राहुल-रघुराम
की बातचीत से निकला क्या ?
दुनिया
के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने चाइनीज वायरस के संकट के दौर में
शिकागो से दिल्ली में केरल के वायनाड से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी से बातचीत की।
बाकायदा कांग्रेस ने बड़ी तैयारी के साथ इस बातचीत को पहले से प्रचारित किया था।
सबको इसकी प्रतीक्षा थी क्योंकि रघुराम राजन जैसे दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री इस
तरह से सार्वजनिक तौर पर प्रचारित बातचीत में शामिल हो रहे थे तो सबको भरोसा था कि
भारत और विश्व के लिए कुछ बेहतर आर्थिक सूत्र निकलकर आएंगे। केरल के वायनाड से
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी औपचारिक अभिवादन के बाद कुछ इसी अंदाज में
बातचीत शुरू की थी कि उन्हें और उस चर्चा को देखने वालों को भारत अंतर्राष्ट्रीय
परिस्थितियों को समझने और उससे बाहर निकलने का मंत्र दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री
रघुराम राजन देंगे। इतनी उम्मीद इसलिए नहीं थी कि राहुल गांधी, रघुराम राजन से बात
कर रहे थे। उम्मीद की वजह थी उन रघुराम राजन की वजह से जो अभी शिकागो
विश्वविद्यालय के शिकागो बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में केथरीन डुसाक मिलर विशिष्ट सेवा
प्रोफेसर के तौर पर अर्थशास्त्र के छात्रों को अर्थशास्त्र के गुर सिखा रहे हैं,
लेकिन दुर्भाग्य से रघुराम राजन ने अपना सारा ज्ञान अपने विश्वविद्यालय के छात्रों
के लिए ही बचाकर रख लिया और राहुल गांधी के साथ हुई उनकी 28 मिनट से थोड़ा
ज्यादा हुई बातचीत में सिर्फ एक बात निकलकर आई कि देश के गरीबों, मजदूरों,
जरूरतमंदों को सरकार की तरफ से तुरन्त मदद की जरूरत है और राहुल गांधी के पूछने पर
65 हजार करोड़ रुपये का आंकड़ा भी रघुराम राजन ने बताया। क्या सिर्फ यह 65 हजार
करोड़ रुपये का आकड़ा सुनाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने अपने एक सांसद की बातचीत
को इतना प्रचारित किया था और अगर हां, तो खोदा पहाड़, निकली चुहिया कहावत को इससे
अधिक चरितार्थ करने वाली घटना हाल में हुई हो, ध्यान में नहीं आता। रघुराम राजन को
अर्थशास्त्री के तौर पर अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रखना चाहिए था क्योंकि इस बार
खुला खतरा था। इससे पहले रघुराम राजन यूपीए के शासनकाल में आर्थिक नीतियों को तय
करने वाले महत्वपूर्ण पदों पर रहकर वापस शिकागो विश्वविद्यालय पढ़ाने लौट गए,
लेकिन उस दौरान हुई आर्थिक गड़बड़ियों के लिए उन पर ऊंगली कम ही उठाई जाती है। इसकी
बड़ी वजह यही रही कि दुनिया के एक और आर्थिक विद्वान डॉक्टर मनमोहन सिंह
प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज थे तो रघुराम राजन से भला सवाल क्यों पूछा जाता,
लेकिन आज यह प्रश्न पूछना जरूरी है कि किस मोह में रघुराम राजन ने राहुल गांधी को
दुनिया की स्थिति और उसके मुकाबले भारत की स्थिति, भारत की सरकार फैसले और उसके
अच्छे-बुरे होने बात नहीं की।
रघुराम
राजन अभी अमेरिका के तीसरे सबसे ज्यादा आबादी वाले शहर शिकागो से बात कर रहे थे। अमेरिका
में चाइनीज वायरस से प्रभावित मरीजों का आंकड़ा 10 लाख के पार चला गया है और करीब
64 हजार अमेरिकियों की जान नहीं बचाई जा सकी है। राजन जिस शिकागो शहर से बोल रहे
थे, उस राज्य इलनॉइस में करीब 53 हजार मामले सामने आए हैं और तेईस सौ से ज्यादा
लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। राहुल गांधी जिस दिल्ली शहर में बैठकर बात कर रहे
थे, वहां कुल 3515 मामले
सामने आए हैं और 59 लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। पूरे भारत में अब 35 हजार से
ज्यादा मामले
सामने आ चुके हैं और ग्यारह सौ से ज्यादा लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। भारत के
सर्वाधिक प्रभावित महाराष्ट्र में दस हजार से ज्यादा मामले सामने आए और साढ़े चार
सौ से ज्यादा लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। राहुल गांधी जिस केरल के वायनाड से
सांसद हैं, उस केरल राज्य में ही चाइनीज वायरस के शुरुआती मरीज आए थे, लेकिन केरल
में अभी भी इस बीमारी से पीड़ित कुल मामले 500 के नीचे ही हैं और उसमें से 383 बचा
लिए गए, 4 की जान नहीं बचाई जा सकी। देश की सबसे बड़ी आबादी, करीब 22 करोड़
जनसंख्या, वाले राज्य उत्तर प्रदेश में बाइस सौ से कुछ ज्यादा मामले सामने आए हैं
और साढ़े पांच सौ लोगों को बीमारी से बचाने में सफलता मिल चुकी है और 40 लोगों की
जान नहीं बचाई जा सकी। राहुल गांधी और रघुराम राजन की बहुप्रचारित चर्चा में अगर
इस नजरिये से बात होती तो दुनिया में भारत की छवि और बेहतर होती। इन आंकड़ों के
साथ आलोचना भी होती और उसे ठीक करने की चर्चा होती तो भारत की सरकार पर और देश की
राज्य सरकारों पर ज्यादा बेहतर करने का दबाव भी बनता, लेकिन रघुराम राजन ने राहुल
गांधी के साथ बातचीत में वह नहीं किया, जिससे भारत की सरकार पर, देश की राज्य
सरकारों पर बेहतर करने का दबाव बनता और दुनिया यह भी देखती कि भारत की स्थिति
दुनिया के मुकाबले कितनी अच्छी है। इससे चीन से निकलने वाली दुनिया की कंपनियों को
स्पष्ट संदेश भी जाता कि भारत एक बेहतर जगह हो सकती है, लेकिन दुर्भाग्य से यूपीए
शासनकाल में और कार्यकाल पूरा होने तक मोदी के पहले शासनकाल में भी आर्थिक
नीतिनियंता की कुर्सी पर बैठने वाले रघुराम राजन ने भारत की छवि सुधारने की कोई
कोशिश नहीं की।
राहुल-रघुराम
की बातचीत दार्शनिक प्रश्नों, अथॉरिटेरियन मॉडल लिबरल मॉडल पर भारी पड़ने की कोशिश
कर रहा है, समाज में विभाजन हो रहा है, सत्ता का विकेंद्रीकरण जरूरी, राज्य
सरकारों-पंचायतों को अधिकार कम है, राजीव गांधी जिस पंचायत राज को लेकर आए, उसे
कमजोर किया जा रहा है, हम पंचायत राज में आगे बढ़े थे, अब उस पर लालफीताशाही हावी
हो गई है, दक्षिणी राज्य अच्छा कर रहे हैं, विकेंद्रीकरण कर रहे हैं, उत्तरी
राज्यों में लालफीताशाही हावी है। कुल मिलाकर कैसे खुले अर्थव्यवस्था से शुरू हुई
राहुल-रघुराम की बातचीत इस कठिन चुनौतियों और अवसरों वाले समय में भारत की छवि
खराब करने की मजबूत कोशिशों के साथ खत्म हो गई। एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपये के
शुरुआती पैकेज में ही भारत सरकार ने कमजोर लोगों की जरूरत भर के राशन और नकदी का
इंतजाम कर दिया था। छत्तीस हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी, केंद्र और राज्य
सरकारों की अलग-अलग योजनाओं में जरूरतमंदों के खाते में सीधे डाले जा चुके हैं।
महिला, किसान, दिहाड़ी मजदूर, मनरेगा मजदूर, सब सीधे खाते में रकम पा चुके हैं। नोबल
पुरस्कार विजेता अभिजीत बैनर्जी के अस्थाई राशन कार्ड की चर्चा करके छोड़ दिया
गया, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दूसरी सरकारों के बयान
पर कोई बात न हुई कि इस समय जिसको जरूरत है, राशन मिलेगा, राशन कार्ड की जरूरत
नहीं है। ऐसे कठिन समय में राशनकार्ड बनवाने का प्रस्ताव ही लालफीताशाही को जमकर
बढ़ाने वाला है, लेकिन दुनिया के महान अर्थशास्त्री रघुराम राजन यह सब जानबूझकर
नहीं देख रहे थे और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को यह समझा भी नहीं रहे थे। राहुल
गांधी के एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर भी रघुराम राजन ने ठीक से नहीं दिया।
राहुल गांधी ने पूछा कि अभी देश संकट में है, क्या इसके बाद भारत को कोई फायदा
होगा, किस प्रकास दुनिया बदलेगी। राजन का जवाब आया कि किसी देश के लिए पॉजिटिव
इफेक्ट नहीं, लेकिन देश इसका फायदा उठा सकते हैं और इसके लिए ज्यादा से ज्यादा
देशों से संवाद की जरूरत है। होना यह चाहिए था कि रघुराम राजन चाइनीज वायरस के
प्रकोप की वजह से बदल रही दुनिया में भारत की महत्वपूर्ण स्थिति को ज्यादा
महत्वपूर्ण करने के तरीके बताते, लेकिन राजन यहां भी चुप साध गये। ठीक उसी तरह से
जैसे यूपीए के शासनकाल में 2007 से 2014 तक आर्थिक नीतियां तय करने वाले
महत्वपूर्ण पदों पर रहने के बावजूद बैंकिंग तंत्र की गड़बड़ियों पर आंखें मूंदें
रखीं। क्या रघुराम राजन खुद को 1991 वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह की तरह अगली यूपीए
सरकार के वित्त मंत्री के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं और इसीलिए आर्थिक नजरिया
बताने के बजाय राजनीतिक नजरिये से वर्तमान सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश
करते हैं। डॉक्टर रघुराम राजन 2007-08 में आर्थिक मामलों के सुधार पर बनी
समिति के अध्यक्ष थे। 2008-12 तक वो प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के आर्थिक
सलाहकार थे। 2012 से रिजर्व बैंक गवर्नर बनने तक रघुराम राजन देश के वित्त मंत्री
पी चिदंबरम के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। 2007 से लेकर 2013 तक देश में आर्थिक
अराजकता चरम पर थी। आज जिन डूबते कर्जों की सबसे ज्यादा चर्चा होती थी, उन्हें
2006-08 के दौरान ही बांटा गया था और यह बात खुद डॉक्टर रघुराम राजन ने रिजर्व
बैंक के गवर्नर से हटने के बाद बताया था। राहुल गांधी को इस बात का ख्याल भले न हो
कि उनकी छवि का क्या होगा, लेकिन डॉक्टर रघुराम राजन को इस छवि का ख्याल रखना था
और जिस देश में राजन को इतने शीर्ष पदों पर बैठने का अवसर मिला, इस अवसर का प्रयोग
उन्हें उसकी छवि दुरुस्त करने के लिए करना था, जो राजन नहीं कर सके। कुल मिलाकर यह
सवाल हमेशा पूछा जाता रहेगा कि महामारी के दौर में देश को जब आर्थिक मंत्र की
जरूरत थी तो रघुराम राजन जैसे विद्वान अर्थशास्त्री सिर्फ राजनीतिक एजेण्डा पेश
करके क्यों चले गये।
(यह लेख आज इंदौर से छपने वाले प्रजातंत्र अखबार में छपा है)


