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Sunday, November 22, 2009

ये हिंदी की लड़ाई थी ही नहीं


इसे हिंदी की लड़ाई कहा जा रहा था। कुछ तो हिदुस्तान की लड़ाई तक इसे बता रहे थे। देश टूटने का खतरा भी दिख रहा था। लेकिन, क्या सचमुच वो हिंदी की, हिंदुस्तान की लड़ाई थी। दरअसल ये राजनीति की बजबजाती गंदगी को हिंदी की पैकिंग लगाकर उस बजबजाती राजनीति को सहेजने के लिए अपने-अपने पक्ष की सेना तैयार करने की कोशिश थी।


अब सोचिए भला देश अबू आजमी को लेकर संवेदनशील इसलिए हो गया कि हिंदी के नाम पर आजमी ने चांटा खाया। सोचिए हिंदी की क्या गजब दुर्गति हो गई है कुछ इधर कुआं-उधर खाई वाले अंदाज में। उसको धूल धूसरित करने खड़े हैं राज ठाकरे और उसको बचाने खड़े हैं अबू आजमी। जबकि, सच्चाई यही है कि न तो राज ठाकरे की हिंदी से कोई दुश्मनी है न अबू आजमी को हिंदी से कोई प्रेम।


ये दो गंदे राजनेताओं की अपनी जमीन बचाने के लिए एक बिना कहा समझौता है जो, समझ में खूब ठीक से आ रहा है। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अबू आजमी के रिश्ते देश के दुश्मन दाऊद इब्राहिम से होने की खबरों के ठंडे हुए अभी बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ और न ही इसे ज्यादा समय बीता होगा जब मराठी संस्कृति के नाम पर भारतीय संस्कृति तक को चुनौती देने वाले राज ठाकरे गर्व से पॉप स्टार माइकल जैकसन की गंधाती देह के दर्शन के लिए आतुर थे।



हिंदी न इनकी बेहूदी हरकतों से मिटेगी न बचेगी। कभी-कभी कुछ सरकारी टाइप के लगने वाले बोर्ड बड़े काम के दिखते हैं। रेलवे स्टेशन पर हिंदी पर कुछ महान लोगों के हिंदी के बारे में विचार दिखे जो, मुझे लगता है कि जितने लोग पढ़ें-सुनें बेहतर। उसमें सबसे जरूरी है भारतीय परंपरा के हिंदी परंपरा के मूर्धन्य मराठी पत्रकार बाबूराव विष्णु पराड़कर जी का हिंदी पर विचार। पराड़कर जी की बात साफ कहती है हिंदी हमारे-आपके जैसे लोगों की वजह से बचेगी या मिटेगी। बेवकूफों के फेर में मत पड़िए।

Monday, September 07, 2009

100 रुपए खुल्ला होता है

करीब 9 महीने बाद मुंबई जाने का मौका मिला। मुंबई राजधानी में दिल्ली से मुंबई के लिए सफर शुरू हुआ। मुंबई का रोमांच- मुंबई की भीड़, गणपति, मुंबई की नई पहचान ताजा बना बांद्रा-वर्ली सी लिंक- अपनी ओर खींच रहा था।



यात्रा शुरू हुई। मेरे सामने की चार सीटों पर सिर्फ एक महिला यात्री थीं। लेकिन, माशाअल्ला पर्सनालिटी क्या पूरा पर्सनालटा था। लंबाई-चौड़ाई सब ऐसी थी कि शायद उन्हें हमारी तरह साइड की बर्थ मिली होती तो, उनके लिए उसमें समाना मुश्किल होता। किसी संभ्रांत मुस्लिम परिवार की बुजुर्ग भद्र महिला थीं। उनको छोड़ने संभवत: उनकी भतीजी और दामाद आए थे। माशाअल्ला भतीजी भी आपा पर ही गई थी। भतीजी के पति ने ऊपर वाली बर्थ एकदम से ऊपर उठा दी जिससे आपा का सर शान से उठा रहे कोई तकलीफ न हो। और, चूंकि चारो सीटों पर वो अकेली ही थीं तो, इस इत्तफाक के बहाने दामाद ने पूरी आत्मीयता उड़ेल दी और आपा के ना-ना करने के बावजूद सीट ऊपर कर दी। एसी द्वितीय श्रेणी के कूपे की ऊपर वाली सीटें फोल्डिंग हैं और, अगर आपको भी संयोग मिले कि नीचे आप हों और ऊपर की सीट खाली हो तो, इसका मजा ले सकते हैं।


कुली आपा का सामान रख चुका था। उसे पैसे देने के लिए भतीजी ने पैसे निकाले तो, आपा ने मीठी आवाज में I have lot of change … कहकर पर्स में से एक साथ निकल आई ढेर सारी नोटों में से एक 100 की नोट कुली को थमा दी। कुली बेचारा इतनी अंग्रेजी अगर समझ गया होगा तो, सोचता कि काश ऐसे ही रोज 5-10 लोग चेंज देने वाले मिल जाते तो, जीवन सुधर जाता। खैर, 100 रुपया चेंज होता है ये जानकर थोड़ा तो मैं भी हदस गया था।

Tuesday, August 11, 2009

हम हाथ मिला लिए हैं .. तुम मरो-कटो हमारी बला से

लीजिए साहब सब शांति से निपट गया। बड़ा बुरा हुआ। कोशिश तो पूरी हुई थी फिर भी न तो कोई मार पीट हुई, न दंगा। अब जब कुछ नहीं हो पाया तो, चलो भाई हाथ मिला लेते हैं। आखिर भरोसा जो मिल गया है कि शांतिपूर्वक सब काम हो जाएगा।


ई भरोसा हो गया है कि अब उन्हें घर तो मिल जाएगा। उन्हीं लोगों के भरोसे पर वो शांत हो गए हैं। जिनसे वो, टीवी चैनल पर चिल्ला-चिल्लाकर पूछ रहे थे- क्या मैं आतंकवादी दिखता हूं? अरे मैं कोई सीरियल किलर थोड़े ना हूं, मैं तो सीरियल किसर हूं?


जवाब किसी ने दिया नहीं लेकिन, सच्चाई तो यही है कि तुम हरकत तो आतंकवादी जैसी ही कर रहे थे। परदे पर दूसरों की बीवी पर बुरी नजर रखते थे, घर तोड़ने की कोशिश करते थे। अब देश में तोड़फोड़ करने की कोशिश कर रहे हो। चिल्ला-चिल्लाकर जो बोल रहे थे कि क्या मैं आतंकवादी हूं, मुझे घर इसलिए नहीं मिल रहा है कि मैं मुसलमान हूं। ये क्या है आतंकवाद नहीं है। लगे हाथ इमरान हाशमी अपने माई बाप महेश भट्ट के साथ ये भी बताए जा रहे कि ऐसा नहीं है। मेरी पत्नी तो हिंदु है लेकिन, मैं तो सबके अधिकारों की बात कर रहा हूं। बस फिर क्या था- टीवी चैनलों पर देश की सेक्युलर जमात के इकलौते अगुवा दंपति जावेद अख्तर और शबाना आजमी की पुरानी बाइट और ग्राफिक्स प्लेट पर किसको कब मुंबई में मुसलमान होने की वजह से घर नहीं मिला। सब बैक टू बैक चलने लगा।


अब ई हाशमी और भट्ट भइया को कौन बताए कि आतंकवाद हमेशा AK 47 उठाकर गोली चलाने से ही तोड़े न आता है। जो, तुम कर रहे थे। वो, भी तो वही था। दो धर्मों के बीच कटुता फैलाने की पूरी कोशिश की। जब तुम्हारे लाख भड़काने पर भी कोई नहीं भड़का तो, तुमने हाथ मिला लिया। तर्क ये भी कि भई सब शांति से करना है तो, ये तो पहले भी कर सकते थे। औ अगर सही में तुमको सिर्फ मुसलमान होने की वजह से घर नहीं मिला तो, लड़ो। काहे चुप बैठ गए। इसीलिए कि अब तो तुमको कोई भाव भी नहीं दे रहा। सच्चाई तो यही है कि तुमने जो सवाल पूछे थे वो, करने की कोशिश तो पूरी की थी लेकिन, हाय जालिम जमाना तुम्हारे साथ खड़ा नहीं हुआ। और, सब गड़बड़ हो गया। अभी भी तुम्हारी गिनती सेक्युलर जमात के अगुवा लोगों के साथ नहीं हो पाएगी। चलो मौका मिले तो, फिर कोशिश करना। मामला बन गया तो, रील लाइफ से रियल लाइफ में भी हीरो बन जाना। न बन पाना तो, फिर हाथ मिला लेना। हिंदुस्तान में इस बात की आजादी तो सबको है कि थोड़ी कूबत हो तो, कुछ भी करके शांति से हाथ मिला लो ...

Friday, January 11, 2008

मैं किसी लड़की के कपड़े फाड़ना चाहता हूं

मैं इंजीनियर बनना चाहता हूं ... डॉक्टर बनना चाहता हूं ... मैनेजर बनना चाहता हूं ... आईएएस, पीसीएस अफसर बनना चाहता हूं ... हीरो बनना चाहता हूं ... बड़ा बिजनेसमैन बनना चाहता हूं ... 2007 की आखिरी रात तक देश के ज्यादातर लड़कों की आरजू कुछ ऐसी ही हुआ करती थी। लेकिन, नए साल की पहली सुबह नई आरजू, कुछ नए तरह की तमन्ना लड़कों के अंदर लेकर आई है। लड़कों के सीने में दबे अरमान उबल रहे हैं। वो, कह रहे हैं मैं किसी लड़की के कपड़े फाड़ना चाहता हूं। नहीं फाड़ पाऊंगा तो, कपड़े फटते देखने का सुख तो, जरूर लूंगा।


ये 2008 के लड़के टीवी पर दिखना चाहते हैं। तिलक लगाकर टीवी पर दिख रहे हैं। इनकी मांए-बहनें इन्हें टीका लगाकर शहादत वाले भाव में कैमरों के सामने पेश कर रही हैं। ऐसे, जैसे कह रही हों जाओ, आज इम्तिहान है तुम्हारा कमीनेपन में पुरानी सारी मर्द पीढ़ी को मात देकर लौटना। वैसे पुरानी पीढ़ी के जांबाज मर्द भी उनके साथ खड़े हैं।

भगवान शंकर या फिर छत्रपति शिवाजी किसके नाम पर इन्हें इतना साहस मिलता है, आज तक मैं समझ नहीं पाया। ऐसी नाम से सेना तैयार है। सेना पता नहीं किसे जीतती है लेकिन, ठाकरे नाम जिंदा रहे इसलिए कुछ न कुछ करती रहती है। पता नहीं किसका सामना करने के लिए इनके पास सामना अखबार भी है। संपादकीय से लेकर खबर तक कपड़े फाड़ने वालों के गुणगान हैं। कहा जा रहा है सब मराठा स्वाभिमान और मराठी अस्मिता पर हमला है।

सेना से जुड़ी शहर की साध्वी मेयर का बयान आ जाता है कि मराठी तो, किसी लड़की के कपड़े फाड़ ही नहीं पाता। सब बाहर से आए लोग ही कर रहे हैं। किसी लड़की के कपड़े फाड़ने की आरजू 31 दिसंबर 2007 की रात पूरी कर लेने वालों 14 लड़कों में से 2 लड़के कुछ उत्तर प्रदेश, बिहार जैसी जगहों से आए थे और यहीं बस गए थे। वो, संस्कारी नहीं हैं। मेयर साहिबा और उनकी सेना को शायद मरीन ड्राइव पर बलात्कार करने वाले मराठी कांस्टेबल की याद नहीं रही होगी।

सेना का एक अखबार तो, मराठी अस्मिता की लड़ाई लड़ने लगा। लेकिन, दूसरे अखबारों, टीवी चैनलों को ये बात समझ में नहीं आई। एक अंग्रेजी अखबार के दो फोटोग्राफरों का ही दुस्साहस था कि इन शूरवीरों की आरजू पूरी होने के बाद बेजवह उस पर हंगामा मच गया। मन मारकर पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी। मीडिया ने बेवजह ऐसी घटना को तूल दे दिया जो, मुंबई के पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, मुंबई में कहीं भी कभी भी हो जाने वाली छोटी सी घटना थी।

गृहमंत्री को राजनीति करनी थी इसलिए कमिश्नर को कड़ी कार्रवाई की निर्देश दिया। खैर, न्याय व्यवस्था को ये गंवारा नहीं हुआ और मराठी अस्मिता के सारे प्रतीक लड़के जेल से बाहर आ गए। लेकिन, बात इतने पर ही कहां रुकने वाली थी। एक पुराने सैनिक को याद आया कि उनका तो, जीवन ही सिर्फ महाराष्ट्र के नवनिर्माण को समर्पित है। और, अगर कठिन से कठिन स्थितियों में भी परिस्थितियों में बेशर्मी से खड़े रहने वाले से नौजवान उनके पाले में नहीं रहे तो, नवनिर्माण कैसे होगा। वो, पहुंच गए सबको लेकर गृहमंत्री के दफ्तर कहा- सब मीडिया की गलती है। मीडिया ने इतना बढ़ा-चढ़ाकर मामला पेश किया कि बेगुनाह जेल भेज दिए गए।

ये बेगुनाह लड़के बेचारे तो, सिर्फ ये देख रहे थे कि लड़कियों के कपड़े कौन फाड़ रहा है। कौन है जो, नए साल में नए तरह के संकल्प पूरे करने का साहस कर रहा है। अब मीडिया में फोटो आई तो, ये समझ में ही नहीं आ रहा है कि कौन सिर्फ कपड़े फटते देखने का सुख ले रहा है। कौन ज्यादा साहसी है जो, खुद कपड़े फाड़ रहा है। वैसे ऐसे संकल्पवान नौजवानों ने 31 दिसंबर की रात और उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्से में खूब अपने संकल्प पूरे किए।

ये त्यागी नौजवान अपने नए साल के संकल्प को लोगों के सामने जाहिर नहीं करना चाहते थे। लेकिन, बेड़ा गर्क हो ये फोटोग्राफर, कैमरामैन नाम की गंदी प्रजाति का, जिन्होंने इन लड़कों का संकल्प सबके सामने पेश कर दिया। मुंबई, दिल्ली, केरल, गुड़गांव जैसी जगहों के लड़कों का साहस सबके सामने आ गया। ऐसे उत्साही नौजवानों ने संकल्प तो पूरे देश में पूरा किया होगा लेकिन, दूसरे शहरों के फोटोग्राफर नाकारा निकले कुछ दिखा नहीं सके। और, उन लड़कों को हीरो नहीं बना सके। संकलपवान लड़कों के हाथ से प्रेस कांफ्रेंस का मौका भी निकल गया।

नए साल की शुरुआत में ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के अपने जिले के एक गांव के कुछ नौजवानों ने भी ऐसा ही संकल्प पूरा कर डाला। अब ऐसा संकल्प पूरा करने वाले हीरो तो, हो ही गए हैं। टीवी चैनलों पर, अखबार पर आने लगे हैं। देश के दूसरे लड़के भी ऐसे संकल्प ले रहे हैं। मैं भी संकल्पवान होने की हिम्मत जुटा रहा हूं। मै किसी लड़की के कपड़े फाड़ना चाहता हूं। मैं कमीने से भी कमीना बनना चाहता हूं। मैं अपनी जाति के नाम पर समर्थन चाहता हूं। मैं अपने क्षेत्र के लोगों से समर्थन चाहता हूं। मैं अपने प्रदेश के लोगों का समर्थन चाहता हूं। मैं हर उससे समर्थन चाहता हूं जो, मेरे नए साल के संकल्प को पूरा करने के लिए मेरे साथ खड़ा हो सके और अब तो, गंदे पत्रकारों का भी डर नहीं रहा। मेरे संकल्प को उन्होंने सबके सामने दिखाया तो, मैं हीरो तो हो ही जाऊंगा।

Saturday, September 29, 2007

मुंबई रहने के लिहाज से सबसे अच्छा शहर नहीं है

रहने के लिहाज से दिल्ली देश का सबसे अच्छा शहर है। इसका मतलब ये है कि आधुनिक सुविधा, जीने-रहने की आसानी दिल्ली में सबसे ज्यादा है। सड़कें अच्छी हैं। सड़कों पर जाम कम है और जरूरी सुविधाओं के मामले में बहुत खराब मुंबई से अभी भी सस्ता है। ये बात कह रही है शहरी विकास मंत्रालय की हाल ही में मुंबई में जारी रिपोर्ट।

दिल्ली रहने के लिए देश का सबसे अच्छा शहर है। इसके लिए तो, ढेर सारे तर्क हैं। दिल्ली- देश की राजधानी है। दिल्ली- देश के सारे नेता-बड़े अधिकारी यहीं रहते हैं। विदेशों से आने वाले प्रतिनिधिमंडल-नेताओं को यहीं रुकाया जाता है। इन सब छोटी-बड़ी वजहों से दिल्ली को बुनियादी सुविधाओं यानी सड़क, बिजली, पानी के लिहाज से बेहतर होना ही पड़ता और, वो है। दिल्ली सरकार के साथ ही केंद्र की सरकार भी इस शहर/राज्य को सजाने-संवारने की हर संभव कोशिश करती रहती है।

दिल्ली रहने के लिहाज से सबसे अच्छा है, इसके पक्ष में ऐसे सैकड़ो तर्क हैं। लेकिन, ऐसे ही सैकड़ो तर्क होने के बाद भी देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को रहने लायक देश के सबसे अच्छे शहर का खिताब नहीं मिल सका। आपको लगेगा कि इसमें क्या बात हुई ये तो, चलता रहता है। दरअसल मुंबई के इसी, चलता है वाले, अंदाज से ही सारी काबिलियत होने के बाद भी मुंबई रहने के लिहाज से देश का सबसे अच्छा शहर नहीं बन पा रहा है।

मुंबई रहते हुए मुझे भी तीन साल हो गए हैं। सच बात ये है कि अभी भी मुझे दिल्ली के मुकाबले मुंबई कम ही अच्छी लगती है। इसके पीछे कोई ऐसी वजह नहीं है जो, अभी के सर्वे में निकली है। लेकिन, तीन साल पहले और अब जब मुझे हाल में दिल्ली जाने का मौका मिला था तो, दिल्ली में जमीन-आसमान का अंतर दिखा। लेकिन, इन तीन सालों में मुंबई एयरपोर्ट की बदली सूरत को छोड़ दें तो, कुछ भी नहीं बदला। यहां तक कि नवंबर 2004 में सुबह-सुबह मुंबई एयरपोर्ट पर उतरने के बाद से बांद्रा के एक होटल में पहुंचने तक जिस तरह झुग्गियों की लाइन, सड़क पर सुबह चारपाई डालकर सोते लोग, जाम, भीड़ भाड़ दिखा था, वो आज भी वैसे का वैसा है।

सड़क के दोनों तरफ करीब 6-6 फीट रास्ता रोके झुग्गियों में अभी भी लाखों लोग रह रहे हैं। 2004 में बनकर पूरा होने वाला बांद्रा वर्ली सी लिंक अगले साल अप्रैल तक पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है। बांद्रा वर्ली सी लिंक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का पहला हिस्सा है जो, 5.6 किमी का है। दूसरा हिस्सा वर्ली से कोलाबा का 12 किमी से ज्यादा का है जो, अभी शुरू भी नहीं हुआ है। वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे के अलावा कोई ऐसी सड़क नहीं दिखती जो, देश के सबसे अमीर लोगों के शहर होने का भरोसा दिला सके।

मुंबई में लोकल रेलवे इतनी भरी होती हैं कि सांस लेना भी मुश्किल होता है। अब ऐसा तो है नहीं कि ऐसी दमघोंटू रेल में कोई खुशी से सफर करना चाहता है। लोकल मुंबई की जान इसलिए है कि दम घुटते हुए भी सफर जरा जल्दी पूरा हो जाता है और, दम निकलने से बच जाता है। रेल के बराबर की ही दूरी सड़क के रास्ते तय करने में मुंबई में दोगुना समय लग जाता है। और, सड़कों का ये हाल तब है जब, मुंबई का सिर्फ म्युनिसिपल कॉरपोरेशन इतना बजट पाता है। जितने में कई राज्य अपना बजट बना लेते हैं। आपको शायद भरोसा नहीं होगा- BMC यानी बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन का बजट 7000 करोड़ रुपए का है।

मुंबई में टाटा-अंबानी-गोदरेज-बजाज जैसे जाने कितने तुर्रमखां उद्योगपति रहते हैं। जो, इस समय दिल्ली दरबार में अलग से पूरा शहर (SEZ) बनाने के लिए अर्जी पे अर्जी दे रहे हैं। ये उद्योगपति कह रहे हैं कि ये शहर ऐसे होंगे जहां, बाहर से कुछ जरूरत नहीं होगी। बिजली, पानी, सड़क, एयरपोर्ट सबकुछ शहर में होगा। हेडक्वार्टर होने की वजह से इन्हें अक्सर ही मुंबई रहना, एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना पड़ता है। लेकिन, दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति बनने की कतार में लगे उद्योगपति अपने शहर में कुछ खास करने की इच्छा भी नहीं जताते। हां, अपने प्रोजेक्ट में जरा सी ऊंच-नीच होने पर किसी भी सरकार से भिड़ने को तैयार रहते हैं।

दिल्ली में रिंग रोड तो पूरी तरह से रेड सिग्नल फ्री है। इसके साथ ही दूसरी कई ऐसी सड़कें भी बन गई हैं जिसमें, 10-15 किलोमीटर तक ब्रेक लगाने की जरूरत नहीं होती। मेट्रो की सहूलियत तो दुनिया को पता है। मुंबई भी मेट्रो दौड़ाना चाहता है लेकिन, सी लिंक की ही तरह मेट्रो के काम में भी देरी शुरुआत से होनी शुरू हो गई है। लेकिन, रेड सिग्नल फ्री सड़कों की बात तो अभी मुंबई चलाने वाले सोच भी नहीं रहे हैं। जबकि, मुंबई में जिस तरह से छोटी (कम चौड़ी) सड़कों पर चलने वाली गाड़ियां बढ़ रही हैं, पूरी मुंबई में दो मंजिला सड़क की जरूरत दिखती है।

मैं मुंबई को लेकर निराश नहीं हूं। लेकिन, इतना जरूर सोचता हूं कि देश में सबसे ज्यादा पैसा खर्च कर लोग मुंबई में रहते हैं। उन्हें विश्व स्तरीय सुविधा न मिलने की कोई वजह नहीं है। मोनो रेल, मेट्रो रेल, ढेर सारे फ्लाईओवर, सी लिंक, नई खूबसूरत-ज्यादा सुविधाओं-रफ्तार वाली लोकल और ऐसी ही दूसरी योजनाएं हैं जो, भरोसा दिलाती हैं कि मुंबई देश का सबसे ज्यादा सुविधाओं वाला शहर आसानी से बन सकता है। मुंबई एयरपोर्ट पर नए टर्मिनस पर उतरने पर ये अहसास होता भी है। मैंने बचपन में मुंबई के बारे में सुन रखा था कि वहां तो, कई-कई लेन वाली सड़कें हैं। तेज रफ्तार वाली गाड़ियों के लिए अलग-अलग लेन है। लंबी दूरी, चंद मिनटों में तय हो जाती है।

तीन साल पहले दिल्ली से हवाई सफर तय करने के बाद जमीन पर उतरा तो, खराब सुविधाओं को देखकर मेरे नीचे की जमीन ही खिसक गई। लेकिन, उम्मीद करता हूं कि मेरे बाद कोई और जब मायानगरी में सपने पूरे करने आएगा तो, उसे मुंबई देश में ही नहीं दुनिया में रहने के लिए सबसे अच्छे शहरों में शामिल मिले। उसे सिर्फ ये कहकर न बहलाया जाए कि मुंबई की खूबी यही है कि मुंबई कभी रुकती नहीं। बल्कि, यहां नया आने वाला मुंबई की तेज रफ्तार देखकर कहे कि हम दुनिया से आगे निकल गए हैं।

Tuesday, September 11, 2007

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे! तीसरी कड़ी

भ्रष्टाचार जगह-जगह कितना संगठित तंत्र बन गया है। इसका अंदाजा आज मायावती सरकार के एक फैसले से हुआ। उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार ने 6504 सिपाहियों की भर्ती रद्द कर दी गई है। ये सभी भर्तियां मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में हुई थीं। इस भर्ती के दौरान रहे 12 IPS अफसरों को निलंबित कर दिया गया है। इन पर भर्ती में गड़बड़ी का आरोप है। इन अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी। निलंबित 12 आईपीएस अधिकारियों में 1 आईजी, 9 डीआईजी हैं। 2 एसपी रैंक के अधिकारी भी निलंबित हुए हैं। इसके अलावा 18 एएसपी और 40 डीएसपी रैंक के अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

55 केंद्रों में से 14 पर हुई भर्ती की जांच के बाद मायावती सरकार ने ये फैसला लिया है। जांच में पाया गया है कि इन सिपाहियों की भर्ती में कॉपी सेंटर से बाहर लिखी गई। कई कॉपियों में नंबर काटकर फिर से बढ़ाए गए। जांच में ये भी सामने आया है कि इन सिपाहियों ने भर्ती के लिए दो से चार लाख रुपए दिए हैं। यानी उत्तर प्रदेश के लोगों की सुरक्षा के लिए भर्ती होने वाले इन सिपाहियों की शुरुआत ही रिश्वत के जरिए हुई। अब अगर ये दो से चार लाख देकर सिपाही बने हैं तो, जाहिर है इनका सबसे पहला काम यही रहा होगा कि कैसे रिश्वत के तौर पर दिए गए दो से चार लाख रुपए कैसे वापस लिया जाए। अब ये पैसा इमानदारी से तो आने से रहा। साफ है कि इसके लिए उस सिपाही ने अपराधियों को छोड़ा होगा। सही आदमी को पैसा लेकर फंसाया होगा।

इस फैसले से मायावती सरकार पर राजनीति का भी आरोप लग रहा है। क्योंकि, ये सारी भर्तियां मुलायम सिंह यादव के सत्ता में रहते हुई थीं। लेकिन, ये कोई छिपा तथ्य नहीं है कि सिपाहियों की भर्ती का पूरा जिम्मा मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने खुद संभाल रखा था। अनुमान के मुताबिक, कुल मिलाकर सिपाहियों की भर्ती में कम से कम 500 करोड़ की रिश्वत ली गई है। अब अगर मायावती ने राजनीति के तहत भी एक सही काम किया है तो, इसके लिए मायावती को बधाई दी जानी चाहिए। लेकिन, अब मायावती को ये भी ध्यान रखना होगा कि पांच साल में अगर उन्होंने कोई भ्रष्ट फैसले लिए तो, उसका क्या अंजाम होगा।

उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार का जो तंत्र इतने सालों तक फला-फूला है। उस पर मायावती अगर लगाम लगा पाती हैं तो, सचमुच मुलायम के शासन में बने नारे उत्तम प्रदेश को सही साबित कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश से ही एक और खबर है कि 15 साल पुराने फर्जी मुठभेड़ के मामले में 15 पुलिसवालों को अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। फर्जी मुठभेड़ एक ऐसा भ्रष्टाचार है जो, भ्रष्टाचार को और बढ़ाने में मदद करता है। और, भ्रष्टाचार करने वाला बहादुरी की तमगा भी पा जाता है।

अलग-अलग जगहों पर भ्रष्टाचार के तरीके भी अलग-अलग हैं। मुंबई में लोगों को जरूरी सुविधाएं देने का जिम्मा रखने वाली संस्था BMC अपनी ही तरह का भ्रष्टाचार कर रही है। मुंबई के वर्ली नाके में 5000 छात्रों की पढ़ाई की जगह पर मॉल बनाने की इजाजत BMC ने दे दी है। यानी शिक्षा के मंदिर की जगह, खरीदने बेचने का काम होगा।

वैसे मुंबई में इससे पहले स्लम रिहैबिलिएशन यानी झुग्गी झोपड़ी वालों को अच्छी जगह बसाने के नाम पर सरकार से मिलकर बिल्डर हजारों करोड़ रुपए का घोटाला कर चुके हैं। सरकार भी ये मानती है, जांच के लिए कमेटी भी बनी है। लेकिन, आज तक कुछ नहीं हुआ। हां, स्लम रिहैबिलिएशन के नाम पर मुंबई की बेशकीमती जमीन कौड़ियों के दाम पाने वाले बिल्डर करोड़पति बन चुके हैं। और, शहर में इतने सम्मानित हो चुके हैं कि टीवी चैनलों में रियल एस्टेट सेक्टर की हर खुशी-चिंता की बहस में अपने विचार देते दिखते हैं। इन बिल्डरों को आंख मूंदकर बेईमानी की इजाजत देने वाले अलग-अलग सरकारों के मंत्री, विधायक, सांसद भी लग्जरी कारों में घूमते हैं। और, हर बार मीडिया में झुग्गी-झोपड़ी घोटाले का मामला खुलने पर बेशर्मी से कार्रवाई की मांग करते हैं या आश्वासन देते रहते हैं।

टीवी चैनलों का स्टिंग ऑपरेशन भी भ्रष्टाचार का जरिया बन गया है। दिल्ली की स्कूल टीचर के खिलाफ एक नए-नए चैनल के फर्जी स्टिंग ऑपरेशन की खबर अभी पुरानी भी नहीं पड़ी है। आज एक और फर्जी स्टिंग का मामला सामने आया है। सांसदों को स्टिंग ऑपरेशन में फंसाने की धमकी दे रहे 3 लोगों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

भ्रष्टाचार हममें ऐसा रच बस गया है कि हमें पता ही नहीं चल पाता कि हम क्या-क्या कर गुजर रहे हैं । अलग-अलग किस्म भ्रष्टाचार के आरोपी लालू प्रसाद यादव के साले साधु और सुभाष यादव ने अनोखा भ्रष्टाचार किया है। संसद में और चुनाव आयोग में दर्ज जानकारी के मुताबिक, इन दोनों भाइयों की उम्र में सिर्फ महीने का अंतर है। जय हो। हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

Monday, September 10, 2007

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे! दूसरी कड़ी

आज ही सुबह मैंने महाराष्ट्र के डीजीपी पी एस पसरीचा और पंजाब के पूर्व डीजीपी एस एस विर्के के भ्रष्टाचार के किस्से लिखे। शाम को मैं टीवी चैनल देख रहा था तो, एक और राज्य बिहार के डीजीपी के भ्रष्ट आचरण का नमूना सामने आ गया। बिहार के डीजीपी जनता दरबार में फरियादियों से चरण स्पर्श कराकर उन्हें कार्रवाई का आशीर्वाद दे रहे थे। ये भ्रष्टाचार तो ऐसा फैल गया है कि इनके नमूना तो, कहीं से भी कोई भी उठा ले।
हैदराबाद से एक खबर आई कि फ्लाईओवर गिरने से कई लोगों की मौत हो गई। ये फ्लाईओवर अभी बना भी नहीं था। बन रहा था, बन चुका होता तो, न जाने कितने और लोगों को मौत के गाल में ले जाता। फ्लाईओवर कोई छोटा-मोटा ठेकेदार नहीं बना रहा था। ऐसे कामों के लिए कॉन्ट्रैक्ट लेने वाली बड़ी कंपनी गैमन इंडिया के पास इसका काम था।

हैदराबाद से ताजा खबर थी, इसलिए पूरे देश को दिख गया। लेकिन, मैं मुंबई में भ्रष्टाचार के नमूने रोज ही देख लेता हूं। मुबंई से उसके पड़ोसी शहर ठाणे जाने के रास्ते में तो, मुझे भ्रष्टाचार के नमूने ऐसे मिल जाते हैं, जैसे मधुमक्खी के किसी छत्ते से शहद टपक रही हो। मुंबई की सड़कों को दुरुस्त करने को लेकर मुंबई हाईकोर्ट BMC, MMRDA को बुरी तरह से लताड़ चुका है। बावजूद इसके अब तक इन बेशर्म संस्थाओं का भ्रष्टाचार से मोह नहीं छूट पा रहा है।

ठाणे की घोड़बंदर रोड पिछले एक साल से लगातार बन रही है। हाईकोर्ट की कई बार डांट खाने के बाद इसके एक बड़े हिस्से का काम काफी हद तक पूरा हो गया है। लेकिन, मुंबई से ठाणे जाते समय घोड़बंदर के लिए मुड़ते ही किसी भी गाड़ी में बैठे व्यक्ति की सारी हडि्डयां एक दूसरे के साथ मिलकर राग भैरवी गाने लगती हैं। मुंबई में सिर्फ गड्ढों में ही हर साल लाखों-करोड़ो रुपए चले जाते हैं लेकिन, BMC, MMRDA एक ऐसी सड़क नहीं बना पा रहे हैं जिसमें बनने के कुछ ही दिन बाद गड्ढे न हो जाएं। BMC का सालाना बजट 7000 करोड़ रुपए से ज्यादा का है, पता नहीं इसमें से कितना गड्ढों में चला जाता है। मुंबई में भ्रष्टाचार के नमूनों की ऐसी लंबी लिस्ट है।

भ्रष्टाचार है, देश के लोगों को इसमें मजा आ रहा है। हर राज्य में सड़कें बनाने की जिम्मा होता है, लोक निर्माण विभाग यानी PWD के पास। इस विभाग में काम करने वाले छोटे कर्मचारी से इंजीनियर, ठेकेदार सब अपने को खुशकिस्मत मानते हैं। यहां तक कि राज्यों में लोक निर्माण विभाग के मंत्री का पद भी राज्य के सबसे रुतबेदार विधायक को ही मिल पाता है। आपको लग रहा होगा कि जब पूरे राज्य को जोड़ने, सड़क-पुल बनाने का काम इसी विभाग के पास है तो, सबसे जिम्मेदार विधायक को ही ये काम मिलना ही चाहिए।
लेकिन, दरअसल किस्सा कुछ और ही होता है। कहने को तो ये विभाग लोक निर्माण के लिए है। लेकिन, ये विभाग मंत्री, इंजीनियर, ठेकेदार से राज्य के मुख्यमंत्री तक के निजी निर्माण में मददगार होता है।

मैं 2001 के महाकुंभ के दौरान इलाहाबाद में रिपोर्टिंग कर रहा था। इस दौरान मुझे जो जानकारी मिली वो ये कि इस कुंभ मेले में अपनी ड्यूटी लगवाने के लिए इंजीनियरों ने लाखों रुपए मंत्रीजी को चढ़ावे में दिए थे। महाकुंभ में करोड़ो रुपए का काम बिना हुए ही भुगतान कर दिया गया। इसका तरीका भी आसान था, ठेकेदार दो लाख के भुगतान के लिए एडवांस में नकद एक लाख पचीस हजार रुपए चढ़ावे में देता था। वो, मंत्री से लेकर बाबू तक बंट जाता था। बची पचहत्तर हजार की रकम ठेकेदार को बिना कुछ किए फायदे के तौर पर मिल जाती थी।

लोक निर्माण विभाग का मैं सिर्फ उदाहरण दे रहा हूं। हर विभाग में ऐसा ही होता है। कहा न भ्रष्टाचार मजा देने लगा है। हर विभाग में भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी को तेज-तर्रार लोगों में गिना जाता है। जो, भ्रष्टाचार में मददगार न हो उसे, कोई अपने साथ नहीं रखना-देखना चाहता। ऐसे लोग बेकार माने जाते हैं। पैसे लेकर काम करने वाला -मंत्री, सांसद, विधायक, सभासद, अधिकारी, दरोगा, सिपाही- सबको पसंद आता है। पैसे लेकर काम कराने वाला दलाल भी इज्जत की नजर से देखा जाता है। हम तो अब रिश्ते भी यही देखकर करते हैं कि भ्रष्टाचार में हमारा रिश्तेदार कितना आगे है। ये बात पूरी हनक के साथ दूसरों को बताते भी हैं। तो, भ्रष्ट समाज के सम्मान में जोर से बोलो- हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

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