किया तो, एक और जमात इसमें शामिल हुई जो, अफसर बनने की कोशिश में असफल हो गई या जीवन में कुछ न कर पाने वाले लोग। थोड़ा बहुत लिखना-पढ़ना आता था प्रेस रिलीज समझ लेते थे और प्रेस रिलीज में लिखे नामों के साथ जनसंपर्क बना लेते थे और उस आधार पर कुछ खबरें निकालकर कुछ आगे बढ़ा देते थे।


अखबारों में थोड़े बहुत पैसे मिलते थे और झौआ भर तिलिस्मी सम्मान। तिलिस्मी सम्मान इसलिए कह रहा हूं कि जिले के अफसर-दरोगा या तोड़ा राजनीतिक-सामाजिक चाहत रखने वाले लोग उन्हें-उनके सामने इसलिए सम्मान देते थे। इस सम्मान मिलने-मिलाने में कभी-कबी कुछ ऐसी खबरें होती थीं जो, उनके सम्मान में थोड़ी और बढ़ोतरी कर देती थीं। इस सबके बीच देश में अखबारी पत्रकारों का एक ऐसा समूह बना जो, लोगों का आदर्श बना लेकिन, प्रिंटाई पत्रकारों को मिलने वाली छोटी रकम किसी भी अच्छे घर के-सुविधासंपन्न बच्चे को ये करियर बनाने से रोकती रहती थी। उस पर कुछ आदर्शवादी पत्रकार, पत्रकारिता को मिशन बनाए रखने की वकालत करते कुछ इस तरह का पेश करते रहे कि पत्रकारिता में आने का मतलब रूखी-सूखी खाए के ठंडा पानी पीव- भर ही दिखता रहा।


फिर प्रिंटाई पत्रकारिता को समझने के बीच-बीच में जाने कब टीवी की तिलिस्म आ गया। खांटी प्रिंटाई पत्रकारों को पता ही नहीं चला। पहले-पहल तो, तकनीक से अनजान, कीबोर्ड देखकर घबराने वाले पत्रकारों ने टीवी को एकदम से ही खारिज करने की कोशिश की। लेकिन, टीवी के साथ-साथ बाजार-पैसा भी आया था। उसकी ताकत और नए प्रयोग ने प्रिंटाई पत्रकारों के ही एक बड़े वर्ग में कुछ अलग करने की इच्छा पैदा कर दी। इस अलग करने की इच्छा ने टेलीविजन की अवधारणा को मजबूत करना शुरू कर दिया। ये विधा मजबूत होने लगी। चकाचौंध थी इसलिए नए जमाने के बच्चे जो, कुछ लिखना-पढ़ना चाहते थे। जिनका मन आंदोलन के दौर के प्रिंट के बड़े पत्रकार पर मोहता था। वो, टीवी में आने की इच्छा रखने लगे। उनको लगा पैसा भी है और पत्रकार भी कहलाएंगे।


टीवी चलाने वाले जो लोग थे वो, सबके सब प्रिंट की बेहतर पत्रकारिता करके ही इस नई विधा में हाथ आजमाने आए थे। पैसे ने प्रिंट और टीवी के पत्रकारों के बीच खाई भी बढ़ाई-खुन्नस भी। फिर एक साफ सा फैसला अपने आप तैयार होता गया कि पैसे के लिए पत्रकारिता करनी है तो, टीवी में जाओ। सचमुच की पत्रकारिता करनी है तो, अखबार में काम करो। इसके साथ एक पुछल्ला भी जुड़ा होता है कि प्रिंट की पत्रकारिता में सुकून है। यही सुकून और सचमुच की पत्रकारिता की बात कर ली जाए तो, कुछ मसला समझ में आ जाएगा।


चलिए पहले बात ये कर लेते हैं कि अखबार की पत्रकारिता करने के लिए आपमें क्या काबिलियत होनी चाहिए। खबरों की समझ ये तो, टीवी के लिए भी चाहिए। कंप्यूटर पर लिखना। सीधे-सीधे खबर की तरह- ये अखबार-पत्रिका के लिए जरूरी है। खबर में गलती न जाए- इसके लिए अखबार पूरा मौका देता है दिन भर का- देर रात सारी खबरों को परखकर-समझकर अगले दिन के लिए एक दिन पहले की सारी खबर कुछ इस तरह देना कि लोगों को पूरी खबर समझ में आए। उसे इत्मीनान से पढ़ा जा सकता है इसलिए सब कुछ विस्तार में देना।


अब टीवी की बात करें तो, खबरों की समझ और कंप्यूटर पर लिखना छोड़ दें तो, सबकुछ बदल जाता है। यहां सारा खेल प्रजेंटेशन का हो जाता है। खबरों का प्रजेंटेशन मतलब क्या। मतलब ये कि खबर अधूरी आई या पूरी आई जितनी भी आई उसे दर्शकों को बताना है। सबसे पहले- ये कॉन्सेप्ट और साथ में खबर दिखे ऐसे कि ये न लगे कि कुछ छूटा है। अभी की खबर है इसमें 24 घंटे का समय नहीं है। आराम से सोकर 2 बजे के बाद ऑफिस पहुंचकर टीवी तो, चलने से रहा। यहां 24 घंटे के व्हील पर सबकुछ चलता है। कुछ छोड़ा नहीं जा सकता क्योंकि, जो छोड़ा वही खबर दिखाकर दूसरा चौनल TRP बटोर लेगा।


मैंने दोनों माध्यमों में काम किया है। और, 5-6 साल प्रिंट में काम करने के बाद टीवी देखने समझने की इच्छा हुई। आया और ठीक ठाक ही कर रहा हूं। यहां जो, लोग काम कर रहे हैं वो, अखबार से ज्यादा तकनीकी ज्ञान वाले हैं, खबरों ज्यादा चौकन्ने हो जाते हैं, मशीन के साथ उनका संपर्क, मनुष्य के साथ के संपर्क से ज्यादा हो जाता है। और, इस सबके साथ ढेर सारे तनाव का बोनस मुफ्त में मिलता है। और, इस तनाव की कीमत टीवी चुकाता है ज्यादा पैसे देकर।


ऊबता आदमी हर जगह है। थोड़ा सा पत्रकारिता अंदर घुसी तो, हर जगह ही कुछ दिन बाद बोर करने लगती है। नयापन नहीं दिखता। भले अपनी ओर से नयापन करने का रंचमात्र भी प्रयास न हो। अचानक अखबार की झिकझिक से ऊबे पत्रकार कहते हैं कि यार जब यही झिकझिक झेलनी है तो, चलो टीवी में ही चलते हैं। वहां जाते हैं कुछ तो, ज्यादा तनाव लेकर टीवी से मिले इंसेंटिव (ज्यादा सैलरी) को जस्टिफाई करते रहते हैं। और, कुछ जो इस तनाव को झेल नहीं पाते- टीवी को गरियाते हुए फिर से किसी अखबार में सुकून की नौकरी करने चले जाते हैं। बहुत से सचमुच के काबिल लोग इसलिए टीवी छोड़कर अखबार में जाते हैं कि सचमुच टीवी में सर्फ बहुतअच्छा लिखने-पढ़ने वाले लोगों के लिए ज्यादा जगह नहीं है।


अब बात टीवी के तिलिस्म की। मैं जब टीवी चैनल में काम करने आया तो, लगा कि यार सब जादू है। चंद्रकांता संतति जैसी तिलिस्मी दुनिया लग रही थी। लगा कि गलत फैैसला तो, नहीं ले लिया प्रिंट से टीवी में आने का। जुटे और बमुश्किल 6 महीने लगे होंगे। टीवी की ज्यादातर तिलिस्मी एयारी की काट समझ में आने लगी। टीवी का उस्ताद तो नहीं कह सकता उस्ताद जी लोग तो टीवी चला रहे हैं लेकिन, काम भर का टीवी सीख गया। और, ये भरोसा पक्का हुआ कि अगर टीवी में नहीं आते तो, पत्रकारिता के इस बेहद सश्कत माध्यम से अनजाने रह जाते और छाती फुलाए टीवी को गरियाते रहते कि टीवी की पत्रकारिता कोई पत्रकारिता है।


अब अगर आप जरा दिमाग पर जोर डालकर याद करिए तो, पिछले 5-6 सालों में सरकारों-सत्ता को परेशान करने वाली खबरें टीवी की उसी बाइट से पैदा हुईं जिनके बारे में कहा जाता है खबर तो, पत्रकार खोजकर निकालता है। बाइट मिली तो खबर कहां। लेकिन, सोचिए कि प्रिंट में सूत्रों के हवाले से छपी खबर और टीवी पर किसी की बाइट के साथ टलती खोजी खबर में से कौन खबर ज्यादा प्रभाव पैदा करती है। हां, ये भी सही है कि टीवी में बहुत सी खबरें बाइट न मिल पाने से दब जाती हैं।


अब सवाल ये है कि क्या इसी बिना पर टीवी को पूरी तरह से खारिज किया जाना चाहिए। क्या ये समय नहीं है जब टीवी और प्रिंट के पत्रकार दोनों ही नए जमाने की पत्रकारिता और टीवी के तिलिस्म को बेहतर तरीके से समझें जिससे पत्रकारिता के एक तुरंत समाज पर प्रभाव डालने वाले माध्यम टीवी को मजबूत किया जा सके। मैं भी हो सकता है कि कल को किसी अखबार में काम करता दिखूं लेकिन, वो टीवी के तिलिस्म के टूटने का सबूत नहीं होगा। वो, मेरी सहूलियत-मेरी जरूरत के साथ पत्रकारिता के दोनों माध्यमों टीवी और अखबार के बेहतर तालमेल का सबूत होगा। अमर उजाला देहरादून में काम करते हुए 12-14 घंटे काम करने का जो, अभ्यास लगा और जो, खबरों के रियाज का नुस्खा मिला उसने टीवी में बड़ी मदद की। और, टीवी में खबरों पर तेजी रिएक्ट करना और प्रजेंटेशन बेहतर करने की जो ट्रेनिंग मिली है वो, अखबार में भी फायदा ही करेगी। अभी तो, भारतीय टीवी को बहुत से पड़ाव पार करने हैं इसके तिलिस्म के टूटने की बात जमनी नहीं।