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Friday, March 14, 2014

चुनाव लाएगा अर्थव्यवस्था में तेजी

अंतरिम बजट में जब वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने छोटी कारों के साथ एसयूवी गाड़ियों पर भी एक्साइज ड्यूटी घटाने का एलान किया तो उसे बेहद कमजोर बिक्री आंकड़ों से मूर्छित सी हो रही ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को संजीवनी देने के लिहाज से देखा गया। खुद वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी यही दलाल देकर एक्साइज ड्यूटी घटाई। लेकिन, बजट अंतरिम भले था। बजट चुनावी भी था। इसलिए इसमें चुनावी वजह खोजना स्वाभाविक है। निजी तौर पर मुझे लगता है कि ऑटो इंडस्ट्री के साथ एसयूवी गाड़ियों पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपनी नेताओं की जमात का भी बड़ा भला किया है। ये कोई छिपा तथ्य नहीं है कि देश में ज्यादातर राजनेताओं की पहली पसंद एसयूवी कारें हैं। यानी वो गाड़ियां जो थोड़ी ऊंची और बड़ी होती हैं। जो आम जनता के बीच ही खास का अहसास देती है। खैर, भले ही वित्त मंत्री पी चिदंबरम के इस फैसले से नेताओं को चुनावी जरूरत के समय थोड़ी सस्ती एसयूवी मिले। लेकिन, इतना तो तय है कि अगर ये एसयूवी गाड़ियां थोड़ा कम दामों में भी बिकती हैं तो भले सरकारी खजाने में एक्साइज टैक्स के तौर पर कम रकम आए। इंडस्ट्री को इस फैसले से जरूर तेजी मिलेगी। और सिर्फ एक अंतरिम बजट के फैसले का ही सवाल नहीं है। दरअसल लंबे समय से आर्थिक स्थिरता की शिकार भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भारतीय लोकतंत्र का ये महोत्सव इकोनॉमिक स्टिमुलस के तौर पर दिख रहा है। लोकतंत्र के महोत्सव के बहाने भारतीय अर्थव्यवस्था को मिलने वाला ये स्टिमुलस यानी राहत पैकेज न सिर्फ अर्थव्यवस्था में तेजी लाएगा। बल्कि, नौजवान भारत की सबसे बड़ी समस्या यानी रोजगार के लिए भी बड़ी राहत का काम करेगा। चुनावी खर्च के तौर पर जो अनुमानित रकम भारतीय अर्थव्यवस्था में सिस्टम में आएगी। उसका अंदाजा लगाइए। ये रकम है तीस हजार करोड़ रुपये से ज्यादा। ये रकम 2008 की मंदी से उबरने के लिए उद्योगों के दिए गए हर तरह के राहत पैकेज से ज्यादा है। 2008 की मंदी से उबरने के लिए भारत सरकार ने कुल बीस हजार करोड़ रुपये के राहत पैकेज का एलान किया था। जो ज्यादातर उद्योगों को तरह-तरह की छूट और भविष्य की योजनाओं के लिए प्रोत्साहन के तौर पर दिया गया था। अब भारतीय लोकतंत्र के इस महोत्सव से तीस हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम अर्थव्यवस्था में शामिल हो जाएगी। 

ये रकम इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इसके लिए सरकार को अपनी दूसरी योजनाओं में कटौती नहीं करनी पड़ेगी और न ही जनता पर अलग से कई तरह के टैक्स का बोझ लादना पड़ेगा। और ये भी अच्छी बात है कि इस रकम का बड़ा हिस्सा वो काला धन होगा जिसका जिक्र भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी बड़े ठसके से इस तरह करते हैं कि काला धन देश में वापस आ जाए तो देश की सारी समस्या का हल हो जाएगा। दरअसल मैं ये मानता हूं कि देश के बाहर कितना काला धन है और वो कैसे आएगा ये अलग विषय लेकिन, देश के अंदर का काला धन अगर सिस्टम में ठीक से आ जाए तो देश का बड़ा भला हो जाए। मोटे तौर पर देश की 543 लोकसभा सीटों से कम से कम दो हजार महत्वपूर्ण प्रत्याशी चुनाव लड़ेंगे। और अगर ये माना जाए कि इनमें से हर प्रत्याशी औसत चार करोड़ रुपये भी खर्च करेगा तो कम से कम सिर्फ इन प्रत्याशियों के खर्च से ही सिस्टम में आठ हजार करोड़ रुपये से ज्यादा आ जाएंगे। जाहिर है इसमें पार्टियों के निजी खर्चे और स्टार प्रचारकों के ऊपर खर्च होने वाली रकम शामिल नहीं है। एक मोटे अनुमान के तौर पर दोनों राष्ट्रीय पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस के कम से कम 25 स्टार प्रचारक होंगे। जिनके लिए पार्टी निजी विमान किराए पर लेगी। इसका सीधा सा मतलब ये होगा कि सिर्फ निजी विमानों को किराए के तौर पर ही दोनों राष्ट्रीय पार्टियां चुनाव के दौरान बड़ी रकम निजी विमान चलाने वाली कंपनियों को देंगी। और देश की कई क्षेत्रीय पार्टियां भी इस मामले में राष्ट्रीय पार्टियों को टक्कर देती नजर आती हैं। चुनाव के समय देश के विज्ञापन उद्योग के लिए मुंह मांगी मुराद पूरी होने जैसा होता है। मोटे तौर पर देश के विज्ञापन उद्योग में कम से कम दो हजार करोड़ रुपये आते हैं। खबरें थीं कि इस चुनाव के लिए कांग्रेस की ओर से पांच सौ करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है। और भारतीय जनता पार्टी भी इसमें ज्यादा पीछे नहीं है। भारतीय जनता पार्टी का चुनावी विज्ञापन बजट करीब चार सौ करोड़ रुपये का बताया जा रहा है। यानी करीब एक हजार करोड़ रुपये तो सिर्फ कांग्रेस और भाजपा का ही चुनावी विज्ञापन बजट है। क्षेत्रीय पार्टियों के चुनावी विज्ञापन का बजट इसमें शामिल नहीं है।

सरकारों के लिए लोकसभा चुनाव का मौका अपनी उपलब्धियों को सबके सामने रखने के लिए सबसे उपयुक्त होता है। इसलिए केंद्र से लेकर सभी राज्य सरकार करोड़ो रुपये के अपनी उपलब्धियों का बखान करने वाला बजट का मुंह इसी समय खोल देते हैं। राजनीतिक दलों को इस समय ब्रांड मैनेजर से लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं को बड़ी फौज चाहिए होती है। पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं के अलावा बड़े पैमाने पर सभी पार्टियां लोगों को अपने चुनावी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए रकम देकर नियुक्त करती हैं। बार-बार ये भी खबरें आ रही हैं कि इस बार मुख्य धारा के मीडिया यानी प्रिंट, टेलीविजन से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका सोशल मीडिया यानी इंटरनेट पर संवाद के माध्यमों की होगी। इसके लिए राजनीतिक दल बाकायदा तकनीकी विशेषज्ञों को मोटी तनख्वाह पर रख रहे हैं। जिनका काम ही हर दिन उस रजनीतिक पार्टी के एजेंडे को हर रोज चर्चा में रखना और ज्यादा से ज्यादा लोगों को उससे जोड़ना होता है। राजनीतिक पार्टियां लोगों को नकद रकम या फिर उनकी सुविधाओं के लिए जो रकम अनाधिकृत तौर पर खर्च करती हैं उसका कोई अनुमान आज तक नहीं लग पाया है। लेकिन, ये माना जाता है कि चुनाव के समय पांच हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम भारत में बांट दी जाती है। इसमें चुनाव आयोग की तरफ से लोगों को जागरूक बनाने, चुनाव कराने के लिए खर्च की रकम शामिल नहीं है। भारतीय चुनावों में अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा रकम खर्च होती है। हाल में हुए अमेरिकी चुनावों में करीब बयालीस हजार करोड़ रुपये की रकम खर्च हुई थी। ये भारतीय लोकतंत्र के महोत्सव का समय है। भारत के शेयर बाजार में भी अचानक आई तेजी ने सेंसेक्स को बाइस हजार के पार पहुंचा दिया। उम्मीदें सबने इस चुनाव से लगा रखी हैं। कुछ उम्मीदें चुनाव के दौरान पूरी हो जाएंगी। कुछ चुनाव के बाद। लेकिन, मौका सबके लिए है। अब ये आपके ऊपर है कि आप इस मौके का इस्तेमाल किस तरह करते हैं। खैर, जो भी हो चुनाव का मजा लीजिए। लोकतंत्र के महोत्सव में शामिल होइए। और ऐसी सरकार चुनिए कि पांच साल बाद होने वाले चुनाव का अर्थव्यवस्था में तेजी के लिए हमारे देश को इंतजार न करना पड़े।
(इसी पर ऑस्ट्रेलिया के एसबीएस रेडियो से हुई मेरी बातचीत भी यहां सुन सकते हैं।)

Wednesday, February 05, 2014

बढ़ती भीड़, बढ़ता भाजपा का संकट!


सात लाख अस्सी हजार। मेरठ में रैली खत्म होने के बाद भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के मीडिया प्रभारी मनीष शुक्ला पत्रकारों को बता रहे थे कि जिस मैदान में नरेंद्र मोदी की रैली हुई। उसकी क्षमता सात लाख अस्सी हजार की थी। जाहिर है सारे पत्रकार मुस्कुरा रहे थे। क्योंकि, हम पत्रकारों को आसानी से इतनी बड़ी भीड़ का आंकड़ा हजम नहीं होता। एक पत्रकार ने कहा- तो डेढ़ दो लाख तो रही ही होगी ये मान लें। फिर जवाब आया- हमारी पिछली गोरखपुर की रैली ही 6 लाख से ज्यादा की थी। और ये तो उससे बहुत बड़ा मैदान है। इस मैदान की क्षमता ही करीब आठ लाख की है। अगर मंच, बैरीकेडिंग वगैरह हटा दें तो लगभग इतने लोग कम से कम माने जा सकते हैं। उस पर भी सबसे बड़ी बात ये कि रैली खत्म होने के बाद भी आने वालों को तांता लगा हुआ था। मेरठ भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी की कर्मभूमि भी है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी के लिए ये चुनौती थी कि अध्यक्ष के गृह जिले में नरेंद्र मोदी की होने वाली रैली पिछली सभी रैलियों से ज्यादा बड़ी हो। खुद नरेंद्र मोदी ने भी मंच से किसी रैली में कहा कि हमारी हर रैली पहले की रैली से बड़ी होती है। ये दबाव था जो लक्ष्मीकांत बाजपेयी के ऊपर रहा होगा। साढ़े दस बजे के आसपास मैं भी रैली स्थल पर पहुंचा और मीडिया के लिए बने सबसे आगे के इलाके में जाकर स्थापित हो गया। खास कोहरा था। मीडिया के कैमरे लग चुके थे। हर जगह की तरह दो सटे मंच भगवा रंग में रंगे हुए थे। सिर्फ मीडिया के पीछे बना ब्लॉक पूरी तरह से भरा हुआ था। उसके अलावा पूरा मैदान खाली था। हम मीडिया के लोगों को लग रहा था कि क्या आज कोहरा नरेंद्र मोदी की सभा चौपट करेगा। लेकिन, मजे की बात ये थी कि कोई भी भाजपा नेता चिंता में, भीड़ कहां से कितनी आ रही है। कितने बजे तक आएगी। ये सब पूछता चिल्लाता नजर नहीं आ रहा था। ये समझना मुश्किल हो रहा था कि रैली से तीन घंटे पहले लगभग खाली मैदान होने के बावजूद भाजपा नेताओं को चिंता क्यों नहीं हो रही है। टीवी मीडिया के लोग इस बात को लेकर ज्यादा तफ्तीश करते दिख रहे थे कि आखिर सत्यपाल सिंह मेरठ रैली में बीजेपी में शामिल हो रहे हैं या नहीं। भाजपा के नेता इसका जवाब ये दे रहे थे कि ये नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की रैली है। जिसको भाजपा में आना हो वो आए। हुआ भी यही सत्यपाल सिंह सहित कई लोग भाजपा में बेहद सामान्य तरीके से शामिल हो गए। वो भी नरेंद्र मोदी के आने से पहले ही। दरअसल भारतीय जनता पार्टी इस समय किसी को भी नरेंद्र मोदी के सामने शामिल कराकर उसका कद बहुत ऊंचा नहीं करना चाहती। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को ये पता है कि ये नरेंद्र मोदी की हवा है इसलिए सिर्फ नरेंद्र मोदी की ही चर्चा होनी चाहिए।

दोपहर के बारह बजते-बजते सूर्यदेवता कोहरे के कोप से बाहर निकलते दिखे और साथ ही रैली स्थल के हर प्रवेश द्वार से लोगों की भीड़ भगवा-हरे कमल निशान वाले झंडे लहराती नजर आने लगी। लेकिन, लग यही रहा था कि मेरठ में एकाध ब्लॉक खाली ही रह जाएंगे। लेकिन, जब एक बजे के बाद नरेंद्र मोदी की हेलीकॉप्टर सभा स्थल के ऊपर दिखा तो लगा जैसे हर कोई मेरठ के शताब्दी नगर मैदान (जिसे भाजपा ने शहीद मातादीन सभा स्थल का नाम दिया था) में पहुंच जाने के लिए हर कोशिश कर लेना चाहता है। टीवी कैमरों के लिए बने ऊंचे मंच से ये हलचल आसानी से देखी-महसूस की जा सकती थी। चार चक्कर लगाने के बाद नरेंद्र मोदी की हेलीकॉप्टर जब तक मैदान के पीछे बने हेलीपैड पर उतरता। तब तक मैदान में भीड़ का दबाव विशाल मैदान को छोटा साबित करने पर आमादा हो चुका था। लाउडस्पीकर टांगने के लिए बने लोहे के खंभों पर भाजपा के कार्यकर्ता चढ़े हुए थे। तीन-चार कार्यकर्ता तो एक ऐसे खंभे पर चढ़ गए जिसमें लाउडस्पीकर बंधा था और बिजली के तार भी उससे जा रहे थे। डबल बैरीकेडिंग होने के बाद भी लगातार दबाव इस तरह बढ़ रहा था कि डर लग रहा था कि कहीं भगदड़ न मच जाए। ये डर नरेंद्र मोदी को भी लग रहा था इसीलिए मोदी ने माइक संभालते ही हाथ जोड़कर कहा कि मेरठ के वीर पुरुषों को मेरा नमन। लेकिन, कृपया आप लोग खंभों से नीचे उतर आएं वरना कुछ अनर्थ हुआ तो हमारे लिए जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। नरेंद्र मोदी का भी प्रयास थोड़े समय बाद ही उन उत्साही वीर पुरुषों पर असर कर सका।

जिस तरह से नरेंद्र मोदी की रैलियों में भीड़ बढ़ रही है और बढ़ती भीड़ के लिहाज से सही संख्या का अनुमान लगाना और उससे भी बड़ा संकट पत्रकारों को बताना हो जाता है। ये संकट इतना बड़ा है कि पिछली कुछ रैलियों से पत्रकार भारतीय जनता पार्टी के लोगों से संख्या पूछते जरूर हैं लेकिन, इतनी भारी संख्या सुनकर उसका जिक्र करने का साहस नहीं कर पाते हैं। यानी अब किसी टीवी न्यूज चैनल या फिर अखबार में ये नहीं लिखा जाता कि नरेंद्र मोदी की सभा में कितनी अनुमानित भीड़ रही। अब एक लाख, दो लाख, तीन, पांच लाख तक तो चल गया लेकिन, उसके आगे संकट बढ़ता है। अब यही संकट मेरठ की रैली में दिखा था। इसलिए किसी भी मीडिया ने आठ लाख वाली भारतीय जनता पार्टी की भीड़ बताने का जोखिम नहीं उठाया। वैसे नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी तथ्यों और तैयारी के साथ ज्यादातर बातें करने लगी है। भाजपा नेता जोड़कर यही बता रहे थे कि दो लाख वर्ग मीटर से बड़ा मैदान था और पूरा मैदान भरा था। साथ ही अंतिम समय तक मैदान में किसी तरह पहुंच जाने के लिए लंबी लाइन लगी थी। अब ये तो था भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का दावा। लेकिन, मेरा खुद को जो कष्टप्रद अनुभव रहा उसे भी बताना जरूरी है। मैं मेरठ में नरेंद्र मोदी की भीषड़ भीड़ वाली रैली में शामिल था। मीडिया गैलरी में होने से किसी प्रकार के देहमर्दन कार्यक्रम से मैं बचा रहा। लेकिन, हर पल ये डर तो लग ही रहा था कि कहीं किसी ओर से बेहद उत्साही ये भीड़ बैरीकेडिंग तोड़कर हमारी गैलरी में भी न घुस जाए। सवा तीन बजे के बाद रैली खत्म हुई। हम लोग तेजी से निकलकर होटल पहुंचे। लेकिन, होटल से निकलकर तुरंत दिल्ली लौटने का साहस नहीं जुटा सके। मेरठ से दिल्ली का रास्ता पूरी तरह जाम दिख रहा था। होटल में करीब डेढ़ घंटे और बिताए। छे बजकर आठ मिनट पर होटल से निकले और पहले एक घंटे में चार किलोमीटर, दूसरे एक घंटे में पांच किलोमीटर और तीसरे एक घंटे में भी करीब पांच किलोमीटर ही दिल्ली की तरफ बढ़ पाए। कुल मिलाकर दिल्ली से मेरठ की करीब सत्तर किलोमीटर की दूरी तय करने में पूरे पांच घंटे लग गए। और इस सबकी वजह नरेंद्र मोदी की रैली थी। अब इस उत्साही भीड़ को रैलियों से संभालकर मतदान स्थल तक पहुंचाना बड़ी चुनौती है लेकिन, अगर नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी इसमें कामयाब हो गए तो सचमुच 2014 में भारतीय राजनीति का नया अध्याय शुरू होगा।

Monday, September 23, 2013

नितिन गडकरी नागपुर से चुनाव लड़ेंगे?

जमीन पर रहना-जाना जरूरी होता है। न्यूजरूम से जो पता चलता है वो न्यूजरूम जैसा ही होता है। मतलब चमकता और उस चमक में हकीकत अकसर साफ-साफ दिख नहीं पाती। अभी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के बुलावे पर वर्धा गया था। हिंदा ब्लॉगिंग व सोशल मीडिया पर दो दिन की राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठी थी। मेरा विषय था सोशल मीडिया और राजनीति।  इस संगोष्ठी और वर्धा विश्वविद्यालय की चर्चा आगे की पोस्ट में। अभी बात राजनीति की।
नागपुर में संघ मुख्यालय परिसर में
लौटते समय सोचा कि नागपुर कई बार आकर नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय तक जाना नहीं हो पा रहा है। इसलिए स्टेशन से पहले पहुंच गए रेशमबाग के संघ मुख्यालय यानी केशवराव बलिराम हेडगेवार स्मृति परिसर। शानदार परिसर। बहुत बड़ी इमारत। और परिसर में हेडगेवार की चमकती मूर्ति। रात का समय था और मोबाइल से तस्वीरें लीं। इसलिए उसकी भव्यता का उतना अंदाजा लगाना मुश्किल होगा। परिसर में जो सभागार है उसका नाम महर्षि व्यास सभागार है। शाम के आठ बज रहे थे। महर्षि व्यास सभागार के अंदर से आवाजें आ रहीं थीं। झाककर देखा तो शाखा लगी हुई थी। तस्वीर उतारने का मोह नहीं छोड़ पाया। ठीक-ठाक संख्या थी।

महर्षि व्यास सभागार में चल रही सायं शाखा
नागपुर संसदीय क्षेत्र में नागपुर दक्षिण पश्चिम, नागपुर दक्षिण, नागपुर पूर्व, नागपुर मध्य, नागपुर पश्चिम, नागपुर उत्तर- कुल 6 विधानसभा आती हैं। देवेंद्र फडनवीस नागपुर दक्षिण पश्चिम से विधायक हैं और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। नागपुर दक्षिण से विधायक दीनानाथ देवराव पडोले हैं जो कांग्रेस हैं। नागपुर पूर्व से विधायक कृष्णा खोपड़े हैं ये भी सीट बीजेपी के पास है। नागपुर मध्य से भी बीजेपी के ही विकास शांकरराव कुंभारे विधायक हैं। नागपुर पश्चिम पर भी भारतीय जनता पार्टी की कब्जा है विधायक हैं सुधाकर शामराव देशमुख और नागपुर उत्तर पर कांग्रेस पार्टी के विधायक हैं नितिन काशीनाथ राउत। (स्रोत- विकीपीडिया) लेकिन नागपुर संसदीय क्षेत्र की 6 में से 4 विधानसभा सीटें जीतने के बाद भी नागपुर ने सांसद कांग्रेस का चुना है। कांग्रेस के विलास मुत्तेमवार यहां से सांसद हैं। इसीलिए नागपुर सीट संघ के लिए छवि और प्रतिष्ठा का विषय है। इस बार चर्चा भी इस बात की है कि बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी यहां से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। इस बात की संभावना भी पूरी है।

लेकिन, नागपुर से दिल्ली लौटते समय केरल एक्सप्रेस में मिले गजानन कोषटवार ने मेरी और देश में जाहिर इस आम धारणा को तोड़ने की कोशिश की। गजानन कोषटवार नागपुर के मनीष नगर में रहते हैं, बीजेपी समर्थक हैं। बीना में रिफाइनरी में काम करते हैं। कहते हैं पिछले कुछ समय से वोट भी कर रहे हैं। लेकिन, वो कह रहे हैं कि नितिन गडकरी चुनाव नहीं लड़ेंगे। वजह। उन्होंने जो वजह बताई वो चौंकाने वाली और अविश्वसनीय है। गजानन का कहना था कि वो बीजेपी के भले हैं लेकिन, जब वोट देना होगा तो बनिया जाति के विलास मुत्तेमवार को ही वोट देंगे। हल्की मुस्कुराहट के साथ उन्होंने कहा कि यही हकीकत है। गजानन यहां तक कह गए कि विलास मुत्तेमवार और नितिन गडकरी के बीच बहुत गहरे संबंध हैं। मुश्किल है कि नितिन गडकरी विलास मुत्तेमवार के सामने चुनाव मैदान में आएं। मतलब या मुत्तेमवार लड़े तो गडकरी बीजेपी से प्रत्याशी नहीं होंगे। और, अगर नितिन गडकरी चुनाव लड़ते हैं तो विलास मुत्तेमवार कांग्रेस से टिकट नहीं लेंगे। हालांकि, उनकी ये दलील मेरे गले नहीं उतरती। क्योंकि, वो लगे हाथ ये भी कहते हैं कि इस बार नरेंद्र मोदी की वजह से समीकरण बीजेपी के पक्ष में हैं। इसलिए नितिन गडकरी के चुनाव न लड़ने की बात तो मुझे समझ में नहीं आती और एक आदमी की राय पर कुछ तय मानना पूरी तरह से गलत होगा। लेकिन, जब योगेंद्र यादव इतने सर्वे गलत करने के बाद अपनी पार्टी #AAP को खुद सर्वे करके जिता देते हैं और उसका जमकर प्रचार-प्रसार होता है तो, मुझे लगता है कि मेरा तो इसमें कोई हित नहीं जुड़ा इसलिए इसे लिख रहा हूं। हो सकता है सही हो।

Thursday, September 12, 2013

आडवाणी जी मुश्किल तो है लेकिन ...

लालकृष्ण आडवाणी नहीं मानेंगे। किसी से नहीं मानेंगे। जनभावना से नहीं मानेंगे। पार्टी नेताओं से नहीं मानेंगे और यहां तक कि जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वो अपने जीवन की सारी उपलब्धियों की सबसे बड़ी वजह मानते हैं उस संघ की भी नहीं मानेंगे। लोगों को लग रहा है कि ये लालकृष्ण आडवाणी को हो क्या गया है। यहां तक कि एक समय में आडवाणी खेमे के कहे जाने वाले और नरेंद्र मोदी के खिलाफ बिहारी मोदी बनने वाले सुशील मोदी भी अब आडवाणी को नसीहत दे रहे हैं। लेकिन, आडवाणी मान नहीं रहे हैं। अगर हम पुराने वाकयों पर नजर डालें तो साफ समझ में आ जाएगा कि आडवाणी न माने हैं न मानेंगे। वरना तीन बार पार्टी से बाहर-अंदर न हुए होते। लालकृष्ण आडवाणी 5 दशक से भारतीय जनता पार्टी चला रहे हैं और इस लिए वो इस उम्र में भूल सा गए हैं कि पार्टी कोई फैक्ट्री नहीं है कि जिसको अच्छे से चलाने वाला उसका मालिक होता है। यहीं आडवाणी जी मार खा रहे हैं। पिछली बार भी आडवाणी ने जब 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले ही खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करा लिया था तब भी यही बात उनके खिलाफ चली गई थी। दिसंबर 2007 में ही हड़बड़ी में खुद को बीजेपी की ओर से पीएमइनवेटिंग घोषित करा लिया था। बिना किसी बहस के बीजेपी जो भी है उसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बाद सबसे बड़ा योगदान अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का ही है। लेकिन, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी में एक मूल भिन्नता जो थी वो हिंदूवादी या उदारवादी छवि की तो थी ही। एक और बड़ी भिन्नता थी जो अब खुलकर सामने आ गई है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी पार्टी में खुली लामबंदी नहीं की और न ही पार्टी से ज्यादा खुद की निष्ठा वाले नेता तैयार किए। जबकि, लालकृष्ण आडवाणी ने ये खुलकर किया। आडवाणी जिद्दी इतने हैं कि अपने गुरु की सलाह भी उन्होंने नहीं मानी थी। शायद आडवाणी ये मानते थे कि बिना कॉकस के बड़ा होना बहुत मुश्किल है। और आडवाणी की ये सोच लंबे समय तक काम भी करती रही। लेकिन, 2009 में जब आडवाणी मनमोहन सिंह को बार-बार कमजोर कहने के बाद भी कमजोर हो गए। और, बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधन की जगह यूपीए फिर से सत्ता में आ गया तो लालकृष्ण आडवाणी के कॉकस को तोड़ने की संघ की कोशिश तेज हो गई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार की तरह दिखने वाले सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने तय कर लिया था कि अब चरित्र निर्माण की शाखा नए सिरे से लगानी ही होगी। संघ ने बड़े सलीके से ये किया। पहले नितिन गडकरी को ले आकर दिल्ली दरबार के डी 4 को तोड़ने की कोशिश की। लेकिन, गडकरी की कारोबारी शैली की राजनीति बीजेपी कार्यकर्ताओं को भी कम पची और उस पर आरोपों ने भी गडकरी की राह में गड्ढे कर दिए। लालकृष्ण आडवाणी को मौका मिल गया उन्होंने नितिन गडकरी के अलावा कोई भी वाली शर्त रख दी। और, जनभावना के लिहाज से समय-समय पर सटीक फैसले लेने वाले संघ ने भारी मन से गडकरी को दूसरा कार्यकाल नहीं दिया। लेकिन, सहमति के अध्यक्ष बने राजनाथ सिंह आडवाणी का सम्मान तो करते रहे लेकिन, कॉकस का हिस्सा नहीं बने। वो वही करते रहे जो सबको ठीक लगे और सबको इस समय तो नरेंद्र मोदी ही ठीक लग रहे हैं। इसीलिए गोवा में वो हो गया जो लालकृष्ण आडवाणी ने कभी सोचा भी नहीं था। आडवाणी गए और फिर लौटे।

लालकृष्ण आडवाणी लौटे लेकिन, तब तक तो अपनी शैली के बूते नरेंद्र मोदी औपचारिक तौर पर दिल्ली आ चुके थे। संसदीय समिति सदस्य के तौर पर और चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष के तौर पर। नरेंद्र मोदी की शैली ऐसी थी कि नरेंद्र मोदी ने कोई नेताओं का कॉकस नहीं बनाया लेकिन, समर्थकों का समूह बढ़ाते गए। और वो भी ऐसे समर्थक जो बीजेपी, संघ और हिंदू छवि की बात पर सिर्फ और सिर्फ मोदी को नेता मान रहा था। इसमें ऐसे समर्थक भी थे जो नरेंद्र मोदी की विकास यात्रा गुजरात से बाहर निकलकर पूरे देश में देखना चाह रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी कार्यकर्ता अब नरेंद्र मोदी के नाम पर थोड़ा भी पीछे हटने को  तैयार नहीं। ये सब स्वाभाविक तौर पर हो रहा है। हवा सब समझ रहे हैं। लेकिन आडवाणी जी अब समझने को तैयार नहीं। जबकि, वो नहीं माने तो त्यागी, संगठन के उस्ताद, हिंदुओं के गजब के नेता, अच्छे स्वयंसेवक- इन सब पर उनकी सत्तालोलुप आडवाणी वाली छवि भारी पड़ जाएगी। वही याद रहेगी। इसलिए आडवाणी जी मुश्किल तो है लेकिन, मान जाइए। मन मार के मान जाइए। सब ठीक रहा प्रणब दा की तरह रायसीना हिल्स के विशाल महल में रहने का मौका तो आपके पास रहेगा।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...