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Monday, May 04, 2020

खोदा पहाड़, निकली चुहिया

राहुल-रघुराम की बातचीत से निकला क्या ?

दुनिया के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने चाइनीज वायरस के संकट के दौर में शिकागो से दिल्ली में केरल के वायनाड से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी से बातचीत की। बाकायदा कांग्रेस ने बड़ी तैयारी के साथ इस बातचीत को पहले से प्रचारित किया था। सबको इसकी प्रतीक्षा थी क्योंकि रघुराम राजन जैसे दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री इस तरह से सार्वजनिक तौर पर प्रचारित बातचीत में शामिल हो रहे थे तो सबको भरोसा था कि भारत और विश्व के लिए कुछ बेहतर आर्थिक सूत्र निकलकर आएंगे। केरल के वायनाड से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी औपचारिक अभिवादन के बाद कुछ इसी अंदाज में बातचीत शुरू की थी कि उन्हें और उस चर्चा को देखने वालों को भारत अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को समझने और उससे बाहर निकलने का मंत्र दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री रघुराम राजन देंगे। इतनी उम्मीद इसलिए नहीं थी कि राहुल गांधी, रघुराम राजन से बात कर रहे थे। उम्मीद की वजह थी उन रघुराम राजन की वजह से जो अभी शिकागो विश्वविद्यालय के शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में केथरीन डुसाक मिलर विशिष्ट सेवा प्रोफेसर के तौर पर अर्थशास्त्र के छात्रों को अर्थशास्त्र के गुर सिखा रहे हैं, लेकिन दुर्भाग्य से रघुराम राजन ने अपना सारा ज्ञान अपने विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए ही बचाकर रख लिया और राहुल गांधी के साथ हुई उनकी 28 मिनट से थोड़ा ज्यादा हुई बातचीत में सिर्फ एक बात निकलकर आई कि देश के गरीबों, मजदूरों, जरूरतमंदों को सरकार की तरफ से तुरन्त मदद की जरूरत है और राहुल गांधी के पूछने पर 65 हजार करोड़ रुपये का आंकड़ा भी रघुराम राजन ने बताया। क्या सिर्फ यह 65 हजार करोड़ रुपये का आकड़ा सुनाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने अपने एक सांसद की बातचीत को इतना प्रचारित किया था और अगर हां, तो खोदा पहाड़, निकली चुहिया कहावत को इससे अधिक चरितार्थ करने वाली घटना हाल में हुई हो, ध्यान में नहीं आता। रघुराम राजन को अर्थशास्त्री के तौर पर अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रखना चाहिए था क्योंकि इस बार खुला खतरा था। इससे पहले रघुराम राजन यूपीए के शासनकाल में आर्थिक नीतियों को तय करने वाले महत्वपूर्ण पदों पर रहकर वापस शिकागो विश्वविद्यालय पढ़ाने लौट गए, लेकिन उस दौरान हुई आर्थिक गड़बड़ियों के लिए उन पर ऊंगली कम ही उठाई जाती है। इसकी बड़ी वजह यही रही कि दुनिया के एक और आर्थिक विद्वान डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज थे तो रघुराम राजन से भला सवाल क्यों पूछा जाता, लेकिन आज यह प्रश्न पूछना जरूरी है कि किस मोह में रघुराम राजन ने राहुल गांधी को दुनिया की स्थिति और उसके मुकाबले भारत की स्थिति, भारत की सरकार फैसले और उसके अच्छे-बुरे होने बात नहीं की।
रघुराम राजन अभी अमेरिका के तीसरे सबसे ज्यादा आबादी वाले शहर शिकागो से बात कर रहे थे। अमेरिका में चाइनीज वायरस से प्रभावित मरीजों का आंकड़ा 10 लाख के पार चला गया है और करीब 64 हजार अमेरिकियों की जान नहीं बचाई जा सकी है। राजन जिस शिकागो शहर से बोल रहे थे, उस राज्य इलनॉइस में करीब 53 हजार मामले सामने आए हैं और तेईस सौ से ज्यादा लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। राहुल गांधी जिस दिल्ली शहर में बैठकर बात कर रहे थे, वहां कुल 3515 मामले सामने आए हैं और 59 लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। पूरे भारत में अब 35 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं और ग्यारह सौ से ज्यादा लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। भारत के सर्वाधिक प्रभावित महाराष्ट्र में दस हजार से ज्यादा मामले सामने आए और साढ़े चार सौ से ज्यादा लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। राहुल गांधी जिस केरल के वायनाड से सांसद हैं, उस केरल राज्य में ही चाइनीज वायरस के शुरुआती मरीज आए थे, लेकिन केरल में अभी भी इस बीमारी से पीड़ित कुल मामले 500 के नीचे ही हैं और उसमें से 383 बचा लिए गए, 4 की जान नहीं बचाई जा सकी। देश की सबसे बड़ी आबादी, करीब 22 करोड़ जनसंख्या, वाले राज्य उत्तर प्रदेश में बाइस सौ से कुछ ज्यादा मामले सामने आए हैं और साढ़े पांच सौ लोगों को बीमारी से बचाने में सफलता मिल चुकी है और 40 लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। राहुल गांधी और रघुराम राजन की बहुप्रचारित चर्चा में अगर इस नजरिये से बात होती तो दुनिया में भारत की छवि और बेहतर होती। इन आंकड़ों के साथ आलोचना भी होती और उसे ठीक करने की चर्चा होती तो भारत की सरकार पर और देश की राज्य सरकारों पर ज्यादा बेहतर करने का दबाव भी बनता, लेकिन रघुराम राजन ने राहुल गांधी के साथ बातचीत में वह नहीं किया, जिससे भारत की सरकार पर, देश की राज्य सरकारों पर बेहतर करने का दबाव बनता और दुनिया यह भी देखती कि भारत की स्थिति दुनिया के मुकाबले कितनी अच्छी है। इससे चीन से निकलने वाली दुनिया की कंपनियों को स्पष्ट संदेश भी जाता कि भारत एक बेहतर जगह हो सकती है, लेकिन दुर्भाग्य से यूपीए शासनकाल में और कार्यकाल पूरा होने तक मोदी के पहले शासनकाल में भी आर्थिक नीतिनियंता की कुर्सी पर बैठने वाले रघुराम राजन ने भारत की छवि सुधारने की कोई कोशिश नहीं की।
राहुल-रघुराम की बातचीत दार्शनिक प्रश्नों, अथॉरिटेरियन मॉडल लिबरल मॉडल पर भारी पड़ने की कोशिश कर रहा है, समाज में विभाजन हो रहा है, सत्ता का विकेंद्रीकरण जरूरी, राज्य सरकारों-पंचायतों को अधिकार कम है, राजीव गांधी जिस पंचायत राज को लेकर आए, उसे कमजोर किया जा रहा है, हम पंचायत राज में आगे बढ़े थे, अब उस पर लालफीताशाही हावी हो गई है, दक्षिणी राज्य अच्छा कर रहे हैं, विकेंद्रीकरण कर रहे हैं, उत्तरी राज्यों में लालफीताशाही हावी है। कुल मिलाकर कैसे खुले अर्थव्यवस्था से शुरू हुई राहुल-रघुराम की बातचीत इस कठिन चुनौतियों और अवसरों वाले समय में भारत की छवि खराब करने की मजबूत कोशिशों के साथ खत्म हो गई। एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये के शुरुआती पैकेज में ही भारत सरकार ने कमजोर लोगों की जरूरत भर के राशन और नकदी का इंतजाम कर दिया था। छत्तीस हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी, केंद्र और राज्य सरकारों की अलग-अलग योजनाओं में जरूरतमंदों के खाते में सीधे डाले जा चुके हैं। महिला, किसान, दिहाड़ी मजदूर, मनरेगा मजदूर, सब सीधे खाते में रकम पा चुके हैं। नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बैनर्जी के अस्थाई राशन कार्ड की चर्चा करके छोड़ दिया गया, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दूसरी सरकारों के बयान पर कोई बात न हुई कि इस समय जिसको जरूरत है, राशन मिलेगा, राशन कार्ड की जरूरत नहीं है। ऐसे कठिन समय में राशनकार्ड बनवाने का प्रस्ताव ही लालफीताशाही को जमकर बढ़ाने वाला है, लेकिन दुनिया के महान अर्थशास्त्री रघुराम राजन यह सब जानबूझकर नहीं देख रहे थे और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को यह समझा भी नहीं रहे थे। राहुल गांधी के एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर भी रघुराम राजन ने ठीक से नहीं दिया। राहुल गांधी ने पूछा कि अभी देश संकट में है, क्या इसके बाद भारत को कोई फायदा होगा, किस प्रकास दुनिया बदलेगी। राजन का जवाब आया कि किसी देश के लिए पॉजिटिव इफेक्ट नहीं, लेकिन देश इसका फायदा उठा सकते हैं और इसके लिए ज्यादा से ज्यादा देशों से संवाद की जरूरत है। होना यह चाहिए था कि रघुराम राजन चाइनीज वायरस के प्रकोप की वजह से बदल रही दुनिया में भारत की महत्वपूर्ण स्थिति को ज्यादा महत्वपूर्ण करने के तरीके बताते, लेकिन राजन यहां भी चुप साध गये। ठीक उसी तरह से जैसे यूपीए के शासनकाल में 2007 से 2014 तक आर्थिक नीतियां तय करने वाले महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद बैंकिंग तंत्र की गड़बड़ियों पर आंखें मूंदें रखीं। क्या रघुराम राजन खुद को 1991 वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह की तरह अगली यूपीए सरकार के वित्त मंत्री के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं और इसीलिए आर्थिक नजरिया बताने के बजाय राजनीतिक नजरिये से वर्तमान सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करते हैं। डॉक्टर रघुराम राजन 2007-08 में आर्थिक मामलों के सुधार पर बनी समिति के अध्यक्ष थे। 2008-12 तक वो प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार थे। 2012 से रिजर्व बैंक गवर्नर बनने तक रघुराम राजन देश के वित्त मंत्री पी चिदंबरम के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। 2007 से लेकर 2013 तक देश में आर्थिक अराजकता चरम पर थी। आज जिन डूबते कर्जों की सबसे ज्यादा चर्चा होती थी, उन्हें 2006-08 के दौरान ही बांटा गया था और यह बात खुद डॉक्टर रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक के गवर्नर से हटने के बाद बताया था। राहुल गांधी को इस बात का ख्याल भले न हो कि उनकी छवि का क्या होगा, लेकिन डॉक्टर रघुराम राजन को इस छवि का ख्याल रखना था और जिस देश में राजन को इतने शीर्ष पदों पर बैठने का अवसर मिला, इस अवसर का प्रयोग उन्हें उसकी छवि दुरुस्त करने के लिए करना था, जो राजन नहीं कर सके। कुल मिलाकर यह सवाल हमेशा पूछा जाता रहेगा कि महामारी के दौर में देश को जब आर्थिक मंत्र की जरूरत थी तो रघुराम राजन जैसे विद्वान अर्थशास्त्री सिर्फ राजनीतिक एजेण्डा पेश करके क्यों चले गये। 
(यह लेख आज इंदौर से छपने वाले प्रजातंत्र अखबार में छपा है)

Sunday, June 12, 2016

रघुराम के राज में मध्यवर्ग ‘रामभरोसे’

रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर रघुराम राजन पहली बार मौद्रिक नीति जारी करने जा रहे थे। चार सितंबर 2013 को रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक के गवर्नर का पदभार संभाला था और बीस सितंबर को उनकी पहली मौद्रिक नीति जारी होने वाली थी। बैंक, बाजार, आम जनता सभी को आशा थी कि रघुराम राजन की नीति से बैंक कर्ज सस्ता होगा। जिससे लोगों की जेब पर पड़ रहा अतिरिक्त बोझ घटेगा। रुपया डॉलर के मुकाबले सत्तर के भाव से मजबूत हो रहा था। सेंसेक्स भी फिर से इक्कीस हजार की तरफ बढ़ रहा था। और कच्चे तेल का भाव भी एक सौ बारह डॉलर प्रति बैरल की ऊंचाई से वापस लौट रहा था। छे प्रतिशत से कुछ ऊपर की महंगाई दर थी। और ये महंगाई दरअसल खाने-पीने के सामानों उसमें भी खासकर प्याज की महंगाई की वजह से थी। मतलब कुल मिलाकर ब्याज दरें घटाने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास भरपूर वजहें थीं। लेकिन, हुआ ये कि रघुराम राजन की दूरदृष्टि दरअसल महंगाई दर के घटने का इंतजार कर रही थी। राजन की इस दूरदृष्टि का उल्टा असर ये हुआ कि देश के सबसे बड़े और सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बीस सितंबर की मौद्रिक नीति के बाद ब्याज दरें बढ़ा दीं। पहले से ही मौके की ताक में बैठे निजी बैंक तो जैसे इसी के इंतजार में थे। मेरे बैंक ने भी ब्याज दरें बढ़ाईं और मुझे सूचित किया कि आपकी 240 महीने की अवधि बढ़कर 255 महीने हो गई है। मतलब साढ़े दस प्रतिशत पर लिया गया मेरा कर्ज अब बीस साल के बजाए इक्कीस साल से ज्यादा का हो चुका था। ये रघुराम राजन का आगाज था। जबकि, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के तब के चेयरमैन प्रतीप चौधरी इन्हीं रघुराम राजन के इंतजार में थे कि जब नया गवर्नर आएगा, तो ब्याज दरें घटाएगा या घटाने के संकेत देगा। लेकिन, जब सितंबर की मौद्रिक नीति में रेपो रेट नहीं घटा, तो प्रतीप चौधरी ने ये कहते हुए ब्याज दरें बढ़ा दी कि जुलाई से करना जरूरी था। अब तीन साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद रघुराम राजन की विदाई के संकेत हैं। और इन तीन सालों में रघुराम राजन ने इस तरह से लोगों के मन में धारणा पक्की हो गई है कि ये गवर्नर अपनी तथाकथित दूरदृष्टि के चक्कर में मध्यवर्ग के खिलाफ ही फैसले लेगा। इसीलिए जब सात जून 2016 को मौद्रिक नीति आई, तो कोई चौंका नहीं और रघुराम राजन ने फिर महंगाई के बढ़ने का हवाला देकर रेपो रेट साढ़ेछे प्रतिशत ही बरकरार रहने दिया।

पहले से ही रेपो रेट न बदलने के संकेत थे इसलिए बाजार मजे में है। उद्योग संगठन और बैंक भी उसी लिहाज से प्रतिक्रिया दे रहे हैं। मौद्रिक नीति देखेंगे, तो रघुराम राजन ने रेपो रेट में कटौती न करने के अपने फैसले को मजबूती देते हुए महंगाई दर के बढ़ने का डर सामने रख दिया है। लेकिन, यहां ये समझना जरूरी है कि लगातार सत्रह महीने से महंगाई दर में कमी के बाद अप्रैल पहला महीना था जब महंगाई दर बढ़ी है। और अगर 2015 की शुरुआत से राजन के कार्यकाल में हुई कुल ब्याज कटौती की बात करें, तो ये कुल डेढ़ प्रतिशत रही है। और इसमें से भी सिर्फ आधा यानी पौना प्रतिशत का ही फायदा बैंकों ने लोगों को दिया है। यानी मध्यवर्ग के लोगों को सस्ते कर्ज के लिए फिलहाल अब नए रिजर्व बैंक गवर्नर के आने का इंतजार करना होगा। क्योंकि, एक सौ बारह डॉलर के भाव पर कच्चे तेल से कार्यकाल की शुरुआत के बाद पचास डॉलर के आसपास के भाव पर भी राजन आगे महंगाई घटने का इंतजार कर रहे हैं, तो ये दूरदृष्टि कहा जाएगा या दृष्टिदोष इस पर भी विचार करने की जरूरत है। क्योंकि, ये अजीब स्थिति है कि भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने राजन पर सवाल क्या उठाया, अंतर्राष्ट्रीय लॉबी के साथ देश में भी अर्थशास्त्र के जानकार राजन के कार्यकाल की स्वस्थ समीक्षा करने के बजाए रघुराम राजन को शहीद घोषित करने की कोशिश में लग गए हैं। एक बड़े अंग्रेजी आर्थिक पत्रकार ने तो काफी आगे जाकर पूरा लेख लिख मारा कि कैसे राजन को दूसरा कार्यकाल नहीं मिला, तो देश से विदेशी पूंजी ही गायब हो जाएगी। ऐसे अर्थशास्त्र के जानकारों की बुद्धि पर तरस आता है। ऐसे तो देश में चुनाव की जरूरत ही नहीं है। सीधे एक अच्छा रिजर्व बैंक गवर्नर चुना जाए और अपने आप विदेशी निवेशक दौड़ता-भागता भारत आ जाएगा।

विदेशी निवेश के आने का किसी देश के बैंक गवर्नर से संबंध का कोई उदाहरण दुनिया में नहीं है। ये सीधे तौर पर किसी देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती से तय होता है। देश के नेता की मजबूती से तय होता है। देश की नीतियों से तय होता है। देश की नीतियों को कैसे उस देश की सरकार लागू कर रही है, उससे विदेशी निवेश का आना तय होता है। इसलिए अर्थव्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों के बजाए किसी गवर्नर के भरोसे पूरी अर्थव्यवस्था के बदलाव की स्थितियों को बनते देखने वालों की बुद्धिहीनता से ज्यादा एक साजिश दिखाता है, जिसकी तरफ सुब्रमण्यम स्वामी इशारा कर रहे हैं। क्योंकि, जिस महंगाई के बढ़ने की बात बार-बार रिजर्व बैंक की ताजा पॉलिसी में की गई है। उसे तैयार करते समय कम से कम दो साल बाद देश में पक्के तौर पर आने वाले शानदार मॉनसून को ध्यान में रखा गया होगा। ऐसा तो माना ही जाना चाहिए। फिर भी महंगाई दर का डर दिखाकर मध्यवर्ग और छोटे-मंझोले उद्योगों को सस्ते कर्ज से दूर रखकर राजन बेहतर नीति नहीं बना रहे हैं। जिस डूबते कर्ज को लेकर राजन की छवि किसी बैंकिंग हीरो जैसी बनी है। उस पर भी चर्चा करना जरूरी है। रघुराम राजन चार सितंबर दो हजार तेरह को रिजर्व बैंक के गवर्नर बने थे। लेकिन, उससे पहले 2007 रघुराम राजन यूपीए की सरकार के साथ थे। 2007-08 में आर्थिक मामलों के सुधार पर बनी समिति के अध्यक्ष थे। 2008-12 तक वो प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार थे। 2012 से रिजर्व बैंक गवर्नर बनने तक रघुराम राजन देश के वित्त मंत्री पी चिदंबरम के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। अब 2007 से लेकर 2013 तक देश में आर्थिक अराजकता कहां पर थी। इसके आंकड़े बताने की शायद ही जरूरत हो। यही वो समय था जब देश में बैंकों का एनपीए यानी नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स लगातार बढ़ रहा था। मतलब आज नरेंद्र मोदी की सरकार के समय रिजर्व बैंक गवर्नर के तौर पर रघुराम राजन जिस डूबते कर्ज को लेकर बैंकों को धमका रहे हैं। दरअसल इसके बढ़ने का असल समय वही था जब राजन आर्थिक सुधार वाली कमेटी के मुखिया थे। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार थे और तत्कालीन वित्त मंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे।

इसलिए मुझे लगता है कि सुब्रमण्यम स्वामी के आरोपों को राजनीतिक विरोध के नजरिये से देखने के बजाए इस नजरिये से देखा जाना चाहिए कि आखिर रघुराम राजन ने सही मायने में गवर्नर के तौर पर क्या अच्छा-बुरा किया। राजन के गवर्नर बनने के कुछ ही महीने बाद देश में एक मजबूत सरकार थी। दुनिया में उसकी साख बेहतर थी। महंगाई दर बहुत कम हो गई थी। कच्चा तेल काबू में था। इस सबके बाद भी अगर राजन के खाते में कुछ खास नहीं दिखता, तो राजन की काबिलियत पर संदेह उठना स्वाभाविक है। क्योंकि, देखने से तो यही लगता है कि एक सेलिब्रिटी गवर्नर यूपीए के समय में हिंदुस्तान को मिला जिसकी कीमत एनडीए सरकार के समय में जनता चुका रही है। और इस तरह से देश की अर्थव्यवस्था कोअंधों में काना राजा कहने वाले गवर्नर को फिलहाल दूसरा कार्यकाल देने का कोई मतलब नहीं है। मोदी सरकार के लिए ये फैसला इसलिए भी ज्यादा जरूरी हो जाता है कि राजन की नीतियां उसी मध्यवर्ग और छोटे-मंझोले उद्योगों का नुकसान कर रही हैं। जिसने बड़ी उम्मीद से नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री चुना है।
(ये लेख catchHindi और catchenglish पर छपा है)

Monday, September 30, 2013

हे राजन ये तुमने क्या किया !



स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमैन प्रतीप चौधरी की मानें तो १५ जुलाई को जो फैसला उन्हें लेना था वो उन्होंने १५ सितंबर के बाद किया। यानी पूरे दो महीने इंतजार करने के बाद देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रतीप चौधरी किस बात का इंतजार कर रहे थे। हमारी समझ ये कहती है कि प्रतीप चौधरी को इंतजार था कि डी सुब्बाराव के जाने के बाद नया गवर्नर जो आएगा वो शायद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के फोकस का एजेंडा बदलेगा। क्योंकि, जो बातें नॉर्थ ब्लॉक के गलियारों में चर्चा में थीं वो ये कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम ग्रोथ पर फोकस करना चाहते हैं जबकि, रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव सरकार के इशारे के बाद भी ब्याज दरों में कटौती करने या कटौती करने के संकेत देने तक को तैयार नहीं हैं। ये लगभग तय था कि जब चार सितंबर को डी सुब्बाराव की गवर्नर पद से विदाई होगी तो, कोई ऐसा व्यक्ति ही पद संभालेगा जो वित्त मंत्रालय के सुर के साथ ताल मिला सके। यानी ब्याज दरें कम करके तरक्की की रफ्तार बढ़ाने पर फोकस कर सके। क्योंकि, चुनावी साल में महंगाई को फोकस बताने वाला रिजर्व बैंक अभी की सरकार की संभावनाओं को धूमिल करेगा। इसीलिए अनुमानों के मुताबिक पहले से ही सरकार के सुर के साथ ताल मिलाने का अभ्यास कर चुके रघुराम राजन को रिजर्व बैंक का काम सौंपा गया।

प्रभावशाली, सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी रघुराम राजन ने डी सुब्बाराव की जगह ली तो सबको लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा। काफी हद तक ठीक भी हुआ। चार सितंबर को रघुराम राजन ने दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक के वित्त मंत्रालय के सलाहकार वाला पद छोड़कर मुंबई के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर का पद क्या संभाला कमजोर हुआ रुपया भी ताल ठोंकने लगा। दे दनादन बाजार में भी तेजी के सारे संकेत मिलने लगे। अठारह हजार के आसपास लहरा रहा सेंसेक्स तेजी से बीस हजार के पार चला गया। लग रहा था कि रुपया सत्तर के पार अब गया कि तब गया लेकिन रघुराम राजन के साथ से रुपये ने तेजी से मजबूती हासिल की और डॉलर के मुकाबले करीब दस रुपये तक चढ़ गया। रुपये की लीकेज यानी जहां जहां डॉलर लेने के लिए रुपया देने वाली स्थितियां थीं उनको कम करने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रहे। लगे हाथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार से भी अच्छी खबरें आने लगीं। रुपया मजबूत हो रहा था और कच्चा तेल भी धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा था। रघुराम राजन के गवर्नर का पद संभालने के ठीक एक दिन पहले जो कच्चा तेल एक सौ बारह डॉलर प्रति बैरल के ऊपर था वो एक सौ सात डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। लेकिन, दबे छिपे एक गड़बड़ हो रही थी। वो गड़बड़ ये थी कि बैंकों के कर्ज धीरे से महंगे हो रहे थे। एक सुबह मुझे भी झटका लगा जब मेरे बीस साल यानी दो सौ चालीस महीने के कर्ज की सीमा मेरे निजी बैंक ने बढ़ाकर दो सौ पचपन महीने यानी इक्कीस साल से ज्यादा कर दी। असल खतरा यही था। और सरकार की सामाजिक वोट बैंक की जरूरत पूरी करने के लिए निजी बैंक भला क्यों इंतजार करते। लेकिन, सरकारी बैंक के नाम में ही सरकार है तो वो इंतजार कर रहे थे। यही वो इंतजार था जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के प्रमुख प्रतीप चौधरी कर रहे थे। उनको लग रहा था कि बीस सितंबर की रिजर्व बैंक की क्रेडिट पॉलिसी में कम से कम चौथाई प्रतिशत की कमी तो होगी ही। लेकिन, रघुराम राजन की नीति से शॉर्ट टर्म में रुपया बाजार भले खुश हुआ। राजन का इरादा लंबे समय के लिए कर्ज लेने वाले भारतीयों को खुश करने का कतई नहीं थी। इसीलिए राजन ने जब ये संकेत दिए कि कड़वी दवा भी पीनी पड़ेगी तो मिडटर्म रिव्यू के ठीक एक दिन पहले ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने ब्याज दरें बढ़ा दीं। निजी बैंक तो पहले ही ये काम कर चुके थे। यानी महंगे कर्ज का दौर अभी लंबा चलेगा इसके लिए भारतीयों को तैयार रहना होगा।

महंगाई का दौर जारी रहेगा। इसके लिए सिर्फ बैंकों का कर्ज जिम्मेदार नहीं है। हमारी-आपकी हर तरह की महंगाई बढ़ रही है। खाना सबसे महंगा हो रहा है। अगस्त महीने के महंगाई दर के जो आंकड़े आए हैं उनसे ये संकेत मिल रहे हैं कि महंगाई कम नहीं होने वाली। ये आंकड़े थोक महंगाई दर के हैं। हालांकि, आंकड़ों में ये 5.79% से बढ़कर 6.10% ही हुए हैं। लेकिन, खतरनाक बात इसमें जो छिपी थी वो ये कि महंगाई दर को करीब दशमलव दो प्रतिशत बढ़ाने में खाने-पीने के सामानों की बड़ी अहम भूमिका है। वैसे तो समय-समय पर सरकार की नीति से खाने-पीने के सामान की महंगाई बढ़ती रहती है। लेकिन, पहले की तरह इस बार भी तगड़ा मोर्चा प्याज ने संभाला है। प्याज ने किचन का बजट पीटकर पटरा कर दिया है। प्याज कीमतें 250 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ीं थीं। प्याज की कीमतें बढ़ी हैं ये खबरें मीडिया में आने के तुरंत बाद ही बिचौलयों ने मोर्चा संभाल लिया। नासिक से लेकर दिल्ली तक हर जगह प्याज की कमी थी। और कमी की खबरों के साथ तेजी से बढ़ रही प्याज की कीमतों की भी खबर थी। इसने साहसी रघुराम राजन के सारे साहस की हवा निकाल दी। महंगाई से तरक्की पर फोकस ले जाने की बात करने वाले रघुराम राजन भी महंगाई को बैंक की प्राथमिकता में ले आए। प्याज की हॉरर स्टोरी ने उनके अर्थशास्त्र के सारे सिद्धांतों को ध्वस्त कर दिया। राजन सुब्बाराव वाले सुर में आ गए। विकास की जगह महंगाई रिजर्व बैंक के एंजेडे में आने से हम महंगाई के दुष्चक्र में फंसे रहेंगे।  क्योंकि, अगस्त के भाव सितंबर में भी भाव बढ़ा चुके हैं। सितंबर की भी महंगाई दर अब घटेगी नहीं। फिर त्यौहारों के सीजन में तो हम भारतीय कर्ज लेकर भी मस्त रहते हैं। रघुराम राजन के पास अच्छा मौका था। रुपया काबू में था। बाजार भरोसे में दिख रहा था। जिनकी छींक से हमारे बाजार को निमोनिया हो जाता है वो, अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी अच्छी बातें कर गया था। सेंसेक्स इक्कीस हजार की दिशा में जा रहा था। लेकिन, रघुराम राजन ने इस अच्छे मौके को बेकार कर दिया। दो हजार अंकों से ज्यादा चढ़े सेंसेक्स ने फिर उल्टी दिशा पकड़ ली है। रघुराम राजन का पहला दिन जितना एतिहासिक इस मामले में रहा कि तेजी से सब सुधरता दिख रहा है। रघुराम राजन की पहली मौद्रिक नीति का एलानठीक इसके उलट दिशा में जा रहा है कि अभी सब बिगड़ा ही रहेगा। वैसे भी पॉलिसी ही कह रही है कि महंगाई अनुमान से ज्यादा ही रहेगा। अब सारा कुछ दारोमदार इस साल की दूसरी छमाही में बुनियादी परियोजनाओं को कितनी तेजी मिली इस पर निर्भर होगा। लेकिन रघुराम राजन के रेपो रेट बढ़ाने के फैसले पर देश यही कह रहा है कि हे राजन ये तुमने क्या किया।


Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

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