Sunday, November 25, 2007

बाबूजी कानून मत बताइए

नियम-कायदे तोड़ना और उसी से तरक्की की कोशिश करना हमारे मिजाज में गजब का रच बस गया है। हाल ये है कि भ्रष्टाचार की हमें इस तरह आदत पड़ गई है कि इसके लिए हमने ढेर सारे तर्क-कुतर्क भी ढूंढ़ लिए हैं।

आज मैं अपने मोहल्ले की दुकान से स्प्राइट लेने गया। वैसे तो मैं कोई भी कोल्डड्रिंक नहीं पीता हूं। लेकिन, जब पेट साफ न हो रहा हो या फिर किसी पार्टी में तेल से भरा खाना ज्यादा खा लेने से पेट अजीब भाव दिखाने लगे तो, मैं कोल्डड्रिंक पी लेता हूं। और, ये मेरा भ्रम ही होगा लेकिन, मुझे लगता है कि कोल्डड्रिंक पी लेने के बाद पेट की सफाई बड़ी अच्छी हो जाती है।

खैर, मोहल्ले की दुकानवाले से मैंने स्प्राइट मांगा। बोतल पर MRP 20 रुपए लिखी हुई थी। 20 रुपए देने लगा तो, उसने 22 रुपए मांगे। मैंने कहा इस पर तो 20 रुपए लिखा है। उसने कहा तो, क्या बाबूजी हम कुछ न कमाएं। मैंने कहा कंपनी तो तुम्हें इस पर कमीशन देती ही है। फिर उसके पास जवाब तैयार था और इस बार पहले से तीखा जवाब था। बाबूजी कानून मत बताइए और जब आप इस तरह के सवाल कर रहे हैं तो, फिर इसे ठंडा करने में हमें जो बिजली का बिल देना पड़ता है। वो, कौन भरेगा। उसकी दुकान में फ्रिज भी कोल्डड्रिंक कंपनी का दिया हुआ लगा था।

मैंने कहा तुम्हारी दुकान में तो, फ्रिज भी कंपनी का ही दिया हुआ है। उसने फिर अचानक पैंतरा बदला। दुकानदार ने कहा साहब बहुत चोर कंपनियां हैं ये। अब दो-चार रुपए कमा लेता हूं इसलिए रखता हूं नहीं तो, ये सब सामान तो इस्तेमाल ही नहीं करना चाहिए पीने लायक थोड़े ना होता है। इसी बीच उसके मुंह से निकल गया बिना ठंडा किया लेना हो तो, ले लीजिए। मैं भी 2 रुपए ज्यादा न देने पर अड़ा था। मैं 20 रुपए में ही बोतल लेकर आ गया।

ये दुकानदार भ्रष्ट होने के लिए अजीब तर्क गढ़ रहा था। एक कंज्यूमर चैनल में काम करने के नाते मुझे अच्छे से पता है कि MRP पर ही बेचने वाले को कंपनियां कमीशन देती हैं। ये दुकानदार महाशय ज्यादातर दूध, दही, मक्खन जैसी चीजें बेचते हैं। उसमें भी हर आधे किलो के पैकेट 50 पैसे और एक किलो के पैकेट पर 1 रुपए ज्यादा उसे ठंडा रखने के नाम पर ले लेते हैं। शायद भ्रष्टाचार हमारी आदत में शामिल हो गया है। और, हमें लगता है कि अपनी तरक्की के लिए दूसरों से जरूरत से ज्यादा पैसे वसूल लेने से ही बड़ा आदमी बना जा सकता है।

5 comments:

  1. त्रिपाठी जी ऐसे लेख समय समय पर कन्‍ज्‍यूमर्स व पाठको के बीच आते रहना चाहिए । यह बात हम सब को पता है और गाहे बजाहे हम सब इससे दो चार होते हैं पर दो रूपये में क्‍या होता है कह कर अपने अधिकारों व दायित्‍वों की इतिश्री कर लेते हैं । इसे पढने के बाद मन में जागृति तो आयी ही है । धन्‍यवाद ।

    www.aarambha.blogspot.com

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  2. "भ्रष्टाचार हमारी आदत में शामिल हो गया है। और, हमें लगता है कि अपनी तरक्की के लिए दूसरों से जरूरत से ज्यादा पैसे वसूल लेने से ही बड़ा आदमी बना जा सकता है।" अच्छा लगा।

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  3. ये दिक्कत तकरीबन सभी जगह है देश में!!

    बात सिर्फ़ स्प्राईट की ही नही है!
    अधिकतर उत्पाद में ऐसे ही लूट रहे हैं ये!!

    एक रुपए वाला गुटखे का पाऊच सारे शहर में डेढ़ रुपए में बिक रहा, क्यों, क्योंकि कमीशन में कंपनी ने कटौती कर दी है, अत: सीधे रेट बढ़ाकर बेचो और ग्राहक से वसूलो। माना कि गुटखा एक गलत चीज है पर कानून भी कोई चीज है या नई!!

    दूसरी बात , छत्तीसगढ़ मे अठन्नी नाम की वस्तु का चलन तो जमाना हुआ बंद ही है बदले में चॉकलेट थमा दी जाती है। जबकि नागपुर तरफ़ जाओ तो अठन्नी धड़ल्ले से चलती दिखती है।

    आम आदमी की जेब से न जाने कितनी ही अठन्नियां ऐसे ही निकलते जाती है और सरकारी विभागों को फ़ुरसत ही नई ऐसी लूट पर ध्यान देने की!!

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  4. यूपोरियन वातावरण में तो इनकी बिक्री भी खास नहीं होती। सही कन्ज्यूमर रिलेशन रखें तो शायद बढ़े भी। पर लालच और भ्रष्टाचार इनकी खुद की जड़ खोदता है।

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  5. उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोई प्रभावी तंत्र न होने के कारण जागरुक उपभोक्ताओं को कोफ्त ही होती है। क्योंकि ऐसी स्थिति में अपने अधिकार सुरक्षित रखने के लिए जागरूक उपभोक्ताओं को हर गली, हर मोहल्ले, हर दुकान पर हर वक्त झगड़ते ही रहना पड़ता है। और फिर एक समय आता है, जब आपके दोस्त और परिवार वाले भी कहते हैं कि यार सारी दुनिया में एक तुम ही कानून वाले हो। क्या 1-2 रुपये के लिए झगड़ते रहते हो। है न?

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