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Wednesday, September 21, 2016

89 का गणित जो सुलझा पाएगा, वही यूपी में सरकार बनाएगा

उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी। ये सवाल किसी से भी पूछने पर वो यही कहेगा कि जिस रफ्तार में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का खेल बन-बिगड़ रहा है, उसमें अभी से ये बता पाना असंभव है कि किसकी सरकार बनने वाली है। ये काफी हद तक ठीक भी लगता है क्योंकि, 2007 विधानसभा में मायावती को पूर्ण बहुमत, 2012 में अखिलेश यादव को उससे भी ज्यादा सीटें और 2014 के लोकसभा चुनाव में उसी उत्तर प्रदेश ने बीजेपी के लिए राजनीतिक चमत्कार वाला जनादेश दिया। इसलिए सही बात यही है कि यूपी की जनता के मन की बात समझना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है। लेकिन, इसी मुश्किल को समझने में 89 का एक आंकड़ा मिला जो, साफ-साफ बता देता है कि किसकी सरकार उत्तर प्रदेश में बनने जा रही है। 2007 में ये आंकड़ा 149 का था। लेकिन, 7 चरणों में हुए 2012 के विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड 60% मतदान ने 149 के आंकड़े को 89 का कर दिया।

अब इस 89 के गणित को समझते हैं। दरअसल ये वो 89 सीटें हैं जहां हार-जीत का अंतर 5000 से भी कम रहा है। अगर मत प्रतिशत के लिहाज से समझें, तो ये 3-4% के बीच कहीं बैठता है। 2012 में बुआ जी से भतीजे के हाथ में आई सत्ता में इसी 4% मत का पूरा मसला है। समाजवादी पार्टी को करीब 4% ज्यादा मत मिले और बहुजन समाज पार्टी के 4.5% कम। 2007 में 149 विधानसभा सीटें ऐसी थीं जहां हार-जीत का अंतर 5000 मतों से भी कम था। इन 149 सीटों में बीएसपी 64, एसपी 68, बीजेपी 20, कांग्रेस 6 और राष्ट्रीय लोकदल 3 सीटों पर जीती थी। यानी इन सीटों पर जीतने वाली पार्टी को दूसरे स्थान पर रहने वाली पार्टी से करीब 3-4% मत ही ज्यादा मिले थे। और यही 149 सीटें दरअसल मायावती से अखिलेश की सफलता का असली सूत्र हैं। समाजवादी पार्टी को 2012 में करीब 4% ही ज्यादा मत मिले और बीएसपी को करीब 4.5% मतों का नुकसान हुआ। इसी का असर ये रहा कि बीएसपी के हाथ से वो सारी 64 सीटें निकल गईं, जहां अंतर 5000 मतों से भी कम का था। 2007 में बीजेपी को 51 सीटें मिलीं थीं और जब 2012 में 2% मत घटा, तो सीधे-सीधे 4 सीटें कम हो गईं। हां, कांग्रेस को जरूर 2007 के मुकाबले 3% मत और इसी वजह से 6 सीटों का फायदा हो गया था।

इसीलिए इतना तो तय है कि अब 2017 के विधानसभा चुनाव में भी वो 89 सीटें बड़ी महत्वपूर्ण होंगी, जहां हार-जीत का अंतर 3-4% ही रहा है। हालांकि, 2007 के मुकाबले 2012 में ऐसी विधानसभा सीटें घटी हैं। इसकी बड़ी वजह ये रही कि 2012 में उत्तर प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान हुआ था। सीधे-सीधे 2007 से 14% ज्यादा मतदाताओं ने अपनी सरकार चुनी। 2012 में 60% लोगों ने मत दिए थे। इसलिए 2007 के मुकाबले 2012 में 5000 मतों से कम हार-जीत के अंतर वाली सीटें बहुत घट गईं। 5000 कम मतों से विधायक बनाने वाली सीटें सीधें 149 से घटकर 89 रह गईं।

भले ही 2012 में 5000 से कम अंतर से हार-जीत वाली 89 सीटें ही हों। लेकिन, इनका महत्व 2007 की 149 सीटों से ज्यादा का है। इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि 2012 में पूरी तरह से यूपी के मतदाता के सामने सरकार के लिए एसपी और बीएसपी के बीच ही चुनाव करने का मन बन पाया था। लेकिन, अब 2017 में लंबे समय बाद दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भी उत्तर प्रदेश के चुनाव में बेहतर करती दिख रही है। लोकसभा चुनाव में चमत्कारी प्रदर्शन से बीजेपी तो पहले से ही सरकार बनाने का दावा ठोंक रही हैं। नई रणनीति के सहारे राहुल गांधी भी कांग्रेस का दावा बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं। साथ ही समाजवादी पार्टी के भीतर अखिलेश-शिवपाल का खुला झगड़ा भी अब खेल को ज्यादा रोचक बना रहा है। इसलिए 2012 में 5000 मतों से कम हार-जीत वाली सीटों का महत्व बहुत ज्यादा है। अब सबसे बड़ा सवाल तो यही होगा कि क्या पिछले चुनाव के रिकॉर्ड से ज्यादा मतदान इस साल होगा। अब अगर 60% से ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश के चुनाव में मत डालते हैं, तो जाहिर है कि इन 89 सीटों पर सबसे पहले उलटफेर की गुंजाइश बन जाएगी। 2012 में एक और महत्वपूर्ण बात थी कि कल्याण सिंह बीजेपी से अलग अपनी जनक्रांति पार्टी के बैनर पर चुनाव लड़ रहे थे। इसकी वजह से अलीगढ़, बुलंदशहर, एटा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, फर्रुखाबाद और बदायूं में करीब एक दर्जन सीटें ऐसी थीं, जहां बीजेपी और जनक्रांति पार्टी के प्रत्याशी एक दूसरे की वजह से हारे। डिबाई, अतरौली, भोजपुर, अमृतपुर, अनूपशहर, बुलंदशहर, कासगंज, अमनपुर, कायमगंज और फर्रुखाबाद ऐसी ही सीटें थीं, जहां बीजेपी और जनक्रांति पार्टी के प्रत्याशी के मत मिलकर जीते प्रत्याशी के मतों से ज्यादा थे। इसका एक उदाहरण देखिए बीजेपी के दिग्गज नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी के बेटे बीजेपी नेता सुनील द्विवेदी फर्रुखाबाद सीट से निर्दलीय प्रत्याशी विजय सिंह से सिर्फ 147 मतों से हार गए। जबकि, इसी सीट पर जनक्रांति पार्टी के प्रत्याशी मोहन अग्रवाल को 9405 मत मिले थे। इसी तरह बुलंदशहर की सीट पर बीजेपी के वीरेंद्र सिंह सिरोही बीएसपी के मोहम्मद अलीम खान से 7000 मतों से हारे थे। जबकि, इसी सीट पर जनक्रांति पार्टी के संजीव राम को 20000 मत मिले थे। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं। लेकिन, सबका लब्बोलुआब यही है कि 89 सीटें ही तय करेंगी कि कौन सरकार बनाएगा।
(ये लेख QUINTHINDI पर छपा है।)

Friday, March 20, 2015

भारतीय शिक्षा का आइना हैं बिहार से आई नकल की तस्वीरें

बिहार में नकल की तस्वीरें और वीडियो देखकर देश सोच रहा है कि बिहार ऐसे पढ़ता-बढ़ता है। तस्वीरें दिखें, सामने आती हैं तो उत्तर प्रदेश के लोगों को भी ऐसी ही लजाना पड़ता हो। मुझे बचपन में इलाहाबाद के गांव के एक स्कूल में ऐसे ही नकल कराने का वाकया बड़े अच्छे से याद है। लगभग इसी तरह खिड़कियों से नकल की पुर्ची फेंकना और बीच-बीच में, कानून व्यवस्था कायम है का अहसास दिलाने के लिए, पुलिस वालों का डंडा लेकर नकल कराने वालों को दौड़ाना। बचपन में गर्मी की छुट्टियों में हम करीब डेढ़-दो महीने के लिए गांव जाते थे। हम सभी भाई-बहन इलाहाबाद में रहते—पढ़ते थे। नकल जैसी संस्थागत व्यवस्था से परिचय नहीं था। इसका मतलब ये भी नहीं है कि कभी नकल ही नहीं किया। हां, पढ़ाई के दौरान दो बार छोड़कर कभी नकल नहीं किया। एक बार वाला परिणाम अच्छा हुआ निराशाजनक रहा। एलएलबी में दाखिले के लिए की गई नकल काम नहीं आई। दोबारा वाली नकल काम आई। लेकिन, गांव में छेउंगा में जो विद्यालय था, वहां की पढ़ाई अद्भुत तरीके से होती थी। ऐसे ही सब जिस बोरे पर बैठते थे। उसी बोरे के नीचे पेपर में लिखे प्रश्नों के उत्तर खोजने का जुगाड़ होता था। उसमें भी ज्यादा जुगाड़ी/प्रतिष्ठित जुगाड़ी लोगों की तो पूरी कॉपी बाहर जाकर अंदर आ जाती थी। हां, उत्तर प्रदेश में अब बहुतायत में ये हाल नहीं है। लेकिन, ये किसे भूला होगा कि उत्तर प्रदेश में नकल विरोधी कानून भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार की जड़ में मट्ठा डालने में अहम भूमिका में था। सवाल ये है कि कौन लोग हैं जो, अपने बच्चों को इस तरह से पास कराकर डिग्री दिला देना चाहते हैं। सवाल ये है कि कौन सी सरकार और अधिकारी हैं, जिन्हें इस संस्थागत नकल व्यवस्था का पता नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ बिहार की समस्या है। या ये यूपी-बिहार की समस्या है। अच्छा है कि मीडिया में बहुतायत उत्तर प्रदेश-बिहार के लोग हैं और वो खुद की बुराई करने में पीछे नहीं रहते। तो, देश देख रहा है कि देश कैसे पढ़ रहा है, कैसे पास हो रहा है और कैसे डिग्री ले रहा है।

लेकिन, क्या ये समस्या सिर्फ यूपी-बिहार की है। ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश-बिहार के पढ़ने में कमजोर लड़के दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, गुजरात जाकर कैसे डॉक्टर, इंजीनियर बनकर चले आते हैं। और ये आज से नहीं हो रहा है। इसीलिए जब इस तरह के पढ़ाकुओं में से ही कोई पढ़ाने वाला बन जाता है तो, क्या हाल होता है। हाल ये होता है कि नकल की तस्वीरें दिखा रहे टीवी चैनलों के कैमरे जब शिक्षकों से पूछते हैं कि गणतंत्र दिवस और स्वाधीनता दिवस में अंतर क्या है तो, वो खिसिया रहे होते हैं। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक का नाम नहीं जानते। कई लोग तो राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बता देते हैं। ये बिहार की या यूपी की समस्या नहीं है। ये समस्या से आंख मूंद लेने की समस्या है। अगर ऐसा नहीं होता तो, दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, विद्यालयों में भारत क्यों नहीं है। मेरा निजी मत इस मामले में साफ है कि डिग्री के आधार पर समाज में प्रतिष्ठा पाने का पैमाना भी इसकी बड़ी वजह है। हां, सचिन का हाईस्कूल ही पास होना किसी को सताता नहीं है। लेकिन, बगल का कोई बच्चा हाईस्कूल ही पास हो तो देखिए, गजब हो जाएगा। जब बुनियाद मजबूत नहीं होगी तो, हाईस्कूल पास या फेल, किस काम का। लेकिन, इस पर कौन सी सरकार सोच रही है। राज्य सरकारों के स्कूल आर्थिक कमजोरों को पढ़ने का अहसास कराने और इसी तरह नकल करके डिग्री पाने की संस्था बनकर रह गई हैं। और कमाल तो ये सरकारी स्कूलों की इसी बुनियाद को अब निजी शिक्षण संस्थाओं में नकल कारोबार बना दिया गया है। विद्यालय विद्या के लिए नहीं डिग्री बांटकर और कारोबार बढ़ाने के लिए खुल रहे हैं। और ये सरकार की चिंता का विषय नहीं है। इसलिए बिहार की तस्वीरों पर हंसने की जरूरत नहीं है। ये तस्वीरें भारत की उस बेबुनियाद प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद का सजीव चित्रण है, जिस पर गांव के बहुतायत बच्चे अपनी डिग्री की इमारत बनाते हैं। इस डिग्री के बूते उन गांव के बच्चों का देश बनाने की व्यवस्था में हिस्सेदारी होना तो लगभग असंभव ही है। फिर कैसे गांव के उन नकल कराकर डिग्री दिलाने वाली फैक्ट्रियों को बंद कराने के बारे में कोई चिंता कर सकता है। हां, सालाना दूसरी खबरों की तरह इस तरह की तस्वीरों का भी रुदन हो सकता है। टीवी पर बैठकर शिक्षा व्यवस्था पर चिंतित हुआ जा सकता है। बिहार को गरियाया जा सकता है। लगे हाथ उत्तर प्रदेश को भी। आखिर देश की सारी अव्यवस्था की जड़ तो यूपी-बिहार ही है। ऐसे लगता है कि यूपी-बिहार देश में नहीं होता तो, देश गजब, अद्भुत, अकल्पनीय होता। बस हमारा काम हो गया है।

Tuesday, June 30, 2009

पत्थर के सनम ... बड़ी भूल हुई

पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना ... बड़ी भूल हुई। फिल्म में ये गाना दो लोगों के निजी प्रेम संबंधों के उम्मीदों पर खरा न उतरने को बखूबी बयां करता है। लेकिन, गीत लिखने वाले को शायद ये अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि ये लाइनें किसी ऐसी शख्सियत पर बखूबी फिट बैठेगा जो, करोड़ो की उम्मीदों को तोड़ रही है। धूल-धूसरित कर रही है।


मनुवाद, ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद की विरोधी मायावती की मूर्तियां लखनऊ में हर थोड़ी दूर पर नजर आने लगी हैं। मायावती शायद देश की पहली नेता होंगी जो, जीते जी ही खुद अपनी मूर्तियां लगाने पर जुटी हैं। गांव-समाज में एक देसी कहावत अकसर सुनने को मिल जाती है फलनवा बड़ा आदमी रहा। अपने जीते जी मरे के बादौ क इंतजाम कई गवा। काहे से कि केहु ओकरे करै वाला नहीं रहा। मायावती भी कुछ गांव-समाज के उसी बड़े आदमी जैसा बर्ताव कर रही हैं। लेकिन, मामला सिर्फ ये नहीं है कि मायावती ने किसी से प्रेम नहीं किया-शादी नहीं की तो, उनकी फिकर करने वाला भी कैसे होगा। दरअसल, ये मायावती तो, उन करोड़ों लोगों की उम्मीद थी जिन्हें लगता था कि ये हमारे लिए बहुत कुछ करने के लिए शादी-ब्याह नहीं कर रही। अपना जीवन-करियर सब त्याग दिया।


ये वो मायावती थी जिसकी मूर्ति कहीं नहीं थी लेकिन, यूपी का करोड़ो दबा-कुचला अधिकारविहीन पीछे डंडा-झंडा लिए गर्मी-पानी-जाड़ा में मायावती के नाम का झंडा बुलंद करता घूम रहा था। फिर मायावती को ये करने की क्यों सूझी। इन करोड़ो लोगों पर मायावती को भरोसा क्यों नहीं रहा कि ये उनके मरने के बाद भी उनका नाम उसी बुलंदी पर रखेंगे जहां आज बिठा रखा है।


ये वो लोग थे जो, मायावती के बनाए अंबेडकर पार्क में इकट्ठा होते हैं। एक दिन की रोजी-रोटी त्यागकर लखनऊ पहुंचते हैं। मनुवाद की खिलाफत में मायावती के साथ खड़े होने के लिए गंगा का किनारा छोड़कर लखनऊ के अंबेडकर पार्क में बनी नहर को भीमगंगा बना देते हैं। गंगा से पवित्र मानकर उसी पानी से आचमन करते हैं।

अब देखिए मायावती क्या कर रही हैं। मायावती इन अधिकार विहीन लोगों को अधिकार दिलाने की मृगमरीचिका दिखाकर सत्ता में आ गईं। अधिकार छीनने वालों की जिस टोली के मुलायम के साथ होने का ढिंढोरा पीटकर ये सत्ता में आईं सत्ता में आते ही उन्हीं लोगों को मंच पर खड़ा कर दिया। और, उन अधिकार विहीन लोगों से कहा- ये आपके मसीहा हैं इन्हें अधिकार दीजिए ये, आपके अधिकारों के लिए लड़ेंगे।


हाथी इन अधिकार विहीन लोगों की ताकत था। फटे पुराने नीले कपड़े पर हाथी लहराता देख इन्हें अपनी ताकत का अहसास होता था। अब लंबी-लंबी कारों पर साटन-मखमल के कपड़े पर हाथी लहरा रहा है। इन्हें लगता है कि जैसे ठगे गए हों। लखनऊ में खड़े 60 हाथी इन पर भार बन रहे हैं। बहनजी और उनके साथ दूसरे अधिकार विहीनों के लिए लड़ने वाले नेताओं की मूर्तियों पर सिर्फ लखनऊ में 2700 करोड़ रुपए खर्च हो गए। और, कहते हैं न कि हाथी पालने से ज्यादा उसे खिलाना भारी पड़ता है। कुछ ऐसा ही है। यूपी के अधिकार विहीनों की मेहनत की कमाई का 270 करोड़ रुपए हर साल सिर्फ इन पत्थर की मूर्तियों और हाथिय़ों को खिलाने में (मरम्मत) बरबाद होगा।


गांव-गिरांव में इन अधिकार विहीनों की जमीन का पट्टा नहीं हो पा रहा है। रत्ती-धूर जमीन में ये परिवार चला लेते हैं। जमींदार टाइप के लोग इनकी जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। इनको गांव की जमीन दिलाने का वादा करने वाला मायावती अब यूपी की सबसे बड़ी जमींदार हो गई है। जमींदार है इसलिए जमींदारी भी कर रही है। सिर्फ लखनऊ में 413 एक़ड़ की इस जमींदारी कब्जे की जमीन पर पत्थर के हाथी, पत्थर की मायावती, पत्थर के कांशीराम और पत्थर के दूसरे नेता खड़े हैं जो, जमींदारी मिटाने की लड़ाई लड़ रहे थे। पूरा का पूरा वो आंदोलन पत्थर होता दिख रहा है जो, नोएडा के एक गांव की अधिकार विहीन सामान्य महिला को कुछ महीने पहले तक देश की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने की जमीन बना चुका था।


और, ये आंदोलन खत्म होगा ऐसा नहीं है। सिर्फ अधिकार विहीनों की ही बात क्यों। मायावती की जिस सोशल इंजीनियरिंग ने यूपी में सारे समीकरण ध्वस्त कर दिए थे। वो, भी टूटेगा। सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय नारा भर बनकर रहा गया है। मायावती के नजदीकी हिताया और सिर्फ उन्हीं का सुखाय। और, सबको सिर्फ इन पत्थरों में ही अपना सुख खोजना होगा। 413 एकड़ जमीन और 2700 करोड़ रुपए इतनी बड़ी रकम तो, थी ही कि अधिकार विहीनों (5 करोड़ 90 लाख लोग इस प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे हैं) के अधिकार कुछ तो मिल ही जाते।

बात सिर्फ लखनऊ की ही नहीं है। मायावती अपने आखिरी निशान हर जगह छोड़ देना चाहती हैं। दिल्ली से नोएडा घुसते ही लखनऊ जैसे ही गुलाबी राजस्थानी पत्थरों की ऊंची दीवार दिखने लगती है। करीब 3 किलोमीटर का ये पूरा क्षेत्र जंगल था-हरा-भरा था। इन पत्थरों की ऊंची दीवारों के बीच में पत्थर के हाथी और मूर्तियां हैं जो, गर्मी की चिलचिलाती धूप में चिढ़ पैदा करते हैं। मेरा मन इन मूर्तियों को ढहाने का होता है।


नोएडा के दूर-दराज गांवों में भी लोगों के रहने के लिए घर मिलना मुश्किल है। इनता महंगा कि आम आदमी तो, सिर्फ देखते हुए जिंदगी बिता लेता है। ये पत्थर के जंगल वहां तैयार हो रहे हैं जहां, ठीक सामने की जमीन पर करोड़ो के बंगले हैं। मायावती का मनुवाद विरोध एक चक्र पूरा कर चुका है। करोड़पति बंगले वाले और मायावती और उनके पहले के मनुवाद विरोध नेता पत्थर के ही सही लेकिन, पड़ोसी हैं। आमने-सामने रहते हैं। खैर, मैं भी यूपी में ही रहता हूं इसलिए ज्यादा हिम्मत नहीं करूंगा लेकिन, मायावती के पीठ पीछे ये धुन जरा ऊंची आवाज में सुनने का मन करता है।

पत्थर की मायावती ... तुझे हमने दलितों का खुदा जाना ... बड़ी भूल हुई ...

पीछे से बैकग्राउंड स्वर – भूल हुई तो, भुगतो


और, सुना-पढ़ा कि सुप्रीमकोर्ट अब इन मूर्तियों के बनने, जनता के पैसे की बर्बादी पर सवाल पूछ रहा है –

ऑर्डर .. ऑर्डर .. ऑर्डर .. ये अदालत का मामला है चलता ही जाए

Saturday, May 03, 2008

लखनऊ की सत्ता से गांवों में बदलती सामाजिक-आर्थिक हैसियत

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव की इस छठवीं कड़ी में आज कोशिश इस बात को समझने-समझाने की कि आखिर, राजनीतिक पार्टी की सत्ता बदलने से कैसे गांवों में समीकरण बदल जाते हैं। कैसे इज्जत से कोई फूल जाता है और कैसे कोई बाजार में मूछें ऐंठने वाला दुम दबाकर अपने घर में बैठा सरकार के बदलने का इंतजार करता है।)

गांव जब गया तो, हमारे गांव की बाजार में मेडिकल स्टोर चलाने वाले बबलू तिवारी के घर का न्यौता भी करने का इरादा बन गया। बबलू की बहन की शादी थी। लेकिन, चूंकि हम लोगों को शाम को इलाहाबाद भी लौटना था। इसलिए दोपहर में ही जाकर न्यौता देकर लौट आने पर हम लोगों में सहमति बनी। भयानक गरमी में हम लोग अपने गांव से करीब दस किलोमीटर दूर चकवड़ गांव के लिए निकले।

बाघराय बाजार से नहर के बगल-बगल गांव के लिए थोड़ा शॉर्टकट रास्ता जाता है। नहर के दोनों तरफ बबूल के पेड़ लगे थे। मैं ही गाड़ी चला रहा था। बड़ी होने की वजह से टाटा सफारी को बबूल के कांटों से बचाकर चलना थोड़ा सा दुष्कर भी लग रहा था। तभी उस चटकती धूप में गमछा बांधे यामहा मोटरसाइकिल पर आ रहे दो लोगों में से पीछे वाले ने अपनी दुनाली बंदूक हवा में लहराकर गाड़ी किनारे करने का इशारा किया। खैर, न इतनी जगह ही थी नहर की पटरी पर और न ही बंदूक लहराने का अंदाज मुझे डरा पाया कि मैं गाड़ी किनारे करता। उनके मुंह से कुछ अपशब्दों के निकलने का अंदाजा लगा तो, मैंने गाड़ी धीमी कर ली (आखिर, मेरी भी तो पैदाइश प्रतापगढ़ की थी। मैं भला उनके बंदूक के रुतबे में कैसे आ जाता।) लेकिन, वो लोग रुके नहीं। शायद उनको भी लगा होगा कि सफारी में जा रहे हैं तो, कुछ अड़बंग लोग ही होंगे।


खैर, बंदूक के रुतबे से बचते-बचाते हम चकवड़ गांव के मोड़ पहुंचे तो, अंबेडकर ग्राम का चमकता बोर्ड और गांव तक चमकती पक्की सड़क थी। हम सीधे पहुंच गए। हमारे लिए पानी पीने के लिए बढ़िया पेठा आया। तब तक बबलू बाहर निकल आए थे और उन्होंने डांटकर कहा- बरातियन बिना जउन मिठइया आइबा, ओका लावा न यार। अरे, मैनेजर साहब (मेरे पिताजी) इलाहाबाद से इही तक चला आय अहैं। बबलू का छोटा भाई बिना चप्पल पहने ही मोटरसाइकिल लिए कराह और दूसरे जरूरी सामान टेंट में रखवा रहा था। पिताजी का पैर छूने के बाद बबलू ने सीना चौड़ा करके बताया (आखिर छोटे भाई की नौकरी जो, लगवा दी थी)- चाचा महेशौ क जिंदगी बनि ग अब। डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव म मैनेजर पर होई ग बा। हमहूं सोचे रहे कि स्वामी प्रसाद के साथे लाग अही तो, छोट काम न कहब। इहै सोचे रहे होई गवा चाचा आप सबेक आशीर्वाद आ। शुरू म रामपुर जाइ क परी लेकिन, मंत्रीजी कहे अहैं कि जल्दिन इलाहाबाद या प्रतापगढ़ बोलवाए लेब।

दरअसल, ये मंत्रीजी हैं बहनजी की सरकार के बेहद ताकतवर मंत्री और निष्ठावान बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य। यही वजह थी कि ब्राह्मण बहुल गांव होने के बाद भी ये गांव अंबेडकर गांव की श्रेणी में शामिल हो गया था। चूंकि इसी गांव में स्वामी प्रसाद मौर्य का भी घर था। और, सबसे बड़ी बात ये कि स्वामी प्रसाद मौर्य भले ही लखनऊ में बहुत रुतबे वाले हों। अपने गांव के आसपास वो बहुत शांति से रहते हैं, अंग्रेजी में लो प्रोफाइल। उसकी वजह भी साफ है- इसके पहले तक राजा (कुंडा के निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह) की हनक के आगे बेइज्जत होने से बचना चाहते थे। अब बहनजी की सत्ता आने के बाद राजा ठउरुक (शांत) होई ग अहैं। रघुराज प्रताप सिंह यूथ ब्रिगेड के बोर्ड तो पहले ही बाजारों से गायब हो गए थे अब, यूथ ब्रिगेड के कार्यकर्ता (रघुराज प्रताप सिंह के नाम पर प्रतापगढ़ की छोटी बाजारों में लफंगई करने वाले बेरोजगार लड़के) भी नहीं दिखते। अब इस इलाके में प्रमोद की टाटा सफारी पहचानी जाती है। राजा जैसा डर तो नहीं है लेकिन, रुतबा जबरदस्त है। बाभन तो, राज्य भर में बहनजी की सलामी बजा ही रहे हैं। यहां ठाकुर भी स्वामी मौर्य और उनके भतीजे प्रमोद के आगे सलामी बजाते हैं।

समाज बदल रहा है। अगड़े वर्ग के अगुवा बाभन की रोजी-रोटी (नौकरी) का जुगाड़ दलित (मायावती सरकार के मंत्री) की सिफारिश पर हो रहा है। अब बताइए, दलित उत्थान हो रहा है ना। वैसे, कुछ लोग दबी जुबान से ये भी कह रहे हैं कि प्रमोद बहुत बौराइ ग अहैं, ढेर उधरइहैं तो, मराइउ जइहैं। सरकार तो, आवत जात रह थे। खैर, अभी तो मायावती की ही सत्ता है और, बसपा के हाथी लगे नीले झंडे लगी गाड़ियों से उतरने वाले को सलाम-नमस्ते करने वाले ही बाजारों में ज्यादा दिख रहे हैं।

लखनऊ की सत्ता बदलते ही अचानक सबकुछ बदल जाता है। एसपी, डीएम के तबादले सुर्खियों में आते हैं। इससे बड़े लोगों को फरक पड़ता है। लेकिन, गांव में असली फरक पड़ता है ऐसे तबादलों से जिनके बारे में तो मीडिया खबर भी नहीं बनाता। लोक निर्माण विभाग(PWD), ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग(RES), फैक्सपेड, जल निगम, सिंचाई विभाग—के इंजीनियर, प्रोजेक्ट इंजीनियर के चार्ज तेजी में बदल जाते हैं। सपा की सरकार में एक साथ 5 करोड़ रुपए का काम करवा रहा ठेकेदार पैदल हो चुका है (मैं जानबूझकर नाम नहीं लिख रहा हूं), बसपा के निष्ठावान कार्यकर्ता ठेकेदार बन गए हैं (ये सतत प्रक्रिया है, यूपी में हर सरकार बदलने पर चुपचाप सबसे तेज धंधा यही होता है)।

आधी गिरी गिट्टी, डामर कोई दूसरा आकर कब्जा लेता है, काम शुरू करा देता है। पुरानी सरकार के लोगों के पेमेंट रुक गए हैं और नई सरकार के ठेकेदार सिर्फ गिट्टी गिराकर एडवांस पेमेंट पा जा रहे हैं। ये सामाजिक संतुलन है जो, एक सरकार बदलने और दूसरी सरकार बनने से बदल जाता है। यही आगे का मुनाफा पोलिंग बूथ पर अलग-अलग पार्टियों के कार्यकर्ताओं को अपने नेताजी के लिए गोली-बम चलाने, मतपत्र फाड़ने को उकसाता है। उत्तर प्रदेश में राजनीति का ये धंधा पूरी तरह से प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलता है। और, जिस प्राइवेट लिमिटेज कंपनी (पार्टी) से जो, जुड़ा है, उसका फायदा पक्का। बहन-बेटी की शादी में दरवाजे पर सत्ताधारी पार्टी के नेता के आने भर से गांव में मेजबान की काफी दिन तक हवा-पानी बनी रहती है।

सपा नेताओं के गांव तक स्वीकृत पक्की सड़क अब बसपा नेता के गांव तक जा रही है। कांग्रेस-भाजपा के छुटभैये नेता कह रहे हैं कि भई सरकार तो, बहनजी की ही अच्छी है और किसी बसपाई से सटकर अपना छोटा-मोटा काम निकाल ले रहे हैं। कुर्ता-पाजामा तो, सफेद ही रहता है किसी पार्टी की ड्रेस तो, है नहीं, बस थोड़ी जुबान सरका देनी है बहनजी के पक्ष मे। जुबान सरक रही है, ठेका चल रहा है। नीला झंडा लहरा रहा है। दलित उत्थान हो रहा है। और, कुछ लोग अगले चार सालों के लिए राजनीति से तौबा कर चुके हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि यूपी के गांवों में तो लोकसभा चुनावों में नीला झंडा ही लहराएगा। 5 साल बाद यूपी के गांव में मुझे सामाजिक संतुलन कुछ इसी तरह दिखा।

अगली कड़ी में
यूपी रोडवेज से सफर, एसी सलून और एटीएम की लाइन

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...