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Saturday, July 01, 2017

फिलहाल घरेलू झगड़े में टूटी जमीन भरने में लगे हैं अखिलेश यादव

विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ा सवाल था कि प्रचण्ड बहुमत से आई सरकार के सामने निराश समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल कैसे बढ़ाया जाए। ये सवाल इसलिए भी और बड़ा हो गया है क्योंकि, चाचा शिवपाल यादव नई पार्टी बनाने के लिए ताल ठोंक रहे थे और पिता मुलायम सिंह यादव हमेशा की तरह हर बीतते पल के साथ रंग बदल रहे हैं। ऐसे में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी पर कब्जा कर लेने के आरोप के साथ नई समाजवादी पार्टी की शुरुआत करने की बड़ी जिम्मेदारी अखिलेश के कंधों पर आ गई है। 44 साल की उम्र में अखिलेश के सामने ये बड़ी चुनौती है कि वो कैसे समाजवादी पार्टी का आधार सुरक्षित रखते हुए नए लोगों को समाजवादी पार्टी के साथ जोड़ पाते हैं। कमाल की बात ये है कि 44 साल के अखिलेश के 17 साल सत्ता के साथ बीते हैं। पिछले 5 साल से अखिलेश राज्य के मुख्यमंत्री थे, उसके पहले 10 साल तक सांसद। लेकिन, उस सत्रह साल की राजनीतिक मजबूती को चाचा शिवपाल यादव कृपा से मिली सफलता बताते हैं। इसीलिए जब आज 1 जुलाई को अखिलेश अधिकारिक तौर पर 44 साल के हो गए हैं, तो ये सवाल उठता है कि अखिलेश वाली नई समाजवादी पार्टी कैसे खड़ी हो पाएगी।
बुरी तरह चुनाव हारने के बाद मायावती ने पूरी तरह से ईवीएम मशीनों पर ठीकरा फोड़ दिया। हालांकि, अखिलेश ने इसे पहले जनता का आदेश कहा। बाद में लगा कि ईवीएम की राजनीति चल सकती है, तो उन्होंने भी ईवीएम मशीनों की जांच कराने की मांग कर दी। लेकिन, जल्दी ही उन्हें यह अहसास हो गया कि फिलहाल ये मुद्दा है नहीं। इसीलिए 25 मार्च को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद समाजवादी पार्टी का सदस्यता अभियान नए सिरे से शुरू करने का फैसला लिया गया। 25 मार्च के बाद लगभग हर तीसरा ट्वीट अखिलेश यादव ने या तो समाजवादी पार्टी के सदस्यता अभियान का किया है या फिर पार्टी कार्यालय में कार्यकर्ताओं के साथ मुलाकात करते हुए। दरअसल, मुख्यमंत्री रहने के दौरान अखिलेश यादव पर एक बड़ा आरोप लगा कि वो कुछ खास लोगों से ही घिरे रहते हैं। और समाजवादी पार्टी के असली कार्यकर्ता मुलायम सिंह यादव वाली समाजवादी पार्टी के हैं। समाजवादी पार्टी के एमएलसी और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य संजय लाठर कहते हैं कि ये भ्रम है कि समाजवादी पार्टी में शिवपाल यादव की असली ताकत है। इसी भ्रम को तोड़ने के लिए समाजवादी पार्टी ने 15 अप्रैल से 15 जून तक सदस्यता अभियान चलाया। जिसे बाद में बढ़ाकर 30 जून तक कर दिया गया। ये सदस्यता अभियान सबके लिए खुली थी। अब इसी आधार पर जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक का चुनाव होगा। संयोग देखिए कि 30 जून को सदस्यता अभियान खत्म होने के अगले ही दिन अधिकारिक तौर पर अखिलेश का जन्मदिन होता है। सदस्यता पूरी हो गई है अब पार्टी को भी आकार लेना है।
समाजवादी पार्टी को फिर से खड़ा करने के अखिलेश यादव के तीन सूत्र बिल्कुल साफ है। सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण- नई सदस्यता के बाद जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के चुनाव कराकर ये साबित कर देना कि अब समाजवादी पार्टी का मतलब सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव है।
दूसरा- प्रदेश की जनता के सामने अपनी साफ-सुथरी वाली छवि को और दुरुस्त करना। इसीलिए अखिलेश यादव ने 6 महीने तक योगी सरकार के खिलाफ कोई आन्दोलन न करने का फैसला लिया है।
तीसरा- प्रदेश की जनता को ये लगातार बताते रहना कि उनकी सरकार ने क्या किया। फिर चाहे वो आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे का काम हो, नोएडा एलिवेटेड रोड का काम हो या फिर डायल 100। इसका अन्दाजा 24 जून को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के एक ट्वीट से ठीक से समझ आता है।
राम राम जपना, पराया काम अपना।
अखिलेश यादव के इस ट्वीट को करीब साढ़े आठ हजार लोगों ने पसन्द किया। 2200 से ज्यादा लोगों ने इसे रिट्वीट किया है। उत्तर प्रदेश चुनाव नतीजों के बाद अखिलेश यादव के किए गए ट्वीट में से सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया इसी ट्वीट को मिली है।
इसी से उत्साहित होकर कहें या कि अपनी रणनीति के तीसरे सूत्र के तहत अखिलेश ने लगातार लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे, इटावा लायन सफारी की तस्वीरें डाली हैं। डायल 100 की सफलता की कहानी को अखिलेश प्रचारित कर रहे हैं। और सबसे बड़ी 29 जून को रामगोपाल यादव का सैफई में जन्मदिन था। 30 जून को उन्हें विदेश जाना था। लेकिन, अखिलेश विदेश जाने से पहले नोएडा आ गए। और नोएडा में एलिवेटेड रोड पर भी कार्यकर्ताओं के साथ काफी देर तक रहे। एलिवेटेड रोड अखिलेश के ही कार्यकाल में लगभग पूरी हो गई थी। जिसका लोकार्पण योगी सरकार के मंत्री सतीश महाना ने किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नहीं आए। शायद उसके पीछे, नोएडा आने से सत्ता जाने वाला डर हावी रहा हो। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश ने नोएडा आकर अपशकुन दूर करने के साथ अपने काम को लोगों को बताने की भी कोशिश की।
अखिलेश यादव जब अपना जन्मदिन मनाकर विदेश से लौटेंगे, तो ताजा-ताजा समाजवादी पार्टी के सदस्य बने करीब 1 करोड़ कार्यकर्ता उनके निर्देश का इन्तजार कर रहे होंगे। पहली बार मिस्ड कॉल और ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन के जरिए भी समाजवादी पार्टी की सदस्यता हुई है। समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता जूही सिंह कहती है कि अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी की छवि बदली है। महिला विरोधी, गुन्डा पार्टी की छवि किसी न किसी वजह से बन गई थी। सितम्बर के पहले या दूसरे हफ्ते में समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय अधिवेशन करने की तैयारी में है। उस समय तक योगी सरकार के 6 महीने भी पूरे हो जाएंगे। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में सितम्बर में फिर से बड़ी हलचल देखी जा सकती है। वो वक्त नगर निकाय चुनावों का भी होगा और अखिलेश यादव वाली नई समाजवादी पार्टी की परीक्षा का भी।
(ये लेख FirstPostHindi पर छपा है)

Tuesday, February 21, 2017

इस बार इटावा, औरैया में “नेताजी” नहीं “जाति” तय करेगी जीत

बेटी की विदाई हो जाने के बाद पिता/परिवार और चुनाव में मतदान हो जाने के बाद प्रत्याशी/समर्थक शांत से हो जाते हैं। स्थिर से हो जाते हैं। लेकिन, तीसरे चरण का चुनाव हो जाने के बाद समाजवादी पार्टी के गढ़ इटावा, औरैया में यादव परिवार में गजब हलचल मची हुई दिख रही हैं। समाजवादी पार्टी के गढ़ इटावा, औरैया में समाजवादी पार्टी के लिए वही कमजोरी बन सकती है, जिसे मुलायम सिंह यादव ने अपनी ताकत के तौर पर इस्तेमाल किया था। मुलायम सिंह यादव जातिवादी राजनीति के अगुवा राजनेता रहे हैं, जिसे उन्होंने बड़े सलीके से समाजवादी राजनीति की पैकिंग में बेचा। इटावा, औरैया में काफी संख्या यादव मतदाताओं की है। पिछड़े और मुसलमान के साथ मिलकर वो एक मजबूत आधार बन जाते हैं। यही वजह है कि इस इलाके में समाजवादी पार्टी अपने गठन के बाद से ही स्वाभाविक पार्टी के तौर पर दिखती है और मुलायम सिंह निर्विवाद नेता। अपनी जाति के आधार पर राजनीति करने वाले नेताओं की अगर देश में एक सूची बनाई जाएगी, तो शायद पहले स्थान के लिए मुलायम सिंह यादव से ही सभी को लड़ना होगा। कमाल की बात ये रही कि मुलायम के यादववाद में लम्बे समय तक सारी पिछड़ी जातियां यादव को अपना नेता मानकर खुद की तरक्की यादवों के जरिये ही होता देखती रहीं। लेकिन, 3 दशक में इतना ज्यादा जाति-जाति हुआ कि दूसरी जातियां भी अब जाग सी गई हैं। और, इसीलिए सैफई में सत्ता मतलब इटावा, औरैया की सत्ता वाला भ्रम इस चुनाव में टूटता दिख सकता है। इस चुनाव में सभी जातियों को अपना विधायक चाहिए। इसीलिए हर पार्टी के लिए जातीय जुगाड़ बड़ा कठिन हुआ। समाजवादी गढ़ में जाति का जंजाल कठिन हो गया है। इटावा और औरैया में हर जाति अपना विधायक चाहती है। मतदान हो गया लेकिन, ज्यादातर जातियों ने अपने पत्ते नहीं खोले। हां, इतना जरूर दिखा कि वो अपनी जाति के प्रत्याशी के साथ खुलकर रहीं। इटावा सदर विधानसभा पर रामगोपाल यादव का खासमखास आदमी कुलदीप गुप्ता मजबूत स्थिति में है। पूरे प्रदेश में और इटावा, औरैया की दूसरी सीटों पर परम्परागत तौर पर बीजेपी को वोट करने वाला बनिया मतदाता यहां कुलदीप गुप्ता के साथ खड़ा दिखा। इस सीट से ब्राह्मण उम्मीद कर रहे थे कि बीजेपी किसी ब्राह्मण को टिकट देगी। लेकिन, बीजेपी ने सरिता भदौरिया को टिकट दे दिया। इसकी वजह से ब्राह्मणों में थोड़ी नाराजगी देखने को मिली। 1991 में इस सीट से बीजेपी के अशोक दुबे विधायक बने। इसको भुनाने के लिए बीएसपी ने यहां से नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी को टिकट दिया। रघुराज शाक्य का टिकट कटने से नाराज शाक्यों के मत बीजेपी में जाने की खबरें हैं।
इटावा की जसवंतनगर सीट पर ढेर सारे अगर-मगर के बावजूद शिवपाल यादव की जीत पक्की मानी जा रही है। हालांकि, बीजेपी के मनीष यादव को भी अच्छा मत मिलने की उम्मीद है। मनीष यादव ने पिछला चुनाव बसपा से लड़ा था। इस बार बसपा ने दरवेश शाक्य को टिकट दिया है। इसकी वजह से इटावा सदर में बीजेपी के साथ जाते दिखे शाक्य मत इस सीट पर बसपा के लिए गोलबंद होते दिखे। इटावा की भरथना सीट पर समाजवादी पार्टी ने मौजूदा विधायक सुखदेवी वर्मा का टिकट काटकर कमलेश कठेरिया को टिकट दे दिया है। इसकी वजह से कहा जा रहा है कि वर्मा बिरादरी ने सपा प्रत्याशी के खिलाफ वोट किया है। बीजेपी ने भी यहां से सावित्रा कठेरिया को टिकट दिया है। जबकि, बसपा ने अपने पुराने प्रत्याशी राघवेंद्र गौतम पर भरोसा जताया है। गौतम की अच्छी छवि है। इटावा और भरथना दोनों सीटें ऐसी हैं, जहां ब्राह्मण मतदाता बहुत महत्वपूर्ण है। भरथना में ब्राह्मण बीजेपी के साथ दिखे।
मायावती ने मुख्यमंत्री रहते इटावा जिले की औरैया तहसील  काटकर जिला बना दिया था। इसका नतीजा ये रहा था कि 2002 में बसपा यहां की तीनों सीटें जीत गई थी। 2007 में भी बसपा ने 2 सीटें जीतीं थीं। सिर्फ बिधूना सीट पर धनीराम वर्मा सपा की इज्जत बचाने में कामयाब हुए थे। लेकिन, 2012 में सपा ने औरैया की तीनों सीटों पर कब्जा कर लिया। राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के लड़ने से 2012 के चुनाव में बीजेपी का खासा नुकसान हुआ था। 19 फरवरी को हुए मतदान में मामला थोड़ा उलटा दिखा। दिबियापुर सीट पर प्रदीप यादव को फिर से सपा ने मैदान में उतारा। यहां का लोध मतदाता बीजेपी के साथ, साथ ही दिबियापुर में बनिया और सवर्ण भी बीजेपी के साथ जाता दिखा है। हालांकि, बसपा से रामकुमार अवस्थी को बसपा के परम्परागत मतों के साथ ब्राह्मण मत भी मिलने की बात कही जा रही है।

बिधूना में बनिया मतदाता बीजेपी के साथ गया दिख रहा है। यहां मुलायम के साढ़ू प्रमोद गुप्ता का टिकट काटकर सपा ने दिनेश यादव को टिकट दिया है। दिनेश यादव धनीराम वर्मा के बेटे हैं। कन्नौज लोकसभा में ही बिधूना विधानसभा आती है और यहां से डिम्पल हार गई थीं। प्रमोद गुप्ता का टिकट कटने के पीछे ये भी एक बड़ी वजह बताई जा रही है। बीजेपी का विनय शाक्य को टिकट देना काम करता दिखा है। बीएसपी के शिवप्रसाद यादव को यादव मत मुश्किल से ही मिलते दिख रहे हैं। औरैया सीट इस चुनाव में सुरक्षित हो गई है। इस सीट पर ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या अधिक है। इस सीट पर समाजवादी पार्टी ने मौजूदा विधायक को ही टिकट दिया है। कुल मिलाकर सभी सीटों पर सबसे ज्यादा मजबूत समाजवादी पार्टी ही नजर आ रही है। लेकिन, मुलायम के इस गढ़ में लोग बीजेपी की स्थिति इस चुनाव में 1991 जैसी बता रहे हैं। माना जा रहा है कि बिधूना, इटावा सदर और भरथना में मतों के बिखराव की स्थिति में बीजेपी को लाभ हो सकता है। लेकिन, समाजवादी पार्टी के “नेताजी” मुलायम सिंह यादव या कहें कि किसी भी नेता के नाम पर नहीं, इस बार इटावा, औरैया का मतदाता विशुद्ध रूप से अपनी जाति की मजबूती खोज रहा है। और इसमें भी जो समझने वाली बात है कि इसके लिए किसी नेता को ठेकेदारी भी नहीं दे रहा। इसीलिए यादव परिवार के गढ़ जिलों में चुनाव के बाद शांति होने के बजाय हलचल बढ़ गई है। मुलायम ने यादव जाति जगाई, अब सब जातियां जाग गई हैं। 

Friday, February 17, 2017

“यूपी के लड़कों” की हवा खराब हो रही है !

आमतौर पर अच्छा रसोइया हो या भारतीय गृहणी, भगोने में पक रहे चावल के पकने का अंदाजा ऊपर के 1-2 चावल को हाथ में लेकर लगा लेती है। उत्तर प्रदेश के चुनावी मिजाज को समझने भर का काम उत्तर प्रदेश विधानसभा के 2 चरणों के चुनावों में हुए मतों के मिजाज को समझकर लगाया जा सकता है। इस चुनाव में एक कमाल की बात ये रही कि सत्ताधारी पार्टी के परिवार का झगड़ा चुनाव के ठीक पहले ऐसा उभरकर सामने आया कि चुनावी हवा खत्म सी हो गई। और इसीलिए ये लगने लगा कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठजोड़ की हवा बन गई है। क्योंकि, समाजवाद-कांग्रेस गठजोड़ बनते ही समीक्षकों की नजर में ये पक्का हो गया कि फरवरी के महीने में हो रहे इन चुनावों में मुसलमान आंख मूंदे किसी प्रेमी जैसा व्यवहार करेगा और पूरी तरह से इस गठजोड़ के आगे समर्पण कर देगा। लेकिन, समीक्षक इस प्रेम त्रिकोण के तीसरे कोण को ठीक से नहीं देख पा रहे थे। उसकी वजह भी बड़ी साफ थी। अखिलेश यादव ने चाचा-पिता के खिलाफ लड़ाई इस अंदाज में लड़ी कि सारा मीठा गप्प गप्प चला आया अखिलेश के खाते में और कड़वा कड़वा थू थू हो गया मुलायम और शिवपाल पर। उसी में किसानों का मांगपत्र भरवाते थक से गए राहुल गांधी ने भी अखिलेश का साथ थाम लिया। फिर क्या था “यूपी के लड़के” छा गए। ये मीडिया में बना माहौल था, जिसमें “यूपी के लड़के” छा गए थे। लेकिन, जमीन पर जब 2 चरणों के मतों का मिजाज दिखना शुरू हुआ है, तो लग रहा है कि “यूपी के लड़कों” की हवा खराब हो रही है।
“यूपी के लड़कों” की हवा खराब हो रही है, ये मैं क्यों कह रहा हूं ?
सबसे बड़ी और पहली वजह- कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों ने सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर ली थी। इस वजह से कांग्रेस के सम्भावित प्रत्याशी और कांग्रेस समर्थकों ने बमुश्किल कुछ सीटों पर ही समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों की मदद की है। और लगभग यही काम समाजवादी पार्टी के सम्भावित दावेदारों और उनके समर्थकों ने किया है। गठजोड़ की केमिस्ट्री गड़बड़ा गई है।
दूसरी बड़ी वजह ये रही कि आंख मूंदकर जिस तरह से मुसलमानों के इस गठजोड़ के साथ आने की उम्मीद “यूपी के लड़कों” को हो गई थी, वो उम्मीद धरी की धरी रह गई है। कम से कम पहले और दूसरे चरण में मत के बाद का मिजाज ऐसा ही दिख रहा है। मुसलमानों का मत समाजवादी-कांग्रेस गठजोड़ के बजाय हाथी के निशान पर लड़ रहे मुसलमानों पर ज्यादा भरोसे के साथ पड़ने की खबरें हैं। मायावती ने 403 में से 99 सीटों पर मुसलमानों को टिकट दिया है। मायावती का प्रचार तंत्र मुसलमानों को ये समझाने में कामयाब रहा है कि समाजवादी पार्टी की सरकार मुसलमानों पर हुए अत्याचार को रोकने में नाकाम रही है।
तीसरी बड़ी वजह ये रही कि मुजफ्फरनगर में हुए 2013 के दंगों के बाद जितनी तेजी से जाट-मुसलमान के एक साथ बैठने की उम्मीद राष्ट्रीय लोकदल के पक्ष में लगाई जा रही थी, वो समीकरण उतना सलीके से फिट होता नहीं दिखा है।
चौथी एक बड़ी वजह ये रही कि जाट आरक्षण और हरियाणा गैर जाट मुख्यमंत्री को लेकर पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाटों में जिस तरह का विरोध भारतीय जनता पार्टी के लिए दिख रहा था। उसे काफी हद तक ठीक करने में अमित शाह को सफलता मिल गई है। भले ही जाटों ने मई 2014 की तरह पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में मत नहीं दिए लेकिन, जाटों का गुस्सा जरूर काफी कम होता दिखा है।
पांचवी वजह ये कि कहा जा रहा था कि इस चुनाव में कोई हवा नहीं है। क्योंकि, यादव परिवार के झगड़े की हवा सबसे तेज चल रही थी। लेकिन, सच्चाई ये है कि मतदाताओं में हवा काम कर रही है। और वो हवा सत्ता के खिलाफ ही है। समाजवादी सरकार के 5 साल की कानून व्यवस्था ने उस हवा को अंदर ही अंदर बहुत तेज किया है।
छठवीं और आखिरी सबसे जरूरी वजह ये रही कि देश भर में दलित अत्याचार के मामले को बड़े सलीके से मुसलमानों के साथ जोड़ दिया गया है। उसकी वजह से उत्तर प्रदेश में एमवाई की जगह डीएम समीकरण का जोड़ ज्यादा तगड़ा दिख रहा है। मुसलमान और दलितों में संगत बेहतर हुई है, बनिस्बत यादव और मुसलमान के।

ये छह वजहें ऐसी हैं, जो “यूपी के लड़कों” की हवा खराब करती दिख रही हैं। साथ ही रणनीति के तौर पर मायावती का दलित-मुसलमान को ही सबसे आगे रखना काम करता दिख रहा है। समाजवादी-कांग्रेस गठजोड़ से अपनी सीधी लड़ाई बताने वाले अमित शाह ने भी पहले चरण के मत के बाद साफ कहाकि हमारी लड़ाई पहले-दूसरे चरण में बीएसपी से ही है। अभी जो नजर आ रहा है उसमें किसकी सरकार बनेगी, ये कहना कठिन है। पहले 3 चरण के चुनाव में ही समाजवादी-कांग्रेस गठजोड़ को भारी बढ़त की उम्मीद मुसलमान मतों के भरोसे थी, जो ध्वस्त होती दिख रही है। यूपी का मतदाता “यूपी के लड़कों” की हवा खराब करता साफ दिख रहा है और आखिरी नतीजे चौंकाने वाले ही होंगे, ये तय करता भी दिख रहा है। 

Wednesday, February 15, 2017

खिसकती दिख रही समाजवादी पार्टी की “बुनियादी ईंट”

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के राज में इटावा अति महत्वपूर्ण जिले में गिना जाता रहा है। अखिलेश यादव के राज में भी इटावा का ये रुतबा कायम रहा। ऐसा सुख शायद ही देश में किसी जिले को हासिल हो। मुलायम राज में इटावा के लोग खुद को सबसे ऊपर समझते रहे हैं। और इसी वीआईपी होने की चाहत में इटावा के लोगों ने आंख मूंदकर मुलायम सिंह यादव का समर्थन किया है। इसी जिले की जसवंतनगर सीट से मुलायम सिंह यादव ने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और उसके बाद ये शिवपाल की सीट हो गई। मुलायम सिंह यादव ने जसवंतनगर में भाई शिवपाल यादव के समर्थन में कहाकि अखिलेश जिद्दी है। कई बार वो बात सुन लेता है, कई बार नहीं सुनता। ऐसा कहते मुलायम भावुक हो गए। उन्होंने कहाकि शिवपाल को वही सम्मान दीजिए, जो आप मुझे देते रहे हैं। दरअसल जसवंतनगर एक ऐसी सीट है जिस पर पिछले 4 दशक से ज्यादा में 2 बार छोड़कर मुलायम सिंह यादव का कब्जा पक्का होता रहा है। 1967 में पहली बार मुलायम यहां से चुनकर विधानसभा में पहुंचे। उसके तुरंत बाद 1969 में हुए चुनाव में उन्हें बिशंभर सिंह यादव ने हरा दिया और एक बार 1980 में बलराम सिंह यादव ने हराया। इसके अलावा 67 से 93 तक ये सीट मुलायम सिंह को विधायक बनाती रही। 1996 से अभी तक यहां से शिवपाल सिंह यादव विधायक चुने जा रहे हैं। इस बार के चुनाव में भाजपा ने बसपा से पिछला चुनाव लड़े मनीष यादव पर भरोसा जताया है। बसपा से दरवेश कुमार शाक्य, और राष्ट्रीय लोकदल से जगपाल सिंह यादव लड़ रहे हैं। सीधे तौर पर शिवपाल को यहां खास चुनौती नहीं दिखती है। लेकिन, अंदरखाने अखिलेश यादव के समर्थक शिवपाल को चुनाव हराने की कोशिश में लगे हैं। ये बात जसवंतनगर की सड़कों पर कोई आम आदमी भी बता देगा।
जसवंतनगर सीट पर भले ही चाचा का टिकट काटने का साहस जसवंतनगर में अखिलेश भले न कर पाए। क्योंकि, चाचा शिवपाल को यहां हराना असम्भव न सही लेकिन, बहुत मुश्किल जरूर है। लेकिन, बगल की इटावा की सीट पर अखिलेश वाली समजावादी पार्टी ने मुलायम के खासमखास मौजूदा विधायक रघुराज शाक्य का टिकट काट दिया है। 2012 में रघुराज सिंह शाक्य ने बसपा के महेंद्र सिंह राजपूत को हराया था। हालांकि, राजपूत भी पुराने सपाई रहे। 2002 और 2007 के चुनाव में साइकिल की सवारी करके ही विधानसभा पहुंचे थे। शाक्य का टिकट काटकर रामगोपाल के नजदीकी कुलदीप गुप्ता को लड़ाया जा रहा है। कुलदीप गुप्ता इटावा नगर पालिका चेयरमैन हैं। भाजपा ने यहां से सरिता भदौरिया और बसपा ने नरेंद्र चतुर्वेदी को प्रत्याशी बनाया है। यादव, मुसलमान और शाक्य के मजबूत आधार मतों पर यहां समजावादी पार्टी का किला बहुत मजबूत रहा है। इस सीट पर 40 हजार मुसलमान मत हैं। और नगरपालिका के चुनाव में कुलदीप गुप्ता ने नफीसुल आलम को हराया था। कमाल की बात ये कि कुलदीप ने हिन्दू ध्रुवीकरण को अपने पक्ष में करके पालिका चेयरमैन की कुर्सी हथियाई। मुसलमानों का मानना है कि नफीसुल आलम को हराने में रामगोपाल यादव की बड़ी भूमिका रही है। नफीसुल को मुलायम-शिवपाल का नजदीकी माना जाता है। सवाल ये है कि क्या नगर पालिका की हार का बदला लेने के लिए इटावा के मुसलमान समाजवादी पार्टी के खिलाफ मत डाल सकते हैं। वैसे भी ये सीट तय करेगी कि इटावा में शिवपाल का अधिकार कुछ बचा हुआ है या रामगोपाल ने उसे लगभग खत्म कर दिया है। हालांकि, रामगोपाल यादव ने नफीसुल अंसारी को नगर पालिका चेयरमैन फिर से बनाने का वादा करके उन्हें कुलदीप के साथ लगा दिया है। साथ ही मुसलमान इलाकों में अवैध बिजली बड़ा मुद्दा है। मुसलमानों को लगता है कि बसपा की सरकार आई तो उनके लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

इटावा और जसवंतनगर के अलावा समाजवादी पार्टी की तीसरी बुनियादी आधार सीट है भरथना। 1989 में जनता दल और उसके बाद 1991 में जनता पार्टी। फिर जब मुलायम सिंह यादव ने अपनी समाजवादी पार्टी 1992 में बना ली तो उसके बाद से ये सीट समाजवादी पार्टी की परम्परागत सीट हो गई। 2007 मे मुलायम सिंह यादव खुद इस सीट से चुने गए। और, जब 2009 में मुलायम लोकसभा के लिए चुन लिए गए तो, बीएसपी के शिव प्रसाद यादव ने उपचुनाव में इस सीट पर कब्जा जमाया। लेकिन, 2012 के विधानसभा चुनाव में फिर से ये सीट समाजवादी पार्टी के खाते में आ गई। यहां से समाजवादी पार्टी ने कमलेश कुमार कठेरिया को प्रत्याशी बनाया है। बीजेपी से सावित्री कठेरिया और बीएसपी से राघवेंद्र गौतम प्रत्याशी हैं। राघवेंद्र गौतम के लिए प्रचार करने आई मायावती ने भरथना की रैली में कहाकि- ये दोनों एक दूसरे को हराएंगे। इसलिए सपा-कांग्रेस गठबंधन भी गया काम से। मायावती के ये दोनों दरअसल अखिलेश-शिवपाल हैं। इटावा जिले की हर विधानसभा सीट पर अखिलेश-रामगोपाल के समर्थक मुलायम-शिवपाल के समर्थकों को चिढ़ाते नजर आ रहे हैं। इसीलिए मायावती का ये कहना कि ये दोनों एक दूसरे को हराएंगे, अगर मुसलमानों को समझ में आ गया तो समाजवादी पार्टी की सबसे मजबूत बुनियादी ईंट इटावा में दरार पड़ सकती है। हो सकता है कि इस चुनाव में तीनों ही सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में आ जाएं लेकिन, लम्बे समय के लिए समाजवादी राजनीति का तगड़ा होता साफ दिख रहा है। क्योंकि, परिवार की लड़ाई की धुरी यही जिला है और इसी के चुनाव तय करेंगे कि लड़ाई 11 मार्च के बाद कैसे आगे बढ़ेगी। 

Tuesday, January 10, 2017

उत्तर प्रदेश में "परिवर्तन" का क्या होगा?

प्रख्यात समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि जिन्दा कौमें 5 साल तक इंतजार नहीं करती हैं। लेकिन, देश के सबसे बड़े सूबे में समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव 5 साल के बाद भी उत्तर प्रदेश की जनता को “परिवर्तन की आहट” ही सुना पा रहे हैं। और इसी परिवर्तन की आहट के जरिये वो उत्तर प्रदेश की जनता को संदेश देना चाह रहे हैं कि प्रदेश के लोगों की भलाई दोबारा समाजवादी पार्टी की सरकार लाने में ही है। और इसे बौद्धिक तौर पर मजबूती देने के लिए अखिलेश यादव के इस कार्यकाल पर एक किताब आई है। इस किताब में “परिवर्तन की आहट” बताता अखिलेश के भाषणों का संकलन है। कमाल की बात ये है कि आमतौर पर परिवर्तन की बात विपक्ष सत्ता हासिल करने के लिए करता है। लेकिन, उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य बनने जा रहा है, जहां चुनावी लड़ाई परिवर्तन के ही इर्द गिर्द हो रही है। फिर चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष। सरकार में आने के लिए विपक्ष सत्ता परिवर्तन की लड़ाई लड़ता है। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी का परिवर्तन पर खास जोर देना आश्चर्यजनक नहीं लगता। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विशेषकर परिवर्तन पर जोर देते हैं। भारतीय जनता पार्टी की पूरी चुनावी रणनीति इसी एक शब्द के इर्दगिर्द बुनी हुई दिखती है। परिवर्तन रथयात्रा और परिवर्तन महारैली ये भारतीय जनता पार्टी के दो सबसे बड़े चुनावी अस्त्र नजर आ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी अपनी यात्रा और रैली के जरिये ये बताने की कोशिश कर रही है कि उत्तर प्रदेश की जनता को अगर देश के सबसे बड़े सूबे का खोया हुआ सम्मान हासिल करना है, तो उसे परिवर्तन करना होगा। और वो परिवर्तन भारतीय जनता पार्टी की सरकार के आने से होगा।

बीजेपी राजनीतिक तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार की नाकामियों, कानून व्यवस्था और परिवारिक झगड़े को मुद्दा बनाए हुए है। साथ ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की उन योजनाओं का भी जिक्र परिवर्तन के साथ किया जा रहा है जिससे देश के साथ उत्तर प्रदेश के लोगों को भी सीधे लाभ मिलता दिखे। और इसीलिए अमित शाह हों या बीजेपी की परिवर्तन रथयात्रा के नेता, मोदी सरकार की हर योजना को एक सांस में लोगों को बताना नहीं भूलते। राजनीतिक लड़ाई के साथ बौद्धिक लड़ाई में भी भारतीय जनता पार्टी अब “परिवर्तन” की ही बात कर रही है। और इस बौद्धिक लड़ाई में “परिवर्तन” की ब्रांडिंग का जिम्मा बीजेपी के थिंक टैंक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान ने ले लिया है। संस्थान के निदेशक अनिर्बान गांगुली की मूल भाषा अंग्रेजी है। लेकिन, पिछले कुछ समय में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान ने हिन्दी को लेकर ढेर सारे शोध पत्र, पुस्तकें प्रकाशित की हैं। और अब “परिवर्तन की ओर” नाम से एक पुस्तक संस्थान लेकर आया है। अनिर्बान गांगुली कहते हैं कि ये कहना गलत होगा कि बीजेपी ने ये पुस्तक लिखी या लिखवाई है। निश्चित तौर पर इस पुस्तक में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद देश में अलग-अलग क्षेत्रों में हुए परिवर्तन की चर्चा है। लेकिन, इसे लिखने वाले कहीं से भी बीजेपी से सम्बद्ध नहीं हैं। ये स्वतंत्र लेखकों की ओर से स्वतंत्र तौर पर केंद्र सरकार की नीतियों की समीक्षा है। वैसे तो ये किताब केंद्र सरकार की नीतियों के असर पर है। लेकिन, बीजेपी इसका फायदा उत्तर प्रदेश के चुनावों में लेना चाहती है।
बीजेपी “परिवर्तन की ओर” ले जाने की बात कर रही है, तो समाजवादी पार्टी या कहें कि अखिलेश यादव प्रदेश की जनता को “परिवर्तन की आहट” सुनाना चाह रहे हैं। डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान की ये किताब 168 पन्ने की जिसमें कुल 28 लेखकों ने लिखा है। जबकि, अखिलेश यादव की किताब “परिवर्तन की आहट” पूरी तरह से अखिलेश यादव के दिए गए भाषणों का संग्रह है। करीब सवा दो सौ पृष्ठ की इस किताब में 34 शीर्षकों से प्रदेश में समाजवादी सरकार के कामों का ब्यौरा दिया गया है। साथ ही अखिलेश यादव ने इस किताब के जरिये भावनात्मक तौर पर भी यूपी की जनता से जुड़ने की कोशिश की है। बीजेपी सरकार बदलने के लिए “परिवर्तन की ओर” जाने की बात कर रही है तो अखिलेश यादव “परिवर्तन की आहट” के जरिये प्रदेश की जनता को ये समझाना चाह रहे हैं कि परिवर्तन की आहट पिछले 5 सालों में सुनाई देने लगी है लेकिन, परिवर्तन के लिए जनता को उन्हें एक मौका और देना चाहिए। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की जनता के सामने दो बड़ी पार्टियां परिवर्तन की दुहाई दे रही हैं। अब देखना है कि उत्तर प्रदेश की जनता को “परिवर्तन की आहट” सुनाई देती है या वो “परिवर्तन की ओर” चल देती है। 

Saturday, November 05, 2016

मुलायम-अखिलेश की लड़ाई अपनी-अपनी जमीन बचाने की है

भला ऐसा भी कभी होता है कि भाई के लिए कोई अपने बेटे का ही राजनीतिक भविष्य चौपट करने पर तुल जाए। वो भी ऐसा भाई जिसकी छवि बहुत अच्छी न हो, उस पर अच्छी छवि वाले बेटे की बलि चढ़ाने की कोशिश करे। लेकिन, जब राजनीति में कुछ इस तरह का हो, तो इसके मायने ठीक से समझने की जरूरत बन जाती है। इसीलिए मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की इस लड़ाई को सलीके से समझने की जरूरत दिखती है। दरअसल मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव एक दूसरे से लड़ने से ज्यादा अपनी-अपनी हासिल की गई जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और जातियों में गजब तरीके से बंटे राज्य में  जमीन बचाने की लड़ाई इतनी कठिन है कि लग रहा है कि बेटा-बाप एक दूसरे के खिलाफ तलवार भांज रहे हैं। दरअसल इस तलवारबाजी के पीछे एक दूसरे का नुकसान करने से ज्यादा बाप-बेटे की चिंता इस बात की है कि दोनों की जमीन बची रह जाए और समाजवादी पार्टी से छिटककर दूसरी पार्टियों को जाने वाले वोट थम जाएं।

पहले बात करते हैं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बगावती तेवर के पीछे के राजनीतिक गणित की। 2012 में समाजवादी पार्टी पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रही और भले ही मुलायम सिंह यादव ये कहें कि जनादेश उनके नाम पर मिला था। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि अखिलेश यादव को नौजवानों ने वोट दिया था। इसको पुख्ता करता है समाजवादी पार्टी को मिला मत। आमतौर पर सामान्य धारणा यही रही कि उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों ने बहनजी को छोड़ दिया और वापस बीजेपी की तरफ चले गए। लेकिन, सच्चाई ये है कि बीएसपी और समाजवादी पार्टी दोनों को ही 2012 में ब्राह्मण और राजपूतों के मत 2007 से ज्यादा मिले हैं। 2007 में पड़े हर 100 ब्राह्मण मतों में से बहुजन समाज पार्टी को 16 मत मिले थे। जबकि, 2012 में 100 में से 19 ब्राह्मण मत हाथी चुनाव चिन्ह पर पड़े थे। और यही ट्रेंड राजपूत और वैश्य मतों में भी बरकरार रहा। हर पड़े 100 मतों में 12 से बढ़कर 14 और वैश्य मत 14 से बढ़कर 15 बीएसपी के खाते में आ गए। इसी तरह समाजवादी पार्टी को हर 100 ब्राह्मण मतों में से 10 मत 2007 में मिले, जो 2012 में बढ़कर 19 मत हो गए। और राजपूतों के भी 2007 में मिले 20 मत 2012 में बढ़कर 26 हो गए। दरअसल यही वो मत हैं, जिन्हें बीजेपी में जाने से रोकने के लिए अखिलेश यादव पिता-चाचा के खिलाफ बगावती तेवर अपनाए हुए हैं। क्योंकि, ये मत मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव के नाम पर कतई नहीं मिलने वाले। और, इसीलिए अखिलेश यादव इस लड़ाई में कमजोर पड़ते दिखे, तो सवर्ण मत पूरी तरह से भागकर बीजेपी में वापस जा सकते हैं। 

ग्राफिक्स – स्रोत- सीएसडीएस
एसपी- कुल डाले गए वोटों में पार्टी की हिस्सेदारी

जाति        2007        2012

ब्राह्मण      10          19

राजपूत      20          26


मामला सिर्फ सवर्ण मतों का ही नहीं है। दूसरी सामान्य धारणा ये है कि यादव किसी भी हाल में अपने नेता यानी मुलायम सिंह यादव से दूर नहीं जाता है। इसीलिए जब 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तो ये माना गया कि यादवों का पूरा ही मतदान एसपी के पक्ष में हुआ। लेकिन, सच ये है कि यादवों के भरोसे तो अखिलेश यादव की पूर्ण बहुमत की सरकार कतई न बनती। क्योंकि, 2007 में 100 में से 72 यादवों ने समाजवादी पार्टी के पक्ष में मतदान किया था। जबकि, 2012 में 100 में से सिर्फ 66 यादवों ने ही साइकिल की सवारी की। कमाल ये कि 2007 में 100 में से 5 यादव मत ही बीजेपी के खाते में आए थे। लेकिन, 2012 में हर 100 में से 9 यादव मत बीजेपी के खाते में आ गए। और सिर्फ बीजेपी ही नहीं बीएसपी के खाते में भी 2012 में यादव मत बढ़े हैं। 2007 में हर 100 में से सिर्फ 7 यादव मत ही बीएसपी को मिले थे, जो 2012 में बढ़कर 11 हो गए। इसलिए ऐसा भी नहीं है कि यादव अब आंख मूंदकर साइकिल की सवारी करने को तैयार है। नया यादव मतदाता मुलायम के यादववाद से धीरे-धीरे ही सही लेकिन, नाराज होता दिख रहा है। इस नए यादव मतदाता को भी अखिलेश ही लुभाते हैं। लेकिन, ये भी सच है कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनाने के लिए इतने से काम नहीं चलने वाला। ये छिटपुट मत हैं।
मुलायम सिंह यादव जानते हैं कि जो एकमुश्त चुनाव जिताऊ मत समाजवादी पार्टी को मिलता है, वो मत अभी भी यादव और मुसलमान का ही है। और ये एकमुश्त वाला यादव, मुसलमान विकास और साफ छवि के बजाए भाजपा विरोध और जातीय दंभ पर ही वोट करता है। इसलिए ये वोट काफी हद तक मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव को ही मिलने वाले हैं। इन्हीं मतों के बूते मुलायम सिंह यादव अच्छी छवि वाले अपने मुख्यमंत्री बेटे को कार्यकर्ताओं के सामने चुनौती दे देते हैं कि तुम्हारी हैसियत ही क्या है। दरअसल मुलायम सिंह यादव को पता है कि अखिलेश की विकास और स्वच्छ वाली ब्रांडिंग बहुत ज्यादा मत नहीं खींच सकेगी। विकास और स्वच्छ छवि के मामले में बीजेपी बाजी मार सकती है। और फिर समाजवादी पार्टी बीजेपी के सामने सीधी लड़ाई में नहीं रही, तो मुसलमान मत बीएसपी की तरफ जा सकता है। और ये होता भी दिख रहा है। समाजवादी पार्टी को 2007 में हर 100 में से 45 मुसलमान मत मिले थे, जो 2012 में घटकर 39 रह गए। 2012 में बीएसपी के खाते में मुसलमान मत 17 से बढ़कर 20 हो गए। कमाल की बात ये है कि 2007 के मुकाबले 2012 में मुसलमानों का भरोसा कांग्रेस पर भी बढ़ा। कांग्रेस को 2012 में हर 100 मतों में 4 मत 2007 से ज्यादा मिले।

एसपी- कुल डाले गए वोटों में पार्टी की हिस्सेदारी

जाति        2007        2012

यादव        72          66

मुस्लिम      45          39 

मुसलमानों का बीएसपी और दूसरी पार्टियों में जाने का खतरा मुलायम सिंह यादव समझ रहे हैं। इसीलिए वो मुसलमानों की बात करते हिन्दू विरोधी दिखने में भी गुरेज नहीं करते हैं। पिछले 3 विधानसभा चुनावों- 2002, 2007, 2012- में मुसलमान मत साइकलि से उतरकर मायावती के साथ हाथी पर सवार होते दिखे। बीएसपी को 2002 में 100 में से सिर्फ 9 मुसलमान मत मिले थे, जो 2012 में बढ़कर 20 हो गए। जबकि, 2002 में 100 में से 52 मुसलमानों का मत पाने वाली समाजवादी पार्टी के पास 2012 में सिर्फ 39 मत ही बचे।

 मुसलमान जीत की चाभी

साल         मुस्लिम मत सपा    मुस्लिम मत बसपा

2002        52                9      
2007        45                17     
2012        39                20               



इसलिए अगर समाजवादी पार्टी का झगड़ा सलीके से नहीं सुलझा, तो इसका सबसे बड़ा फायदा बीजेपी को होता दिख रहा है। क्योंकि, बीजेपी ने सवर्ण जातियों के परंपरागत बंधन से निकलकर पिछड़ी और गैर जाटव दलित जातियों में पहले से ही काफी असर बना लिया है। दूसरा सबसे बड़ा फायदा बीएसपी को हो सकता है। क्योंकि, बीजेपी के लड़ाई में सीधे आने का असर ये होगा कि मुसलमान आपस में लड़ रही समाजवादी पार्टी के बजाए मायावती के साथ जाना पसंद करेगी। और इसकी संभावना सबसे कम है लेकिन, इस तरह की भ्रम की स्थिति में थोड़ा बहुत फायदा कांग्रेस को भी मिल सकता है। दरअसल इन्हीं संभावनाओं को बनने से रोकने की कोशिश में बाप-बेटे झगड़ रहे हैं। लेकिन, ये झगड़ा इतना आगे बढ़ गया है कि समाजवादी पार्टी के आधार मतों में 2017 में सेंध सलीके से लगती दिख रही है। 

Thursday, October 13, 2016

उत्तर प्रदेश में 17वीं विधानसभा हवा में उड़ते वोटों का चुनाव है

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा प्रदेश है। ये सबसे बड़ा प्रदेश कई बार देश की राजनीति के बदलावों को भी सबसे आगे बढ़कर रास्ता दिखाता रहा है। 2017 के विधानसभा चुनावों में भी एक ऐसा ही रास्ता बनता दिख रहा है। वो रास्ता है जाति संघर्ष से आगे बढ़कर जाति प्रतिस्पर्द्धा की राजनीतिक यात्रा के शुरू होने का। बेहद कठिन जातीय खांचे में बंटे उत्तर प्रदेश में इस बार जातियों के वोट पाने के लिए राजनीतिक दलों को गजब की मशक्कत करनी पड़ रही है। कुल मिलाकर जातीय चेतना का एक चक्र पूरा हो चुका है।
दिसंबर 1989 में जब पहली बार मंडल की लहर पर सवार होकर मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, उस समय वो ऐसे गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीतिक जमीन बंजर कर दी थी। इससे पहले चरण सिंह, बनारसी दास और रामनरेश यादव गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे लेकिन, उनका कार्यकाल बड़ा छोटा रहा। लेकिन, जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने, तो वो अति पिछड़ी जातियों के अकेले नेता बन गए। किसी एक जाति समूह को लेकर राजनीति की ऐसी मजबूत बुनियाद उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने ही तैयार की थी। उससे पहले तक अगड़ी जातियों के ही नेता सबके नेता होते थे। ये और बात है कि  पिछले करीब 3 दशक में पिछड़ों से सिर्फ यादव और अब यादवों में भी परिवारी यादवों के नेता बनते मुलायम सिंह यादव नजर आ रहे हैं।
पिछड़ों की राजनीतिक चेतना जाग्रत होने के बाद उत्तर प्रदेश में दलितों को जाग्रत अवस्था तक पहुंचने में डेढ़ दशक से ज्यादा लग गए। जून 1995 में पहली बार एक दलित मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची। मायावती जब मुख्यमंत्री बनीं, तो वो सिर्फ जाटव नेता नहीं थीं। मायावती दलित नेता बनकर उभरीं। लेकिन, अपने उत्तराधिकारी के बारे में बात करते और जिलों में महत्वपूर्ण पदों पर दलितों में सबसे ज्यादा आबादी वाले जाटवों को कब उन्होंने इतना प्रश्रय दे दिया कि दूसरी दलित जातियां उनको नेता मानने से बिदकने लगीं, ये अंदाजा शायद उन्हें भी नहीं होगा। मायावती और मुलायम सिंह यादव ही वो नेता हैं, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में मजबूती से एक जाति के वोटबैंक के आधार पर सत्ता हासिल की। करीब 20% के इस पक्के वाले वोटबैंक में बीजेपी के विरोध में जाने वाला 18-19% मुसलमान जुड़कर जीत की गारंटी देता रहा। कांग्रेस मंडल और कमंडल में उत्तर प्रदेश से एकदम गायब सी हो गई। बीएसपी, एसपी और बीजेपी के स्थानीय समीकरणों में होने वाली गड़बड़ के आधार पर कहीं भूले-बिसरे कांग्रेस के प्रत्याशी भी विधानसभा तक पहुंचते रहे। लेकिन, मोटे तौर पर देश के सबसे बड़े सूबे में कांग्रेस लगभग गायब ही रही। इस वजह से भी MY और DM समीकरण उत्तर प्रदेश की दशा-दिशा तय करता रहा। इस दौरान राममंदिर आंदोलन का असर खत्म होने के बाद बीजेपी पर पूरी तरह से ब्राह्मण-बनिया पार्टी की छवि चस्पा रही। लेकिन, 2007 में मायावती ने सतीश मिश्रा को चेहरा बनाकर 14% ब्राह्मणों को सम्मान का सफलतापूर्वक अहसास दिला दिया और पहली बार पूर्ण बहुमत की सत्ता हासिल कर ली।
अगर उत्तर प्रदेश की राजनीति में आए जातिगत बदलावों की बात करें, तो 1989 पिछड़ों के राजनीतिक उभार, 1991 हिन्दू राजनीति के उभार, 1995 दलित राजनीति के बढ़ता प्रभाव और 2007 हिन्दू समाज के सबसे ऊपर और नीचे के पायदान पर खड़ी मानी जाने वाली जातियों के गठजोड़ के तौर पर जाना जाएगा। लेकिन, 2014 का लोकसभा चुनाव इन सबसे हटकर रहा। उत्तर प्रदेश में जातियां और जातियों के नेता गायब हो गए। गुजरात के एक नेता नरेंद्र मोदी के प्रभाव में उत्तर प्रदेश ने चमत्कारिक जनादेश दे दिया। और उसी से आगे बढ़ते अब जब उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा चुनने के लिए 2017 में चुनाव होना है, तो लग रहा है कि ये पहला चुनाव है जिसमें किसी जाति को ये नहीं पता है कि उसकी पार्टी कौन सी है। राजनीतिक दलों को भी मुश्किल हो रही है कि आखिर उनकी आधार जाति का वोट उन्हें मिल रहा है या नहीं। कमाल तो ये है कि सिर्फ बीजेपी विरोध पर ही वोट करता चला आ रहा मुसलमान भी इस बार पक्के तौर पर कुछ कहने-बताने की स्थिति में नहीं है। दरअसल इस सबके पीछे सबसे बड़ी वजह यही है कि राजनीतिक दल अपनी परंपरागत जातियों के खांचे को तोड़कर दूसरी जातियों को जोड़ने के लिए अभियान सा चला रहे हैं। थोड़ा बहुत अगर कहें, तो यादव और जाटव ही दो जातियां हैं, जो अभी भी अपने नेताओं में भरोसा रखे हुए हैं। अभी भी उत्तर प्रदेश में यादव मुलायम सिंह यादव और जाटव मायावती के अलावा किसी और को नेता मानने को तैयार नहीं हैं। लेकिन, यादव परिवार की अंदरूनी कलह और मायावती के नजदीकी कई जाटव नेताओं के बीएसपी का साथ छोड़ने से इन जातियों में भी बहस शुरू हो गई है कि आखिर इन्हीं नेताओं पर भरोसा कायम रखा जाए या नए नेताओं को भी विकल्प के तौर पर आजमाया जा सकता है। मोटे तौर पर यादव और जाटव दोनों ही जातियां 20% के आसपास हैं। और यही दोनों जातियों सबसे बड़े मत समूह के तौर पर एक साथ हैं। इसी वजह से मुलायम सिंह यादव और मायावती के आगे उत्तर प्रदेश में किसी भी पार्टी का बड़ा से बड़ा नेता भी छोटा लगता है। इसीलिए बीजेपी दलितों और अति पिछड़ों में कुछ सेंध लगाने के लिए हर संभव कोशिश में जुट गई है।

हर जाति राजनीतिक दलों को तौल रही है। किसी दल के साथ बंध रहने की छवि टूटी तो पार्टियों की बीच आपसी प्रतिस्पर्द्धा से हर जाति का सम्मान बढ़ा है। चुनाव नजदीक आते जातियों और पार्टियों के बीच विद्वेष बढ़ जाता था। इस बार का चुनाव ऐसा दिख रहा है कि चुनाव नजदीक आते हर जाति एक दूसरे से मुकाबले में है। हर जाति चुनावी बाजार में बेहतर से बेहतर बोली आजमा रही है। और ये कहना बहुत गलत नहीं होगा कि इसी वजह से इस चुनाव में जातियों के बीच झगड़ा कम है। जातीय संघर्ष की खबरें भी नहीं हैं। ये उत्तर प्रदेश में हवा में उड़ते वोटों का चुनाव दिख रहा है। जिस राजनीतिक दल में हवा में उड़ते इन वोटों को साधने की बेहतर क्षमता होगी, वो चुनाव जीतने के ज्यादा नजदीक पहुंच जाएगा। हर जाति जाग्रत अवस्था में है। हर जाति अपनी ताकत समझ रही है। लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। इतना कि बीजेपी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार मुसलमानों के बीच प्रोग्रेस पंचायत कर रही है। उत्तर प्रदेश के चुनाव में संवाद महत्वपूर्ण हो गया है। चुनाव नजदीक आते हर राजनीतिक दल, हर जाति-संप्रदाय के लोगों तक पहुंच जाना चाहता है। ताकि, सनद रहे। हम भी आए थे। जाने कौन सा मिलन चुनावी गठजोड़ में बदल जाए। 

Monday, September 26, 2016

यूपी का सबसे हिट चुनावी नारा- “पंडित जी पांवलागी”

भ्रष्टाचार के आरोपी गायत्री प्रजापति फिर से अखिलेश यादव मंत्रिमंडल में शामिल हो गए हैं। लेकिन, ये अब खबर नहीं है। इस पर तो जितना बोला-लिखा जाना था, हो चुका। खबर ये है कि गायत्री के साथ प्रतापगढ़ की रानीगंज विधानसभा से चुनकर आए शिवाकांत ओझा फिर से कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं। शिवाकांत ओझा इसी सरकार में मंत्री बने और हटाए गए थे। अब फिर से बना दिए गए हैं। शिवाकांत ओझा का अखिलेश मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि अभी हफ्ते भर पहले ही बीजेपी के एक कार्यक्रम में ओझा का स्वागत किया गया था। प्रतापगढ़ जिले में बीजेपी के संभावित प्रत्याशियों में शिवाकांत ओझा का भी नाम चल रहा है। शिवाकांत भाजपाई रास्ते से ही राजनीतिक सफलता हासिल करने के बाद समाजवादी हुए थे। अगर आपको इसमें कोई बड़ी खबर नहीं नजर आ रही है। तो उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार के दूसरे कुछ नए मंत्रियों के नाम सुनिए। मनोज पांडेय को भी कैबिनेट में ले लिया गया है। अखिलेश यादव के बेहद करीबी अभिषेक मिश्रा कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं। ये अखिलेश की कैबिनेट के नए नाम नहीं हैं। ये दरअसल इस समय हर रोज बदलती उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति में एक नया, काम वाला सूत्र है। इस पर अभी तक भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस ही लगे थे। अब इस सूत्र को आखिरी दौर में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने भी थाम लिया है। ये सूत्र उत्तर प्रदेश में इस समय सबसे हिट चुनावी नारा है। और ये नारा है पंडित जी पांवलागी। और अखिलेश यादव ने मंत्रिमंडल विस्तार में 3 ब्राह्मणों को जगह देकर इसी नारे को बुलंद करने की कोशिश की है।

मुलायम सिंह यादव के साथ भी लंबे समय तक जनेश्वर मिश्रा जैसा बड़ा ब्राह्मण नेता रहा है। और जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने, तो उनके साथ भी अभिषेक मिश्रा थे। लेकिन, इसके बावजूद समाजवादी पार्टी की छवि ब्राह्मणों को कम ही लुभाती रही। इसकी बड़ी वजह यादवों के वर्चस्व वाली पार्टी में ब्राह्मणों को कम मिलता सम्मान रहा। साथ ही ये भी एक वजह थी कि ब्राह्मण खुद को कांग्रेस से हटने के बाद पिछले 2 दशकों से भारतीय जनता पार्टी को अपनी स्वाभाविक पार्टी मानने लगा। अब जब 2007 में मायावती ने सतीश मिश्रा के जरिए समाजिक बदलाव का नया समीकरण स्थापित करके दिखा दिया, तो ये तय हो गया कि उत्तर प्रदेश में अब कोई भी जाति किसी पार्टी की बपौती नहीं रही। इस चुनाव में तो ये बात कुछ ज्यादा ही मजबूती से साबित हो रही है। करीब 14% ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने-गिराने में अहम भूमिका रखता है। और अब जब ब्राह्मण वोट बीजेपी के खूंटे से बंधने के बजाए हवा में उड़ने लगा, तो हर कोई इस उड़ते वोट को लपक लेना चाहता है। यहां तक कि कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अपने राजनीतिक पुनर्जन्म में ब्राह्मण मत ही संजीवनी बूटी की तरह दिख रहा है। दिल्ली में राजनीतिक तौर पर निष्क्रिय होने के बाद शीला दीक्षित को ब्राह्मण चेहरे के तौर पर मैदान में उतार दिया है। यहां तक कि इलाहाबाद में राहुल गांधी की यात्रा के दौरान कई पोस्टर-बैनरों में पंडित राहुल गांधी लिखा हुआ था। शीला दीक्षित लगभग हर सभा में कहती हैं कि वो अब यूपी की हैं और ब्राह्मण हैं। कांग्रेस के लिए एक अच्छी बात ये है कि लगभग हर जिले में बचे हुए बड़े कांग्रेसी नेता ब्राह्मण ही हैं। जिलों के अस्तित्वहीन हो चुके ब्राह्मण कांग्रेसी नेता फिर से चमकने लगे हैं।

मायावती ने ब्राह्मणों के बीजेपी की तरफ रुझान दिखने के चलते मुसलमानों को ज्यादा तरजीह दी। लेकिन, अब जिस तरह से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक समीकरण हर घंटे के साथ बदल रहे हैं, उसमें ब्राह्मणों को छोड़ देने जैसा संदेश जाने का खतरा बहन जी को भी सताने लगा हैं। इसीलिए विश्वस्त ब्राह्मण नेता सतीश चंद्र मिश्रा फिर से मैदान में हैं। अब सतीश मिश्रा और रामवीर उपाध्याय फिर से पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों का सम्मान जगाने में जुट गए हैं। पूरब का जिम्मा सतीश मिश्रा के पास और पश्चिम का जिम्मा रामवीर उपाध्याय के पास। 30 से ज्यादा ब्राह्मण सभाएं सतीश मिश्रा करने जा रहे हैं। सतीश मिश्रा ने गोरखपुर जिले की खजनी विधानसभा से इसकी शुरूआत की है। सतीश मिश्रा कह रहे हैं कि ब्राह्मण और दलित मिलकर इस बार बीएसपी की सरकार बनाने जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि ब्राह्मणों को ज्यादा उन विधानसभा में पकड़ने की कोशिश बीएसपी कर रही है, जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटें हैं। दरअसल इन सीटों पर सभी प्रत्याशी अनुसूचित जाति के होने से और ब्राह्मणों का एकमुश्त मत मिल जाने से बीजेपी ऐसी सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करती रही है। अब बीएसपी इसी चक्र को तोड़ने के लिए ब्राह्मणों को लुभाने में लगी है। बीजेपी का हाल ये है कि ब्राह्मण-बनिया की पार्टी का ठप्पा लगा होने के बावजूद उसे भी ब्राह्मण वोटों के छिटकने का डर सता रहा है। मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्रा से लेकर निवर्तमान अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी तक बड़े ब्राह्मण नेता उसके पास हैं। लेकिन, फिर भी तीन चुनाव हारने वाले बीएसपी में सतीश मिश्रा के डिप्टी रहे ब्रजेश पाठक तक को राष्ट्रीय परिषद में शामिल कर लिया है। कुल मिलाकर इस चुनाव में 2 राष्ट्रीय और 2 क्षेत्रीय पार्टियों के बीच 14% ब्राह्मण वोटों के लिए जबरदस्त मारकाट होती दिख रही है। 
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है।)

Wednesday, September 21, 2016

89 का गणित जो सुलझा पाएगा, वही यूपी में सरकार बनाएगा

उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी। ये सवाल किसी से भी पूछने पर वो यही कहेगा कि जिस रफ्तार में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का खेल बन-बिगड़ रहा है, उसमें अभी से ये बता पाना असंभव है कि किसकी सरकार बनने वाली है। ये काफी हद तक ठीक भी लगता है क्योंकि, 2007 विधानसभा में मायावती को पूर्ण बहुमत, 2012 में अखिलेश यादव को उससे भी ज्यादा सीटें और 2014 के लोकसभा चुनाव में उसी उत्तर प्रदेश ने बीजेपी के लिए राजनीतिक चमत्कार वाला जनादेश दिया। इसलिए सही बात यही है कि यूपी की जनता के मन की बात समझना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है। लेकिन, इसी मुश्किल को समझने में 89 का एक आंकड़ा मिला जो, साफ-साफ बता देता है कि किसकी सरकार उत्तर प्रदेश में बनने जा रही है। 2007 में ये आंकड़ा 149 का था। लेकिन, 7 चरणों में हुए 2012 के विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड 60% मतदान ने 149 के आंकड़े को 89 का कर दिया।

अब इस 89 के गणित को समझते हैं। दरअसल ये वो 89 सीटें हैं जहां हार-जीत का अंतर 5000 से भी कम रहा है। अगर मत प्रतिशत के लिहाज से समझें, तो ये 3-4% के बीच कहीं बैठता है। 2012 में बुआ जी से भतीजे के हाथ में आई सत्ता में इसी 4% मत का पूरा मसला है। समाजवादी पार्टी को करीब 4% ज्यादा मत मिले और बहुजन समाज पार्टी के 4.5% कम। 2007 में 149 विधानसभा सीटें ऐसी थीं जहां हार-जीत का अंतर 5000 मतों से भी कम था। इन 149 सीटों में बीएसपी 64, एसपी 68, बीजेपी 20, कांग्रेस 6 और राष्ट्रीय लोकदल 3 सीटों पर जीती थी। यानी इन सीटों पर जीतने वाली पार्टी को दूसरे स्थान पर रहने वाली पार्टी से करीब 3-4% मत ही ज्यादा मिले थे। और यही 149 सीटें दरअसल मायावती से अखिलेश की सफलता का असली सूत्र हैं। समाजवादी पार्टी को 2012 में करीब 4% ही ज्यादा मत मिले और बीएसपी को करीब 4.5% मतों का नुकसान हुआ। इसी का असर ये रहा कि बीएसपी के हाथ से वो सारी 64 सीटें निकल गईं, जहां अंतर 5000 मतों से भी कम का था। 2007 में बीजेपी को 51 सीटें मिलीं थीं और जब 2012 में 2% मत घटा, तो सीधे-सीधे 4 सीटें कम हो गईं। हां, कांग्रेस को जरूर 2007 के मुकाबले 3% मत और इसी वजह से 6 सीटों का फायदा हो गया था।

इसीलिए इतना तो तय है कि अब 2017 के विधानसभा चुनाव में भी वो 89 सीटें बड़ी महत्वपूर्ण होंगी, जहां हार-जीत का अंतर 3-4% ही रहा है। हालांकि, 2007 के मुकाबले 2012 में ऐसी विधानसभा सीटें घटी हैं। इसकी बड़ी वजह ये रही कि 2012 में उत्तर प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान हुआ था। सीधे-सीधे 2007 से 14% ज्यादा मतदाताओं ने अपनी सरकार चुनी। 2012 में 60% लोगों ने मत दिए थे। इसलिए 2007 के मुकाबले 2012 में 5000 मतों से कम हार-जीत के अंतर वाली सीटें बहुत घट गईं। 5000 कम मतों से विधायक बनाने वाली सीटें सीधें 149 से घटकर 89 रह गईं।

भले ही 2012 में 5000 से कम अंतर से हार-जीत वाली 89 सीटें ही हों। लेकिन, इनका महत्व 2007 की 149 सीटों से ज्यादा का है। इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि 2012 में पूरी तरह से यूपी के मतदाता के सामने सरकार के लिए एसपी और बीएसपी के बीच ही चुनाव करने का मन बन पाया था। लेकिन, अब 2017 में लंबे समय बाद दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भी उत्तर प्रदेश के चुनाव में बेहतर करती दिख रही है। लोकसभा चुनाव में चमत्कारी प्रदर्शन से बीजेपी तो पहले से ही सरकार बनाने का दावा ठोंक रही हैं। नई रणनीति के सहारे राहुल गांधी भी कांग्रेस का दावा बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं। साथ ही समाजवादी पार्टी के भीतर अखिलेश-शिवपाल का खुला झगड़ा भी अब खेल को ज्यादा रोचक बना रहा है। इसलिए 2012 में 5000 मतों से कम हार-जीत वाली सीटों का महत्व बहुत ज्यादा है। अब सबसे बड़ा सवाल तो यही होगा कि क्या पिछले चुनाव के रिकॉर्ड से ज्यादा मतदान इस साल होगा। अब अगर 60% से ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश के चुनाव में मत डालते हैं, तो जाहिर है कि इन 89 सीटों पर सबसे पहले उलटफेर की गुंजाइश बन जाएगी। 2012 में एक और महत्वपूर्ण बात थी कि कल्याण सिंह बीजेपी से अलग अपनी जनक्रांति पार्टी के बैनर पर चुनाव लड़ रहे थे। इसकी वजह से अलीगढ़, बुलंदशहर, एटा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, फर्रुखाबाद और बदायूं में करीब एक दर्जन सीटें ऐसी थीं, जहां बीजेपी और जनक्रांति पार्टी के प्रत्याशी एक दूसरे की वजह से हारे। डिबाई, अतरौली, भोजपुर, अमृतपुर, अनूपशहर, बुलंदशहर, कासगंज, अमनपुर, कायमगंज और फर्रुखाबाद ऐसी ही सीटें थीं, जहां बीजेपी और जनक्रांति पार्टी के प्रत्याशी के मत मिलकर जीते प्रत्याशी के मतों से ज्यादा थे। इसका एक उदाहरण देखिए बीजेपी के दिग्गज नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी के बेटे बीजेपी नेता सुनील द्विवेदी फर्रुखाबाद सीट से निर्दलीय प्रत्याशी विजय सिंह से सिर्फ 147 मतों से हार गए। जबकि, इसी सीट पर जनक्रांति पार्टी के प्रत्याशी मोहन अग्रवाल को 9405 मत मिले थे। इसी तरह बुलंदशहर की सीट पर बीजेपी के वीरेंद्र सिंह सिरोही बीएसपी के मोहम्मद अलीम खान से 7000 मतों से हारे थे। जबकि, इसी सीट पर जनक्रांति पार्टी के संजीव राम को 20000 मत मिले थे। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं। लेकिन, सबका लब्बोलुआब यही है कि 89 सीटें ही तय करेंगी कि कौन सरकार बनाएगा।
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है।)

Monday, August 17, 2015

सिर्फ विज्ञापनों में उत्तम है उत्तर प्रदेश

सरकारें भूल जातीं हैं कि विज्ञापन अगर सिर्फ विज्ञापन है और धरातल पर वैसा नहीं है। जैसा सरकार विज्ञापन में जनता को बताने की कोशिश कर रही है तो, फिर सरकारें नहीं रहती हैं। सरकारों के लिए अच्छी बात ये हो सकती है कि जनता की याददाश्त बहुत लंबी नहीं होती है। लेकिन, सरकारों को को कम से कम पुरानी गलतियों से सबक तो लेना ही चाहिए। तब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री हुआ करते थे। और महानायक अमिताभ बच्चन अगर किसी एक राज्य के लिए समर्पित थे। तो, वो राज्य था उत्तर प्रदेश। अमिताभ बच्चन तब के विज्ञापन में पर्दे पर आते थे। और मुस्कुराते हुए कहते थे। यूपी में दम है, क्योंकि, जुर्म यहां कम है। अब अमिताभ बच्चन बोल रहे थे तो, जनता ने और गंभीरता पूर्वक देखना शुरू कर दिया कि आखिर जुर्म कितना कम है। जब जनता पता लगाने लगी तो, उसके साथ घटी घटनाओं ने बता दिया कि जुर्म तो कम नहीं यहां सबसे ज्यादा है। अब सरकार बदल चुकी है। हालांकि, सरकार फिर से समाजवादी पार्टी की ही है। लेकिन, अब पिता की जगह पुत्र अखिलेश यादव ने ले ली है। नौजवान मुख्यमंत्री से लोगों को बड़ी अपेक्षाएं थीं। लगा कि ये नौजवान मुख्यमंत्री पहले की समाजवादी पार्टी के हर बार के बुरे अनुभव को इस बार बदल देगा। लेकिन, इस नौजवान मुख्यमंत्री ने भी वहा रास्ता अपनाया जो, उनके पिता ने अपनाया था। समाजवादी सरकार उत्तर प्रदेश में चल रही है। लेकिन, विज्ञापन का तरीका अखिलेश ने बदल दिया है। मुलायम ने बुजुर्ग अमिताभ की साख का विज्ञापन में इस्तेमाल करना चाहा था। अब नौजवान अखिलेश नौजवानों की भावना अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाह रहे हैं। रेडियो पर बजते सुमधुर गानों के बीच अचानक एक लड़की की आवाज आती है। हम कहीं वॉशिंगटन में तो नहीं आ गए हैं। फिर दूसरी आवाज बताती है कि नहीं हम उत्तर प्रदेश में हैं। फिर वो सवाल करती है कि फिर ये आधुनिक इनोवा कारें हमारी पुलिस के पास। जवाब आता है। हमारी सरकार ने पुलिस को अतिआधुनिक बना दिया है। इंटरनेट पर ही एफआईआर लिखी जा रही है। और ऐसे ढेर सारे दावे जिससे लगने लगता है कि उत्तर प्रदेश तो लगभग अपराध शून्य हो गया है। फिर विज्ञापन में ये भी आता है कि नौजवान मुख्यमंत्री के काम करने की तरीका सबसे अलग है।

ये तो यूपी में दम है क्योंकि, जुर्म यहां कम है कि तर्ज पर विज्ञापन की बात थी। अब जरा सच्चाई की तरफ बढ़ें। उत्तर प्रदेश में ऑनलाइन एफआईआर तो छोड़िए। थाने में जाकर अपने साथ हुई घटना की शिकायत दर्ज कराना कितना मुश्किल काम है। ये उत्तर प्रदेश के लोगों से समझा जा सकता है। पत्रकारों की हत्या से लेकर दर्जनों ऐसे उदाहरण हैं जो, उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था का हाल बताते हैं। लेकिन, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े ज्यादा भयावह तस्वीर पेश करते हैं। यहां ये समझना बेहद जरूरी है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो भले ही गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। लेकिन, ये रिपोर्ट राज्यों के दिए उनके आंकड़े के आधार पर ही तैयार होती है। ये आंकड़े बता रहे हैं कि देश में अपराध के मामले में सबसे खराब है उत्तर प्रदेश। 2012 में अखिलेश सिंह यादव की सरकार आने के बाद अपराध तेजी से बढ़े हैं। एनसीआरबी के ताजा आंकड़े 2013 तक के हैं। इससे ये साफ है कि उत्तर प्रदेश में हर तरह के अपराध बढ़े हैं। सामान्य अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश देश में दूसरा सबसे ज्यादा अपराध वाला राज्य है, देश भर के अपराधों के साढ़े आठ प्रतिशत से ज्यादा अपराध सिर्फ उत्तर प्रदेश में हुए हैं। देश के किसी एक शहर में सबसे ज्याद अपराध बढ़े हैं तो वो है हमारे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ। हिंसक अपराधों के मामले में देश में सबसे बुरे हाल में उत्तर प्रदेश ही है। उत्तर प्रदेश में 2013 में 38779 मामले दर्ज हुए हैं। देश में सबसे ज्यादा हत्याएं भी उत्तर प्रदेश में ही हुई हैं। देश भर में कुल 33201 हत्याएं हुईं जिसमें से 5259 हत्याएं सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही हुई हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का हाल कितना बुरा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपहरण, बंधक बनाने के मामले में सबसे बुरा हाल उत्तर प्रदेश का ही है। 2012 में अखिलेश यादव की सरकार आने के साल भर में ही प्रदेश में कानून का राज पूरी तरह से ध्वस्त हो गया। उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार आने के एक साल बाद अपहरण, बंधक बनाने के मामले में करीब बीस प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अपहरण, बंधक बनाने के 9737 मामले दर्ज हुए हैं। महिलाओं की सुरक्षा के मामले में उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार पूरी तरह से नाकाम है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश देश में दूसरे नंबर पर है। महिलाओं के खिलाफ अपराध के 32546 मामले दर्ज किए गए हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ 2013 में 2335 दहेज हत्या के मामले सामने आए हैं।

महिलाओं की सुरक्षा का हाल बुरा है। तो बच्चे भी समाजवादी पार्टी के जंगलराज में डरकर जी रहे हैं। देश में सबसे ज्यादा बुरे हाल में बच्चे उत्तर प्रदेश में ही हैं। बच्चों के खिलाफ सबसे अपराध उत्तर प्रदेश में ही हो रहे हैं। अखिलेश यादव के राज में जाति संघर्ष किस तरह से समाज में जहर घोल रहा है ये सब जानते हैं। लेकिन, अखिलेश सरकार के सत्ता में आते ही अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार के मामले किस तेजी से बढ़े इसका अंदाजा शायद ही आप लोगों को हो। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में 2013 में अनुसूचित जाति के खिलाफ सबसे ज्यादा अत्याचार उत्तर प्रदेश में ही हुआ है। देश भर में कुल 39408 मामले हुए। इसमें से 7078 मामले सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही हुए। इस सरकार में गंभीर अपराधों के मामले में हमारे प्रदेश का नाम खराब हुआ है। हत्या, अपहरण, दहेज हत्या, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार, बलात्कार जैसे मामलों में तो पुलिस जैसे अनदेखा ही कर देती है। गाड़ियों की चोरी के मामले में भी उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। 2013 में 23916 गाड़ियां चोरी हुई हैं। यानी हर दिन करीब सत्तर गाड़ियां यूपी में चोरी हो जाती हैं। इसको ऐसे समझें कि शायद ही कोई दिन ऐसा होता है जब उत्तर प्रदेश के किसी जिले में एक भी गाड़ी चोरी ना होती हो। ऑटो चोरी के भी सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में ही हुए हैं। अखिलेश सरकार आने के बाद चोरों-डकैतों के हौसले खूब बढ़ गए। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2013 में यानी अखिलेश सरकार के आने के तुरंत बाद अपराध तेजी से बढ़े। उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर जिला सबसे ज्यादा डकैती वाला जिला रहा। जिले में 317 डकैती के मामले सामने आए। मतलब लगभग हर रोज जिले में कहीं न कहीं डकैती हो जाती है।

विज्ञापन के लिए अखिलेश सरकार नए-नए तरीके इस्तेमाल कर रही है। लेकिन, हकीकत बदलने के लिए शायद ही कुछ हो रहा है। एक निजी एफएम चैनल के साथ यूपी सरकार ने हाथ मिलाया है। इस समझौते में उस रेडियो स्टेशन पर अलग-अलग कहानियों के जरिये यूपी की छवि सुधारने की कोशिश हो रही है। यूपी की कहानियां सुनते आपको कतई नहीं लगेगा कि ये पूरी तरह से प्रायोजित है। लेकिन, अगर आप लगातार कहानियां सुनते रहे तो, कहीं न कहीं आपको यूपी की हकीकत और इन मायावी कहानियों के बीच का फासला साफ दिख जाएगा। अखिलेश यादव से उम्मीद थी कि वो कुछ धरातल बदलेंगे लेकिन, आसमानी तस्वीर बदलकर ही यूपी पर राज करने की जुगत में लगे हैं। यूपी में जुर्म कम है से लेकर इंडिया शाइनिंग तक के विज्ञापनों का इतिहास गवाह है कि ऐसा हो नहीं पाता है।



जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...