दंगा !


मुजफ्फरनगर का दंगा भी धर्म की लड़ाई है। ये साबित हो ही चुका है। लेकिन, क्या ये धर्म की लड़ाई है। दरअसल इस देश में एक बड़ी विचित्र बात जो हो बार-बार साबित हो चुकी है कि दंगा या फिर इस तरह का कोई तनाव हिंदु मुस्लिम वोट दिलाने में मददगार होता है। और इससे भी बड़ी बात ये साबित करने की कोशिश होती रही है कि दक्षिणपंथी पार्टियां ही इस सारे ध्रुवीकरण के लिए अकेले जिम्मेदारी निभाती हैं। ये बात कांग्रेस, बसपा, सपा, राजद और जाने कौन-कौन सी देश की पार्टियां लगातार साबित भी करती रहती हैं। दुखद ये नहीं है। देश की ज्यादातर पार्टियां धर्मनिरपेक्ष होने के नाम पर ही मुसलमान वोटों की लड़ाई लड़ती रहती हैं। और ठीक है अगर सिर्फ एकाध दक्षिणपंथी पार्टियों को पूरी तरह सांप्रदायिक बता भर देने से मुसलमान वोट मिल जा रहे हैं तो बुरा क्या है। लेकिन, दुखद बात ये है कि अब कई स्वानामधन्य संपादकों को भी एकाध दक्षिणपंथी पार्टियां उसमें भी राष्ट्रीय स्तर पर अकेली बीजेपी ही है जो देश के सारे दंगों की वजह दिखती है। जबकि, ये साबित होता रहा है कि दंगे या ऐसी किसी भी तनाव वाली स्थिति का मुसलमान वोटों के तौर पर थोक फायदा उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को ही होता रहा है। फिर भी दंगे या ऐसी धर्मों के बीच तनाव की स्थिति के लिए जिम्मेदार बीजेपी ही होती है। ये स्थिति ऐसी बिगड़ चुकी है कि अगर बीजेपी शासन वाले राज्य में दंगा हो तो राज्य सरकार कराती है और अगर किसी दूसरी पार्टी का शासन है तो मुख्य विपक्ष में या मुख्य विपक्ष से भी नीचे कहीं दिख रही बीजेपी साजिश करके कराती है।

और बीजेपी ही दंगे या हिंदु मुसलमान तनाव के लिए जिम्मेदार होती है इस बात को साबित करने में कई जिम्मेदार संपादक धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से से भी कई हाथ आगे निकलने की कोशिश करते दिखते हैं। एक और महत्वपूर्ण तथ्य है कि हिंदु मुस्लिम के बीच के तनाव की खबर बने इससे पहले जब वो सीधे अपराध की भी खबर होती है तो भी मीडिया उसमें अल्पसंख्यक बहुसंख्यक के लिहाज से पहचान बता या छिपा रहा है। दो धर्मों से जुड़ा मसला है तो उसे बिल्कुल भी मीडिया में नहीं आना चाहिए। दंगा दिखाने से दंगा भड़कता है इस नैतिक नीति के तहत भारतीय मीडिया 2002 के बाद का कोई दंगा नहीं दिखाता #UPriots की चर्चा तो बिल्कुल नहीं। पत्रकारिता की ये नैतिक नीति काफी हद तक सही भी है। लेकिन, ये नीति जब अपनी सहूलियत के लिहाज से बदलती है तो, शायद दंगा भड़काने वालों को और आसानी हो जाती है। ये ऐसे कि कई स्वनामधन्य संपादक ऐसे मसलों पर हिंदुओं के खिलाफ लिखकर ये सोचते हैं कि वो अल्पसंख्यक मुस्लिमों का भला कर रहे हैं। अब एक उदाहरण देखिए आशुतोष की अच्छे पत्रकारों में गिनती है। देश के एक बड़े चैनल के संपादक हैं। लेकिन, मुजफ्फरनगर के मसले पर वो पहले से ही सारी गलती दक्षिणपंथियों पर थोपने लगते हैं। और एकाध उग्र दक्षिणपंथियों के ट्वीट पकड़कर सारा निष्कर्ष निकाल लेते हैं। उन्होंने मुजफ्फरनगर मसले पर ट्वीट किया - Hate tweets should be banned and  such persons should be arrested एकदम सही बात है किसी भी जिम्मेदार संपादक को यही लाइन लेनी चाहिए। लेकिन, इसके बाद की एक और ट्वीट पढ़ने पर लगा कि वो संपादकीय जिम्मेदारी निभाते-निभाते जल्दी से सहूलियत वाली दक्षिणपंथी विरोध की भूमिका चुन लेते हैं। उनका ट्वीट आता है - I repeat those who are writing anti Muslim tweets should be arrested. Unless they are put behind bars they will not change. Harmony is must. अब इस ट्वीट को देखने के बाद लगने लगता है कि वो सारी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के प्रवक्ता की जिम्मेदारी भी निभाने से चूकना नहीं चाहते। ऐसे माहौल में दंगा करना और दंगे की बात करना एक जैसा ही हो जाता है। लेकिन, किसके लिए। उनके लिए जिनके ऊपर दंगे का कोई असर नहीं होता या सकता। 

किसी भी दंगे में किसी की जान जाए ये दुखद है लेकिन, क्या दंगे और जान जाने में भी communal secular का फर्क हो जाता है। पता नहीं पत्रकार राजेश वर्मा का दंगों के कवरेज में मरना दंगा न दिखाने की नैतिक नीति में बदलाव लाता है या नहीं। हम भारतीय भी गजब हैं एक 2002 से @narendramodi कुछ के लिए राक्षस बन गए। हर दूसरे चौथे 2002 दोहराने वाले नियमित रक्षक। ऐसा क्यों? ये सवाल इसीलिए भी उठता है कि मुख्यमंत्री बनने के साथ ही दंगों को न्यौता देने वाली अखिलेश सरकार की बर्खास्तगी की मांग करने वाली पार्टियां भी सेक्युलरिज्म के नाम पर इसमें लगे हाथ बीजेपी की साजिश की जांच की मांग भी जोड़ देती हैं। ये जो दंगा हुआ ये एक अपराधिक घटना थी। जिसमें एक हिंदु लड़की के साथ छेड़खानी एक मुस्लिम लड़के ने किया। लड़की के भाइयों ने उस लड़के को मार दिया। फिर मारे गए लड़के के परिजनों ने लड़की के दोनों भाइयों को मार दिया। छेड़खानी और उसके बाद के किसी भी समय पर कानून व्यवस्था काबू करने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ राज्य सरकार की थी। इसके लिए जो खाप पंचायत बुलाई गई उसका भी आह्वान भारतीय किसान यूनियन और खापों ने मुख्य रूप से किया था। इसको समर्थन राजनीतिक वजहों से सिर्फ बीजेपी ने नहीं, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल ने भी दिया था। ये धार्मिक लड़ाई नहीं थी। न धार्मिक दंगा। ये पूरी तरह से अखिलेश सरकार की नाकामी है। 

मैं हिंदु हूं। पत्नी तीज का व्रत रखती है। उसी के साथ पूजा के लिए मंदिर गया था। दरअसल मैं पूजा तो कम ही कर रहा था। मुजफ्फरनगर की खबरें देख-पढ़ रहा था। आरती के बाद मंदिर के पुजारी ने ऊंचे स्वर में बोला और सबने दोहराया, मैंने भी। धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हो। आज ये काफी महत्वपूर्ण है।