पिटते राष्ट्रीय मुद्दे और राष्ट्रीय पार्टियां

लोकसभा चुनाव का एलान हो गया है। देश भर से चुने गए सांसद अपनी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए एक दावेदार पेश करेंगे जो, देश चलाने का दावा करेगा। लेकिन, चुनावी महासमर से पहले इतना तो साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री भले ही दोनों राष्ट्रीय पार्टियों (कांग्रेस या बीजेपी) में से किसी का किसी तरह से बन जाए। देश पर राज अब क्षेत्रीय पार्टियां ही करेंगी। क्षेत्रीय पार्टियों का दबाव होगा, स्थानीय मुद्दे हावी होंगे। राष्ट्रीय मुद्दों पर भाषण खूब होंगे लेकिन, वोट नहीं मिलेंगे।


मैं अगर कह रहा हूं कि सब कुछ क्षेत्रीय-स्थानीय हो गया है। राष्ट्रीय मुद्दा, राजनीति पीछे छूट रहे हैं तो, ऐसे ही नहीं कह रहा हूं। कल जब गोपालस्वामी चुनाव की तारीखों का एलान कर रहे थे तो, देश की दोनों बड़ी पार्टियां राज्यों में अपने सांसद बढ़ाने के लिए स्थनीय-क्षेत्रीय दलों को साष्टांग प्रणाम कर रहीं थीं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस, लेफ्ट का गढ़ ढहाने के लिए ममता के सहारे थी तो, उत्तर प्रदेश में उसे मुलायम-अमर की जोड़ी का सहारा है जिन्होंने साम-दाम-दंड-भेद से यूपीए सरकार को परमाणु समझौते के मुद्दे पर बचा लिया था।



मामला सिर्फ इतना ही नहीं है कि कांग्रेस का हाथ इन क्षेत्रीय पार्टियों से मिलने के लिए बेकरार है, असल बात तो कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों का पिछलग्गू बनने से गुरेज नहीं है। बंगाल में कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी प्रदेश अध्यक्ष हैं। लेकिन, राष्ट्रीय पार्टी के इस अंतराष्ट्रीय संकटमोचक के पास अपनी पार्टी की राष्ट्रीय उपस्थिति बनाए रखने का कोई नुस्खा नहीं है।


लेकिन, संकटमोचक महाराज पर ही सवाल क्यों खड़ा किया जाए? जब त्यागी सोनिया माता के साथ देश भर में कांग्रेस को खड़ा करने की अनोखी योजना तैयार करने का दावा करने वाले राहुल भइया और नौजवान आंधा-प्रियंका गांधी अपनी खानदानी विरासत वाले राज्य उत्तर प्रदेश में ही कोई ढंग की योजना नहीं दे पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के समय दिल्ली में गांधी परिवार के एक निकट व्यक्ति ने मुझसे कहाकि राहुल भइया की नजर लोकसभा चुनाव पर है। विधानसभा चुनाव तो सिर्फ रिहर्सल भर है।


योजना ये थी कि राहुल के विदेशों में पढ़ी नौजवानों की एक टीम लोकसभा चुनाव का खाका तैयार करेगी। विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए मजबूत सीटों को तलाशा जाएगा और पुराने-नए चेहरों को मिलाकर 15-20 सांसद उत्तर प्रदेश से भेजने को कोशिश होगी। अब वो कोशिश कहां तक पहुंची है ये तो मुझे नहीं पता। लेकिन, कांग्रेस का हाल ये है कि 80 सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में मुलायम उसे 17 से ज्यादा देने को तैयार नहीं हैं। वो, भी तब जब बहनजी के प्रकोप से मुलायम डरे-डरे से घूम रहे हैं। अब 17 सीटं लड़ने को ही मिलेंगी तो, 15-20 सांसद जीतेंगे कैसे ये गणित तो, किसी चमत्कार से ही सिद्ध हो पाएगा।


राष्ट्रीय पार्टियों का हाल कितना बुरा है। इसका सही-सही अंदाजा उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के अभी हुए विधानसभा चुनावों से मिल जाता है। इन दोनों ही राज्यों में सत्ता में काबिज बसपा और लेफ्ट फ्रंट को अभी हुए विधानसभा चुनावों में करारी हार झेलनी पड़ी है। दोनों ने ही पूरा दम लगा रखा था। लेकिन, सब टांय-टांय फिस्स हो गया। काबिलेगौर बात ये कि इसका फायदा मिला दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को- उत्तर प्रदेश में सपा और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस। दोनों ही जगह कांग्रेस-बीजेपी बहुत पिछड़ी हुई दिखीं।


पश्चिम बंगाल की विश्णुपुर (पश्चिम) विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने सीपीएम प्रत्याशी को 30 हजार वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। लेकिन, राजनीति की नब्ज बताने वाली हार थी उत्तर प्रदेश की भदोही विधानसभा सीट से बहनजी की बसपा की। भदोही सीट मई 2007 में बसपा ने 5000 वोटों से जीती थी। अब करी इतने ही वोटों से सपा ने ये सीट जीत ली है।


भदोही विधानसभा सीट जीतने के लिए मायावती ने पूरी ताकत झोंक दी थी। 80 हजार दलित, 55 हजार मुस्लिम और इतने ही ब्राह्मण मतदाताओं वाली सीट पर बहनजी के पक्ष में सारे समीकरण दिख रहे थे। लेकिन, सब उल्टा हो गया। बावजूद इसके लिए मायावती की रैली हुई। ब्राह्मण-दलित एकता फॉर्मूले को अग्रदूत सतीश चंद्र मिश्रा और उनके खास ब्राह्मण सिपहसालारों – नकुल दुबे, अनंत मिश्रा, राकेशधर त्रिपाठी (सारे मंत्री)- और मायावती सरकार के ताकतवर मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दिकी ने पूरी ताकत झोंक दी थी।


यहां जो वोट मिले हैं वो, राष्ट्रीय पार्टियों की हैसियत को देश के इस सबसे बड़े सूबे में आइना दिखाते हैं। भदोही उपचुनाव में सपा की मधुबाला पासी को 60,507 वोट मिले। दूसरे नंबर पर रहे बसपा के अमर सिंह सरोज को 55,487 वोट मिले। अब जरा दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का हाल देखिए। बीजेपी के दीनदयाल सोनकर बसपा, सपा से बहुत पीछे – हां, तीसरे नंबर पर ही- 14,693 वोट ही जुटा पाए। अब आपको लग रहा होगा कि चौथे नंबर पर तो कांग्रेस ही होगी। जी नहीं, कांग्रेस प्रत्याशी को यहां सिर्फ 2,275 वो मिले हैं। जो, क्षेत्रीय में क्षेत्रीय किसी प्रगतिशील मानव समाज पार्टी के प्रत्याशी के 4,258 वोटों से भी कम हैं।


यही वजह है कि लौह पुरुष आडवाणी को अजीत की राष्ट्रीय लोकदल को 7 सीटें देना फायदे का सौदा लग रहा है। लेकिन, ये भी काफी हद तक तय है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को गाजियाबाद सीट से लोकसभा में पहुंचने का फायदा भले इस गठजोड़ से हो जाए। ज्यादा फायदा अजीत सिंह को ही मिलना है।


ये हाल सिर्फ उत्तर प्रदेश बंगाल का नहीं है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और 7 लोकसभा सीटों वाली दिल्ली को छोड़ दें तो, पूरे देश में राष्ट्रीय पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे कदमताल कर रही हैं। यही वजह है कि दिल्ली में बैठे नेताओं का पुराना दंभ – कि लोकसभा चुनाव में तो राष्ट्रीय मुद्दों पर बात होती है- टूट गया है। मुझे क्षेत्रीय पार्टियों के उत्थान से समस्या नहीं है। मुझे समस्या ये है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों के पीछे जैसे राष्ट्रीय पार्टियां चल रही हैं। वैसे ही हर राज्य में क्षेत्रीयता ही लोकसभा चुनाव पर हावी होती दिख रही है।



राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे रैली में झंडा-बेनर लगाने वाले कार्यकर्ता की तरह दरी पर किनारे बैठाए गए हैं। सजे मंच पर क्षेत्रीयता, जातिवाद, सांप्रदायिकता हावी है। इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार वैसे दोनों राष्ट्रीय पार्टियां ही हैं। आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, महंगाई, परमाणु करार पर अखबारों, टीवी चैनलों पर बहस तो चलेगी। कोई 4-6-10 हजार लोगों को लेकर मीडिया घरानों के सर्वे में इस पर 50-60 प्रतिशत लोग चिंता भी जताएंगे। लेकिन, देश की दिशा तय करने वाला एक और चुनाव पूरी तरह से क्षेत्रीय हो गया है। ये एक संप्रभु देश का चुनाव नहीं, अलग-अलग छोटे-छोटे देशों की सहमति से बने एक समूह का चुनाव हो रहा है। ये स्थिति थोड़ी बहुत बदल सकती है तो, हमारे-आपके वोट से। लेकिन, इसके लिए बहुत प्रयत्न करना होगा।


(ये लेख अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)