Wednesday, December 30, 2009

क्या सलीके से दर्शन होने पर भगवान का महत्व कम हो जाता है



वैसे तो अकसर धार्मिक स्थलों पर अराजकता के किस्से अकसर देखने-सुनने को मिल जाते हैं। लेकिन, अभी राजस्थान के दौसा जिले के एक धार्मिक स्थल पर अराजकता का जो नजारा दिखा वो, सब पर भारी था। दौसा जिले के मेंहदीपुर में स्थित बालाजी हनुमान का मंदिर कुछ ऐसी ही अराजकता का शिकार है।


मंदिर के बाहर बाकायदा बालाजी ट्रस्ट का बोर्ड दिखा जिससे ये तो तय हो गया कि कुछ स्वनाम धन्य स्वयंभू धार्मिक ठेकेदारों ने बालाजी मंदिर से आने वाली आय से अपना कल्याण करने का रजिस्ट्रेशन करा रखा है। लेकिन, भगवान के भक्तों का हाल इतना बुरा हो जाता है कि मैं बालाजी मंदिर के सामने करीब 4 घंटे की लाइन में लगने के बाद भी बाहर से ही दर्शन करके लौट आया।



वैसे तो, किसी भी धार्मिक स्थल पर हर आस्थावान मत्था टेकने चला जाता है। लेकिन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोगों के लिए बालाजी हनुमान का विशेष महत्व है। दिल्ली से करीब 270 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटे से गांव मेंहदीपुर में ये मंदिर है जो, इसी मंदिर की वजह से बेहद अस्त व्यस्त गंदे से कस्बे का रूप धर चुका है। एक मुख्य सड़क के दोनों तरफ आश्रम-धर्मशालाओं की लाइन लगी है। और, मंदिर के आसपास का पूरा इलाका प्रसाद की दुकानों में तब्दील हो गया है। हर घर में रुकने का भी इंतजाम है। कुछ मिलाकर पूरा इलाका इन्हीं बालाजी की ही कृपा से खा रहा है। लेकिन, जो भक्त यहां के लोगों के खाने का इंतजाम कर रहे हैं उन भक्तों की ऐसी दुर्दशा हो जाती है कि बहुत पराक्रमी और अंधभक्त न हो तो, दोबारा आने का साहस न कर पाए। कम से कम मेरे जैसे सामान्य आस्था वाले लोग तो नहीं ही।



दरअसल इस मंदिर की दुर्दशा के पीछे एक और बड़ी वजह है जो, मुझे वहां पहुंचने पर ही पता चली। वो, ये कि बालाजी हनुमान के साथ ही भैरव और प्रेत दरबार भी है। जहां ज्यादातर लोग रोग निवारण या प्रेत बाधा दूर कराने के लिए आते हैं। ऐसे लोगों की भीड़ थी जो किसी न किसी भूत-प्रेत बाधा के मरीज को लेकर आए थे। अंधमान्यता ये भी है कि यहां का दर्शन एक बार कर लेने के बाद किसी को कभी प्रेत बाधा नहीं होती है। मंदिर के सामने की लोहे की रेलिंग पर एक दूसरे के साथ गुंथे ताले दरअसल वो लोग बांधकर जाते हैं जिनकी प्रेत बाधा उन्हें लगता है कि बालाजी ने दूर कर दी।


हम लोग दिल्ली से निकले शाम के करीब 6 बजे और 9 बजे के आसपास मथुरा पहुंच गए। लेकिन, तय किया गया कि रात में ही मेंहदीपुर पहुंच जाया जाए तो, सुबह दर्शन करके जल्दी मथुरा वापसी कर लेंगे। रात के करीब बारह-साढ़े बारह बजे हम लोग मेंहदीपुर पहुंचे। जबरदस्त सर्दी की रात में सभी धर्मशालाओं-आश्रमों से हाउसफुल की सूचना मिल रही थी। हारकर एक धर्मशाला के केयरटेकर का नंबर मिलाया गया। उसने बुला लिया। अंदर बनी उस धर्मशाला में पहुंचे तो, पता चला कि कमरा तो, वहां भी नहीं खाली है। लेकिन, उसने स्टोर रूम साफ करवाकर उसी में गद्दे लगवा दिए। लगे हाथ ये हिदायत भी दे दी कि एकाध-दो घंटे जो सोना हो सो लीजिए। 3-4 बजे तक लाइन में लग जाएंगे तो, 12 बजे तक दर्शन हो जाएगा। लगा कि ये बेवजह डरा रहा है।


लेकिन, ये लगा कि जितनी जल्दी दर्शन हो जाएगा मथुरा-वृंदावन में उतना ज्यादा समय मिल जाएगा। आखिरकार आलस करते-ठंड से डरते हम लोग नहा-धोकर साढ़े चार बजे मंदिर पहुंच गए देखा तो, मंदिर के बगल से सटी गलियों में अंदर तक भीड़ लाइन लगाए खड़ी थी। खैर, हम लोग भी लाइन में लग गए। पता चला कि सात बजे से आरती शुरू होगी। आठ बजे से दर्शन शुरू होगा। फिर भई लाइन अभी से क्यों तो, जवाब ये कि अभी से लाइन में लगेंगे तो, ही जाकर 11-12 बजे तक दर्शन हो पाएंगे। दरअसल जानबूझकर आधी रात से ही लाइन लगाने की भूमिका मेंहदीपुर के दुकानदारों से लेकर आश्रम-धर्मशाला तक वाले ऐसी बना देते हैं कि बेचारा दर्शन करने वाला डरकर आधी रात से ही बालाजी की ब्रांडिंग मजबूत करने में जुट जाता है। कुल मिलाकर धर्म के ये ठेकेदार धार्मिक लोगों की आस्था का दोहन करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।


और, जो आधी रात से लाइन में लगते हैं वही बेवकूफ भी गजब बनते हैं। हम लोग भी बने। नियम का पालन करते लाइन में लग गए। बाद में देखा तो, मंदिर के सामने लाइन की बजाए पूरी जनसभा जैसी भीड़ फैलती चली गई। न तो कोई पुलिस का इंतजाम- नही मंदिर से कमाने-खाने वाले ट्रस्टियों का कोई अता-पता। मंदिर के ट्रस्ट का कार्यालय खोजना चाहा तो, पता चला कि ऑफिस तो, आठ बजे तक खुलेगा।


खैर, मंदिर के बाहर भूत-प्रेत बाधा से ग्रसित अभुआते-लटपटाते-गिरे लोगों को देखकर मेरा मन इतना खराब हो चुका था कि मैंने चार घंटे लाइन में लगने के बावजूद मंदिर में न जाने का फैसला कर लिया और मंदिर के बाहर से ही दर्शन करके जाकर गाड़ी में आराम करने लगा। लाइन में लगने के दौरान बालाजी के अनन्य भक्त पश्चिम उत्तर प्रदेश के निवासी एक अधेड़ उम्र के सज्जन ने दावा किया कि एक ट्रक दुर्घटना में उनकी रीढ़ की हड्डी इस कदर टूटी थी कि वो उठने-चलने लायक नहीं रहे थे लेकिन, ये बालाजी की ही कृपा थी कि कुछ ही दिनों में दवा बंद करने के बावजूद वो लाइन में फिर से बालाजी के दर्शन के लिए खड़े हैं। महिलाओं-लड़कियों पर ही ज्यादा भूत-प्रेत बाधा दिख रही थी इसका जवाब उन अधेड़ साहब ने दिया कि हम-आप भी तो लड़कियों की ही तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं। खैर, ये जवाब मुझे इसलिए नहीं पचा कि पहले तो मैं भूत-प्रेत नहीं मानता। और, अगर भूत-प्रेत होते भी हैं तो, क्या सिर्फ पुरुष ही होते हैं। ये नया शोध का विषय मिल गया। अगर ये हो तो अच्छा है कि महिलाएं ऐसे कर्म अपने जीवन में ऐसे कर्म कम ही करती हैं कि उन्हें भूत-प्रेत बनना पड़े।

अब मेरा ये लिखा बालाजी ट्रस्ट के लोग तो पढ़ने से रहे। लेकिन, अगर किसी तरह ट्रस्ट के लोगों को ये बात समझ में आ जाए तो, शायद मेंहदीपुर का बेतरतीब कस्बा बालाजी की कृपा से अच्छी प्रति व्यक्ति कमाई वाली जगह में बदल सकता है। वहां रहने वालों का जीवन स्तर सुधर सकता है। उन्हें भी आधी रात से ही जगकर प्रसाद-चाय, नाश्ता बेचकर रोटी का जुगाड़ करने की जद्दोजहद से मुक्ति मिल सकती है। लेकिन, इसके लिए आधी रात से बालाजी दर्शन की लंबी लाइन का डर दिखाने के बजाए एक व्यवस्थित तरीका तैयार करना होगा। 

Friday, December 25, 2009

दलित-ब्राह्मणवाद को रामबाण बनने से रोकना होगा

ये नए तरह का मनुवाद है। इसको नए तरह का ब्राह्मणवाद भी कह सकते हैं। फर्क बस इतना है कि इस ब्राह्मणवाद का कवच दलित होने पर ही मिलता है। ये दलित ब्राह्मणवाद इतना अचूक नुस्खा हो गया है कि बस एक बार हुंकारी लगाने की जरूरत है फिर पीछे-पीछे लाइन लग जाती है। पुराना ब्राह्मणवाद धर्म के पाप लगने से डराता था और अपने पापों को छिपा ले जाता था तो, ये नया दलित ब्राह्मणवाद वोटबैंक खो जाने जैसे पाप का डर राजनीतिक पार्टियों को दिखाता है यही वजह है कि मायावती को खुद के राज में असल दलितों पर अत्याचार भले ही चिंतित नहीं करता लेकिन, आज के लिहाज से ब्राह्मण में तब्दील हो चुके कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के भ्रष्टाचार के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव में एक दलित के खिलाफ साजिश की बू आने लगती है।
मायावती ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर कहा है कि जस्टिस दिनकरन को बिना मौका दिए महाभियोग का प्रस्ताव लाना गलत है और वो इसके खिलाफ आवाज उठाएंगी। ये दलित नाम का न चूकने वाला नुस्खा ही है कि एक दलित कांग्रेसी सांसद की अगुवाई में सभी दलों के दलित सांसद अचानक दिनकरन के पक्ष में खड़े हो गए हैं। दिनकरन तो पहले से ही चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि दलित होने की वजह से मुझे फंसाया जा रहा है। दिनकरन कह रहे हैं कि उन पर जमीन घोटाले का आरोप तब लगाया गया जब उनके सुप्रीमकोर्ट में जज बनने की बात आई। लेकिन, सवाल ये है अगर दलित होने की वजह से उनके खिलाफ साजिश रचने वाली ब्राह्मणवादी ताकतें इतनी मजबूत हैं तो, उनके कर्नाटक हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनने में अड़ंगा क्यों नहीं लगाया।
ऐसे में ये दिनकरन और दूसरे दलित से ब्राह्मण बन चुके लोगों की दलित-ब्राह्मणवाद की आड़ में भ्रष्टाचार जैसे आरोप को कमजोर करने की कोशिश ज्यादा लगती है। वरना भ्रष्टाचार के आरोप निराधार हैं तो, जस्टिस पी डी दिनकरन आरोपों को भारतीय संविधान के दायरे में खारिज करने की कोशिश क्यों नहीं करते। लॉबी बनाकर ब्राह्मण की श्रेणी में आ चुके दलितों की लामबंदी में क्यों जुटे हैं। दलित सांसदों, मुख्यमंत्रियों और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन बूटा सिंह तक का ये कहना कि दिनकरन पर ऐसे आरोप सिर्फ इसलिए लग रहे हैं कि वो, दलित हैं- ये बात कुछ हजम नहीं हो रही है। अब अगर बूटा सिंह साहब लगे हाथ ये भी याद कर लेते कि सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस बालाकृष्णन साहब कौन सी जाति के हैं तो, अच्छा रहता।
हाल ये हो गया है कि ये दलित-ब्राह्मणवाद ऐसा रामबाण हो गया है कि बस नाम भर ले लो फिर किसी की क्या मजाल जो, कुछ हमला करने की हिम्मत कर सके। अपराध करो, भ्रष्टाचार करो- कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। बेचारे सचमुच के दलितों से लेकर जाति में दलित लगाए महासवर्णों तक आपके साथ खड़े हो जाएंगे और जिनके जाति के आगे दलित नहीं लगा है वो, इस डर से विरोध नहीं करेंगे कि दलित विरोधी होने का ठप्पा न लग जाए। और, सच में दलित स्थिति में रह रहे दलित के दर्द की आवाज इस तमाशे के शोर में दब सी जा रही है।
इसीलिए, जरूरी है कि दलित-ब्राह्मणवाद नाम के इस मंत्र को रामबाण बनने से रोका जाए। क्योंकि, असल दलित तो अपना हक पाने की लड़ाई लड़ते-लड़ते आज भी अपनी स्थिति बहुत कम सुधार पाए हैं। लेकिन, मायावती और जस्टिस पी डी दिनकरन जैसे दलित ब्राह्मण नए तरह के दलित तैयार करने में कामयाब हो जाएंगे। वैसे ज्यादा समय इस बात को भी नहीं हुआ है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन बूटा सिंह ने एक बिल्डर से करोड़ो की धोखाधड़ी के मामले में बेटे की गिरफ्तारी पर सीबीआई के खिलाफ ही दलित होने के रामबाण का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे थे। इस नए रामबाण को अचूक होने से रोकना होगा नहीं तो, जाने कितने भ्रष्टाचार, गंदगियां और जाने कितनी दूसरी बुराइयों की ये ढाल बन जाएगा।

Thursday, December 24, 2009

मराठी भाजपा अध्यक्ष की चुनौतियां


भारी भरकम शरीर वाले नितिन गडकरी का भाजपा अध्यक्ष बनना कई मायनों में एतिहासिक है। वैसे तो नितिन गडकरी संघ के पूर्ण आशीर्वाद की वजह से ही उस कुर्सी पर बैठ पाए हैं जिस पद के जरिए अटल बिहारी वाजपेयी-लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जैसे भाजपा के दिग्गजों ने पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे तक पहुंचा दिया और, कांग्रेस का विकल्प भाजपा बन गई। गड़करी सिर्फ 52 वर्ष के हैं और भाजपा के इतिहास में सबसे कम उम्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। गडकरी मराठी हैं और संघ मुख्यालय नागपुर में होने के बावजूद पहली बार संघ ने किसी मराठी के लिए प्रतिष्ठा लगाई है।


इतनी एतिहासिक परिस्थितियों में कुर्सी संभालने वाले गडकरी अब आगे इतिहास बनाएंगे या खुद इतिहास में ठीक तरीके से दर्ज भी नहीं हो पाएंगे। गडकरी का नाम जब राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए पहली बार सामने आया था तो, राष्ट्रीय मीडिया में एक सुर था-- मरती भाजपा के लिए आत्मघाती कदम। राज्य स्तर के नेता को राष्ट्रीय दर्जा देने की संघ की कोशिश की खूब आलोचना हुई थी। लेकिन, गडकरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही गडकरी के लिए फ्लाईओवर मैन, विकास पुरुष जैसे नारे सुर्खियां बन गए। टीवी चैनलों पर गडकरी का स्कूटर से वोट डालने वाला दृष्य भी खूब दिखाया। गडकरी को इस चुनौती को समझना होगा। मीडिया से संबंध बेहतर रखें लेकिन, सिर्फ और सिर्फ काम करना होगा। भाजपा की जगह आज भी है लेकिन, माहौल अच्छा नहीं है। खुद की राष्ट्रीय छवि तैयार करनी होगी।


गडकरी की सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि वो, दिल्ली दरबार के उन माहिर खिलाड़यों को पटकनी देकर भाजपा के मुखिया बने हैं जो, पिछले एक दशक से दिल्ली की राजनीति का रास्ता बनाते बिगाड़ते रहे हैं। भले ही आंतरिक संतुलन बनाए रखने के लिए आडवाणी को घर के बड़े बुजुर्ग जैसे भाजपा संसदीय समिति के चेयरमैन का पद दे दिया गया और सुषमा को लोकसभा और जेटली को राज्यसभा में भाजपा का मुखिया बना दिया गया। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये दोनों नेता खुद को आडवाणी के बाद पार्टी के स्वाभाविक मुखिया के तौर पर देख रहे थे। यहां तक कि गडकरी की ताजपोशी के पहले तक पार्टी कार्यकर्ता भी इन्हीं में से किसी की ताजपोशी तय मान रहे थे। इसीलिए जब गडकरी का नाम तय हो गया तो, सुषमा स्वराज ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि उन्होंने और भाजपा के कुछ दूसरे नेताओं ने अध्यक्ष बनने से मना किया तब गडकरी का नाम आया। यानी गडकरी दूसरे दर्जे के नेता हैं जो, आज की बीजेपी के पहले दर्जे के नेताओं की छोड़ी सीट पर बैठ रहे हैं। गडकरी की सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली दरबार के नेताओं से तालमेल बिठाते हुए इसी पहले दर्जे में खुद को स्थापित करने की होगी।


ठीक पहले के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के कार्यकाल से भी नितिन गडकरी सबक ले सकते हैं। राजनाथ सिंह देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश से आते हैं। और, अध्यक्ष बनते समय यही राजनाथ सिंह के मजबूत पक्ष को दिखा रहा था। लेकिन, कार्यकाल खत्म होते-होते साफ हो गया कि राजनाथ के समय में बीजेपी की देश में जो दुर्गति हुई सो हुई- उत्तर प्रदेश में पार्टी पहले-दूसरे की लड़ाई से नीचे उतरकर तीसरे नंबर पर पहुंच गई। अब गडकरी के सामने दो राज्यों में भाजपा का प्रभाव फिर से स्थापित करना तुरंत की चुनौती होगी। पहला उत्तर प्रदेश और दूसरा अपने गृह राज्य महाराष्ट्र में।


उत्तर प्रदेश में नया नेतृत्व तलाशना गडकरी के लिए सबसे मुश्किल काम होगा। बीजेपी में अब तक कद्दावर रहे नेताओं की लाइन एक दूसरे की इतनी छीछालेदर कर चुकी है कि वो, चाहकर भी किसी एक के साथ चल नहीं पाएंगे। ऐसे में गडकरी को कोई ऐसा नेतृत्व खोजना होगा जिसे संघ का आशीर्वाद मिले और जो, नौजवानों की टीम खड़ी कर सके। उत्तर प्रदेश में भाजपा के संगठन मंत्री नागेंद्र नाथ गडकरी के लिए बेहतर दांव साबित हो सकते हैं। नागेंद्र नाथ संघ के प्रचारक हैं। उनके समय में ही विद्यार्थी परिषद राज्य के हर विश्वविद्यालय में प्रभावी स्थिति में पहुंची। और, परिषद-कैडर के प्रत्याशियों को पिछले विधानसभा चुनाव में आजमाने की उन्होंने काफी कोशिश पिछले विधानसभा चुनाव में की भी थी। लेकिन, बसपा की सोशल इंजीनियरिंग और भाजपा के नेताओं की आपसी मारामारी में अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सका।


उत्तर प्रदेश से भी बड़ी चुनौती गडकरी के लिए महाराष्ट्र में होगी। क्योंकि, महाराष्ट्र में जाकर भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी को शिवसेना जैसी क्षेत्रीय पार्टी के पीछे चलना पड़ता है। यही वजह है कि मुंबई हमले और उत्तर भारतीयों पर राज ठाकरे के हमले के बावजूद भाजपा के कमल पर कांग्रेस का हाथ भारी पड़ गया। अच्छी बात ये है कि महाराष्ट्री की राजनीति को नजदीक से देखने वाले खूब जानते हैं कि गडकरी हमेशा महाजन-ठाकरे गठजोड़ के खिलाफ खड़े होकर मजबूत होते रहे। अब गडकरी को राज्य में गोपीनाथ मुंडे और विनोद तावड़े से संतुलन साधना होगा। और, साथ ही संकीर्ण ठाकरे छाया से भाजपा को मुक्त कराना होगा। गडकरी मराठी हैं और इसलिए कुछ समय पहले तक सिर्फ उत्तर भारत की मानी जाने वाली पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर महाराष्ट्र में मराठी-उत्तर भारतीय वोटबैंक को बेहतर तरीके से साध सकते हैं। 


भाजपा शासित राज्यों में सत्ता-संगठन तालमेल के लिए गडकरी को नए सिरे से योजना बनानी होगी। कर्नाटक में येदियुरप्पा का हाथ मजबूत करना होगा जिससे फिर कभी रेड्डी भाइयों की ब्लैकमेलिंग के फंदे में भाजपा न फंसे। गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में बेहद मजबूत मुख्यमंत्रियों की सत्ता में भाजपा संगठन खत्म न हो जाए इसकी चिंता भी गडकरी को करनी होगी। उत्तराखंड में कोश्यारी-खंडूरी की कलह अभी खत्म नहीं हुई है तो, राजस्थान में अब तक पार्टी के पास वसुंधरा राजे का विकल्प नहीं बन सका है।


इन सारी चुनौतियों के अलावा गडकरी के लिए संघ-भाजपा का संतुलन बनाए रखना भी कम बड़ी चुनौती नहीं होगी। वैसे, अभी भाजपा भले ही 116 सांसदों वाली और कई राज्यों में शासन वाली पार्टी हो लेकिन, सच्चाई यही है कि संघ कैडर लगभग भाजपा से दूरी बना चुका है। उसे वापस लाया जा सकता है इसके लिए कैडर को ये दिखना चाहिए कि संघ का कहा भाजपा अभी भी मानती है। ये खुद गडकरी की ताजपोशी से साबित भी हो चुका है। और, अब आने वाला समय ये तय करेगा कि सबसे कम उम्र सर संघचालक और सबसे कम उम्र भाजपा अध्यक्ष इतिहास में किस तरह से नाम दर्ज कराते हैं।



(ये लेख राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

Friday, November 27, 2009

अब कितनी सनसनी होती है


रात के करीब साढ़े दस बजे थे। दफ्तर की छत पर खुले में बैठकर हम खाना खाने जा ही रहे थे। पहला कौर उठाया ही था कि संपादक जी का फोन आ गया।
हर्ष, कोई गोलीबारी की खबर है क्या।
नहीं सर, ऐसे ही कुछ हल्की-फुल्की झगड़े की खबर थी मैंने देखा था लेकिन, शायद हमारे चैनल के लिहाज से खास नहीं थी।
नहीं देखो शायद कोई बड़ी गैंगवॉर है  या कोई आतंकवादी हमला है।
खाना छोड़कर मैं तुरंत भागकर न्यूजरूम में पहुंचा तो, हर चैनल पर वही खबर थी। कहीं पर दो माफिया गुटों के बीच भयानक गोलीबारी की खबर थी तो, कहीं कुछ और ... कोई भी चैनल एकदम से नहीं बता पा रहा था कि हुआ क्या है।


तब तक फिर संपादक जी का फोन आ गया था।
हर्ष, कौन-कौन है ऑफिस में।
अभी तो सर, गिने-चुने लोग ही बचे हैं। लगभग सब जा चुके हैं। क्या करना है सर
अच्छा देखो खबर पक्की हो जाए तो, फैसला लेते हैं नजर रखो। ये कोई बहुत बड़ी खबर हो गई है।


फोन रखते-रखते अचानक एक न्यूज चैनल पर फ्लैश आया - मुंबई पर हमला। लगा जैसे वज्रपात हो गया। फिर एक साथ गोलियों की तरह ब्रेकिंग न्यूज वाली पट्टी पर लगभग सभी न्यूज चैनलों पर मुंबई पर हमला। लियोपोल्ड कैफे पर गोलीबारी... सांताक्रूज में टैक्सी में धमाका ताज होटल में आतंकवादी घुसे ... ओबरॉय होटल में भी आतंकवादियों के घुसने की आशंका ...  ऐसे फ्लैश टीवी स्क्रीन से निकलकर जेहन को जकड़ रहे थे।


मैंने संपादक जी को फोन किया- सर, IBN7 लाइव कट कर लें क्या।
तुरंत कट करो, फिर देखते हैं। PCR के सारे लोग जा चुके थे। एंकर नहीं था। डेस्क पर भी मेरे अलावा एकाध लोग ही थे। सिर्फ टिकर पर एक साथी था। तुरंत फैसला लिया। IBN7 लाइव कट किया और ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी पर जैसे-जैसे खबरें आती गईं सूचना डालने लगे।


तब तक न्यूज चैनलों पर खबर  आ चुकी थी कि मुंबई CST पर आतंकवादी गोलीबारी करके भागे हैं। स्क्रीन पर हेमंत करकरे का गाड़ी से उतरकर बुलेटप्रूफ जैकेट और लोहे वाली टोपी पहने तस्वीरें दिखीं। ATS प्रमुख को स्क्रीन पर देखकर समझ में आ गया था ATS हरकत में आ चुकी है। भरोसा हुआ कि अब कुछ घंटे में मामला निपट जाएगा। फिर अचानक कुछ शांति सी लगी। लगा कि आतंकवादी घिनौनी वारदात को अंजाम देकर भाग चुके हैं। लेकिन, वो तूफान के पहले की शांति थी। लाल-लाल ब्रेकिंग न्यूज चमकी ATS प्रमुख हेमंत करकरे शहीद, मुंबई पुलिस के शूटर सालस्कर, डीआईजी अशोक काम्टे शहीद। तेजी में फ्लैश बनाते मेरे रोंगटे खड़े हो गए। खून खुद के शरीर पर दिखने लगा।


बुरी से बुरी खबरें अब आनी शुरू हुई थीं। पता चला ताज को आतंकवादियों ने कब्जे में कर लिया है। ओबरॉय आतंकवादियों के कब्जे में है। मुंबई CST पर भयानक खून खराबा आतंकवादियों ने किया है। नरीमन हाउस भी आतंकवादियों के कब्जे में चले जाने की खबर आई। लगा जैसे पाकिस्तान ने घुसकर हमें मसल दिया हो। खबर ये भी आई कि आतंकवादी पुलिस की एक गाड़ी लेकर उससे भी मौत बरसाते बहुत देर तक घूमते रहे। खैर, थोड़ी ही देर में खूनियों के मरीन ड्राइव पर मरने की खबर भी आई।


बॉसेज से बात की तो, तय हुआ कि सुबह आठ बजे से हम अपना बुलेटिन खोलेंगे। एक बिजनेस न्यूज चैनल सारी रात लाइव था। देश पर हमला जो हुआ था। सारी फ्लैश बनाते थक गया था। आंख में नींद पानी में बालू की तरह भरी हुई थी लेकिन, हमले की वजह से सोने का मन नहीं हो रहा था। सुबह की शिफ्ट आ गई थी लेकिन, आठ का बुलेटिन मैंने खुद ही बनाया था। पूरी रात की टाइमलाइन मुंहजुबानी याद हो गई थी। करीब ग्यारह बजे कमरे पर गया कि थोड़ा आराम कर लूं। लेकिन, फ्रेश होकर, नहा धोकर सोने की लाख कोशिश कामयाब नहीं हुई। एकाध घंटे में ही फिर से ऑफिस में था।


ह्रदयविदारक तस्वीरों को तेजी से चलने लायक बनाने के काम में मैं भी सबके साथ जुट गया। फिर तय हुआ कि हमारे अपने रिपोर्टर भी जाने चाहिए। स्वभावत: रिपोर्टर होने की वजह से वैसे तो, हमेशा रिपोर्टिंग ही करने की इच्छा होती रही। लेकिन, इस मौके पर तो ये इच्छा या यूं कहूं कि आतंकवादियों के खिलाफ जंग में अपनी सामर्थ्य भर शामिल होने की इच्छा जोर मार रही थी। लेकिन, न तो मैं बॉसेद से कह पाया और न ही वो मेरी इस इच्छा को भांप सके या भांपकर भी उन्हें लगाकि ये शो प्रोड्यूस करने, प्रोडक्शन के लिए इस समय ज्यादा उपयोगी है, मुझे नहीं भेजा गया। लगा क्या खाक पत्रकारिता कर रहे हैं हम। शायद इसी कोफ्त में मैंने 27 नवंबर 2008 को ये गुस्सा निकाला था।


खैर, सुबह तक के अखबारों में कलावा बांधे आतंकवादी की तस्वीरें क्या आईं। ATS प्रमुख के हिंदू अतिवादियों के शिकार होने की रात की अफवाह एक बार फिर जोर पकड़ने लगी। अच्छा हुआ जल्दी ही ये साफ हो गया। वरना तो, लोग करकरे की शहादत को हिंदू आतंकवाद, साध्वी प्रज्ञा और मालेगांव धमाकों की ATS जांच तक से जोड़ने लगे थे। फिर तो NSG, मार्कोस के जवानों के जिम्मे देश बचाने का काम आ चुका था। मुंबई की तीन महत्वपूर्ण इमारतों से कम से कम लोगों की जान जाए इसे समझते हुए कमांडो कार्रवाई शुरू हो गई थी। खैर, जवानों की जांबाजी के बीच टीवी की टीआरपी के खिलाड़ियों ने शुरू में जल्दी से जल्दी और कुछ हद तक लाइव तस्वीरें दिखाकर TRP बटोरने की जो कोशिश की उसने शायद आतंकवादियों को जवानों की पोजीशन बताने में भी मदद कर दी।


दुनिया के सबसे बड़े और कठिन इस तरह के आतंकवादी हमले को हमारे जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। होटलों, नरीमन हाउस में फंसे लोगों को बचाकर आतंकवादियों को मार गिराया। आतंकवादी घटना को रोक न पाने की नैतिक जिम्मेदारी थोपकर कांग्रेस ने विलासराव देशमुख को वहां से हटाकर केंद्र में बड़ा मंत्री बना दिया। अच्छा हुआ कि रस्मी कहिए, TRP की मजबूरी कहिए, पत्रकारिता कहिए या आप जो भी कहिए- देश के जख्म को साल भर बाद फिर से टीवी चैनलों ने, मीडिया ने थोड़ा कुरेदा तो सही। टीवी पर देखते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए। 26 नवंबर 2008 को याद करके। 26, 27 नवंबर की काली रात याद करके। ये दहशत मुंबई में ऐसे भर गई है कि हल्का सा खटका भी आतंकवादी हमला लगता है। रोजी-रोटी की मजबूरी है जिसे हम मुंबई SPIRIT कहते हैं और मुंबई की जिंदादिली समझते हैं लेकिन, बताइए ना ऐसी सरकारों में हम क्या कर सकते हैं गोली खाकर सिवा जिंदादिल रहने के। अच्छा है कि टीवी है, अच्छा है कि टीवी TRP के फेर में या फिर सनसनी फैलाने के लिए जख्म याद कराती रहती है वरना तो, सरकारें तो चाहती हैं जनता गोली खाकर सो जाए या फिर बची रहे तो, भी सोती रहे बस उनकी सत्ता चलती रहे। देश जाए भाड़ में ...

मैं जब ये पोस्ट लिख रहा था तो, रात 12.27 बजे पत्रकार मित्र अमोल परचुरे का ये संदेश आया
A year after 26/11, the safest person in the country is, ironically ...


kasab

Monday, November 23, 2009

ऐसा चमत्कार कैसे हो जाता है

हिंदी-अंग्रेजी का व्यवहार-बोलचाल हमें गजब का बदल रहा है। हिंदी के जिन शब्दों, क्रिया कलापों को हम हिंदी में सुनना नहीं चाहते वही अंग्रेजी भाषा में तब्दील होते ही अरुचिकर नहीं लगता। और, ये ऐसे घुस रहा है हमारे घर, परिवार, समाज में कि जाने-अनजाने हम भी इसका हिस्सा बनते जाते हैं। गालियों का तो है ही। बेहद आधुनिक दिखने वाले लड़के-लड़कियां ऐसे अंतरंग शब्दों को अंग्रेजी में सरेआम प्रयोग कर लेते हैं जिसे हिंदी में कह दिया जाए तो, असभ्य, जाहिल, जंगली जाने क्या-क्या हो जाएं। लेकिन, अंग्रेजी में उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करके स्मार्ट।


हिंदी की टट्टी गंदी लगती है उसमें से बदबू भी आती है लेकिन, अंग्रेजी की potty होते ही उसमें की गंध और गंदगी पता नहीं कहां गायब हो जाती है। और, हम इन शब्दों को बोलते वक्त भाव भी चेहरे पर ऐसे ही लाते हैं जाने या अनजाने। कैसे हो जाता है ये चमत्कार। हिंदी-अंग्रेजी किसी में भी बताइए ना ...

Sunday, November 22, 2009

ये हिंदी की लड़ाई थी ही नहीं


इसे हिंदी की लड़ाई कहा जा रहा था। कुछ तो हिदुस्तान की लड़ाई तक इसे बता रहे थे। देश टूटने का खतरा भी दिख रहा था। लेकिन, क्या सचमुच वो हिंदी की, हिंदुस्तान की लड़ाई थी। दरअसल ये राजनीति की बजबजाती गंदगी को हिंदी की पैकिंग लगाकर उस बजबजाती राजनीति को सहेजने के लिए अपने-अपने पक्ष की सेना तैयार करने की कोशिश थी।


अब सोचिए भला देश अबू आजमी को लेकर संवेदनशील इसलिए हो गया कि हिंदी के नाम पर आजमी ने चांटा खाया। सोचिए हिंदी की क्या गजब दुर्गति हो गई है कुछ इधर कुआं-उधर खाई वाले अंदाज में। उसको धूल धूसरित करने खड़े हैं राज ठाकरे और उसको बचाने खड़े हैं अबू आजमी। जबकि, सच्चाई यही है कि न तो राज ठाकरे की हिंदी से कोई दुश्मनी है न अबू आजमी को हिंदी से कोई प्रेम।


ये दो गंदे राजनेताओं की अपनी जमीन बचाने के लिए एक बिना कहा समझौता है जो, समझ में खूब ठीक से आ रहा है। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी के रिश्ते देश के दुश्मन दाऊद इब्राहिम से होने की खबरों के ठंडे हुए अभी बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ और न ही इसे ज्यादा समय बीता होगा जब मराठी संस्कृति के नाम पर भारतीय संस्कृति तक को चुनौती देने वाले राज ठाकरे गर्व से पॉप स्टार माइकल जैकसन की गंधाती देह के दर्शन के लिए आतुर थे।



हिंदी न इनकी बेहूदी हरकतों से मिटेगी न बचेगी। कभी-कभी कुछ सरकारी टाइप के लगने वाले बोर्ड बड़े काम के दिखते हैं। रेलवे स्टेशन पर हिंदी पर कुछ महान लोगों के हिंदी के बारे में विचार दिखे जो, मुझे लगता है कि जितने लोग पढ़ें-सुनें बेहतर। उसमें सबसे जरूरी है भारतीय परंपरा के हिंदी परंपरा के मूर्धन्य मराठी पत्रकार बाबूराव विष्णु पराड़कर जी का हिंदी पर विचार। पराड़कर जी की बात साफ कहती है हिंदी हमारे-आपके जैसे लोगों की वजह से बचेगी या मिटेगी। बेवकूफों के फेर में मत पड़िए।

Wednesday, November 18, 2009

ये सोचकर करना-होना जरा मुश्किल था

कुछ बदलाव ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत पहले से सोचकर करना शायद ही संभव हो। यहां तक कि कई बार जो बुराई दिख रही होती है उसी में छिपे बदलाव कुछ मायनों में बड़े सुखद होते हैं। मैं ये बदलाव महसूस तो पहले भी कर रहा था। लेकिन, अभी जब बिटिया के साथ इलाहाबाद में था तो, उत्तर प्रदेश के राज्य-शहर के लिए इस अच्छे बदलाव को समझा। पहले भी मैं इलाहाबाद के रिक्शा बैंक की कहानी बता चुका हूं।



अल्लापुर के साकेत हॉस्पिटल में हमारी बिटिया हुई। रोज शाम को मैं हॉस्पिटल के सामने से शानदार पीली बसें गुजरते हुए देखता था। शंभूनाथ इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी। शानदार पीली बसों पर ऐसे ही यूनाइटेड, वाचस्पति, पुणे, एलडीसी, मदर टेरेसा और जाने कितने नामों का बैनर लगाए बच्चों को उनके घर छोड़ने ये बसें आती हैं। ये बच्चे इंजीनियरिंग, मेडिकल, पैरामेडिकल, फार्मेसी, मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे हैं। और, वो भी अपने शहर में रहकर। इन्हें अब दक्षिण भारत या देश से बाहर नहीं जाना है।


वैसे तो, शिक्षा के निजीकरण की बुराई का हल्ला ही इस पर होता है। और, ये सही भी है कि कॉलेज, इंस्टिट्यूट खोलना बाकायदा कमाई के दूसरे धंधे जैसा ही हो गया है। मायावती की सरकार हो या फिर उसके पहले की मुलायम सरकार बाकायदा रेट तय हैं कि बीएड, MBA, MBBS, BDS, BHMS, इजीनियरिंग, पैरामेडिकल कॉलेज के लिए कितना घूस खिलाना होगा। लेकिन, इस भ्रष्टाचार के बीच अच्छी बात जो निकलकर आई वो, ये कि इलाहाबाद शहर में ही करीब 19 इंजीनियरिंग कॉलेज हो गए हैं। और, दक्षिण भारत के इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेजों में दाखिले जैसा डोनेशन भी नहीं देना पड़ रहा है।


और, चूंकि इलाहाबाद के बच्चों को उनकी मनचाही शिक्षा उनके शहर में ही मिल रही है तो, उनका खर्च बचने के साथ उन्हें शहर भी नहीं छोड़ना पड़ रहा है। सरकारी राजस्व भी बढ़ रहा है। बच्चे पढ़ अपने शहर में रहे हैं तो, विस्थापन (MIGRATION) के खतरनाक दुष्परिणाम से भी वे बचेंगे। राज ठाकरे जैसों को लुच्चई का कम मौका मिलेगा। पढ़ाई पुणे या बुंगलुरू में होती है तो, बच्चा भी उसी के आसपास नौकरी खोजने लगता है। इलाहाबाद में परिवार में कुछ प्रयोजन पर ही साथ रह पाता है। अब यहां आसपास थोड़े कम पैसे की नौकरी भी वो कर सकेगा। इतना स्किल्ड वर्कर जब इलाहाबाद में ही मिलेगा तो, शायद यहां लगी कंपनियां बाहर से लोगों को नहीं बुलाना चाहेंगी और कुछ नई कंपनियां भी इधर का रुख करें।


80 के दशक में देश के विश्वविद्यालयों और सरकार संस्थानों के बाद बचे लोग रूस डॉक्टर, इंजीनियर बनने चले जाते थे। इस मौके को दक्षिण भारत और फिर महाराष्ट्र ने अच्छे से समझा। थोक के भाव में वहां इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज खुल गए। और, जनसंख्या बहुल उत्तर भारत के ही राज्यों  के बच्चे वहां मोटी फीस देकर पढ़ते थे। माता-पिता की गाढ़ी कमाई का पैसा वहां चला जाता था। विस्थापन के चलते यहां के घरों में रहने वाले लोग कम बचते थे और बच्चा दक्षिण भारत, महाराष्ट्र में जाकर वहां की प्रॉपर्टी के रेट भी बढ़ाता था।


अब बस जरूरत इस बात की है कि जहां ये प्रतिभा तैयार हो रही है। वहीं पर उसे कमाने के मौके मिल जाएं। वैसे, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार से ऐसी कोई लगाना बेवकूफी हो होगी। लेकिन, कई बार बदलाव बिना किसी सरकार और लोगों की मंशा के हो जाते हैं। वो अपने निजी लालच में समाज का कुछ भला कर जाते हैं। इसका उदाहरण ऊपर मैं दे ही चुका हूं। उम्मीद करता हूं ये बदलाव होगा और तेजी से होगा। ये बीमारू राज्य में शामिल उत्तर प्रदेश को बेहतर कर सकता है। क्षेत्रीयता की राजनीति करने वाले लोगों को सार्थक जवाब भी यही होगा।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...