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Saturday, September 03, 2016

यूपी के 2.5 करोड़ स्मार्टफोन में कमल निशान चाहते हैं अमित शाह

उत्तर प्रदेश में अभी चुनाव आयोग ने कोई तारीख नहीं दी है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के तो प्रत्याशी भी तय नहीं हैं। इसलिए चुनावी हलचल जमीन पर बहुत ज्यादा नजर नहीं आती। लेकिन, सोशल मीडिया पर सितंबर महीने से भारतीय जनता पार्टी के लिए युद्धस्तर पर जुटने का वक्त है। और इसका आगाज खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह करेंगे। 3 सितंबर को लखनऊ के राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडकर ऑडीटोरियम में भारतीय जनता पार्टी सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट कर रही है। एक समय में वन बूथ ट्वेंटी यूथ का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी अब यूथ को पकड़ने के लिए बूथ की जगह स्मार्टफोन के रास्ते पर खड़ी है। स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाला कोई भी, खासकर नौजवान, छूटने न पाए। उत्तर प्रदेश में मई 2014 से आगे बढ़ने का अमित शाह का मंत्र यही है। इसीलिए अमित शाह के हवाले से कई बार ये खबर मीडिया में आती रही है कि विधानसभा चुनाव चाहने वाले से फेसबुक पर कम से कम 25 हजार लोग जुड़ होने चाहिए। ये उसी सोशल मीडिया मंत्र का विस्तार है। हालांकि, खुद अमित शाह बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं से सीधे मिलने के पारंपरिक तरीके में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन, सोशल मीडिया के इस युग में शाह को अच्छे से पता है कि अपनी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक आसानी से पहुंचाने का सबसे आसान और प्रभावी जरिया स्मार्टफोन है। इसीलिए उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के आईटी विभाग को साफ निर्देश है कि स्मार्टफोन वाले नौजवान को पकड़ने की रणनीति तैयार करें। इसी की विधिवत शुरुआत 3 सितंबर को सोशल मीडिया वॉलंटियर मीट से अमित शाह करेंगे। उत्तर प्रदेश के चुनाव में सोशल मीडिया भारतीय जनता पार्टी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि अभी तक नया प्रदेश अध्यक्ष आने के बाद कोई मीडिया मीट या कार्यशाला नहीं हुई है। जबकि, सोशल मीडिया की कई कार्यशालाएं पहले ही की जा चुकी हैं।

उत्तर प्रदेश में एक मोटे अनुमान के मुताबिक करीब डेढ़ करोड़ फेसबुक यूजर्स हैं। और व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब 5 करोड़ है। इसीलिए बीजेपी उत्तर प्रदेश में व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों को पकड़ने के ही चक्कर में है। बीजेपी का मानना है कि ढाई करोड़ व्हाट्सएप यूजर्स हैं जो बीजेपी के साथ जुड़ सकते हैं। इसीलिए इन्हीं ढाई करोड़ व्हाट्सएप यूजर्स के मोबाइल में कमल निशान पक्का बनाने की योजना पर बीजेपी काम कर रही है। बीजेपी से जुड़े व्हाट्सएप समूहों और फेसबुक पेज पर या फिर अपने ही फेसबुक अकाउंट से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में लिखने वालों की भी सूची तैयार की जा रही है। चाहे वो भारतीय जनता पार्टी से सीधे कार्यकर्ता के तौर पर जुड़े हों या न जुड़े हों। 3 सितंबर को होने लखनऊ में होने वाली सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट में ऐसे लोगों को शामिल करने पर ज्यादा जोर है, जो अभी तक बीजेपी से नहीं जुड़े हैं लेकिन, बीजेपी के पक्ष में नियमित तौर पर लिख रहे हैं। बीजेपी आईटी विभाग के मुताबिक, करीब 8 हजार लोगों ने अभी तक सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट के लिए पंजीकरण किया है। हालांकि, कुल पांच हजार लोगों के ही कार्यक्रम में शामिल होने की उम्मीद है। इन 5 हजार लोगों में से आधे से ज्यादा तो अभी भी बीजेपी से किसी न किसी तरह से जुड़े हुए हैं। इसीलिए नए आने वाले लोगों को बीजेपी अपने चुनावी अभियान में अच्छे से जोड़ने की योजना बना रही है। उत्तर प्रदेश बीजेपी आईटी विभाग के एक नेता का कहना है कि 25 से 45 साल के बीच के ज्यादातर स्मार्टफोन यूजर किसी राजनौतिक दल के कार्यकर्ता नहीं हैं। ऐसे लोग किसी बड़े नेता की रैली छोड़कर राजनैतिक कार्यक्रमों में कम ही शामिल होते हैं। क्योंकि, वो अपनी नौकरी, रोजगार में व्यस्त हैं या फिर पारिवारिक जीवन के मजे ले रहे हैं। लेकिन, फेसबुक और व्हाट्सएप पर अगर उनको राजनीतिक रूप से जोड़ा जाए, तो वो आसानी से सक्रिय हो जाते हैं। और पार्टी की नीतियों, केंद्र सरकार के कामों को नीचे तक ले जाने में मददगार होते हैं। 

सोशल मीडिया के जरिए सक्रिय लोगों के अपने पक्ष में होने का बड़ा फायदा अभी हाल के दिनों में बीजेपी को मिल चुका है। जब मुख्य धारा का मीडिया दयाशंकर सिंह के बेहूद बयान के खिलाफ पूरी पार्टी को लानत भेजने में लगा था। लेकिन, सोशल मीडिया पर एक ही दिन बाद दयाशंकर की बेटी और पत्नी को चेहरा बनाकर पूरा माहौल खड़ा कर दिया गया। बाद में पीछे से बीजेपी ने भी इस अभियान को जमकर समर्थन दिया। बेटी के सम्मान में, भाजपा मैदान में नारे के साथ बीजेपी भले सड़कों पर उतरी। लेकिन, ये नारा किसी बीजेपी नेता के दिमाग में नहीं उपजा था। ये नारा उसी सोशल मीडिया ब्रिगेड ने उछाला था जो, बीजेपी के लिए सोशल मीडिया पर स्वत:स्फूर्त तरीके से काम कर रही है। उसी ताकत को संगठित करने की योजना पर अमित शाह काम कर रहे हैं।
लखनऊ में हो रही सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट की जमीन पहले ही तैयार कर ली गई थी। यूपी बीजेपी ने काम के लिहाज से उत्तर प्रदेश को 6 क्षेत्रों में बांट रखा है। उन सभी 6 क्षेत्रों में आईटी विभाग कार्यशाला कर चुका है। ब्रज क्षेत्र में 2 कार्यशालाएं की गईं। 10 जुलाई को प्रदेश की एक कार्यशाला भी हो चुकी है। 3 सितंबर की सोशल मीडिया वॉलंटियर्स मीट के बाद बीजेपी प्रदेश की हर कमिश्नरी पर सोशल मीडिया कार्यशाला कराने की योजना बना रही है। औसतन 4 जिले पर एक कमिश्नरी है। उत्तर प्रदेश में कुल 18 कमिश्नरी हैं। साथ ही बीजेपी प्रदेश के हर विकास खंड में सोशल मीडिया यूनिट खड़ी करने की तैयारी कर रही है। विकासखंड को बीजेपी अपने काम के लिहाज से मंडल कहती है और प्रदेश में बीजेपी के 1500 मंडल हैं। 15 सितंबर तक बीजेपी इन सभी मंडलों में अपनी यूनिट बनाने की कोशिश कर रही है। इसके बाद ग्राम पंचायत तक पहुंच बनाने की कोशिश होगी। बीजेपी के रणनीतिकारों का ये भी मानना है कि शहरों की अपेक्षा गांव में सोशल मीडिया के जरिये बनाई गई पहुंचा का ज्यादा लंबा असर होता है। गांव में एक बार कोई सूचना लोगों तक पहुंचा दी गई, तो गांव के लोग नई सूचना आने तक उसी आधार पर बात करते हैं। इसलिए चुनाव पूरा होने तक व्हाट्सएप और फेसबुक के जरिये बीजेपी नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की अच्छाइयों से हर स्मार्टफोन भर देने की योजना पर काम कर रही है। 2017 का विधानसभा चुनाव जीतने का ये सबसे बड़ा नुस्खा है। 

Saturday, December 05, 2015

राजनीति में खेलिये, क्रिकेट में क्यों खेलते हैं नेताजी?

भाजपा सांसद युवा मोर्चा के अध्यक्ष और ‪#‎BCCI सचिव @ianuragthakur बड़ी मासूमियत से भारत-पाक सीरीज के पक्ष में बोल रहे हैं। उनके कहे का लिंक भी लगा रहा हूं। जो उन्होंने बार-बार ट्वीट किया है। जो वो कह रहे हैं वो इतना सीधा मासूम नहीं हैं। वो सीधे एक पक्ष हैं। इसलिए उनकी बात को गंभीरता से उतना ही लिए जाने की जरूरत है जितना सरकार उद्योग संगठनों की सुनती है और जैसे सुनती है। क्रिकेट जैसा उद्योग चूंकि सारे दलों के नेता मिलकर चलाते हैं। इसलिए ये चलता रहे। फिर चाहे भारत के पाकिस्तान से मानवीय और औद्योगिक रिश्ते कितने ही खराब रहें। क्योंकि, उससे सीधे-सीधे नेताओं का कुछ बुरा नहीं हो रहा। अब अगर पाकिस्तान से हमारे राजनयिक कारोबारी संबंध बेहतर नहीं हो रहे, तो क्रिकेट खेलकर कौन सी डिप्लोमेसी हो जाएगी। मैं निजी तौर पर किसी भी प्रतिबंध का विरोधी हूं। लेेकिन, अनुराग ठाकुर की मासूमियत में मुझे सारी पार्टियों का क्रिकेट कनेक्शन पैसे के ढेर पर भारतीय जनमानस की खिल्ली उड़ाता दिखता है। इसीलिए जब अनुराग कहते हैं कि सोशल मीडिया से ही हर बात तय नहीं की जा सकती। तो मुझे लगता है कि ये उस पार्टी का नेता कह रहा है जिसके पूर्ण बहुमत में ‪#‎SocialMedia का बड़ा हाथ है। जिस सरकार के नेता, मंत्री, सासद से लेकर छोटे नेता तक सोशल मीडिया पर बड़े से बड़ा हो जाना चाह रहे हैं। उस पार्टी के सांसद का ये कहना कि सबकुछ सोशल मीडिया से ही तय नहीं होना चाहिए। उस चेहरे को बेनकाब करता है। जिसमें सबके हित छिपे हुए हैं। फिर से कह रहा हूं कि मैं निजी तौर पर प्रतिबंध के खिलाफ हूं लेकिन, अब तय होना चाहिए कि भारत के नेताओं को धनधान्य से भरपूर रखने के लिए क्रिकेट डिप्लोमेसी हो रही है या फिर सचमुच इससे भारत-पाक के रिश्ते कभी सुधरते हैं। इसलिए फिलहाल तो मैं ‪#‎NoCricketWithPakistan कह रहा हूं। क्रिकेट डिप्लोमेसी की आड़ में नेताओं की अमरबेल की जड़ में मट्ठा पड़ना जरूरी है। पत्रकारिता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ही मैंने अनुराग ठाकुर के बयान का लिंक भी लगाया है। लेकिन, ये नेताजी लोग राजनीतति खेलते क्रिकेट क्यों खेलने लगते हैं। इनके बयान को सुनकर ये सीरीज कराने की आतुरता भी समझ में आएगी।

Thursday, September 26, 2013

वर्धा में जेएनयू !

महात्मा गांधी अंतरर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा दूसरी बार जाना हुआ। करीब दो साल पहले पहली बार वर्धा जाना हुआ था। नागपुर से वर्धा पिछली बार रेलमार्ग से ही गए थे। इस बार सड़क के रास्ते गए। उसकी कहानी अगली पोस्ट में। लेकिन, इस पोस्ट में बात सिर्फ वर्धा की। वर्धा वैसे तो महात्मा गांधी के सेवाग्राम आश्रम और विनोबा भावे के पवनार आश्रम के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन, अब इसकी प्रसिद्धि में एक और वजह जुड़ गई है महात्मा गांधी गांधी के नाम पर बना अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय। दुनिया में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए ये केंद्रीय विश्वविद्यालय बना है। जैसा मुझे पता है कि करीब चालीस करोड़ रुपए का बजट है। जब दो साल पहले हम यहां सोशल मीडिया पर बात करने के लिए गए थे तो विषय था- हिंदी ब्लॉगिंग की आचार संहिता। जाहिर है जब ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया है तो किसी तरह की आचार संहिता की बात तो मानी ही नहीं जा सकती। सिवाय स्वनियंत्रण के। लेकिन, कुछ बातें तय हुईं। उस समय हम लोगों को फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास में रुकने का अवसर मिला था। क्योंकि, तब विश्वविद्यालय के पास और कोई बेहतर जगह नहीं थी। ये छात्रावास विदेशी छात्रों के लिए है जो यहां रहकर हिंदी पर परास्नातक या शोध की पढ़ाई करना चाहते हैं।

2 साल पहले की तस्वीर पीछे छात्रावास बनने के क्रम में
विश्वविद्यालय तब बनने की प्रक्रिया में तेजी से आगे बढ़ रहा था। पहाड़ियों पर बसे इस विश्वविद्यालय में जिस तरह से प्रशासनिक भवन, छात्रावास, सभागार बना था। वो काफी खींचने वाला था। फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास से मुख्य द्वार की तरह जाएं तो दाहिने मुंशी प्रेमचंद के नाम पर बना रास्ता गांधी हिल्स की तरफ ले जाता है। गांधी हिल्स चढ़ने से पहले बाएं नजर डालेंगे तो नजीर हाट नजर आएगी। दो साल पहले  नजीर अकबराबादी के नाम पर बनी नजीर हाट नहीं थी। रही भी होगी तो, बस शुरुआत हुई थी। इस बार वो काफी व्यवस्थित बनी थी। उसमें हर जरूरत के सामान की दुकान थी। और, हिंदी में लिखे नाम आकर्षित करते हैं। एक दुकान पर कुंतल लिखा देखकर मैं भी सोच में पड़ गया कि ये किस काम की दुकान है। बाद में पूछकर समझा कि ये नाई की दुकान है। वहीं पर भरे पूरे दूध वाली कॉफी स्टील के बड़े मग जैसे कप में निपटाई गई।

मुंशी प्रेमचंद मार्ग घुमाव लेते हुए ऊपर चढ़ता है तो गांधी हिल्स पर पहुंचता है। अच्छा पार्क है। यहां गांधी जी की प्रतीक वस्तुओं से सजा पार्क बना हुआ है। ये सब दो साल पहले भी था। पार्क के द्वार पर ही लिखा है कि कृपया जूते-चप्पल उतारकर अंदर जाएं। हालांकि, सीमेंटेड खुरदुरी जमीन होने से ज्यादातर लोग (खासकर नियमित आने वाले छात्र) तो जूते चप्पल पहने ही अंदर आते हैं। हमने लिखे को पढ़ा, पढ़कर पालन किया। जूते-चप्पल उतार दिए।
हम ऐसे समय पहुंचे थे कि शाम धीरे-धीरे गहरी हो रही थी। दोनों तस्वीरें गांधी हिल की खूबसूरती बयां करती हैं। गांधी जी की प्रतीक झोपड़ी, गांधी जी का चश्मा, तीनों बंदर और दूसरी प्रतीक वस्तुएं भी बड़े सलीके से सजाई गई हैं। शाम गहराने लगी तो पार्क में लगे लैंप भी जल गए। हालांकि, तब तक शाम से रात नहीं हुई थी। लेकिन, इस गहरी शाम में जो चित्र आया वो भी अच्छा दृष्य पैदा कर रहा है ।


इस बार भी वर्धा में मिले हिंदयुग्म वाले शैलेष भारतवासी ने कहा कि कोई हिमांशु हैं यहीं शोध कर रहे हैं। उनसे मिलने का प्रयास काफी देर बाद सफल हुआ। क्योंकि, शैलेष उनके लखनऊ के नंबर पर प्रयासरत थे। काफी प्रयास के बाद हम मिले तो पता चला कि वहां का एक स्थानीय मोबाइल नंबर भी है। लेकिन, लखनऊ वाला नंबर जिंदा रखे हुए हैं। हम लोग नजीर हाट में मिले। उसके बाद मुख्य द्वार के बाहर की चाय की दुकान पर चर्चा चकल्लस का क्रम बढ़ा। टीन के डिब्बे चाय की दुकान पर बेंच कुर्सी की शक्ल में मिले। बैठे तो उन्होंने ये अहसास नहीं होने दिया कि वो असल में क्या हैं। हिमांशु नवल किशोर प्रेस के राष्ट्रीय चेतना में योगदान पर शोध कर रहे हैं। उर्दू भी सीख रहे हैं जो शोध के लिए जरूरी है। हिमांशु तहलका के लिए लिखते रहे हैं। इस चाय की दुकान से और हबीब तनवीर सभागार तक एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती रही कि यहां के बच्चे जाग रहे हैं। चेतना जागृत है। और इतनी कि जो ब्लॉगर साथी गए थे उनकी चेतना भी जगा रहे थे। इसीलिए किसी भी विश्वविद्यालय केंद्र पर जाना मुझे बहुत खींचता है। पता चला कि अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अलग-अलग विषयों पर पढ़ने शोध के काम में एक हजार से ज्यादा छात्र हो गए हैं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय छात्रों की उपस्थिति अभी कम है। इस पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय और कुलपति विभूति नारायण राय को काम करने की जरूरत है।

वैसे विभूति नारायण राय इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि 2 साल में ही उन्होंने विश्वविद्यालय का कायाकल्प कर दिया है। फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास में इस बार हम लोगों को छात्रों के कमरे घेरने की जरूरत नहीं पड़ी। हमें नई बनी नागार्जुन सराय में रुकाया गया। किसी होटल के कमरे जैसे अतिथि कक्ष थे। बाहर से एक तस्वीर ली थी वही यहां लगा रहा हूं। वहां विनोद कुमार शुक्ल जी से भी मुलाकात हुई। हम लोग जब सोशल मीडिया पर बात करने पहुंचे थे उसके ठीक पहले दुनिया भर के कवियों का जमावड़ा हुआ था। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर ही ढेर सारे मेरी पहचान में न आ पाने वाले कवियों की तस्वीरें चिपकी थीं। हालांकि, न पहचान का दोष मेरा है। क्योंकि, कविता और कवियों से मेरा वास्ता कम ही है।

तस्वीर में वो बात नहीं काफी बेहतर प्रस्तुति
हम लोगों की संगोष्ठी की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलगीत से हुई। और ये भी समझ में आया कि विश्वविद्यालय के छात्रों की रचनात्मकता जिंदा है। आकार प्रकार भी इस विश्वविद्यालय का पहाड़ियों पर बसे होने की वजह से दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की तरह है। और, काफी कुछ गतिविधियां भी। हालांकि, JNU दिल्ली में है। और लंबे समय से विशुद्ध वामपंथ का जमावड़ा रहा है। वैसे अच्छा ये होगा कि सिर्फ वामपंथ का जमावड़ा बनकर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय न रह जाए। जवानी में जितना वामपंथ हर किसी में होता है उतना तो जरूरी है। लेकिन इसे छोड़ भी दें तो और मामलों में भी वर्धा जेएनयू बनने की पूरी संभावना रखता है। इसका बड़ा श्रेय कुलपति विभूति नारायण राय को जाता है जो गालियां खाकर भी सोशल मीडिया वालों को बुलाने से बाज नहीं आते।  दो साहसी कदम कुलपति विभूति नारायण राय को और उठाने चाहिए। पहला रात दस बजे की छात्राओं पर पाबंदी हटाने की और दूसरा विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की शुरुआत करने की। उम्मीद करें कि एक और बेहतर विश्वविद्यालय तैयार होगा। 

Tuesday, September 24, 2013

इसके लिए रेल बजट का इंतजार क्यों करें ?

सोशल मीडिया को लेकर प्रधानमंत्री ने चिंता जताई है। कहा है कि आजादी भी बनी रहे और इसका दुरुपयोग भी न हो। हालांकि, दुखद ये है कि इस मीडिया को लेकर चिंताएं ज्यादा जताई जा रही हैं। ये कम ही बताया जा रहा है कि आखिर इस सोशल मीडिया या जिसको मैं नागरिक मीडिया कहना ज्यादा पसंद करूंगा वो कितना बेहतर है। और समाज को कितना बेहतर कर रहा है। अब मैं टीवी पत्रकार हूं लेकिन, टीवी के लिए खबर करने के लिए कई ढेर सारी औपचारिकताओं के बाद ही कोई खबर की जा सकती है। फिर समय भी अनुकूल हो ये भी देखना होगा। जैसे रेलवे की खामियों पर बात करनी है तो रेल बजट के आसपास ही ये खबर बेहतर बनेगी। क्योंकि, ट्रेन में गंदगी होती है। खाना ठीक नहीं मिलता। चद्दर, कंबल गंदे होते हैं इसे जानते सब हैं इसकी चर्चा रेल बजट के आसपास ही ठीक रहेगी। यानी रेलवे की कमियों को दूर करने का दबाव पारंपरिक मीडिया सिर्फ रेल बजट के आसपास ही बनाता है कुछ बहुत अलग हटकर न हो जाए। मतलब कोई बड़ी दुर्घटना या ऐसी ही मिलती जुलती खबर। लेकिन, सोशल मीडिया के जरिए हर कोई हर दिन दबाव बनाने में मदद कर सकता है। नागरिक मीडिया है तो उसके लिए पत्रकार होने की भी जरूरत नहीं।

शानदार सेवा की गारंटी देने वाला पैकेट
अभी दो संगोष्ठी-कार्यशाला में जाने का अवसर मिला। पहले भोपाल मीडिया चौपाल में और फिर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा। दोनों ही जगह बात सोशल मीडिया पर ही थी। और संयोग ये भी कि भोपाल से लौटते समय और नागपुर जाते समय बैंगलोर राजधानी की यात्रा करनी पड़ी। चादर वाली पैकेट पर इतनी अच्छी बातें लिखी थी कि लगा राजधानी का मजा ही कुछ और है। वैसे तो चार साल मुंबई-दिल्ली खूब राजधानी का मजा लिया और लगा कि अगर ऐसी राजधानी हो जाए तो देश में लोगों की यात्रा कितनी सुखद हो जाए। ऐसा ही अनुभव इलाहाबाद जाने में दिल्ली से हावड़ा जाने वाली सारी राजधानियों में भी लगा। लेकिन, बैंगलोर राजधानी ने राजधानी की शानदार यात्रा का सारा भ्रम तोड़कर रख दिया। पहले भी करीब दो साल पहले बैंगलोर राजधानी का सफर अंग्रेजी का सफर हो गया था। भोपाल से दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन के लिए हो या हजरत निजामुद्दीन से नागपुर के लिए दोनों ही यात्रा एक ही जैसी खराब अनुभव वाली रही। ट्रेन में बैठने के बाद चाय मांगने पर उसका जवाब आया सारी भट्ठियों पर खाना बन रहा है तो मुश्किल है चाय मिलना। वो मुश्किल ऐसा रहा कि सुबह के पहले चाय नहीं मिली। खाने की क्वालिटी को लेकर तो मुझे दूसरी राजधानियों में शिकायत रही है लेकिन, बैंगलोर राजधानी का खाना तो न खाने लायक है। राजधानी के चिर परिचित मोटे पराठे की जगह पतली रोटी दिखी तो खुशी हुई। लेकिन, खुशी काफूर हो गई। क्योंकि, रोटी कच्ची थी। पहले कौर के बाद गले से नीचे उतारने की हिम्मत नहीं हुई। चावल सब्जी खाई। दही खाई।

बैंगलोर राजधानी की दाग वाली चादर

पैकेट में से चद्दर निकाली कि अब सोया जाए तो चद्दर सफेद कहने को ही थी। उसे पीलिया सा हुआ लग रहा था। सर्विस करने वाले को बुलाया तो उसने पहले तो अचरज जताते हुए कहा कि ये कहां गंदा है। फिर जब मैंने गुस्से में चादर बदलने को कहा तो उसने पैकेट बदलकर दे दिया। लेकिन, नतीजा खास नहीं निकला। बदली हुई चद्दर की तस्वीर यहां लगा रहा हूं। लगता ऐसे था जैसे हर बार बस प्रेस करके उसे फिर से पैक करके यात्रियों को राजधानी में दे दिया जाता था। ये यात्रा थी भोपाल से हजरत निजामुद्दीन की। कंबल से ऐसे धूल गिर रही थी जिसे देखकर समझने के लिए दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं थी। मतलब जब खरीदा गया था तबसे कभी उसकी साफ सफाई की जरूरत नहीं समझी गई। और, सबसे बड़ी बात कि जब मैं इन बातों पर नाराज हो रहा था। तो, दूसरी ट्रेनों से ज्यादा टिकट की रकम देकर बैंगलोर राजधानी में चलने वाले यात्रियों के माथे सिकुड़ रहे थे कि ये क्यों बेकार में बहस कर रहा है रात भर की तो यात्रा है। यही यात्री होंगे रेल बजट के समय टीवी कैमरे पर गजब का गुस्सा दिखा रहे होंगे।

खैर कुछ खाने से पहले जब ट्रेन के टॉयलेट की तरफ गया तो मन और अच्छा हो गया। सामान्य ट्रेनों के स्लीपर क्लास में तो इस तरह की गंदगी आमतौर पर दिख जाती है। लेकिन, किसी राजधानी में इस तरह की गंदगी मैंने इसके पहले नहीं देखी। देखी भी थी तो दो साल पहले बैंगलोर राजधानी में ही। टॉयलेट के सामने काफी गंदगी दिख रही थी। और टॉयलेट के अंदर जाने के साहस को कम कर रही थी। लेकिन, कुछ शंकाएं ऐसी होती हैं जिनका समय पर निवारण होना जरूरी होता है।
इसलिए खराब होते मन के साथ ट्रेन के टॉयलेट का दरवाजा खोलकर उसमें घुस गया। अंदर से टॉयलेट बंद करने की कोशिश की तो देखिए क्या हुआ। ये राजधानी का टॉयलेट था। अब चादर देना, सफाई का काम और खाना-चाय, ये सब तो रेलवे ने पूरी तरह से निजी हाथों में दे रखा है। कुछ भी कहने पर ठेकेदार से बात कीजिए। हम क्या करें का रुदन सेवा करने वाले लोग दे देते हैं। लेकिन, टॉयलेट भी क्या पूरी तरह से रेलवे ने ऐसा निजी हाथों में दे रखा है कि तय मानक वाली सिटकनी भी न लगे।

अब ये सब टीवी-अखबार वाली मीडिया में तो रेल बजट के समय ही लिखा-दिखाया जाएगा। और काफी संसाधन भी इस स्टोरी को करने पर खर्च होगा। सोशल मीडिया या नागरिक मीडिया में मेरी तरह हर कोई ये रिपोर्टिंग रोज कर सकता है। रोज-रोज इसकी रिपोर्टिंग होगी तो शायद कुछ असर भी हो। शायद ऐसे ठेकेदारों का ठेका भी रद्द हो। बैंगलोर की कोई अकांक्षा एंटरप्राइजेज के पास इसका ठेका अभी है। चादर कंबल वाला पैकेट किसी पैरामाउट गारमेंट से आया था। ये भी बैंगलोर की ही थी। मुझे ये भी आश्चर्य हो रहा था कि आखिर राजधानी में चलने वाले लोग इसका विरोध क्यों नहीं करते। इस मामले पर अराजक क्यों नहीं होते।

नागपुर से वापसी में ये समझ में आ गया। वापसी में मेरा आरक्षण केरल एक्सप्रेस में था। सेकेंड एसी में होने से मैं आश्वस्त था कि यात्रा सुखद रहेगी। बोगी में घुसते ही गंदगी ने मेरा स्वागत किया। मेरी सीट एकदम दरवाजे के पास थी। और, दरवाजे के पास जाने कहां से या शायद एसी से ही निकलकर पानी चू रहा था और लोगों के आने जाने से अच्छी कीचड़ वाली गंदगी दरवाजे पर ही जमा हो गई थी। सीट और उसके आसपास फिर सफाई की उम्मीद ही दिमाग में नहीं रह गई थी। और, इस नाउम्मीदी को पूरी तरह से केरल एक्सप्रेस की गंदगी ने समर्थन किया। खैर टीटीई आया। टिकट चेक कराया। मैंने स्टेशन पर पता कर लिया था कि केरल एक्सप्रेस में पैंट्री कार है। आश्वस्त था कि खाना मिल जाएगा। लेकिन, ट्रेन की हालत देखकर दोबारा आश्वस्त होना चाहा। टीटीई ने कहा - अरे अब तो सब बंद हो गया होंगा। फिर थोड़ा रुककर बोला नहीं अभी तो साढ़े आठ ही बजा है ना मिलेंगा-मिलेंगा। अभी वो ऑर्डर लेने आएगा।
केरल एक्सप्रेस के टॉयलेट की छत
लेकिन, थोड़ी देर बाद ही दोबारा आश्वस्त होना भी भ्रम साबित हो गया। चिप्स का पैकेट और कोल्डड्रिंक की बोतल लिए आ रहे यात्री ने बताया कि कुछ बचा नहीं है। बस यही है। स्टेशन पर फ्लेवर्ड मिल्क तो पी लिया था लेकिन, वो खाने की जगह तो ले नहीं सकता था। इसलिए जल्दी से पैंट्री कार की तरफ बढ़ा। सेकेंड एसी के दो डिब्बे फिर थर्ड एसी के कई डिब्बे फिर स्लीपर के दो डिब्बे और फिर पैंट्री कार। पैंट्रीकार में पुलिसवाले पैंट्री वालों से मुफ्त का खाने के लिए लड़ रहे थे। दारू फुल थी। मामला दोनों ओर से टाइट था। पैंट्रीवाला भी दारू के नशे में पुलिस की वर्दी के रोब में जरा भी आने को तैयार नहीं था। खत्म होते सामान में से चिप्स, बिस्किट, पानी और एक जूस की बोतल लेकर मैं जल्दी से अपने कूपे में आ गया। और जब केरल एक्सप्रेस के टॉयलेट में गया तो साफ हो गया कि आखिर इसी रूट पर बैंगलोर राजधानी में यात्रा करने वाले खुशी से सफर क्यों करते हैं। अराजक क्यों नहीं होते।

Friday, September 20, 2013

भारतीय राजनीति को बदल रहा है सोशल मीडिया

मगांअंहिंविवि में सोशल मीडिया व राजनीति सत्र का संचालन करते हुए
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी और कार्यशाला में पहले दिन का आखिरी सत्र सोशल मीडिया और राजनीति पर। इस सत्र के संचालन मुझे ही करना है तो बहुत सी बातें जो मेरे दिमाग में हैं वो शायद पूरी तरह से कहना संभव नहीं होगा। इस लिहाज से मैंने जो लेख तैयार किया था। उसे यहां चिपका रहा हूं।

बहुत समय से भारत में ये बात बार-बार उठ रही थी कि क्या भारत में भी चुनावों में अमेरिकी चुनावों की तर्ज पर नेताओं को आमने सामने बहस करनी चाहिए। लेकिन, ये बात जितनी मजबूती से उठती थी उतनी ही मजबूती से खारिज भी हो जाती थी कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव का तरीका अलग है। यहां विधानसभा और संसद सदस्यों के चुनाव से आखिर में कोई राज्य का मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुना जाता है। सभी दल इस छद्म व्यवहार को ही असलियत का जामा पहनाने की हर संभव कोशिश करते हैं। इसीलिए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री घोषित करने की परंपरा नहीं रही भले ही वो लगभग तय होता हो। लेकिन, तकनीक ने इन छद्म व्यवहार करने वाले राजनीतिज्ञों के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। ये तकनीक आई सोशल मीडिया की। जिसे ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग या दूसरे प्रचलित सामाजिक माध्यमों के जरिए जाना जाता है। ये सोशल मीडिया राजनीति का नक्शा बदलने के लिए तैयार है। और, कांग्रेस बार-बार ये स्थापित करने की कोशिश करती रहती है कि स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते @pitrodasam की दूरदृष्टि ही थी जिसने भारत को इक्कीसवीं सदी में पहुंचाया। इक्कीसवीं सदी में पहुंचाने से उनका मतलब कंप्यूटर युग में था। हालांकि, इक्कीसवीं सदी अब कंप्यूटर के माउस को कब का दरकिनार करके स्मार्टफोन और टैबलेट के जरिए देखी जा रही है। और इसे इस्तेमाल करने वाला वो नौजवान है जो पिछले 2 दशकों में राजनीति के लिए तैयार तो हो गया था (उम्र 18 के पार जा पहुंची) लेकिन, राजनीति के लिए तैयार नहीं था न ही वोट डालने के लिए। लेकिन, इंटरनेट से युक्त स्मार्टफोन और टैबलेट राजनीति बदलने का साधन बनते दिख रहे हैं औऱ इसे बदलने के लिए आगे आ रहा है वही सोया हुआ नौजवान।

कांग्रेस भले ही ये स्थापित करने की कोशिश करे कि इक्कीसवीं सदी में वही देश को लेकर गई। लेकिन, इक्कीसवीं सदी में पहुंचे देश के नौजवान को सबसे सलीके से साधने में कामयाब होते दिख रहे हैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी। नरेंद्र मोदी देश के ऐसे राजनेता बने जिन्होंने नौजवान को उसके मौज मस्ती वाले अड्डे यानी सोशल मीडिया पर जाकर धर लिया और ऐसा पकड़ा कि देश के ज्यादातर राजनेताओं को नौजवानी के मस्त अड्डे सोशल मीडिया पर जाना पड़ रहा है। हालांकि, कांग्रेसी नेता और यूपीए मंत्री शशि थरूर नरेंद्र मोदी से पहले से ट्विटर पर हैं और यूनाइटेड नेशंस में अहम पद पर रहे शशि थरूर की फॉलोइंग भी भारतीय नेताओं में सबसे ज्यादा थी। लेकिन, शशि थरूर का ट्विटर अकाउंट बेहद निजी था। उसे अभियान के तौर पर राजनीतिक इस्तेमाल करना सीखा नरेंद्र मोदी ने। और यही वजह रही कि जब शशि थरूर से ज्यादा फॉलोअर नरेंद्र मोदी के ट्विटर अकाउंट के हुए तो बीजेपी और नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया समर्थकों ने इसका जमकर जश्न मनाया। अभी नरेंद्र मोदी के ट्विटर पर बीस लाख से ज्यादा समर्थक हैं। और, शशि थरूर के करीब 18 लाख। ये फर्स्ट मूवर एडवांटेज यानी शुरू में ही इस अड्डे पर अपने राजनीतिक फायदे के लिए पहुंचने का फायदा @narendramodi को होता दिख रहा है। @narendramodi इस सोशल मीडिया के अड्डे पर पहले पहुंचे साथ ही वो तेजी से बदलती तकनीक के साथ खुद की पहुंच बढ़ाने के लिए भी ढेर सारे बदलाव करते रहे। मोदी ट्विटर पर अब हिंदी, उर्दू के अलावा मराठी, उड़िया, बांग्ला, तमिल, असमिया, कन्नड़, मलयालम में ट्वीट करते हैं। जाहिर है इसके लिए उनकी एक पूरी आईटी आर्मी है जो ये काम करती है। इसके अलावा नरेंद्र मोदी फेसबुक पर अब रिकॉर्ड बनाने के लिए मोदी के सोशल मीडिया रणनीतिकार उनके समर्थन में बने अलग-अलग पन्नों को एक साथ जोड़ देने की कोशिश में लगे हैं। इसके लिए वो फेसबुक के मुख्यालय में बात कर रहे हैं जिससे मोदी के समर्थकों की प्रभावी संख्या एक ही पन्ने पर नजर आने लगे। सोशल मीडिया राजनीति बदल रहा है इसके तरीके भी। पहले चुनाव आते ही शानदार नारे गढ़े जाने लगते थे। एक-दो शानदार नारे से पूरे चुनाव की नैया पार हो जाती थी। लेकिन, सोशल मीडिया की लड़ाई एक दो नारों से नहीं चल सकती। हालांकि, इसमें भी कोई एक दो सटीक हैशटैग लड़ाई को शानदार बना देते हैं। राहुल गांधी के लिए बीजेपी समर्थक ट्विटरबाजों के #pappu के इस्तेमाल से परेशान कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम ने नरेंद्र मोदी के लिए #feku हैशटैग को प्रचलित करने की कोशिश की और ये दोनों कोशिशें सोशल मीडिया की राजनीति में जमकर सफल हुई हैं। ये आज के सबसे चर्चित हैशटैग हैं। और, ये चरम पर तब पहुंचा था जब देश के दो सबसे बड़े उद्योग संगठनों CII और FICCI ने राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी को हफ्ते भर के भीतर ही अपने मंचों पर बुलाया। राहुल गांधी CII की एजीएम में आए तो, नरेंद्र मोदी FICCI की महिला शाखा के कार्यक्रम में।

सोशल मीडिया के जरिए राजनीति कैसे बदल रही है इसका अंदाजा सरकारों को भी लग रहा है। देश की ज्यादातर सरकारें अब सोशल मीडिया के जरिए तुरंत अपनी उपलब्धि या फिर अपने खिलाफ दुष्प्रचार को खारिज करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए मौनी बाबा जब सरकार की छवि को गर्त में पहुंचाने लगा तो, प्रधानमंत्री कार्यालय का सोशल मीडिया अवतार हुआ और @PMOIndia के जरिए प्रधानमंत्री कार्यालय से सरकार की उपलब्धियों का जमकर बखान किया जाने लगा। हालांकि, @PMOIndia विवादों में भी रहा कि कई ट्विटर अकाउंट्स को उसने इसलिए ब्लॉक कर दिया कि वो सरकार के लिए अप्रिय स्थितियां पैदा कर रहे थे। हाल ये कि @PMOIndia के ब्लॉक करने को भी कई ट्विटरबाज अपने ट्विटर प्रोफाइल पर किसी सम्मान जैसा चमकाए रखे हैं। सरकार के हर मंत्रालय की उपलब्धियां उस मंत्रालय के ट्विटर हैंडल के अलावा @PIB_India पर भी चमकने लगी हैं। प्लानिंग कमीशन का ट्विटर हैंडल @PlanComIndia तो बाकायदा नौजवानों को जोड़ने के लिए उनसे पंचवर्षीय योजना पर टिप्पणियां मांगने लगा।

राजनीति में सोशल मीडिया का महत्व किस कदर बढ़ गया है इसका अंदाजा एक छोटी सी बात से लगाया जा सकता है। यूपीए 2 के एक बेहतर मंत्री अजय माकन चुनाव से ठीक पहले इस्तीफा दे देते हैं। अजय माकन अब कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के इंचार्ज हैं। @ajaymaken के ट्विटर प्रोफाइल पर ये दर्ज है। नरेंद्र मोदी के सोशल मीडिया अभियान को रोकने के लिए अजय माकन की कांग्रेसी सोशल मीडिया ब्रिगेड हरसंभव कोशिश में लगी है। हैशटैग्स के जरिए नारों की तरह सोशल मीडिया की लड़ाई में हैदराबाद रैली के दिन कांग्रेसी ब्रिगेड #FaekuExpress को टॉप ट्विटर ट्रेंड में दर्ज कराने में कामयाब रही। हालांकि, इसके जवाब में बीजेपी आईटी सेल ने #PappuPassenger को भी ट्विटर ट्रेंड बनाने की भरसक कोशिश की। नरेंद्र मोदी समर्थकों के लिए सुकून की बात ये थी कि ज्यादातर समय ट्विटर का नंबर वन ट्रेंड #NaMoInHyd ही रहा। लेकिन, नरेंद्र मोदी जब हैदराबाद की रैली के बाद हर तरफ से तारीफ पा रहे थे तो अजय माकन का ये दिलचस्प ट्वीट आया

Why is #fakuexpress trending at number one? Has it something to do with some other wrong figures and lies feted out in hyderabad today?

अजय माकन के इस ट्वीट को 128 रीट्वीट मिले और 23 लोगों का ये पसंदीदा ट्वीट बना। लेकिन, जरूरी नहीं कि सारे रीट्वीट अजय माकन के साथ ही हों। 128 रीट्वीट में से एक दिलचस्प जवाब सुन लीजिए-

Interesting @ajaymaken’s role has been reduced to checking twitter trends. That’s  what happens when all that u do is to please 1 dynasty.

हैदराबाद की इस रैली का सबसे ज्यादा प्रचार-प्रसार भी सोशल मीडिया पर ही हुआ। आंध्र प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष और अंबरपेट विधानसभा से चुने गए जी किशन रेड्डी @kishanreddybjp ने कई महीने पहले से ही नरेंद्र मोदी की हैदराबाद रैली के लिए समां बांधना शुरू कर दिया था। किशन रेड्डी खुद भी ट्विटर पर अत्यंत सक्रिय हैं। जिस तरह से धरातल की राजनीति में किसी बड़े नेता के नीचे उससे कम प्रभाव वाले नेताओं की उसी लिहाज से सीढ़ी बनती है। वैसा ही सोशल मीडिया के राजनीतिक धरातल पर हो रहा है। नरेंद्र मोदी या फिर कांग्रेस समर्थकों की फॉलोअर संख्या ये बताती है कि कौन कितना तगड़ा प्रचार इस जमीन पर चला पा रहा है और उसको कितना समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा राजनेताओं को नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता के बाद लगा। कई लेखों में तो 2014 के चुनाव से पहले ही नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया का प्रधानमंत्री तक कह दिया गया। लेकिन, अब नरेंद्र मोदी या दूसरे नेताओं को सोशल मीडिया प्रभाव के अलावा तथ्य भी जुड़ने लगे हैं। एक सर्वे कह रहा है कि देश की 160 संसदीय सीटों पर सोशल मीडिया यानी वही 18 साल से ऊपर का स्मार्टफोन, टैबलेट वाला नौजवान तय करेगा कि संसद कौन पहुंचेगा। यही वजह थी कि गोवा में बीजेपी की लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बनने के बाद जब पहली बार नरेंद्र मोदी मुंबई पहुंचे तो, उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों से साफ कहा कि उन्हें 48 लाख सोशल मीडिया आईडी चाहिए। महाराष्ट्र में कुल 48 लोकसभा सीटें हैं। यानी हर लोकसभा सीट से एक लाख सोशल मीडिया आईडी। यानी एक लोकसभा में एक लाख लोगों तक मोदी एक झटके में अपनी बात पहुंचाने की तरकीब का बेहतर से बेहतर इस्तेमाल करना चाहते हैं।

सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा पिछले कुछ समय से सबको लग रहा है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव तब दिखा था जब अप्रैल 2011 में पहले जंतर मंतर और उसके बाद रामलीला मैदान से अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी लड़ाई छेड़ी थी। उस समय टीम अन्ना का सबसे बड़ा चेहरा अरविंद केजरीवाल थे। और भारतीय इतिहास में ये सबसे बड़ा आंदोलन साबित हुआ जो पूरी तरह से सोशल मीडिया की जमीन पर पाला पोसा गया था। हालांकि, उस समय इस आंदोलन के पूरी तरह से सामाजिक होने की बात थी। जो मेरा खुद का भी अनुमान था। लेकिन, धीरे-धीरे अरविंद की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने अन्ना हजारे के सामाजिक आंदोलन को अकेला कर दिया। उसके पीछे की बड़ी वजह भी यही रही कि अन्ना हजारे की अपील थी है लेकिन, अन्ना अपनी बात उस वर्ग तक नियमित पहुंचाने का साधन नहीं खोज पाए जो उनके लिए रामलीला मैदान में 13 दिन तक डटा रहा था। और जब सोशल मीडिया के जरिए आने वाली भीड़ बंद हुई तो टीवी का कैमरा और अखबार की कलम भी अन्ना से हट गए। भारतीय राजनीति को उसी समय सोशल मीडिया की जोरदार अहमियत का अंदाजा हुआ था। अन्ना की टीम से राजनीति के मैदान में पूरी तरह से कूद चुके अरविंद केजरीवाल की असल ताकत अभी भी भी सोशल मीडिया पर अपने लोगों तक पहुंचना और जुड़े रहना है।

सोशल मीडिया पर राजनीति का वाकया जम्मू कश्मीर से भी जुड़ा है जब आडवाणी ने ब्लॉग पर धारा 370 के खिलाफ लिखा। ट्विटर पर पूरी तरह से सक्रिय कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला लालकृष्ण आडवाणी को चुनौती देने वाले अंदाज में आ गए। उसके बाद अभी किश्तवाड़ में हुई हिंसा की भी असल खबरें पहले सोशल मीडिया के जरिए ही आईं। उसके बाद ही मुख्य धारा के मीडिया में ये खबरें दिखनी शुरू हुईं। ट्विटर पर लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बीच विवाद टीवी चैनलों की सुर्खियां बना और अगले दिन अखबारों की। फास्ट फूड वाली जेनरेशन के समय सोशल मीडिया नौजवानों के लिए फास्ट फूड की तरह है। फास्ट फूड जैसे हर चौराहे पर वैसे ही सोशल मीडिया की खबर हर स्मार्टफोन, टैबलेट पर।

जिस तरह से असल राजनीति में कीचड़ उछालने और छवि खराब करने का खेल चलता है वो यहां सोशल मीडिया में भी है। जो पसंद नहीं या जिसकी छवि खराब करनी हो उसके नाम से एक आईडी बनाओ और उसी से उसका मजाक बनाओ। कांग्रेसी खेमे खासकर राहुल, सोनिया को सबसे ज्यादा परेशान करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ट्विटर पर भी यही काम जोर शोर से कर रहे हैं। अब @swamy39 बीजेपी में शामिल हो गए हैं। तो, कांग्रेस खेमे ने @BJPShooSwamy के नाम से एक अकाउंट बनाकर उनका छवि बिगाड़ने का अभियान छेड़ रखा है। कुल मिलाकर सोशल मीडिया भारतीय राजनीति को बदल रहा है लेकिन, बहुत सी बातें पुरानी राजनीति की यहां नए रंग में देखने को मिलेंगी।

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  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...