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Monday, July 04, 2016

नजरिया सुधारिये सरकार, सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह, पेंशन बोझ नहीं है

NDTV India पर #7thPayCommission पर मेरे विचार देख-सुन सकते हैं। सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट को सरकार ने मंजूर कर लिया है। मैं इस बात पर कतई बहस नहीं कर रहा कि वेतन कितना बढ़ा या और बढ़ना चाहिए था, क्या? मैं दूसरी बात कर रहा हूं या कहूं कि एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा हूं। वो बड़ा सवाल हर दस साल पर होने सरकारी कर्मचारियों की वेतन वृद्धि पर सरकार और मीडिया के नजरिये का है। करीब 70 साल के आजाद देश में 2016 में सातवां वेतन आयोग आया है। अब आप सोचिए जिस देश में निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी हर साल मार्च के खत्म होते-होते अपनी तनख्वाह में बढ़त की उम्मीद लगा लेते हैं। वहीं सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह और सरकारी कर्मचारी रहे पेंशनधारियों को इसके लिए बाकायदा एक दशक तक का इंतजार करना पड़ता है। एक वेतन आयोग जैसी समिति इसके लिए बाकायदा सरकार बनाती है और जो अपनी रिपोर्ट देने में करीब-करीब 2 साल लगा देती है। फिर रिपोर्ट आती है, तो सरकार तुरंत अपने खजाने को ऐसे देखने लगती है, जैसे दान में कुछ देना हो। जबकि, सच्चाई यही है कि जैसे किसी कंपनी के आगे बढ़ने में उसमें काम करने वाले मानव संसाधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, वैसे ही देश के आगे बढ़ने में या सरकार के बेहतर तरीके से काम करने सरकारी कर्मचारियों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फिर उस महत्वपूर्ण भूमिका को निभाने वाले सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह या सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन सरकारी खजाने पर बोझ जैसी क्यों दिखने लगती है। मुझे लगता है कि ये इनका सीधा सा हक है।


बेहतर हो कि मोदी सरकार जिस अप्रेजल सिस्टम की बात कर रही है, उसे लागू कर दे। सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही तय हो। साथ ही सरकारी कर्मचारियों को उनका पूरा हक मिले। बिना ये अहसास दिलाए कि खजाने पर उनकी तनख्वाह या पेंशन बढ़ने से कितना बोझ बढ़ रहा है। क्योंकि, उन सरकारी कर्मचारियों के काम का देश की जीडीपी यानी तरक्की की रफ्तार बढ़ने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। सरकारी कर्मचारियों को सिर्फ कामचोर या भ्रष्टाचारी नजरिये से देखना देश को बंद करना होगा। एक और खतरनाक संकेत हैं कि इस जवान देश में धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बन रही है कि नौजवान सरकारी नौकरी में बड़ी तेजी से घटता जा रहा है। इसका अंदाजा इस आंकड़े से लग जाता है कि करीब 47 लाख सरकारी कर्मचारी हैं और करीब 56 लाख पेंशन लेने वाले हैं। भारत जैसे देश के लिए ये खतरनाक है। क्या सरकारी नौकरी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। क्या सरकार सिर्फ सरकार चलाएगी, नीति बनाएगा, कर वसूलेगी। ये बड़ा सवाल है, क्योंकि, हिंदुस्तान में ज्यादातर निजी कंपनियों की बुनियाद के पीछे उस क्षेत्र में बड़े अच्छे से काम कर रही सरकारी कंपनियां हैं। इसलिए सरकार को इस बड़े सवाल का जवाब खोजना चाहिए। 

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