देखिए
कितने तरह के भ्रम टूट रहे हैं। @BJP4India को
रुढिवादी पिछड़ी सोच की पार्टी के तौर पर स्थापित किया गया। राजीव गांधी के
कम्प्यूटर का विरोध उस समय बीजेपी ने किया था, इसे
सबसे पक्के आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा। बीजेपी समय के साथ चलती रही।
मोदी उससे आगे निकल गए। नोटबंदी जैसा फैसला ले लिया। डिजिटल लागू करने के लिए ज़िद
सी कर बैठे हैं। सबकुछ आधुनिक, प्रगतिशील
कर रहे हैं। कांग्रेस कहती रही, मोदी
हमारे किए को आगे बढ़ाकर श्रेय ले रहे हैं। इसी दौरान उत्तर प्रदेश के चुनाव में
बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिल गया। फिर क्या था प्रगतिशीलों को प्रतिगामी होने का
पक्का आधार मिल गया। मायावती ने शुरुआत की और अब प्रगतिशीलों की आख़िरी उम्मीद
अरविन्द केजरीवाल कह रहे हैं कि नया कूड़े में डालो और पुराने को प्रणाम करो। #EVM कूड़े
में डालो और बैलट पेपर पर मतदान कराओ। कांग्रेस भी अरविन्द जी के विचार से
प्रभावित है। देखिए ना कितने तरह के भ्रम टूट रहे हैं।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
Showing posts with label bjp. Show all posts
Showing posts with label bjp. Show all posts
Friday, March 17, 2017
Saturday, February 25, 2017
रज्जू भइया, जोशी,सिंघल के घर में फिर ताकतवर होती भाजपा
चौथे
चरण का मतदान कई तरह से खास रहा है। चौथे चरण में इलाहाबाद जिले में भी मतदान हुआ,
जो पूर्वांचल का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। इलाहाबाद कांग्रेस की पैदाइश वाली
जमीन है और यही वो जमीन है, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक
प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भइया का घर है। इतना ही नहीं, इसी शहर में
विश्व हिंदू परिषद के संस्थापक अशोक सिंघल का घर है और यही वो शहर है जहां से
बीजेपी के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी अकेले ऐसा नेता रहे, जो लगातार 3 बार इस
सीट से सांसद चुने गए। कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी भले ही
लखनऊ की कैंट विधानसभा से चुनाव लड़ रही हों लेकिन, उनका घर भी इलाहाबाद में ही
है। फूलपूर से सांसद और उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष केशव प्रसाद
मौर्य का भी घर यहीं है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी भी इसी शहर
में रहते हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद तिवारी भी इसी शहर में रहते हैं। देश
के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में शामिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय भी यहीं है।
इस जिले का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि चौथे चरण के प्रचार का समय खत्म होते
समय भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपना रोड शो खत्म कर रहे
थे। और उसी समय यूपी के दोनों लड़के (अखिलेश यादव और राहुल गांधी) भी इलाहाबाद में
ही थे। चौथे चरण का प्रचार 21 तारीख को शाम 5 बजे बंद हुआ, उसके एक दिन पहले
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इलाहाबाद में रैली करके जा चुके थे। इलाहाबाद में
सभी दलों की इतनी जोर आजमाइश की वजह बड़ी साफ है। इस जिले में प्रदेश की सबसे
ज्यादा विधानसभा सीटें हैं। अभी भी इलाहाबाद में 12 विधानसभा सीटें हैं और अगर इस
जिले का हिस्सा रहे कौशांबी को जोड़ लिया जाए, तो कुल 15 सीटों का फैसला यहां से
होना है। चौथे चरण में 23 फरवरी को कुल 53 सीटों पर मतदान होना है। इसलिए भी
इलाहाबाद की 12 सीटें अतिमहत्वपूर्ण हो जाती हैं। और सबसे बड़ी बात कि इन सीटों से
निकाल संदेश पूरब की ओर प्रभावी भी होता है।
चौथे
चरण की 53 सीटों की 2012 के परिणाम के लिहाज से बात करें, तो 24 सीटें समाजवादी
पार्टी के खाते में, 15 सीटें बहुजन समाज पार्टी के खाते में, 6 सीटें कांग्रेस के
खाते में, 5 सीटें भाजपा के खाते में और 3 सीटें पीस पार्टी के खाते में गई थीं।
इस लिहाज से सीधे तौर पर सपा-बसपा ही 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां मुख्य
खिलाड़ी रहीं। यहां तक कि सीट के लिहाज से कांग्रेस बीजेपी से आगे रही और पीस
पार्टी भी एकदम नजदीक खड़ी दिखी। इलाहाबाद जिले की बात करें, तो 12 में से 8 सीटें सपा ने जीत
लीं। 1 सीट कांग्रेस के पास है और 3 सीटें बीएसपी के पास। बीजेपी का 2012 में यहां
से खाता भी नहीं खुला। यहां तक बीजेपी की परम्परागत मानी जाने वाली शहर उत्तरी और
दक्षिणी की सीट पर भी उसे हार का स्वाद चखना पड़ा। लेकिन, 2017 में स्थिति बदली
दिख रही है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ की परम्परागत सीट दक्षिणी से
बीजेपी ने बीएसपी से कांग्रेस के रास्ते बीजेपी में आए नंद गोपाल गुप्ता नंदी को
टिकट दिया है। नंदी ने ही 2007 में केशरीनाथ त्रिपाठी को हराया था। नंदी का
मुकाबला सपा विधायक हाजी परवेज अहमद से है। यहां बसपा से माशूक खान और सीपीआई से
आमिर हबीब के होने से बीजेपी की राह आसान दिख रही है। शहर उत्तरी भी 1991 के बाद
बीजेपी की पक्की सीट हो गई थी। लेकिन, 2007 और 12 में कांग्रेस के अनुग्रह नारायण
सिंह ने ये सीट जीत ली। 2012 में बीएसपी के टिकट पर दूसरे स्थान पर रहे हर्षवर्धन
बाजपेयी को बीजेपी ने इस बार प्रत्याशी बनाया है। हर्षवर्धन बाजपेयी का पारिवारिक
वोट और बीजेपी का मत मिलाकर लड़ाई रोचक बना रहा है। हालांकि, कांग्रेस विधायक
अनुग्रह नारायण सिंह की स्थिति यहां काफी मजबूत रहती है। मुकाबला इन्ही दोनों के
बीच रहने वाला है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्रसंघ अध्यक्ष रही ऋचा सिंह को
सपा ने शहर की तीसरी पश्चिमी विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया है। विश्वविद्यालय
की पहली महिला अध्यक्ष होने के नाते ऋचा को छात्रों का जबर्दस्त समर्थन है। ऋचा के
पक्ष में माहौल भी अच्छा है। लेकिन, मुश्किल ये कि ऋचा को शहर उत्तरी के बजाय
पश्चिमी से टिकट दे दिया गया। ज्यादातर छात्र शहर उत्तरी में ही हैं। पश्चिमी सपा
के बाहुबली अतीक अहमद की सीट है। हालांकि, समाजवादी पार्टी ने अतीक को टिकट नहीं
दिया है। लेकिन, चुनाव में सीधे नहीं होने के बावजूद इस सीट पर अतीक का असर देखा
जा सकता है। बसपा ने विधायक पूजा पाल पर फिर से भरोसा जताया है। पूजा पाल के पति
राजू पाल का हत्या के मामले में अतीक और उसके भाई अशरफ पर मुकदमा चल रहा है। भारतीय
जनता पार्टी ने यहां से राष्ट्रीय प्रवक्त सिद्धार्थनाथ सिंह को टिकट दिया है।
सिद्धार्थनाथ अपने नाना लालबहादुर शास्त्री और राष्ट्रीय नेतृत्व के खास होने के
नाम पर मैदान में हैं। यहां मामला त्रिकोणीय है।
इलाहाबाद
में यमुनापार की मेजा विधानसभा में भी मुकाबला रोचक हो गया है। बीजेपी के पूर्व
विधायक उदयभान करवरिया की पत्नी नीलम करवरिया यहां से चुनाव लड़ रही हैं। सपा
विधायक विजमा यादव के पति जवाहर यादव की हत्या के आरोप में करवरिया बंधु जेल में
हैं। 20 साल पुराने मामले के फिर से खुलने और करीब 2 साल से जेल में होने को सत्ता
की प्रताड़ना बताने में नीलम करवरिया कामयाब दिख रही हैं। महिला होने से उन्हें
सहानुभूति भी मिल रही है। मेजा से सपा से रामसेवक सिंह मैदान में हैं और बसपा ने
भूमिहार ब्राह्मण एस के मिश्रा को मैदान में उतारा है। 1967 से 2007 तक मेजा
विधानसभा सुरक्षित थी। 2012 में सामान्य हुई तो सपा से गामा पांडेय विधायक बने
लेकिन, रेवती रमण सिंह ने अपने नजदीकी गामा पांडेय का टिकट कटवा दिया। 2012 में
दूसरे स्थान पर रहे बसपा के आनंद पांडेय भाजपा में आ गए हैं। इसकी वजह से ब्राह्मण
बहुल मेजा विधानसभा में ब्राह्मण बीजेपी के साथ गोलबंद होते दिख रहे हैं। शहर
उत्तरी की ही तरह यमुनापार की बारा सुरक्षित सीट भी सपा-कांग्रेस गठजोड़ में कांग्रेस
के पास गई है। कांग्रेस से यहां से सुरेश कुमार मैदान में हैं। ये सीट भी समाजवादी
पार्टी के पास थी। लेकिन, सपा विधायक डॉक्टर अजय कुमार भाजपा के टिकट पर मैदान में
हैं। बसपा से अशोक गौतम मैदान में हैं। यमुनापार की करछना विधानसभा से दिग्गज सपा
नेता रेवती रमण सिंह के बेटे उज्ज्वल रमण मैदान में है। पिछले चुनाव में उज्ज्वल
रमण बसपा के दीपक पटेल से हार गए थे। इस बार फिर से ये दोनों आमने-सामने हैं। भाजपा
से पीयूष रंजन इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में लगे हैं। यमुनापार की कोरांव सुरक्षित
2012 में बसपा के कब्जे में थी और इस बार बसपा विधायक राजबली जैसल को सीपीएम से
कांग्रेस में गए रामकृपाल कड़ी चुनौती दे रहे हैं। यहां से भाजपा ने राजमणि और सपा
ने रामदेव को टिकट दिया है।
इलाहाबाद
के गंगापार में 5 विधानसभा सीटें हैं। गंगापार की फूलपुर विधानसभा से बीजेपी ने
प्रवीण सिंह पटेल को टिकट दिया है। प्रवीण पटेल पिछले चुनाव में बसपा से लड़े थे
और दूसरे स्थान पर थे। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के विरोध के
बावजूद प्रवीण पटेल ने अमित शाह की अपने विधानसभा में सभा कराई और उसी में बीजेपी
में शामिल हुए। यहां से सपा के सईद अहमद विधायक थे। लेकिन, सपा से मन्सूर आलम और
बसपा से मोहम्मद मसरूर शेख को टिकट मिला है। फूलपूर सीट पर मुसलमान मतदाता काफी
संख्या में है लेकिन, सपा-बसपा दोनों से मुस्लिम प्रत्याशी होने से बीजेपी को
फायदा मिल सकता है।
फाफामऊ
सीट पर सीट पर सबसे ज्यादा मौर्य मतदाता हैं और उसके बाद ब्राह्मण और मुसलमान हैं।
समाजवादी पार्टी ने यहां से विधायक अन्सार अहमद को फिर से उतार दिया है। बसपा के परम्परागत
मतों के साथ मनोज पांडेय ने ब्राह्मण मतों में सेंधमारी की अच्छी कोशिश की है। हालांकि,
इलाहाबाद की हर सीट पर ब्राह्मण और सवर्ण मतदाताओं के बीजेपी के साथ जाने को मनोज
यहां कितना रोक पाएंगे ये बड़ा सवाल है। बीजेपी ने यहां से विक्रमजीत मौर्य को
टिकट दिया है। विक्रमाजीत को मौर्य के साथ सवर्ण मतों के सहारे जीत का भरोसा है। प्रतापपुर
सीट से समाजवादी पार्टी ने विधायक विजमा यादव को फिर से मैदान में उतारा है। यहां
से बसपा ने मुज्तबा सिद्दीकी को टिकट दिया है। भाजपा ने ये सीट अपना दल को दी है। अपना
दल से करन सिंह प्रत्याशी हैं। यहां सभी प्रत्याशी सपा की विजमा यादव से ही
लड़ेंगे। हंडिया सीट भी अपना दल के खाते में गई है। यहां से पूर्व मंत्री राकेशधर
त्रिपाठी की पत्नी प्रमिलाधर त्रिपाठी
चुनाव लड़ रही हैं। राकेशधर पर लोकायुक्त ने भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है। राकेशधर
के परम्परागत मत, सवर्ण और अपना दल के मतों से प्रमिलाधर की स्थिति मजबूत है। सपा
से निधि यादव और बसपा से हकीम लाल यहां मुकाबले में हैं। सोरांव सीट पर अंतिम समय
तक भाजपा और अपना दल में सहमति नहीं बन सकी थी। हालांकि, बाद में ये सीट अपना दल
के खाते में चली गई है। अपना दल से जमुना प्रसाद सरोज लड़ रहे हैं। लेकिन, बीजेपी
से सुरेंद्र चौधरी को भी चुनाव चिन्ह मिल गया है। इसी तरह समाजवादी और कांग्रेस
दोनों के ही प्रत्याशी मैदान में हैं। ऐसे में सोरांव सीट पर बसपा की गीता देवी की
संभावना बेहतर दिखती है। हर पार्टी इलाहाबाद में अच्छे माहौल के भरोसे उत्तर
प्रदेश का पूर्वी दुर्ग जीत लेने की मंशा रखती है। 2012 में पूरी तरह से साफ हो गई
भाजपा के पक्ष में 2017 में कम से कम 5 सीटें आती दिख रही हैं। समाजवादी पार्टी 3
सीटों पर पहले स्थान की लड़ाई में है और कांग्रेस के लिए अपनी एक सीट बचाना बड़ी
चुनाती साबित हो रहा है। 2 सीटों पर बसपा का हाथी सबसे मजबूत दिख रहा है।
Wednesday, July 13, 2016
इलाहाबादी प्रदेश अध्यक्ष की टीम से इलाहाबाद गायब
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष घोषित होने के तीन
महीने से ज्यादा समय के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों का एलान हो
गया। तीन दिन में घोषित होने वाली टीम को बनने में तीन महीने लग गए। आठ अप्रैल को केशव
प्रसाद मौर्या प्रदेश अध्यक्ष बने थे और 12 जुलाई को भाजपा की टीम घोषित हुई है। इलाहाबाद
से प्रदेश अध्यक्ष चुनने के बाद जब इलाहाबाद में राष्ट्रीय कार्यसमिति हुई तो,
संदेश साफ था। कांग्रेस की बुनियाद की जमीन को आधार बनाकर भारतीय जनता पार्टी
उत्तर प्रदेश में अपना 14 साल का वनवास खत्म करना चाह रही है। लेकिन, प्रदेश
अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या की नई टीम से दो बातें साफ हैं। पहली इसमें केशव के
गृह जिले इलाहाबाद को और केशव के नजदीकियों को जगह नहीं मिल सकी है। पूरे इलाहाबाद
मंडल से किसी को भी प्रदेश की टीम में जगह नहीं मिल सकी है। प्रदेश मंत्री बने
अमरपाल मौर्य को छोड़ दें तो, ऐसा नाम खोजना मुश्किल है, जिस पर केशव की छाप हो। मजबूत
नेता की केशव की छवि कमजोर पड़ रही है। दूसरी ये टीम भले कहने को प्रदेश अध्यक्ष की है।
लेकिन, उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का मतलब सुनील बंसल है, ये और मजबूती
से साबित हुआ है। सुनील बंसल उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश
महामंत्री संगठन हैं। सुनील बंसल राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बेहद नजदीकी माने
जाते हैं। विद्यार्थी परिषद के रास्ते भारतीय जनता पार्टी में आए सुनील बंसल की
छाप नई टीम पर साफ दिखती है। जेपीएस राठौर, अशोक कटारिया, संतोष सिंह, कामेश्वर
सिंह, दयाशंकर सिंह, कौशलेंद्र सिंह पटेल विद्यार्थी परिषद से ही भाजपा में आए
हैं। लक्ष्मीकांत बाजपेयी की टीम में प्रवक्ता रहे विजय बहादुर पाठक को महामंत्री
बनाना साफ दिखाता है कि बंसल ने जिसे जहां चाहा, वहां बैठाया। माना जा रहा है कि
पाठक ही मीडिया भी देखेंगे। इस बार बीजेपी की प्रदेश की टीम बड़ी हो गई है। 15
उपाध्यक्ष और मंत्री बनाए गए हैं। साथ ही 8 महामंत्री बनाए गए हैं। प्रदेश
उपाध्यक्ष में राज्यसभा सांसद बने शिवप्रताप शुक्ला का नाम अपेक्षित था। पहले भी
शिवप्रताप शुक्ला उपाध्यक्ष रहे हैं। पार्टी शिवप्रताप को ब्राह्मण चेहरे के तौर
पर आगे बढ़ा रही है। कलराज मिश्र के 75 पार करने के साथ मंत्री पद से हटने की
खबरों के बीच ब्राह्मणों को रिझाने के लिए शिवप्रताप शुक्ला और हालिया बदलाव में
मंत्री बने महेंद्र पांडेय बेहतर विकल्प के तौर पर देखे जा रहे हैं।
नई टीम में बड़े नेताओं के बेटों को पूरा सम्मान दिया गया है। कल्याण सिंह के
बेटे राजवीर सिंह राजू एटा से सांसद हैं और नई समिति में उपाध्यक्ष बने हैं। लालजी
टंडन के बेटे गोपाल टंडन लखनऊ से विधायक हैं और नई समिति में उपाध्यक्ष बन गए हैं।
गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को फिर से महामंत्री बनाया गया है। अब
सवाल ये भी उठता है कि क्या पदाधिकारी को टिकट न देने को बीजेपी लागू कर सकेगी। प्रदेश
अध्यक्ष के दावेदार रहे विधायक धर्मपाल सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। बागपत
से सांसद सतपाल सिंह को भी प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। केंद्र में मंत्री बनने
की आस रखने वाले सतपाल को प्रदेश में पद देकर संभालने की कोशिश है। शामली के विधायक
सुरेश राणा को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाने से साफ है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी
के लिए कैराना जैसे मुद्दे रहेंगे ही रहेंगे। बरेली से विधायक राजेश अग्रवाल को
कोषाध्यक्ष का भी जिम्मा दे दिया गया है। हालांकि, रणनीति के लिहाज से इतने सांसदों
और विधायकों को ही प्रदेश में पद देना बहुत बेहतर तो नहीं कहा जा सकता। भारतीय
जनता पार्टी का नया जातीय समीकरण इस टीम में भी साफ दिखता है। दलित और पिछड़ों को
भरपूर जगह मिली है। कौशांबी के सांसद विनोद सोनकर को उपाध्यक्ष से हटाया गया तो, सैदपुर
सुरक्षित से पूर्व सांसद रहे विद्यासागर सोनकर को वही पद दे दिया गया। इससे भी समझ
में आता है कि पार्टी जातीय संतुलन को लेकर कितनी सजग है। फिलहाल मीडिया टीम और
प्रवक्ताओं का एलान अभी भी बाकी है। टीम के एलान में एक बात जो सबसे ज्यादा खटकती
है कि आखिर पार्टी अगले दस साल बाद प्रदेश में किन नेताओं को अगली कतार में देखना
चाह रही है।
Friday, December 04, 2015
राज्य में नेता की कमी बीजेपी की सबसे बड़ी मुश्किल
ये नरेंद्र मोदी का प्रभाव है या कहें कि उनके प्रभाव का
विरोधियों में डर है कि हर चुनाव के बाद ये चर्चा होने लगती है कि मोदी का प्रभाव
घटा या नहीं। इससे भी आगे बढ़कर विरोधी कहते हैं कि नरेंद्र मोदी की लहर खत्म हो
गई है। और समर्थक कहते हैं कि मोदी लहर जारी है। वैसे तो ये बहस कभी खत्म ही नहीं
हुई। लेकिन, अब ये ताजा बहस शुरू हुई है नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात के
स्थानीय निकाय चुनाव नतीजे आने के बाद। हालांकि, जिस तरह से ठीक स्थानीय निकाय,
जिला पंचायत चुनाव के पहले पटेलों ने आंदोलन शुरू किया था। उससे तो दिल्ली की
मीडिया ने ये निष्कर्ष साफ तौर पर निकाल लिया था कि अब बीजेपी के गुजरात में साफ
होने की शुरुआत हो जाएगी। ऐसा हो नहीं सका। गुजरातियों की पहली पसंद अभी भी बीजेपी
ही है। गुजरात की सभी छे महानगरपालिका में कमल का ही कब्जा है। जिला पंचायतों में
कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया है। इकतीस में से तेईस जिला पंचायतें हाथ की
पकड़ में आ गई हैं। तालुका पंचायतों मे भी कांग्रेस बेहतर स्थिति में रही है। एक
सौ तिरानबे में से एक सौ तेरह हाथ की पकड़ में हैं। लेकिन, बड़े शहरों की तरह नगर
पालिकाओं में भी अभी बीजेपी कांग्रेस से बहुत मजबूत है। छप्पन में से बयालीस सीटों
पर कमल खिला है।
इन आंकड़ों के आधार पर भारतीय जनता पार्टी के समर्थक कह
सकते हैं कि गुजरात में अभी भी उनका कब्जा बरकरार है। तर्क ये भी आ सकता है कि जिला
पंचायत और स्थानीय निकाय के चुनाव विधानसभा या लोकसभा चुनाव के संकेत नहीं दे पाते
हैं। बीजेपी समर्थकों का ये तर्क उत्तर प्रदेश के संदर्भ में तो ठीक हो सकता है। जहां
अभी हुए जिला पंचायत चुनावों में बीजेपी तीसरे नंबर पर रही। लेकिन, गुजरात के
संदर्भ में ये बिल्कुल सही नहीं है। क्योंकि, गुजरात में स्थानीय निकाय, जिला
पंचायत और विधानसभा, लोकसभा के चुनाव नतीजे लगभग एक जैसे ही आते रहे हैं। एक और
महत्वपूर्ण बात ये भी है कि गुजरात में सीधी लड़ाई है। सीधी लड़ाई का मतलब ये कि
भाजपा और कांग्रेस के अलावा कोई तीसरा है ही नहीं। पहले बिंदु पर बात करें, तो नरेंद्र
मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते भारतीय जनता पार्टी राज्य में कभी कोई चुनाव
नहीं हारी है। यानी करीब चौदह सालों तक गुजरात में भारतीय जनता पार्टी को किसी
चुनाव में हार का सामना नहीं करना पड़ा है। इस लिहाज से गुजरात में करीब डेढ़ दशक
में जिला पंचायत चुनावों में हुई हार भारतीय जनता पार्टी की पहली हार है। महानगर
पालिका में 2010 में बीजेपी ने 443 सीटें जीतीं थीं जो, 2015 में घटकर 389 रह गईं।
2010 में कांग्रेस को सिर्फ 100 सीटें मिलीं थीं जो, 2015 में बढ़कर 176 हो गईं। नगर
पालिका की बात करें, तो 2010 में बीजेपी ने 1245 सीटें जीतीं थीं। जो, 2015 में
1199 हो गईं। 2010 में कांग्रेस को सिर्फ 401 सीटें मिलीं थीं। वो बढ़कर 2015 में
674 सीटें हासल कर ले गई। अभी तक फासला बीजेपी के पक्ष में ज्यादा बना हुआ है।
लेकिन, जिला पंचायत में 2010 में बीजेपी ने 547 सीटें जीतीं जो, 2015 में घटकर 367
रह गईं। कांग्रेस दोगुने से ज्यादा पहुंच गई। 2010 में कांग्रेस को सिर्फ 244
सीटें मिलीं थीं जबकि, अभी के चुनाव में कांग्रेस को 596 सीटें मिली हैं। अगर पूरे
स्थानीय निकाय चुनाव के लिहाज से देखें, तो भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच
का फासला लगभग नगण्य है। सिर्फ 2% का अंतर। बीजेपी 48%, कांग्रेस 46%। भारतीय जनता पार्टी
के पक्ष में रह गई ये सिर्फ दो प्रतिशत की बढ़त नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता
पार्टी के लिए कितने खतरनाक संकेत दे रही है। ये समझने की जरूरत है। 2010 में
बीजेपी ने स्थानीय निकाय के चुनाव में 83 प्रतिशत सीटें जीत लीं थी। 323 में से
269 सीटें। 2015 में बीजेपी के हिस्से की 44% सीटें कम हो गईं।
सिर्फ 126 सीटें मिलीं। 2010 में बीजेपी ने जिला पंचायत के चुनाव में 24 जिला
पंचायतों में 547 सीटें जीतीं थीं। 2015 में 31 जिला पंचायतों में कांग्रेस ने 596
सीटें जीत लीं हैं। आठ जिले ऐसे हैं जहां जिला पंचायत चुनाव में बीजेपी का खाता तक
नहीं खुला है। और सबसे बड़ी बात ये कि अहमदाबाद में छत्तीस हजार लोगों ने नोटा का
इस्तेमाल किया है। इसका मतलब ये हुआ कि गुजरात भी विकल्प खोजने लगा है। और इस
विकल्प खोजने में अगर कांग्रेस ने खुद को ताकतवर नहीं बनाया तो, गुजराती किसी और की
तरफ भी 2017 तक देख सकता है। हालांकि, ये भी साफ है कि ये विकल्प हार्दिक पटेल कतई
नहीं है। खुद हार्दिक पटेल के गांव में भाजपा जीती है। और अहमदाबाद में हुए चुनाव
में पटेल बहुल वॉर्डों में भाजपा ने 43 सीटें जीतीं हैं जबकि, कांग्रेस ने सिर्फ 9
सीटें। निष्कर्ष साफ है कि हार्दिक पटेल, पटेलों का नेता नहीं बन पाया। और पटेल
मोटे तौर पर अभी भी बीजेपी के ही साथ हैं।
ये भी निष्कर्ष निकलता है कि मोदी की लहर अभी भी कायम है।
और ये बात सच है कि भारतीय जनता पार्टी के हालात अभी भी अगर बेहतर हैं, तो उसके
पीछे नरेंद्र मोदी का दो दशक से ज्यादा मुख्यमंत्री के तौर पर बेहतर काम है। स्थानीय
निकाय और जिला पंचायत चुनावों को जब तक मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के कामकाज की
समीक्षा माना जा रहा था। तब तक सचमुच बीजेपी के पक्ष से लोग खिसकते दिख रहे थे।
लेकिन, जब राष्ट्रीय मीडिया में ये बहुतायत चलने लगा कि बिहार में मोदी लहर की
समाप्ति के एलान के बाद अब गुजरात से भी मोदी वाली बीजेपी गायब होने जा रही है। समीक्षा
इस बात की भी होने लगी कि संघ की प्रयोगशाला में अब भगवा रंग फीका पड़ने लगा है। इसने
जबर्दस्त बदलाव किया। और भारतीय जनता पार्टी के पक्ष से खिसकते उन गुजरातियों को
वापस खींचा जो, डर रहे थे कि गुजरात की स्थानीय निकाय चुनाव की हार भी केंद्र में
नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे को ध्वस्त करेगी। इस डर ने विकास के एजेंडे पर
पिछले दो दशक से ज्यादा समय से मोदी के साथ खड़े गुजरातियों को एक कर दिया। इसलिए
ये विश्लेषण की गुजरात में जिला पंचायत चुनावों में कांग्रेस की बढ़त मोदी की
कमजोरी के संकेत हैं। ये पूरी तरह से निराधार है। हां, इतना जरूर है कि इस पंचायत,
स्थानीय निकाय चुनाव से बीजेपी और खासकर मोदी-शाह की जोड़ी को बड़ा सबक लेने की
जरूरत है। अगर वो चाहते हैं कि विकास के एजेंडे पर देश 2019 में उनके साथ खड़ा
रहे। बिहार चुनाव नतीजों से ये बात समझाना कठिन था। लेकिन, अब गुजरात से ये बात
मोदी-शाह को आसानी से समझ में आएगी। वो बात ये है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह को
राज्यों में नेतृत्व खोजना होगा। शिवराज सिंह, रमन सिंह और वसुंधरा राजे के ऊपर
चाहे जितने तरह के आरोप लगें। लेकिन, इतना तो तय है कि मजबूत नेता राज्य में होने
से वो खुद ही ऐसी बहुत से हमलों को निष्प्रभावी कर देता है। जो कमजोर नेतृत्व होने
पर सीधे मोदी-शाह को झेलना होता। गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल इस पैमाने
पर बेहद कमजोर नेता साबित हुई हैं। अगर मोदी-शाह का हाथ मजबूती से न हो, तो शायद
ही वो मुख्यमंत्री निवास में अब तक टिक पातीं। गांधीनगर से आने वाली खबरें बताती
हैं कि मुख्यमंत्री राज्य को ठीक से संभाल नहीं पा रही हैं। पाटीदार आंदोलन को
कितने खराब तरीके से नियंत्रित करने की कोशिश की गई। ये पूरे देश ने देखा। इसलिए
जरूरी है कि 2017 के पहले नरेंद्र मोदी और अमित शाह गुजरात के लिए बेहतर सेनापति
खोज लें। अच्छा होगा कि नए साल में नया सेनापति नियुक्त किया जाए। जिससे नए
सेनापति को भी समय मिल सके। यही रणनीति दूसरे चुनाव वाले राज्यों के लिए भी करनी
होगी। अच्छी बात ये है कि असम के लिए भारतीय जनता पार्टी की रणनीति काफी स्पष्ट और
बेहतर दिखती है। बंगाल में काफी कुछ हलचल दिख रही है। और खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष
अमित शाह उस पर नजर रखे हैं। लेकिन, बेहद महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश को लेकर राष्ट्रीय
नेतृत्व भ्रम की स्थिति में ज्यादा दिख रहा है। ये बेहतर है कि अभी के यूपी बीजेपी
के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी अमित शाह के भरोसेमंद ही हैं। और अच्छी बात
ये भी है कि लंबे समय के बाद बीजेपी को उत्तर प्रदेश में लड़ने-भिड़ने वाला
अध्यक्ष मिला है। इसलिए बाजपेयी को एक और कार्यकाल देना बेहतर रणनीति हो सकती है।
लेकिन, लगे हाथ अमित शाह को उत्तर प्रदेश में नए नेताओं की एक पूरी फौज तैयार करनी
होगी। तभी उत्तर प्रदेश की लड़ाई लड़ने में आसानी हो पाएगी। नरेंद्र मोदी की लहर
है और फिलहाल बहुत तेजी से खत्म होती नहीं दिख रही। लेकिन, पहले बिहार विधानसभा और
अब गुजरात स्थानीय निकाय, जिला पंचायत चुनाव ने ये साफ कर दिया है कि मोदी लहर को
राज्यों में मजबूत रखने के लिए राज्यों में मजबूत सेनापति चाहिए। और वो चिंता
दिल्ली से बैठकर नहीं की जा सकती। बाहरी बनाम बिहारी का नारा सबक देने के लिए काफी
है।
Tuesday, February 03, 2015
लोकतंत्र की जीत के लिए!
लोकतंत्र में हार जीत होती रहती है। इसलिए
दिल्ली कौन जीतेगा का जवाब है- कोई भी जीत सकता है। ये भी ठीक है कि सत्ता का नशा
ऐसा होता है कि उसमें अहंकार बढ़ना पक्का है। ये भी ठीक है कि अहंकार बढ़ने से
तानाशाही आ जाती है। इसलिए भाजपा का दिल्ली में चुनाव जीतना ठीक नहीं है। इसलिए
लोकतंत्र बचाने के लिए जरूरी है कि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जीत जाए।
अरविंद के जीत जाने से लोकतंत्र बच जाएगा। ऐसा बताने वाले बुद्धिजीवियों की
बहुतायत है। मैं भी इस विचार से प्रभावित होता हूं। लेकिन, इसी
विचार को जब मैं आगे ले जाता हूं तो मैं ठिठक जाता हूं। तब मुझे समझ आता है कि देश
में बिना वजह की राजनीति चमकाने वाली ताकतें शायद इसी इंतजार में हैं। ये वही
ताकतें हैं जिनके चलते न देश सुधारवादी हो पाया, न
समाजवादी। न सीधे गरीबों के साथ खड़ा होकर उनका पेट भर पाया और न ही अमीरों के साथ
खड़ा होकर उनकी फैक्ट्री, कारोबार को आगे बढ़ा पाया। जिससे
अमीरों के जरिए ही गरीबों का पेट भर पाता। लालू, मुलायम,
मायावती और देश की तमाम क्षेत्रीय पार्टियां इंतजार ही सिर्फ इस बात
का कर रही हैं कि किसी भी तरह अरविंद केजरीवाल दिल्ली में जीत जाए। दरअसल उन्हें अरविंद
की राजनीति से प्रेम नहीं है। उन्हें अरविंद की सफलता भी नहीं पचेगी। बल्कि,
सही मायने में तो ये सारी ताकतें अरविंद की राजनीति की घोर विरोधी
हैं। लेकिन, इस समय उनका महत्व खत्म है। और ये महत्वहीन हुए
हैं नरेंद्र मोदी की लगातार जीत से। ये हारे रहें लेकिन, अगर
नरेंद्र मोदी एक बार हार गया तो ये जीतने की बुनियाद बनाने लगेंगे। ये उत्तर
प्रदेश, बिहार बनाने लगेंगे। और फिर कहेंगे कि लोकतंत्र
की ताकत यही है कि किसी भी दल को कुछ करने का अधिकार न हो। अधिकार हर किसी को
सबकुछ करने का हो। इससे होगा ये कि इन परिवार, पालकों
को सत्ता की चाभी मिली रहेगी। लोकतंत्र के जीवित रहने के बहाने देश के लोगों के
जीवनस्तर बेहतर होने को ही ये दांव पर लगा देना चाहते हैं। इसीलिए दिल्ली में देश
की उन सारी ताकतों को अरविंद केजरीवाल की जीत से ज्यादा नरेंद्र मोदी की हार
चाहिए। ये सारी ताकतें वही हैं जो दस साल की यूपीए सरकार के किसी भी फैसले को
राजनीतिक मोलभाव के आधार पर तोल-मोल के फैसले पर हां या ना करती रहीं। ये वो
राजनीतिक ताकतें हैं जो सिर्फ इस आधार पर राजनीति करती रही हैं कि किसी का विरोध
करना है। इन पार्टियों में से किसी के पास भी कोई एजेंडा नहीं है। इनके पास किसी
खास मसले पर किसी के विरोध का एजेंडा होता है। और यही एजेंडा राजनीतिक ब्लैकमेलिंग
की ताकत देता है। यही एजेंडा देश में भ्रष्टाचार को छिपाने की राजनीति करता है।
यही एजेंडा देश में बेईमानी की बुनियाद और मजबूत करता है। यही एजेंडा देश में
परिवारवाद को समाजवाद या फिर एक जाति के उत्थान से जोड़ देता है। यही एजेंडा देश
की तरक्की को सबसे निचले पायदान पर रख देता है। यही एजेंडा धर्मनिरपेक्ष होने
राजनीतिक वोटबैंक का सबसे बड़ा हथियार बना देता है।
सबसे कमाल की बात ये है कि अरविंद केजरीवाल की
राजनीति शुरू ही इसलिए हुई थी कि भ्रष्टाचार, परिवारवाद को खत्म किया जा सके। एक
एजेंडा था जो अन्ना के पीछे किरन बेदी और अरविंद केजरीवाल को खड़ा करता था। वो
एजेंडा था लोकपाल का। वो एजेंडा था देश से भ्रष्टाचार खत्म करने का। वो एजेंडा था
देश में नई राजनीति की शुरुआत का। वो एजेंडा था परंपरागत राजनीति के नाम पर देश की
जनता को वोटबैंक समझने वालों की राजनीति ध्वस्त करने का। अब दिल्ली की सत्ता के
लिए अरविंद केजरीवाल की जीत की कामना के बहाने उस सारी राजनीति का शीर्षासन करने
की कोशिश हो रही है। कोशिश ये हो रही है कि अरविंद की जीत हो जाए और अरविंद की
राजनीति के सारे पैमाने ध्वस्त हो जाएं। और इस सबके बाद देश के हर कोने से आवाज
आएगी कि नरेंद्र मोदी हार गया। नरेंद्र मोदी हार गया। मतलब देश में जाति, धर्म की
राजनीति ही होगी। विकास की राजनीति कभी नहीं चलेगी। फिर हम कहेंगे कि ये देश ऐसे
ही चलता है। इस देश की राजनीति ही ऐसे चलती है। इसीलिए अरविंद केजरीवाल को दिल्ली
में जिताना, लोकतंत्र को जिताने से जोड़ दिया गया है। इसीलिए मुझे लगता है कि अरविंद ने अपनी पार्टी का नाम ईमानदार आदमी पार्टी नहीं रखा।
Monday, May 19, 2014
ढेर सारी जीतों को पिरोकर नरेंद्र मोदी ने भारत जीता है
नरेंद्र
मोदी की इस जीत ने ढेर सारे प्रतिमान बनाए हैं, ध्वस्त किए हैं। और ये सिर्फ
नरेंद्र मोदी ही कर सकते थे। सब चौंक रहे हैं, चिंहुक रहे हैं। मुझे भी उत्तर
प्रदेश में 50 सीटें और पूरे देश में बीजेपी को 240 सीटों से ज्यादा मिलने का
अंदाजा नहीं था। हालांकि, नरेंद्र मोदी ने जो 18-25 और 25-40 साल के नौजवानों को
जाकर पकड़ा था उसकी व्याख्या मैं पहले से कर रहा था। उसे अच्छे से समझ रहा था।
मुझे पता था कि नरेंद्र मोदी ने 18-25 साल के मौके की तलाश में परेशान नौजवान को
ये सपना दिखा दिया है कि मौका तो अब नरेंद्र मोदी ही उन्हें दे सकते हैं। यानी
अच्छे दिन तो तभी आएंगे जब मोदी सरकार होंगे। और, उससे भी ज्यादा सलीके से
उन्होंने 25-40 वाले नौजवानों को ये समझाया कि यूपीए की सरकार ने जो आपके मौके को
छीन लिया है आपकी जेब में आने वाली रकम में कटौती कर दी है, आपकी तरक्की की रफ्तार
धीमी कर दी है। वो सब मैं ठीक कर दूंगा। कमाल की बात तो ये है कि हिंदु-मुस्लिम की
बात करने वाल इस देश के नेताओं को ये बात तब भी समझ में नहीं आई जब राम मंदिर पर
फैसले के बाद भी देश में कहीं से भी उन्मादी स्वर नहीं दिखाई दिए। मामला ऐसा पलट
गया था कि उसे अपनी तरक्की की चिंता सबसे पहले होने लगी थी। और उस चिंता को बेहद
संतुलित तरीके से नरेंद्र मोदी ने उन्माद में बदल दिया। नरेंद्र मोदी ने मौज मस्ती
के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल करने वाले नौजवानों को उनके अड्डे पर
जाकर सबसे पहले पकड़ा और बताना शुरू किया कि कैसे तुम्हारे मौज मस्ती के दिन
धीरे-धीरे घटते जाएंगे और इसके लिए जिम्मेदारी कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए की
सरकार है।
नरेंद्र
मोदी ने इस उन्माद को किस तरह से वोटों में बदल दिया इसका अंदाजा लगाइए। नरेंद्र
मोदी की भारतीय जनता पार्टी को पूरे देश में सत्रह करोड़ से ज्यादा मत मिले हैं।
ये कुल पड़े मतों के इकतीस प्रतिशत से ज्यादा है। और जिस दिन भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी थी तो मेरे साथ पैनल डिस्कशन में
बैठे कांग्रेस एक प्रवक्ता कह रहे थे कि आप लोग एकदम से मोदी-मोदी करने लगे हैं।
जबकि, कांग्रेस को सीटें भले ही विपक्षी पार्टी का ओहदा पाने लायक भी न मिली हो।
लेकिन, कांग्रेस को 22 प्रतिशत मत मिले हैं और भारतीय जनता पार्टी को करीब 32
प्रतिशत। टीवी की उस बहस तक मतगणना जारी थी। अंतिम परिणाम आने के बाद स्थिति ये
रही कि कांग्रेस को कुल 19 प्रतिशत से ही कुछ ज्यादा मत मिले। इस प्रतिशत को मतों
में बदलें तो ये साढ़े दस करोड़ से ज्यादा होता है। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से
व्यवस्था से भन्नाए नए-पुराने मतदाताओं के उन्माद को मत में बदला है। उससे क्या
हुआ। उसके एक परिणाम के बारे में जरा गंभीरता से सोचिए। अब इस देश में भारतीय जनता
पार्टी और कांग्रेस के अलावा कोई राष्ट्रीय पार्टी नहीं रही। भारतीय जनता पार्टी
इकतीस प्रतिशत मतों के साथ और कांग्रेस उन्नीस प्रतिशत से कुछ ज्यादा मतों के साथ।
इसके ठीक बाद जो पार्टी है वो है बहुजन समाज पार्टी। मायावती वाली पार्टी, जिसके
बारे में कहा जाता था कि कुछ भी हो जाए मोदी की आंधी में हाथी मजे से खड़ा रहेगा।
हुआ क्या। देश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का कोई सांसद लोकसभा में नहीं
है। मायावती की पार्टी को मत भी सिर्फ चार प्रतिशत से कुछ ज्यादा ही मिले हैं।
जबकि, किसी भी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय पार्टी होने के लिए कम से कम छे प्रतिशत
मत और चार सांसद होने चाहिए। इस पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के
अलावा कोई भी राष्ट्रीय पार्टी की दर्जा हासिल नहीं कर सकेंगी। ममता की पार्टी
तृणमूल कांग्रेस (3.8), मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी (3.4), जयललिता की
पार्टी (3.3) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (3.2) को चार प्रतिशत से भी कम मत
मिले हैं।
जिस
भारतीय जनता पार्टी को कहा जाता था कि वो पूरे देश की पार्टी कभी हो ही नहीं सकती।
किसी को शायद ही ये कल्पना हो कि जम्मू कश्मीर की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता
पार्टी है। जम्मू कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी को करीब साढ़े बत्तीस प्रतिशत मत
मिले हैं और ये दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस से दस प्रतिशत ज्यादा हैं। उसे
अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्य में भी छियालीस प्रतिशत से ज्यादा मत मिले हैं। जो
कांग्रेस से पांच प्रतिशत ज्यादा हैं। असम में भी भारतीय जनता पार्टी को सबसे
ज्यादा साढ़े प्रतिशत से भी ज्यादा मत मिले हैं। बिहार की भी सबसे बड़ी पार्टी
भारतीय जनता पार्टी ही है। बीजेपी को करीब साढ़े उन्तीस प्रतिशत मत मिले हैं।
छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी को कुल पड़े मतों का करीब पचास प्रतिशत मत मिला
है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दादरा नगर हवेली, दमन दीव,
गोवा, गुजरात इन राज्यों में भी पचास प्रतिशत से ज्यादा मत भारतीय जनता पार्टी के
हिस्से में चले गए हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें जहां का चमत्कार किसी को समझ में
नहीं आ रहा। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को बयालीस प्रतिशत से ज्यादा मत
मिले हैं। उत्तर प्रदेश में दूसरे नंबर की पार्टी समाजवादी पार्टी को सिर्फ बाइस
और तीसरे नंबर पर मायावती की बसपा को बीस प्रतिशत से भी कम मत मिले हैं। कांग्रेस
का मत प्रतिशत उत्तर प्रदेश में दस प्रतिशत के भी नीचे चला गया है। अब लोगों के
लिए ये रहस्य है कि आखिर बुरी तरह से जातियों में बंटे उत्तर प्रदेश में ये चमत्कार
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने किया कैसे। मेरा विश्लेषण ये कहता है कि
पिछले तीन दशकों से जिस तरह से उत्तर प्रदेश का मान मर्दन राष्ट्रीय राजनीति में
हुआ। उसी यूपी के सबसे बड़े राज्य और बुद्धि के आधार पर अपनी महानता के बोध से
ग्रसित होने का नरेंद्र मोदी ने हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। नरेंद्र मोदी ये
बताने में और अमित शाह अपनी कार्यकुशलता से उसे लागू करने में कामयाब रहे कि उत्तर
प्रदेश जैसा ऊर्जा, बुद्धिमत्ता और ताकत किसी में नहीं है। लेकिन, घटिया नेतृत्व
ने महान उत्तर प्रदेश को बेइज्जत कराया है। और उस पर ये भी कि मुलायम, मायावती
यूपी को नहीं खुद को महान बताने में जुटे रहे। और सोनिया, राहुल गांधी देश में भले
सबसे ताकतवर रहे लेकिन, उत्तर प्रदेश के लोग देश में सबसे कमजोर हो गए। ये बात
नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के लोगों के दिमाग में अच्छे से भर दी। इस कदर कि
उत्तर प्रदेश में यादव परिवार यानी मुलायम सिंह यादव, बहू, भतीजे के अलावा और
गांधी परिवार यानी सोनिया और राहुल गांधी के अलावा या तो भारतीय जनता पार्टी जीती
है और या तो दो सीटें भारतीय जनता पार्टी के साथ वाले अपना दल को। उसमें भी मुलायम
सिंह यादव की बहू डिंपल यादव बीस हजार से भी कम मतों से जीती हैं। जबकि, भारतीय
जनता पार्टी के इकहत्तर में से उनसठ सांसदों की जीत का अंतर एक लाख से ज्यादा मतों
का है। नरेंद्र मोदी ने जो कुछ पूरे देश में किया उसको उत्तर प्रदेश में सलीके से
लागू करने के लिए अमित शाह की भी तारीफ होनी चाहिए कि अमित शाह ने नरेंद्र मोदी के
पैदा किए गुस्से का उन्माद अपने प्रबंधन से मतों में ऐसे बदला कि जातियों में
जकड़ी उत्तर प्रदेश में धर्म और जाति की राजनीति का शीर्षासन हो गया।
Tuesday, April 29, 2014
संत चरित्र या कारोबारी चरित्र
साल 2013 के पहले महीने यानी जनवरी के आखिर में लंबी कसरत के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जब राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर नितिन गडकरी की दोबारा ताजपोशी नहीं होने दी तो, अलग-अलग कयास लगाए गए। कोई लालकृष्ण आडवाणी के अड़ जाने की खबर ला रहा था तो कोई संघ के खुद की छवि को धक्का न लगने की कोशिश को। कुछ पत्रकार ये भी खबर ला रहे थे कि दरअसल नितिन गडकरी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद जिस तरह से दिल्ली दरबार के डी4 को एकदम किनारे कर दिया था वो, बड़ी वजह बना। आज भी नितिन गडकरी पूरे ठसके से ये बात बोलते सुने जा सकते हैं कि पूर्ति के भ्रष्टाचार का मसला सिर्फ उन्हें हटाने के लिए लाया गया था। उसमें कोई सच्चाई नहीं है। हम जैसे सामान्य समझ और इस मामले में कम जानकारी रखने वाले लोगों को ये एक बार सही भी लगता है। क्योंकि, नितिन गडकरी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद कभी पूर्ति की चर्चा न मीडिया ने की, न कांग्रेस ने। तो क्या नितिन गडकरी को भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर गलती की। मेरी निजी राय में बिल्कुल नहीं। मेरी निजी राय यही है कि राजनीति से पहले अगर कोई और प्राथमिक काम किसी का है तो उसे कम से कम किसी पार्टी का राष्ट्रीय या प्रदेश अध्यक्ष भी नहीं बनना चाहिए। ऐसा नहीं है कि नितिन गडकरी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते कुछ बेहतर नहीं किया। नितिन गडकरी ने ढेर सारे बेहतर काम किए। नितिन गडकरी के पहले के 11 अशोक रोड और उसके बाद के 11 अशोक रोड में जाकर कोई भी गडकरी की दूसरी क्षमताओं से प्रभावित हो सकता है। लेकिन, राजनीतिक आंकलन में गडकरी से चूक हुई जो, 2012 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में साफ दिखा। और इसीलिए मुझे हमेशा ये लगता है कि जो संघ विचारधारा से जुड़े चार्टर्ड अकाउंटेंट एस गुरुमूर्ति ने नितिन गडकरी पर पूर्ति विवाद के समय टिप्पणी की थी वो बड़ी महत्वपूर्ण है। गुरुमूर्ति ने ट्वीट किया था कि वो निजी तौर पर मानते हैं कि किसी भी राष्ट्रीय अध्यक्ष को कारोबार में नहीं होना चाहिए। क्योंकि, इससे हमेशा मुश्किलें खड़ी होती रहती हैं। और, छवि पर भी बुरा असर होता है। इसी छवि का बड़ा महत्व है।
अब ताजा मामला है रामदेव का। जब कोई योग गुरु रामदेव कहता है तो मुझे एतराज नहीं होता। लेकिन, जब स्वामी या बाबा रामदेव कहता है तो थोड़ा पचाने में मुश्किल होती है। क्योंकि, भाई रामदेव संत नहीं हैं। इस पर कोई चाहे तो मुझसे बहस कर सकता है। स्वामी रामदव बिना डिग्री के आयुर्वेदिक डॉक्टर हो सकते हैं। अच्छे योग चेतना जगाने वाले प्रभावी पुरुष हो सकते हैं। लेकिन, ये बात रामदेव मानने, समझने को तैयार नहीं हैं। इसीलिए वो फंस जाते हैं। रामदेव जैसे लोग दो चरित्र लेकर चलते हैं। एक चरित्र उनका योग गुरु और उनके लिहाज से स्वामी या बाबा रामदेव वाला है। दूसरा चरित्र कारोबारी रामदेव का है। एक गेरुआ कपड़े पहनता है, जिसमें से उनके बदन का काफी हिस्सा दिखता रहता है। दूसरे का हजारों करोड़ का कारोबार है। एक देश की बात करता रहता है और देश के खिलाफ दिखने वाली सरकार की हर हरकत का विरोध करता है। दूसरा अपने कारोबार के खिलाफ दिखने वाली सरकार की हर हरकत का विरोध करता है। रामदेव का एक चरित्र चुनाव में नरेंद्र मोदी का समर्थन इसलिए करता है कि उसे राष्ट्रवादी व्यक्ति को प्रधानमंत्र बनवाना है। उन्हीं रामदेव का दूसरा चरित्र नरेंद्र मोदी का समर्थन और सोनिया, राहुल गांधी का विरोध इसलिए करता है कि उनके पतंजलि योगपीठ के कारोबार पर प्रतिकूल असर न पड़े। दरअसल असल बात यही है कि जो एस गुरुमूर्ति ने कहा उसे में थोड़ा और आगे ले जाता हूं। मैं निजी तौर पर ये मानता हूं कि प्राथमिक कार्य के रूप में राजनीति, समाज कार्य में आने वाले लोग ही इसमें आगे रहें तो बेहतर। अब उसका उदाहरण ये है कि दुनिया भर में बड़े-बड़े कारोबारी ढेर सारे फाउंडेशन टाइप कुछ खोलकर लोगों की भलाई के लिए काम करते रहते हैं। वजह साफ है कि किसी भी कंपनी, कारोबार को बड़ा करने में ढेर सारे गलत काम करने पड़ते हैं और उन्हीं गलत कामों के अपराधबोध को कम करने के लिए कारोबारी, कंपनी के मालिक, चेयरमैन अपने, पत्नियों के नाम से कुछ पुण्य के काम करते रहते हैं। लेकिन, सोचिए कि बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन हो, नीता अंबानी वाली रिलायंस की फाउंडेशन हो, अजीम प्रेमजी वाली हो या दुनिया की कोई ऐसी कारोबारी संस्था की समाज कार्य करने वाली फाउंडेशन हो वो, अधिकतम कितनी रकम फाउंडेशन पर खर्च करेगी। दरअसल इसे समझने के लिए यही समझिए कि देश की ज्यादातर कंपनियां अपने मुनाफे का दो प्रतिशत भी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलटी (CSR) पर खर्च नहीं कर पाती हैं। इसके लिए बाकायदा कानून बनाने की जरूरत पड़ी है। अब जरा मुझे बताइए न कि कौन सा खांटी नेता है जिसने धर्मशाला बनवाई हो। जिसने गरीब बच्चों को खिलाने-पहनाने का काम दिखाया, बताया हो। क्योंकि, प्राथमिक तौर पर राजनीति करने वाले तो ये काम यानी समाज की बेहतरी के काम खुद ही करते रहते हैं। लेकिन, जो समाज के किसी न किसी हिस्से का हक मारकर खुद को बड़ा बनाते हैं। वो, कारोबारी, कंपनी के मालिक किसी का हक मारने की बददुआ न लगे, इसके लिए ढेर सारे समाजसेवा के काम करने लगते हैं। बताइए न कितने नौकरी करने वालों को आप जानते हैं जो अपनी सैलरी में से समाजसेवा का काम करते दिखते हैं। मुश्किल से मिलेंगे। हां, अगर नौकरी में अनाप-शनाप कमाई हो रही है तो जरूर कुछ समाजसेवी टाइप के वो होते दिखेंगे। पूरा सिद्धांत ही यही है कि कारोबारी, कारोबारी रहेगा तो कारोबार में किए गलत कामों को सही करने के लिए धर्मशाला खुलवाएगा, कुछ समाजसेवा के काम करेगा लेकिन, अगर कोई साधु, नेता कारोबारी होगा तो अपने कारोबार की गलतियों को सही साबित करने के लिए राजनीति, साधु के चोले का इस्तेमाल करेगा।
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय की बाबा रामदेव के बारे में राय की कुछ लाइनें दिखीं। बड़े सलीके से वो सारी बात कह देती हैं। राम बहादुर राय कहते हैं कि ''बाबा रामदेव आर्य समाजी हैं, उन्होंने जो वस्त्र धारण किया है, वह् त्याग-तपस्या का वस्त्र है. बाबा भौतिक रुप से सन्यासी हैं और आध्यात्मिक रुप से कारोबारी. कोई व्यक्ति क्या है, इसका पता उसके आत्म तत्व से चलता है. एक कारोबारी में आत्म तत्व कम होता है . यह बात राम लीला मैदान में दिखाई भी पड़ी. रामदेव ने थोड़े समय के लिए ही सही सन्यास का वस्त्र छोड़ा. और उनका पुनर्जन्म हुआ. एक सन्यासी जब संन्यास का वस्त्र धारण करता है, तो उसका दूसरा जन्म होता है. और उसे उतार कर जब वह् महिला का वस्त्र पहनता है. तो उसका प्रेत जन्म होता है. वह् प्रेत अब किस-किस को नुकसान पहुँचाएगा और समाज का कितना भला करेगा, यह बड़ा प्रश्न है. बाबा ने अपना एक अवसर गन्वाया है और अब वे कोई भी प्रयास करेंगे, गन्वाया हुआ अवसर वापस नहीं आएगा.''
इसके आगे मैं अपनी राय जोड़ूं तो दरअसल बाबा रामदेव को वो गंवाया अवसर इसीलिए वापस नहीं मिलेगा क्योंकि, वो अपना आत्मबल कारोबार के मुनाफे में पूरी तरह से गंवा चुके हैं। उनका आत्मबल शायद अब इस बात से ज्यादा बढ़ता होगा कि उनके पतंजलि योगपीठ में कितने नए मरीज इलाज के लिए आ गए हैं। आत्मबल शायद इससे भी बढ़ता होगा कि हर दिन कितने हजार, लाख, करोड़ रुपये उन्हें पहले से ज्यादा मिल रहे हैं। आत्मबल शायद इससे भी बढ़ता होगा कि पतंजलि योगपीठ और कितना बड़ा ब्रांड बन चुका है। जाहिर है जब मामला ब्रांड या मुनाफे का होता है तो फिर आत्मबल या आत्मतत्व से ज्यादा जरूरत रणनीति की होती है। चमक-दमक की होती है। पैकेजिंग की होती है। और इसी ब्रांडिंग पैकेजिंग को बचाने के लिए वो मजबूत होते दिख रहे नरेंद्र मोदी के पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। ये दूसरा वाला आत्मबल है। लेकिन, चूंकि असल वाला आत्मबल नहीं है तो वो महिलाओं के कपड़े पहनकर सरकार के सामने से भाग खड़े होते हैं। अरे उतना कमजोर आत्मबल वाला तो विश्वविद्यालय की राजनीति करने वाला छात्रनेता भी नहीं होता है। दरोगा, सिपाही की लाठी थाम लेता है। क्योंकि, उसकी कोई दुकान बंद होने का खतरा नहीं होता। रामदेव की तो बहुत बड़ी दुकान बंद होने का उसका मुनाफा घटने, कटने का डर है। और लोग भूल जाते हैं कि जब भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी जैसा मजबूत नेता नहीं था। पार्टी कमजोर होती जा रही थी। लोग कहने लगे थे कि अटल, आडवाणी के बाद बीजेपी खत्म ही समझो तो यही रामदेव थे जो अपनी पार्टी, सेना बनाकर भारत की सत्ता विजय का सपना देखने लगे थे। उस दौरान वो खुद को चाणक्य समझकर चंद्रगुप्त तैयार करने लगे थे। स्वामी रामदेव का यही दोहरा चरित्र है।
योग गुरु रामदेव आगे अपने राजनीतिक परिश्रम को न्यायसंगत बनाने के लिए गुरु वशिष्ठ, वाल्मीकि और उनके राम के साथ खड़े होने की घटना सुनाने लगे हैं। अब जरा ये भी बताते रामदेव जी की वशिष्ठ या वाल्मीकि महाराज को राज्य का भला करने के लिए कितने तरह के उत्पाद बनाने पड़े थे। कितनी योगपीठ बनानी पड़ी थी। कितने हेलीकॉप्टर लेने पड़े थे। कितनी जमीन खरीदनी पड़ी थी। कितने योग शिविर लगाने पड़े थे। रामदेव जी आप योग गुरु हैं। आपने देश में योग चेतना जगाने का अद्भुत काम किया है। उसी पर टिके रहिए। क्योंकि, उस योग चेतना जगाने के एवज में आपने अपना कारोबार खड़ा किया है। आपने जमकर मुनाफा कमाया है। आपने चमकती इमारतें खड़ी की हैं। इसलिए आप राजनीति के चक्कर में वैसे ही पड़िए जैसे कारोबारी पड़ते हैं। संत वाला चरित्र तो आप वैसे ही खो चुके हैं। एक कारोबारी की तरह किसी नेता का समर्थन, विरोध कीजिए और उसी लिहाज से मुनाफे, घाटे के लिए तैयार रहिए।
अब ताजा मामला है रामदेव का। जब कोई योग गुरु रामदेव कहता है तो मुझे एतराज नहीं होता। लेकिन, जब स्वामी या बाबा रामदेव कहता है तो थोड़ा पचाने में मुश्किल होती है। क्योंकि, भाई रामदेव संत नहीं हैं। इस पर कोई चाहे तो मुझसे बहस कर सकता है। स्वामी रामदव बिना डिग्री के आयुर्वेदिक डॉक्टर हो सकते हैं। अच्छे योग चेतना जगाने वाले प्रभावी पुरुष हो सकते हैं। लेकिन, ये बात रामदेव मानने, समझने को तैयार नहीं हैं। इसीलिए वो फंस जाते हैं। रामदेव जैसे लोग दो चरित्र लेकर चलते हैं। एक चरित्र उनका योग गुरु और उनके लिहाज से स्वामी या बाबा रामदेव वाला है। दूसरा चरित्र कारोबारी रामदेव का है। एक गेरुआ कपड़े पहनता है, जिसमें से उनके बदन का काफी हिस्सा दिखता रहता है। दूसरे का हजारों करोड़ का कारोबार है। एक देश की बात करता रहता है और देश के खिलाफ दिखने वाली सरकार की हर हरकत का विरोध करता है। दूसरा अपने कारोबार के खिलाफ दिखने वाली सरकार की हर हरकत का विरोध करता है। रामदेव का एक चरित्र चुनाव में नरेंद्र मोदी का समर्थन इसलिए करता है कि उसे राष्ट्रवादी व्यक्ति को प्रधानमंत्र बनवाना है। उन्हीं रामदेव का दूसरा चरित्र नरेंद्र मोदी का समर्थन और सोनिया, राहुल गांधी का विरोध इसलिए करता है कि उनके पतंजलि योगपीठ के कारोबार पर प्रतिकूल असर न पड़े। दरअसल असल बात यही है कि जो एस गुरुमूर्ति ने कहा उसे में थोड़ा और आगे ले जाता हूं। मैं निजी तौर पर ये मानता हूं कि प्राथमिक कार्य के रूप में राजनीति, समाज कार्य में आने वाले लोग ही इसमें आगे रहें तो बेहतर। अब उसका उदाहरण ये है कि दुनिया भर में बड़े-बड़े कारोबारी ढेर सारे फाउंडेशन टाइप कुछ खोलकर लोगों की भलाई के लिए काम करते रहते हैं। वजह साफ है कि किसी भी कंपनी, कारोबार को बड़ा करने में ढेर सारे गलत काम करने पड़ते हैं और उन्हीं गलत कामों के अपराधबोध को कम करने के लिए कारोबारी, कंपनी के मालिक, चेयरमैन अपने, पत्नियों के नाम से कुछ पुण्य के काम करते रहते हैं। लेकिन, सोचिए कि बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन हो, नीता अंबानी वाली रिलायंस की फाउंडेशन हो, अजीम प्रेमजी वाली हो या दुनिया की कोई ऐसी कारोबारी संस्था की समाज कार्य करने वाली फाउंडेशन हो वो, अधिकतम कितनी रकम फाउंडेशन पर खर्च करेगी। दरअसल इसे समझने के लिए यही समझिए कि देश की ज्यादातर कंपनियां अपने मुनाफे का दो प्रतिशत भी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलटी (CSR) पर खर्च नहीं कर पाती हैं। इसके लिए बाकायदा कानून बनाने की जरूरत पड़ी है। अब जरा मुझे बताइए न कि कौन सा खांटी नेता है जिसने धर्मशाला बनवाई हो। जिसने गरीब बच्चों को खिलाने-पहनाने का काम दिखाया, बताया हो। क्योंकि, प्राथमिक तौर पर राजनीति करने वाले तो ये काम यानी समाज की बेहतरी के काम खुद ही करते रहते हैं। लेकिन, जो समाज के किसी न किसी हिस्से का हक मारकर खुद को बड़ा बनाते हैं। वो, कारोबारी, कंपनी के मालिक किसी का हक मारने की बददुआ न लगे, इसके लिए ढेर सारे समाजसेवा के काम करने लगते हैं। बताइए न कितने नौकरी करने वालों को आप जानते हैं जो अपनी सैलरी में से समाजसेवा का काम करते दिखते हैं। मुश्किल से मिलेंगे। हां, अगर नौकरी में अनाप-शनाप कमाई हो रही है तो जरूर कुछ समाजसेवी टाइप के वो होते दिखेंगे। पूरा सिद्धांत ही यही है कि कारोबारी, कारोबारी रहेगा तो कारोबार में किए गलत कामों को सही करने के लिए धर्मशाला खुलवाएगा, कुछ समाजसेवा के काम करेगा लेकिन, अगर कोई साधु, नेता कारोबारी होगा तो अपने कारोबार की गलतियों को सही साबित करने के लिए राजनीति, साधु के चोले का इस्तेमाल करेगा।
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय की बाबा रामदेव के बारे में राय की कुछ लाइनें दिखीं। बड़े सलीके से वो सारी बात कह देती हैं। राम बहादुर राय कहते हैं कि ''बाबा रामदेव आर्य समाजी हैं, उन्होंने जो वस्त्र धारण किया है, वह् त्याग-तपस्या का वस्त्र है. बाबा भौतिक रुप से सन्यासी हैं और आध्यात्मिक रुप से कारोबारी. कोई व्यक्ति क्या है, इसका पता उसके आत्म तत्व से चलता है. एक कारोबारी में आत्म तत्व कम होता है . यह बात राम लीला मैदान में दिखाई भी पड़ी. रामदेव ने थोड़े समय के लिए ही सही सन्यास का वस्त्र छोड़ा. और उनका पुनर्जन्म हुआ. एक सन्यासी जब संन्यास का वस्त्र धारण करता है, तो उसका दूसरा जन्म होता है. और उसे उतार कर जब वह् महिला का वस्त्र पहनता है. तो उसका प्रेत जन्म होता है. वह् प्रेत अब किस-किस को नुकसान पहुँचाएगा और समाज का कितना भला करेगा, यह बड़ा प्रश्न है. बाबा ने अपना एक अवसर गन्वाया है और अब वे कोई भी प्रयास करेंगे, गन्वाया हुआ अवसर वापस नहीं आएगा.''
इसके आगे मैं अपनी राय जोड़ूं तो दरअसल बाबा रामदेव को वो गंवाया अवसर इसीलिए वापस नहीं मिलेगा क्योंकि, वो अपना आत्मबल कारोबार के मुनाफे में पूरी तरह से गंवा चुके हैं। उनका आत्मबल शायद अब इस बात से ज्यादा बढ़ता होगा कि उनके पतंजलि योगपीठ में कितने नए मरीज इलाज के लिए आ गए हैं। आत्मबल शायद इससे भी बढ़ता होगा कि हर दिन कितने हजार, लाख, करोड़ रुपये उन्हें पहले से ज्यादा मिल रहे हैं। आत्मबल शायद इससे भी बढ़ता होगा कि पतंजलि योगपीठ और कितना बड़ा ब्रांड बन चुका है। जाहिर है जब मामला ब्रांड या मुनाफे का होता है तो फिर आत्मबल या आत्मतत्व से ज्यादा जरूरत रणनीति की होती है। चमक-दमक की होती है। पैकेजिंग की होती है। और इसी ब्रांडिंग पैकेजिंग को बचाने के लिए वो मजबूत होते दिख रहे नरेंद्र मोदी के पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। ये दूसरा वाला आत्मबल है। लेकिन, चूंकि असल वाला आत्मबल नहीं है तो वो महिलाओं के कपड़े पहनकर सरकार के सामने से भाग खड़े होते हैं। अरे उतना कमजोर आत्मबल वाला तो विश्वविद्यालय की राजनीति करने वाला छात्रनेता भी नहीं होता है। दरोगा, सिपाही की लाठी थाम लेता है। क्योंकि, उसकी कोई दुकान बंद होने का खतरा नहीं होता। रामदेव की तो बहुत बड़ी दुकान बंद होने का उसका मुनाफा घटने, कटने का डर है। और लोग भूल जाते हैं कि जब भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी जैसा मजबूत नेता नहीं था। पार्टी कमजोर होती जा रही थी। लोग कहने लगे थे कि अटल, आडवाणी के बाद बीजेपी खत्म ही समझो तो यही रामदेव थे जो अपनी पार्टी, सेना बनाकर भारत की सत्ता विजय का सपना देखने लगे थे। उस दौरान वो खुद को चाणक्य समझकर चंद्रगुप्त तैयार करने लगे थे। स्वामी रामदेव का यही दोहरा चरित्र है।
योग गुरु रामदेव आगे अपने राजनीतिक परिश्रम को न्यायसंगत बनाने के लिए गुरु वशिष्ठ, वाल्मीकि और उनके राम के साथ खड़े होने की घटना सुनाने लगे हैं। अब जरा ये भी बताते रामदेव जी की वशिष्ठ या वाल्मीकि महाराज को राज्य का भला करने के लिए कितने तरह के उत्पाद बनाने पड़े थे। कितनी योगपीठ बनानी पड़ी थी। कितने हेलीकॉप्टर लेने पड़े थे। कितनी जमीन खरीदनी पड़ी थी। कितने योग शिविर लगाने पड़े थे। रामदेव जी आप योग गुरु हैं। आपने देश में योग चेतना जगाने का अद्भुत काम किया है। उसी पर टिके रहिए। क्योंकि, उस योग चेतना जगाने के एवज में आपने अपना कारोबार खड़ा किया है। आपने जमकर मुनाफा कमाया है। आपने चमकती इमारतें खड़ी की हैं। इसलिए आप राजनीति के चक्कर में वैसे ही पड़िए जैसे कारोबारी पड़ते हैं। संत वाला चरित्र तो आप वैसे ही खो चुके हैं। एक कारोबारी की तरह किसी नेता का समर्थन, विरोध कीजिए और उसी लिहाज से मुनाफे, घाटे के लिए तैयार रहिए।
Subscribe to:
Posts (Atom)
जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव
सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...
-
हमारे यहां बेटी-दामाद का पैर छुआ जाता है। और, उसके मुझे दुष्परिणाम ज्यादा दिख रहे थे। मुझे लगा था कि मैं बेहद परंपरागत ब्राह्मण परिवार से ह...
-
उत्तर प्रदेश की जनता को कर्कश आवाज में मुलायम के जंगलराज के खिलाफ चीखकर मायावती ने ठग लिया है। जिन दलितों के दबे होने को लेकर वो सत्ता में आ...
-
आप लोगों में से कितने लोगों के यहां बेटियों का पैर छुआ जाता है। यानी, मां-बाप अपनी बेटी से पैर छुआते नहीं हैं। बल्कि, खुद उनका पैर छूते हैं...


