अपंग सरकारों की गलत नीतियों से फिर मजबूत हो रहे हैं आतकंवादी

आज उत्तर प्रदेश के 3 शहरों में एक साथ फिर धमाके हुए। कम से कम 15 लोगों के मारे जाने की खबर हैं। सैकड़ो घायल हुए हैं। इस बार के हमले लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद की जिला कचहरियों में हुए। ये इत्तफाक ही नहीं है कि तीनों ही अदालतों में आतंकवादियों के खिलाफ मामलों की सुनवाई चल रही है। लखनऊ की अदालत में तो अभी कुछ दिन पहले ही तीन आतंकवादियों को वकीलों के गुस्से का शिकार होना पड़ा था। ये तीनों आतंकवादी राहुल गांधी या फिर दूसरे किसी नेता को अगवा कर देश की अलग-अलग जेलों में बंद 52 आतंकवादियों को छुड़ाना चाहते थे।

लखनऊ में वकीलों ने पेशी के समय इन्हीं तीनों आतंकवादियों की पिटाई कर दी थी। माना जा रहा है कि आज के धमाके करके आतंकवादी ये संदेश देना चाहते हैं कि कोई भी कहीं भी हो वो हमले कर सकते हैं। सबसे ज्यादा लोग वाराणसी की अदालत में हुए धमाके में मारे गए हैं। यहां एक और बहुचर्चित मामले की सुनवाई चल रही है। भाजपा विधायक अजय राय के भाई अवधेश राय की एक दशक पहले हुई हत्या के मामले में आज अजय राय की गवाही होनी थी। इस मामले में मऊ के माफिया विधायक मुख्तार अंसारी मुख्य आरोपी हैं। ये वही मुख्तार अंसारी हैं जो, सपा शासन के दौरान भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के भी आरोपी हैं। इसके अलावा मुख्तार पर मऊ में दंगे भड़काने और दंगे के दौरान नंगी रिवाल्वर लेकर कई गाड़ियों के काफिले के साथ खुलेआम दहशत फैलाने का भी आरोप है। पहले से भी इस बात की चर्चा होती रही है कि इन माफियाओं के संबंध दाऊद और आतंकवादी संगठनों से हैं।

पिछले कुछ समय से देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई कट्टरपंथी घटनाओं को भी अगर साथ रखकर देखें तो, साफ-साफ दिखता है कि किस तरह आतंकवादी धीरे-धीरे फिर सिर उठा रहे हैं। वो, इतने मजबूत हो गए हैं कि टीवी चैनलों को मेल भेजकर बताया और उत्तर प्रदेश की तीन जिला अदालतों में बम धमाके करा दिए।

वैसे तो, उत्तर प्रदेश के इन तीन शहरों और कोलकाता में कोई रिश्ता नहीं दिखता है। लेकिन, मैं कोलकाता में दंगे जैसे हालात की वजह जानकर हैरान रह गया था। कोलकाता में कट्टरपंथी मुस्लिम तसलीमा को बंगाल से बाहर भगाने की बात कह रहे थे। मझे लग रहा था कि ये नंदीग्राम का गुस्सा है। लेकिन, नंदीग्राम की आड़ में आतंकवादी ताकतें कोलकाता को कबाड़ बनाने में सफल हो गईं। और, घुसपैठी बांग्लादेशियों को अपने वोटबैंक के तौर पर तैयार करने वाली सीपीएम की सरकार इतने बड़े खतरे से आंखें मूंदे बैंठी रही। हाल ये है कि बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल से कई ऐसे रास्ते हैं जिसके जरिए लोग धड़ल्ले से आर पार आते जाते रहते हैं। यहां तक कि कई इलाकों में तो लोग बांग्लादेश का सिमकार्ड तक इस्तेमाल कर रहे हैं।

महाराष्ट्र के मालेगांव में धमाके, हैदराबाद के धमाके, हैदराबाद में तसलीमा के ऊपर हमला, कोलकाता मे तसलीमा के सिर पर ईनाम रखने वाला मौलवी। ये सारी ऐसी घटनाएं थीं जो, पूरी तरह से सोची समझी साजिश थी। इन सबको एक के बाद एक अंजाम दिया गया। लेकिन, सवाल ये कि देश भर में चल रही आतंकवादी हरकतों की जानकारी केंद्र सरकार को किस तरह से है। और, अगर इस खतरे की पूरी जानकारी है तो, इस मामले पर कड़ी कार्रवाई करने से क्यों बच रही है सरकार। क्या सिर्फ इस डर से कि मुसलमानों का वोटबैंक उसके हाथ से निकल जाएगा।

मुझे समझ में नहीं आता कि जमीन-जायदाद, हत्या, अपहरण के मामले में अदालतें समय लेते-लेते इतना समय ले लेती हैं कि न्याय के इंतजार में कई पीढ़ियों की जिंदगी खत्म हो जाती है। लेकिन, देश की अदालतें आतंकवादियों को सजा देने में इतना समय कैसे ले सकती हैं। आज आतंकवादियों ने सिर्फ इस बात पर हमला बोला है कि वकीलों ने उनके साथ मारपीट की और उनका केस लड़ने से मना कर दिया। कम से कम अदालतों को देश की सुरक्षा जैसे संवेदनशील मामले पर फैसला सुनाने में तो जल्दबाजी दिखानी ही होगी।

कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार के गृहमंत्री शिवराज पाटिल और गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल को तो देखकर ही लगता है कि ये सोए-सोए से रहते हैं। धमाके के बाद श्रीप्रकाश जायसवाल शांति भाषण दे रहे थे और आतंकवादियों से लड़ने की उम्मीद प्रदेश की जनता से कर रहे थे। उनके बयान में आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का एक भी शब्द नहीं फूटा। कांग्रेस और मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति खेलने वाली पार्टियों ने संसद में पोटा कानून का विरोध इस तरह से किया था जैसे वो उनकी राजनीति ही खत्म कर दगा।

ये तुष्टीकरण की राजनीति ही है कि सुप्रीमकोर्ट से सजा सुनाए जाने के बाद भी संसद पर हमले का दोषी अफजल गुरू अब तक फांसी पर नहीं चढ़ाया जा सका है। मानवाधिकार संगठन अफजल गुरू के पक्ष में जनमत बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें आतंकवादी हमले में मारे गए निर्दोषों के मानवाधिकार नजर नहीं आते। और, पूरी यूपीए सरकार चुपचाप अफजल को बचाने की मुहिम पर आंख मूंदे बैठी है। तसलीमा को बचाने के लिए सरकारों को तसलीमा को देश भर में भगाकर रखना पड़ रहा है। हम किससे डरे हुए हैं। इतने डरे लोगों को सौ करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश के भाग्य का फैसला करने का हक कैसे दिया जा सकता है। ऐसे में सचमुच लगता है कि इस नजरिए के साथ सत्ता में बैठे लोगों के हाथ में देश है तो, देश का भगवान ही मालिक है।