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Sunday, September 13, 2015

लाल बत्ती की जरूरत क्या है

देश में किसी भी समस्या के लिए सबसे आसानी से अगर किसी एक बात को दोषी ठहराया जाता है, तो वो है लालफीताशाही। देश के अंदर भी और देश के बाहर भी ये सामान्य धारणा है कि भारत में लालफीताशाही की वजह से चीजें अपनी रफ्तार में नहीं चल पाती हैं। हर सरकार लालफीताशाही खत्म करने की बात भी कहती है। लेकिन, देश में उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुए करीब ढाई दशक होने के बाद भी लालफीताशाही अपनी जगह बनी हुई है। नरेंद्र मोदी की सरकार जब बनी थी, तो नरेंद्र मोदी ने बार-बार ये कहा कि लालफीताशाही खत्म करना उनकी प्राथमिकता है। इसे और आगे ले जाते हुए उन्होंने कहा कि हम हर दिन एक गैरजरूरी कानून खत्म करेंगे। नरेंद्र मोदी ने धीरे-धीरे वो किया भी है। और अब नितिन गडकरी ने एक ऐसा प्रस्ताव आगे बढ़ाया है, जो लागू हुआ तो शायद लालफीताशाही को सही मायने में खत्म करने वाला सबसे बड़ा फैसला होगा। लालफीताशाही दरअसल किसी फाइल पर लाल निशान लगाने, काम को रोकने से संबंध रखती है। लेकिन, लालफीताशाही ये भी है कि देश में अंबैसडर कारों, आज के संदर्भ में दूसरी कंपनियों की कारों, एसयूवी पर चमकती लाल बत्तियां सड़कों पर एक खास प्रभुत्व के दर्शन कराती रहती हैं। देश को आजाद हुए करीब सत्तर साल हो गए। लेकिन, अंग्रेजों के जमाने की ये लाल बत्ती वाली सत्ता की निशानी देश में वीआईपी होने का सबसे बड़ा अहसास है। ऐसे में जब भूतल परिवहन मंत्री केंद्र सरकार में इस बात पर सहमति बनाने की कोशिश की है कि देश में लालबत्ती गाड़ियों की संख्या लगभग खत्म कर दी जाए। तो, लगता है कि नरेंद्र मोदी की इस सरकार में मंत्रियों का दृष्टिकोण बेहतर है। नितिन गडकरी नरेंद्र मोदी सरकार में सबसे ज्यादा कामकाजी मंत्रियों में से हैं। नितिन गडकरी अपने मंत्रालय में काम कर रहे हैं। और इसी काम करने में नितिन गडकरी ने लाल बत्तियों वाली कारों की संख्या सीमित करने प्रस्ताव आगे बढ़ाया है। इस प्रस्ताव में नितिन गडकरी ने राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही लाल बत्ती की विशेषाधिकार देने की बात की है। इसके अलावा राज्यों में लाल बत्ती वाली गाड़ी के इस्तेमाल का अधिकार सिर्फ राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ही देने की बात की गई है। इसे कानून बनाने से पहले नितिन गडकरी ने सभी मंत्रालयों को भी ये प्रस्ताव भेजा है। और अच्छी बात ये है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस प्रस्ताव को लागू करने पर सहमति जताई है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी लाल बत्ती का इस्तेमाल कम से कम करने के इस प्रस्ताव पर सहमति जताई है। चर्चा है कि नितिन गडकरी ने जब प्रधानमंत्री से इस प्रस्ताव को लागू करने की बात की, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी मंत्रालयों से चर्चा करके इसे लागू करने की सलाह दी है। अब अगर ये कानून लागू हो जाता है, तो कल्पना की जा सकती है कि भारतीय सड़कों से इस वीवीआईपी क्लास के गायब होने से लालफीताशाही कितनी आसानी से कम की जा सकती है। इस प्रस्ताव को अलग तरीके से इसलिए भी देखना चाहिए क्योंकि, अकसर इस बात की चर्चा होती है। या ये कहें कि सांसदों, मंत्रियों की आलोचना होती है कि अपनी तनख्वाह, अपने भत्ते बढ़ाने के लिए खुद ही प्रस्ताव पास कर लेते हैं। लागू कर देते हैं। अब अगर एक सरकार अपने ही मंत्रियों को लाल बत्ती के विशेषाधिकार से बाहर कर रही है, तो इसकी चर्चा बड़े बदलाव के तौर पर होनी चाहिए। लाल बत्ती के इस प्रस्ताव के लागू होने के बाद खुद भूतल परिवहन मंत्री भी लाल बत्ती के अधिकारी नहीं रह जाएंगे। इसलिए भी इसे बड़े बदलाव के तौर पर देखा जाना चाहिए।


लाल बत्ती वाली गाड़ियों का इस्तेमाल किस कदर होता है। इसके बारे में भारत में किसी को शायद ही कुछ बताने की जरूरत हो। ज्यादातर भारतीयों को अपने जीवन में कई बार लाल बत्ती की महत्ता, सत्ता का अहसास होता ही होता है। राज्यों में तो लाल बत्तियों की महत्ता इस कदर होती है कि राजनीति में बरसों से लगे नेताओं में मंत्री न बन पाने के बाद किसी ऐसी संस्था का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष बनने की होड़ लग जाती है जिसमें लाल बत्ती वाली गाड़ी जरूर मिल जाए। या फिर सरकार उनको दिए पद को ही राज्य मंत्री का दर्जा देकर उन्हें लाल बत्ती दे देती है। अब अगर केंद्र सरकार के मंत्री को भी लाल बत्ती का अधिकार नहीं रहेगा। तो, इस तरह से पिछले दरवाजे से लाल बत्ती के लिए कतार लगाए खड़े लोग भी हतोत्साहित होंगे। लाल बत्ती की सत्ता की महत्ता इस कदर कष्ट देने लगी थी कि 2013 में सर्वोच्च न्यायालय को सरकार से ये कहना पड़ा कि लाल बत्तियों की संख्या घटाई जाए। और नई सूची सर्वोच्च न्यायालय को सौंपी जाए। कमाल की बात ये है कि आजादी के सत्तर साल बाद देश के सर्वोच्च न्यायालय को गुलामी की प्रतीक लाल बत्तियों पर ये टिप्पणी करनी पड़ी। अच्छा है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार लाल बत्ती के विशेषाधिकार को लगभग खत्म करने की सोच रही है। लाल बत्ती के साथ लगे हाथ लाल बत्ती के विशेषाधिकार वाली गाड़ियों में चलने वालों के लिए लगने वाले रूट का भी सिस्टम खत्म किया जाना चाहिए। रूट का मतलब ये कि ये लाल बत्ती वाले मंत्री लोग जिस रास्ते से जाते हैं उस रास्ते को पूरी तरह से लोगों के लिए रोक दिया जाता है। अच्छा लगता है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चंडीगढ़ में एक कार्यक्रम में जाते हैं। और लोगों से क्षमा मांगते हैं कि उनके कार्यक्रम की वजह से लोगों को कष्ट हुआ। लेकिन, ये सरकार नियमित व्यवहार का हिस्सा होना चाहिए। अगर ये हो पाया तभी शायद नरेंद्र मोदी के मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस की बात साकार हो पाएगी। इक्कीसवीं सदी में तो लाल बत्ती की ये लालफीताशाही बर्दाश्त के बाहर है। 

Monday, September 23, 2013

नितिन गडकरी नागपुर से चुनाव लड़ेंगे?

जमीन पर रहना-जाना जरूरी होता है। न्यूजरूम से जो पता चलता है वो न्यूजरूम जैसा ही होता है। मतलब चमकता और उस चमक में हकीकत अकसर साफ-साफ दिख नहीं पाती। अभी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के बुलावे पर वर्धा गया था। हिंदा ब्लॉगिंग व सोशल मीडिया पर दो दिन की राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठी थी। मेरा विषय था सोशल मीडिया और राजनीति।  इस संगोष्ठी और वर्धा विश्वविद्यालय की चर्चा आगे की पोस्ट में। अभी बात राजनीति की।
नागपुर में संघ मुख्यालय परिसर में
लौटते समय सोचा कि नागपुर कई बार आकर नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय तक जाना नहीं हो पा रहा है। इसलिए स्टेशन से पहले पहुंच गए रेशमबाग के संघ मुख्यालय यानी केशवराव बलिराम हेडगेवार स्मृति परिसर। शानदार परिसर। बहुत बड़ी इमारत। और परिसर में हेडगेवार की चमकती मूर्ति। रात का समय था और मोबाइल से तस्वीरें लीं। इसलिए उसकी भव्यता का उतना अंदाजा लगाना मुश्किल होगा। परिसर में जो सभागार है उसका नाम महर्षि व्यास सभागार है। शाम के आठ बज रहे थे। महर्षि व्यास सभागार के अंदर से आवाजें आ रहीं थीं। झाककर देखा तो शाखा लगी हुई थी। तस्वीर उतारने का मोह नहीं छोड़ पाया। ठीक-ठाक संख्या थी।

महर्षि व्यास सभागार में चल रही सायं शाखा
नागपुर संसदीय क्षेत्र में नागपुर दक्षिण पश्चिम, नागपुर दक्षिण, नागपुर पूर्व, नागपुर मध्य, नागपुर पश्चिम, नागपुर उत्तर- कुल 6 विधानसभा आती हैं। देवेंद्र फडनवीस नागपुर दक्षिण पश्चिम से विधायक हैं और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। नागपुर दक्षिण से विधायक दीनानाथ देवराव पडोले हैं जो कांग्रेस हैं। नागपुर पूर्व से विधायक कृष्णा खोपड़े हैं ये भी सीट बीजेपी के पास है। नागपुर मध्य से भी बीजेपी के ही विकास शांकरराव कुंभारे विधायक हैं। नागपुर पश्चिम पर भी भारतीय जनता पार्टी की कब्जा है विधायक हैं सुधाकर शामराव देशमुख और नागपुर उत्तर पर कांग्रेस पार्टी के विधायक हैं नितिन काशीनाथ राउत। (स्रोत- विकीपीडिया) लेकिन नागपुर संसदीय क्षेत्र की 6 में से 4 विधानसभा सीटें जीतने के बाद भी नागपुर ने सांसद कांग्रेस का चुना है। कांग्रेस के विलास मुत्तेमवार यहां से सांसद हैं। इसीलिए नागपुर सीट संघ के लिए छवि और प्रतिष्ठा का विषय है। इस बार चर्चा भी इस बात की है कि बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी यहां से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। इस बात की संभावना भी पूरी है।

लेकिन, नागपुर से दिल्ली लौटते समय केरल एक्सप्रेस में मिले गजानन कोषटवार ने मेरी और देश में जाहिर इस आम धारणा को तोड़ने की कोशिश की। गजानन कोषटवार नागपुर के मनीष नगर में रहते हैं, बीजेपी समर्थक हैं। बीना में रिफाइनरी में काम करते हैं। कहते हैं पिछले कुछ समय से वोट भी कर रहे हैं। लेकिन, वो कह रहे हैं कि नितिन गडकरी चुनाव नहीं लड़ेंगे। वजह। उन्होंने जो वजह बताई वो चौंकाने वाली और अविश्वसनीय है। गजानन का कहना था कि वो बीजेपी के भले हैं लेकिन, जब वोट देना होगा तो बनिया जाति के विलास मुत्तेमवार को ही वोट देंगे। हल्की मुस्कुराहट के साथ उन्होंने कहा कि यही हकीकत है। गजानन यहां तक कह गए कि विलास मुत्तेमवार और नितिन गडकरी के बीच बहुत गहरे संबंध हैं। मुश्किल है कि नितिन गडकरी विलास मुत्तेमवार के सामने चुनाव मैदान में आएं। मतलब या मुत्तेमवार लड़े तो गडकरी बीजेपी से प्रत्याशी नहीं होंगे। और, अगर नितिन गडकरी चुनाव लड़ते हैं तो विलास मुत्तेमवार कांग्रेस से टिकट नहीं लेंगे। हालांकि, उनकी ये दलील मेरे गले नहीं उतरती। क्योंकि, वो लगे हाथ ये भी कहते हैं कि इस बार नरेंद्र मोदी की वजह से समीकरण बीजेपी के पक्ष में हैं। इसलिए नितिन गडकरी के चुनाव न लड़ने की बात तो मुझे समझ में नहीं आती और एक आदमी की राय पर कुछ तय मानना पूरी तरह से गलत होगा। लेकिन, जब योगेंद्र यादव इतने सर्वे गलत करने के बाद अपनी पार्टी #AAP को खुद सर्वे करके जिता देते हैं और उसका जमकर प्रचार-प्रसार होता है तो, मुझे लगता है कि मेरा तो इसमें कोई हित नहीं जुड़ा इसलिए इसे लिख रहा हूं। हो सकता है सही हो।

Wednesday, April 21, 2010

प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, भ्रमित नेता

भारतीय जनता पार्टी ने बुधवार को आज दिल्ली में जो रैली की वो, अपने आप में एतिहासिक कई मायनों में है। सबसे बड़ी बात तो ये कि भारतीय जनता पार्टी की इस 42 डिग्री की गर्मी में दिल्ली में हुई इस रैली ने साबित कर दिया कि घर बैठे कांग्रेस सरकार के राज में महंगाई की गर्मी की तपिश दिल्ली आकर 41 डिग्री के तापमान में झुलसने से कहीं ज्यादा भारी है। साबित ये भी हुआ कि नितिन गडकरी कैसे अध्यक्ष होंगे, उनका बीजेपी के इतिहास में नाम कैसे लिखाएगा ये तो, वक्त बताएगा लेकिन, संघ के इस लाडले अध्यक्ष की ताकत पूरे देश ने देख ली। साबित ये भी हुआ कि अटल-आडवाणी-जोशी और उस दौर के सारे नेताओं को भी नमस्ते किया जा चुका है। पार्टी कार्यकर्ता के सामने सिर्फ और सिर्फ सरकार से महंगाई पर कड़े सवाल पूछते गडकरी ही दिख रहे थे।

लेकिन, इतना सबकुछ होने गडकरी के सबसे ताकतवर नेता के तौर पर प्रतिस्थापित होने के बावजूद गडकरी की बेहोशी ने मीडिया को विश्लेषण का वो बहाना दे दिया कि जब नेता खुद खड़ा नहीं हो पा रहा है तो, पार्टी क्या खड़ी करेगा। देश भर से आए बीजेपी कार्यकर्ताओं की जुबान में बोलते हुए बीजेपी के ताजा-ताजा प्रवक्ता बने तरुण विजय भले ही इसे मीडिया का फाउल गेम कहें कि मीडिया बेवजह उनके अध्यक्ष की बेहोशी को तूल दे रहा हो, मीडिया को देश भर से आए लाखों कार्यकर्ता नहीं दिखे। अब तरुण विजय कुछ भी कहें लेकिन, सवाल उनसे मीडिया अगर पूछे कि क्या कांग्रेस की किसी रैली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी धूप में बेहोश होकर गिर पड़ें तो, क्या बीजेपी इस बात का बतंगड़ नहीं बनाएगी। बनाएगी और जरूर बनाएगी।

प्रतीकों की राजनीति से सत्ता तक पहुंच जाने वाली पार्टियों के इस देश में ऐसे प्रतीक बड़ा असर करते हैं। और, गडकरी की बेहोशी का असर भी उसी तरह से हुआ। गडकरी को कुछ दिन पहले मैंने अपने लेख में एक सलाह दी थी, दूसरे उनके शुभचिंतक भी उनको ये सलाह जरूर देते होंगे अगर वो, उनका बात सुनते होंगे। वो, सलाह भी यही होती होगी कि गडकरी जी राहुल गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस से लड़ना है तो, चुस्त-दुरुस्त रहिए। स्लिम मत होइए लेकिन, स्वस्थ रहिए-स्वस्थ दिखिए। वरना तो, राहुल गांधी के NREGS में तसला उठाए धूप में मिट्टी ढोती तस्वीरों के सामने आपकी रैली में करीब डेढ़ लाख की भीड़ होने पर भी बेहोश होकर गिरने की तस्वीरें कहां ठहर पाएंगी। सोचिए सिर्फ अच्छी बातें करने से कुछ नहीं होगा। अच्छी बातों पर अमल दिखे और इन बातों पर अमल करने वाला पार्टी अध्यक्ष अच्छा दिखे ये बड़ा जरूरी है। अभी ये शुरुआत है आगे इसे सुधार लें तो, शायद मामला संभल जाए।

बीजेपी की महारैली देखने के लिए मैंने राजीव चौक स्टेशन से रामलीला मैदान के लिए ऑटो वाले से पूछा तो, उसका जवाब था-साहब पिछले 25 सालों से ऑटो चला रहा हूं ऐसी रैली नहीं देखी। मैं नहीं जाऊंगा। दूसरा ऑटो वाला इस शर्त पर तैयार हुआ जहां ज्यादा जाम हुआ वहीं छोड़ दूंगा लेकिन, 30 रुपए लूंगा। मुझे लगा अतिशयोक्ति है लेकिन, रामलीला मैदान पर सचमुच ऐसा माहौल था जिससे कहीं से ये लग ही नहीं रहा था ये उस पार्टी की रैली है जिसके गर्त में जाने की भविष्यवाणी पिछले लोकसभा चुनाव में हार के बाद जाने कितने राजनीतिक विश्लेषक लगाने लगे थे। कार्यकर्ताओं में जबरदस्त जोश और जान दिख रही थी।

मंच पर बुढ़ाती पीढ़ी के आडवाणी-जोशी थे लेकिन, पोस्टरों से ये सब गायब थे। किसी-किसी को गडकरी के साथ आडवाणी की सुध आ गई दिख रही थी। मंच के एक-एक तरफ दीन दयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तस्वीरें टंगी थीं। और, मंच के एक तरफ बड़ा सा लहराता हुआ अटल बिहारी वाजपेयी का मुस्कुराता चित्र था जिस पर उनकी कविताएं लिखीं थीं। नारे लिखे बोर्ड्स पर आम जन या फिर नितिन गडकरी ही दिख रहे थे।

सबसे बड़ी बात ये थी कि रैली में ज्यादातर जगहों कम से कम उत्तर प्रदेश से तो कार्यकर्ता जुटाकर नहीं लाए गए थे। छिटपुट 10-20 की टोली में आए थे। किसी बड़े नेता के साथ जुटकर नहीं आए थे। उम्मीद में चले आए थे पता नहीं अगर वो, रैली के बाद नेताओं के व्यवहार से ठगे न महसूस कर रहे होंगे तो, उत्तर प्रदेश में जमीन से चिपकी पार्टी थोड़ी तो, ऊपर उठेगी। उत्तर प्रदेश में पार्टी की दुर्दशा की वजह समझ में आई जब पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह बोलने खड़े हुए तो, एक कार्यकर्ता मेरे ठीक पीछे से बोला – अब तो ग आधी भीड़। ये कोई पैमाना नहीं है लेकिन, ऐसी कच्ची-पक्की लाइनें किसी गंभीर सर्वे से ज्यादा महत्व रखती हैं। हां, रैली में इंतजाम से कार्यकर्ता बहुत खुश थे। पानी के टैंकर से लेकर पैंकेटबंद पानी तक मुफ्त था। लखनऊ से आने वाले करीब डेढ़ हजार कार्यकर्ताओं के लिए सांसद लालजी टंडन के घर भोजन का इंतजाम था। लखनऊ के कार्य़कर्ताओं की बसें तो, जाम में फंस गईं वो तो, समय से नहीं पहुंच सके। हां, उत्तर प्रदेश के दूसरे जिलों से आए कार्यकर्ताओं को शानदार भोजन मिल गया।

अब बीजेपी इस रैली की सफलता से गदगद होगी लेकिन, लगे हाथ उसे ये भी आंकलन जरूर करना चाहिए कि इतनी बड़ी भीड़ की मंशा पार्टी नेता क्यों नहीं भांप सके जो, इस गर्मी में भी पुलिस की लाठी खाने को तैयार थी लेकिन, नेता जी लोग गर्मी झेलने से डर रहे थे। और, बार-बार कार्यकर्ताओं को अनुशासन का पाठ पढ़ा रहे थे। जितनी बार बीजेपी के बड़े नेता सिर्फ दस हजार लोगों के जंतर-मंतर तक जाने की प्रशासन की इजाजत बताकर कार्यकर्ताओं को अनुशासित करने की कोशिश कर रहे थे। उतनी बार कार्यकर्ता नेताओं पर खीझ रहा था। दरअसल ये वही कार्यकर्ताओं की भीड़ थी जो, 2004 के लोकसभा चुनावों के समय भी बीजेपी के साथ थी जिसे देखकर पूरे मीडिया ने बीजेपी की जीत का अनुमान लगाया था। और, ये भीड़ 2009 के लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी के साथ थी लेकिन, नेताओं इन कार्यकर्ताओं के जोश को वोट में नहीं बदल सके। बीजेपी और उसके नए अध्यक्ष ये बात समझ लें तो, शायद एक बार फिर बाजी पलट सकती है।
(this article is published on peoples samachar's edit page)

Thursday, December 24, 2009

मराठी भाजपा अध्यक्ष की चुनौतियां


भारी भरकम शरीर वाले नितिन गडकरी का भाजपा अध्यक्ष बनना कई मायनों में एतिहासिक है। वैसे तो नितिन गडकरी संघ के पूर्ण आशीर्वाद की वजह से ही उस कुर्सी पर बैठ पाए हैं जिस पद के जरिए अटल बिहारी वाजपेयी-लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जैसे भाजपा के दिग्गजों ने पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे तक पहुंचा दिया और, कांग्रेस का विकल्प भाजपा बन गई। गड़करी सिर्फ 52 वर्ष के हैं और भाजपा के इतिहास में सबसे कम उम्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। गडकरी मराठी हैं और संघ मुख्यालय नागपुर में होने के बावजूद पहली बार संघ ने किसी मराठी के लिए प्रतिष्ठा लगाई है।


इतनी एतिहासिक परिस्थितियों में कुर्सी संभालने वाले गडकरी अब आगे इतिहास बनाएंगे या खुद इतिहास में ठीक तरीके से दर्ज भी नहीं हो पाएंगे। गडकरी का नाम जब राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए पहली बार सामने आया था तो, राष्ट्रीय मीडिया में एक सुर था-- मरती भाजपा के लिए आत्मघाती कदम। राज्य स्तर के नेता को राष्ट्रीय दर्जा देने की संघ की कोशिश की खूब आलोचना हुई थी। लेकिन, गडकरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही गडकरी के लिए फ्लाईओवर मैन, विकास पुरुष जैसे नारे सुर्खियां बन गए। टीवी चैनलों पर गडकरी का स्कूटर से वोट डालने वाला दृष्य भी खूब दिखाया। गडकरी को इस चुनौती को समझना होगा। मीडिया से संबंध बेहतर रखें लेकिन, सिर्फ और सिर्फ काम करना होगा। भाजपा की जगह आज भी है लेकिन, माहौल अच्छा नहीं है। खुद की राष्ट्रीय छवि तैयार करनी होगी।


गडकरी की सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि वो, दिल्ली दरबार के उन माहिर खिलाड़यों को पटकनी देकर भाजपा के मुखिया बने हैं जो, पिछले एक दशक से दिल्ली की राजनीति का रास्ता बनाते बिगाड़ते रहे हैं। भले ही आंतरिक संतुलन बनाए रखने के लिए आडवाणी को घर के बड़े बुजुर्ग जैसे भाजपा संसदीय समिति के चेयरमैन का पद दे दिया गया और सुषमा को लोकसभा और जेटली को राज्यसभा में भाजपा का मुखिया बना दिया गया। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये दोनों नेता खुद को आडवाणी के बाद पार्टी के स्वाभाविक मुखिया के तौर पर देख रहे थे। यहां तक कि गडकरी की ताजपोशी के पहले तक पार्टी कार्यकर्ता भी इन्हीं में से किसी की ताजपोशी तय मान रहे थे। इसीलिए जब गडकरी का नाम तय हो गया तो, सुषमा स्वराज ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि उन्होंने और भाजपा के कुछ दूसरे नेताओं ने अध्यक्ष बनने से मना किया तब गडकरी का नाम आया। यानी गडकरी दूसरे दर्जे के नेता हैं जो, आज की बीजेपी के पहले दर्जे के नेताओं की छोड़ी सीट पर बैठ रहे हैं। गडकरी की सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली दरबार के नेताओं से तालमेल बिठाते हुए इसी पहले दर्जे में खुद को स्थापित करने की होगी।


ठीक पहले के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के कार्यकाल से भी नितिन गडकरी सबक ले सकते हैं। राजनाथ सिंह देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश से आते हैं। और, अध्यक्ष बनते समय यही राजनाथ सिंह के मजबूत पक्ष को दिखा रहा था। लेकिन, कार्यकाल खत्म होते-होते साफ हो गया कि राजनाथ के समय में बीजेपी की देश में जो दुर्गति हुई सो हुई- उत्तर प्रदेश में पार्टी पहले-दूसरे की लड़ाई से नीचे उतरकर तीसरे नंबर पर पहुंच गई। अब गडकरी के सामने दो राज्यों में भाजपा का प्रभाव फिर से स्थापित करना तुरंत की चुनौती होगी। पहला उत्तर प्रदेश और दूसरा अपने गृह राज्य महाराष्ट्र में।


उत्तर प्रदेश में नया नेतृत्व तलाशना गडकरी के लिए सबसे मुश्किल काम होगा। बीजेपी में अब तक कद्दावर रहे नेताओं की लाइन एक दूसरे की इतनी छीछालेदर कर चुकी है कि वो, चाहकर भी किसी एक के साथ चल नहीं पाएंगे। ऐसे में गडकरी को कोई ऐसा नेतृत्व खोजना होगा जिसे संघ का आशीर्वाद मिले और जो, नौजवानों की टीम खड़ी कर सके। उत्तर प्रदेश में भाजपा के संगठन मंत्री नागेंद्र नाथ गडकरी के लिए बेहतर दांव साबित हो सकते हैं। नागेंद्र नाथ संघ के प्रचारक हैं। उनके समय में ही विद्यार्थी परिषद राज्य के हर विश्वविद्यालय में प्रभावी स्थिति में पहुंची। और, परिषद-कैडर के प्रत्याशियों को पिछले विधानसभा चुनाव में आजमाने की उन्होंने काफी कोशिश पिछले विधानसभा चुनाव में की भी थी। लेकिन, बसपा की सोशल इंजीनियरिंग और भाजपा के नेताओं की आपसी मारामारी में अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सका।


उत्तर प्रदेश से भी बड़ी चुनौती गडकरी के लिए महाराष्ट्र में होगी। क्योंकि, महाराष्ट्र में जाकर भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी को शिवसेना जैसी क्षेत्रीय पार्टी के पीछे चलना पड़ता है। यही वजह है कि मुंबई हमले और उत्तर भारतीयों पर राज ठाकरे के हमले के बावजूद भाजपा के कमल पर कांग्रेस का हाथ भारी पड़ गया। अच्छी बात ये है कि महाराष्ट्री की राजनीति को नजदीक से देखने वाले खूब जानते हैं कि गडकरी हमेशा महाजन-ठाकरे गठजोड़ के खिलाफ खड़े होकर मजबूत होते रहे। अब गडकरी को राज्य में गोपीनाथ मुंडे और विनोद तावड़े से संतुलन साधना होगा। और, साथ ही संकीर्ण ठाकरे छाया से भाजपा को मुक्त कराना होगा। गडकरी मराठी हैं और इसलिए कुछ समय पहले तक सिर्फ उत्तर भारत की मानी जाने वाली पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर महाराष्ट्र में मराठी-उत्तर भारतीय वोटबैंक को बेहतर तरीके से साध सकते हैं। 


भाजपा शासित राज्यों में सत्ता-संगठन तालमेल के लिए गडकरी को नए सिरे से योजना बनानी होगी। कर्नाटक में येदियुरप्पा का हाथ मजबूत करना होगा जिससे फिर कभी रेड्डी भाइयों की ब्लैकमेलिंग के फंदे में भाजपा न फंसे। गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में बेहद मजबूत मुख्यमंत्रियों की सत्ता में भाजपा संगठन खत्म न हो जाए इसकी चिंता भी गडकरी को करनी होगी। उत्तराखंड में कोश्यारी-खंडूरी की कलह अभी खत्म नहीं हुई है तो, राजस्थान में अब तक पार्टी के पास वसुंधरा राजे का विकल्प नहीं बन सका है।


इन सारी चुनौतियों के अलावा गडकरी के लिए संघ-भाजपा का संतुलन बनाए रखना भी कम बड़ी चुनौती नहीं होगी। वैसे, अभी भाजपा भले ही 116 सांसदों वाली और कई राज्यों में शासन वाली पार्टी हो लेकिन, सच्चाई यही है कि संघ कैडर लगभग भाजपा से दूरी बना चुका है। उसे वापस लाया जा सकता है इसके लिए कैडर को ये दिखना चाहिए कि संघ का कहा भाजपा अभी भी मानती है। ये खुद गडकरी की ताजपोशी से साबित भी हो चुका है। और, अब आने वाला समय ये तय करेगा कि सबसे कम उम्र सर संघचालक और सबसे कम उम्र भाजपा अध्यक्ष इतिहास में किस तरह से नाम दर्ज कराते हैं।



(ये लेख राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

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