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Tuesday, May 30, 2017

भारत के लिए OBOR बेकार, EWHW पर ध्यान दो सरकार !

भारत सरकार के लिए ये फैसला लेना इतना आसान नहीं था। लेकिन, सरकार की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि भारत ने चीन की अतिमहत्वाकांक्षी OBOR योजना से खुद को पूरी तरह बाहर ही रखा है। कठिन फैसला इसलिए भी क्योंकि, भारत के 2 सम्वेदनशील पड़ोसी देशों पर OBOR के जरिए चीन का बढ़ता प्रभाव जल्दी ही दिखने लगेगा। नेपाल ने इस बात को स्वीकारा कि इतनी बड़ी आर्थिक गतिविधि से हम कैसे किनारे रह सकते हैं। और, पाकिस्तान तो OBOR के सबसे महत्वपूर्ण CPEC यानी चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का एक अहम पक्ष ही है। पाकिस्तान भारत के लिहाज से दुश्मन देश जैसा है और CPEC के पाक अधिकृत कश्मीर, बलूचिस्तान और दूसरे विवादित इलाकों से गुजरने की वजह से भारत को इस गलियारे पर कई कड़े एतराज हैं। लेकिन, चीन ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया है। वन बेल्ट वन रोड की इस अतिमहत्वाकांक्षी योजना के जरिए चीन भले ही दुनिया के 60 देशों को जोड़ने का दावा कर रहा हो। लेकिन, सच्चाई यही है कि इसके जरिए वो अपनी टूटती अर्थव्यवस्था को मजबूती से जोड़ने की कोशिश कर रहा है। साथ ही चीन इसके जरिए कमजोर देशों को कर्ज देकर और सामरिक तौर पर निर्भर बनाकर उन्हें अपने उपनिवेश के तौर पर भी इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है। ये बात अब धीरे-धीरे ही सही लेकिन, खुलकर सामने आ रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इस पर एकमत थे कि चीन की मंशा इस मामले में ठीक नहीं है। विदेश सचिव एस जयशंकर ने कहाकि ये बड़ा मुद्दा है कि देशों को जोड़ने वाला रास्ता बनाने का काम आम सहमति से होगा या फिर किसी एक पक्ष के तय फैसले के आधार पर। जयशंकर ने कहाकि चीन अपनी सम्प्रभुता का लेकर बेहद सम्वेदनशील है। हम उम्मीद करते हैं कि चीन को भी दूसरों की सम्वेदना का ख्याल होगा। CPEC ऐसे इलाके से गुजर रहा है, जो पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरता है। ये इलाका भारत का है, जिस पर पाकिस्तान ने अवैध तौर पर कब्जा कर रखा है। हालांकि, चीन ने भारत की आपत्तियों को सिरे से खारिज कर दिया और बीजिंग में OBOR की शुरुआत के मौके को भव्य बनाने के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सहित 29 देशों के मुखिया मौजूद थे। OBOR को हर देश कितने बड़े मौके के तौर पर देख रहा है, इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम के प्रतिनिधि भी इस मौके पर मौजूद थे। इसके बावजूद भारत का इस पूरे आयोजन का बहिष्कार करना बड़ी बात थी। इतना ही नहीं भारत में भी बड़े जानकार इस मसले पर भारत के अकेले पड़ने को लेकर चिन्तित हैं। विदेशी मामलों के जानकार कांति बाजपेई लिखते हैं चीन के बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव से बाहर रहकर भारत ने खुद को अकेला कर लिया है। OBOR के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से CPEC को लेकर भारत के एतराज पर कांति बाजपेई लिखते हैं कि चीन ने 1963 से भारत की जमीन पर कब्जा जमा रखा है। भारत ने चीन के साथ कारोबार बंद तो नहीं कर दिया।
तार्किक लिहाज से देखें, तो कांति बाजपेई की बात सही लगती है। लेकिन, मुझे लगता है कि भारत की सम्प्रभुता और सामरिक लिहाज के अलावा आर्थिक नजरिए या मौके के लिहाज से भी भारत का OBOR में शामिल नहीं होना बेहतर फैसला है। चीन की असली चिन्ता ही यही है कि तरक्की की रफ्तार के मामले में दुनिया में सबसे आगे रहे और अब जो दिख रहा है, उसमें भारत सबसे तेज तरक्की करने वाला देश बन रहा है। हालांकि, चीन भारत से 5 गुना बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन, अगर भारत सबसे तेज तरक्की करने वाला देश लगातार बन गया, तो दुनिया के निवेशक और रेटिंग एजेंसियां चीन को कमतर करके देखने लगेंगी। इसी आशंका को खारिज करने के लिए चीन OBOR लेकर आया है। विकसित देशों अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम की कम्पनियों को इसमें मौके दिख रहे हैं। जबकि, रूस इसका इस्तेमाल अमेरिका के खिलाफ चीन और पाकिस्तान का एक गठजोड़ बनाकर करना चाह रहा है। इस लिहाज से रणनीतिक, सामरिक या आर्थिक तीनों ही दृष्टिकोण से OBOR भारत के लिए बेकार है।
भारत को अपनी आर्थिक या सामरिक मजबूत के लिए देश से बाहर ऐसी किसी योजना में शामिल होने की जरूरत नहीं है। भारत सरकार को OBOR की बजाए EWHW पर ध्यान देना चाहिए। OBOR में सुरक्षा के लिहाज से खतरे की आशंका इतनी ज्यादा है कि चीन की 71% कम्पनियां शी जिनपिंग की इस अतिमहत्वाकांक्षी योजना में राजनीतिक खतरे देख रही हैं। अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इराक, सीरिया और यमन से होकर गुजरने वाले इस रास्ते के बनने में ढेरों मुश्किलें हैं। बीजिंग के शोध संस्थान सेंटर फॉर चाइना एंड ग्लोबलाइजेशन के सर्वे में 300 कम्पनियां शामिल हुईं थीं। इसीलिए भारत और भारतीय कम्पनियों के लिए OBOR की बजाए EWHW ही काम का है। EWHW मतलब एवरीवेयर हाईवे। भारत में पहली बार अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने हाईवे के महत्व को समझा और स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के जरिए देश को जोड़ा। दिल्ली-कोलकाता, कोलकाता-चेन्नई, चेन्नई-मुंबई और मुंबई-दिल्ली को जोड़कर बने 5846 किलोमीटर के हाईवे से लगभग देश का हर बड़ा शहर जुड़ गया था। 6 जनवरी 1999 को इसकी आधारशिला रखी गई थी और जनवरी 2012 में ये परियोजना पूरी हो गई थी। यही वो सड़क परियोजना थी, जिसके बाद आम भारतीय सड़क के जरिए एक शहर से दूसरे शहर फर्राटा भरने लगा था। इसके पहले तक मौर्य शासक चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में बनी और मुगल बादशाह शेरशाह सूरी की ठीक कराई 2 लेन और कहीं-कहीं तो सिंगल लेन वाली ग्रांड ट्रंक रोड (जीटी रोड) से ही भारत यात्रा धीरे-धीरे खिसकता रहा। स्वर्णिण चतुर्भुज ने हिन्दुस्तानियों को 4-6 लेन की सड़क पर झूमते हुए मस्ती से यात्रा का आनन्द लेना सिखाया। दुनिया की कार कम्पनियों के लिए सबसे पसन्दीदा ठिकाना भी भारत इन्हीं हाईवेज की वजह से बना। मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे से शुरू हुआ ये सफर अभी उत्तर प्रदेश में ग्रोटर नोएडा से आगरा को जोड़ने वाले यमुना एक्सप्रेस वे और आगरा से लखनऊ को जोड़ने वाले एक्सप्रेस वे तक पहुंच चुका है। लेकिन, इसके बाद EWHW की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश की कुल सड़कों में हाईवे की हिस्सेदारी 2% से भी कम की है। जबकि, इन्हीं 2% सड़कों पर देश के 40% यातायात का दबाव है। संसद में सरकार की ओर से बताया गया है कि 2013-14 में 4,260 किलोमीटर, 2014-15 में 4,410 किलोमीटर और 2015-16 में 6,061 किलोमीटर का राष्ट्रीय राजमार्ग बनाया गया। इस लिहाज से सड़कों के बढ़ने का आंकड़ा देखा जाए, तो 1951 से लेकर 2015 तक सालाना 4.2% की रफ्तार से सड़कें बढ़ी हैं। लेकिन, एवरीवे हाईवे का मतलब सिर्फ और सिर्फ सड़कें बनाना नहीं है। इसका मतलब जहां, जिस रास्ते से कोई जाना चाहे, उसकी यात्रा सुगम, सुखद होनी चाहिए। फिर वो सड़क मार्ग हो, रेल मार्ग हो या फिर जल मार्ग।
अच्छी बात ये है कि सड़क परिवहन, हाईवे और पोत परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की गिनती मोदी सरकार के सबसे अच्छा काम करने वाले मंत्रियों में होती है। मोदी सरकार में प्रतिदिन 22 किलोमीटर हाईवे बन रहा है और गडकरी इसे 30 किलोमीटर प्रतिदिन तक ले जाना चाहते हैं। स्वर्णिम चतुर्भुज की ही तर्ज पर मोदी सरकार अब भारतमाला परियोजना शुरू कर रही है। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी इसके तहत 20000 किलोमीटर हाईवे बनाकर पूरे देश को एक माला में पिरोने की बात कर रहे हैं। इस परियोजना की अनुमानित लागत 10 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है। भारतमाला परियोजना की सबसे बड़ी बात ये है कि ये हाईवे देश के किनारे-किनारे बनेंगे और कई जगहों पर अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से सटे होंगे। नितिन गडकरी का कहना है कि हम सभी जिला मुख्यालयों को हाईवे से जोड़ेंगे। सड़क परिवहन मंत्रालय की एक और महत्वाकांक्षी परियोजना है चारधाम हाईवे विकास की। जिसकी बुनियाद प्रधानमंत्री रख चुके हैं। चारधाम महामार्ग विकास परियोजना के तहत 900 किलोमीटर हाईवे बनेगा। इसकी अनुमानित लागत 12000 करोड़ रुपये की है। इसमें से 3000 करोड़ रुपये की मंजूरी पहले ही दी जा चुकी है। इनलैंड वॉटर बिल 2016 को मंजूरी मिलने के बाद जल परिवहन में भी तेजी आने की उम्मीद की जा सकती है। इस नए कानून की मंजूरी के समय नितिन गडकरी ने बताया कि देश में 111 नदियां ऐसी हैं, जिनमें जल परिवहन की सम्भावना है। इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि अगर सम्भावित नदियों में से दसवें हिस्से पर भी जल परिवहन शुरू किया जा सका, तो भारतीय परिवहन की तस्वीर कितनी तेजी से बदल सकती है।
रेलमंत्री सुरेश प्रभु भी मोदी सरकार के अच्छे मंत्रियों में गिने जा रहे हैं। तेज रफ्तार ट्रेनें चलाने के लिए पटरियों को बदलने के साथ रेलवे स्टेशनों के भी कायाकल्प की बड़ी योजना तैयार की गई है। रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने देश के 283 रेलवे स्टेशनों को रीडेवलपमेंट प्रोग्राम के लिए चुना है। पहले चरण में 23 रेलवे स्टेशनों का काम शुरू हो चुका है। लोकमान्य तिलक मुम्बई, पुणे, ठाणे, विशाखापत्तनम, हावड़ा, कानपुर सेंट्रल, इलाहाबाद, कामाख्या, फरीदाबाद, जम्मू तवी, उदयपुर शहर, सिकन्दराबाद, विजयवाड़ा, रांची, चेन्नई सेंट्रल, कोझीकोड, यशवन्तपुर (बैंगलुरू), भोपाल, मुम्बई सेंट्रल, बांद्रा टर्मिनस, बोरीवली और इन्दौर वो 23 स्टेशन हैं, जिनका कायाकल्प पहले चरण में होना है। दूसरे चरण में 100, तीसरे और आखिरी चरण में 250 रेलवे स्टेशनों के कायाकल्प का काम शुरू होगा। सभी स्टेशनों के कायाकल्प का काम इसी साल के अंत तक शुरू होना है। तेज रफ्तार वाली तेजस ट्रेन शुरू हो चुकी है। इसलिए सरकार को देश की आर्थिक तरक्की, रोजगार देने के लिहाज से सरकार को देश के लिहाज से बेकार OBOR छोड़कर EWHW पर ही मिशन मोड में लग जाना चाहिए।

Sunday, September 13, 2015

लाल बत्ती की जरूरत क्या है

देश में किसी भी समस्या के लिए सबसे आसानी से अगर किसी एक बात को दोषी ठहराया जाता है, तो वो है लालफीताशाही। देश के अंदर भी और देश के बाहर भी ये सामान्य धारणा है कि भारत में लालफीताशाही की वजह से चीजें अपनी रफ्तार में नहीं चल पाती हैं। हर सरकार लालफीताशाही खत्म करने की बात भी कहती है। लेकिन, देश में उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुए करीब ढाई दशक होने के बाद भी लालफीताशाही अपनी जगह बनी हुई है। नरेंद्र मोदी की सरकार जब बनी थी, तो नरेंद्र मोदी ने बार-बार ये कहा कि लालफीताशाही खत्म करना उनकी प्राथमिकता है। इसे और आगे ले जाते हुए उन्होंने कहा कि हम हर दिन एक गैरजरूरी कानून खत्म करेंगे। नरेंद्र मोदी ने धीरे-धीरे वो किया भी है। और अब नितिन गडकरी ने एक ऐसा प्रस्ताव आगे बढ़ाया है, जो लागू हुआ तो शायद लालफीताशाही को सही मायने में खत्म करने वाला सबसे बड़ा फैसला होगा। लालफीताशाही दरअसल किसी फाइल पर लाल निशान लगाने, काम को रोकने से संबंध रखती है। लेकिन, लालफीताशाही ये भी है कि देश में अंबैसडर कारों, आज के संदर्भ में दूसरी कंपनियों की कारों, एसयूवी पर चमकती लाल बत्तियां सड़कों पर एक खास प्रभुत्व के दर्शन कराती रहती हैं। देश को आजाद हुए करीब सत्तर साल हो गए। लेकिन, अंग्रेजों के जमाने की ये लाल बत्ती वाली सत्ता की निशानी देश में वीआईपी होने का सबसे बड़ा अहसास है। ऐसे में जब भूतल परिवहन मंत्री केंद्र सरकार में इस बात पर सहमति बनाने की कोशिश की है कि देश में लालबत्ती गाड़ियों की संख्या लगभग खत्म कर दी जाए। तो, लगता है कि नरेंद्र मोदी की इस सरकार में मंत्रियों का दृष्टिकोण बेहतर है। नितिन गडकरी नरेंद्र मोदी सरकार में सबसे ज्यादा कामकाजी मंत्रियों में से हैं। नितिन गडकरी अपने मंत्रालय में काम कर रहे हैं। और इसी काम करने में नितिन गडकरी ने लाल बत्तियों वाली कारों की संख्या सीमित करने प्रस्ताव आगे बढ़ाया है। इस प्रस्ताव में नितिन गडकरी ने राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही लाल बत्ती की विशेषाधिकार देने की बात की है। इसके अलावा राज्यों में लाल बत्ती वाली गाड़ी के इस्तेमाल का अधिकार सिर्फ राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही देने की बात की गई है। इसे कानून बनाने से पहले नितिन गडकरी ने सभी मंत्रालयों को भी ये प्रस्ताव भेजा है। और अच्छी बात ये है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस प्रस्ताव को लागू करने पर सहमति जताई है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी लाल बत्ती का इस्तेमाल कम से कम करने के इस प्रस्ताव पर सहमति जताई है। चर्चा है कि नितिन गडकरी ने जब प्रधानमंत्री से इस प्रस्ताव को लागू करने की बात की, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी मंत्रालयों से चर्चा करके इसे लागू करने की सलाह दी है। अब अगर ये कानून लागू हो जाता है, तो कल्पना की जा सकती है कि भारतीय सड़कों से इस वीवीआईपी क्लास के गायब होने से लालफीताशाही कितनी आसानी से कम की जा सकती है। इस प्रस्ताव को अलग तरीके से इसलिए भी देखना चाहिए क्योंकि, अकसर इस बात की चर्चा होती है। या ये कहें कि सांसदों, मंत्रियों की आलोचना होती है कि अपनी तनख्वाह, अपने भत्ते बढ़ाने के लिए खुद ही प्रस्ताव पास कर लेते हैं। लागू कर देते हैं। अब अगर एक सरकार अपने ही मंत्रियों को लाल बत्ती के विशेषाधिकार से बाहर कर रही है, तो इसकी चर्चा बड़े बदलाव के तौर पर होनी चाहिए। लाल बत्ती के इस प्रस्ताव के लागू होने के बाद खुद भूतल परिवहन मंत्री भी लाल बत्ती के अधिकारी नहीं रह जाएंगे। इसलिए भी इसे बड़े बदलाव के तौर पर देखा जाना चाहिए।


लाल बत्ती वाली गाड़ियों का इस्तेमाल किस कदर होता है। इसके बारे में भारत में किसी को शायद ही कुछ बताने की जरूरत हो। ज्यादातर भारतीयों को अपने जीवन में कई बार लाल बत्ती की महत्ता, सत्ता का अहसास होता ही होता है। राज्यों में तो लाल बत्तियों की महत्ता इस कदर होती है कि राजनीति में बरसों से लगे नेताओं में मंत्री न बन पाने के बाद किसी ऐसी संस्था का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष बनने की होड़ लग जाती है जिसमें लाल बत्ती वाली गाड़ी जरूर मिल जाए। या फिर सरकार उनको दिए पद को ही राज्य मंत्री का दर्जा देकर उन्हें लाल बत्ती दे देती है। अब अगर केंद्र सरकार के मंत्री को भी लाल बत्ती का अधिकार नहीं रहेगा। तो, इस तरह से पिछले दरवाजे से लाल बत्ती के लिए कतार लगाए खड़े लोग भी हतोत्साहित होंगे। लाल बत्ती की सत्ता की महत्ता इस कदर कष्ट देने लगी थी कि 2013 में सर्वोच्च न्यायालय को सरकार से ये कहना पड़ा कि लाल बत्तियों की संख्या घटाई जाए। और नई सूची सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी जाए। कमाल की बात ये है कि आजादी के सत्तर साल बाद देश के सर्वोच्च न्यायालय को गुलामी की प्रतीक लाल बत्तियों पर ये टिप्पणी करनी पड़ी। अच्छा है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार लाल बत्ती के विशेषाधिकार को लगभग खत्म करने की सोच रही है। लाल बत्ती के साथ लगे हाथ लाल बत्ती के विशेषाधिकार वाली गाड़ियों में चलने वालों के लिए लगने वाले रूट का भी सिस्टम खत्म किया जाना चाहिए। रूट का मतलब ये कि ये लाल बत्ती वाले मंत्री लोग जिस रास्ते से जाते हैं उस रास्ते को पूरी तरह से लोगों के लिए रोक दिया जाता है। अच्छा लगता है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चंडीगढ़ में एक कार्यक्रम में जाते हैं। और लोगों से क्षमा मांगते हैं कि उनके कार्यक्रम की वजह से लोगों को कष्ट हुआ। लेकिन, ये सरकार नियमित व्यवहार का हिस्सा होना चाहिए। अगर ये हो पाया तभी शायद नरेंद्र मोदी के मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस की बात साकार हो पाएगी। इक्कीसवीं सदी में तो लाल बत्ती की ये लालफीताशाही बर्दाश्त के बाहर है। 

Thursday, January 19, 2012

बीजेपी के लिए उमा फैक्टर कितने काम का ?

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी राजनीति बिल्कुल कारोबार की तरह कर रहे हैं। कब, कहां, कितना और किसका निवेश करना है। ये इससे तय करते हैं कि उस निवेश से कितना मुनाफा हो पाएगा। बड़ी कंपनियां, बड़े कारोबारी अकसर बड़े निवेश लंबे समय के मुनाफे और हित को ध्यान में रखकर करते हैं लेकिन, नितिन गडकरी राजनीति में शायद बड़े हो नहीं पाए हैं। इसीलिए छोटे हित और छोटी अवधि के हितों के मुताबिक, फैसले कर रहे हैं।
2-5 सीट जिताने के समीकरण के आधार पर दागी- भ्रष्टाचारी, अपराधी- चलेगा। क्यों, नजर इसी विधानसभा चुनाव पर जो, है। ऐसी ही 2-2, 5-5 सीटों के आधार पर गडकरी की बीजेपी हो सकता है कि यूपी में 51 से आगे कुछ सीटें जीत ले। लेकिन, कांग्रेस या क्षेत्रीय पार्टियों को जिन मुद्दों पर बीजेपी घेरती थी। उनमें से कोई भी मुद्दा अब बीजेपी के पास नहीं है। वजह, छोटे और छोटी अवधि के हितों के लिए गडकरी ऐसे कर्जे ले ले रहे हैं जो, शायद उतार पाना इस राजनीतिक कंपनी भारतीय जनता पार्टी के लिए संभव नहीं होगा। भले ही ये राजनीतिक कंपनी फिलहाल की चुनौती पार कर ले। गडकरी संघ प्रमुख भागवत की पसंद हैं। और, संघ स्थापना से लेकर अब तक कभी हड़बड़ी में नहीं दिखता। कभी ऐसे फैसले नहीं लेता, न अपने स्वयंसेवकों को ऐसे फैसले लेने के लिए उकसाता या कहता है कि वो, छोटी अवधि के हित तो, हो जाएं। लेकिन, लंबे समय की साख को खतरा पहुंचा दे। लेकिन, उसी संघ के पूर्ण समर्थन वाले नितिन गडकरी ये पता नहीं क्यों समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाहते।
इतने बड़े आंदोलन के बाद का चुनाव था। लेकिन, नितिन गडकरी के शॉर्ट टर्म निवेश और मुनाफे वाले फैसलों से बीजेपी पहले ही पिछड़ गई। अब भ्रष्टाचार, अपराध का कर्ज लेकर उमा भारती को बीजेपी की यूपी यूनिट के सीईओ की दौड़ में फिर से लगा दिया। उमा भारती नितिन गडकरी से अति प्रसन्ना थीं कि किसी तरह राजनीतिक संक्रमण सम्मान पूर्वक गडकरी ने खत्म करने में मदद की और उन्हें बीजेपी में ले आए। फिर बेहद नाराज हुईँ कि सारा कार्यकर्ताओं का जोश खत्म कर दिया। कार्यकर्ता छोड़ गडकरी दूसरी पार्टी के लतियाए लोगों को टिकट देने में जुट गई। उमा भारती ने चुनाव प्रचार से दूर तक रहने की बात कर दी। बादशाह सिंह और बाबू सिंह कुशवाहा के खिलाफ पूरा दम लगाकर भी उमा भारती गडकरी के फैसले को बदल नहीं सकीं। और, अब आखिरकार गडकरी ने कारोबारी कौशल दिखाते हुए उमा भारती को मना लिया कि वो, चुनाव लड़ें।
राजनीतिक जमीन बचाने के संकट से जूझ रहीं उमा भारती के पास शायद कोई विकल्प नहीं है। इसीलिए उमा ने मान भी लिया। लेकिन, अब संघ सोचे कि ऐसे छोटे हितों वाले फैसले से गडकरी बीजेपी को क्या बना रहे हैं और, क्या उसमें संघ परिवार से निकले कार्यकर्ताओं के लिए जगह बचेगी। और, जगह बचेगी भी तो, क्या मजबूर संघ विचार के नेताओं के लिए ही। संघ विचार-परिवार के नेताओ को मजबूर करके ही बीजेपी में लाना है तो, फिर बीजेपी की जरूरत ही क्या है। इस सवाल पर संघ को अच्छे से सोचना होगा।

Thursday, December 24, 2009

मराठी भाजपा अध्यक्ष की चुनौतियां


भारी भरकम शरीर वाले नितिन गडकरी का भाजपा अध्यक्ष बनना कई मायनों में एतिहासिक है। वैसे तो नितिन गडकरी संघ के पूर्ण आशीर्वाद की वजह से ही उस कुर्सी पर बैठ पाए हैं जिस पद के जरिए अटल बिहारी वाजपेयी-लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जैसे भाजपा के दिग्गजों ने पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे तक पहुंचा दिया और, कांग्रेस का विकल्प भाजपा बन गई। गड़करी सिर्फ 52 वर्ष के हैं और भाजपा के इतिहास में सबसे कम उम्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। गडकरी मराठी हैं और संघ मुख्यालय नागपुर में होने के बावजूद पहली बार संघ ने किसी मराठी के लिए प्रतिष्ठा लगाई है।


इतनी एतिहासिक परिस्थितियों में कुर्सी संभालने वाले गडकरी अब आगे इतिहास बनाएंगे या खुद इतिहास में ठीक तरीके से दर्ज भी नहीं हो पाएंगे। गडकरी का नाम जब राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए पहली बार सामने आया था तो, राष्ट्रीय मीडिया में एक सुर था-- मरती भाजपा के लिए आत्मघाती कदम। राज्य स्तर के नेता को राष्ट्रीय दर्जा देने की संघ की कोशिश की खूब आलोचना हुई थी। लेकिन, गडकरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही गडकरी के लिए फ्लाईओवर मैन, विकास पुरुष जैसे नारे सुर्खियां बन गए। टीवी चैनलों पर गडकरी का स्कूटर से वोट डालने वाला दृष्य भी खूब दिखाया। गडकरी को इस चुनौती को समझना होगा। मीडिया से संबंध बेहतर रखें लेकिन, सिर्फ और सिर्फ काम करना होगा। भाजपा की जगह आज भी है लेकिन, माहौल अच्छा नहीं है। खुद की राष्ट्रीय छवि तैयार करनी होगी।


गडकरी की सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि वो, दिल्ली दरबार के उन माहिर खिलाड़यों को पटकनी देकर भाजपा के मुखिया बने हैं जो, पिछले एक दशक से दिल्ली की राजनीति का रास्ता बनाते बिगाड़ते रहे हैं। भले ही आंतरिक संतुलन बनाए रखने के लिए आडवाणी को घर के बड़े बुजुर्ग जैसे भाजपा संसदीय समिति के चेयरमैन का पद दे दिया गया और सुषमा को लोकसभा और जेटली को राज्यसभा में भाजपा का मुखिया बना दिया गया। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये दोनों नेता खुद को आडवाणी के बाद पार्टी के स्वाभाविक मुखिया के तौर पर देख रहे थे। यहां तक कि गडकरी की ताजपोशी के पहले तक पार्टी कार्यकर्ता भी इन्हीं में से किसी की ताजपोशी तय मान रहे थे। इसीलिए जब गडकरी का नाम तय हो गया तो, सुषमा स्वराज ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि उन्होंने और भाजपा के कुछ दूसरे नेताओं ने अध्यक्ष बनने से मना किया तब गडकरी का नाम आया। यानी गडकरी दूसरे दर्जे के नेता हैं जो, आज की बीजेपी के पहले दर्जे के नेताओं की छोड़ी सीट पर बैठ रहे हैं। गडकरी की सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली दरबार के नेताओं से तालमेल बिठाते हुए इसी पहले दर्जे में खुद को स्थापित करने की होगी।


ठीक पहले के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के कार्यकाल से भी नितिन गडकरी सबक ले सकते हैं। राजनाथ सिंह देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश से आते हैं। और, अध्यक्ष बनते समय यही राजनाथ सिंह के मजबूत पक्ष को दिखा रहा था। लेकिन, कार्यकाल खत्म होते-होते साफ हो गया कि राजनाथ के समय में बीजेपी की देश में जो दुर्गति हुई सो हुई- उत्तर प्रदेश में पार्टी पहले-दूसरे की लड़ाई से नीचे उतरकर तीसरे नंबर पर पहुंच गई। अब गडकरी के सामने दो राज्यों में भाजपा का प्रभाव फिर से स्थापित करना तुरंत की चुनौती होगी। पहला उत्तर प्रदेश और दूसरा अपने गृह राज्य महाराष्ट्र में।


उत्तर प्रदेश में नया नेतृत्व तलाशना गडकरी के लिए सबसे मुश्किल काम होगा। बीजेपी में अब तक कद्दावर रहे नेताओं की लाइन एक दूसरे की इतनी छीछालेदर कर चुकी है कि वो, चाहकर भी किसी एक के साथ चल नहीं पाएंगे। ऐसे में गडकरी को कोई ऐसा नेतृत्व खोजना होगा जिसे संघ का आशीर्वाद मिले और जो, नौजवानों की टीम खड़ी कर सके। उत्तर प्रदेश में भाजपा के संगठन मंत्री नागेंद्र नाथ गडकरी के लिए बेहतर दांव साबित हो सकते हैं। नागेंद्र नाथ संघ के प्रचारक हैं। उनके समय में ही विद्यार्थी परिषद राज्य के हर विश्वविद्यालय में प्रभावी स्थिति में पहुंची। और, परिषद-कैडर के प्रत्याशियों को पिछले विधानसभा चुनाव में आजमाने की उन्होंने काफी कोशिश पिछले विधानसभा चुनाव में की भी थी। लेकिन, बसपा की सोशल इंजीनियरिंग और भाजपा के नेताओं की आपसी मारामारी में अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सका।


उत्तर प्रदेश से भी बड़ी चुनौती गडकरी के लिए महाराष्ट्र में होगी। क्योंकि, महाराष्ट्र में जाकर भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी को शिवसेना जैसी क्षेत्रीय पार्टी के पीछे चलना पड़ता है। यही वजह है कि मुंबई हमले और उत्तर भारतीयों पर राज ठाकरे के हमले के बावजूद भाजपा के कमल पर कांग्रेस का हाथ भारी पड़ गया। अच्छी बात ये है कि महाराष्ट्री की राजनीति को नजदीक से देखने वाले खूब जानते हैं कि गडकरी हमेशा महाजन-ठाकरे गठजोड़ के खिलाफ खड़े होकर मजबूत होते रहे। अब गडकरी को राज्य में गोपीनाथ मुंडे और विनोद तावड़े से संतुलन साधना होगा। और, साथ ही संकीर्ण ठाकरे छाया से भाजपा को मुक्त कराना होगा। गडकरी मराठी हैं और इसलिए कुछ समय पहले तक सिर्फ उत्तर भारत की मानी जाने वाली पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर महाराष्ट्र में मराठी-उत्तर भारतीय वोटबैंक को बेहतर तरीके से साध सकते हैं। 


भाजपा शासित राज्यों में सत्ता-संगठन तालमेल के लिए गडकरी को नए सिरे से योजना बनानी होगी। कर्नाटक में येदियुरप्पा का हाथ मजबूत करना होगा जिससे फिर कभी रेड्डी भाइयों की ब्लैकमेलिंग के फंदे में भाजपा न फंसे। गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में बेहद मजबूत मुख्यमंत्रियों की सत्ता में भाजपा संगठन खत्म न हो जाए इसकी चिंता भी गडकरी को करनी होगी। उत्तराखंड में कोश्यारी-खंडूरी की कलह अभी खत्म नहीं हुई है तो, राजस्थान में अब तक पार्टी के पास वसुंधरा राजे का विकल्प नहीं बन सका है।


इन सारी चुनौतियों के अलावा गडकरी के लिए संघ-भाजपा का संतुलन बनाए रखना भी कम बड़ी चुनौती नहीं होगी। वैसे, अभी भाजपा भले ही 116 सांसदों वाली और कई राज्यों में शासन वाली पार्टी हो लेकिन, सच्चाई यही है कि संघ कैडर लगभग भाजपा से दूरी बना चुका है। उसे वापस लाया जा सकता है इसके लिए कैडर को ये दिखना चाहिए कि संघ का कहा भाजपा अभी भी मानती है। ये खुद गडकरी की ताजपोशी से साबित भी हो चुका है। और, अब आने वाला समय ये तय करेगा कि सबसे कम उम्र सर संघचालक और सबसे कम उम्र भाजपा अध्यक्ष इतिहास में किस तरह से नाम दर्ज कराते हैं।



(ये लेख राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...