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Sunday, November 25, 2007

बाबूजी कानून मत बताइए

नियम-कायदे तोड़ना और उसी से तरक्की की कोशिश करना हमारे मिजाज में गजब का रच बस गया है। हाल ये है कि भ्रष्टाचार की हमें इस तरह आदत पड़ गई है कि इसके लिए हमने ढेर सारे तर्क-कुतर्क भी ढूंढ़ लिए हैं।

आज मैं अपने मोहल्ले की दुकान से स्प्राइट लेने गया। वैसे तो मैं कोई भी कोल्डड्रिंक नहीं पीता हूं। लेकिन, जब पेट साफ न हो रहा हो या फिर किसी पार्टी में तेल से भरा खाना ज्यादा खा लेने से पेट अजीब भाव दिखाने लगे तो, मैं कोल्डड्रिंक पी लेता हूं। और, ये मेरा भ्रम ही होगा लेकिन, मुझे लगता है कि कोल्डड्रिंक पी लेने के बाद पेट की सफाई बड़ी अच्छी हो जाती है।

खैर, मोहल्ले की दुकानवाले से मैंने स्प्राइट मांगा। बोतल पर MRP 20 रुपए लिखी हुई थी। 20 रुपए देने लगा तो, उसने 22 रुपए मांगे। मैंने कहा इस पर तो 20 रुपए लिखा है। उसने कहा तो, क्या बाबूजी हम कुछ न कमाएं। मैंने कहा कंपनी तो तुम्हें इस पर कमीशन देती ही है। फिर उसके पास जवाब तैयार था और इस बार पहले से तीखा जवाब था। बाबूजी कानून मत बताइए और जब आप इस तरह के सवाल कर रहे हैं तो, फिर इसे ठंडा करने में हमें जो बिजली का बिल देना पड़ता है। वो, कौन भरेगा। उसकी दुकान में फ्रिज भी कोल्डड्रिंक कंपनी का दिया हुआ लगा था।

मैंने कहा तुम्हारी दुकान में तो, फ्रिज भी कंपनी का ही दिया हुआ है। उसने फिर अचानक पैंतरा बदला। दुकानदार ने कहा साहब बहुत चोर कंपनियां हैं ये। अब दो-चार रुपए कमा लेता हूं इसलिए रखता हूं नहीं तो, ये सब सामान तो इस्तेमाल ही नहीं करना चाहिए पीने लायक थोड़े ना होता है। इसी बीच उसके मुंह से निकल गया बिना ठंडा किया लेना हो तो, ले लीजिए। मैं भी 2 रुपए ज्यादा न देने पर अड़ा था। मैं 20 रुपए में ही बोतल लेकर आ गया।

ये दुकानदार भ्रष्ट होने के लिए अजीब तर्क गढ़ रहा था। एक कंज्यूमर चैनल में काम करने के नाते मुझे अच्छे से पता है कि MRP पर ही बेचने वाले को कंपनियां कमीशन देती हैं। ये दुकानदार महाशय ज्यादातर दूध, दही, मक्खन जैसी चीजें बेचते हैं। उसमें भी हर आधे किलो के पैकेट 50 पैसे और एक किलो के पैकेट पर 1 रुपए ज्यादा उसे ठंडा रखने के नाम पर ले लेते हैं। शायद भ्रष्टाचार हमारी आदत में शामिल हो गया है। और, हमें लगता है कि अपनी तरक्की के लिए दूसरों से जरूरत से ज्यादा पैसे वसूल लेने से ही बड़ा आदमी बना जा सकता है।

Tuesday, November 13, 2007

ज्यादा पढ़े-लिखे भारत को लड़कियां कम पसंद हैं

दीपावली बीत गई। सबने लक्ष्मी पूजन किया। घर की लक्ष्मी की भी इज्जत बढ़ाई। और, घर में ढेर सारी लक्ष्मी आने के लिए तरह-तरह की पूजा की, दीप जलाया, मिठाइयां बांटी। वैसे भी अक्सर भारतीय संस्कृति-संस्कारों में लड़की को मातृशक्ति, देवी, घर की मालकिन कहकर उसे ज्यादा इज्जत देने की कोशिश दिखती रहती है। लेकिन, हर साल तरक्की करता भारत शायद इसका दिखावा ही करता है। दरअसल ज्यादा पढ़ा-लिखा भारत लड़कियों से ज्यादा ही भेदभाव कर रहा है।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के ताजा जेंडर गैप इंडेक्स में भारत सबसे नीचे के दस देशों में शामिल है। लड़कियों से भेदभाव के मामले में भारत की स्थिति और खराब हुई है। इस सर्वे में 128 देश शामिल हुए। इसमें भारत 115वें नंबर पर है। जबकि, पिछले साल भारत 98वें नंबर पर था। पिछले साल से इस साल में पढ़े-लिखे लोग तेजी से बढ़े। भारतीयों के घर सुविधाओं बढ़ीं और ज्यादा समृद्धि आई। लेकिन, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक और स्वास्थ्य के मामले में लड़कियों के साथ भेदभाव भी बढ़ता गया।

कुछ दिन पहले दिल्ली से एक सर्वे में ये साफ निकलकर आया था कि दक्षिण दिल्ली में सबसे ज्यादा कन्याएं गर्भ में ही मार दी जाती हैं। दक्षिण दिल्ली, सिर्फ दिल्ली का ही नहीं देश का वो इलाका है, जहां लोग ज्यादा पढ़े-लिखे हैं। ज्यादा तरक्की की है। किसी तरह की सुविधाओं की कमी नहीं है। इसके खतरे भी साफ नजर आने लगे हैं।

खैर वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के सर्वे के मुताबिक, लड़कियों को आर्थिक तरक्की यानी रोजगार के मौके देने के मामले में भारत 128 देशों में 122वें नंबर पर चला गया है। इस मामले में भारत से खराब स्थिति सिर्फ ऐसे देशों की है जिनका जिक्र करने का भी मतलब नहीं है। तरक्की के मामले में अक्सर BRIC देशों (ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन) की तुलना होती है। लड़कियों को समान मौके देने के मामले में ये देश भारत से बहुत आगे हैं। ब्राजील इसमें 62वें, रूस 16वें और चीन 60वें नंबर पर है।

दीपावली पर लक्ष्मी की पूजा करने वालों को ये समझ में क्यों नहीं आता कि अगर असल लक्ष्मी (लड़कियों) के साथ इसी तरह भेदभाव होता रहा। तो, लक्ष्मी किस बहाने ऐसे लोगों के घर आ पाएंगी। भारतीय शास्त्र और संस्कृति में तो ये भी कहा जाता है कि लक्ष्मी (पत्नी) के साथ की गई पूजा का फल जल्दी और ज्यादा मिलता है। तो, लक्ष्मी को सम्मान (बराबर का दर्जा) तो देना सीखो।

Monday, November 05, 2007

भारत में कब किसी मंत्री पर जुर्माना लगेगा?

ब्रिटेन में एक मंत्री पर पुलिस ने जुर्माना लगा दिया है। गुनाह इतना छोटा था कि अगर भारत में मंत्रीजी ऐसा कर रहे होते तो, पुलिस उनकी तरफ देखती भी नहीं। ब्रिटेन के होम ऑफिस मिनिस्टर ऑफ स्टेट फॉर बॉर्डर एंड इमीग्रेशन को रोड ट्रैफिक एक्ट 1988 के तहत 208 डॉलर यानी करीब 8,000 रुपए का जुर्माना लगाया है। साथ ही ब्रिटेन के मंत्रीजी के लाइसेंस पर 3 पेनाल्टी प्वाइंट्स भी जोड़ दिए गए हैं।
लियाम बायर्ने ने अदालत से अपनी गलती की माफी मांगी है। और, कहा कि वो बहुत जरूरी कॉल थी। लेकिन, अदालत ने कहा कि वो इतने जिम्मेदार पद पर हैं इसलिए ये और जरूरी हो जाता है कि वो, इन नियमों का पूरी तरह से पालन करें। बायर्ने रोड सेफ्टी एक्ट बनाने वाली संसदीय समिति के सदस्य भी रहे हैं जिसने, गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल पर बात करने वालों पर ज्यादा जुर्माना लगाने की सिफारिश की थी।
वैसे तो, भारत में भी मोबाइल फोन पर बात करना गुनाह है। और, दिल्ली में तो, इस पर हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने जुर्माना भी बढ़ा दिया है। लेकिन, पुलिस की क्या मजाल जो किसी मंत्री या आला अधिकारी को कभी इस गुनाह के लिए पकड़ने की हिम्मत कर पाए। हम तो उस दिन का इंतजार कर रहे हैं भारत के किसी मंत्रीजी से पुलिस फोन पर बात करने के लिए जुर्माना वसूल करने की हिम्मत जुटा पाए।

Thursday, November 01, 2007

42 साल बाद 2.80 करोड़ लड़कों की शादी नहीं होगी!

हैदराबाद में एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस में एक डराने वाली बात सामने आई है कि 2050 तक करीब 3 करोड़ लड़कों को शादी के लिए लड़की नहीं मिलेगी। भारत में गर्भ में ही लड़कियों को मार देने का चलन न रुक पाने की वजह से लड़कों-लड़कियों के बीच का अनुपात घटता ही जा रहा है। लेकिन, अभी भी भारतीय समाज शायद इस बात को गंभीरता से नहीं ले रहा है। ये कितना बड़ा खतरा है इसका अंदाजा उत्तर प्रदेश के एक गांव की कहानी से लगाया जा सकता है। यहां अभी ही लड़कियां खोजने से नहीं मिल रही हैं। शाहजहांपुर के बहादुरपुर गांव में दस से बारह लड़कों के बीच में अकेली लड़की परिवारों में जन्म ले पा रही है। सिर्फ एक गांव की ये बुरी हालत नहीं है। जिले की सदर तहसील में लड़कों के आधे से थोड़ी ज्यादा ही लड़कियां हैं। सदर तहसील में 1,000 लड़कों पर सिर्फ 535 लड़कियां हैं।

शाहजहांपुर के शहरी इलाके में भी लड़कों के लिए लड़कियां खोजे नहीं मिल रही है। 1,000 लड़कों के बीच सिर्फ 678 लड़कियां हैं। हाल ये है कि एक-एक परिवारों में छे-छे लड़कों के बीच में अकेली बहनें हैं। शाहजहांपुर में लड़कियों को गर्भ में ही मार देने का चलन ऐसा है कि खुद महिलाएं अबॉर्शन की बात मानती हैं। वो, भी खुश हैं कि बेटी की शादी के लिए दहेज जुटाने की चिंता से वो मुक्त हैं। लड़कियों के हर क्षेत्र में लड़कों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के बाद भी हर साल एक करोड़ लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है। मुझे समझ में नहीं आता कि वो कौन से लोग हैं जो, अपने ही बच्चे को गर्भ में मारकर दहेज बचा लेने की चिंता दूर होने से खुश होते हैं। मैं तो, अब ये सोचता हूं कि हमारे समाज के वो लोग ज्यादा भले हैं जिन्होंने लड़कों की चाहत में कई लड़कियों को जन्म दिया। कम से कम यहां लड़के की चाहत किसी लड़की जिंदगी तो नहीं ले रही है।
पता नहीं कब हम भारतीय ये समझ पाएंगे कि दस लड़के पैदा करने से अच्छा है कि एक-दो लड़कियों को ही इतनी अच्छी परवरिश दे दी जाए कि वो लड़के भी उनकी किस्मत से रश्क करें। उम्मीद करता हूं कि कम से कम हमारी पीढ़ी 2050 में आने वाली पीढ़ी के लिए ऐसी सामाजिक विसंगति तैयार करके नहीं देगी।

Friday, October 12, 2007

सादगी से शादी!

दिल्ली की मशहूर शादियों की रौनक कुछ कम हो सकती है। खासकर पंजाबी शादियों की। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने शादियों की सीजन शुरू होने से पहले सिख धर्म मानने वालों को सादगी से शादी करने की सलाह दी है। कमटी का तो, यहां तक कहना है कि लोग रात की बजाए दिन में ही शादियां करें। साथ ही ये शादियां गुरुद्वारे से ही की जाए।

लोग गुरुद्वारे की सलाह मान भी रहे हैं। लेकिन, ज्यादा से ज्यादा लोगों को गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का शादियों पर बना कोड ऑफ कंडक्ट पता चल सके इसके लिए शहर में 400 से ज्यादा बोर्ड लगाए जा रहे हैं। साथ ही कमेटी के लोग भी अलग-अलग सर्कल में शादियों पर ध्यान देंगे कि वो सादगी से हो रही हैं या नहीं। ज्यादातर लोग इस बात के लिए तो मान ही गए हैं कि शादियों में शराब नहीं बहाई जाएगी। लेकिन, गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी कुछ ज्यादा ही कड़े मूड में दिख रही है। कमेटी का साफ कहना है कि जो, कोड ऑफ कंडक्ट नहीं मानेगा उसे गुरुद्वारे से शादी का प्रमाणपत्र नहीं दिया जाएगा।

वैसे गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का कहना है कि मोरल कोड ऑफ कंडक्ट कोई कानून नहीं है। ये सिर्फ सलाह है और गुरुद्वारा में तो, सादगी से शादी करनी ही होगी। बाहर वो जो चाहें कर सकते हैं। वैसे तो भारतीय शादियां भव्यता के लिए खूब जानी जाती हैं। यहां तक कि आर्थिक रुप से कमजोर भी अपने बेटे-बेटी की शादी में दिल खोलकर खर्च करते हैं। कई बार सचमुच पैसा पानी की तरह बहता दिखता है।

राजधानी दिल्ली में सबसे ज्यादा धूम पटाखे के साथ पंजाबियों की ही शादियां होती हैं। शादियों के सीजन में बड़े शहरों में हालात ये हो जाते हैं कि महीनों पहले बुकिंग न हो तो, शादी के लिए जगह मिलना भी मुश्किल हो जाता है। शादी के पूरे सीजन ज्यादातर शहरों में ट्रैफिक जाम का नजारा आम तौर पर देखने को मिल जाता है।
शादी के धूम धड़ाके में लोग अपनी शान के साथ दबंगई भी दिखाने की कोशिश करते हैं। शादियों में अनजाने में गोली लगने से हर साल कई शादियों में मातम छा जाता है। शादी खुशी का बड़ा मौका होती है लेकिन, खुशी के मौके को जिंदगी भर यादगार बनाने के लिए शराब बहाना, गोलियां चलाना, अनाप-शनाप पैसे खर्च करना तो कहीं से भी समझदारी नहीं है। ऐसे में गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ये सलाह सबको रास्ता दिखा सकती है।

Tuesday, September 11, 2007

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे! तीसरी कड़ी

भ्रष्टाचार जगह-जगह कितना संगठित तंत्र बन गया है। इसका अंदाजा आज मायावती सरकार के एक फैसले से हुआ। उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार ने 6504 सिपाहियों की भर्ती रद्द कर दी गई है। ये सभी भर्तियां मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में हुई थीं। इस भर्ती के दौरान रहे 12 IPS अफसरों को निलंबित कर दिया गया है। इन पर भर्ती में गड़बड़ी का आरोप है। इन अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी। निलंबित 12 आईपीएस अधिकारियों में 1 आईजी, 9 डीआईजी हैं। 2 एसपी रैंक के अधिकारी भी निलंबित हुए हैं। इसके अलावा 18 एएसपी और 40 डीएसपी रैंक के अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई है।

55 केंद्रों में से 14 पर हुई भर्ती की जांच के बाद मायावती सरकार ने ये फैसला लिया है। जांच में पाया गया है कि इन सिपाहियों की भर्ती में कॉपी सेंटर से बाहर लिखी गई। कई कॉपियों में नंबर काटकर फिर से बढ़ाए गए। जांच में ये भी सामने आया है कि इन सिपाहियों ने भर्ती के लिए दो से चार लाख रुपए दिए हैं। यानी उत्तर प्रदेश के लोगों की सुरक्षा के लिए भर्ती होने वाले इन सिपाहियों की शुरुआत ही रिश्वत के जरिए हुई। अब अगर ये दो से चार लाख देकर सिपाही बने हैं तो, जाहिर है इनका सबसे पहला काम यही रहा होगा कि कैसे रिश्वत के तौर पर दिए गए दो से चार लाख रुपए कैसे वापस लिया जाए। अब ये पैसा इमानदारी से तो आने से रहा। साफ है कि इसके लिए उस सिपाही ने अपराधियों को छोड़ा होगा। सही आदमी को पैसा लेकर फंसाया होगा।

इस फैसले से मायावती सरकार पर राजनीति का भी आरोप लग रहा है। क्योंकि, ये सारी भर्तियां मुलायम सिंह यादव के सत्ता में रहते हुई थीं। लेकिन, ये कोई छिपा तथ्य नहीं है कि सिपाहियों की भर्ती का पूरा जिम्मा मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने खुद संभाल रखा था। अनुमान के मुताबिक, कुल मिलाकर सिपाहियों की भर्ती में कम से कम 500 करोड़ की रिश्वत ली गई है। अब अगर मायावती ने राजनीति के तहत भी एक सही काम किया है तो, इसके लिए मायावती को बधाई दी जानी चाहिए। लेकिन, अब मायावती को ये भी ध्यान रखना होगा कि पांच साल में अगर उन्होंने कोई भ्रष्ट फैसले लिए तो, उसका क्या अंजाम होगा।

उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार का जो तंत्र इतने सालों तक फला-फूला है। उस पर मायावती अगर लगाम लगा पाती हैं तो, सचमुच मुलायम के शासन में बने नारे उत्तम प्रदेश को सही साबित कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश से ही एक और खबर है कि 15 साल पुराने फर्जी मुठभेड़ के मामले में 15 पुलिसवालों को अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। फर्जी मुठभेड़ एक ऐसा भ्रष्टाचार है जो, भ्रष्टाचार को और बढ़ाने में मदद करता है। और, भ्रष्टाचार करने वाला बहादुरी की तमगा भी पा जाता है।

अलग-अलग जगहों पर भ्रष्टाचार के तरीके भी अलग-अलग हैं। मुंबई में लोगों को जरूरी सुविधाएं देने का जिम्मा रखने वाली संस्था BMC अपनी ही तरह का भ्रष्टाचार कर रही है। मुंबई के वर्ली नाके में 5000 छात्रों की पढ़ाई की जगह पर मॉल बनाने की इजाजत BMC ने दे दी है। यानी शिक्षा के मंदिर की जगह, खरीदने बेचने का काम होगा।

वैसे मुंबई में इससे पहले स्लम रिहैबिलिएशन यानी झुग्गी झोपड़ी वालों को अच्छी जगह बसाने के नाम पर सरकार से मिलकर बिल्डर हजारों करोड़ रुपए का घोटाला कर चुके हैं। सरकार भी ये मानती है, जांच के लिए कमेटी भी बनी है। लेकिन, आज तक कुछ नहीं हुआ। हां, स्लम रिहैबिलिएशन के नाम पर मुंबई की बेशकीमती जमीन कौड़ियों के दाम पाने वाले बिल्डर करोड़पति बन चुके हैं। और, शहर में इतने सम्मानित हो चुके हैं कि टीवी चैनलों में रियल एस्टेट सेक्टर की हर खुशी-चिंता की बहस में अपने विचार देते दिखते हैं। इन बिल्डरों को आंख मूंदकर बेईमानी की इजाजत देने वाले अलग-अलग सरकारों के मंत्री, विधायक, सांसद भी लग्जरी कारों में घूमते हैं। और, हर बार मीडिया में झुग्गी-झोपड़ी घोटाले का मामला खुलने पर बेशर्मी से कार्रवाई की मांग करते हैं या आश्वासन देते रहते हैं।

टीवी चैनलों का स्टिंग ऑपरेशन भी भ्रष्टाचार का जरिया बन गया है। दिल्ली की स्कूल टीचर के खिलाफ एक नए-नए चैनल के फर्जी स्टिंग ऑपरेशन की खबर अभी पुरानी भी नहीं पड़ी है। आज एक और फर्जी स्टिंग का मामला सामने आया है। सांसदों को स्टिंग ऑपरेशन में फंसाने की धमकी दे रहे 3 लोगों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

भ्रष्टाचार हममें ऐसा रच बस गया है कि हमें पता ही नहीं चल पाता कि हम क्या-क्या कर गुजर रहे हैं । अलग-अलग किस्म भ्रष्टाचार के आरोपी लालू प्रसाद यादव के साले साधु और सुभाष यादव ने अनोखा भ्रष्टाचार किया है। संसद में और चुनाव आयोग में दर्ज जानकारी के मुताबिक, इन दोनों भाइयों की उम्र में सिर्फ महीने का अंतर है। जय हो। हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

Monday, September 10, 2007

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे! दूसरी कड़ी

आज ही सुबह मैंने महाराष्ट्र के डीजीपी पी एस पसरीचा और पंजाब के पूर्व डीजीपी एस एस विर्के के भ्रष्टाचार के किस्से लिखे। शाम को मैं टीवी चैनल देख रहा था तो, एक और राज्य बिहार के डीजीपी के भ्रष्ट आचरण का नमूना सामने आ गया। बिहार के डीजीपी जनता दरबार में फरियादियों से चरण स्पर्श कराकर उन्हें कार्रवाई का आशीर्वाद दे रहे थे। ये भ्रष्टाचार तो ऐसा फैल गया है कि इनके नमूना तो, कहीं से भी कोई भी उठा ले।
हैदराबाद से एक खबर आई कि फ्लाईओवर गिरने से कई लोगों की मौत हो गई। ये फ्लाईओवर अभी बना भी नहीं था। बन रहा था, बन चुका होता तो, न जाने कितने और लोगों को मौत के गाल में ले जाता। फ्लाईओवर कोई छोटा-मोटा ठेकेदार नहीं बना रहा था। ऐसे कामों के लिए कॉन्ट्रैक्ट लेने वाली बड़ी कंपनी गैमन इंडिया के पास इसका काम था।

हैदराबाद से ताजा खबर थी, इसलिए पूरे देश को दिख गया। लेकिन, मैं मुंबई में भ्रष्टाचार के नमूने रोज ही देख लेता हूं। मुबंई से उसके पड़ोसी शहर ठाणे जाने के रास्ते में तो, मुझे भ्रष्टाचार के नमूने ऐसे मिल जाते हैं, जैसे मधुमक्खी के किसी छत्ते से शहद टपक रही हो। मुंबई की सड़कों को दुरुस्त करने को लेकर मुंबई हाईकोर्ट BMC, MMRDA को बुरी तरह से लताड़ चुका है। बावजूद इसके अब तक इन बेशर्म संस्थाओं का भ्रष्टाचार से मोह नहीं छूट पा रहा है।

ठाणे की घोड़बंदर रोड पिछले एक साल से लगातार बन रही है। हाईकोर्ट की कई बार डांट खाने के बाद इसके एक बड़े हिस्से का काम काफी हद तक पूरा हो गया है। लेकिन, मुंबई से ठाणे जाते समय घोड़बंदर के लिए मुड़ते ही किसी भी गाड़ी में बैठे व्यक्ति की सारी हडि्डयां एक दूसरे के साथ मिलकर राग भैरवी गाने लगती हैं। मुंबई में सिर्फ गड्ढों में ही हर साल लाखों-करोड़ो रुपए चले जाते हैं लेकिन, BMC, MMRDA एक ऐसी सड़क नहीं बना पा रहे हैं जिसमें बनने के कुछ ही दिन बाद गड्ढे न हो जाएं। BMC का सालाना बजट 7000 करोड़ रुपए से ज्यादा का है, पता नहीं इसमें से कितना गड्ढों में चला जाता है। मुंबई में भ्रष्टाचार के नमूनों की ऐसी लंबी लिस्ट है।

भ्रष्टाचार है, देश के लोगों को इसमें मजा आ रहा है। हर राज्य में सड़कें बनाने की जिम्मा होता है, लोक निर्माण विभाग यानी PWD के पास। इस विभाग में काम करने वाले छोटे कर्मचारी से इंजीनियर, ठेकेदार सब अपने को खुशकिस्मत मानते हैं। यहां तक कि राज्यों में लोक निर्माण विभाग के मंत्री का पद भी राज्य के सबसे रुतबेदार विधायक को ही मिल पाता है। आपको लग रहा होगा कि जब पूरे राज्य को जोड़ने, सड़क-पुल बनाने का काम इसी विभाग के पास है तो, सबसे जिम्मेदार विधायक को ही ये काम मिलना ही चाहिए।
लेकिन, दरअसल किस्सा कुछ और ही होता है। कहने को तो ये विभाग लोक निर्माण के लिए है। लेकिन, ये विभाग मंत्री, इंजीनियर, ठेकेदार से राज्य के मुख्यमंत्री तक के निजी निर्माण में मददगार होता है।

मैं 2001 के महाकुंभ के दौरान इलाहाबाद में रिपोर्टिंग कर रहा था। इस दौरान मुझे जो जानकारी मिली वो ये कि इस कुंभ मेले में अपनी ड्यूटी लगवाने के लिए इंजीनियरों ने लाखों रुपए मंत्रीजी को चढ़ावे में दिए थे। महाकुंभ में करोड़ो रुपए का काम बिना हुए ही भुगतान कर दिया गया। इसका तरीका भी आसान था, ठेकेदार दो लाख के भुगतान के लिए एडवांस में नकद एक लाख पचीस हजार रुपए चढ़ावे में देता था। वो, मंत्री से लेकर बाबू तक बंट जाता था। बची पचहत्तर हजार की रकम ठेकेदार को बिना कुछ किए फायदे के तौर पर मिल जाती थी।

लोक निर्माण विभाग का मैं सिर्फ उदाहरण दे रहा हूं। हर विभाग में ऐसा ही होता है। कहा न भ्रष्टाचार मजा देने लगा है। हर विभाग में भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी को तेज-तर्रार लोगों में गिना जाता है। जो, भ्रष्टाचार में मददगार न हो उसे, कोई अपने साथ नहीं रखना-देखना चाहता। ऐसे लोग बेकार माने जाते हैं। पैसे लेकर काम करने वाला -मंत्री, सांसद, विधायक, सभासद, अधिकारी, दरोगा, सिपाही- सबको पसंद आता है। पैसे लेकर काम कराने वाला दलाल भी इज्जत की नजर से देखा जाता है। हम तो अब रिश्ते भी यही देखकर करते हैं कि भ्रष्टाचार में हमारा रिश्तेदार कितना आगे है। ये बात पूरी हनक के साथ दूसरों को बताते भी हैं। तो, भ्रष्ट समाज के सम्मान में जोर से बोलो- हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में NSUI के चारों प्रत्याशी जीत गए हैं। इन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों का भरोसा मिल गया है। अगले साल भर तक ये चारों दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के नेता रहेंगे। सीधे-सीधे देखने में इनका नेता बनना एक सामान्य प्रक्रिया लगती है। लेकिन, ये इतनी सामान्य प्रक्रिया है नहीं, जितनी दिख रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के उपाध्यक्ष बन गए हैं NSUI के देवराज तेहलान। देवराज तेहलान ने चुनाव के एक दिन पहले एक निजी चैनल के खुफिया कैमरे पर बोला था कि लाखों रुपए खर्च कर उन्हें टिकट मिला है और वो चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। लाखों रुपए खर्च कर सकते हैं। छात्रों को शराब बांट सकते हैं और जो, भी जरूरी होगा वो करेंगे।
दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने और कांग्रेस के आलाकमान ने तेहलान का ये इकबालिया बयान सुना होगा। लेकिन, न तो कांग्रेस ने तेहलान के खिलाफ कुछ किया और न ही छात्रों ने तेहलान को उपाध्यक्ष बनने से रोका। इसके बाद तो यही लगता है कि अब भ्रष्टाचार मुद्दा ही नहीं रह गया है, हमें भ्रष्ट होने में और भ्रष्टाचार करने में मजा आने लगा है।

जिस दिन टीवी चैनल पर तेहलान लाखों रुपए छात्रसंघ चुनाव पर खर्च करने का ऐलान कर रहे थे। उसी दिन एक और खबर थी। हरियाणा में कांग्रेस के एक सांसद सरकारी गेस्ट हाउस में दो महिलाओं के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़े गए। पकड़े जाने के बाद भी न तो कांग्रेस ने और न ही पुलिस ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की। और, कांग्रेसी सांसद महोदय की बेशर्मी ये कि वो अपने साथ पकड़ी गई महिलाओं में से एक को अपनी पुत्रवधू बता रहे थे। लेकिन, चैनलों पर जिस अवस्था में थे, उसे देखकर कोई भी साफ समझ सकता है कि इस तरह से कोई गेस्ट हाउस में अपनी बहू के साथ तो नहीं रह सकता है। भ्रष्टाचार सिर्फ नेता ही नहीं कर रहे हैं।

दूसरों के भ्रष्टाचार को उजागर करने का दावा करने वाले एक टीवी चैनल ने भी हद कर दी। नए-नए खुले चैनल लाइव इंडिया के एक टीवी जर्नलिस्ट प्रकाश सिंह ने अपनी एक जानने वाली नई नवेली पत्रकार रश्मि सिंह के साथ मिलकर दिल्ली की एक स्कूल टीचर के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन कर डाला। इस स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया गया था कि दिल्ली के स्कूल की एक टीचर उमा खुराना लड़कियों को वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करती थी। और, बड़े लोगों को लड़कियों की सप्लाई करती थी। इस स्टिंग ऑपरेशन के बाद दिल्ली में जमकर हंगामा हुआ था। लेकिन, बाद में पुलिस जांच में ये बात सामने आई कि सब रश्मि और प्रकाश की मिलीभगत थी। स्टिंग ऑपरेशन झूठा था। अब लाइव इंडिया बेशर्मी से कह रहा है कि हमारे पास कई लड़कियों ने उमा के खिलाफ शिकायत की थी। लेकिन, कोई भी लड़की कैमरे पर नहीं आना चाहती थी। इसलिए हमें इस तरह का ऑपरेशन करना पड़ा। लेकिन, कोई इन लाइव इंडिया से पूछे कि अगर लोगों को सच बताने के लिए सच खोजने का साहस और धैर्य नहीं था तो, क्यों आ गए पत्रकार बनने। बस जल्दी से टीआरपी बढ़ाने के लिए। हालांकि, अभी तक ये साफ नहीं हो पाया है कि उमा गलत धंधे में लगी थी या नहीं। लेकिन, महीने भर के बच्चा टीवी चैनल की ये हरकत आजकल के पागलपन वाले टीवी जर्नलिज्म की इंतहा दिखाती
भ्रष्टाचार में हमें कुछ ऐसे मजा आने लगा है कि हर रोज ऐसी खबर देखने को मिल जाती है। पंजाब के एक पूर्व डीजीपी एस एस विर्के को भ्रष्टाचार के एक मामले में गिरफ्तार किया गया है। विर्के पर आरोप है कि उन्होंने 100 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति जुटाई है। अब ये बिना भ्रष्ट हुए तो, जुटाई नहीं जा सकती।
वैसे ये तो, पूर्व डीजीपी थे। अभी कुछ महीने पहले ऐसा ही आरोप महाराष्ट्र के डीजीपी पी एस पसरीचा के ऊपर भी लगा था। एक टीवी चैनल की इस खोजबीन के बाद महाराष्ट्र विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ। गृहमंत्री आर आर पाटिल ने जांच और कार्रवाई का आश्वासन भी दिया। लेकिन, पसरीचा अभी भी महाराष्ट्र के डीजीपी हैं। सरकार ने एक कमेटी भी बना दी है।

कई मामलों में भ्रष्टाचार करने वालों को सजा भी हो रही है। लेकिन, ज्यादातर मामलों में ऐसी सजा कोर्ट के दखल के बाद ही मिल पाती है। लेकिन, हमें तो, भ्रष्टाचार में मजा आने लगा है। हम भ्रष्टाचार में मददगार बन रहे हैं। पहला मौका मिलते ही भ्रष्टाचार कर रहे हैं। भ्रष्टाचार का ये चक्र कुछ ऐसा घूम चुका है कि अब इन सबके बाद मैं तो इतना ही कहूंगा कि हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!

Monday, August 20, 2007

सेक्युलरिज्म नहीं देश बचाइए

तसलीमा की हत्या करके कोई भी कितने भी पैसे कमा सकता है। ये फतवा जारी किया है कोलकाता के एक मस्जिद के इमाम ने। मौलाना मानते हैं कि तसलीमा ने इस्लाम का अपमान किया है, जिसकी कीमत तसलीमा की जान से कम नहीं हो सकती। देश की धर्मनिरपेक्ष ताकतें तसलीमा के बचाव में भी खुलकर नहीं आ रही हैं। वैसे अगर एमएफ हुसैन की भारत माता या किसी देवी-देवता को गलत तरीके दिखाने वाली पेंटिंग पर किसी हिंदू संगठन ने कुछ कहा होता तो, अब तक देश की सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतें मिलकर हुसैन की तरफदारी में अभिव्यक्ति की आजादी के कसीदे पढ़ने लगतीं। वो, सिर्फ इसलिए हो पाता है क्योंकि, किसी उग्र हिंदू संगठन या लोगों का विरोध करके उन्हें भारत के उस धर्मनिरपेक्ष जमात में शामिल होने का मौका मिल जाता है जो, भारत में सेक्युलर नाम से बड़ा सम्मान पाती है।
आखिर क्या वजह है ऐसे ही मामले में तोगड़िया का विरोध करने वाले तसलीमा के खिलाफ फतवा जारी करने वाले मौलाना के खिलाफ कुछ न बोलकर अपनी बात कहने वाली तसलीमा के ही विरोधी हो जाते हैं। और, ये मौलाना कोलकाता की एक मस्जिद के हैं जिस राज्य पश्चिम बंगाल में पिछले तीस सालों से सेक्युलर लेफ्ट पार्टियों की सरकार है। वैसे सेक्युलरिज्म के नाम पर एक खास तरह का विद्वेष फैलाने का लेफ्ट पार्टियों का ये पहला उदाहरण नहीं है। इससे पहले तसलीमा के ही उपन्यास लज्जा को भारत में अकेली पश्चिम बंगाल सरकार ही थी, जिसने प्रतिबंधित कर दिया था। मामला सिर्फ इतना ही नहीं है। इससे कुछ दिन पहले ही हैदराबाद में मुस्लिम संगठन MIM के विधायकों ने तसलीमा के ऊपर हमला कर दिया था। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और सिर्फ सेक्युलरिज्म ही है जिसके नाम पर अल्पमत की कांग्रेस दूसरे सेक्युलर दलों के साथ मिलकर सरकार में आ जाती है। फिर कांग्रेस की सरकार तसलीमा के मामले में सेक्युलर क्यों नहीं रह पाई।

दरअसल देश में सेक्युलर ताकतों का यही असली चरित्र है। मुस्लिम कट्टरपंथियों के मामले में वो शांत रहकर ही सेक्युलर हो पाते हैं। काफी दबाव के बाद हैदराबाद पुलिस ने तसलीमा पर हमला करने वाले विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। लेकिन, सेक्युलरिज्म फिर हावी हो गया और तसलीमा के खिलाफ भी सरकार ने धार्मिक भावनाएं भड़काने और उसका अपमान करने का मामला दर्ज कर लिया। ऐसी ही सेक्युलर कारगुजारियों की वजह से तोगड़िया की बात सुनने वाले और उसे सुनकर कुछ करने वाले बढ़ते जाते हैं।

वैसे ये मामला सिर्फ आंध्र प्रदेश या पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में भी ऐसे कई वाकये हुए हैं जब, सरकार मुस्लिम समाज से जुड़े होने की वजह से आतंकवादियों या फिर बदमाशों पर कार्रवाई नहीं कर पाई। उत्तर प्रदेश में तो, एक मंत्री हाजी याकूब कुरैशी ने कथित तौर पर मोहम्मद साहब का गलत चित्र बनाने पर दानिश कार्टूनिस्ट के सिर पर 51 लाख रुपए का इनाम जारी कर दिया था। खुलेआम ऐलान के बाद भी कुरैशी के खिलाफ कुछ नहीं हो पाया। इससे पहले इलाहाबाद के फूलपुर में कुछ आतंकवादियों को पकड़ने के लिए जब पुलिस ने छापा मारा तो, पुलिस को लोगों की पत्थरबाजी का सामना करना पड़ा। इस पत्थरबाजी के पीछे इलाहाबाद के ही एक बड़े माफिया का हाथ था। लेकिन, पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। बाद में जब आतंकवादी पकड़ा गया तो, उसके तार अंडरवर्ल्ड और उग्रवादी संगठन सिमी से जुड़े निकले।

सरकारों का हाल ये है कि हैदराबाद में हमले के बाद 14 अगस्त को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तसलीमा का कार्यक्रम कैंसिल कर दिया गया। कुलपति प्रोफेसर आर जी हर्षे चाहते थे कि तसलीमा का कार्यक्रम हो लेकिन, राज्य सरकार से ये निर्देश मिला कि कानून व्यवस्था की मुश्किल हो सकती है। इसलिए ये कार्यक्रम निरस्त कर दिया जाए। तसलीमा के विचार सुनने का मौका इलाहाबाद के लोगों के हाथ से निकल गया। सवाल यही है कि क्या सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष होने के मायने यही है। क्या ऐसी घटनाएं हिंदू और मुस्लिम दोनों ओर कट्टरपंथियों की जमात बड़ी करने का मौका नहीं देती हैं। क्या किसी मौलाना या मुस्लिम मंत्री के फतवा जारी करने के बाद भी कोई कार्रवाई न करने से धर्मनिरपेक्षता बचेगी। मुझे तो यही लगता है कि अब जरूरत इस बात की है कि धर्मनिरपेक्षता शब्द और इससे जुड़ी जमात की बात खत्म हो। धर्मनिरपेक्ष होने की वकालत ही कट्टरता बढ़ा रही है। सभी धर्मों का आदर करने की बात ज्यादा अच्छे से समझ में आती है। और, कहीं भी कानून धर्म देखकर एक्शन में नहीं आना चाहिए।

वैसे अच्छी बात ये है कि तसलीमा का वीजा बढ़ गया है। बांग्लादेश से कट्टरपंथियों के हमले से बचने के लिए भागी तसलीमा तब से भारत में ही रह रही हैं। ये इस देश की सभी धर्मों और मानवता का आदर करने की सबसे बड़ी मिसाल है। लेकिन, बांग्लादेश में जिन कट्टरपंथियों से भागकर तसलीमा भारत आई हैं, वही भारत में तसलीमा पर हमला करने में सफल होते हैं तो, इससे देश को ही नुकसान होगा।

Monday, June 04, 2007

जनरल, ओबीसी, एससी/एसटी की फिर से पहचान हो

अब जातियां खत्म हो रही हैं। जातियों की बजाए आरक्षण की श्रेणी के आधार पर पहचान हो रही है। और, एक बात और उल्टी हो रही है। जातियां थीं तो, लोग ऊपर की जाति के बराबर होना चाहते थे। अब आरक्षण मिलने लगा तो, लोग नीचे की श्रेणी में आरक्षण चाहने लगे। नीचे जाने की लड़ाई ऐसी हो गई है कि राजस्थान में गुर्जर और मीना ने करीब 30 लोगों की शहादत दे दी। इन जातियों के नेता इसे शहादत बताकर औऱ जानें लेने-देने की तैयारी में जुटे हैं। एक दूसरे के गांव में राशन तक नहीं ले जाने दे रहे हैं। आखिर नीचे जाने की लड़ाई है तो कितना भी गिर सकते हैं। गुर्जर पहले से ही ओबीसी हैं लेकिन, उनका कहना है कि ओबीसी में जाटों के भी शामिल होने से उन्हें आरक्षण का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है। और, एसटी श्रेणी में होने की वजह से मीना जाति के लोगों का सामाजिक स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है।

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा माता अब तक कुछ नहीं कर सकी हैं। या यूं कहें कि कुछ करने की उनकी मंशा ही नहीं दिख रही। गुर्जरों के हंगामा शुरू करने के दो दिनों तक माता वसुंधरा ने प्रजा की सुध ही नहीं ली। और, दो-तीन बाद जागीं तो, सबसे पहले मीना जाति को इस बात के लिए जगाया कि गुर्जर एसटी में शामिल होकर तुम्हारा हक मारना चाहते हैं, उन्हें रोको। और, जब मीना जाति के लोग पूरी तरह से तैयार हो गए तो, वसुंधरा ने गुर्जर जाति के लोगों को बातचीत के लिए बुलाया। स्वाभाविक है, अब बात कहां से बन सकती है। वैसे राजस्थान में ये जो आग जल रही है इसकी आग सभी राजनीतिक दलों ने अपने चूल्हे में बचा कर रखी थी। कभी कोई हवा मारकर आग की आंच तेज कर देता है कभी दूसरा। फिलहाल इस बार इस आग कीं आच को तेज करने का काम खुद राज्य की महारानी वसुंधरा राजे ने किया है। 2003 के विधानसभा चुनाव में राजे ने हर रैली में गुर्जरों को भरोसा दिलाया कि वो चुनाव जीतते ही उन्हें ओबीसी से एसटी बना देंगी। लेकिन, चुनाव जीतने के बाद साफ कह दिया कि ये केंद्र का मसला है इसमें वो कुछ नहीं कर सकतीं।

एक नजर अगर राजस्थान के जातीय समीकरण पर डालें तो, ये साफ हो जाएगा कि ये आग इतनी ज्यादा क्यों भड़की। राज्य में गुर्जर करीब 6 प्रतिशत हैं, मीना करीब 13 प्रतिशत और जाट करीब 10 प्रतिशत। यानी वोट बैंक के लिहाज से तीनों जातियां ऐसी हैं कि इन्हें नाराज करके कोई तपते रेगिस्तान में सत्ता का पानी नहीं पीसकता। और, इसी सत्ता के लिए बीजेपी ने 1999 के लोकसभा चुनाव के पहले जाटों को ओबीसी श्रेणी का लाभ दे दिया। जाट ओबीसी श्रेणी पाने के लिए काफी समय से हिंसा पर उतारू थे। और, पहले से ही शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक तौर पर संपन्ना जाटों ने ओबीसी कोटे का 25 से 70 प्रतिशत तक लाभ लेना शुरू कर दिया। और, गुर्जरों को ये बात खटकने लगी। अब तक गुर्जर और मीना जातियों के लोगों में काफी सामंजस्य था। लेकिन, एसटी में शामिल मीना जाति के लोग पुलिस कॉन्सटेबल से लेकर आईपीएस/आईएएस की परीक्षा में जब बढ़ने लगे तो, बगल में अब तक मीना के साथ चाय-पानी करने वाले गुर्जरों को मीना के एसटी श्रेणी में होने से ही जलन होने लगी।

जबकि, अगर आरक्षण देने की बात की जाए तो, राजस्थान में मीना, गुर्जर या जाट तीनों में से कोई भी जाति आरक्षण की हकदार नहीं है। मीना और अब अपने लिए एसटी कोटा मांग रहे गुर्जर तो, एटी में शामिल किसी भी तरह से नहीं हो सकते। राजस्थान में ये दोनों जातियां बड़े गांवों में अच्छे घरों में संपन्न तरीके से रह रही हैं। इन जातियों में परिवार के एक-दो लोग नौकरी में हैं। राजस्थान में व्यापार में भी ये तीनों जातियां इतनी प्रभावी तो हैं ही कि इन्हें किसी भी तरह से एसटी (शेड्यूल्ड ट्राइबल) श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता। क्योंकि, इस श्रेणी में शामिल होने के लिए जरूरी शर्तों में से सबसे जरूरी ये है कि एसटी में शामिल होने वाली जाति का लोगों से संपर्क न जुड़ा हुआ हो। जीवन की सामान्य जरूरतें इनकी पूरी न हो पा रही हों। और, ऐसा कम से कम मीना और गुर्जरों के साथ तो नहीं है।

वैसे इन जातियों के आरक्षण ने राजस्थान में हमेशा से एक दूसरे विरोधी रहे ब्राह्मण और राजपूतों को भी साथ ला दिया है। लेकिन, राजनीतिक तौर पर अब न ये सुने जाते हैं और न ही ओबीसी, एससी/एसटी कोटे की असली हकदार जातियां गड़िया लोहार, बंजारा और नट। सच्चाई ये है कि राजस्थान में अगर किसी को आरक्षण अब मिलना चाहिए तो वो गड़िया लोहार, बंजारा और नट जातियां ही हैं। राजस्थान में विधानसभा के चुनाव साल भर से कुछ ज्यादा समय में ही होने वाले हैं। इसलिए राज्य में सत्ता सुख ले रही बीजेपी और केंद्र में सत्ता सुख ले रही कांग्रेस, दोनो में से कोई भी कड़े कदम नहीं उठाना चाह रहा। आज नहीं तो कल ये आंदोलन खत्म हो ही जाएगा।

लेकिन, राजस्थान में आरक्षण श्रेणी बदलने को लेकर शुरू हुए इस अनोखे आंदोलन देश में जनरल, ओबीसी, एससी/एसटी कोटे वाली जातियों के नए सिरे से वर्गीकरण की जरूरत तय कर दी है। अगर ऐसा नहीं होता है तो, अछूत से ब्राह्मण बनने की लड़ाई आजादी के साठ साल बाद अब बड़ी, पिछडी सभी जातियों के जल्दी से जल्दी अछूत बनने की लड़ाई में बदल जाएगी। और, ये सिर्फ राजस्थान में ही नहीं है। यूपी-बिहार जैसे राज्यों में भी यादव, कुर्मी जातियों को कब तक अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा जाएगा ये भी बड़ा सवाल है।

वरना किसी न किसी जाति का कोई नेता खुद के लिए आरक्षण की मांग करेगा और टीवी चैनल पर चिल्लाकर ये बयान देगा कि देश देखेगा कि कोई जाति किस तरह से देश के लिए कुरर्बान हो सकती है। इसी भ्रम में अब तक पचीस से ज्यादा गुर्जर जान गंवा चुके हैं। कुल मिलाकर जरूरत ये समझने की है कि देश की आजादी के समय दस सालों के लिए लागू हुआ आरक्षण कब तक अलग-अलग जातियों के लोगों की जान लेता रहेगा। शायद इसका एक मात्र तरीका यही है कि जातियों का आरक्षण खत्म करके सिर्फ आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाए और वो भी दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं।

Sunday, June 03, 2007

कोर्ट ने बताया कि अमिताभ किसान नहीं हैं!

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद की जिला अदालत ने एक बहुत बड़ा काम कर दिया। कोर्ट ने फैसला सुना दिया है कि अमिताभ किसान नहीं, अभिनेता हैं। अब तक ये बात किसी को पता नहीं थी, सभी इस पर बहस कर रहे थे कि अमिताभ किसान हैं या नहीं। ये बहस कुछ ऐसी थी कि सात साल बाद अब इसी बिना पर महाराष्ट्र सरकार अमिताभ से पुणे की 24 एकड़ जमीन वापस ले सकती है। ये वो जमीन है जिसे खरीदने के लिए अमिताभ को किसान होने का सुबूत देना जरूरी था।

अमिताभ ने ये जमीन तो, ली 2000 मे लेकिन, चूंकि बड़े आदमी हैं इसलिए 6 साल बाद 2006 में ये दस्तावेज पेश किए कि वो किसान हैं। अमिताभ रहने वाले उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के हैं। लेकिन, उनकी किसानी वाली जमीन है बाराबंकी में। और, वो भी 1980 से। लेकिन, 2000 में पुणे में जमीन खरीदने के बाद वो इस पर अपना हक साबित कर पाए 2006 में। वजह साफ है कि 2000 में अमिताभ के बड़े भाई मुलायम सिंह यादव की सरकार उत्तर प्रदेश में नहीं थी। 2006 में मुलायम ने अमिताभ के नाम बाराबंकी की जमीन के एक छोटे से टुकड़े का मालिकाना हक अमिताभ के नाम कर दिया। लेकिन, 1970 में ये जमीन खरीदने वाले पंजाब से आए एक सरदारजी को अमिताभ की निजी हैसियत का अंदाजा नहीं रहा और सरदारजी ने साफ कह दिया कि वो जमीन नहीं छोड़ेंगे चाहे जान देनी पड़ी।

खैर, सरदारजी को जान नहीं देनी पड़ी, फैजाबाद की जिला अदालत ने कह बाराबंकी के तत्कालीन डीएम की रिपोर्ट को ही सही ठहराया है जिसमें कहा गया है कि सहस्राब्दि के महानायक अमिताभ बच्चन को गलत तरीके से बाराबंकी में जमीन दी गई। अब इसी आधार पर महाराष्ट्र सरकार अमिताभ से पुणे की जमीन भी छीन सकती है कि वो किसान नहीं हैं। लेकिन, सवाल ये है कि महाराष्ट्र सरकार को क्या इसके लिए किसी कोर्ट के आदेश की जरूरत थी कि अमिताभ किसान नहीं हैं। सबसे ज्यादा टैक्स देने वाला अभिनेता किसानी कैसे कर सकता है ये जानने के लिए किस कोर्ट के आदेश की जरूरत थी।

अमिताभ के पिता हरिवंशराय बच्चन, जिनकी मधुशाला इतनी चर्चित हुई कि हर कोई जानता है कि वो कवि थे किसान नहीं यानी, पैतृक तरीके से भी अमिताभ के किसान होने का कोई सवाल ही नहीं। पिछले तीन दशकों से अमिताभ मुंबई की मायानगरी में राज कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश वो सिर्फ 1984 में एक साथ ज्यादा समय के लिए गए थे, जब उन्हें इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ना था। फिर ये भ्रम कहां से आ गया कि अमिताभ किसान हैं। इस पर बहस की जरूरत क्यों आई।

इस बात को बहस बनाने के लिए ही अमिताभ के खिलाफ मामला दर्ज होना चाहिए कि वो अपने को किसान साबित करना चाह रहे हैं। अमिताभ के किसान न होने का कोर्ट का फैसला जो, सबसे बड़ी बात साबित करता है कि आजादी के साठ साल से ज्यादा बीतने पर भी इस देश में सत्ता में रहने वाले लोकतंत्र का इस्तेमाल किसी भी तरह से अपने हक में कर सकते हैं। किसी की भी जमीन कोई भी अपने नाम करवा सकता है। फिर चाहे वो एक जाने-माने अभिनेता को किसान बनाने की ही बात क्यों न हो।

सच्चाई तो, ये है कि अगर कोर्ट कह भी देता कि अमिताभ किसान हैं तो, भी वो कभी बाराबंकी की जमीन पर अपना मालिकाना हक साबित करने के लिए नहीं जाते। लेकिन, पुणे की जमीन का मालिकाना हक छोड़ने का उन्हें मलाल ज्यादा हो सकता है। सत्ता के इस्तेमाल से दुनिया के जाने-माने अभिनेता को किसान बनाने की ये घटना देश में अवैध तरीके से जमीन हड़पने की पूरी तस्वीर साफ कर देती है। अक्सर ये खबर आती है कि बिल्डर-डेवलपर नई बसती जगह पर लोगों से उल्टे-सीधे तरीके से जमीन हथिया लेता है और वहां आलीशान इमारतें खड़ी कर दी जाती हैं। फिर, उस इमारत की बुलंदी के सामने जमीन के छोटे से टुकड़े के असली मालिक की आवाज दबकर रह जाती है।

बात यहां भी वही हुई है। फर्क सिर्फ इतना है कि बाराबंकी में जमीन के असली मालिक के हक की बजाए यहां सरकार को ही चूना लगाया गया। किसान अमिताभ को कम रेट पर जमीन दे दी गई क्योंकि, अभिनेता नहीं किसान हैं। लोकतंत्र में लोकसत्ता लोगों के ही हक मार रही है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...