Saturday, November 03, 2007

बिहार को बरबादी-बदनामी से रोकने का आखिरी मौका

ज्यादा आशंका इसी बात की है कि 7 नवंबर को अदालत से बौराए विधायक अनंत कुमार सिंह को जमानत मिल जाए। और, वो अपने शाही बंगले में पहुंचकर फिर से कानून और लोकतंत्र को अपनी जेब में रखने का अहंकार दिखाने लगे। पत्रकार पिटे औऱ जमकर पिटे। इस पिटाई ने बिहार में कानून व्यवस्था की पोल तो, खोलकर रख ही दी है। साथ ही ये भी साफ दिख रहा है कि नीतीश कुमार अगर इस मौके पर चूक गए तो, फिर से बिहार को बरबादी और बदनामी के चंगुल में पूरी तरह फंसने से कोई रोक नहीं सकता।
पत्रकारों के पिटने का बहाना लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है। शुक्रवार को लालू की राष्ट्रीय जनता दल और रामविलास पासवान को लोक जनशक्ति पार्टी ने बंद रखा। और, राबड़ी देवी ने अनंत सिंह को फांसी देने की मांग भी कर डाली। पता नहीं राबड़ी देवी को याद है कि जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष चंद्रशेखर की हत्या करवाने के आरोपी की उनके पति लालू प्रसाद यादव के शासन में कितनी चलती थी। जाहिर है ये सारे लोग अनंत कुमार के पागलपन और नीतीश कुमार के मजबूरी के शासन का फायदा उठाकर फिर से सत्ता में लौटना चाहते हैं।
दरअसल अनंत कुमार सिंह जैसे लोगों की उत्पत्ति लालू राज का वो कोढ़ है जो, अब ठीक नहीं पा रहा है। नीतीश कुमार ने बिहार में जनता के बदलते मूड को पकड़ा जिसकी वजह से जनता ने उन्हें उनके सपनों की कुर्सी पर बैठा दिया। लेकिन, नीतीश ने लालू के बाहुबलियों से मुकाबले के लिए अनंत कुमार सिंह और दूसरे कई बाहुबलियों को प्रश्रय देना भी शुरू कर दिया था। इन लोगों ने नीतीश कुमार के लिए चंदा भी जुटाया। गोली भी चलाई और अब वो सारे किए को बिहार की जनता से वसूल रहे हैं।

नीतीश के प्यारे छोटे सरकार (लोकतंत्र पर ऐसे विशेषण गाली की तरह हैं) जेल से राज चलाते हैं। नीतीश कुमार अनंत कुमार जैसे पागल गुंडे को सार्वजनिक मंच पर गले लगाकर गदगद हो जाते हैं। नीतीश को तब भी समझ में नहीं आता जब अनंत कुमार के यहां सार्वजनिक मौके पर एके 47 से गोलयां चलती हैं। नीतीश कुमार को इस पागलपन का अहसास तब भी नहीं होती। जब अनंत कुमार कानून को ठेंगा दिखाते हुए बड़े मजे से किसी चैनल पर कहते हैं कि हां, एक ठेकेदार ने उन्हें मर्सिडीज कार तोहफे में दी है। मैंने उसे कह दिया है कि अब जाओ मजे से काम शुरू करो। नीतीश कुमार को तब भी पता नहीं चलता कि वो बिहार को किस रास्ते पर ले जा रहे हैं। जब, उन्हें रेशमा खातून नाम की महिला अनंत कुमार सिंह की काली करतूतों के बारे में चिट्ठी लिखती है। साफ-साफ लिखती है कि अनंत कुमार सिंह उनके साथियों ने उसके साथ बलात्कार किया। अब उसकी कभी भी हत्या की जा सकती है। लेकिन, नीतीश सरकार कान में तेल डालकर बैठी रही। अब तो ये लगभग साफ हो गया है कि बेनामी लाश रेशमा खातून की ही है। यानी बिहार में मुख्यमंत्री से फरियाद भी गुंडों से नहीं बचा पाती है।

इसी मामले के बारे में पत्रकार जब अपने धर्म को निभाते हुए आरोपी से भी उनका पक्ष जानने गए तो, उन्हें बिहार के नए नीति नियंताओं ने मार-मारकर लहूलुहान कर दिया। मुझे लगता है, रेशमा खातून के पत्र की सच्चाई पर शक करने की अब तो कोई वजह नहीं दिखती। लालू के राज में हुए वसूली, बलात्कार, हत्या, अपहरण के मामलों को ही मुद्दा बनाकर नीतीश को सत्ता मिल गई। लेकिन, नीतीश के राज में भी वही सब होने लगा। बस, करने वालों के चेहरे बदल गए। नीतीश शायद कुर्सी पाने के बाद ये भूल गए हैं कि मुख्यमंत्री से सड़क पर सरकार का विरोध करने वाले नेता पर पड़ती सरकारी लाठी में बहुत ज्यादा फासला नहीं होता है।
अभी भी नीतीश कुमार के आशीर्वाद के भरोसे पगलाया अनंत कुमार पत्रकारों को जेल से ही मरवाने की धमकी दे रहा है। नीतीश कुमार के लिए ये आखिरी मौका होगा कि वो किसी भी तरह से अनंत कुमार जैसे लोगों के चंगुल से बिहार को बंधक बनाने से रोक लें। क्योंकि, अगर ये साबित हो गया कि बस चेहरे बदल गए हैं बिहार वैसे का वैसा ही है तो, फिर से बिहार की जनता परिवर्तन का मन बनाने में जाने कितने साल लगा देगी। नीतीश को ये समझना होगा कि बिहार में निवेशकों को बुलाने के सम्मेलन और कुछ सड़के, पुल बना देने भर से बिहार नहीं सुधरने-बदलने वाला।

बिहार का कोढ़ है यहां समाज व्यवस्था में घुस गया कानून को ठेंगे पर रखने का चलन। हर कोई इसी बात में खुश रहना चाहता है कि उसे कानून का कोई डर नहीं। अनंत कुमार को कड़ी सजा मिले ये नीतीश के कुद के स्वाभिमान को बचाए रखने के लिए जरूरी है। रेशमा खातून के पत्र में साफ लिखा था कि वो नीतीश को अपने छोटे-छोटे, लुच्चे-लफंगे टाइप के गुंडों के सामने भी अकसर गरियाता रहता है। साफ है अनंत कुमार के घर का चौकीदार भी नीतीश की इज्जत तो नहीं ही करता होगा। अब अगर नीतीश अपनी ही इज्जत नहीं बचा पाते हैं तो, फिर उनको बिहार की इज्जत बचाने का जिम्मा कैसे दिया जा सकता है। नीतीशजी आप सुन रहे हैं ना या आपको लुच्चों-लफंगों-गुंडों के अलावा किसी की आवाज भी सुनाई नहीं देती?

5 comments:

  1. बिहार की राजनीति एवं अपराधीकरण पर एक सटीक और सार्गर्भित टिप्पणी .

    निश्चय ही लेख झकझोर गया . सोचने पर मज़बूर करता है आपका लेख.
    परंतु मित्र, हल कहां है? क्या बिहार की समस्याओं का हल हम नीतिश या किसी अन्य व्यक्ति में खोज सकते हैं?

    अशिक्षा, गरीबी ,भुखमरी ,बेकारी और इन सबसे ऊपर बैठा जातिवाद का राक्षस. शुरुआत ऊपर से ही करनी होगी

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  2. फिक्र न करें - महापद्म नन्द और जरसन्ध के जमाने में भी बिहार ऐसा बेलाग और बेलगाम रहा है। एनडीटीवी के पत्रकार तो आज पिटे हैं न। कई लोग युगों से पिटते पीटते आ रहे हैं। बहुत ज्यादा स्यापा न करिये।

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  3. पत्रकारों के पिटने का स्यापा तो मैं कर भी नहीं रहा। कुछ पत्रकार भी अगर लालू-नीतीश और उनके बेलगाम राज के साथी नहीं रहते तो, इतना बेलगाम राज तो नहीं ही रहता। आपको भले ये साफ न दिख रहा हो। किसी एक पत्रकार के पिटने से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन, जब लोकतंत्र के प्रतीकों पर हमला करके कोई व्यक्ति सबकुछ ढेंगे पर रखता दिखे तो, उस पर लोगों का आक्रोश अगर एक साथ दिख रहा है तो, उसे स्यापा कहके सुधार की संभावना धूमिल तो नहीं किया जा सकता।

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  4. अरविंदजी
    हल निकालने के लिए ही जनता ने बिहार में बड़ा बदलाव किया। लेकिन, नीतीश उस बदलाव को धो दे रहे हैं। देखते हैं बदलाव तो जनता ही करेगी

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  5. बिहार में राजनीति के अपराधीकरण का यह मामला कोई नया नही है भाई , बिहार में ऐसी घटनाओं को आम घटनाओं की संज्ञा दी जाती है , बिहार के ही एक कवि डॉक्टर श्याम नंदन किशोर ने लिखा है कि -
    स्व से ऊँचा चरित्र कठिन है,
    राजनीति में मित्र कठिन है ,
    किसी जुआरी के अड्डे पर -
    वातावरण पवित्र कठिन है !
    सही कहा आपने -बदलाव तो जनता ही करेगी!

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