Showing posts with label सोपान स्टेप. Show all posts
Showing posts with label सोपान स्टेप. Show all posts

Thursday, September 15, 2016

छोटे किसानों का बड़ा भला कर सकता है GST

GST को देश के सबसे बड़े आर्थिक सुधार के तौर पर देखा जा रहा है। करों में पारदर्शिता से कर घटने और ज्यादा कर वसूली का भी अनुमान है। लेकिन, एक बड़ा खतरा बार-बार बताया जा रहा है कि इससे महंगाई शुरुआती दौर में बढ़ सकती है और उससे भी बड़ी खतरनाक स्थिति ये बताई जा रही है कि इससे किसानों की मुश्किल बढ़ सकती है। उसके पीछे भारतीय किसान संघ तर्क दे रहा है कि किसान को हर तरफ से घाटा होगा। क्योंकि, किसान अपनी उपज के लिए कम कीमत हासिल कर पाएगा। जबकि, उसे बाजार में जरूरी चीजों के लिए ज्यादा कीमत देनी होगी। भारतीय किसान संघ के इस तर्क के पीछे तथ्य ये है कि अभी कृषि जिंस से बने खाद्य उत्पादों पर कम कर है। लेकिन, जीएसटी के बाद लगभग एक जैसा कर ही लगेगा और इसकी वजह से किसानों की मुश्किल बढ़ सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुषांगिक संगठन होने के नाते कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह भी भारतीय किसान संघ की बात को गंभीरता से ले रहे हैं। लेकिन, कृषि मंत्री का ये मानना है कि जीएसटी सभी के भले के लिए है। भारतीय किसान संघ ये भी चाहता है कि संसद के शीतकालीन सत्र में इस पर चर्चा हो और अगर सरकार ये कर सके तो सरकार एक पंथ दो काज कर सकती है। इस चर्चा से सरकार राज्यों को और देश के लोगों को दरअसल जीएसटी के बहाने होने वाली सहूलियत से राष्ट्रीय कृषि बाजार की बात भी ठीक से कर सकती है। राष्ट्रीय कृषि बाजार ही वो योजना है, जिसके भरोसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों की आमदनी दोगुना करने का दावा करते दिखते हैं। लेकिन, ये भी एक कड़वी सच्चाई है कि राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना के राह की सबसे बड़ी बाधा दो राज्यों के बीच करों को लेकर होने वाली उलझन है। इसीलिए अगर सरकार जल्दी से जल्दी जीएसटी लागू कर सके, तो इसी बहाने राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना भी उतनी ही तेजी से लागू कर सकेगी।


गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स के लागू होने से किसी भी तरह के उत्पाद पर कर के ऊपर कर लगने की अभी तक चली आ रही परंपरा खत्म होगी। इससे कर लगने में होने वाली पारदर्शिता से खेती-किसानी का बड़ा भला हो सकता है। खासकर अगर जीएसटी के साथ-साथ राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना भी लागू हो सके। दोनों को लागू करने में सबसे बड़ी मुश्किल राज्यों के बीच के सम्बंध, केंद्र और राज्य के सम्बंध और उससे भी आगे आसानी शब्दों में कहें, तो सम्वैधानिक संघीय ढांचे की उलझन है। अब अच्छी बात ये है कि सैद्धांतिक तौर पर संसद ने इसे कानून बनाने के लिए आगे बढ़ा दिया है। अब राज्यों में इसे मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। अच्छी बात ये है कि असम ने इसकी शुरुआत कर दी है और तेजी से दूसरे राज्य भी इसे अपनी विधानसभा में मंजूर करते दिख रहे हैं। यहीं से किसानों के भले वाली राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना का भी आसानी से लागू होना दिखने लगेगा। दरअसल जब केंद्र सरकार बार-बार ये कह रही है कि राष्ट्रीय कृषि बाजार का सीधा सा उद्देश्य देश के हर किसान को देशभर का बाजार एक साथ देना है। इसमें भी समझने की बात ये है कि छोटे किसान को राष्ट्रीय कृषि बाजार की ज्यादा जरूरत है। क्योंकि, बड़ा किसान तो पहले से ही देश के हर बाजार तक पारंपरिक तरीकों से पहुंच बनाए हुए है। लेकिन, छोटे किसान की पहुंच अपनी नजदीकी मंडी तक भी बमुश्किल हो पाती है। इसीलिए राष्ट्रीय कृषि बाजार के जीएसटी के साथ-साथ लागू होने से छोटे किसान का बड़ा होता दिख रहा है। किसानों को या खती से जुड़े उत्पादों का कारोबार करने वालों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल चुंगी, एंट्री-एग्जिट टैक्स, मंडी टैक्स हैं। और, जीएसटी इन सभी करों को खत्म करेगा। खेती के उत्पाद के खेती उद्योग में पहुंचने तक चूंकि वैल्यू एडेड टैक्स ही देना होगा। इससे कर के ऊपर कर वाली स्थिति भी नहीं बनेगी। और, खाद्य उत्पादों के मामले में ये बहुत जरूरी है। इसके लाभ लंबे समय में महंगाई की असल स्थिति पता लगाने में दिखेंगे। किसी भी अनाज, खाद्य सामग्री के किसान के खेत से मंडी तक पहुंचने तक किस तरह का कितना कर लगा और उससे उस अनाज या खाद्य सामग्री का भाव कितना हुआ, ये भी पारदर्शी तरीके से पता चलेगा। खेत से मंडी तक की मुनाफाखोरी का पता भी सरकार ज्यादा आसानी से कर सकेगी। इससे किसान से सही कीमत पर खरीदने और ग्राहक को भी सही कीमत पर बेचने की व्यवस्था भी बनाई जा सकेगी। जीएसटी लागू होने से कृषि क्षेत्र को कई फायदे होंगे और उसमें सबसे बड़ा फायदा यही है कि देश भर में अलग-अलग करों का एक हो जाना देश में एक राष्ट्रीय कृषि बाजार का निर्माण करेगा। इससे देश भर में एक राज्य से दूसरे राज्य में कृषि उत्पाद आसानी से आ जा सकेंगे। चेक पोस्ट, बैरियर जैसी व्यवस्था खत्म होगी। राज्यों के बिना किसी बाधा के कृषि उत्पादों के परिवहन से कृषि बाजार में निजी क्षेत्रों की रुचि बढ़ेगी। इससे आधुनिक गोदाम सुविधा से लेकर आधुनिक बाजार के लागू होने में तेजी आएगी। जीएसटी और राष्ट्रीय कृषि बाजार का साझा मंच किसानों के लिए गजब फायदे का साबित हो सकता है। उसकी वजह है कि कृषि और उससे सम्बंधित उत्पादों के ही सबसे तेजी से खराब होने का खतरा होता है और अभी तक का अनुभव, शोध ये साफ बताता है कि भारत में तरह-तरह के करों और एक मंडी से दूसरी मंडी के बीच की बाधाओं की वजह से फल, सब्जियां और दूसरे अनाज खराब होकर देश के सकल घरेलू उत्पाद का सीधे तौर पर नुकसान करते हैं। इससे राज्यों के बीच खेती के उत्पादों का कारोबार भी बेहतर होने की उम्मीद है। कुल मिलाकर राष्ट्रीय कृषि बाजार के साथ जीएसटी का मंजूर होना देश के किसानों की आमदनी दोगुना करने के लक्ष्य को पूरा करने का साधन बनता दिख रहा है।  

Thursday, August 11, 2016

सरकारी योजनाएं बेहतर करेंगी मजदूरों का जीवन?

महात्मा गांधी ने देश में फैली असमानता पर अपने जीवन के आखिरी दिनों में जो कुछ लिखा। उसी में से कुछ पंक्तियां हैं कि मैं तुम्हें एक ताबीज देता हूं। जब तुम्हें भ्रम होने लगे। तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो, इस आजमाकर देखो। उस आदमी या औरत का चेहरा याद करो। जो तुम्हें अब तक सबसे कमजोर, गरीब दिखा हो। और सोचो कि जो तुम करने जा रहे हो, उससे उसका क्या कुछ भला हो सकेगा। महात्मा गांधी ने ये पंक्तियां कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति को ध्यान में रखकर लिखी होंगी। देश की सामाजिक असमानता को ध्यान में रखकर लिखी होंगी। लेकिन, आज के संदर्भ में ये पंक्तियां असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर एकदम सटीक बैठती हैं। और मुझे लगता है कि ये ताबीज देश की सरकार को भी इस्तेमाल करनी चाहिए। देश में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लेकर ढेर सारी रिपोर्ट अब तक आ चुकी हैं। इससे इतना तो पता लगता है कि दरअसल देश की जीडीपी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के ही बूते चल रही है। लेकिन, शायद ही आजाद भारत में कोई सरकार आई हो जिसने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की दशा सुधारने के लिए कोई ऐसा कदम उठाया हो जिससे उनके जीवनस्तर में सकारात्मक बदलाव हो सके। मनरेगा जैसी योजनाएं असंगठित क्षेत्र के ग्रामीण मजदूरों के जीवन में एक तय मजदूरी को सुनिश्चित करने के लिए आईं। लेकिन, इससे कितने ग्रामीण मजदूरों के जीवनस्तर में बेहतरी हुई, इस पर बहुतायत विवाद है। बल्कि, ज्यादातर मामलों में ये राजनीतिक बढ़त का एक बेहतर जरिया भर ही साबित हुई है। इसीलिए बार-बार ये सवाल खड़ा होता है कि क्या किसी सरकार को असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए कोई योजना बनाते समय महात्मा गांधी का वो ताबीज ध्यान में रहता है या नहीं। ये समझना इसलिए जरूरी है कि भारत में रोजगार की चुनौतियों पर 2004 बनी डॉक्टर अर्जुन के सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट कहती है कि देश में 2017 तक 55 करोड़ से ज्यादा बेरोजगार होंगे। अगर देश 9 प्रतिशत की रफ्तार से भी तरक्की करता है, तो देश में कुल रोजगार के मौके 49 करोड़ से भी कम होंगे। और इसमें से भी करीब 92 प्रतिशत यानी 50 करोड़ मजदूर असंगठित क्षेत्र में होंगे। अब अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट 2009 में आई थी इसलिए 9 प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार का अनुमान लगाया गया था। जो अब साढ़े सात से आठ प्रतिशत के बीच ही दिख रही है। इससे लोगों को रोजगार मिलने का आंकड़ा भले बदल जाएगा लेकिन, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की हिस्सेदारी नब्बे प्रतिशत से ज्यादा ही रहने वाली है। और इनकी सबसे बड़ी तीन समस्याएं हैं जिससे छुटकारा मिलने का रास्ता बमुश्किल ही दिख रहा है।






पहली असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए फिलहाल कोई तय रकम नहीं है। बेहद कम रकम इन मजदूरों को मिल रही है और ज्यादातर उसका मिलना भी तय नहीं होता। न तो इन मजदूरों की छुट्टी पक्की होती है और न ही ज्यादातर नियोक्ता उनको काम के तय घंटे से ज्यादा काम करने पर अतिरिक्त मजदूरी देते हैं। दूसरी बड़ी समस्या है असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सुरक्षा की। ज्यादातर असंगठित क्षेत्र के मजदूर निर्माण के काम में लगे हुए हैं और किसी भी क्षेत्र में ऐसे मजदूरों की सुरक्षा का कोई पक्का बंदोबस्त नहीं दिखता है। तीसरी सबसे बड़ी मुश्किल असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की खराब होती स्वास्थ्य समस्या की है। कठिन हालात में मजदूरी की वजह से ज्यादातर मजदूरों का स्वास्थ्य हर बीतते दिन के साथ खराब होता जाता है।

सवाल ये है कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की इन तीन सबसे बड़ी परेशानी को लेकर अभी की सरकार ने क्या कुछ किया है। इस लिहाज से बेहतर मजदूरी दिलाने को लेकर अभी बहुत ठोस कदम फिलहाल तो नहीं दिखता है। लेकिन, सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर इस सरकार ने संजीदगी दिखाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को ध्यान में रखकर बनाई गई कई योजनाएं जीवनस्तर में बेहतरी में कुछ मदद तो करती दिख रही हैं। पेंशन तो अब धीरे-धीरे सभी क्षेत्रों में खत्म हो रही है। लेकिन, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि इतनी कम और अनियमित कमाई में कैसे एक उम्र के बाद गुजारा हो पाएगा। इस लिहाज से अटल पेंशन योजना एक बेहतर पहल दिखती है। एक हजार रुपये से पांच हजार रुपये महीने तक की पेंशन के लिए कोई भी इसमें शामिल हो सकता है। बस उम्र 18 से 40 साल के बीच होनी चाहिए। 1000 रुपये महीने की पेंशन हासिल करने के लिए 18 साल के नौजवान को 40 साल तक 42 रुपये हर महीने और 40 साल के व्यक्ति को 291 रुपये हर महीने जमा करना होगा। प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना भी असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों के लिए बेहद उपयोगी है। इसमें दुर्घटना में मृत्यु और अपाहिज होने पर 2 लाख रुपये तक मिल सकते हैं। सिर्फ 12 रुपये सालाना प्रीमियम पर सरकार ने ये बीमा योजना शुरू की है। इसके लिए किसी बैंक में खाता होना जरूरी है। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना भी इसी तरह की योजना है। इसमें भी दो लाख रुपये तक दुर्घटना बीमा राशि मिलती है। इसके लिए 330 रुपये सालाना का प्रीमियम जमा करना होता है। 18 से 70 साल का कोई भी व्यक्ति बैंक में बचत खाते के जरिए इस योजना का लाभ ले सकता है।

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक सबसे बड़ी मुश्किल होती है कि बीमारी के समय उनके पास इलाज के लिए रकम ही नहीं होती है। इसके लिए सरकारी बीमा कंपनियों की स्वास्थ्य बीमा योजजना अस्पताल में होने वाले खर्च का बोझ कम करने में मददगार हो सकती है। इसमें 700-800 रुपये सालाना के प्रीमियम पर 50 हजार रुपये तक का हेल्थ कवर लिया जा सकता है। अब ये योजनाएं महात्मा गांधी की ताबीज के जैसा असर करेंगी या नहीं, इसका अंदाजा तो कुछ समय बाद मिलेगा। वैसे सरकार के स्तर पर असंगठित मजदूरों के जीवनस्तर में बेहतरी सिर्फ इन योजनाओं से ही नहीं होने वाली। इसके लिए जरूरी है कि सरकार सलीके से श्रम सुधारों को लागू करे और महंगाई के लिहाज से किसी जगह काम करने वाले मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन दिलाने का बंदोबस्त करे। क्योंकि, ऐसे तो उद्योग असंगठित मजदूरों को अच्छा जीवन जीने लायक वेतन देने से रहा। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को ज्यादा रकम देने में उद्योग भले ही आगे आने में संकोच करे लेकिन, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की कमाई पर देश के हर उद्योग की तगड़ी नजर है। अब अगर सरकार की तरह निजी क्षेत्र और असंगठित मजदूरों से काम लेने वाले लोगों को भी अगर महात्मा गांधी की ये ताबीज याद रहे, तो इन मजदूरों का जीवन काफी बेहतर हो सकता है।
(ये लेख सोपान स्टेप पत्रिका में छपा है।)

Friday, July 01, 2016

साहेब महंगाई अर्थव्यवस्था की हर अच्छाई खाए जा रही है

इस सरकार ने दाल की महंगाई रोकने के लिए जितना कुछ किया है। इतना इससे पहले किसी सरकार ने नहीं किया है। लेकिन, इसका दूसरा तथ्य ये भी है कि इस सरकार की सारी कोशिशों के बावजूद दाल जिस भाव पर जनता को खरीदनी पड़ रही है। उस भाव पर इतने लंबे समय तक किसी सरकार के समय में नहीं खरीदनी पड़ी। सरकार बार-बार ये बता रही है कि दाल की कीमतों पर काबू के लिए कितना कुछ किया जा रहा है। दाल का भंडार पहले डेढ़ लाख टन का किया गया। अब सरकारी दाल भंडार आठ लाख टन का किया जा रहा है। राज्यों को बार-बार इस बात की ताकीद की जा रही है कि एक सौ बीस रुपये किलो ऊपर के भाव पर दाल को न बिकने दें। हर कुछ दिनों में सरकार बताती है कि कितनी दाल आयात की जा रही है। लेकिन, इस सबके बावजूद दिल्ली की संसद के नजदीक के केंद्रीय भंडार तक में दाल एक सौ चालीस रुपये के नीचे बमुश्किल ही मिल पा रही है। इसी बीच टमाटर और आलू के भाव भी अचानक मंडी में मजबूती से सरकार की नाकामयाबी को बताने लगे। और सबसे बड़ी बात ये हुई कि देश के रिजर्व बैंक गवर्नर ने ये कहते हुए ब्याज दरें घटाने से इनकार कर दिया कि महंगाई दर फिर से बढ़ना शुरू हो गई है। हालांकि, रिजर्व बैंक ने अपने उस अनुमान में ये नहीं बताया कि लगातार सत्रह महीने महंगाई दर घटने के बाद अप्रैल का महीना है जब महंगाई दर फिर से बढ़ने लगी है। अब सवाल ये है कि अगर नजदीक की मंडी से लेकर रिजर्व बैंक गवर्नर के पूर्वानुमान तक में महंगाई डायन की तरह मुंह बाए खड़ी दिख रही है, तो क्या अर्थव्यवस्था में अच्छी खबरें होने की बात की जा सकती है।   

दरअसल रेपो रेट न घटाने के रिजर्व बैंक गवर्नर के तर्क ने देश में ये संदेश मजबूत किया है कि महंगाई फिलहाल बढ़ती ही जा रही है और इस लिहाज से देश के लोगों के लिए अच्छे दिन जल्दी आने वाले नहीं हैं। और दरअसल सच भी यही है कि देश के लोगों के जेब में सीधे आई कमाई और उनकी जेब से निकलकर खर्च हो गई रकम ही सबसे बड़ा पैमाना होता है कि उनके अच्छे दिए आए या नहीं। इस लिहाज से जनता को अच्छे दिन का अहसास कतई नहीं हो रहा है। लेकिन, जैसे किसी व्यक्ति की एक बुराई के लिहाज से उसको सिर्फ बुरा नहीं कहा जा सकता। वैसे ही इस समय देश की बढ़ती महंगाई के लिहाज से पूरी अर्थव्यवस्था को बुरा कहना ठीक नहीं होगा। जब दाल, टमाटर, आलू की महंगाई पर मीडिया सुर्ख है। उसी समय ये भी खबर आई है कि देश का चालू खाते का घाटा जनवरी-मार्च में घटकर सिर्फ करोड़ डॉलर रह गया है। चालू खाते का घाटा मतलब आयात-निर्यात का संतुलन। और घाटा घटने का मतलब हुआ कि आयात-निर्यात का संतुलन बेहतर हुआ है। हालांकि, आयात-निर्यात दोनों ही घटा है। मार्च 2016 को खत्म वित्तीय वर्ष में चालू खाते का घाटा जीडीपी का कुल एक दशमलव एक प्रतिशत रह गया है। जबकि, पिछले वित्तीय वर्ष में घाटा एक दशमलव आठ प्रतिशत था। इसका सीधा मतलब ये हुआ कि कुल जीडीपी का करीब एक प्रतिशत सरकार को पिछले वित्तीय वर्ष में विदेशों से आयात करने में कम खर्चना पड़ा है। इससे भी रुपये कीमत को स्थिरता मिली है। हालांकि, सरकार के लिए ये सावधानी बरतने की चेतावनी देने वाले आंकड़े हैं। क्योंकि, चालू खाते के घाटे की बड़ी वजह कच्चे तेल और दूसरी कमोडिटीज की दुनिया में गिरती कीमतें हैं। लेकिन, ये अर्थव्यवस्था के अच्छे दिनों की बेहतर खबर है। अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन की खबर आम आदमी के अच्छे दिन की खबर से कैसे जुड़ी है। इसे समझने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष के इंडिया मिशन चीफ पॉल कशिन की बात सुननी चाहिए। पॉल कह रहे हैं कि इस समय भारत की स्थिति काफी अच्छी दिख रही है। निश्चित तौर पर इस अच्छी स्थिति की बड़ी वजह कच्चे तेल की कम कीमतें हैं। इससे सभी भारतीय की असल आमदनी बढ़ी है। आईएमएफ ने 2015-16 के लिए 7.3 प्रतिशत और 2016-17 के लिए तरक्की की रफ्तार साढ़े सात प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। तरक्की की इस रफ्तार की बुनियाद पक्की दिखती है। अर्थव्यवस्था में कारों की बिक्री भी एक बड़ा संकेत होता है कि लोगों के पास रकम है या नहीं। अप्रैल महीने में कारों की बिक्री ग्यारह प्रतिशत बढ़ी है। अप्रैल के आंकड़े इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि ये इस वित्तीय वर्ष का पहला महीना है। जिस तरह से मॉनसून बेहतर होने का अनुमान है। इससे ग्रामीण क्षेत्र में भी ट्रैक्टर, मशीनरी की बिक्री बढ़ेगी। कारों की बिक्री बेहतर होने से कार कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों की बेहतरी की खबरें आ रही हैं। दुनिया की ज्यादातर कार बनाने वाली कंपनियां भारत के बाजार को ध्यान में रखकर नीति बना रही हैं। भारत में उत्पादन यूनिट लगाने से कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों का कारोबार बहतर हुआ है। रेटिंग एजेंसी इकरा का अनुमान है कि कार के पुर्जे बनाने वाली कंपनियों की तरक्की इस साल करीब दस प्रतिशत की होगी। और ये तरक्की की रफ्तार ज्यादातर क्षेत्रों में होती दिख रही है। सरकार के उदारीकरण के नए फैसले इसे और गति देंगे। नए शहर बनाने से लेकर बुनियादी सुविधाओं में सरकार का तेजी से बढ़ता खर्च अर्थव्यवस्था की तेजी में मदद कर रहा है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर सरकार के ताजा फैसले की कड़ी समीक्षा की जा सकती है। और सबसे बड़ी आलोचना ये तो है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी जब 2013 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए इससे बहुत कम उदारता के खिलाफ थी, तो क्या हो गया कि 2016 में वो पूरे दरवाजे खोल रही है और प्रधानमंत्री ये सीना ठोंककर कह रहे हैं कि हम दुनिया की सबसे खुली अर्थव्यवस्था हैं। उदारवादी नीतियां कितनी ठीक हैं या नहीं। ये दूसरी बहस है लेकिन, इतना तो तय है कि किसी भी देश की आर्थिक नीतियां एक समय में अगर एक दिशा में ही जाएंगी, तो ही आगे बढ़ सकती हैं। उदाहरण के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की 2004-2009 की सरकार के फैसलों में शायद ही कोई ऐसा फैसला खोजा जा सके, जिसे बताकर कहा जा सके कि इससे देश की तरक्की रुक गई। हालांकि, 2009 के चुनावों के पहले साठ हजार करोड़ रुपये की किसानों की कर्ज माफी पूरी तरह से सोनिया की अपनी वोटबैंक की राजनीति थी। और माना जाता है कि कर्ज माफी और मनरेगा दोनों ही सही लोगों के फायदे की वजह नहीं बन सके और इससे सरकार की नीतियों के दो दिशा में चलने का भ्रम भी पैदा हुआ। यहां तक कि जिस आधुनिक आर्थिक नीति पर इंडिया दुनिया के अगुवा देशों में खड़ा दिख रहा है। वो पूरी की पूरी नरसिंहा राव के दुनिया के लिए बाजार खोलने की नीति की बुनियाद पर ही बनी थी। कम से कम इस लिहाज से देखें, तो 1991 के बाद 2016 इंडियन इकोनॉमिक पॉलिसी में बदलाव की एक बड़ी तारीख के तौर पर याद किया जाएगा। जाहिर है इससे दुनिया के निवेशक भारतीय वीसा के लिए आवेदन करने में देरी नहीं लगाएंगे। कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था के लिहाज से ढेर सारी ऐसी खबरें हैं जो, भारत की उस प्रतिष्ठा को मजबूत करती हैं। जिसमें दुनिया अर्थव्यवस्था ठीक रखने के लिए चमकते भारत की तरफ देख रही हैं।

लेकिन, ये नरेंद्र मोदी सरकार को ये बहुत अच्छे से समझना होगा कि जनता के लिए अच्छे दिन का सिर्फ और सिर्फ एक पैमाना है कि सरकार की नीतियों से उसकी जेब में कितनी ज्यादा रकम आई और जब वो घर का खर्च चला रहा है, तो कितनी रकम उसकी जेब से गई। और भले ही महंगाई के बढ़ने की दर मनमोहन सरकार के करीब दस प्रतिशत से मोदी सरकार में करीब पांच प्रतिशत ही हो। लेकिन, महंगाई दर के बढ़ने के संकेत जनता को अच्छे दिन का अहसास कतई नहीं दे रहे हैं। डेढ़ सौ रुपये किलो की दाल तरक्की की रफ्तार और दूसरे अर्थव्यवस्था के अच्छे आंकड़ों को बिना डकारे हजम कर रही है। साहेब समझिए कि महंगाई अर्थव्यवस्था की सारी अच्छी खबरों को खाए जा रही है। अच्छा है कि बारिश अच्छी होने के संकेत हैं। लेकिन, खेत से बाजार तक की व्यवस्था में बुनियादी बदलाव नहीं हुआ तो अच्छे दिन सिर्फ जुमला ही रह जाएगा।  
(ये लेख सोपान स्टेप पत्रिका के ताजा अंक में छपा है)

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...