आडवाणी जी मुश्किल तो है लेकिन ...

लालकृष्ण आडवाणी नहीं मानेंगे। किसी से नहीं मानेंगे। जनभावना से नहीं मानेंगे। पार्टी नेताओं से नहीं मानेंगे और यहां तक कि जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वो अपने जीवन की सारी उपलब्धियों की सबसे बड़ी वजह मानते हैं उस संघ की भी नहीं मानेंगे। लोगों को लग रहा है कि ये लालकृष्ण आडवाणी को हो क्या गया है। यहां तक कि एक समय में आडवाणी खेमे के कहे जाने वाले और नरेंद्र मोदी के खिलाफ बिहारी मोदी बनने वाले सुशील मोदी भी अब आडवाणी को नसीहत दे रहे हैं। लेकिन, आडवाणी मान नहीं रहे हैं। अगर हम पुराने वाकयों पर नजर डालें तो साफ समझ में आ जाएगा कि आडवाणी न माने हैं न मानेंगे। वरना तीन बार पार्टी से बाहर-अंदर न हुए होते। लालकृष्ण आडवाणी 5 दशक से भारतीय जनता पार्टी चला रहे हैं और इस लिए वो इस उम्र में भूल सा गए हैं कि पार्टी कोई फैक्ट्री नहीं है कि जिसको अच्छे से चलाने वाला उसका मालिक होता है। यहीं आडवाणी जी मार खा रहे हैं। पिछली बार भी आडवाणी ने जब 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले ही खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करा लिया था तब भी यही बात उनके खिलाफ चली गई थी। दिसंबर 2007 में ही हड़बड़ी में खुद को बीजेपी की ओर से पीएमइनवेटिंग घोषित करा लिया था। बिना किसी बहस के बीजेपी जो भी है उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बाद सबसे बड़ा योगदान अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का ही है। लेकिन, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी में एक मूल भिन्नता जो थी वो हिंदूवादी या उदारवादी छवि की तो थी ही। एक और बड़ी भिन्नता थी जो अब खुलकर सामने आ गई है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी पार्टी में खुली लामबंदी नहीं की और न ही पार्टी से ज्यादा खुद की निष्ठा वाले नेता तैयार किए। जबकि, लालकृष्ण आडवाणी ने ये खुलकर किया। आडवाणी जिद्दी इतने हैं कि अपने गुरु की सलाह भी उन्होंने नहीं मानी थी। शायद आडवाणी ये मानते थे कि बिना कॉकस के बड़ा होना बहुत मुश्किल है। और आडवाणी की ये सोच लंबे समय तक काम भी करती रही। लेकिन, 2009 में जब आडवाणी मनमोहन सिंह को बार-बार कमजोर कहने के बाद भी कमजोर हो गए। और, बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधन की जगह यूपीए फिर से सत्ता में आ गया तो लालकृष्ण आडवाणी के कॉकस को तोड़ने की संघ की कोशिश तेज हो गई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार की तरह दिखने वाले सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने तय कर लिया था कि अब चरित्र निर्माण की शाखा नए सिरे से लगानी ही होगी। संघ ने बड़े सलीके से ये किया। पहले नितिन गडकरी को ले आकर दिल्ली दरबार के डी 4 को तोड़ने की कोशिश की। लेकिन, गडकरी की कारोबारी शैली की राजनीति बीजेपी कार्यकर्ताओं को भी कम पची और उस पर आरोपों ने भी गडकरी की राह में गड्ढे कर दिए। लालकृष्ण आडवाणी को मौका मिल गया उन्होंने नितिन गडकरी के अलावा कोई भी वाली शर्त रख दी। और, जनभावना के लिहाज से समय-समय पर सटीक फैसले लेने वाले संघ ने भारी मन से गडकरी को दूसरा कार्यकाल नहीं दिया। लेकिन, सहमति के अध्यक्ष बने राजनाथ सिंह आडवाणी का सम्मान तो करते रहे लेकिन, कॉकस का हिस्सा नहीं बने। वो वही करते रहे जो सबको ठीक लगे और सबको इस समय तो नरेंद्र मोदी ही ठीक लग रहे हैं। इसीलिए गोवा में वो हो गया जो लालकृष्ण आडवाणी ने कभी सोचा भी नहीं था। आडवाणी गए और फिर लौटे।

लालकृष्ण आडवाणी लौटे लेकिन, तब तक तो अपनी शैली के बूते नरेंद्र मोदी औपचारिक तौर पर दिल्ली आ चुके थे। संसदीय समिति सदस्य के तौर पर और चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष के तौर पर। नरेंद्र मोदी की शैली ऐसी थी कि नरेंद्र मोदी ने कोई नेताओं का कॉकस नहीं बनाया लेकिन, समर्थकों का समूह बढ़ाते गए। और वो भी ऐसे समर्थक जो बीजेपी, संघ और हिंदू छवि की बात पर सिर्फ और सिर्फ मोदी को नेता मान रहा था। इसमें ऐसे समर्थक भी थे जो नरेंद्र मोदी की विकास यात्रा गुजरात से बाहर निकलकर पूरे देश में देखना चाह रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी कार्यकर्ता अब नरेंद्र मोदी के नाम पर थोड़ा भी पीछे हटने को  तैयार नहीं। ये सब स्वाभाविक तौर पर हो रहा है। हवा सब समझ रहे हैं। लेकिन आडवाणी जी अब समझने को तैयार नहीं। जबकि, वो नहीं माने तो त्यागी, संगठन के उस्ताद, हिंदुओं के गजब के नेता, अच्छे स्वयंसेवक- इन सब पर उनकी सत्तालोलुप आडवाणी वाली छवि भारी पड़ जाएगी। वही याद रहेगी। इसलिए आडवाणी जी मुश्किल तो है लेकिन, मान जाइए। मन मार के मान जाइए। सब ठीक रहा प्रणब दा की तरह रायसीना हिल्स के विशाल महल में रहने का मौका तो आपके पास रहेगा।