देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Thursday, July 14, 2011
एक बार थम क्यों नहीं जाता देश
मीडिया मजबूरी में या ये कहें कि और करे भी तो, क्या। अब यही चलाना-दिखाना है कि मुंबई के जज्बे को सलाम। आखिरकार जिंदादिल मुंबई के लोगों ने आतंक को फिर से मात दे दी। कुछ 22 प्वाइंट की मामूली सेंसेक्स की बढ़त ने एक और हेडलाइन ये भी दे दी कि आतंक को शेयर बाजार का करारा जवाब। लेकिन, क्या सचमुच ऐसा हुआ है। क्या सच्चाई यही है कि मुंबई या फिर शेयर ने आतंक को करारा जवाब दिया है। देश में अगर कश्मीर के बाद कहीं के लोगों के सीने में सबसे ज्यादा आतंकी घाव पक रहा है तो, वो मुंबई शहर ही है। देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर की मजबूरी को लोगों खासकर हम मीडिया वालों ने जबरदस्ती बहादुरी बनाने की कोशिश बार-बार की है। और, इसे आतंक से लड़ने के लिए जरूरी सकारात्मक सोच साबित कर दिया है।
11/7/2006 के ट्रेन धमाके हों या फिर 26/11/2008 के ताज और मुंबई के दूसरे अहम ठिकानों पर हुए आतंकी हमले हों। मीडिया में लाख ये बात साबित करने की कोशिश की जाए कि हमलों के तुरंत बाद मुंबई के जिंदादिल लोग उठ खड़े होते हैं। मुंबई कभी थमती नहीं, ये जज्बा दिखाते हैं। लेकिन, इन दोनों धमाकों के समय इन घटनाओं को नजदीक से महसूस करने और मुंबई के लोगों की हालत देखकर लगा कि ये मीडिया बार-बार तय तरीके से मुंबई के लोगों को अपने घाव का इलाज करने के बजाए उसे दबाने, घाव में मवाद बनने को मजबूर कर देता है। ये थोपी गई जिंदादिली ही है कि लोगों का गुस्सा बाहर आने पर एक सामूहिक सहमति की रोक हावी हो जाती है। 11/7 के सीरियल लोकल ट्रेन ब्लास्ट के काफी दिन बाद मैं लोकल से लोवर परेल स्टेशन से ठाणे जा रहा था। अचानक बीच के एक स्टेशन पर अफवाह फैली, ट्रेन में बम है। और, मीडिया में कभी थमती न दिखने वाले मुंबईकर ऐसे थमे कि 3 सेकेंड भी नहीं लगे होंगे और पूरी ट्रेन खाली हो गई। मैं खुद फुर्ती देखकर भी हैरान था कि इतनी तेजी से कैसे में लोकल के डिब्बे से स्टेशन पर आ गया।
26/11 के हादसे के समय और उसके बाद भी मुंबई के लोगों की सांसें थमी की थमी रह गईं थीं। लेकिन, डर, आतंक की बात करना तो, देश में निराशा फैलाना वाला माना जाता। और, जब झूठे साहसी बनना हो तो, भला कोई क्यों पीछे रहता। लोगों को गुस्सा तक दिखाने की इजाजत नहीं थी। पता नहीं कैसे समाचार चैनलों और अखबारों में बिना कहे ये सहमति बन जाती है कि इस समय लोगों का गुस्सा मत दिखाइए, पॉजिटिव स्टोरी दिखाइए। जिसने घायल लोगों को धमाके के बीच से निकालकर अस्पताल पहुंचाया हो, उसे हीरो बना दीजिए। एक-दो कॉमनमैन यानी आम आदमी को हीरो बना-दिखाकर मीडिया लोगों का गुस्सा दबा देती है। लोग हीरोइक स्टोरी में फंस जाते हैं और आतंकवादी फिर से ढेर सारे आम आदमियों को मौत के घाट उतारने की तैयारी करने में लग जाते हैं। हमें ऐसा बना दिया गया है कि अब कुछ दिन ही लगता है किसी आतंकी हमले को भूलने में। मीडिया में बरसी की खबरों से भले याद आ जाए।
गुस्सा बाहर न आने देने साजिश और लोगों की जिंदादिल बनाए रखने की साजिश ऐसी हावी होती है कि लोग मजबूरी में आंसू पीकर मुस्कुराने लगते हैं। फिर भावनात्मक कहानियां खोजी जाने लगती हैं। मोमबत्ती जलाए कुछ लोगों के शॉट्स दिखाकर ही आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की मजबूती मान ली जाती है। और, आतंकवाद के असली मुद्दे से लोगों का ध्यान ही भटक जाता है। कौन बताए-समझाए कि अरे, मजबूरी है भइया। इसलिए जिंदादिल नजर आते हैं। ऐसे जिंदादिल कि कांग्रेस के वही महासचिव राहुल गांधी जो, भट्टा-पारसौल में किसानों पर जमीन अधिग्रहण के मामले में मायावती सरकार के खिलाफ रात के अंधेरे में गांव में चुपचाप घुसकर लड़ाई का एलान कर देते हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का एलान और उसके बाद कौन सी लड़ाई राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने लड़ी है। उस पर राहुल गांधी मुंबई हमलों पर बयान दे देते हैं कि एक-दो हमले रोके नहीं जा सकते। इराक-ईरान में तो, ऐसे हमे रोज होते रहते हैं। लेकिन, हम हिंदुस्तानियों पर तथाकथित जिंदादिली ऐसी हावी है कि हम राहुल गांधी के बयान पर भी गुस्सा नहीं होते। इस बात पर भी गुस्सा नहीं होते कि पूरी कांग्रेस पार्टी इस बयान को सही साबित करने में जुट जाती है।
इस बात पर भी हम हिंदुस्तानी अपनी जिंदादिली का त्याग नहीं कर पाते। मीडिया ये चिल्लाने लगता है कि मुंबई में धमाके के बाद हो रही बारिश से सारे सबूत धुल जाने के अंदेशा है। पता नहीं हम ये याद क्यों नहीं कर पाते कि आखिर अब तक सारे सबूत मिलने के बाद भी क्यों नहीं एक भी आतंकी को उसके किए की सजा हम दे पाए। कसाब, अफजल गुरू जैसे लोग हमारी जेल में होते हुए भी हमारे खास मेहमान से बढ़कर हैं। आंकड़े आते रहते हैं कि कसाब पर हर रोज करीब एक करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। स्पेशल कोर्ट, फास्ट ट्रैक कोर्ट ये सब आतंकियों को सजा सुनाकर फांसी के फंदे तक क्यों नहीं पहुंचा पातीं। जवाब साफ है क्योंकि, कांग्रेस के युवराज को लगता है कि ऐसे एक दो हमले तो रोके नहीं जा सकते। एक दिन मुकर्रर करके सरकार देश की सभी जेलों में बंद आतंकवादियों को एक साथ क्यों फांसी के फंदे पर लटकाती।
लेकिन, ऐसा भला कैसे हो सकता है। मुंबई हमले के करीब 48 घंटे बाद आतंरिक सुरक्षा सचिव बयान दे देते हैं कि सभी आतंकी संगठनों पर साजिश का शक है। अब समझ लीजिए, किसी पर और कैसे कार्रवाई हो सकती है। फिर बात तो, वही है ना कि, जब ऊपर से संदेश आतंकवाद को राजनीतिक फायदे के रूप में इस्तेमाल करने का हो तो, कार्रवाई कौन और कैसे करेगा। खैर, इस सरकार का जो, अंदाज है वो, साफ कह रहा है कि हिंदुस्तानियों आदत डाल लो। मुंबईकरों आदत डाल लो। हम तुम्हारे न थमने वाले जज्बे की तारीफ करते रहेंगे। तुम अपने कुछ लोगों को खोकर, फिर से सुबह काम के लिए चल पड़ना। क्योंकि, मुंबई-दिल्ली में क्या उदारीकरण के बाद देश के किसी भी हिस्से में कितने भी बड़े हादसे के गम जो, रुक जाएगा-थम जाएगा। बगल वाला वैश्वीकरण वाले इंडिया में एक पायदान ऊपर चला जाएगा। काश एक बार आतंकवाद के दिए जख्म से मुंबई थम जाए, देश थम जाए तो, शायद इसका कुछ इलाज निकल सके। क्योंकि, अब तो देश के सबसे ताकतवर शख्स के तौर पर स्थापित राहुल गांधी भी ये साफ कह रहे हैं ऐसे हमले रोकने की क्षमता उनमें और उनकी सरकार में नहीं है।
Friday, November 27, 2009
अब कितनी सनसनी होती है
रात के करीब साढ़े दस बजे थे। दफ्तर की छत पर खुले में बैठकर हम खाना खाने जा ही रहे थे। पहला कौर उठाया ही था कि संपादक जी का फोन आ गया।
हर्ष, कोई गोलीबारी की खबर है क्या।
नहीं सर, ऐसे ही कुछ हल्की-फुल्की झगड़े की खबर थी मैंने देखा था लेकिन, शायद हमारे चैनल के लिहाज से खास नहीं थी।
नहीं देखो शायद कोई बड़ी गैंगवॉर है या कोई आतंकवादी हमला है।
खाना छोड़कर मैं तुरंत भागकर न्यूजरूम में पहुंचा तो, हर चैनल पर वही खबर थी। कहीं पर दो माफिया गुटों के बीच भयानक गोलीबारी की खबर थी तो, कहीं कुछ और ... कोई भी चैनल एकदम से नहीं बता पा रहा था कि हुआ क्या है।
तब तक फिर संपादक जी का फोन आ गया था।
हर्ष, कौन-कौन है ऑफिस में।
अभी तो सर, गिने-चुने लोग ही बचे हैं। लगभग सब जा चुके हैं। क्या करना है सर
अच्छा देखो खबर पक्की हो जाए तो, फैसला लेते हैं नजर रखो। ये कोई बहुत बड़ी खबर हो गई है।
फोन रखते-रखते अचानक एक न्यूज चैनल पर फ्लैश आया - मुंबई पर हमला। लगा जैसे वज्रपात हो गया। फिर एक साथ गोलियों की तरह ब्रेकिंग न्यूज वाली पट्टी पर लगभग सभी न्यूज चैनलों पर मुंबई पर हमला। लियोपोल्ड कैफे पर गोलीबारी... सांताक्रूज में टैक्सी में धमाका ताज होटल में आतंकवादी घुसे ... ओबरॉय होटल में भी आतंकवादियों के घुसने की आशंका ... ऐसे फ्लैश टीवी स्क्रीन से निकलकर जेहन को जकड़ रहे थे।
मैंने संपादक जी को फोन किया- सर, IBN7 लाइव कट कर लें क्या।
तुरंत कट करो, फिर देखते हैं। PCR के सारे लोग जा चुके थे। एंकर नहीं था। डेस्क पर भी मेरे अलावा एकाध लोग ही थे। सिर्फ टिकर पर एक साथी था। तुरंत फैसला लिया। IBN7 लाइव कट किया और ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी पर जैसे-जैसे खबरें आती गईं सूचना डालने लगे।
तब तक न्यूज चैनलों पर खबर आ चुकी थी कि मुंबई CST पर आतंकवादी गोलीबारी करके भागे हैं। स्क्रीन पर हेमंत करकरे का गाड़ी से उतरकर बुलेटप्रूफ जैकेट और लोहे वाली टोपी पहने तस्वीरें दिखीं। ATS प्रमुख को स्क्रीन पर देखकर समझ में आ गया था ATS हरकत में आ चुकी है। भरोसा हुआ कि अब कुछ घंटे में मामला निपट जाएगा। फिर अचानक कुछ शांति सी लगी। लगा कि आतंकवादी घिनौनी वारदात को अंजाम देकर भाग चुके हैं। लेकिन, वो तूफान के पहले की शांति थी। लाल-लाल ब्रेकिंग न्यूज चमकी ATS प्रमुख हेमंत करकरे शहीद, मुंबई पुलिस के शूटर सालस्कर, डीआईजी अशोक काम्टे शहीद। तेजी में फ्लैश बनाते मेरे रोंगटे खड़े हो गए। खून खुद के शरीर पर दिखने लगा।
बुरी से बुरी खबरें अब आनी शुरू हुई थीं। पता चला ताज को आतंकवादियों ने कब्जे में कर लिया है। ओबरॉय आतंकवादियों के कब्जे में है। मुंबई CST पर भयानक खून खराबा आतंकवादियों ने किया है। नरीमन हाउस भी आतंकवादियों के कब्जे में चले जाने की खबर आई। लगा जैसे पाकिस्तान ने घुसकर हमें मसल दिया हो। खबर ये भी आई कि आतंकवादी पुलिस की एक गाड़ी लेकर उससे भी मौत बरसाते बहुत देर तक घूमते रहे। खैर, थोड़ी ही देर में खूनियों के मरीन ड्राइव पर मरने की खबर भी आई।
बॉसेज से बात की तो, तय हुआ कि सुबह आठ बजे से हम अपना बुलेटिन खोलेंगे। एक बिजनेस न्यूज चैनल सारी रात लाइव था। देश पर हमला जो हुआ था। सारी फ्लैश बनाते थक गया था। आंख में नींद पानी में बालू की तरह भरी हुई थी लेकिन, हमले की वजह से सोने का मन नहीं हो रहा था। सुबह की शिफ्ट आ गई थी लेकिन, आठ का बुलेटिन मैंने खुद ही बनाया था। पूरी रात की टाइमलाइन मुंहजुबानी याद हो गई थी। करीब ग्यारह बजे कमरे पर गया कि थोड़ा आराम कर लूं। लेकिन, फ्रेश होकर, नहा धोकर सोने की लाख कोशिश कामयाब नहीं हुई। एकाध घंटे में ही फिर से ऑफिस में था।
ह्रदयविदारक तस्वीरों को तेजी से चलने लायक बनाने के काम में मैं भी सबके साथ जुट गया। फिर तय हुआ कि हमारे अपने रिपोर्टर भी जाने चाहिए। स्वभावत: रिपोर्टर होने की वजह से वैसे तो, हमेशा रिपोर्टिंग ही करने की इच्छा होती रही। लेकिन, इस मौके पर तो ये इच्छा या यूं कहूं कि आतंकवादियों के खिलाफ जंग में अपनी सामर्थ्य भर शामिल होने की इच्छा जोर मार रही थी। लेकिन, न तो मैं बॉसेद से कह पाया और न ही वो मेरी इस इच्छा को भांप सके या भांपकर भी उन्हें लगाकि ये शो प्रोड्यूस करने, प्रोडक्शन के लिए इस समय ज्यादा उपयोगी है, मुझे नहीं भेजा गया। लगा क्या खाक पत्रकारिता कर रहे हैं हम। शायद इसी कोफ्त में मैंने 27 नवंबर 2008 को ये गुस्सा निकाला था।
खैर, सुबह तक के अखबारों में कलावा बांधे आतंकवादी की तस्वीरें क्या आईं। ATS प्रमुख के हिंदू अतिवादियों के शिकार होने की रात की अफवाह एक बार फिर जोर पकड़ने लगी। अच्छा हुआ जल्दी ही ये साफ हो गया। वरना तो, लोग करकरे की शहादत को हिंदू आतंकवाद, साध्वी प्रज्ञा और मालेगांव धमाकों की ATS जांच तक से जोड़ने लगे थे। फिर तो NSG, मार्कोस के जवानों के जिम्मे देश बचाने का काम आ चुका था। मुंबई की तीन महत्वपूर्ण इमारतों से कम से कम लोगों की जान जाए इसे समझते हुए कमांडो कार्रवाई शुरू हो गई थी। खैर, जवानों की जांबाजी के बीच टीवी की टीआरपी के खिलाड़ियों ने शुरू में जल्दी से जल्दी और कुछ हद तक लाइव तस्वीरें दिखाकर TRP बटोरने की जो कोशिश की उसने शायद आतंकवादियों को जवानों की पोजीशन बताने में भी मदद कर दी।
दुनिया के सबसे बड़े और कठिन इस तरह के आतंकवादी हमले को हमारे जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। होटलों, नरीमन हाउस में फंसे लोगों को बचाकर आतंकवादियों को मार गिराया। आतंकवादी घटना को रोक न पाने की नैतिक जिम्मेदारी थोपकर कांग्रेस ने विलासराव देशमुख को वहां से हटाकर केंद्र में बड़ा मंत्री बना दिया। अच्छा हुआ कि रस्मी कहिए, TRP की मजबूरी कहिए, पत्रकारिता कहिए या आप जो भी कहिए- देश के जख्म को साल भर बाद फिर से टीवी चैनलों ने, मीडिया ने थोड़ा कुरेदा तो सही। टीवी पर देखते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए। 26 नवंबर 2008 को याद करके। 26, 27 नवंबर की काली रात याद करके। ये दहशत मुंबई में ऐसे भर गई है कि हल्का सा खटका भी आतंकवादी हमला लगता है। रोजी-रोटी की मजबूरी है जिसे हम मुंबई SPIRIT कहते हैं और मुंबई की जिंदादिली समझते हैं लेकिन, बताइए ना ऐसी सरकारों में हम क्या कर सकते हैं गोली खाकर सिवा जिंदादिल रहने के। अच्छा है कि टीवी है, अच्छा है कि टीवी TRP के फेर में या फिर सनसनी फैलाने के लिए जख्म याद कराती रहती है वरना तो, सरकारें तो चाहती हैं जनता गोली खाकर सो जाए या फिर बची रहे तो, भी सोती रहे बस उनकी सत्ता चलती रहे। देश जाए भाड़ में ...
मैं जब ये पोस्ट लिख रहा था तो, रात 12.27 बजे पत्रकार मित्र अमोल परचुरे का ये संदेश आया
A year after 26/11, the safest person in the country is, ironically ...
kasab
हर्ष, कोई गोलीबारी की खबर है क्या।
नहीं सर, ऐसे ही कुछ हल्की-फुल्की झगड़े की खबर थी मैंने देखा था लेकिन, शायद हमारे चैनल के लिहाज से खास नहीं थी।
नहीं देखो शायद कोई बड़ी गैंगवॉर है या कोई आतंकवादी हमला है।
खाना छोड़कर मैं तुरंत भागकर न्यूजरूम में पहुंचा तो, हर चैनल पर वही खबर थी। कहीं पर दो माफिया गुटों के बीच भयानक गोलीबारी की खबर थी तो, कहीं कुछ और ... कोई भी चैनल एकदम से नहीं बता पा रहा था कि हुआ क्या है।
तब तक फिर संपादक जी का फोन आ गया था।
हर्ष, कौन-कौन है ऑफिस में।
अभी तो सर, गिने-चुने लोग ही बचे हैं। लगभग सब जा चुके हैं। क्या करना है सर
अच्छा देखो खबर पक्की हो जाए तो, फैसला लेते हैं नजर रखो। ये कोई बहुत बड़ी खबर हो गई है।
फोन रखते-रखते अचानक एक न्यूज चैनल पर फ्लैश आया - मुंबई पर हमला। लगा जैसे वज्रपात हो गया। फिर एक साथ गोलियों की तरह ब्रेकिंग न्यूज वाली पट्टी पर लगभग सभी न्यूज चैनलों पर मुंबई पर हमला। लियोपोल्ड कैफे पर गोलीबारी... सांताक्रूज में टैक्सी में धमाका ताज होटल में आतंकवादी घुसे ... ओबरॉय होटल में भी आतंकवादियों के घुसने की आशंका ... ऐसे फ्लैश टीवी स्क्रीन से निकलकर जेहन को जकड़ रहे थे।
मैंने संपादक जी को फोन किया- सर, IBN7 लाइव कट कर लें क्या।
तुरंत कट करो, फिर देखते हैं। PCR के सारे लोग जा चुके थे। एंकर नहीं था। डेस्क पर भी मेरे अलावा एकाध लोग ही थे। सिर्फ टिकर पर एक साथी था। तुरंत फैसला लिया। IBN7 लाइव कट किया और ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी पर जैसे-जैसे खबरें आती गईं सूचना डालने लगे।
तब तक न्यूज चैनलों पर खबर आ चुकी थी कि मुंबई CST पर आतंकवादी गोलीबारी करके भागे हैं। स्क्रीन पर हेमंत करकरे का गाड़ी से उतरकर बुलेटप्रूफ जैकेट और लोहे वाली टोपी पहने तस्वीरें दिखीं। ATS प्रमुख को स्क्रीन पर देखकर समझ में आ गया था ATS हरकत में आ चुकी है। भरोसा हुआ कि अब कुछ घंटे में मामला निपट जाएगा। फिर अचानक कुछ शांति सी लगी। लगा कि आतंकवादी घिनौनी वारदात को अंजाम देकर भाग चुके हैं। लेकिन, वो तूफान के पहले की शांति थी। लाल-लाल ब्रेकिंग न्यूज चमकी ATS प्रमुख हेमंत करकरे शहीद, मुंबई पुलिस के शूटर सालस्कर, डीआईजी अशोक काम्टे शहीद। तेजी में फ्लैश बनाते मेरे रोंगटे खड़े हो गए। खून खुद के शरीर पर दिखने लगा।
बुरी से बुरी खबरें अब आनी शुरू हुई थीं। पता चला ताज को आतंकवादियों ने कब्जे में कर लिया है। ओबरॉय आतंकवादियों के कब्जे में है। मुंबई CST पर भयानक खून खराबा आतंकवादियों ने किया है। नरीमन हाउस भी आतंकवादियों के कब्जे में चले जाने की खबर आई। लगा जैसे पाकिस्तान ने घुसकर हमें मसल दिया हो। खबर ये भी आई कि आतंकवादी पुलिस की एक गाड़ी लेकर उससे भी मौत बरसाते बहुत देर तक घूमते रहे। खैर, थोड़ी ही देर में खूनियों के मरीन ड्राइव पर मरने की खबर भी आई।
बॉसेज से बात की तो, तय हुआ कि सुबह आठ बजे से हम अपना बुलेटिन खोलेंगे। एक बिजनेस न्यूज चैनल सारी रात लाइव था। देश पर हमला जो हुआ था। सारी फ्लैश बनाते थक गया था। आंख में नींद पानी में बालू की तरह भरी हुई थी लेकिन, हमले की वजह से सोने का मन नहीं हो रहा था। सुबह की शिफ्ट आ गई थी लेकिन, आठ का बुलेटिन मैंने खुद ही बनाया था। पूरी रात की टाइमलाइन मुंहजुबानी याद हो गई थी। करीब ग्यारह बजे कमरे पर गया कि थोड़ा आराम कर लूं। लेकिन, फ्रेश होकर, नहा धोकर सोने की लाख कोशिश कामयाब नहीं हुई। एकाध घंटे में ही फिर से ऑफिस में था।
ह्रदयविदारक तस्वीरों को तेजी से चलने लायक बनाने के काम में मैं भी सबके साथ जुट गया। फिर तय हुआ कि हमारे अपने रिपोर्टर भी जाने चाहिए। स्वभावत: रिपोर्टर होने की वजह से वैसे तो, हमेशा रिपोर्टिंग ही करने की इच्छा होती रही। लेकिन, इस मौके पर तो ये इच्छा या यूं कहूं कि आतंकवादियों के खिलाफ जंग में अपनी सामर्थ्य भर शामिल होने की इच्छा जोर मार रही थी। लेकिन, न तो मैं बॉसेद से कह पाया और न ही वो मेरी इस इच्छा को भांप सके या भांपकर भी उन्हें लगाकि ये शो प्रोड्यूस करने, प्रोडक्शन के लिए इस समय ज्यादा उपयोगी है, मुझे नहीं भेजा गया। लगा क्या खाक पत्रकारिता कर रहे हैं हम। शायद इसी कोफ्त में मैंने 27 नवंबर 2008 को ये गुस्सा निकाला था।
खैर, सुबह तक के अखबारों में कलावा बांधे आतंकवादी की तस्वीरें क्या आईं। ATS प्रमुख के हिंदू अतिवादियों के शिकार होने की रात की अफवाह एक बार फिर जोर पकड़ने लगी। अच्छा हुआ जल्दी ही ये साफ हो गया। वरना तो, लोग करकरे की शहादत को हिंदू आतंकवाद, साध्वी प्रज्ञा और मालेगांव धमाकों की ATS जांच तक से जोड़ने लगे थे। फिर तो NSG, मार्कोस के जवानों के जिम्मे देश बचाने का काम आ चुका था। मुंबई की तीन महत्वपूर्ण इमारतों से कम से कम लोगों की जान जाए इसे समझते हुए कमांडो कार्रवाई शुरू हो गई थी। खैर, जवानों की जांबाजी के बीच टीवी की टीआरपी के खिलाड़ियों ने शुरू में जल्दी से जल्दी और कुछ हद तक लाइव तस्वीरें दिखाकर TRP बटोरने की जो कोशिश की उसने शायद आतंकवादियों को जवानों की पोजीशन बताने में भी मदद कर दी।
दुनिया के सबसे बड़े और कठिन इस तरह के आतंकवादी हमले को हमारे जवानों ने मुंहतोड़ जवाब दिया। होटलों, नरीमन हाउस में फंसे लोगों को बचाकर आतंकवादियों को मार गिराया। आतंकवादी घटना को रोक न पाने की नैतिक जिम्मेदारी थोपकर कांग्रेस ने विलासराव देशमुख को वहां से हटाकर केंद्र में बड़ा मंत्री बना दिया। अच्छा हुआ कि रस्मी कहिए, TRP की मजबूरी कहिए, पत्रकारिता कहिए या आप जो भी कहिए- देश के जख्म को साल भर बाद फिर से टीवी चैनलों ने, मीडिया ने थोड़ा कुरेदा तो सही। टीवी पर देखते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गए। 26 नवंबर 2008 को याद करके। 26, 27 नवंबर की काली रात याद करके। ये दहशत मुंबई में ऐसे भर गई है कि हल्का सा खटका भी आतंकवादी हमला लगता है। रोजी-रोटी की मजबूरी है जिसे हम मुंबई SPIRIT कहते हैं और मुंबई की जिंदादिली समझते हैं लेकिन, बताइए ना ऐसी सरकारों में हम क्या कर सकते हैं गोली खाकर सिवा जिंदादिल रहने के। अच्छा है कि टीवी है, अच्छा है कि टीवी TRP के फेर में या फिर सनसनी फैलाने के लिए जख्म याद कराती रहती है वरना तो, सरकारें तो चाहती हैं जनता गोली खाकर सो जाए या फिर बची रहे तो, भी सोती रहे बस उनकी सत्ता चलती रहे। देश जाए भाड़ में ...
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