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Wednesday, February 01, 2017

सड़क, रेल, घर, कपड़ा और आसान कर्ज से मिलेगा रोजगार

इस सरकार की सबसे बड़ी आलोचना इस बात को लेकर होती है कि नई नौकरियां, नए मौके बनते नहीं दिखे या फिर उम्मीद से कम दिखे। इसी बात को बजट पेश होने के ठीक एक दिन पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कहा। राहुंल गांधी ने नौकरियों के मामले में सरकार को पूरी तरह से फेल बताया। खासकर विमुद्रीकरण के बाद ये आलोचना और बढ़ गई कि सरकार ने तरक्की की अच्छी खासी चल रही गाड़ी के सामने रोड़ा लगा दिया और अब तो नया रोजगार मिलना और कम हो जाएगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस धारणा को ही ध्वस्त करने की कोशिश की है। वित्त मंत्री के पूरे भाषण में 11 बार जॉब यानी नौकरियों का जिक्र आया है। हालांकि, सरकार को बहुत अच्छे से पता है कि आज के समय में तरक्की की रफ्तार बढ़ने भर से नौकरियां बहुत नहीं बढ़ने वालीं। इसीलिए सरकार का स्किल इंडिया पर खास जोर है। वित्त मंत्री के बजट भाषण में 16 बार स्किल शब्द का जिक्र आया है। सरकार एकदम साफ है कि नए मौके लाने के लिए किधर ध्यान देना है। और सरकार उस तरफ खास ध्यान देती दिखी है। 21.47 लाख करोड़ रुपये के इस साल के बजट में 3.96 लाख करोड़ रुपये इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च के लिए रखा गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नई मेट्रो रेल नीति जल्दी ही घोषित करने की बात बजट में की है। साथ ही कहा गया है कि इससे ढेर सारे नए रोजगार के मौके बनेंगे।

वित्तमंत्री ने बजट में रोजगार का जिक्र करते हुए बताया कि भारत इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की कोशिश सरकार कर रही है। इसकी सफलता के बारे में उन्होंने कहाकि पिछले 2 साल में 1.26 लाख करोड़ रुपये की योजनाएं शुरू हुई हैं। इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग में सरकार को नए मौके बनने की उम्मीद दिखती है। वित्त मंत्री ने ट्रांसपोर्ट सेक्टर के लिए 2.41 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। 64000 करोड़ रुपये सिर्फ राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए रखा गया है। समुद्री किनारों की 2000 किलोमीटर की सड़कों को भी सरकार ने विकसित करने के लिए चिन्हित किया है। सरकार ने 2018 तक 3500 किलोमीटर नए रेलवे ट्रैक बनाने का भी लक्ष्य रखा है। सरकार की योजना सड़क और रेलवे के जरिये बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने के साथ युवाओं को रोजगार देने की भी है। रियल एस्टेट क्षेत्र की मंदी को दूर करने और रोजगार के मौके तैयार करने के लिए सरकार ने सस्ते घर बनाने को बुनियादी क्षेत्र का दर्जा दिया है। इससे बुनियादी क्षेत्र को मिलने वाले सभी फायदे सस्ते घर बनाने वालों को मिलेंगे। विमुद्रीकरण के बाद सबसे ज्यादा रोजगार इसी क्षेत्र में घटने की खबरें थीं। इसीलिए सरकार इस क्षेत्र में रोजगार की गति को बढ़ाने के लिहाज से ये कोशिश करती दिख रही है। टेक्सटाइल सेक्टर में रोजगार के लिए सरकार ने पहले से विशेष योजना लागू कर रखी है। इसमें लेदर और फुटवेयर उद्योग को भी शामिल किया गया है। कपड़ा उद्योग भी रोजगार के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। साथ ही 5 विशेष पर्यटन क्षेत्र बनाने से भी नौजवानों को नए मौके मिल सकेंगे।

वित्त मंत्री के बजट भाषण में 11 बार जॉब और 16 बार स्किल का जिक्र है। वित्त मंत्री ने स्किल इंडिया को आगे ले जाने की बात इस बजट में की है। 600 जिलों में कौशल केंद्र खोले जाएंगे। सरकार 100 इंडिया इंटरनेशनल स्किल सेंटर खोलने जा रही है। इन केंद्रों के जरिये देश-विदेश में रोजगार की जरूरत के लिहाज से लोगों को तैयार किया जाएगा। कुशल भारत को मजबूत करने के लिए 3479 ऐसे विकासखंडों में शिक्षा बेहतर करने पर जोर दिया जाएगा, जो पिछड़े हैं। सरकार चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा लोग खुद उद्यमी बनें। इसके लिए सरकार ने इस साल का बैंकों का कर्ज देने का लक्ष्य दोगुना करके मुद्रा योजना के तहत 2.44 लाख करोड़ रुपये कर दिया है। कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी सरकार इस बजट के जरिए घर, सड़क, रेलवे, कपड़ा उद्योग में तेजी लाकर और आसान कर्ज लोगों को देकर रोजगार के नए मौके तैयार करने की कोशिश की है। 
(ये लेख Hindi Quint पर छपा है।)

Tuesday, November 22, 2016

महंगाई पर काबू रखने के लिए जीएसटी की 5 दरें

आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद केंद्र सरकार ने जीएसटी की दरों पर सहमति बनाने में कामयाबी हासिल कर ली। जीएसटी परिषद की बैठक में चार कर दरें लागू करने पर सहमति बनी है। जीएसटी को लेकर सबसे बड़ी आशंका इसी बात की जताई जा रही थी कि जीएसटी लागू होने के बाद उसके अच्छे परिणाम तो देर से दिखेंगे लेकिन, बुरे परिणाम पहले नजर आने लगेंगे। और उन बुरे परिणामों में सबसे बड़ा महंगाई का तुरंत बढ़ना था। अब अच्छी बात ये है कि जीएसटी परिषद की हुई बैठक ने जिस तरह से जीएसटी की दरों को 4 श्रेणी में बांटा है, उससे जरूरी सामानों की महंगाई तो कतई नहीं बढ़ने वाली। सेवाओं पर कर बढ़ेगा। जिससे सेवाएं महंगी होंगी। लेकिन, इसे लेकर सरकार बहुत ज्यादा चिंतित नहीं दिखती। क्योंकि, सरकार ने जरूरी कई सामानों को तो करमुक्त तक कर दिया है। इस लिहाज से जीएसटी परिषद ने 5 दरें तय की हैं। शून्य, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की कर दरें समझने से साफ होता है कि सरकार की प्राथमिकता में महंगाई पर काबू रखना कितना ऊपर है। उसके पीछे सबसे बड़ी वजह संभवत: ये भी होगी कि बड़ी मुश्किल से कर्ज पर ब्याज दरें काफी नीचे आई हैं। और इस बात पर सरकार और रिजर्व बैंक के बीच सहमति सी बनती दिखी है कि ब्याज दरें कम रहनी चाहिए, जिससे लोगों और कॉर्पोरेट को आसानी से सस्ता कर्ज मिल सके। रघुराम राजन पर रिजर्व बैंक का गवर्नर रहते सबसे बड़ा आरोप यही लगता रहा कि महंगाई दर को लेकर वो इतने ज्यादा सशंकित रहे कि ब्याज दरों को उस अनुपात में नहीं घटाया जितना उसे घटाया जाना चाहिए था। इसीलिए केंद्र सरकार जीएसटी की दरों को तय करने में इस बात पर खास ध्यान दे रही है कि किसी भी तरह से महंगाई के बढ़ने के संकेत नहीं मिलने चाहिए। और जीएसटी परिषद के दरें तय करने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली की बातों से इसकी गंभीरता आसानी से समझी जा सकती है।
वित्त मंत्री अरुण जेटली जीरो टैक्स रेट के बारे में बताते हैं कि जीरो टैक्स रेट उन सामानों पर रखा गया है, जिनकी कीमत बढ़ने-घटने से कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स बास्केट का पचास प्रतिशत तय होता है। जेटली जोर देकर कहते हैं कि हम इनके मुक्त कर वाले सामान नहीं कह रहे हैं। हम इनको जीरो टैक्स आइटम कह रहे हैं।
दरअसल सरकार की मल्टिपल जीएसटी रेट तय करने में अगर कोई एक सबसे बड़ी बात ध्यान में रही है, तो वो है महंगाई। अनाज और दूसरे आम लोगों पर सीधे असर डालने वाले सामानों की कीमतों पर जीरो टैक्स लगेगा। इतना ही नहीं लोगों की रोज की जरूरत चीजों पर 5 प्रतिशत टैक्स लगेगा। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने ये बताया कि प्रस्ताव 6 प्रतिशत का था। लेकिन, अंत में 5 प्रतिशत पर ही सहमति बनी। दरअसल जीरो और 5 प्रतिशत टैक्स रेट जिन सामानों पर लगने वाला है, वही सामान हैं, जिनसे महंगाई दर के घटने-बढ़ने पर सबसे ज्यादा असर होता है। यही वो सामान हैं जिससे सीधे रसोई से लेकर आम लोगों के घर का खर्च बढ़ता-घटता है। इसीलिए केंद्र सरकार ने देश के सबसे बड़े टैक्स सुधार को लागू करते वक्त दरें तय करने में इस बात का ध्यान रखा है कि गलती से भी इसका दुष्परिणाम महंगाई बढ़ाने के तौर पर न दिखे। सरकार ने इसके बाद दो स्टैंडर्ड रेट तय किए हैं। 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत। केंद्र सरकार ने दो स्टैंडर्ड दरें तय करके कांग्रेस की 18 प्रतिशत का स्टैंडर्ड रेट रखने की मांग को खारिज कर दिया है। इसके पीछे वित्त मंत्री अरुण जेटली का तर्क बड़ा साफ है। उनका कहना है कि कई अनाज और रोजमर्रा के जरूरी सामानों के अलावा के सामानों में कई सामान ऐसे हैं, जिस पर अभी 11 प्रतिशत का टैक्स लग रहा है। सीधे 18 प्रतिशत का कर उन सामानों पर लगाने पर महंगाई के बढ़ने का खतरा होगा। इसलिए ऐसे आइटम पर 12 प्रतिशत का कर लगेगा। और जिन सामानों पर पहले से ही 18 प्रतिशत के आसपास या उससे ऊपर का टैक्स लग रहा है, उन पर 18 प्रतिशत का टैक्स लगेगा। इस तरह 18 प्रतिशत के स्टैंडर्ड रेट की जगह 12-18 प्रतिशत का स्टैंडर्ड रेट तय हुआ है।      
रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन जैसे ज्यादातर होम अप्लायंसेज की श्रेणी में आने वाले सामानों पर कर की दरों को 28 प्रतिशत रखा गया है। उद्योग जगत कंज्यूमर ड्यूरेबल्स पर 28 प्रतिशत की टैक्स दरों से खुश नहीं है। उद्योग को उम्मीद है कि ऐसे कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जो लोगों की रोज की जरूरत का हिस्सा बन गए हैं, उन्हें 18 प्रतिशत कर की श्रेणी में रखा जाएगा। 4 श्रेणियां तय होने के बाद भी अभी सामान विशेष पर लगने वाले टैक्स को लेकर सफाई नहीं आ पाई है। वो श्रेणियों के लिहाज से सामानों की सूची आने के बाद ही पक्का हो पाएगा। लेकिन, इतना तो तय दिख रहा है कि सरकार हर हाल में ऐसे सामानों पर ज्यादा कर लगाने के पक्ष में नहीं है, जिससे महंगाई दर बढ़े। खासकर आम लोगों के रोज के इस्तेमाल में आने वाले सामानों पर महंगाई। यही वजह रही कि राज्यों को उनके राजस्व की भरपाई के लिए दी जाने वाली रकम का इंतजाम करने के लिए जीएसटी परिषद ने सेस लगाने को मंजूरी दी है। हालांकि, जानकार कह रहे हैं कि सेस लगने से जीएसटी पर टैक्स के ऊपर टैक्स लगता ही रहेगा। इस पर सरकार का साफ कहना है कि सेस जीएसटी लागू होने के बाद से 5 साल तक के लिए ही है। महंगी लग्जरी कारों और तंबाकू-पान मसाला जैसे उत्पादों पर ही सेस लगाने की बात है। इससे इन उत्पादों पर कर की दर 40 प्रतिशत 65 प्रतिशत तक होगी।
वित्त मंत्री अरुण जेटली की मानें, तो किसी भी उत्पाद पर पहले से ज्यादा कर या सेस नहीं लगने वाला है। उन्होंने कहाकि राज्यों को राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए 50 हजार करोड़ रुपये की जरूरत पहले साल होगी, जो सेस के जरिए वसूला जाएगा। कुल मिलाकर सरकार तेजी से अप्रैल 2017 की समयसीमा तक जीएसटी लागू करने के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रही है। शायद यही वजह है कि सरकार ज्यादातर मसलों पर आम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, अभी भारत जैसे विशाल देश में जीएसटी लागू होने के बाद सामानों पर अलग-अलग राज्य में किस सामान पर कितना कर लगेगा, इसे बता पाना बेहद मुश्किल है। इसके पीछे सिर्फ कर की 4 श्रेणियां होना ही नहीं है। बल्कि, सबसे बड़ी बात ये भी है कि कहां, कौन सा सामान बिक रहा है। साथ ही अभी जीएसटी परिषद को सामान विशेष के लिहाज से श्रेणी तय करके सूची बनानी होगी। इसके बाद ही पूरी तरह से समझा जा सकेगा कि देश के इस सबसे बड़े सुधार से कर ढांचे में कितना सुधार होने वाला है। और इससे आम लोगों से लेकर उद्योगों तक को कितनी सहूलियत मिलने वाली है। लेकिन, प्रथम दृष्टया जीरो टैक्स और 4 टैक्स स्लैब को देखकर ये पक्की टिप्पणी है कि सरकार किसी भी हाल में महंगाई दर बढ़ाने वाली दरों को नहीं लागू करेगी, खासकर आम लोगों के रोज के सामान की महंगाई।

अभी भी आशंकित है उद्योग जगत
जीएसटी लागू करने में सरकार जिस तेजी से आगे बढ़ रही है, उस पर उद्योग जगत खुश नजर आ रहा है। हालांकि, मल्टिपल जीएसटी दरों को लेकर उद्योग जगत थोड़ा आशंकित दिखता है। लेकिन, ज्यादातर लोग जीएसटी लागू करने के सरकार के तरीके की तारीफ करते नजर आ रहे हैं। हां, ये सलाह जरूर है कि ज्यादातर कंज्यूमर गुड्स पर 18 प्रतिशत का ही कर लगना चाहिए।
उद्योग संगठन फिक्की के प्रेसिडेंट हर्षवर्धन नेवतिया ने जीएसटी की 4 दरों पर सहमति बनाने के लिए जीएसटी परिषद की तारीफ की है।
सीआईआई अध्यक्ष नौशाद फोर्ब्स का कहना है कि मॉडल जीएसटी कानून हर राज्य में सामान और सेवाओं की आपूर्ति पर अलग-अलग कर की बात कर रहा है, इससे कर संरचना के और कठिन होने की आशंका है। फोर्ब्स का सुझाव है कि सरकार को अधिकतम 2 दरें रखनी चाहिए। 


Monday, July 04, 2016

नजरिया सुधारिये सरकार, सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह, पेंशन बोझ नहीं है

NDTV India पर #7thPayCommission पर मेरे विचार देख-सुन सकते हैं। सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट को सरकार ने मंजूर कर लिया है। मैं इस बात पर कतई बहस नहीं कर रहा कि वेतन कितना बढ़ा या और बढ़ना चाहिए था, क्या? मैं दूसरी बात कर रहा हूं या कहूं कि एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा हूं। वो बड़ा सवाल हर दस साल पर होने सरकारी कर्मचारियों की वेतन वृद्धि पर सरकार और मीडिया के नजरिये का है। करीब 70 साल के आजाद देश में 2016 में सातवां वेतन आयोग आया है। अब आप सोचिए जिस देश में निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी हर साल मार्च के खत्म होते-होते अपनी तनख्वाह में बढ़त की उम्मीद लगा लेते हैं। वहीं सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह और सरकारी कर्मचारी रहे पेंशनधारियों को इसके लिए बाकायदा एक दशक तक का इंतजार करना पड़ता है। एक वेतन आयोग जैसी समिति इसके लिए बाकायदा सरकार बनाती है और जो अपनी रिपोर्ट देने में करीब-करीब 2 साल लगा देती है। फिर रिपोर्ट आती है, तो सरकार तुरंत अपने खजाने को ऐसे देखने लगती है, जैसे दान में कुछ देना हो। जबकि, सच्चाई यही है कि जैसे किसी कंपनी के आगे बढ़ने में उसमें काम करने वाले मानव संसाधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, वैसे ही देश के आगे बढ़ने में या सरकार के बेहतर तरीके से काम करने सरकारी कर्मचारियों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। फिर उस महत्वपूर्ण भूमिका को निभाने वाले सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह या सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन सरकारी खजाने पर बोझ जैसी क्यों दिखने लगती है। मुझे लगता है कि ये इनका सीधा सा हक है।


बेहतर हो कि मोदी सरकार जिस अप्रेजल सिस्टम की बात कर रही है, उसे लागू कर दे। सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही तय हो। साथ ही सरकारी कर्मचारियों को उनका पूरा हक मिले। बिना ये अहसास दिलाए कि खजाने पर उनकी तनख्वाह या पेंशन बढ़ने से कितना बोझ बढ़ रहा है। क्योंकि, उन सरकारी कर्मचारियों के काम का देश की जीडीपी यानी तरक्की की रफ्तार बढ़ने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। सरकारी कर्मचारियों को सिर्फ कामचोर या भ्रष्टाचारी नजरिये से देखना देश को बंद करना होगा। एक और खतरनाक संकेत हैं कि इस जवान देश में धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बन रही है कि नौजवान सरकारी नौकरी में बड़ी तेजी से घटता जा रहा है। इसका अंदाजा इस आंकड़े से लग जाता है कि करीब 47 लाख सरकारी कर्मचारी हैं और करीब 56 लाख पेंशन लेने वाले हैं। भारत जैसे देश के लिए ये खतरनाक है। क्या सरकारी नौकरी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। क्या सरकार सिर्फ सरकार चलाएगी, नीति बनाएगा, कर वसूलेगी। ये बड़ा सवाल है, क्योंकि, हिंदुस्तान में ज्यादातर निजी कंपनियों की बुनियाद के पीछे उस क्षेत्र में बड़े अच्छे से काम कर रही सरकारी कंपनियां हैं। इसलिए सरकार को इस बड़े सवाल का जवाब खोजना चाहिए। 

Thursday, March 17, 2016

मोदी सरकार की साख तय करेंगे माल्या

विजय माल्या को मोदी सरकार सलाखों के पीछे पहुंचाएगी या नहीं। इससे भी बड़ा सवाल अब ये पूछा जाने लगा है कि मोदी सरकार माल्या को सलाखों के पीछे पहुंचाना भी चाहती है या नहीं। ये सवाल तब खड़ा हो रहा है, जब मोदी सरकार के सिर्फ बाइस महीने में ही माल्या का इतना बुरा हुआ कि उन्हें देश छोड़कर भागना ही बेहतर लगा। माल्या को लगने लगा कि अब किसी भी समय वो सीबीआई दफ्तर के रास्ते जेल की सलाखों के पीछे पहुंच सकता है। धीरे से वो भारत से बाहर चला गया। उस पर तुर्रा ये कि माल्या सोशल मीडिया के जरिये मीडिया से लेकर सबको धमका सा रहे हैं। नसीहत दे रहे हैं। जानबूझकर गलतियां तो ढेर सारे लोग पहले भी करते रहे हैं। लेकिन, गंभीर गलतियां करने के बाद भी छाती चौड़ी करके चुनौती देने वाले अंदाज में बात करने वाले कम ही उदाहरण हैं। इससे पहले कुछ इसी तरह की हरकत सहारा ग्रुप के चेयरमैन सुब्रत रॉय ने की थी। हालांकि, दोनों के मामले अलग हैं। लेकिन, जब कोई उद्योगपति इस तरह से सरकार, सत्ता को चुनौती देने लगे, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई सरकार, सत्ता की साख के लिए जरूरी हो जाती है। फिर जब नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री हो, तो उसकी साख के लिए ये और जरूरी हो जाता है कि माल्या जैसे लोगों को उनके अपराध के लिए सलाखों के पीछे भेजा जाए। लेकिन, ये इतना आसान नहीं है। इसका अंदाजा पूर्व प्रधानमंत्री और अभी के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर के बयान से समझ में आ जाता है।

विजय माल्या के अच्छे दिनों में शायद ही कोई राजनीतिक दल या राजनेता रहा हो, जिससे माल्या से अच्छे रिश्ते न रहे हों। लेकिन, जब माल्या के बुरे दिन शुरू हुए, तो सबने दूरी बना ली। हां, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा खुलकर माल्या के समर्थन में आ गए हैं। देवगौड़ा ने विजय माल्या को कर्नाटक धरती पुत्र बताते हुए मीडिया पर आरोप लगा दिया है कि राज्यसभा सदस्य होने की वजह से माल्या के मामले को इतना तूल दिया जा रहा है। देवगौड़ा कह रहे हैं कि दूसरे इसी तरह के साठ से ज्यादा बड़े कर्ज न चुका पाने वाले उद्योगपतियों की बात मीडिया में क्यों नहीं हो रही। दरअसल ये एक बड़ा सवाल है जो देवगौड़ा ने उठाया है। दिसंबर अंत तक देश के बैंकों का बैड लोन या एनपीए साढ़े चार लाख करोड़ रुपये का हो चुका है। हालांकि, बजट चर्चा पर जवाब देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस बात को बेबुनियाद बताया कि कोई भी डूबा छोड़ दिया गया है। लेकिन, डूबे कर्ज की ये रकम कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस साल के बजट में योजनागत खर्च छे लाख करोड़ से कम का ही है। बैंक कर्मचारियों के सबसे बड़े संगठन के मुताबिक, 2001 से 2013 के बीच दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज माफ कर चुके हैं। और सबसे बड़ी बात है कि ये सारे कर्ज बड़े उद्योगपतियों के हैं। सरकारी बैंकों में चार सबसे बड़े डिफॉल्टर की ही बात करें, तो ये रकम तेईस हजार करोड़ रुपये की है। इसीलिए जब देवगौड़ा ये कहते हैं कि सिर्फ माल्या निशाना क्यों, तो बात सही लगने लगती है। इसका कतई ये मतलब नहीं कि विजय माल्या के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। दरअसल इसी आधार पर विजय माल्या के खिलाफ और ऐसे सभी कर्ज न चकाने वाले बड़े उद्योगपतियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। कर्ज, ब्याज और जुर्माना मिलाकर सरकारी बैंकों का करीब नौ हजार करोड़ रुपये माल्या पर बकाया है। अभी तो खबरें ये भी आ रही हैं कि विजय माल्या काफी रकम देश बाहर ले जाने में भी कामयाब रहे हैं। अच्छा है कि सेबी भी इस मामले में कड़ाई बरत रहा है। क्योंकि, ये ऐसे कर्ज न चुकाने वाले उद्योगपति हैं, जो ऐशोआराम की किसी भी सोची जा सकने वाली ऊंचाई पर दिखते हैं। लेकिन, माल्या के खिलाफ कार्रवाई करने में कितनी मुश्किलें हैं। इसकी ओर इशारा रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का ताजा बयान करता है। राजन ने एक सवाल के जवाब में कहा कि किसी भी कर्ज के डूब जाने की ढेर सारी वजहें होती हैं। इसीलिए क्या किया जा सकता था इसमें पड़ना ठीक नहीं होगी। ज्यादातर समझदार उद्योगपति डूबते कर्ज रीस्ट्रक्चर कराने के पीछे बहुत आशावादी होते हैं। किंगफिशर मामले में क्या हुआ। इसे नहीं देखना चाहिए। बैंकिंग सिस्टम में अपराध को जगह नहीं दी जा सकती।


राजन कह रहे हैं कि अपराध को बैंकिंग सिस्टम में जगह नहीं दी जा सकती। लेकिन, बैंकिंग में बड़े कार्पोरेट किस तरह से अपराध कर रहे हैं या ये कहें कि बैंकिंग व्यवस्था के साथ दुष्कर्म कर रहे हैं। इसे समझने के लिए एसबीआई चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य को सुनना चाहिए। एसबीआई देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक है। और विजय माल्या को कर्ज देने वाले 17 बैंकों का अगुवा बैंक है, जिनका कर्ज डूब गया है। अरुंधति भट्टाचार्य ने माल्या के मामले बताया कि किसी खाते से संबंधित जानकारी बैंक सार्वजनिक नहीं करता है। लेकिन, इस मामले पर जनता की बहुत ज्यादा नजर है। बैंक माल्या से 2013 से कर्ज वसूली प्राधिकरण में लड़ रहा है। हमारी 81 सुनवाई वहां हो चुकी है। माल्या ने हमारे खिलाफ ढेर सारे केस दर्ज कराए हैं। जिसका जवाब हमने दिया है। कुल 22 मामले हम माल्या के खिलाफ लड़ रहे हैं। 508 सुनवाई हो चुकी है। और 180 बार सुनवाई स्थगित हो गई। भट्टाचार्य ने बताया कि माल्या के गोवा के एक बंगले पर कब्जे के लिए उच्च न्यायालय ने आदेश दे दिया कि तीन महीने के भीतर बंगले का कब्जा बैंक को मिल जाना चाहिए। लेकिन, कलेक्टर ने उसके बाद आठ सुनवाई की और फिर छुट्टी पर चला गया। विजय माल्या का मामला बैंकिंग सिस्टम के साथ पूरे सरकारी तंत्र की गंदगी का जीता जागता उदाहरण है। और इसीलिए जरूरी है कि इस मामले में सरकार सख्ती बरते और माल्या को सलाखों के पीछे भेजा जाए। इसीलिए मैं मानता हूं कि ये सीधे-सीधे नरेंद्र मोदी की उस साख से जुड़ा हुआ है। जिसकी बुनियाद उनके, न खाउंगा-न खाने दूंगा, बयान से तैयार हुई है। जिस तरह से देश के बड़े उद्योगपति ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत का चार्वाक सिद्धांत को अमल में ला रहे हैं। उसमें जरूरी है कि उनके देश की जनता की खून पसीने की कमाई से घी पीने पर रोक लगे। विजय माल्या के खिलाफ अगर सलीके की कार्रवाई हुई, तो ये ऐसे कर्ज लेकर घी पीने वाले उद्योगपतियों की जमात को तगड़ा झटका होगा। इसका ताजा उदाहरण है। अभी कुछ समय पहले तक कहां कल्पना थी कि चिटफंड कंपनियों के खिलाफ कोई सरकार कभी कुछ कर पाएगी। सेबी से सुब्रत रॉय की सीधी लड़ाई न हुई होती, तो शायद चिटफंड कंपनियां अभी भी गरीबों की गाढ़ी कमाई लूट रही होतीं। लेकिन, सुब्रत रॉय को सरकार, सत्ता के जेब में होने या फिर उसे खरीद लेने का गुरूर था। झगड़ा बढ़ा और आगे क्या हुआ, ये सब देख रहे हैं। सुब्रत रॉय जेल में हैं। इसी के साथ दूसरे चिटफंडियों पर भी कार्रवाई की सिलसिला तेज हुआ। पर्ल्स, सारदा, साईं प्रसाद और ऐसी जाने कितनी चिटफंड कंपनियों के मालिक फर्जीवाड़े के मामले में जेल में हैं। कमाल ये कि इनमें से ज्यादातर मीडिया हाउस के भी मालिक रहे या हैं। लेकिन, सुब्रत रॉय की गिरफ्तारी की बुनियाद इतनी मजबूत थी कि एक के बाद एक सारे चिटफंडिये जेल के भीतर पहुंच गए। विजय माल्या का गिरफ्तारी भी ऐसी ही एक बुनियाद है। इससे बैंकिंग सिस्टम में कर्ज डुबाकर बैंकों की हालत खराब करने वाले उद्योगपतियों को उनकी औकात में लाया जा सकेगा। मामला कितना गंभीर है, इसका अंदाजा लगाइए। सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज डुबाने वाले उद्योगपतियों की सूची मांगी है। सुप्रीमकोर्ट ये भी पूछ रहा है कि शाही अंदाज में जीने वाले इन उद्योगपतियों के अपनी कंपनी को बीमार घोषित करने के बाद भी बैंक कैसे कर्ज देकर खुश है। बाजार नियामक सेबी ने विलफुल डिफॉल्टरों, यानी ऐसी कंपनियां जिन्होंने जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाया है, को कंपनी में किसी भी पद पर रहने से, बाजार में किसी भी तरह की गतिविधि में शामिल होने से रोक दिया है। देश में नियामक होने न होने पर बहुत बहस चली है। लेकिन, सेबी ने इस बहस को सकारात्मक संदर्भ दे दिए हैं। विजय माल्या के यूबी ग्रुप की संपत्तियों से ये सारा कर्ज वसूला जाना चाहिए। ठीक है कि ऐसा काम न हो कि लोग उद्योग लगाने, कर्ज लेने से डरने लगें। लेकिन, ऐसे उद्योगपति देश के लिए ज्यादा खतरनाक हैं, जिनसे बैंक, देश डरने लगे। विजय माल्या के यूबी ग्रुप की कंपनी यूनाइटेड स्पिरिट्स की किंगफिशर बीयर दुनिया के 52 देशों में बिकती है। भारत के बीयर बाजार में इसकी आधी से ज्यादा हिस्सेदारी है। इसीलिए देवगौड़ा जी विजय माल्या मीडिया की सुर्खियों में है। और इसीलिए मोदी जी आपको विजय माल्या को सलाखों के पीछे भेजना ही होगा। ये सीधे-सीधे आपकी साख का सवाल है। और साख से ज्यादा देश की आर्थिक दशा का सवाल है। ऐसे कर्ज डुबाने वालों से कर्ज वसूली नहीं हुई, तो पचीस-पचास हजार करोड़ रुपये बैंकों को देकर भी बैंक की दशा सरकार क्या सुधार पाएगी। हां, ऐसे लोगों को कर्ज डुबाने के लिए इतनी रकम और मिल जाएगी। 

Monday, March 14, 2016

समग्रता में पानी, बिजली, सड़क का बजट

वित्तमंत्री अरुण जेटली के इस बजट को पहली नजर में देखने पर ये लगता है कि बजट भाजपा का वो दृष्टि परिवर्तन है, जो बिहार में भारतीय जनता पार्टी की हार से हुआ है। बजट पहली नजर में पूरी तरह से खेत, किसान और गांव का ही बजट नजर आता है। बजट को देखने की ये पहली नजर का ही असर रहा कि शेयर बाजार ने पूरी तरह से बजट को उद्योग के खिलाफ समझ लिया। और शेयर बाजार में तबाही सी आ गई। हालांकि, पहली नजर के प्रभाव से जब बाजार उबरा, तो स्थिति उलट गई और बाजार में काफी हरियाली देखने को मिली। धीरे-धीरे समझ में आया कि गांवों में भी अगर विकास के काम होंगे, तो उसे करने के लिए बड़ी कंपनियां, उद्योग चाहिए। इस देर से आई समझ से बाजार को लगा कि अच्छे दिन आएंगे। मुझे ध्यान में नहीं आ रहा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट भाषण में एक बार भी अच्छे दिन आने वाले हैं या अच्छे दिन का बजट शब्द का इस्तेमाल किया हो। दरअसल अच्छे दिनों को विपक्ष ने इस तरह से जुमला साबित कर दिया है कि अब सरकार अच्छे दिनों की जिक्र करने से बचती है। लेकिन, इस बजट को जरा गहरी नजर से देखें, तो ये अच्छे दिनों का खाका संपूर्णता में पेश करने वाला बजट है। ये देश का पहला बजट है, जिसमें समग्रता में पानी, बिजली और सड़क की बात की गई है। सिर्फ बात नहीं की गई है। पानी, बिजली, सड़क की मुश्किल कैसे दूर होगी। ये साफ-साफ बताया गया है। तारीख दी गई है कि इस समस्या का हल इस तारीख को हो जाएगा। पूरे बजट के बजाय अभी मैं सिर्फ पानी, बिजली, सड़क पर ही इस बजट का विश्लेषण कर रहा हूं।

शुरुआत पानी की मुश्किल से करते हैं, फिर बजट में क्या-क्या हुआ। इस पर बात करेंगे। पानी की मुश्किल इतनी बड़ी हो गई है कि बड़े शहरों में तो डिब्बाबंद पानी सबसे बड़ी जरूरत हो गई है। हर घर में पानी को साफ करके पीने लायक बनाने वाली मशीन लग गई है। गांव में भी मुश्किल से तालाब, कुएं से पीने लायक पानी मिल पा रहा है। पीने लायक तो छोड़िए, अब तो सिंचाई के लिए भी पानी नहीं मिल पा रहा है। जमीन में पानी का स्तर तेजी से नीचे जाने की वजह से खेत बंजर होते जा रहे हैं। खेतों की उर्वर क्षमता खत्म हो रही है। जाहिर है इस हाल में खेतों की उत्पादकता यानी प्रति एकड़ ज्यादा उपज से भी हालात सुधरने वाले नहीं हैं। क्योंकि, उससे ज्यादा तेजी से खेत खत्म हो रहे हैं। इस बजट में इस गंभीर परेशानी को समझकर उससे उबरने की कोशिश करती हुई सरकार दिखती है। जमीन में पानी का स्तर बढ़ाने के लिए साठ हजार करोड़ रुपये इस बजट में प्रस्तावित हैं। ये रकम कितनी बड़ी है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि किसी सरकार ने इस विकराल होती समस्या को खत्म करने की बीड़ा उठाया है। याद नहीं आता कि किसी बजट में सरकार ने जमीन में पानी का स्तर बेहतर करने के लिए इतनी बड़ी रकम दी हो। जमीन में पानी का स्तर बेहतर करने के साथ सरकार को किसानों की सिंचाई की मुश्किल भी अच्छे से पता है। और इसीलिए बजट में अट्ठाइस लाख पचास हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत पक्का करना तय किया गया है। विश्व बैंक के मुताबिक, भारत में जमीन के साठ प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर खेती हो सकती है। अनुमान के मुताबिक, देश में सोलह करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर खेती होती है। करीब चार करोड़ हेक्टेयर खेत की सिंचाई कुओं, तालाबों के जरिये होती है। जबकि, करीब ढाई करोड़ हेक्टेयर खेत की सिंचाई नहर के जरिये होती है। कुल मिलाकर सभी तरह के सिंचाई साधनों का इस्तेमाल करने के बाद भी देश के करीब दो तिहाई खेत सिंचाई का पानी न मिलने की वजह से सिर्फ बारिश के पानी के ही भरोसे होते हैं। और यही वजह होती है कि देश में उपज को लेकर किसान, ग्राहक और सरकार सब आशंकित रहते हैं। इस बजट में पानी का स्तर बढ़ाने और खेतों की सिंचाई पक्का करने का प्रावधानन भरोसा जगाता है कि सरकार पानी की मुश्किल का हल खोज रही है। नाबार्ड बीस हजार करोड़ रुपये का सिंचाई का फंड तैयार करेगा। प्रति एकड़ ज्यादा उपज के लिए सरकार ऑर्गेनिक खेती को भी बढ़ावा दे रही है। अगले तीन सालों में पांच लाख एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक खेती की जाएगी।

बिजली कितने घंटे मिलती है। कितने घंटे कटौती होती है। ये बहस शहरों-गांवों में आम है। लेकिन, बिजली देश के कितने गावों में है ही नहीं। ये कितनी दुखद स्थिति है। इस समस्या को इस सरकार ने खत्म करने का बीड़ा उठाया है। इस पर काम पहले से हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सभी गांवों तक एक हजार दिनों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था। इस बजट में एक मई 2018 वो तारीख बताई गई है, जिसके बाद देश का कोई गांव ऐसा नहीं होगा। जहां बिजली नहीं होगी। बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी इसके लिए ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल की पीठ थपथपाई। दरअसल पहली बार मंत्री ने पीयूष गोयल ने जिस तरह से हर गांव तक बिजली पहुंचाने के प्रधानमंत्री के लक्ष्य को पूरा करने का बीड़ा उठाया है। वो कमाल है। संयोगवश एक दिन इस काम करने वाली नोडल एजेंसी के दफ्तर में जाने पर देखा, तो इस परियोजना से जुड़े हर अधिकारी के टेबल पर रखा कैलेंडर हजार में से हर बीतते दिन का हिसाब तय करता दिखता है। बिजली को लेकर इस तरह से काम किसी सरकार ने किया हो, ये याद नहीं आता। 1999 वाली एनडीए की सरकार में सुरेश प्रभु ने ऊर्जा मंत्री काफी सकारात्मक कोशिश की थी। लेकिन, उस वक्त भी हर गांव तक बिजली पहुंचाने की सोच नहीं बन सकी थी। आधार जरूर उसी समय तैयार हुआ।

पानी और बिजली की ही तरह इस बजट में सड़क पर भी सरकार का खास जोर साफ दिखा। सड़क वैसे तो भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार की सबसे पसंदीदा होती है। फिर चाहे पिछली वाजपेयी सरकार में स्वर्णिम चतुर्भुज की बात हो या फिर इस सरकार के कार्यकाल में तीस किलोमीटर प्रतिदिन राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का लक्ष्य तय करने वाले सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी हों। इस बजट सरकार ने गांव की सड़कों की समस्या को दूर करने का खाका दिया है। शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अच्छे पता है कि अगर गांव से किसान जिला, राज्य मुख्यालय तक उपज लेकर नहीं आ पाया, तो उनका किसान की आमदनी 2022 तक दोगुना करने का वादा सिर्फ ही रह जाएगा। इसीलिए इस बजट में गांवों की सड़कों के लिए उन्नीस हजार करोड़ रुपये दिया गया है। दो हजार किलोमीटर राज्य की सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग में बदलने का प्रस्तावव भी इसी बजट में है। सड़कों के लिए सत्तानबे हजार करोड़ रुपये का प्रावधान इस बजट में है। अगर रेलवे-सड़क दोनों को जोड़ें, तो इस बजट में करीब सवा दो लाख करोड़ रुपये का प्रावधान है। बजट में ये सुनकर अच्छा लगा कि पचासी प्रतिशत रुके पड़े सड़क के काम शुरू हो गए हैं। नितिन गडकरी ने बुनियादी परियोजनाओं को तेजी स लागू करने की अपनी छवि को और दुरुस्त किया है। ग्राम पंचायतों को दिया गया करीब तीन लाख करोड़ रुपये साफ बताता है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार को ये बात अच्छे से समझ आ गई है। पानी, बिजली और सड़क तीनों की सबसे ज्यादा मुश्किल और उसका समाधान देश के गांवों में ही है। इसीलिए पहली नजर से देखने में भले ये लगे कि सरकार ने चुनावी बजट के तौर पर गांवों की ओर चलना शुरू किया है। लेकिन, मुझे लगता है कि पहली बार किसी सरकार ने समग्रता में पानी, बिजली और सड़की मुश्किलें समझी हैं और उन्हें खत्म करने का रास्ता भी देख लिया है।

Thursday, February 11, 2016

आर्थिक मामले में सरकार सही रास्ते पर है

11 फरवरी 2016 को छपा लेख
इधर भारतीय जनता पार्टी के घोर समर्थक भी बहुत मजबूती से मोदी सरकार के कामों का बचाव नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि, एक तो पूर्ण बहुमत वाली लोकप्रिय सरकार से लोगों को उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं। जो जाहिर है, इतनी तेजी से कहां पूरी होने वाली हैं। दूसरी खुद प्रधानमंत्री जिस अंदाज में काम करते हैं, उससे लोगों को हर मुश्किल सुलझाने के लिए नरेंद्र मोदी अलादीन के चिराग जैसे नजर आने लगे थे। अलादीन का चिराग भी तो सिर्फ किस्से कहानियों में ही होता है। शायद यही वजह है कि सरकार सही रास्ते पर है या नहीं। इसे जताने में विपक्ष तो तमाम तर्क गिना देता है। लेकिन, सरकार के सही रास्ते पर होने के पक्ष वाले थोड़ा दबे-छिपे से दिख रहे हैं। खुद वित्त मंत्री अरुण जेटली बार-बार देश की खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देकर लोगों को इस बात के लिए तैयार करने में लगे हैं कि सरकार से फिलहाल बहुत ज्यादा उम्मीद न की जाए। वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा भी लगातार मीडिया से बात करने में ये बताते रहते हैं कि किस तरह से मोदी सरकार देश के खजाने को दुरुस्त करने में लगी है। ये बात बड़े-छोटे वित्त मंत्री अकसर इस सवाल के जवाब में बताते हैं कि आखिर कच्चे तेल की कीमतों में आई इतनी बड़ी कमी का फायदा क्यों लोगों को पूरी तरह से नहीं मिल पा रहा है। इससे गड़बड़ ये हो रही है कि पूर्ण बहुमत की लोकप्रिय सरकार बनाने के लिए जी-जान लगा देने वाले और मोदी को देश की हर मर्ज की दवा समझने वालों को ये डर लगने लगा है कि क्या सरकार सही रास्ते पर है। संयोग से इसी महीने बजट पेश होने वाला है। तो उम्मीद करें कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ऐसा बजट पेश करेंगे, कि कम से कम उन लोगों को जिन्होंने इस सरकार को बड़ी उम्मीदों से चुना है, जिससे लगने लगे कि सरकार सही रास्ते पर है। कम से कम आर्थिक मामले में।

बजट के महीने में अच्छी बात ये आई है कि सरकार के हाथ में एक ऐसा आंकड़ा आ गया है। जिससे कम से कम ये बताया जा सकता है कि सरकार सही रास्ते पर है। ये आंकड़ा इस वित्तीय वर्ष के लिए जीडीपी का है। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि वित्तीय वर्ष दो हजार सोलह में जीडीपी सात दशमलव छह प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ेगी। पिछले वित्तीय वर्ष में ये रफ्तार सात दशमलव दो रही है। इससे एक तो ये कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए खास नहीं कर रही है। इस तरह की आलोचना करने वालों को जवाब मिल गया है। दूसरा ये कि आने वाला समय भारत का ही है, ये भी तय हो गया है। क्योंकि, इस रफ्तार के साथ भारत दुनिया का सबसे तेजी से तरक्की करने वाला देश बन गया है। चीन हमसे पीछे छूट गया है। लेकिन, हमारा बाजार अभी भी चीन के सामानों से भरा पड़ा है। बजट चीन की उस हिस्सेदारी को ध्वस्त करके वो हिस्सेदारी भारत के पक्ष में करने के रास्ते साफ-साफ बताए। क्योंकि, भारत की आबादी की जितनी जरूरतें हैं उसमें साढ़े सात प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार से खुश नहीं हुआ जा सकता। इसके आठ से नौ प्रतिशत के बीच लंबे समय तक रहने की जरूरत है। दस प्रतिशत की बात इसलिए नहीं करूंगा कि वो मनमोहिनी सपने जैसा नजर आने लगता है। उम्मीद की जा सकती है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली बजट में ढेर सारे ऐसे प्रावधान करेंगे कि चीन के बाजार में हमारी हिस्सेदारी बढ़े न बढ़े, कम से कम हमारा बाजार हमारी जीडीपी बढ़ाने में ही मददगार हो।

अब बजट में क्या आएगा ये तो महीने के अंत में ही पता चलेगी। लेकिन, सरकार सही रास्ते पर है और ये रास्ता पक्का बन रहा है। इसे बताने वाला भी आंकड़ा सरकार ने पेश किया है। ये आंकड़ा है सरकारी खजाने में करों की वसूली का। वैसे तो सीधे-सीधे बात ये है कि सरकार कर वसूली के मामले में तय किया लक्ष्य हासिल करने के रास्ते पर है। सरकार ने कुल चौदह करोड़ उन्चास लाख करोड़ रुपये की कर वसूली करने का लक्ष्य किया था। इकतीस जनवरी दो हजार सोलह तक यानी बजट वाले महीने के पहले तक सरकार ने कुल दस लाख छियासठ हजार करोड़ रुपये की कर वसूली कर ली है। लेकिन, इसको जरा विस्तार से समझने की जरूरत है। यही विस्तार बता रहा है कि आर्थिक मामले पर सरकार सही रास्ते पर है। सरकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर वसूली के आंकड़े गौर से देखें, तो काफी कुछ समझ आ जाता है। पहले प्रत्यक्ष कर वसूली की बात करें, तो इसमें करीब ग्यारह प्रतिशत की बढ़त देखने को मिल रही है। कुल मिलाकर जनवरी के आखिर तक पांच लाख बाइस हजार करोड़ रुपये प्रत्यक्ष कर के रूप में सरकार को मिले हैं। यानी सरकार ने तय लक्ष्य का पैंसठ प्रतिशत पूरा कर लिया है। लेकिन, इसका दूसरा मतलब ये भी हुआ कि सरकार अगले दो महीने में इस लक्ष्य को शायद ही हासिल कर पाए। यानी प्रत्यक्ष कर, कॉर्पोरेट टैक्स और इनकम टैक्स, के मामले में लक्ष्य पूरा होने में थोड़ी मुश्किल हो रही है। क्या इससे ये मतलब निकाला जाए कि लोगों की कमाई घटी है। इस वजह से कॉर्पोरेट टैक्स और इनकम टैक्स सरकार के तय लक्ष्य के नजदीक नहीं पहुंच पा रहा है। दरअसल ऐसा है नहीं। सच्चाई ये है कि सरकार ने लक्ष्य ही ज्यादा बड़ा तय कर लिया था। ये लक्ष्य दरअसल आठ से साढ़े आठ प्रतिशत की जीडीपी को आधार बनाकर तय किया गया था। इसलिए साढ़े सात प्रतिशत से थोड़ा ही ज्यादा जीडीपी ग्रोथ के लिहाज से प्रत्यक्ष कर की वसूली भी बेहतर हुई है। ये आंकड़े भी बता रहे हैं। कॉर्पोरेट टैक्स कलेक्शन करीब ग्यारह प्रतिशत बढ़ा है। ऐसे ही इनकम टैक्स कलेक्शन करीब बारह प्रतिशत बढ़ा है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि लोगों की जेब में ज्यादा रकम आई और उसी पर उन्होंने टैक्स दिया है।

अब अगर अप्रत्यक्ष कर वसूली के आंकड़े देख लें, तो मामला ज्यादा साफ हो जाएगा। सरकारी खजाने में पांच करोड़ चौवालीस लाख रुपये का अप्रत्यक्ष कर आया है। जो पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले तैंतीस प्रतिशत ज्यादा है। और अप्रत्यक्ष कर के मामले में तो सरकार ने अपने लक्ष्य का अठासी प्रतिशत पूरा कर लिया है। अप्रत्यक्ष कर से 40 हजार करोड़ रुपये ज्यादा मिलने की उम्मीद है। राजस्व सचिव हंसमुख अधिया इसी के भरोसे ये मान रहे हैं कि सरकार कुल तय लक्ष्य की कर वसूली कर लेगी। अप्रत्यक्ष कर को सीधी, सरल भाषा में समझें, तो ये अलग-अलग तरह के उद्योगों से होने वाली वसूली है। अप्रत्यक्ष कर में कस्टम ड्यूटी के आंकड़े देखें, तो ये पक्का समझ आता है कि देश में नया काम काफी तेजी से शुरू हुआ है। यही वजह है कि इलेक्ट्रिकल मशीनरी पर पिछले वित्तीय वर्ष से करीब पैंतीस प्रतिशत ज्यादा कस्टम ड्यूटी मिली है। अन्य मशीनें भी कस्टम ड्यूटी के तौर पर सरकार के खजाने में पिछले साल से करीब अट्ठाइस प्रतिशत ज्यादा रकम दे गईं हैं। इसका सीधा, सरल मतलब यही हुई कि देश में औद्योगिक गतिविधियों में तेजी आई है। उन्हीं गतिविधियों को पूरा करने के लिए ये मशीनें मंगाई गई हैं।


ये सिर्फ मशीनों के मामले में ही नहीं है। सर्विस सेक्टर में कर वसूली सत्ताइस प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी है। बैंकिंग, फाइनेंशियल क्षेत्र ने करीब पैंतालीस प्रतिशत ज्यादा रकम टैक्स के तौर पर सरकार के खजाने में डाल दी है। वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट और गुड्स, ट्रांसपोर्टेशन के जरिये भी सरकारी खजाने में पिछले वित्तीय वर्ष से चालीस प्रतिशत से ज्यादा रकम आ गई है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि पिछले करीब इक्कीस महीने में मोदी सरकार ने जो कुछ किया है। इसका असर इस तरह से दिखने लगा है। सरकार आर्थिक मामले में सही रास्ते पर है। इसलिए बहुमत की सरकार बनाने वाले अभी सरकार पर भरोसा बनाए रख सकते हैं। लेकिन, अलादीन के चिराग की उम्मीद न पालें। ये चमत्कारिक कहानियां नहीं हैं। ये देश की अर्थव्यवस्था है। 

Saturday, April 25, 2015

दस प्रतिशत की तरक्की का मजबूत होता आधार

दस प्रतिशत की तरक्की की सपना भारत फिर देख रहा है। सवाल ये है कि क्या भारत दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के लिए जमीन तैयार कर पाया है। सवाल ये है कि क्या भारत के इस सपने को दुनिया सच मान रही है। उससे भी बड़ा सवाल ये कि क्या भारतीय कंपनियां नए उद्योग लगा रही हैं। क्या रोजगार के नए मौके बनते दिख रहे हैं। ये सारे सवाल इसीलिए खड़े हो रहे हैं कि इसके पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी यही सपना दिखाया था लेकिन, दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के नजदीक पहुंचते-पहुंचते सरकारी नीतियों में भ्रम से ये सपना बुरी तरह टूट गया। और इस कदर टूटा कि यूपीए दो के शासनकाल के आखिरी दिनों में भारत पांच प्रतिशत के आसपास की तरक्की की रफ्तार पर आकर टिक गया। अब एक बार फिर से नई सरकार के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दस प्रतिशत की तरक्की की तरफ्तार हासिल करने की बात की है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के अनुमान साफ कर चुके हैं कि इसी वित्तीय वर्ष में भारत दुनिया का सबसे तेजी से तरक्की करने वाला देश बन जाएगा। ज्यादातर अनुमानों में भारत की तरक्की की रफ्तार इस वित्तीय वर्ष में साढ़े सात प्रतिशत या उससे ज्यादा रहने वाली है। जबकि, चीन पीछे छूटता दिख रहा है। चीन की तरक्की की रफ्तार सात प्रतिशत या उससे भी कम रहने का अनुमान है। अनुमानों में चमकती इंडिया ग्रोथ स्टोरी को धरातल पर देखें तो तस्वीर ज्यादा साफ होगी। धरातल पर भी हालात यही है कि सबसे तेजी से तरक्की करने वाले देश में दुनिया के सारे निवेशक रकम लगाने को आतुर हैं। इमर्जिंग मार्केट्स में भारत में ही सबसे ज्यादा विदेशी संस्थागत निवेशक आ रहे हैं। इस साल अब तक एफआईआई यानी विदेशी संस्थागत निवेशक भारत में करीब साढ़े छे बिलियन डॉलर का निवेश कर चुके हैं। इसके बाद मेक्सिको, ब्राजील, साउथ कोरिया और ताइवान का नंबर आता है। और ये भरोसा सिर्फ एफआईआई के मामले में ही नहीं है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई के आंकड़े इंडिया ग्रोथ स्टोरी पर ज्यादा भरोसा साबित करते हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार के पहले दस महीने में कुल 25.25 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है। वित्तीय वर्ष 2013-14 में कुल 19 बिलियन डॉलर से कम का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ था।
 
दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार के लिए बहुत बड़े विदेशी निवेश की जरूरत है। फिर वो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हो या फिर संस्थागत विदेशी निवेश। इसलिए किसी भी तरह का विदेशी निवेश अगर भारत में इस तेजी से आ रहा है तो इसका सीधा सा मतलब है कि दुनिया के निवेशकों को इंडिया ग्रोथ स्टोरी भरोसे लायक दिख रही है। इसमें बड़ी भूमिका इस बात की भी है कि भारत में नीतियों में भ्रम की स्थिति अब नहीं रही है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार नीतियों के मामले में यूपीए सरकार बहुत ज्यादा साफ और दृढ़ दिखती है। यही वजह है कि दुनिया की रेटिंग एजेंसियां लगातार भारत की रेटिंग बेहतर कर रही हैं। इसका असर साफ-साफ नजर आ रहा है। फरवरी महीने में औद्योगिक रफ्तार पांच प्रतिशत रही है जो पिछले तीन महीने में सबसे ज्यादा है। फरवरी महीने में कैपिटल गुड्स के उत्पादन की रफ्तार आठ प्रतिशत बढ़ी है। इसका सीधा सा मतलब अगर समझें तो, बड़ी मशीनों का ज्यादा उत्पादन हो रहा है। मतलब निर्माण और दूसरी गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। मार्च महीने में कमर्शियल गाड़ियों की बिक्री में भी तेजी आई है। किसी अर्थव्यवस्था में कारोबारी इस्तेमाल के वाहनों की बिक्री बढ़ने का सीधा सा मतलब अर्थव्यवस्था में तेजी के अच्छे लक्षणों की तरह देखा जाता है। सर्विस सेक्टर में भी बेहतरी के संकेत मिल रहे हैं। सर्विस सेक्टर में इस वित्तीय वर्ष के पहले दस महीने में 2.64 बिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ है। कुल मिलाकर निर्माण हो या सेवा क्षेत्र, दोनों ही क्षेत्रों में फिलहाल बेहतरी के संकेत मिल रहे हैं।
 
यूपीए की सरकार में एक बड़ी समस्या नीतियों को लेकर रही। जिसकी वजह से नए प्रोजेक्ट शुरू करने में कारोबारी डरने लगे थे। उनको डर ये था कि प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद उससे संबंधित नीतियां बदल न जाएं। और इसका असर पुराने प्रोजेक्ट पर भी पड़ रहा था। ढेर सारे प्रोजेक्ट इसी वजह से शुरू हो ही नहीं पाए थे। अच्छी बात है कि मोदी सरकार में पुराने रुके पड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने में तेजी आई है। 2014-15 में करीब दो लाख करोड़ रुपये की रुकी योजनाएं शुरू हुई हैं। जबकि, इससे पहले के साल में सिर्फ सत्ताइस हजार करोड़ रुपये की ही रुकी योजनाएं शुरू की जा सकी थीं। सिर्फ निर्माण क्षेत्र की शुरू हुई योजनाओं की लागत करीब साठ हजार करोड़ है। जो, यूपीए के शासन से साढ़े पांच गुना ज्यादा है। यही बुनियादी परियोजनाओं की बात करें तो करीब छिहत्तर हजार करोड़ रुपये की रुकी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं शुरू हुई हैं। जो, 2013-14 से छे गुना ज्यादा है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि रुकी परियोजनाएं तेजी से शुरू हो रही हैं। साथ में नए प्रोजेक्ट भी तेजी से शुरू हो रहे हैं। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि लोगों को रोजगार के नए मौके मिलने वाले हैं। मोदी सरकार के पहले दस महीने में करीब 1900 प्रोजेक्ट शुरू करने का एलान हुआ है। इन योजनाओं में करीब दस लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा। पिछले साल के मुकाबले यानी यूपीए दो शासन के आखिरी साल के लिहाज से देखें तो ये अस्सी प्रतिशत ज्यादा है। ये आंकड़े साफ बता रहे हैं कि दुनिया को ऐसे ही नहीं भारत के भरोसे अर्थव्यवस्था में तेजी की उम्मीद नजर आ रही है। आईएमएफ चीफ क्रिस्टीन लागार्ड ने ऐसे ही नहीं कहा कि भारत काले घने बादलों के बीच चमकता सितारा है। दरअसल भारत में ये ताकत है कि वो दुनिया की अर्थव्यवस्था के घने बादलों को साफ कर सके। लेकिन, इसके लिए एक जो सबसे जरूरी बात है कि सरकारी नीतियों में भ्रम या बार-बार बदलाव की स्थिति न बने। वो देसी और विदेशी दोनों ही निवेशकों, कारोबारियों के लिए जरूरी शर्त है। अभी तक के नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले देखें तो ये भरोसा बनता है। और अगर ये भरोसा बना रहा तो दस प्रतिशत की तरक्की का मनमोहिनी सपना नरेंद्र मोदी की सरकार में पूरा होता दिख सकता है।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

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