Showing posts with label car. Show all posts
Showing posts with label car. Show all posts

Thursday, February 14, 2008

ए भाई लोगों इन मराठियों की भी जरा चिंता कर लो

मराठी माणुस के भले का दावा करने वालों ने एक मराठी माणुस की जान ले ली। और, दूसरा एक मराठी माणुस हत्यारा बन गया। यानी दो मराठी परिवार बरबाद हो गए। लेकिन, अभी भी मराठियों की चिंता करने वालों की सेना का अभियान जारी है। मराठी हितों की चिंता करने वाले सचमुच कितने चिंतित हैं अपने वोट के लिए या मराठी हितों के लिए ये सब जानते हैं। फिर भी महाराष्ट्र के 2000 के सेंसस से इसे समझने में और आसानी होगी। सच्चाई ये है कि मराठियों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रहीं और ये आंकड़ा सिर्फ मुंबई का नहीं है। जहां गैर मराठियों को मराठियों के संसाधनों पर कब्जा करते प्रचारित किया गया है।

पूरे महाराष्ट्र के आधे से ज्यादा घरों में टॉयलेट तक की सुविधा नहीं है। जब उत्तर भारतीयों की संख्या मुंबई में बहुत कम थी, तब भी देश का अकेला शहर मुंबई ही था जहां, चॉल सिस्टम में बीसों घरों के लोग एक ही टॉयलेट का इस्तेमाल करते थे। मराठी संस्कृति, अस्मिता का ढोल पीटने वालों अब जरा गैर मराठियों को गंदगी में रहने वाले और गंदगी करने वाले बोलने से पहले इन आंकड़ों का ध्यान कर लेना। देश में सबसे ज्यादा शहरीकरण गुजरात के बाद महाराष्ट्र का ही हुआ है। लेकिन, यहां गांवों के लिहाज से 81.8 प्रतिशत और शहरों में 41.9 प्रतिशत घरों को अपना टॉयलेट तक नसीब नहीं है। शहरों की 40 प्रतिशत आबादी ड्रेनेज सिस्टम से जुड़ी नहीं है।

दूसरी सुविधाओं के मामले में भी अगर देखें तो, शहरों में भले ही 70.5 प्रतिशत घरों में टीवी सेट हैं लेकिन, गांव के इससे भी ज्यादा घरों में टीवी ही नहीं है। 35 प्रतिशत घरों मे रेडियो या ट्रांजिस्टर है। 14.1 प्रतिशत घरों में टेलीफोन है। 30.1 प्रतिशत घरों में साइकिल है। 13.2 प्रतिशत घरों में बाइक, स्कूटर या फिर मोपेड है। सिर्फ 3.4 प्रतिशत घरों में ही कारें हैं। और, 36.8 प्रतिशत घरों में इनमें से कोई भी सामान नहीं है। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि मुंबई में चमकती SUV’s में घूमने और मायानगरी की चमकती पार्टियों में शामिल होने वालों को असली मराठी हितों के बारे में अंदाजा भी नहीं होगा।

ऐसा नहीं है कि देश के दूसरे हिस्सों में ऐसा समान बंटवारा है। लेकिन, सच्चाई यही है कि मुंबई जैसी देश की आर्थिक राजधानी होने के बावजूद यहां की सरकारें और यहां के नेता राज्य के दूसरे हिस्सों के विकास का कोई खाका तैयार नहीं कर पा रहे हैं। मुंबई में निश्चित तौर पर जिस तरह से बाहर से लोग आ रहे हैं यहां की भी बुनियादी सुविधें टूट रही हैं। और, इसका कोई न कोई विकल्प भी खोजना पड़ेगा। पर, सवाल ये है कि जब विकसित राज्यों में शुमार महाराष्ट्र की सरकार राज्य के दूसरे हिस्सों में ही ऐसे विकल्प नहीं दे पा रही है और महाराष्ट्र के ही दूसरे हिस्सों से लोग मुंबई भागे चले आ रहे हैं तो, ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि पिछड़े का ठप्पा लगे उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपने अवसर खोजने देश की आर्थिक राजधानी में नहीं आएंगे।

और, ये आंकड़ा ये भी साफ करता है कि मुंबई का विकास किसी मराठी या गैर मराठी की वजह से नहीं हुआ। समुद्र के किनारे बसा होना, आज से सौ साल पहले से ही देश का व्यापारिक केंद्र होना और दुनिया भर में भारत के अकेले आर्थिक शहर के तौर पर पहचान- इन सबकी वजह से मुंबई की शान है, मुंबई की चमक है। अब अगर सचमुच मराठी हितों के रक्षकों को अपना दावा सिद्ध करना है तो, महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों को भी मुंबई जैसा चमकाकर दिखाएं और तब कहें कि पिछड़े राज्यों के लोगों को यहां घुसने नहीं देंगे। क्योंकि, अभी तो महाराष्ट्र के ही दूसरे हिस्से बहुत पिछड़े नजर आ रहे हैं।

Tarique Rahman को बांग्लादेश की जनता ने बड़ा अवसर दिया है

 Harsh Vardhan Tripathi हर्ष वर्धन त्रिपाठी #Bangladesh में @trahmanbnp प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। @PMOIndia @narendramodi ने उन्हें बध...