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Tuesday, July 18, 2017

मोदी के पीएम बनने के बाद अडानी के भाव गिरे!

हिन्दुस्तान में हर आदमी एक बात पक्के तौर पर जानता है। वो बात ये है कि अडानी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दोस्त हैं। इसी आधार पर वो हिन्दुस्तान का हर आदमी ये भी जानता है कि देश के प्रधानमंत्री से दोस्ती का फायदा अडानी की कम्पनियों को जमकर मिलता रहता है। कई लोग तो चौक-चौराहे पर खड़े ऐसे बात करते हैं, जैसे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी की कम्पनियों के भाव लगातार बढ़ते जा रहे हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से अडानी को फायदा मिलने की ये जो धारणा देश के लोगों में बनी है, उसके पीछे बहुत मजबूत आधार हैं। नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते अडानी समूह ने गुजरात में कई बड़ी परियोजनाओं को तेजी से पूरा किया। और जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने की यात्रा शुरू कर रहे थे, तो शेयर बाजार में गौतम अडानी के अडानी समूह को तो जैसे पंख लग गए थे। नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का असर था कि 13 सितम्बर 2013 को जिस अडानी एंटरप्राइजेज का बाजार भाव 141 रुपये था, वही अडानी एंटरप्राइजेज 2014 में लोकसभा चुनाव होने के ठीक पहले के महीने यानी अप्रैल 2014 में 471 रुपये पर बिक रहा था। अडानी समूह की मुख्य कम्पनी अडानी एंटरप्राइजेज के साथ अडानी समूह की दूसरी कम्पनियों को भी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ बढ़ने का जबरदस्त फायदा मिला था। मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मदवारी के दिन यानी 13 सितम्बर 2013 को अडानी पावर की भाव 36 रुपये था और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी के नजदीक पहुंचते तक अडानी पावर 53 रुपये से ज्यादा का हो गया। अडानी एंटरप्राइजेज और अडानी पावर की ही तरह अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड को भी इसका अच्छा खासा फायदा मिला था। 13 सितम्बर को 136 रुपये वाला अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड अप्रैल 2014 में ही 196 रुपये का बिकने लगा था।
अब इस मजबूत आधार पर कोई भी अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाकर बता सकता है कि इस समय अडानी की कम्पनियों का भाव आसमान पर होना चाहिए। लेकिन, जरा अपनी कल्पना के घोड़े को लगाम लगाइए। दरअसल, बाजार सब धीरे-धीरे बराबर कर देता है। ऐसा ही कुछ अडानी समूह की कम्पनियों के साथ भी हुआ। गौतम अडानी के दोस्त नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे, तो अडानी को फायदा होगा। इस भावना को बाजार ने हाथोंहाथ लिया। लेकिन, एक बार जब मई 2014 को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए, तो बाजार ने अडानी की कम्पनियों का कम्पनी के आधार पर मूल्यांकन करना शुरू कर दिया। बाजार की भाषा में कहें, तो कम्पनी ने मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस आधार को अडानी के सन्दर्भ में डिस्काउंट कर दिया।
अब अडानी समूह की कम्पनियों की शेयर बाजार में आंकी जा रही हैसियत की बात कर लेते हैं। अडानी एंटरप्राइजेज की कीमत जुलाई 2013 में 216.15 जुलाई 2014 में 492.70 और 26 मई 2014 को अडानी एंटरप्राइजेज सबसे ऊंचे भाव पर पहुंचा। 22 मई 2015 को अडानी एंटरप्राइजेज का भाव 794.75 के भाव पर बिका। लेकिन, जून 2015 से अडानी एंटरप्राइजेज का भाव जो तेजी से गिरना शुरू हुआ, तो अभी तक संभल नहीं सका है। आज जुलाई 2017 में अडानी एंटरप्राइजेज 140 रुपये के नीचे बिक रहा है। यानी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद करीब 500 रुपये का बिक रहा अडानी एंटरप्राइजेज का शेयर आज 140 रुपये के आसपास बिक रहा है।
अडानी समूह की दूसरी महत्वपूर्ण कम्पनी है अडानी पावर। अडानी पावर के एक शेयर की कीमत जुलाई 2013 में 42.60 रुपये थी। जुलाई 2014 में इसमें अच्छी तेजी देखने को मिली और इसका  भाव 65.35 रुपये हो गया। इसके बाद तो अडानी पावर से जैसे सारा पावर ही खत्म हो गया।  जुलाई 2015 में अडानी पावर के शेयरों का भाव भी तेजी से गिरता दिखा। जुलाई 2015 में अडानी पावर का एक शेयर 29 रुपये से कम में मिल रहा था। आज की तारीख में यानी जुलाई 2017 में भी अडानी पावर के शेयर 30 रुपये से कम में ही मिल जा रहा है। यानी मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अडानी पावर के जिन शेयरों का भाव 65 रुपये के ऊपर पहुंच गया था, आज वही शेयर 30 रुपये से भी कम में मिल रहा है, मतलब आडानी पावर का भाव आधे से भी कम हो गया। हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि अडानी का भाव एकदम ही गिर गया हो। अडानी समूह की कम्पनी अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन का भाव बढ़ा है। अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन के शेयर की कीमत जुलाई 2013 में 151.55 रुपये थी। 2014 जुलाई की शुरुआत में इन शेयरों की कीमत 270 रुपये के पार चली गई। जुलाई 2016 में शेयरों के भाव गिरकर 200 रुपये के आसपास पहुंच गए। आज की तारीख में अडानी पोर्ट का शेयर 340 रुपये के आसपास बिक रहा है। कुल मिलाकर अगर हम विश्लेषण करें, तो मोदी के पीएम बनने का अडानी को फायदा कम है, नुकसान ज्यादा।

Thursday, April 06, 2017

सेंसेक्स 30000 पहुंचा, रफ्तार की वजहें भी जान लीजिए

बांबे स्टॉक एक्सचेंज की रामनवमी शुभकामना
शेयर बाजार में जश्न का माहौल है। माहौल कुछ वैसा ही है, जैसा नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीदों से था। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने 3 साल होने जा रहे हैं। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि शेयर बाजार में अच्छी तेजी देखने को मिल रही है। Sensex सेंसेक्स बुधवार को कारोबार में 30000 के पार चला गया। 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे भी इसकी एक बड़ी वजह है। लेकिन, दूसरी कई वजहें हैं, जिस पर आपका ध्यान नहीं गया होगा।
1 जुलाई से लागू हो जाएगा जीएसटी
लम्बे समय से किन्तु-परन्तु के फेर में फंसा जीएसटी कानून अब 1 जुलाई से लागू होने जा रहा है। केंद्र सरकार ने इसे लागू कराने के लिए जरूरी चारों बिलों को लोकसभा से पास करा लिया है। राजस्व सचिव हंसमुख अधिया का साफ कहना है कि कारोबारियों को जीएसटी के लिए तैयार होने का बहुत वक्त दिया गया है। सरकार इसे जुलाई से लागू करने जा रही है। कानून तैयार है और नियम सबको बता दिया गया है। तकनीकी बुनियादी ढांचा भी तैयार है।
कारोबार करना आसान होने की उम्मीद
जीएसटी लागू होने के बाद देश में कारोबारियों के लिए राहत की उम्मीद की जा रही है। खासकर कारोबारियों को तमाम तरह के टैक्स की वजह से अलग-अलग विभागों के चक्कर काटने से मुक्ति मिल सकती है। माना जा रहा है कि इससे देश में कारोबार करना आसान होगा।
बजट प्रक्रिया का समय से पहले पूरा होना
इस साल नरेंद्र मोदी की सरकार ने बजट करीब एक महीने पहले पेश कर दिया। चुनाव के समय बजट पेश करने को लेकर सरकार की जमकर आलोचना भी हुई। लेकिन, अब उसके सार्थक परिणाम दिख रहे हैं। सरकार ने एक अप्रैल से पहले ही बजट प्रावधान की प्रक्रिया पूरी कर ली है। सभी विभागों और मंत्रालयों का बजट अलॉट कर दिया है। अब सभी विभागों के पास बजट खर्च करने के लिए पूरे एक साल का समय होगा। साथ ही राज्यों को भी अपना बजट बनाने में आसानी होगी।
5 महीने के ऊंचे स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग
मार्च महीने में देश की फैक्ट्रियों में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधि 5 महीने में सबसे ज्यादा रही है। मार्च महीने में नए ऑर्डर और बेहतर मांग की वजह से मैन्युफैक्चरिंग तेजी से बढ़ी है। उत्पादन तेजी से बढ़ने की उम्मीद दिख रही है। साल के तीनों शुरुआती महीनों जनवरी, फरवरी और मार्च में मैन्युफैक्चरिंग में लगातार तेजी देखने को मिली है।
सर्विस क्षेत्र में भी आई तेजी
लगातार दूसरे महीने सर्विस सेक्टर में तेजी देखने को मिली है। नए ऑर्डर जमकर मिले हैं। Pollyanna De Lima, economist कहते हैं कि भारत के निजी क्षेत्र के कारोबार में मार्च महीने में तेज उछाल देखने को मिल रही है। मांग और उत्पादन दोनों ही बढ़ा है। विमुद्रीकरण से आई कमजोरी से बहुत तेज वापसी हुई है। रोजगार के नए मौके बन रहे हैं।
सरकारी खजाने में बढ़ी रकम
इस साल सरकार ने जबर्दस्त कर वसूली की है। सरकार की कर वसूली 18% ज्यादा रही है। ये पिछले 6 सालों में सबसे ज्यादा है। सरकार के खजाने में टैक्स के जरिए 17.10 लाख करोड़ रुपये आए हैं। प्रत्यक्ष कर 14.2% और अप्रत्त्यक्ष कर 22% बढ़ा है। पिछले साल के मुकाबले इस साल इनकम टैक्स ग्रोथ 21% रही है।
रिकॉर्ड अनाज उत्पादन
इस साल रिकॉर्ड अनाज का उत्पादन होने का अनुमान है। गेहूं, दाल और चावल की पैदावार इस साल अब तक सबसे ज्यादा होती दिख रही है। 2016-17 में कुल 27.20 करोड़ टन अनाज उत्पादन का अनुमान लगाया जा रहा है। पिछले साल से ये 8% ज्यादा है। पिछले साल 25.16 करोड़ टन अनाज की पैदावार हुई थी। इससे पहले 2013-14 में रिकॉर्ड 26.50 करोड़ टन अनाज की पैदावार हुई थी।
5 में से 4 राज्य में बीजेपी की सरकार

हाल में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को जबर्दस्त सफलता मिली है। 5 में 4 राज्यों में बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है लेकिन, लम्बे समय से उत्तर प्रदेश का देश की जीडीपी में योगदान बहुत कम रहा है। उम्मीद की जा रही है कि केंद्र और राज्य में बीजेपी की ही सरकार होने से उत्तर प्रदेश केंद्र की नीतियों को आगे बढ़ाने का काम करेगा। 

Wednesday, September 07, 2016

सरपट भागते सेंसेक्स की बुनियाद

भारतीय शेयर बाजार को जैसे अचानक कोई संजीवनी सी मिल गई हो। इस साल अब तक सेंसेक्स 10.5% से ज्यादा चढ़ चुका है। 29000 को छूने के बाद सेंसेक्स थोड़ा सुस्ताता नजर आ रहा है। सेंसेक्स को 29000 छूने में करीब डेढ़ साल लग गए। दरअसल ये पिछले डेढ़ साल सरकार के लिए भी ढेर सारी मुश्किलों वाले रहे हैं। लेकिन, अब सरकार भी मजबूतत नजर आ रही है और शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा भी पक्का नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब अर्थव्यवस्था को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नजर आ रहे हैं। इसकी ढेर सारी वजहें हैं और शेयर बाजार की मजबूती में दिल्ली से लेकर वॉशिंगटन तक की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। मौसम से लेकर महंगाई ने बाजार को मारक रफ्तार दे दी है। उन ढेर सारी वजहों में से सबसे अहम 5 वजहें ये रहीं।

GST कानून बनने की ओर
भारत में कर सुधारों का सबसे बड़ा कानून बनने जा रहा है। मोदी सरकार के दो साल होने के बाद संसद ने GST बिल को पास कर दिया। संसद से मंजूर होने के बाद तेजी से GST कानून बनने की तरफ बढ़ रहा है। 17 राज्यों की विधानसभा ने GST को मंजूर कर लिया है। जिस तेजी से राज्यों ने इसे मंजूर किया है। उससे सरकार के 1 अप्रैल 2017 से इसे कानून बनाने की राह आसान होती दिख रही है। सरकार ने GST काउंसिल की मदद के लिए GST सचिवालय बनाने पर चर्चा शुरू कर दी है। हालांकि, अभी भी कानून बनाने के लिए इसे लंबा सफर तय करना है।

काबू में आती महंगाई
इस साल रिकॉर्ड दाल की पैदावार का अनुमान है। अच्छे मॉनसून की वजह से कुल अनाज भी बेहतर होने का अनुमान है। इसकी वजह से भी महंगाई काबू में आती दिख रही है। इसका असर भी दिखने लगा है। 140 रुपये किलो बिक रही अरहर दाल 100 रुपये किलो के आसपास बिकने लगी है। हालांकि, महंगाई दर 6% प्रतिशत के ऊपर है जो, रिजर्व बैंक के 5% के लक्ष्य से ऊपर है। लेकिन, बेहतर मॉनसून से कम से कम खाने-पीने के सामानों की महंगाई और कम होने की उम्मीद दिख रही है। ग्रामीण क्षेत्र में अच्छी मांग होने से कंपनियों – खासकर कंज्यूमर ड्यूरेबल, मशीनरी- की बिक्री बढ़ने की उम्मीद है। इससे कंपनियों की बैलेंसशीट बेहतर होने के आसार हैं।  

उर्जित पटेल से मिली ऊर्जा
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को हटाने को लेकर दुनिया भर की एजेंसियां और आर्थिक विश्लेषक भारतीय मौद्रिक नीति को लेकर आशंका में थे। लेकिन, उर्जित पटेल का रिजर्व बैंक का गवर्नर बनना सभी आशंकाओं को खारिज करता है। रिजर्व बैंक गवर्नर उर्जित पटेल का अभी तक का रिकॉर्ड आश्वस्त करता है कि भारत की मौद्रिक नीति बदलने वाली नहीं हैं। साथ ही ये भी पटेल और मोदी सरकार के बीच विवाद भी नहीं होने वाला। शेयर बाजार का नए गवर्नर में भरोसा इसी बात से समझा जा सकता है कि उदारीकरण के बाद शेयर बाजार ने रघुराम राजन के बाद अब उर्जित पटेल का भी स्वागत इतने शानदार तरीके से किया है। 4 सितंबर को सेंसेक्स 1.6% चढ़ा है।

मैन्युफैक्चरिंग में जबर्दस्त तेजी
मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में जबर्दस्त तेजी देखने को मिल रही है। प्रधानमंत्री क मेक इन इंडिया का असर साफ नजर आ रहा है। ढेर सारी कंपनियां जो अभी तक असेंबलिंग करती थीं। अब भारत में ही मैन्युफैक्चरिंग कर रही है। मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर इंडेक्स 13 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर है। मैन्युफैक्चरिंग की जीडीपी में हिस्सेदारी 25% है।

अमेरिका से मिले संकेत
अमेरिकी रिजर्व बैंक इस महीने के आखिर में ब्याज दरें नहीं बढ़ाएगा। रोजगार के ताजा आंकड़े आने के बाद ज्यादातर विश्लेषकों का ये मानना है। इसकी वजह से दुनिया भर के निवेशक विकासशील बाजारों में निवेश करने को लेकर उत्साहित हैं और भारत उसमें सबसे ऊपर है।

Thursday, April 09, 2015

भरोसा लौटने की राह पर भारतीय शेयर बाजार

भारतीय शेयर बाजार दुनिया के दूसरे बाजारों के मुकाबले बेहतर ही रहा है। जब भारतीय शेयर बाजार एक ही स्तर पर लगातार करीब तीन सालों तक बने रहे, तब भी सेंसेक्स और निफ्टी दुनिया के दूसरे बाजार सूचकांकों से बेहतर करते रहे। लेकिन, यूपीए दो में भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा बहुत बन नहीं सका। फिर वो विदेशी निवेशक हों या देसी निवेशक या फिर कहें रिटेल इनवेस्टर। विदेशी निवेशकों यानी एफआईआई को लुभाने के लिए यूपीए की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में हरसंभव कोशिश की लेकिन, मामला बन नहीं सका। मल्टीब्रांड रिटल में एफडीआई को मंजूरी देने के सरकार के फैसले के बाद भी धरातल पर इसका असर नहीं दिखा। यहां तक वॉलमार्ट और दूसरे विदेशी मल्टीब्रांड रिटेलर की कोई बड़ी रिटेल दुकान भारत के किसी कोने में चमकती नहीं दिख सकी। इस सबका असर ये रहा कि भारतीय शेयर बाजार में विदेशी और देसी निवेशक प्रवेश करने से बचते रहे। उस पर दुनिया की रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत और भारतीय शेयर बाजार की साख बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तीन साल से स्थिर शेयर बाजार से विदेशी निवेशक भाग रहे थे। साथ ही 2008 में बुरी तरह से मार खाए देसी निवेशक तो दलाल स्ट्रीट के रास्ते की तरफ से गुजरना भी मुनासिब नहीं समझ रहे थे। लेकिन, अब एक बार फिर से शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा वापस लौटता दिख रहा है। विदेशी और देसी निवेशक दोनों ही फिर से शेयर बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। विदेशी निवेशक तो पूरी तरह से वापस आ गया है। लेकिन, देसी निवेशक अभी तोड़ी हिचक दिखा रहा है। हालांकि, ताजा डीमैक खाता खोलने के आंकड़े इस बात को पुख्ता कर रहे हैं कि भारतीय शेयर बाजार का भरोसा लौटा है। हां, 2008 वाला भरोसा पाने के लिए भारत सरकार और बाजार को अभी बहुत कुछ करना होगा।
 
मई में जब नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार आई तो जैसे शेयर बाजार को पंख लग गए। शेयर बाजार का अहम सूचकांक तीस हजार के पार चला गया। दुनिया की हर रेटिंग एजेंसी ने भारत की क्रेडिट रेटिंग निगेटिव से पॉजिटिव कर दी। इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टीना लागार्डे ने साफ कहा है कि दुनिया के निराशा भरे आसमान में भारत एक चमकता सितारा है। दुनिया के जानकार ये मान रहे हैं कि भारत सिर्फ एशिया में ही नहीं सभी उभरते बाजारों में सबसे बेहतर मुनाफा देगा। और यही वजह है कि विदेशी निवेशक धड़ाधड़ भारतीय शेयर बाजार में निवेश कर रहे हैं। अप्रैल 2014 में भारतीय शेयरों में विदेशी निवेशकों ने शुद्ध सात हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की खरीद की थी। मई में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बन गई तो ये निवेश बढ़कर साढ़े सोलह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का हो गया। सिर्फ मई महीने में ही नहीं नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद बीते साल के हर महीने में विदेशी निवेशकों ने जमकर खरीद की। सिर्फ साल का आखिरी महीना दिसंबर अपवाद रहा। दिसंबर महीने में विदेशी निवेशकों ने शुद्ध बिकवाली की और साढ़े आठ सौ करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेच दिए। लेकिन, फिर नए साल में विदेशी निवेशकों का भरोसा लौटा और जनवरी में एफआईआई ने साढ़े सत्रह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर खरीदे। फरवरी में करीब नौ हजार करोड़ रुपये और मार्च 2015 यानी बीते वित्तीय वर्ष के आखिरी महीने में विदेशी निवेशकों ने करीब नौ हजार करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश भारतीय शेयर बाजार में किया। ये भारतीय शेयर बाजार में दुनिया का भरोसा दिखाता है। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि शेयर बाजार के नजरिये से क्या देसी निवेशकों को भी नरेंद्र मोदी की सरकार पर उतना ही भरोसा है। कम से कम आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार में बाजार में पैसा लगाकर मुनाफा कमाने की इच्छा देसी निवेशक में भी बलवती हुई जाती है। शेयर बाजार में निवेश करने के लिए जरूरी है कि डीमैट खाता खोला जाए। 31 मार्च को खत्म हुए वित्तीय वर्ष में खुले डीमैट खाते पिछले चार सालों में सबसे ज्यादा हैं। एक अप्रैल 2014 से 31 मार्च 2015 के बीच सोलह लाख से ज्यादा डीमैट खाते खुले हैं। वित्तीय वर्ष 2014 में आठ लाख सात हजार, 2013 में दस लाख इकसठ हजार और वित्तीय वर्ष 2012 में दस लाख दो हजार डीमैट खाते खुले थे। बीजेपी की सरकार बनने के लिए हर महीने करीब आठ प्रतिशत ज्यादा डीमैट खाते खुल रहे हैं। और सबसे अच्छी बात ये है कि तुरंत बीते वित्तीय वर्ष में खुले खातों में से पचासी प्रतिशत से ज्यादा डीमैट खाते नए खाताधारकों के हैं। यानी देसी निवेशकों का भरोसा तेजी से लौट रहा है। तेजी से खुलते डीमैट खातों के बूते देश में ढाई करोड़ से ज्यादा निवेशक शेयर बाजार से सीधे जुड़ गए हैं। निवेशकों को इसका फायदा भी मिला है। अप्रैल से मार्च तक शेयर बाजार के दोनों अहम सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी 33 प्रतिशत से ज्यादा बढ़े हैं। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 2008 में बुरी तरह से भरोसा खोने के बाद भारतीय शेयर बाजार में देसी छोटे, मंझोले निवेशकों का भरोसा फिर से लौट रहा है। उसे लग रहा है कि एक बार फिर से देश की तरक्की से देश की कंपनियों को होने वाली तरक्की उनके शेयर भाव में भी दिखेगी। और शेयर बाजार में भारतीय कंपनियों में किया गया उनका निवेश उन्हें मुनाफा देगा। मतलब साफ है कि सरकार ने पहली बाधा मजबूती से पार कर ली है। देसी और विदेशी दोनों ही निवेशकों का खोया हुआ भरोसा लौट आया है। लेकिन, ये पहली बाधा पार करने जैसा ही है। अभी नरेंद्र मोदी की सरकार को मनमोहन सिंह की सरकार के पहले कार्यकाल यानी यूपीए वन के आखिरी साल से पहले तक का भरोसा बनाना बाकी है। 2008 में दुनिया में आई मंदी और इसके बुरे परिणाम से ध्वस्त हुए शेयर बाजार में देसी निवेशकों का उसके पहले जैसा भरोसा अब तक नहीं बन सका है। यानी कम से कम शेयर बाजार और तरक्की के मोर्चे पर 2008 जैसा माहौल बनना बाकी है। जनवरी 2008 के पहले आठ दिनों में देसी निवेशकों ने करीब एक लाख साठ हजार डीमैट खाते खोले थे। ये वो दौरर था जब रिलायंस पावर का बहुप्रतीक्षित आईपीओ आना था। और हर कोई शेयर बाजार में निवेश करके तगड़ा मुनाफा कमा लेना चाहता था। लेकिन, वही आईपीओ शेयर बाजार में आईपीओ में निवेश करने वाले लोगों के लिए बुरे सपने की तरह साबित हुआ। और 2008 की मंदी में भारतीय शेयर बाजार और रिलायंस पावर के आईपीओ में मार खाए देसी निवेशक ने तेजी से डीमैट खाता बंद कराकर बाजार से दूरी बना ली। उसके बाद 2010 में आए कोल इंडिया के आईपीओ ने ही निवेशकों को फिर से बाजार की तरफ खींचा। लेकिन, 2008 के बाद से अब तक कोल इंडिया को छोड़कर कोई ऐसा आईपीओ नहीं आया जो, निवेशकों को अपनी तरफ खींचने में कामयाब रहा हो। मतलब साफ है कि भारतीय शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट की संभावनाओं की कहानी फिर से अभी शुरू ही हुई है। और अच्छा हो कि शेयर बाजार इस बार प्राइमरी मार्केट में आए निवेशकों को साध सके। देसी कंपनियों की निवेश योजनाएं पहले से काफी बेहतर हुई हैं। विदेशी कंपनियों को भी मोदी सरकार का मेक इन इंडिया लुभा रहा है। मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रस्ट्रक्चर के मोर्चे पर काफी कुछ हो रहा है। चार महीने में सबसे बेहतर काम मैन्युफैक्चरिंग में होता दिखा है। सड़क बनाने के काम में नितिन गडकरी का मंत्रालय बेहतर कर रहा है। हालांकि, तीस किलोमीटर प्रतिदिन के महात्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में अभी बहुत लंबी दूरी तय करनी है। फिर भी बारह किलोमीटर प्रतिदिन का लक्ष्य हासिल करना भी बड़ी कामयाबी मानी जानी चाहिए। कुल मिलाकर सरकार की दिशा सही है। बस इसकी रफ्तार बेहतर करने की जरूरत है। फिर 2008 के पहले वाला भरोसा और दस प्रतिशत की तरक्की वाला सपना पूरा होने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

Monday, May 12, 2014

इतनी आसानी से अच्छे दिन तो नहीं आने वाले



12 मई को 2014 की संसद के लिए चुनाव का आखिरी दिन और शेयर बाजार का तीसरे हफ्ते का पहला कारोबारी दिन। बाजार में उम्मीदें जैसे किसी अंतरिक्षयान की गति से उछाल मार रही हैं। सोमवार को शेयर बाजार ने फिर से नई ऊंचाई पा ली है। सारी उम्मीद नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार पर टिकी है। सेंसेक्स साढ़े तेईस तो निफ्टी सात हजार पर पहुंच गया है। छे साल से भी ज्यादा समय के बाद शेयर बाजार में इस तरह की तेजी देखने को मिली है। पिछले चार-पांच सालों से इक्कीस हजार पर अंटका सेंसेक्स शुक्रवार को तेईस हजार के पार चला गया। हालांकि, तेईस हजार के ऊपर बंद होने में सेंसेक्स कामयाब नहीं हुआ लेकिन, सेंसेक्स करीब तेईस हजार पर बंद हुआ ये कहा जा सकता है। एक दिन में साढ़े छे सौ प्वाइंट से ज्यादा सेंसेक्स चढ़ गया। लेकिन, क्या ये तेजी निवेशकों के लिए पुराने अच्छे दिन लौटाने वाली है। अगर शेयर बाजार के अनुमान की मानें तो भारतीय जनता पार्टी के चुनावी नारे अच्छे दिन आने वाले हैं की तर्ज पर बाजार के भी अच्छे दिन आने वाले हैं। अब इस बाजार के अनुमान को मानें तो नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार बनने वाली है। और जो बाजार अभी तक अकेले भारतीय जनता पार्टी के 200 के अंदर रहने और मुश्किल से एनडीए बनाकर सरकार का उम्मीद में था। वो बाजार अचानक अकेले भारतीय जनता पार्टी के ही 210-240 सीटों के जीतने का अनुमान लगा रहा है और इसी आधार पर आसानी से नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनने की उम्मीद कर रहा है। 


मई महीने के दूसरे हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन जब दुनिया से किसी तरह का कोई संकेत नहीं था। सिर्फ इसी एक संकेत कि नरेंद्र मोदी मजे से  सरकार बना लेंगे। भारतीय शेयर बाजार ने वो छलांग लगा दी जिसके ट्रेडर, ब्रोकर लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। बाजार को अनुमान  ये है कि नरेंद्र मोदी की सरकार बनेगी और ढेर सारे वो रुके हुए फैसले ले लिए जाएंगे जिसके न लागू होने की वजह से दुनिया की रेटिंग एजेंसियां भारत में निवेश को जोखिम बताने लगी थीं। बाजार को उम्मीद है कि मोदी ऐसे फैसले लेंगे जिससे भारत के कारोबारी देश में तेजी से औद्योगिक गतिविधि बढ़ा सकेंगे। बुनियादी परियोजनाओं के पूरा होने में कोई रुकावट नहीं आएगी। यूपीए दो के दौरान सरकार पर जो लगातार पॉलिसी पैरलिसिस का आरोप लगता था वो, खत्म हो जाएगा। बाजार इसी आधार पर दौड़ लगा चुका है। बाजार में ये सब कुछ हुआ है मई महीने के दूसरे हफ्ते में। और मई महीने के तीसरे हफ्ते यानी 16 मई को ये तय हो जाएगा कि बाजार की उम्मीदें कितनी पूरी होंगी। मतलब नरेंद्र मोदी आसानी से सरकार बना पाएंगे या नहीं। चलिए एक बार मान लेते हैं कि 16 मई को जब ईवीएम खोले जाएंगे तो ढेर सारे कमल निशानों के साथ नरेंद्र मोदी सरकार बनाने के लिए रायसीना हिल्स की ओर बढ़ जाएंगे। ये भी मान लेते हैं कि नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी को अकेले 230-240 और बची सीटें आसानी से एनडीए के साथ पूरी हो जाएंगी। नरेंद्र मोदी की वो सरकार बन जाएगी। जो ये कह रही है कि अच्छे दिन आने वाले हैं। अब जरा ये बात कर लें कि अच्छे दिन आने का मतलब क्या। मोटा-मोटा पांच बातें अगर हो जाएं तो मुझे लगता है कि देश के लोग ये मानने लगेंगे कि अच्छे दिन आ गए हैं। सबसे पहले महंगाई कम हो जाए। महंगाई मतलब- सब्जी, अनाज और दूसरी रोज की खाने-पीने चीजें उन्हें सस्ती मिलें। फिर क्या उद्योगों को भरोसा लौटे और वो देश में आसानी से अपने उद्योग लगा चला सकें। फिर क्या कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अच्छा करने लगे। मतलब कारें, एसी, फ्रिज खूब बिकें। और क्या हो वो ये कि लोगों को सस्ता कर्ज मिले।  सस्ती ब्याज दरों पर घर, गाड़ी खरीद सकें। बुनियादी सुविधाएं यानी सड़क, बिजली, पानी की सहूलियत आसानी से मिल सके। और इस सबके लिए सबसे जरूरी कि ढेर सारे रोजगार के मौके बनें। जिससे लोगों की कमाई बढ़े और वो इस तरह से खर्च कर सके, बचा सके कि देश की तरक्की की रफ्तार यानी जीडीपी के आंकड़े दुरुस्त हो सकें।

अच्छी बात ये है कि यूपीए दो की सरकार सारी आलोचनाओं के बाद अपने पीछे अच्छा विदेशी मुद्रा भंडार खजाने में छोड़कर जा रही है। लेकिन, दूसरी देश की ऐसी समस्याएं और गंभीर हुई दिख रही हैं जिसको आधार बनाकर नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि उनकी सरकार बनाइए तो अच्छे दिए आएंगे। सबसे ज्यादा चोट पड़ी है तो भारतीयों पर महंगाई की। महंगाई का आलम ये रहा है कि पिछले तीन सालों से हर बार जब महीने का सामान खरीदने के लिए भारतीय निकलता है तो उसे पहले से ज्यादा रकम चुकानी पड़ी है। रोज की जरूरत के सामान तेजी से महंगे हुए हैं। आटा, दाल, चावल, सब्जी, दूध और दूसरी सारी जरूरी चीजें तेजी से महंगी हुई हैं। हर तीसरे महीने अखबारों में विज्ञापन देकर दूध कंपनियां दूध के दाम एक-दो रुपया बढ़ाने के तर्क पेश करती हैं। और सबसे बड़ी बात ये रही है कि यूपीए एक हो या दो- दोनों ही कार्यकाल में देश में मॉनसून बेहतर रहा है और खाद्यान्न के मामले में भारत की स्थिति बहुत अच्छी रही है। इसके बावजूद सरकार अनाज, फल, सब्जी, दूध की कीमत काबू में नहीं कर सकी। और प्याज की कीमतों पर तो कोहराम मचा। अब सवाल ये है कि नरेंद्र मोदी इस मोर्चे पर क्या आसानी से काबू पा लेंगे। तो इसका जवाब नहीं में हैं। क्योंकि, अभी तक जो मौसम का हाल रहा है वो, साफ दिखा रहा है कि इस साल मॉनसून सामान्य से कम हो सकता है जिसका सीधा सा मतलब होगा कि खेती पर बुरा असर पड़ेगा। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हालत का अंदाजा लगाइए कि ताजा कारों की बिक्री का आंकड़ा बढ़ने के बजाए करीब दस प्रतिशत कम बता रहा है। मतलब लोगों की जेब में कारें खरीदने के पैसे नहीं हैं। वो भी तब जब दुनिया की हर कार कंपनी भारतीयों को लुभाने के लिए ढेर सारे नए मॉडल हर महीने ला रही है। देश में महंगे कर्ज की वजह से औद्योगिक घरानों को अपनी विस्तार योजना रोकनी पड़ी है। इससे देसी निवेश बुरी तरह प्रभावित हुआ है। घर खरीदने के लिए ग्यारह प्रतिशत के आसपास और गाड़ी खरीदने के लिए लोगों को साढ़े बारह प्रतिशत से ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है। इसकी वजह से रियल एस्टेट सेक्टर में जबर्दस्त ठहराव आ गया है। दिल्ली, मुंबई के बाजार में साल भर पहले के भाव अभी भी थोड़ा खोजने पर मिल जा रहे हैं। डेवलपर भी फंड की वजह से अपने चल रहे प्रोजेक्ट को पूरा नहीं कर पा रहे हैं और नए प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं कर पा रहे हैं। अब रियल एस्टेट सेक्टर को उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी आएंगे तो इस सेक्टर में तेजी आएगी लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस तरह की नीतियां भारत सरकार की रियल एस्टेट सेक्टर के लिए उसमें डर यही है कि 16 मई के बाद की रियल एस्टेट की तेजी सिर्फ बुलबुला होगी, काला धन बढ़ाने वाली होगी। वो फायगा करेगी तो रियल एस्टेट डेवलपर्स का। उससे देश की जीडीपी में खास बेहतरी नहीं होने वाली। जीडीपी की बेहतरी की चिंता इसलिए कि जीडीपी ग्रोथ यानी तरक्की की रफ्तार इस समय दशक में सबसे कम यानी साढ़े पांच प्रतिशत की है। और इस वित्तीय वर्ष में भी इसी के आसपास ये रफ्तार रहती दिख रही है। क्योंकि, जब तक अगली सरकार, चाहे वो मोदी की हो या किसी और की, काम शुरू कर पाएगी तब तक इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही बीत चुकी होगी और दूसरी तिमाही का आधार भी बन चुका होगा। ऐसे में इस तरक्की की रफ्तार को चमत्कारिक तरीके से बढ़ाना नरेंद्र मोदी या अगली किसी भी सरकार के लिए चुनौती होगी।

बात हमने शेयर बाजार के संकतों से शुरू की थी। इसलिए शेयर बाजार की ही बात फिर से कर लेते हैं और उसके संकेतों को भी ज्यादा गंभीरता से समझने की कोशिश करते हैं। मई के दूसरे हफ्ते में शेयर बाजार में ये जो तेजी देखने को मिली है ये पूरी तरह से उन विदेशी खिलाड़ियों की वजह से है जो एक झटके में अपनी सारी रकम निकालकर किसी दूसरे अच्छे मुनाफा देने वाले ठिकाने की ओर  चल देते हैं। यानी 2008 की ही तरह तेजी से विदेशी निवेशक मुनाफा लेकर भागने लगे तो सेंटिमेंट पर चलने वाले बाजार को बचाना बड़ा मुश्किल होगा। शेयर बाजार की तेजी में जो शेयर सबसे तेजी से भागे हैं उनमें बैंक, पावर और रियल एस्टेट सबसे आगे हैं। हालांकि, अच्छी बात ये है कि मई के दूसरे हफ्ते में आई इस तेजी के नेता वो शेयर हैं जिनके फंडामेंटल्स काफी अच्छे हैं और वो लंबे समय से बाजार में आई कमजोरी की वजह से पिट रहे थे। लेकिन, इसी का दूसरा पहली ये भी है कि शेयर बाजार की इस तेजी में नब्बे प्रतिशत से ज्यादा कंपनियां शामिल नहीं हैं और न ही देसी निवेशक इस तेजी का हिस्सा है। शेयर बाजार में भारतीय देसी निवेशकों की रुचि भी कितनी तेजी से खत्म हुई है इसका अंदाजा लगाने के लिए एक आंकड़ा काफी होगा। इस साल के पहले महीने से मार्च महीने में देसी निवेशकों यानी एनएसडीएल के जरिए ट्रेडिंग अकाउंट खुलवाने वाले करीब आधा प्रतिशत घटे हैं। डर ये कि अगर इस बार 16 मई के बाद 2008 जनवरी वाले हालात हुए तो देसी निवेशक ऐसा भागेंगे कि फिर बरसों ये भरोसा वापस लाने में लग जाएगा। इसलिए शेयर बाजार से मिल रहे अच्छे दिन के संकेतों पर सावधानी बरतने की जरूरत है। नई सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां होंगी फिर चाहे वो अच्छे दिन लाने का दावा करने वाले नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों। लालच से बचने की जरूरत है वरना सरकार कोई भी आए लालच अच्छे दिनों को बुरे दिन में बदल देगा। और भारतीय लोकतंत्र है पूरी तरह अनिश्चित। 99 प्रतिशत मोदी की अच्छे दिन वाली सरकार के साथ एक प्रतिशत दूसरी सरकार भी मानें तो देश की भावनाएं जिस तरह से कमजोर होंगी उन्हें उबारना बहुत बड़ी चुनौती होगी।

Monday, November 18, 2013

21000 पर फिसलता बाजार और यूपीए की सरकार




एक नवंबर को दीपावली की शुभकामनाएं देने के बहाने वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पत्रकार वार्ता बुलाई। पत्रकार वार्ता में दीपावली की शुभकामना के बहाने वित्त मंत्री देश को ये बताने आए थे कि देश की अर्थव्यवस्था के हालात काफी बेहतर हुए हैं। काफी हद तक वित्त मंत्री पी चिदंबरम की बात सही भी थे। पुख्ता आंकड़े थे उनके पास अर्थव्यवस्था की हालत सुधरने की बात साबित करने के लिए। चालू खाते का घाटा काबू में आता दिख रहा है। देश की अर्थव्यवस्था जिन अहम उद्योंगों पर टिकी हुई है उस कोर सेक्टर की ग्रोथ बेहतर हुई है। निवेशकों का भरोसा बना हुआ है। मतलब विदेशी निवेशक एफआईआई और एफडीआई दोनों ही तरीकों से भारत में निवेश कर रहे हैं। अप्रैल से अगस्त तक एफडीआई यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए 13 बिलियन डॉलर से ज्यादा देश में आ चुका है। एफआईआई के जरिए भारतीय शेयर बाजार में अच्छी खासी रकम आ चुकी है। जनवरी से अक्टूबर महीने तक एफआईआई यानी विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजार में नब्बे हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम लगाई है। सिर्फ सितंबर और अक्टूबर महीने की बात करें तो सितंबर में तेरह हजार करोड़ रुपये और अक्टूबर में साढ़े पंद्रह हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का विदेशी निवेश भारतीय शेयर बाजार में आया है। विदेशी निवेश की इस ताकत ने ही सेंसेक्स को एक बार फिर से तीन साल के बाद इक्कीस हजार के ऊपर पहुंचा दिया था। इसके अलावा भारत सरकार की एक और बड़ी चुनौती भी काफी हद तक काबू में दिख रही है। चालू खाते का घाटा इस साल 60 बिलियन डॉलर रहने की उम्मीद वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने जताई है। पिछले साल चालू खाते का घाटा 88 बिलियन डॉलर था। इसके अलावा वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने ये भी बताया कि साढ़े तीन लाख करोड़ से ज्यादा के प्रोजेक्ट की बाधाएँ दूर की जा चुकी हैं।

शुभ दीपावली बोलने आए वित्त मंत्री हालांकि, किसी भी आर्थिक अशुभ की खबर पर चर्चा नहीं करना चाहते थे लेकिन, सारे मजबूत आंकड़ों को पेश करते उनके मुंह से एक जरूरी बात निकली जो समझनी बेहद जरूरी है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने मुस्कुराते हुए कहा कि अर्थव्यवस्था के हालात बेहतर हुए हैं और आगे बेहतर ही होंगे। लेकिन, उन्होंने निवेशकों को शेयर बाजार में ज्यादा उत्साह में निवेश करने से बचने की सलाह दी। इस सलाह के मायने समझना जरूरी है। वित्त मंत्री ने अपनी आगे की जो प्राथमिकताएं गिनाईं वो इस सलाह की वजह साफ कर देती हैं। चिदंबरम साहब ने कहा कि रुपया स्थिर हुआ है लेकिन, उसे और स्थिर करना, शेयर बाजार में स्थिरता और महंगाई घटाना प्राथमिकता होगी। उन्होंने जोड़ा कि ये प्राथमिकताएं पूरी हुईं तो सरकार और फैसले ले सकेगी। अब ये समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इन प्राथमिकताओं के पूरा होने और फैसले लेने की बात चिदंबरम साहब को क्यों कहनी पड़ी। दरअसल इन्हीं प्राथमिकताओं में ही सारी बात छिपी हुई है। पिछले एक महीने से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के स्थिर भाव और डॉलर के मुकाबले रुपये के करीब 62 के आसपास के स्थिर भाव से देश में पेट्रोल की कीमतें तेल मार्केटिंग कंपनियां महीने भर में पांच रुपये लीटर से ज्यादा सस्ता कर चुकी हैं। लेकिन, ये बात कब तक बनी रहेगी ये अंदाजा लगाना मुश्किल है। क्योंकि, अब सर्दियां शुरू हो चुकी हैं। और अमेरिका, यूरोप में गैसोलीन की खपत तेजी से बढ़ जाएगी और उस वजह से कच्चे तेल की मांग भी। अकसर कई सालों से ये भी ट्रेंड रहा है कि दीपावली के ठीक पहले के दो तीन महीने एफआईआई यानी विदेशी निवेशक जमकर रकम लगाते हैं और शेयर बाजार के अहम सूचकांक सेंसेक्स को इक्कीस हजार के जादुई आंकड़े तक पहुंचा देते हैं और भारतीय रिटेल निवेशकों में ये भरोसा जग जाता है कि फिर से बाजार 2008 के पहले वाला बाजार हो गया है वो आते हैं निवेश करते हैं और फंस जाते हैं। क्योंकि, जब वो अपनी गाढ़ी बचत की कमाई शेयर बाजार में लगा रहे होते हैं तो धीरे-धीरे कब एफआईआई अपने निवेश पर काम भर का मुनाफा कमाकर निकल जाते हैं पता ही नहीं लगता। दीपावली पर रोज के पेट्रोल की कम हुई महंगाई राहत देती है लेकिन, दूसरी महंगाई अभी भी भारतीयों को जमकर परेशान कर रही है। इसीलिए वित्त मंत्री की आगे की प्राथमिकता में महंगाई को काबू में करना सबसे आगे हैं।

बीती मॉनिटरी पॉलिसी का असर दिखना शुरू हो चुका है। रघुराम राजन के रेपो रेट बढ़ाने के असर से देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और देश के सबसे बड़े होम लोन देने वाले बैंक एचडीएफसी ने करीब दशमलव दो प्रतिशत बेस रेट बढ़ाकर उसे दस प्रतिशत कर दिया है। मतलब बैंकिंग के नेताजी लोग इशारा दे चुके हैं पीछे-पीछे छोटे-बड़े बैंक भी यही करेंगे और महीने की तय तारीख पर किस दिन से आपकी बढ़ी ईएमआई कटेगी इसका बस इंतजार भर करिए। ये महंगाई तो महीने में एक दिन मारेगी। लेकिन, हर रोज प्याज, टमाटर और आलू का बढ़ा भाव आपके खाने का स्वाद पहले से ही कड़वा कर रहा है।
और एक शेयर बाजार से दीपावली की मुहूर्त ट्रेडिंग के दिन अच्छी खबर आई जब छे साल बाद सेंसेक्स ने इक्कीस हजार के ऊपर रिकॉर्ड स्तर पर बंद होने में कामयाबी पाई। 8 जनवरी 2008 वो तारीख है जिस दिन सेंसेक्स ने 21000 के जादुई आंकड़े को पार किया था। हालांकि, उस दिन भी सेंसेक्स बंद हुआ तो इक्कीस हजार के आंकड़े को बरकरार रखने में कामयाब नहीं हो पाया। और 5 नवंबर 2010 को पहली बार सेंसेक्स इक्कीस हजार के जादुई आंकड़े के ऊपर बंद होने में कामयाब हो पाया। लेकिन, उस तारीख से अगले तीन सालों तक सेंसेक्स 21000 के आंकड़े के ऊपर बंद नहीं हो सका। 30 अक्टूबर 2013 को सेंसेक्स 21000 के ऊपर बंद हुआ। और इक्कीस हजार का ये जादुई आंकड़ा इस दीपावली की मुहूर्त ट्रेडिंग के दिन सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त करने में कामयाब रहा और सेंसेक्स 21,239 अंकों की रिकॉर्ड ऊंचाई पर बंद होने में कामयाब रहा। जाहिर शेयर बाजार, सरकार और निवेशकों के लिए ये बड़ी खुशी की खबर है। लेकिन, फिर से वो तारीख याद करें जिस दिन सेंसेक्स इक्कीस हजार के पार पहुंचा था तो सारी खुशी हवा हो जाती है। क्योंकि, करीब छे साल बाद भी शेयर बाजार उसी जगह खड़ा है यानी इक्कीस हजार पर। जबकि, इन छे सालों में महंगाई करीब सत्तर प्रतिशत बढ़ी है। इसका सीधा सा मतलब हुआ कि जो भी शेयर बाजार में बना हुआ है या ऐसे उछाल वाले मौकों पर शेयर बाजार में कूदता है वो पूरी तरह से घाटे में है। मतलब साफ है सेंसेक्स का इक्कीस हजार पर होना भ्रम है। मनमोहिनी अर्थव्यवस्था मनमोहन सिंह के ही काबू में नहीं दिख रही है। सरकार के सुधार के फैसलों पर विदेशी निवेशक यकीन करने करने को तैयार नहीं हैं। वॉलमार्ट की कोई दुकान दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले शहरों को तो छोड़िए दिल्ली मुंबई के बाजार में भी फिलहाल नहीं दिखने वाली। और सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात ये है कि शेयर बाजार की इस तेजी के पीछे एक बड़ी वजह ये भरोसा माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की सरकार आने वाली है। यानी सरकार के फैसलों का कम ही योगदान शेयर बाजार की तेजी में है। इसलिए वित्त मंत्री पी चिदंबरम की सलाह मैं दोहराना चाहूंगा कि रिटेल निवेशक इस समय शेयर बाजार में ज्यादा उत्साह दिखाने से बचें। बाजार में निवेश के मौके अभी फिर आएंगे। 21000 के बाजार और यूपीए की सरकार के रिश्ते अभी बने हुए हैं। दीपावली के तुरंत बाद सेंसेक्स ने अपनी सारी कमाई खो दी है। सेंसेक्स लगातार संघर्ष कर रहा है 21000 पर बने रहने के लिए।

Tuesday, July 12, 2011

सुस्त बाजार, गायब पब्लिक ऑफर


इस साल शेयर बाजार की डांवाडोल रफ्तार बाजार के जरिए पैसा जुटाने की इच्छा रखने वाली नई कंपनियों पर भारी पड़ती दिख रही है। साल 2011 आधा बीत रहा है और अभी तक शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट में पैसा लगाने वालों के लिए ज्यादा विकल्प नहीं दिख रहे हैं। पिछले साल की तेजी के भरोसे इस साल कई कंपनियों ने अपना आईपीओ लाने का इरादा कर रखा था। लेकिन, प्राइमरी मार्केट में कंपनियां उतरने का साहस ही नहीं जुटा पा रही हैं। जनवरी से जून महीने की ही बात करें तो, 15 आईपीओ बाजार में उतरने थे लेकिन, समयसीमा खत्म होने के बाद भी वो, बाजार में नहीं आए। ये वो 15 आईपीओ यानी इनीशियल पब्लिक ऑफर थे जिन्हें, बाजार रेगुलेटर सेबी से मंजूरी मिल चुकी थी। एक बार समय सीमा खत्म होने का सीधा सा मतलब ये हुआ कि अब इनके पब्लिक ऑफर फिलहाल तो नहीं आ सकेंगे।

जिन कंपनियों के आईपीओ सेबी से मंजूरी के बाद भी बाजार में नहीं आ सके। वो, कंपनियां हैं जिंदल पावर, रिलायंस इंफ्राटेल, गुजरात स्टेट पेट्रोलियम, स्टरलाइट एनर्जी, लोढ़ा डेवलपर्स, बीपीटीपी, एंबियंस, ग्लेनमार्क जेनेरिक्स, नेपच्यून डेवलपर्स, कुमार अर्बन डेवलपर्स और एएमआर कंसट्रक्शंस। इनमें से ज्यादातर कंपनियां या तो रियल एस्टेट सेक्टर की हैं या फिर पावर सेक्टर की। वैसे, इन कंपनियों के आईपीओ न आ पाने की बड़ी वजह ये है कि रियल एस्टेट सेक्टर के हालात अंदर से खराब हैं। ज्यादातर कंपनियों के प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं और पिछले छे महीने में कीमतें भी स्थिर रही हैं। इसके अलावा पावर सेक्टर की कंपनियों के आईपीओ के लटकने की जो वजह बताई जा रही है वो, ये कि पावर सेक्टर की कंपनियों को निवेश पर मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया।

अब ये 15 आईपीओ बाजार से बाहर हो चुके हैं। अगर ये आईपीओ बाजार में आते तो, करीब 25 हजार करोड़ रुपए बाजार से जुटाते। लेकिन, फिलहाल आईपीओ बाजार में दिख रही सुस्ती से निवेशकों को सिर्फ सेकेंडरी बाजार के सहारे ही रहना पड़ रहा है। सेकेंडरी बाजार यानी वो, शेयर जो पहले से ही शेयर बाजार में लिस्टेड हैं। आईपीओ बाजार में कमजोरी की सबसे बड़ी वजह यही मानी जा रही है कि साल 2011 की पहली छमाही में एफआईआई निवेश की रफ्तार बहुत घटी है। इसकी वजह से सेंसेक्स जो, दिवाली पर 21000 का स्तर पार कर गया था। उसके बाद 18000-19000 के बीच में ही लटक रहा है।


दरअसल पिछले साल के आखिर में जिस तरह से बाजार में तेजी आई थी। और, देश की तरक्की दस अंकों के नजदीक जाती दिख रही थी। उसने निवेशकों का सेंटिमेंट बेहद मजबूत कर दिया था। बाजार के कई तो, सेंसेक्स के इस साल जुलाई के महीने तक 25000 के नजदीक पहुंचने की भविष्यवाणियां भी करने लगे थे। लेकिन, एक के बाद एक घपले-घोटालों की सरकार के कारनामे जैसे-जैसे सामने आने लगे, धीरे-धीरे सारे सेंटिमेंट उल्टी दिशा में चल पड़े। महंगाई को 5-6 प्रतिशत के बीच में लाने का भरोसा बार-बार दिलाने वाली ये सरकार अब बात करने लगी है कि 7-8 प्रतिशत की महंगाई दर ही अभी की सही महंगाई दर है।

इस सबने भारतीय बाजारों के सेंटिमेंट को बुरी तरह प्रभावित किया है। सेंसेक्स के दिग्गज रिलायंस के लिए एक के बाद एक उत्पादन से लेकर नीतियों में फेरबदल कराने तक की ऐसी खबरें आईं कि ये उबर ही नहीं पा रहा । यही वजह है कि कंपनियों नए आईपीओ बाजार में उतारने का साहस नहीं कर पा रही हैं। साल 2010 के आखिर में बाजार में आई शानदार तेजी के भरोसे आईपीओ में पैसा लगाकर निवेशकों ने जमकर मुनाफा कमाया। पिछले साल के आखिर में आए कोल इंडिया के आईपीओ ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। और, कोल इंडिया ही क्यों, साल 2010 शेयर बाजार में आईपीओ मार्केट के लिए कितना खास रहा इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सिर्फ सरकारी कंपनियों के पब्लिक इश्यू में ही दस लाख से ज्यादा निवेशक शामिल हुए। हां, सबसे बड़ा धमाका रहा कोल इंडिया के काले सोने का।


साल 2010 में शेयर बाजार के प्राइमरी मार्केट की सबसे बड़ी खबर बनी करीब पंद्रह हजार करोड़ रुपए का कोल इंडिया का आईपीओ। कोल इंडिया ने देश का सबसे बड़ा IPO बाजार में उतारा और निवेशकों ने इसे हाथों हाथ लिया। दिवाली के पहले आए इस IPO ने निवेशकों को मालामाल भी किया। कोल इंडिया के पब्लिक इश्यू में पैसा लगाने वाले निवेशकों को 60 प्रतिशत तक मुनाफा कमाने को मिला। कोल इंडिया का IPO निवेशकों के लिए काला सोना साबित हुआ। ये शेयर ऐसा चढ़ा कि इसने मार्केट कैपिटलाइजेशन में ओएनजीसी तक को पीट दिया। इसके बाद तो जो भी IPO आए निवेशकों ने उसे हाथों हाथ लिया। सिर्फ सरकारी कंपनियों के ही पब्लिक इश्यू के लिए दस लाख से ज्यादा निवेशक लाइन में लगे। कोल इंडिया (CIL) के अलावा पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन (PGCIL), और मैंगनीज ओर (MOIL) के IPO को अच्छा रिस्पॉन्स मिला।

इसके अलावा साल 2010 में जितने IPO आए हैं वो, तेजी 3 साल के बाद दिखी है। 2007 में तेजी के दौर में 96 IPO आए थे लेकिन, जनवरी 2008 में शुरू हुई मंदी के असर से 2008 में 36 और 2009 में सिर्फ 21 कंपनियां ही बाजार में अपना IPO लाने की हिम्मत जुटा सकीं। 2010 में 72 IPO आए। यानी साल 2010 प्राइमरी मार्केट के लिए शानदार साबित हुआ है। लोगों को उम्मीद थी कि साल 2011 भी आईपीओ मार्केट के लिए धमाकेदार साबित होगा। लेकिन, आधा साल बीत जाने के बाद भी इस साल अब तक सिर्फ 24 आईपीओ ही बाजार में आए हैं। अब उम्मीद साल की अगली छमाही पर ही टिकी है। लेकिन, वो तेजी तभी आएगी जब महंगाई से राहत मिले और देश की तरक्की की रफ्तार फिर से तेज हो सके। साथ ही सबसे जरूरी ये कि देसी उद्योगपतियों को ये न लगे कि भारत से बेहतर मुनाफा भारत से बाहर पैसा लगाकर बनाया जा सकता है। ये सब हुआ तभी विदेशी निवेशक फिर से लौटेंगे और उनके भरोसे देसी निवेशक भी। इसलिए अभी प्राइमरी मार्केट में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए सलाह यही है कि वो, सोच-समझकर ही किसी नई कंपनी में रकम लगाएं।


कुल 25000 करोड़ रुपए के आईपीओ बाजार में नहीं आए


2007 में 96 आईपीओ आए


2008 में 36 आईपीओ आए


2009 में सिर्फ 21 आईपीओ आए


2010 में 72 आईपीओ आए


2011 में अब तक सिर्फ 24 आईपीओ आए


(ये लेख शुक्रवार पत्रिका में छपा है)

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

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