Showing posts with label लाल कृष्ण आडवाणी. Show all posts
Showing posts with label लाल कृष्ण आडवाणी. Show all posts

Sunday, October 04, 2009

आडवाणी जी, आपके पास एक बड़ा मौका और है

bjp.org
पेजावर मठ के स्वामी के बयान मीडिया की सबसे बड़ी खबर बने हुए हैं। स्वामी जी बीजेपी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी के गुरु हैं और, वो कह रहे हैं कि आडवाणी जी ने उनसे संन्यास लेने की इच्छा व्यक्त की है। लेकिन, उन्होंने मना किया कि भारतीय राजनीति और बीजेपी को उनकी अभी बड़ी जरूरत है। अब लालकृष्ण आडवाणी अपने गुरु का कहा मानते हैं या अपने मन की- ये तो आने वाले दिन में ही पता चलेगा। लेकिन, क्या आडवाणी इतने असहाय-कमजोर और अकेले हो गए हैं कि खुद के राजनीति छोड़ने की बात कहने के लिए भी उन्हें अपने गुरु का सहारा लेना पड़ रहा है।

लगता ये है कि आडवाणी एक ऐसी भ्रमस्थिति के शिकार हो गए हैं जिसमें उनकी महत्वाकांक्षा और उनके मन के बीच का द्वंद न तो, उन्हें कुछ करने दे रहा है लेकिन, शांत भी नहीं बैठने दे रहा है। यही वजह है कि चुनाव हारने के बाद आडवाणी सक्रिय राजनीति से संन्यास की बात करने लगते हैं। नेता विपक्ष का पद छोड़ने की बात भी हुई लेकिन, ये द्वंद ही था कि जब वो, विपक्ष का नेता बने रहने के लिए मान गए तो, उन्होंने बयान दे दिया कि वो, फिर से देश भर की यात्रा करेंगे और भाजपा कार्यकर्ताओं से हार की वजह जानेंगे और भाजपा को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश करेंगे। देश के सबसे सफल रथयात्री की ये यात्रा अगर होती भी है तो, शायद ही राजनीतिक तौर पर इसका कोई महत्व इतिहास दर्ज करेगा।

दरअसल, 2009 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा में इस कदर बवंडर मचा कि पार्टी के टूटने-संघ के नई भाजपा बनाने तक की चर्चा शुरू हो गई और सबके केंद्र बिंदु में लालकृष्ण आडवाणी ही थे। यानी साफ है कि ऐसे कमजोर, असहाय नहीं थे और न हैं जितनी मीडिया और खुद भाजपा के ही एक वर्ग में लगातार चर्चा हो रही है। सच्चाई तो ये है कि भाजपा में भले ही इस बात की चर्चा बल पा गई है कि अब अटल-आडवाणी युग से भाजपा को आगे बढ़ाने के समय आ गया है। लेकिन, उस आगे बढ़ाने में बागडोर थामने वाला कोई नेता है ही नहीं। और, जिनके नाम आ रहे हैं वो, ये चाहते हैं कि आडवाणी उनके सिर पर हाथ रखकर कह दें कि वही उनका असली उत्तराधिकारी है। आडवाणी के भक्त के तौर पर बयान देने वाले और आडवाणी को ही लोकसभा चुनाव की हार का दोषी मानने वाले दोनों ही खेमे दरअसल अभी भी इतना साहस नहीं रख पा रहे हैं कि वो, आडवाणी से इतर भाजपा की कल्पना भी कर लें।

आडवाणी के दो प्रमुख सिपहसालार- सुधींद्र कुलकर्णी और जसंवत सिंह- पार्टी से बाहर जा चुके हैं। तो, एक जमाने में आडवाणी के मुरीद दिग्गज पत्रकार अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा पार्टी में रहकर भी आडवाणी पर लगातार निशाना साध रहे हैं। तो, क्या आडवाणी की अभी और किरकिरी होनी बाकी है। कम से कम अटल बिहारी वाजपेयी की अस्वस्थता ने उनकी किरकिरी होने से तो बचा ही ली है। लेकिन, अटल-आडवाणी युग से आगे निकलने का साहस भाजपा में शून्य है। ये इससे साफ समझ में आता है कि अभी महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के ऑडियो-वीडियो कैसेट जनता से भाजपा के लिए वोट मांगेंगे। अब अटल जी तो, भाजपा के लिए इससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकते हैं। लेकिन, आडवाणी के पास एक बड़ा मौका है जो, इस रथयात्री की अंतिम राजनीतिक यात्रा को शानदार बना सकता है।

दरअसल अभी भी भाजपा कार्यकर्ता पूरे देश में अगर किसी एक नेता के कहने पर कुछ भी करने को तैयार हो सकते हैं तो, वो लालकृष्ण आडवाणी ही हैं। हो सकता है कि अभी इसमें बहस ये हो कि इतना ही होता तो, भाजपा चुनाव जीत गई होती और भाजपा के लौहपुरुष प्रधानमंत्री बन गए होते लेकिन, ये तर्क इसलिए गलत लगता है कि आडवाणी के नेतृत्व वाली भाजपा ने इतना भी खराब प्रदर्शन नहीं किया जितना मीडिया और राजनीति समाज में हल्ला हुआ। 116 सांसद लोकसभा में इतने भी कम नहीं होते। लेकिन, जिस तरह से आडवाणी के राजनीतिक सलाहकारों ने इस चुनाव को आडवाणी के राजनीतिक जीवन की अंतिम लड़ाई जैसा पेश कर दिया था उसमें हारने के बाद आडवाणी हारे हुए योद्धा अपने आप ही साबित हो गए। फिर क्या था जिसे देखो हर किसी ने आडवाणी को सत्ता लोभी तक घोषित कर दिया।

लेकिन, थोड़ा सा पीछे जाकर देखें तो, ये लालकृष्ण आडवाणी ही थे जिन्होंने हवाला कांड में अपना नाम भर आने पर लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था। सोनिया तो, त्याग की मूर्ति बन गई हैं लेकिन, आडवाणी के राजनीतिक जीवन का अंत सत्तालोलुप बने होता दिख रहा है। ये तो सर्वविदित तथ्य है कि उस दौर में संघ के सबसे प्रिय स्वयंसेवक होने के बावजूद आडवाणी ने खुले तौर पर कभी भी अटल बिहारी वाजपेयी को बौना साबित करने की कोशिश कहीं नहीं की। सर्वमान्यता की वजह से भले वाजपेयी स्वयंसेवक प्रधानमंत्री बन गए लेकिन, सच्चाई यही है कि पूरे देश का भाजपा कार्यकर्ता आडवाणी को ही नेता मानता-जानता था।

अब आडवाणी के पास एक बड़ा मौका है। लेकिन, इसके लिए आडवाणी को अपना मन बड़ा करना होगा। और, अपने मन से निकली देश भर के भाजपा कार्यकर्ताओं से बात की इच्छा को अमली जामा पहनाने की रणनीति बदलनी होगी। रणनीति बस इतनी कि इस यात्रा की शुरुआत से पहले उन्हें चुप्पी तोड़नी होगी। उन्हें खुद बोलना होगा। अपने गुरु, अपने सलाहकारों के मुंह से अपनी मंशा व्यक्त करने के बजाए पुराने लौह पुरुष को सामने आना होगा। लेकिन, राजनीति के इस प्रयोगधर्मी नेता को एक और प्रयोग करना होगा। आडवाणी का राजनीति से संन्यास लेकर राजनीति की नई परिभाषा गढ़नी होगी। अब समय ये है कि आडवाणी भाजपा के अभिभावक बनें लेकिन, ऐसा अभिभावक जो, बिना किसी इच्छा के अपने बच्चों को उनके लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता। लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति की ऐसी शख्सियत नहीं हैं कि गुमनामी में राजनीतिक पारी का अंत हो जाए। आडवाणी जी एक नया प्रयोग आपका इंतजार कर रहा है ये बड़ा मौका है आप बोलकर तो देखिए देश आपको अभी भी सुनने को तैयार है। आपके गुरु जी की ये बात एकदम सही है कि भारतीय राजनीति और भाजपा को आपकी अभी बहुत जरूरत है। लेकिन, थोड़ा बदले रोल में ...

Saturday, April 18, 2009

आडवाणी को बढ़ती मायावती का सहारा

राष्ट्रीय राजनीति में मायावती की बड़ा बनने की इच्छा बीजेपी के खूब काम आ रही है। ये नजर नहीं आता क्योंकि, देश की सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में उन्होंने कमाल के फॉर्मूले से बीजेपी का ही कचूमर निकाल दिया है। और, सांप्रदायिक बीजेपी को गाली देने का वो कोई मौका छोड़ती नहीं हैं। लेकिन, दरअसल ये मायावती देश भर में हाथी दौड़ाने की जो कोशिश कर रही हैं उसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल रहा है और उसके साइड इफेक्ट कांग्रेस पर पड़ते दिख रहे हैं।


मायावती किस तरह से बीजेपी के काम आ रही हैं- इसकी बानगी देखिए। इलाहाबाद में अभी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार लालकृष्ण आडवाणी की रैली हुई। केपी कॉलेज मैदान में हुई इस रैली में अच्छी भीड़ उमड़ी। इलाहाबाद में हुई आडवाणी की सफल रैली के कई राष्ट्रीय संकेत साफ दिखते हैं। ये वो इलाहाबाद है जहां से एक जमाने में बीजेपी की तीन धरोहरों –अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर- में से एक मुरली मनोहर जोशी तीन बार लगातार चुनाव जीते लेकिन, पिछला चुनाव हारे तो, गंगा के किनारे-किनारे इलाहाबाद से बनारस पहुंच गए।


जोशी के सीट छोड़ने के बाद इलाहाबाद से बीजेपी को उस कद से काफी नीचे के कद का उम्मीदवार भी नहीं मिल पा रहा था। इलाहाबाद और फूलपूर सीट के परिसीमन ने बीजेपी का गणित और बिगाड़ दिया। शहर उत्तरी जैसी बीजेपी के कैडर वोटरों वाली विधानसभा फूलपुर में जुड़ गई है। बीजेपी ने फूलपुर और
इलाहाबाद दोनों ही सीटों से अपरिचित से चेहरे करन सिंह पटेल और योगेश शुक्ला को टिकट दे दिया। प्रत्याशियों में खास दमखम न होने के बावजूद इलाहाबाद में आडवाणी की शानदार रैली ये संकेत देती है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में थोड़ा बहुत ही सही लेकिन, फिर जिंदा हो रही है।


ऐसा नहीं है कि इसके लिए बीजेपी नेतृत्व ने बहुत मेहनत की हो या फिर कार्यकर्ता अचानक फिर से बीजेपी का झंडा-बैनर लेकर खड़े हो गए हैं। दरअसल, ये सब हुआ है मायावती के एक फैसले – वरुण गांधी पर NSA यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने – से। समाजवादी पार्टी का ये आरोप भले ही राजनीतिक लगता हो लेकिन, काफी हद तक सही है कि मायावती सरकार की ये सिफारिश मुस्लिम वोटों को बीएसपी के पक्ष में और हिंदु वोटों को बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकरण के लिए काफी है।


जाने-अनजाने ही सही मायावती ने बीजेपी को थोड़ी ऑक्सीजन दे ही दी है। लेकिन, इतना भर ही नहीं है। ज्यादातर सर्वे और ओपीनियन पोल भले ही अभी यूपीए को एनडीए पर बढ़त दिखा रहे हैं। लेकिन, ज्यादातर में मायावती को बड़ी ताकत तो बनते दिखाया जा रहा है। इस बात पर कम ही ध्यान जा रहा है कि बड़ी होती मायावती किसको छोटा कर रही हैं। मायावती सिर्फ उत्तर प्रदेश में सत्ता में हैं लेकिन, देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियों – कांग्रेस और भाजपा – से कहीं ज्यादा करीब 500 सीटों पर हाथी चुनाव चिन्ह पर
प्रत्याशी खड़े कर रही हैं।


दरअसल बड़ी होती मायावती ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बुरी तरह से भले ही पटखनी दी हो लेकिन, देश के दूसरे राज्यों में वो बीजेपी के लिए सत्ता का रास्ता आसान कर रही हैं। हाल में हुए विधानसभा चुनावों में बहनजी की बहुजन समाज पार्टी ने कई राज्यों में कांग्रेस के वोट बैंक की चुपके से सफाई कर दी।


गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ सीधे-सीधे सत्ता मिल गई। गुजरात में सत्ता में रहे मोदी ने विकास कार्यों के साथ हिंदुत्व के एजेंडे की अच्छी पैकेजिंग करके चुनाव जीत लिया। और, हिमाचल प्रदेश में कांग्रेसी सत्ता के कुशासन की वजह से देवभूमि की जनता ने दुबारा वीरभद्र पर भरोसा करना ठीक नहीं समझा। और, उन्हें पहाड़ की चोटी से उठाकर नीचे पटक दिया।


दोनों राज्यों में चुनाव परिणामों की ये तो सीधी और बड़ी वजहें थीं। लेकिन, एक दूसरी वजह भी थी जो, दायें-बायें से भाजपा के पक्ष में और कांग्रेस के खिलाफ काम कर गई। वो, वजह थी मायावती का राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडा। उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई मायावती को लगा कि जब वो राष्ट्रीय पार्टियों के आजमाए गणित से देश के सबसे बड़े राज्य में सत्ता में आ सकती हैं। तो, दूसरे राज्यों में इसका कुछ असर तो होगा ही। मायावती की सोच सही भी थी।


मायावती की बसपा ने पहली बार हिमाचल प्रदेश में अपना खाता खोला है। बसपा को सीट भले ही एक ही मिली हो। लेकिन, राज्य में उसे 7.3 प्रतिशत वोट मिले हैं जबकि, 2003 में उसे सिर्फ 0.7 प्रतिशत ही वोट मिले थे। यानी पिछले चुनाव से दस गुना से भी ज्यादा मतदाता बसपा के पक्ष में चले गए हैं। और,
बसपा के वोटों में दस गुना से भी ज्यादा वोटों की बढ़त की वजह से भी भाजपा 41 सीटों और 43.8 प्रतिशत वोटों के साथ कांग्रेस से बहुत आगे निकल गई है। कांग्रेस को 38.9 प्रतिशत वोटों के साथ सिर्फ 23 सीटें ही मिली हैं। बसपा को मिले ज्यादातर वोट अब तक कांग्रेसी नेताओं के ही थैले में थे।


गुजरात में भाजपा की जीत इतनी बड़ी थी कि उसमें मायावती की पार्टी को मिले वोट बहुत मायने नहीं रखते। लेकिन, मायावती को जो वोट मिले हैं वो, आगे की राजनीति की राह दिखा रहे हैं। गुजरात की अठारह विधानसभा ऐसी थीं जिसमें भाजपा प्रत्याशी की जीत का अंतर चार हजार से कम था। इसमें से पांच
विधानसभा ऐसी हैं जिसमें बसपा को मिले वोट अगर कांग्रेस के पास होते तो,वो जीत सकती थी। जबकि, चार और सीटों पर उसने कांग्रेस के वोटबैंक में अच्छी सेंध लगाई।


मामला सिर्फ इतना ही नहीं है। मायावती की महाराष्ट्र पर भी कड़ी नजर है। वो, सबसे पहले मुंबई में पैठ जमाना चाहती हैं। क्योंकि, उन्हें पता है कि यहां से पूरे राज्य में संदेश जाता है। मायावती जानती हैं कि उत्तर प्रदेश के लोगों को उनके जादू का सबसे ज्यादा अंदाजा है। इसलिए वो उत्तर प्रदेश से आए करीब 25 लाख लोगों को सबसे पहले पकड़ना चाहती हैं। यही वो वोटबैंक है जिसने पिछले चुनाव में शिवसेना-भाजपा से किनारा करके कांग्रेस-एनसीपी को सत्ता में ला दिया। मुंबई में हिंदी भाषी जनता करीब 20 विधानसभा सीटों पर किसी को भी जितान-हराने की स्थिति में है। जाति के लिहाज से ब्राह्मण-दलित-मल्लाह-पासी-वाल्मीकि और मुस्लिम मायावती को आसानी से पकड़ में आते दिख रहे हैं।


अब अगर मायावती का ये फॉर्मूला काम करता है तो, रामदास अठावले की RPI गायब हो जाएगी। और, सबसे बड़ी मुश्किल में फंसेगा कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन। कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में कांग्रेस के साथ बड़ी संख्या में हिंदी भाषी हैं साथ ही दलित-मुसलमानों का भी एक बड़ा तबका कांग्रेस से जुड़ा हुआ है। दलितों की 11 प्रतिशत आबादी मायावती की राह आसान कर रही है।


किसी भी सर्वे या ओपीनियन पोल में देखें तो, पिछले लोकसभा चुनाव में 11 सीटें पाने वाली बीजेपी को 15-20 के बीच में सीटें मिल रही हैं। और, बहनजी की बसपा को 29-39 सीटों के बीच में। अब अगर बीजेपी और बीएसपी उत्तर प्रदेश में कुल मिलाकर 50-55 सीटों तक पहुंच जाते हैं तो, यही समीकरण
केंद्र में बीजेपी-बीएसपी गठजोड़ को भी मजबूत आधार देगा। क्योंकि, जाने-अनजाने बीजेपी के कैडर का बड़ा हिस्सा इस समय जाति-कमजोर बीजेपी-मुलायम विरोध या फिर किसी और आधार पर बीएसपी का झंडा उठाए घूम रहा है।


इसमें मुश्किल सिर्फ इतनी ही है कि लालकृष्ण आडवाणी को ये चुनाव अपनी राजनीतिक पारी का अंत दिख रहा है। और, प्रधानमंत्री बनने का ये मौका वो किसी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहेंगे। अब अगर देश भर में बीजेपी, पुराने सहयोगियों (NDA) के साथ मजबूती से रही और, जयललिता जैसे कुछ डांवाडोल पुराने सहयोगियों को पटाती दिखी तो, बहनजी भी उप प्रधानमंत्री की कुर्सी लेकर आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने में मदद कर सकती हैं। लेकिन, अगर बीजेपी और एनडीए थोड़ा कमजोर रहा तो, कांग्रेस को सत्ता से रोकने के लिए बीजेपी और संघ परिवार देश को पहली दलित प्रधानमंत्री देने में अपने योगदान को दर्ज कराने में नहीं चूकेगा।

Thursday, December 13, 2007

लाल कृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने का मतलब

भाजपा ने आखिरकार लाल कृष्ण आडवाणी को अपना नेता घोषित कर ही दिया। लोकसभा चुनाव हारने के बाद और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तबियत खराब होने के बाद ही ये ऐलान हो जाना चाहे था। लेकिन, कुछ पार्टी की आतंरिक खराब हालत और कुछ अटल बिहारी वाजपेयी की आजीवन भाजपा का सबसे बड़ा नेता बने रहने की चाहत। इन दोनों बातों ने मिलकर आडवाणी की ताजपोशी पर बार-बार ब्रेक लगाया। उस पर जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताने वाले आडवाणी के बयान की वजह से संघ के बड़े नेताओं की नाराजगी कुछ बची रह गई थी।

फिर जरूरत (वजह) क्या थी बिना किसी मौके के आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की। अभी लोकसभा के चुनाव तो हो नहीं रहे थे। गुजरात के चुनाव चल रहे हैं और गुजरात में जिस तरह से मोदी की माया में ही पूरे राज्य में बीजेपी का चुनाव प्रचार चल रहा है। सहज ही लाल कृष्ण आडवाणी की उम्मीदवारी मोदी के बढ़ते प्रभाव से जुड़ जाता है। और राष्ट्रीय मीडिया ने इसे बड़ी ही आसानी से जोड़ दिया कि मोदी केंद्र की राजनीति में प्रभावी न हो पाएं इसके लिए गुजरात चुनाव के परिणाम आने से पहले ही आडवाणी की उम्मीदवार पक्की कर दी गई। लेकिन, अगर आडवाणी की उम्मीदवारी के ऐलान के समय पार्टी कार्यालय के दृश्य याद करें तो, आसानी से समझ में आ जाता है कि मोदी कहीं से भी नंबर एक की कुर्सी के लिए आडवाणी को चुनौती देने की हालत में नहीं थे।

दरअसल लाल कृष्ण आडवाणी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पक्की करने के पीछे असली खेल भाजपा में नंबर दो की लड़ाई में भिड़े नेताओं ने किया। मुस्कुराते हुए राजनाथ सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी का पत्र पढ़कर सुनाया। जसवंत सिंह हमेशा की ही तरह आडवाणी के पीछे खड़े थे। अरुण जेटली काले डिजाइनर कुर्ते में चमकते चेहरे के साथ नजर आ रहे थे। लेकिन, इस पूरे आयोजन में सबसे असहज और खुद को सहज बनाने की कोशिश में दिख रहे थे मुरली मनोहर जोशी। राजनाथ के ऐलान के बाद जोशी ने आडवाणी को मिठाई खिलाई, गुलदस्ता भी दिया।

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को भीतर से जानने वाले ये अच्छी तरह जानते हैं कि नंबर दो की कुर्सी को छूने भर के लिए मुरली मनोहर जोशी ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। भाजपा में एक चर्चित किस्से से आडवाणी-जोशी के बीच चल रहे शीत युद्ध को आसानी से समझा जा सकता है। किस्सा कुछ यूं है कि एक बार जोशी के संसदीय क्षेत्र इलाहाबाद से कुछ नाराज लोग आडवाणी के पास मुरली मनोहर की शिकायत करने पहुंचे तो, आडवाणी ने उन्हें जवाब दिया कि इलाहाबाद भाजपा के नक्शे में शामिल नहीं है। ये बात कितनी सही है ये तो पता नहीं। लेकिन, दोनों नेताओं के बीच रस्साकशी लगातार चलती रही थी। आडवाणी स्वाभाविक तौर पर अटल बिहारी के बाद कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्य नेता थे तो, प्रोफेसर राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया के सर संघचालक रहते जोशी ने संघ के दबाव में नंबर दो का दावा बार-बार पेश करने की कोशिश की।

जोशी जब अध्यक्ष बने तो, उसके बाद के चुनावों में एक पोस्टर पूरे देश भर में भाजपा के केंद्रीय कार्यालय से छपा हुआ पहुंचा था। इसमें बीच में अटल बिहारी की थोड़ी बड़ी फोटो के अगल-बगल जोशी और आडवाणी की एक बराबर की फोटो लगी थी और नारा भारत मां की तीन धरोहर, अटल-आडवाणी-मुरली मनोहर। अब तो ये नारा भाजपा कार्यकर्ताओं को याद भी नहीं होगा।

खैर, आडवाणी ने पूरे देश में अपने तैयार किए कार्यकर्ताओं का ऐसा जाल बिछाया कि दूसरे सभी नेता गायब से हो गए। उत्तर प्रदेश से लेकर कर्नाटक तक सिर्फ आडवाणी के कार्यकर्ता ही पार्टी में अच्छे नेता के तौर पर स्वीकार्य दिखने लगे। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह, दिल्ली में मदन लाल खुराना, विजय गोयल, वी के मल्होत्रा, बिहार में सुशील मोदी, मध्य प्रदेश में सुंदर लाल पटवा, राजस्थान में भैरो सिंह शेखावत, महाराष्ट्र में प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे, उत्तरांचल में भगत सिंह कोश्यारी, कर्नाटक में अनंत कुमार, गुजरात में केशूभाई पटेल, कांशीराम रांणा और नरेंद्र मोदी के अलावा राष्ट्रीय राजनीति में गोविंदाचार्य, उमा भारती, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज ऐसे नेता थे जो, देश भर में भाजपा की पहचान थे। और, इन सभी नेताओं की निष्ठा कमोबेश आडवाणी के प्रति ही मानी जाती थी।

कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं की तनी लंबी फौज होने के बाद आडवाणी कभी भी ‘मास अपील’ (इस अपील ने भी भारतीय राजनीति में बहुत भला-बुरा किया है) का नेता बनने में वाजपेयी को पीछे नहीं छोड़ पाए। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरने के बाद आडवाणी का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर गया। लेकिन, इसके साथ ही देश में हिंदूत्व के उभार के साथ एक आक्रामक तेवर वाले नेताओं की भी फौज खड़ी हो गई। साथ ही आडवाणी के ही खेमे के नेताओं में आपस में ठन गई। बीच बचाव करते-करते माहौल बिगड़ चुका था।

उत्तर प्रदेश में भाजपा के सबसे जनाधार वाले नेता कल्याण सिंह ने पार्टी से किनारा कर लिया। गोविंदाचार्य को अध्ययन अवकाश पर जाना पड़ा। मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह से दस साल बाद सत्ता छीनने वाली तेज तर्रार नेता उमा भारती मुख्यमंत्री तो बनीं लेकिन, जल्द ही उनके तेवर पार्टी के लिए मुसीबत बन गए। मदन लाल खुराना आडवाणी को ही पार्टी में होने वाले सारे गलत कामों के लिए दोषी ठहराने लगे। प्रमोद महाजन का दुखद निधन हो गया जो, भाजपा के साथ देश की राजनीति के लिए भी एक बड़ा झटका था। साहिब सिंह वर्मा का सड़क हादसे में निधन हो गया। इस बीच ही आडवाणी को मोहम्मद अली जिन्ना धर्मनिरपेक्ष नजर आने लगे। और, आडवाणी संघ सहित भाजपा के नेताओं-कार्यकर्ताओं के भी निशाने पर आ गए।

राजनाथ सिंह की भाजपा अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के बाद आडवाणी ने खुद को पार्टी की सक्रिय भूमिका से अलग कर लिया। और, सच्चाई ये थी कि उनके अपने खड़े किए नेता अब प्रदेशों में या फिर देश की राजनीति में अब उनके साथ थे ही नहीं। राजनाथ सिंह की अध्यक्षी में उत्तरांचल और पंजाब में भाजपा सत्ता में आई लेकिन, उत्तर प्रदेश में मिली जबरदस्त पटखनी ने पूरे देश में भाजपा का माहौल खराब कर दिया। संघ, विश्व हिंदू परिषद की नाराजगी ने रहा सहा काम भी बिगाड़ दिया।

कुल मिलाकर भारतीय जनता पार्टी जो, खुद को एक परिवार की तरह पेश करती है। एक ऐसा परिवार बनकर रह गई जिसमें घर का हर सदस्य अपने हिसाब से चलना चाह रहा था और घर के मुखिया, दूसरे सदस्यों को कुछ भी कहने-सुनने लायक नहीं बचे थे। संघ के बड़े नेता मोहन भागवत फिर से इस कोशिश में जुट गए कि किसी तरह भाजपा को उसका खोया आधार वापस मिल सके। भोपाल में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ही आडवाणी को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना था लेकिन, अटल बिहारी बीच में ही बोल पड़े कि वो फिर लौट रहे हैं।

आडवाणी भी ये नहीं चाहते थे कि आज की तारीख में देश के सबसे स्वीकार्य नेता की असहमति के साथ वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनें। सारी मुहिम फिर स शुरू हुई। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में जिस तरह से भाजपा का संगठन जिस तेजी से खत्म हुआ है उसमें ये जरूरत महसूस होने लगी कि पार्टी को किसी एक नेता के पीछे चलना ही होगा। गुजरात में मोदी ने जिस तरह से संगठन के तंत्र को तहस-नहस किया है। और, अपना खुद का तंत्र बनाकर केशूभाई पटेल, कांशीराम रांणा, सुरेश मेहता और दूसरे भाजपा के दिग्गज नेताओं को दरकिनार किया है। उससे भी पार्टी और संघ को आडवाणी को नेता बनाने की जरूरत महसूस हुई।

संघ ने आडवाणी की उम्मीदवारी पक्की करने से पहले आडवाणी को मुरली मनोहर जोशी और राजनाथ सिंह को साथ लेकर चलने का पक्का वादा ले लिया। गुजरात में मोदी के प्रकोप से डरे भाजपा के दूसरी पांत के नेता भी आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का निर्विवाद उम्मीदवार मानने के लिए राजी हो गए। नरेंद्र मोदी तो कभी भी इस हालत में नहीं रहे कि दिल्ली की राजनीति में वो आडवाणी के कद के आसपास भी फटकते। वैसे भी गुजरात के बाहर मोदी का साढ़े पांच करोड़ गुजरातियों का फॉर्मूला तो काम करने से रहा। लेकिन, आडवाणी के लिए राह बहुत मुश्किल है। गोविंदाचार्य और उमा भारती जैसे कार्यकर्ताओं के प्रिय नेता पार्टी में आने जरूरी हैं। कल्याण सिंह में अब वो तेवर नहीं बचा है। उत्तर प्रदेश में दूसरा कोई ऐसा नेता बन नहीं पाया है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ तालमेल बिठाना मुंडे के लिए मुश्किल हो रहा है। और, अब शायद ही आडवाणी में इतनी ताकत बची होगी कि वो फिर से सफल रथयात्री बन सकें जो, अपनी मंजिल तक पहुंच सके। लेकिन, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अजब-गजब बयान से इतना तो साफ है कि भाजपा का तीर निशाने पर लगा है।

Wednesday, December 12, 2007

विनोद दुआ की समस्या क्या है?

विनोद दुआ वरिष्ठतम और देश के सबसे काबिल पत्रकारों में से हैं। उस पीढ़ी के पत्रकार हैं जब टीवी ठीक से पैदा भी नहीं हुआ था। नए दौर का टेलीविजन न्यूज आया तो, विनोद दुआ स्टार और उसके बाद फिर एनडीटीवी पर अच्छे और अलग तरीके के शो लेकर आए। उनके शो में कुछ हटकर होता है। और, नए लोगों के लिए बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इधर, एनडीटीवी पर उनका खबरदार एक ऐसा शो है जो, लोगों को खबरें देने के साथ बहुत कुछ सीखने-समझने वाला शो है।

लेकिन, हाल के दिनों में खबरदार और चुनाव के दौरान गुजरात की यात्रा में विनोद दुआ कुछ ऐसा बर्ताव करते नजर आए। जो, खास तौर पर एक ऐसे पत्रकार, जिसको देख-सुनकर एक पूरी पत्रकार पीढ़ी जवान हुई हो, से उम्मीद नहीं की जाती। गुजरात में नरेंद्र मोदी के कारनामों की कलई खोलना और उसके पक्ष में तर्क रखना एक निष्पक्ष पत्रकारिता का तकाजा है। जरूरी है कि मोदी जैसे लोगों के खिलाफ मुहिम चलाई जाए। लेकिन, विनोद दुआ जैसे वरिष्ठ पत्रकार का ये सवाल कि आप मोदी को वोट देंगे या अच्छे आदमी को। जिससे दुआ साहब ने सवाल पूछा- उसका जवाब था मोदी ने विकास किया है, अच्छा आदमी है। फिर दुआ साहब का सवाल था- मोदी के आदमी को वोट देंगे या अच्छे आदमी को। अब ये तर्क का विषय हो सकता है लेकिन, मेरा सवाल ये है कि क्या बीजेपी से लड़ने वाला एक भी प्रत्याशी अच्छा नहीं हो सकता।

मैं भी अभी गुजरात से ही लौटकर आया हूं। नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ाई लड़ते-लड़ते विनोद दुआ जैसे बड़े पत्रकारों ने ऐसा हाल कर दिया है कि गुजरात के लोग मानने लगे हैं कि नेशनल मीडिया गुजरात को बदनाम करने की कोशिश में लगा हुआ है। कोई एक पूरा राज्य अगर ये मानने लगे कि लोकतंत्र का एक स्तंभ पत्रकारिता ही उन्हें देश की मुख्य धारा से काटने में लग गया है तो, फिर ये सोचने वाली बात है (इस पर फिर से तर्क आ सकते हैं कि पूरा राज्य ऐसा मानता तो, मोदी को पूरे वोट मिलते लेकिन, लोकतंत्र में बहुसंख्या जिसके साथ रहती है, उसी को जनादेश माना जाता है)। मोदी के खिलाफ लड़ाई में विनोद दुआ जैसे पत्रकार बीजेपी के किसी भी फैसले के खिलाफ मुहिम सी चलाते दिखते हैं। किसी भी राजनीतिक दल के फैसलों पर टिप्पणी करना पत्रकार का धर्म है। जनता उसे देखे और तय करे कि क्या सही है क्या गलत।

बीजेपी के खेमे से एक और खबर आई कि लाल कृष्ण आडवाणी बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। ये बहुत समय से अपेक्षित खबर थी। इसके पीछे कुछ दूसरे कारण हो सकते हैं लेकिन, जैसा नेशनल मीडिया बता रहा है कि मोदी से डरकर आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया। ये समझ में नहीं आया। मैं मानता हूं और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में मोदी की अपील भी देख चुका हूं। गुजरात के बाहर मोदी के विकास राग को सुनकर लोग खुश हो सकते हैं। लेकिन, गुजरात के बाहर के किसी राज्य में मोदी कभी भी इतने बड़े नेता नहीं हो पाए कि वो लाल कृष्ण आडवाणी की बराबरी कर पाएं।

इस खबर पर विनोद दुआ खबरदार कार्यक्रम में बार-बार दर्शकों को यही बताते रहे कि हम आपको बता दें कि लाल कृष्ण आडवाणी अभी प्रधानमंत्री बने नहीं हैं उन्हें सिर्फ अपनी पार्टी की ओर से उम्मीदवार बनाया गया है। अब ये क्या बताने की जरूरत है कि कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए की सरकार में बीजेपी का नेता प्रधानमंत्री कैसे हो सकता है। न तो मध्यावधि चुनाव हुए और न ही आडवाणी ने कांग्रेस ज्वाइन किया। साथ ही ये भी कि आडवाणी अभी से भगवान का आशीर्वाद मांगने लगे हैं। दुआ बार-बार ये भी कह रहे थे कि आडवाणी इस अंदाज में लोगों का शुक्रिया अदा कर रहे हैं जैसे वो प्रधानमंत्री बन गए हों। अब मुझे समझ में नहीं आता कि एक नेता जो देश का उप प्रधानमंत्री रह चुका हो। देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता हो उसकी क्षमता पर इस तरह से संदेह करना क्या किसी पार्टी के प्रवक्ता जैसा व्यवहार नहीं है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...