Showing posts with label दिल्ली. Show all posts
Showing posts with label दिल्ली. Show all posts

Monday, June 26, 2017

नौकरी में भागते रहने का सुख !

मेरी पहली नौकरी प्रयाग महाकुम्भ में वेबदुनिया के साथ
ये सलाह अनुभव से उपजी है और सभी के लिए है। लेकिन ख़ासकर पत्रकारों के लिए। ये सही है कि हम पत्रकार या तो दिल्ली, मुम्बई जैसी बड़ी जगह या फिर अपने राज्य की राजधानी या फिर अपने जिले के ही धाँसू पत्रकार बनना चाहते हैं। इसमें से किसी भी एक मोह से उबर पाना बेहद कठिन होता है। मैं मूलत: प्रतापगढ़ से हूँ। पैदाइश के बाद हमारी पूरी बनावट इलाहाबाद की देन है। सबसे कठिन फैसला था, इलाहाबाद छोड़ना। बहुत कड़ा मन करके ये फैसला लिया था। आज उस फैसले पर मुग्ध होने जैसा भाव रहता है। फिर कानपुर, देहरादून, मुम्बई होते अभी दिल्ली टिका हूँ। हालाँकि, मैं ठहरना दिल्ली ही चाहता था। पहली बार ११ जुलाई २००१ को दिल्ली आकर गिरा था। लेकिन, दिल्ली निरन्तर भगाती रही। उसी भागने में ऊपर लिखे शहरों में रहना हुआ। आत्मीय सम्बन्ध बने। कानपुर और मुम्बई दोनों ही शहरों को लेकर मन में अच्छा भाव नहीं था। लेकिन, कानपुर में ग़ज़ब के आत्मीय सम्बन्ध बने और समझ भी बेहतर हुई। ईमानदार विश्लेषण ये कि  हर शहर ने मुझे बेहतर होने में मदद की और सबसे बड़ी बात कि समझ का दायरा बहुत बड़ा कर दिया।
हिन्दुस्तान इतनी विविधता वाला देश है कि यहां आप एक छोटी सी 2-4 दिन की यात्रा में एक पर्यटक की तरह कहीं घूम-टहलकर तो आ जाते हैं। अपने फेसबुक पन्ने के लिए कुछ अच्छी तस्वीरें जुटा लेते हैं। लेकिन, उस जगह से जुड़ाव बहुत कम हो पाता है। हिन्दुस्तान को समझने, पक्का हिन्दुस्तानी बनने के लिए जरूरी है कि हर कोई, हर किसी की भावना को समझे। कानपुर, मुम्बई और देहरादून ने मुझे ये समझने में मदद की। मुम्बई मुझे बहुत परेशान करता था। यहां तक कि 4 साल रहने के बाद लगभग विद्रोही अन्दाज में मैंने मुम्बई छोड़ा था। लेकिन, ये भी सच है कि उन 4 सालों में मिली, सहेजी अच्छी यादों की वजह से आज भी मुम्बई जाने का मन होता है। यही हाल देहरादून और कानपुर को लेकर भी है। इस लिहाज से ज्यादा जगहों पर रहना नहीं हो सका। इसीलिए नए पत्रकारों को मेरी ये सलाह है कि पढ़ाई पूरी होते ही पहला मौका मिलते ही बैगपैक करके अपने शहर, अपनी राजधानी और देश की राजधानी से जितना दूर जा सकते हैं, चले जाइए। इससे देश के और नजदीक पहुंचेंगे। लिखने, पढ़ने, समाज को समझने के लिहाज से अद्भुत, सकारात्मक बदलाव होगा।
कम से कम, जीवनसाथी पक्का कर लेने और बच्चों के जिन्दगी में आने तक तो ये प्रक्रिया जितनी तेजी से पूरा कर सकते हों, तो करिए। सच बता रहा हूं, उस भगान लेने के दौरान के अनुभव जिन्दगी में कमाल की समझ, मिठास विकसित करते हैं। और पत्रकार के लिए तो ये जरूरी है कि वो देश के हर हिस्से के लोगों की समझ को थोड़ा बहुत तो समझ सके। वरना अपने शहर, अपनी राजधानी और देश की राजधानी के लिहाज से पूरी समझ बनाएगा। फिर मुश्किल आजीवन रहेगी। दूसरे काम करने वालों के लिए भी ये बहुत सुखद अनुभव देने वाला हो सकता है। लेकिन, पत्रकार के लिए ये सबसे जरूरी सबक के जैसा है। ये किताबी ज्ञान तो है नहीं, अपने निजी अनुभव से सीखा है, इसलिए सकारात्मक परिणाम का दावा भी पक्का है।


Sunday, April 17, 2016

सत्ता आने के साथ समाज की समझ घटती जाती है

दैनिक जागरण में 18 अप्रैल को प्रकाशित
#BJPAgainstOddEven #twitter पर मजे से ट्रेंड कर रहा है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल @ArvindKejriwal सहित पूरी आम आदमी पार्टी इसे ट्वीट करके बता रही है कि भारतीय जनता पार्टी इस न भूतो न भविष्यति वाली योजना में बाधा पहुंचा रही है। लेकिन, मुझे लग रहा है कि दिल्ली की जनता सम-विषण से नाराज हो रही है। बुरी तरह। मैं तो तथ्यों के आधार पर इसके खिलाफ हूं। क्योंकि, ये कतई प्रदूषण से लेकर ट्रैफिक जाम तक कुछ नहीं सुधारने वाला। दुनिया भर में इसकी मिसाल है। सम-विषम प्रदूषण या यातायात की समस्या का समधान नहीं है। इसे यहां विस्तार से पढ़ सकते हैं। शनिवार 16 अप्रैल को किसी काम से मुझे दिल्ली जाना था। मेरी कार का नंबर विषम पर खत्म होता है। तीन बार दिल्ली में ऑटो लिया। कोई मीटर से चलने को तैयार नहीं हुआ। नोएडा में तो खैर मीटर की बात करना मंगल ग्रह से आए प्राणी जैसी दिखना हो जाता है। लगभग जबरदस्ती पुलिस की धौंस दिखाकर ऑटोवाले से मीटर चलाने को कहा। उसने बात नहीं सुनी। आखिरकार कुछ ज्यादा देकर ही छूटे। #Uber ने बड़ा सा विज्ञापन दे रखा था कि वो आज #EVEN150 यानी 150 रुपए तक की यात्रा मुफ्त कराएगा। कहीं कोई उबर टैक्सी मिली ही नहीं। #OlaCabs पर माइक्रो, मिनी में तीन गुना ज्यादा पर टैक्सी उपलब्ध थी। ये एक पक्ष था।


दूसरे पक्ष का अनुभव हुआ, जब नोएडा सिटी सेंटर से मेट्रो पकड़ी। चिलचिलाती गर्मी में सीढ़ियों से नीचे तक कतार लगी थी। जबरदस्त भीड़ थी। दो लाइनों में भी सीढ़ी खत्म होने के बाद भी कतार में खड़े होना पड़ा। कतार में ही एक पुराने सहयोगी मिल गए। वो भी मीडिया में ही हैं। दफ्तर जा रहे थे। मेट्रो ट्रेन आई। हम लोग लपककर सीट पा गए। थोड़ी सीट मिलने के दंभ में थे कि अचानक सोमराज अपना बैग चेक करने लगे। पूरा बैग चेक करने के बाद समझ में आया कि पर्स गायब हो चुका था। फिर मैंने उनको सलाह दी कि सबसे पहले #FIR कराइए क्योंकि, #PANCARD #ADHAARCARD #DebitCard बनवाने के लिए उसकी जरूरत होगी। वो लौटे। लौटने के बाद पता चला कि उसी दौरान दस पंद्रह ऐसे मामले सामने आए। कई लोगों ने पर्स चोरी जाने के बाद भी लौटना जरूरी नहीं समझा होगा। पुलिस का अनुमान था कि भीड़ ज्यादा होने की वजह से ये घटना ज्यादा बढ़ी है। #OddEven का ये बुरा असर तो कभी हमारी कल्पना में भी नहीं था। मुझे लगता है कि अरविंद केजरीवाल शायद अब जनता की नब्ज समझ नहीं पा रहे हैं। और जिस तरह से दिल्ली के दिल से तैयार होने वाला विज्ञापन दिखा रहे हैं। वो दिल्ली के लोगों को चिढ़ाता नजर आ रहा है। इस चिलचिलाती गर्मी में कार चलने वालों की कार छीनकर वो कार वालों को बुरी तरह से नाराज कर ही रहे हैं। मेट्रो और बसों में ज्यादा भीड़ बढ़ने से उन लोगों को भी नाराज कर रहे हैं। लेकिन, सत्ता के साथ ये हो जाता है। समाज की समझ कम होती जाती है। 

Sunday, May 10, 2015

बेवकूफ कौन- आम आदमी पार्टी या दिल्ली की जनता?

अरविंद केजरीवाल की एक के बाद एक क्रांतिकारी हरकतों के बाद कई लोग दिल्ली की जनता का मजाक उड़ाते दिख रहे हैं। क्योंकि, दिल्ली की जनता ने साल भर में ही दो बार अरविंद और उनकी आम आदमी पार्टी को सत्ता सौंपी। अब जरा सोचकर देखिए कि दिल्ली की जनता कितनी समझदार है। उसका मजाक उड़ाने वाले मूर्खता कर रहे हैं। लोकतंत्र संतुलित रहे, इसे दिल्ली की जनता ने तय कराया। बीजेपी दिल्ली चुनाव के समय जिस तरह का व्यवहार कर रही थी, क्या उस समय बीजेपी का दिल्ली जीतना लोकतंत्र के लिए बेहतर होता। अरविंद को राजनीति के एक नए प्रयोग के तौर पर दिल्ली की जनता ने परखने की कोशिश की। एक बार अल्पमत में और दोबारा बहुमत में सत्ता देकर। भारतीय राजनीति और लोकतंत्र की यही खूबी है। जब कांग्रेस पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ लोकतंत्र में राजशाही जैसा व्यवहार करने लगी थी। तभी क्षेत्रीय पार्टियों का उदय हो गया। और ऐसा उदय हुआ कि कांग्रेस को इन क्षेत्रीय पार्टियों के सामने नाक रगड़नी पड़ी। राष्ट्रीय पार्टियों की तानाशाही से क्षेत्रीय पार्टियों के चंगुल में फंसी राष्ट्रीय पार्टियों की सरकार का चक्र पूरा हुआ। लगने लगा था कि अब तो देश में पूर्ण बहुमत की सरकार आने से रही। उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर राष्ट्रीय परिदृष्य तक ऐसा ही दिखने लगा। फिर अचानक उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर राष्ट्रीय सरकार तक परिपक्व लोकतंत्र की परिपक्व जनता ने पूर्ण बहुमत की सरकारें बनाना शुरू कर दिया।
 फिर लगने लगा कि लोकतंत्र में तो विकल्प ही खत्म हो गया है। 160-180 या अधिकतम 200 के खांचे में पड़ी दिखने वाला बीजेपी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और देश की स्वयमेय सिद्ध सत्ताधारी पार्टी के तौर पर स्थापित कांग्रेस 44 सांसदों वाला दल बनकर रह गया। महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना का मुकाबला देश ने देखा। उस समय महाराष्ट्र की जनता ने लोकतंत्र परिपक्व करने का काम किया। हरियाणा की जनता ने भी साबित कर दिया कि विकल्प देने में जनता का कोई जोड़ नहीं है। हरियाणा में चमत्कारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल गया। ये दिल्ली में केजरीवाल की सरकार बनने से बड़ा चमत्कार था। लेकिन, पहले से बीजेपी भारतीय राजनीति में प्रभावी भूमिका में थी। दूसरे राज्यों में बीजेपी की सरकार रही। इसलिए राजनीतिक पंडितों को ये क्रांति नहीं लगी। फिर जब भारतीय जनता पार्टी को ये लगने लगा था कि अब तो जीत के अलावा कुछ कमल के निशान पर होगा ही नहीं। तब दिल्ली की जनता ने वो किया जो, मोदी-शाह की कल्पना से भी परे था। 70 में से 67 सीटें दे दीं। ये परिक्व दिल्ली की जनता का शानदार फैसला था। जो, लोकतंत्र का अद्भुत संतुलन कर रहा था। अब अरविंद अगर उस विकल्प, संतुलन के महत्व को अपनी बेवकूफियों से दरकिनार करना चाह रहे हैं तो, ये दिल्ली की जनता के फैसले की गलती नहीं है। हां, ये जरूर है कि जनता नेताओं को विकल्प देती है। लेकिन, अगर जनता को बेवकूफ समझने की कोशिश की तो, बेवकूफियों को खारिज करती है ये, भारतीय राजनीति में लालू प्रसाद यादव के हश्र से समझा जा सकता है। पता नहीं अरविंद और आम आदमी पार्टी की समझ में अभी ये बात थोड़ा बहुत भी आ रही है या नहीं।

Tuesday, February 03, 2015

लोकतंत्र की जीत के लिए!


लोकतंत्र में हार जीत होती रहती है। इसलिए दिल्ली कौन जीतेगा का जवाब है- कोई भी जीत सकता है। ये भी ठीक है कि सत्ता का नशा ऐसा होता है कि उसमें अहंकार बढ़ना पक्का है। ये भी ठीक है कि अहंकार बढ़ने से तानाशाही आ जाती है। इसलिए भाजपा का दिल्ली में चुनाव जीतना ठीक नहीं है। इसलिए लोकतंत्र बचाने के लिए जरूरी है कि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जीत जाए। अरविंद के जीत जाने से लोकतंत्र बच जाएगा। ऐसा बताने वाले बुद्धिजीवियों की बहुतायत है। मैं भी इस विचार से प्रभावित होता हूं। लेकिन, इसी विचार को जब मैं आगे ले जाता हूं तो मैं ठिठक जाता हूं। तब मुझे समझ आता है कि देश में बिना वजह की राजनीति चमकाने वाली ताकतें शायद इसी इंतजार में हैं। ये वही ताकतें हैं जिनके चलते न देश सुधारवादी हो पाया, न समाजवादी। न सीधे गरीबों के साथ खड़ा होकर उनका पेट भर पाया और न ही अमीरों के साथ खड़ा होकर उनकी फैक्ट्री, कारोबार को आगे बढ़ा पाया। जिससे अमीरों के जरिए ही गरीबों का पेट भर पाता। लालू, मुलायम, मायावती और देश की तमाम क्षेत्रीय पार्टियां इंतजार ही सिर्फ इस बात का कर रही हैं कि किसी भी तरह अरविंद केजरीवाल दिल्ली में जीत जाए। दरअसल उन्हें अरविंद की राजनीति से प्रेम नहीं है। उन्हें अरविंद की सफलता भी नहीं पचेगी। बल्कि, सही मायने में तो ये सारी ताकतें अरविंद की राजनीति की घोर विरोधी हैं। लेकिन, इस समय उनका महत्व खत्म है। और ये महत्वहीन हुए हैं नरेंद्र मोदी की लगातार जीत से। ये हारे रहें लेकिन, अगर नरेंद्र मोदी एक बार हार गया तो ये जीतने की बुनियाद बनाने लगेंगे। ये उत्तर प्रदेश, बिहार बनाने लगेंगे। और फिर कहेंगे कि लोकतंत्र की ताकत यही है कि किसी भी दल को कुछ करने का अधिकार न हो। अधिकार हर किसी को सबकुछ करने का हो। इससे होगा ये कि इन परिवार, पालकों को सत्ता की चाभी मिली रहेगी। लोकतंत्र के जीवित रहने के बहाने देश के लोगों के जीवनस्तर बेहतर होने को ही ये दांव पर लगा देना चाहते हैं। इसीलिए दिल्ली में देश की उन सारी ताकतों को अरविंद केजरीवाल की जीत से ज्यादा नरेंद्र मोदी की हार चाहिए। ये सारी ताकतें वही हैं जो दस साल की यूपीए सरकार के किसी भी फैसले को राजनीतिक मोलभाव के आधार पर तोल-मोल के फैसले पर हां या ना करती रहीं। ये वो राजनीतिक ताकतें हैं जो सिर्फ इस आधार पर राजनीति करती रही हैं कि किसी का विरोध करना है। इन पार्टियों में से किसी के पास भी कोई एजेंडा नहीं है। इनके पास किसी खास मसले पर किसी के विरोध का एजेंडा होता है। और यही एजेंडा राजनीतिक ब्लैकमेलिंग की ताकत देता है। यही एजेंडा देश में भ्रष्टाचार को छिपाने की राजनीति करता है। यही एजेंडा देश में बेईमानी की बुनियाद और मजबूत करता है। यही एजेंडा देश में परिवारवाद को समाजवाद या फिर एक जाति के उत्थान से जोड़ देता है। यही एजेंडा देश की तरक्की को सबसे निचले पायदान पर रख देता है। यही एजेंडा धर्मनिरपेक्ष होने राजनीतिक वोटबैंक का सबसे बड़ा हथियार बना देता है।

सबसे कमाल की बात ये है कि अरविंद केजरीवाल की राजनीति शुरू ही इसलिए हुई थी कि भ्रष्टाचार, परिवारवाद को खत्म किया जा सके। एक एजेंडा था जो अन्ना के पीछे किरन बेदी और अरविंद केजरीवाल को खड़ा करता था। वो एजेंडा था लोकपाल का। वो एजेंडा था देश से भ्रष्टाचार खत्म करने का। वो एजेंडा था देश में नई राजनीति की शुरुआत का। वो एजेंडा था परंपरागत राजनीति के नाम पर देश की जनता को वोटबैंक समझने वालों की राजनीति ध्वस्त करने का। अब दिल्ली की सत्ता के लिए अरविंद केजरीवाल की जीत की कामना के बहाने उस सारी राजनीति का शीर्षासन करने की कोशिश हो रही है। कोशिश ये हो रही है कि अरविंद की जीत हो जाए और अरविंद की राजनीति के सारे पैमाने ध्वस्त हो जाएं। और इस सबके बाद देश के हर कोने से आवाज आएगी कि नरेंद्र मोदी हार गया। नरेंद्र मोदी हार गया। मतलब देश में जाति, धर्म की राजनीति ही होगी। विकास की राजनीति कभी नहीं चलेगी। फिर हम कहेंगे कि ये देश ऐसे ही चलता है। इस देश की राजनीति ही ऐसे चलती है। इसीलिए अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में जिताना, लोकतंत्र को जिताने से जोड़ दिया गया है। इसीलिए मुझे लगता है कि अरविंद ने अपनी पार्टी का नाम ईमानदार आदमी पार्टी नहीं रखा।

Thursday, January 22, 2015

उस दिल्ली में मोदी इस दिल्ली में बेदी


भारतीय जनता पार्टी का ये फैसला उल्टा पड़ता दिख रहा है। या सीधे कहें कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह और अरुण जेटली का फैसला उल्टा पड़ता दिख रहा है। दिल्ली में हर ओर बीजेपी की ताजा-ताजा नेता से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बन गईं किरन बेदी के पक्ष में माहौल बनने से पहले ही बिगड़ता दिख रहा है। टेलीविजन की स्क्रीन पर शुरुआत मनोज तिवारी के थानेदार नहीं नेता वाले बयान और हर्षवर्धन के देर से चाय पार्टी में पहुंचने से हुई। तो इसके बाद दिल्ली में आई भाजपा की सूची ने ऐसी ढेर सारी तस्वीरें टीवी न्यूज चैनलों को परोस दीं जिससे पक्का हो जाता है कि दिल्ली में नेता के तौर पर किरन बेदी को लाने का फैसला उतना बेहतर नीचे तक जाता नहीं दिख रहा। आखिर क्या जरूरत थी लगातार सफलता के ऊंचे मापदंड स्थापित करती जा रही मोदी-शाह की जोड़ी को चुनाव से ठीक पहले इस तरह का फैसला लेने की। और सबसे बड़ी बात ये कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष से देश वित्त मंत्री के पद पर आसीन अरुण जेटली ने भी इस दांव को खेलने की जमीन पक्की करने में पूरी मेहनत की। किरन बेदी आईं और आकर भी अरविंद केजरीवाल की सीट से चुनाव लड़ने से बच गईं। अरविंद केजरीवाल ने किरन बेदी को आमने-सामने बहस की चुनौती दी, उससे भी किरन बेदी ने किनारा कर लिया। भगोड़ा केजरीवाल किरन बेदी को भगाता दिख रहा है। फिर भी मोदी-शाह-जेटली की तिकड़ी को क्या जरूरत थी कि वो किरन बेदी पर ही भरोसा कर रहे हैं। सिर्फ भरोसा नहीं किया। ऐसा दांव खेला है जिसे हारने की जरा सी भी गुंजाइश बनी तो वो राजनीति हार जाएगी जिसने उस दिल्ली में नरेंद्र मोदी को अप्रतिम व्यक्तित्व वाले प्रधानमंत्री के तौर पर पूर्ण बहुमत से चुन लिया है।

दरअसल मुश्किल यहीं है कि मोदी-शाह की जोड़ी के फैसलों को राजनेता और विश्लेषक दोनों ही तय खांचों में बांधकर देखते हैं। इसीलिए लगता है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने अरुण जेटली पुरजोर पैरोकारी के साथ अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार ली है। लेकिन, ऐसा है नहीं। अब जरा किरन बेदी के आने के बाद और पहले के समीकरणों पर चर्चा कर लें। शुरुआत इसी से कि आखिर क्या सूझी थी बीजेपी को किरन बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की। इसके लिए सिर्फ और सिर्फ एक तर्क और जवाब है। वो तर्क है अरविंद केजरीवाल। अगर अरविंद केजरीवाल जैसा नेता दिल्ली में नहीं होता तो मोदी-शाह किसी कीमत पर यहां कोई चेहरा चुनाव के पहले घोषित नहीं करते। लेकिन, ये दिल्ली है। और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल है जो हर बात पर नंगा होने, करने को तैयार दिखता है। इस केजरीवाल की दिल्ली में स्थिति ये है कि लोकसभा चुनाव के समय भी नरेंद्र मोदी को मत देने वाला नौजवान, मध्य वर्ग भी कहता रहा कि उस दिल्ली (लोकसभा) में मोदी लेकिन, इस दिल्ली (विधानसभा) में अरविंद केजरीवाल। यही असल कहानी है किरन बेदी के मुख्यमंत्री के तौर पर मैदान में आने की। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर को उदाहरण के तौर पर पेश करने वाले भूल जाते हैं कि वहां परंपरागत राजनीति और उसी से निकले राजनेता मुकाबले में थे। इसलिए नरेंद्र मोदी के अलावा किसी नेता की जरूरत नहीं थी। लेकिन, यहां अरविंद केजरीवाल है जो परंपरागत राजनीति के सारे स्थापित समीकरणों की ऐसी तैसी करके दिखा चुका है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी मुकाबले में थे जो खुद सारे परंपरागत मापदंडों को उलट चुके हैं। इसलिए अरविंद पिट गए। लेकिन, दिल्ली विधानसभा में बिना किसी चेहरे के मोदी मैजिक मुश्किल में पड़ता दिख रहा था। इसीलिए किरन बेदी को लाना पड़ा।

किरन बेदी को लाकर भारतीय जनता पार्टी ने अरविंद के सामने बराबरी का मुकाबला खड़ा कर दिया है। बल्कि कई मामलों में किरन बेदी अरविंद की राजनीति को आसानी से पटकनी देती नजर आती हैं। किरन बेदी अरविंद केजरीवाल की हर उस कमजोरी को जानती हैं जो घर का भेदी ही जान सकता है। और उस पर यहां तो रावण विभीषण जैसी मजबूती कमजोरी भी नहीं है। अरविंद के पास न तो रावण जैसी अथाह ताकत है और न किरन बेदी के पास विभीषण जैसी कमजोरी है। इसलिए बराबरी के मुकाबले में घर का भेदी तोड़ लेना बड़ी सफलता है। इसके बाद बात दोनों की काबिलियत की। अरविंद केजरीवाल शानदार विद्यार्थी रहे हैं। इंडियन रेवेन्यू सर्विसेज के अधिकारी रहे हैं। लेकिन, विज्ञापनों में वो भले ही कहते रहें कि कमिश्नर की नौकरी को उन्होंने लात मार दी। सच्चाई यही है कि अरविंद केजरीवाल असिस्टेंट कमिश्नर की शुरुआती नौकरी में ही रहे और उस ओहदे पर रहते हुए उन्होंने कोई बड़ा चमत्कार नहीं किया। अरविंद ने इस्तीफा अपने रास्ते खोजने के तहत दिया। जबकि, किरन बेदी के साथ ये जगजाहिर है कि व्यवस्था ने उन्हें दिल्ली का पुलिस कमिश्नर नहीं बनने दिया। इसलिए किरन बेदी ने इस्तीफा दिया। किरन बेदी जहां भी रही हैं, वहां खुद को स्थापित करती आई हैं। इसलिए इस पैमाने पर भी किरन बेदी अरविंद केजरीवाल से बीस ही बैठती हैं।

बात हो रही है कि किरन बेदी का तानाशाही रवैया भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को बर्दाश्त नहीं हो रहा है। और इससे पार्टी में बिखराव होगा। अगर ऐसा होता तो किरन बेदी से कई गुना ज्या तानाशाही होने का आरोप नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर लगता रहा है। फिर तो बीजेपी को कहीं परिदृष्य में होना ही नहीं चाहिए था। दरअसल तानाशाही और मजबूत नेतृत्व में फासला बड़ा हल्का होता है। इसलिए जिस राजनीति को विश्लेषक तानाशाही राजनीति कहते हैं। उसे पार्टी कार्यकर्ता कब मजबूत नेतृत्व मानने लगता है ये समझना कठिन है। एक और तर्क है कि किरन बेदी अरविंद के सामने न चुनाव लड़ रही हैं और न ही बहस कर रही हैं। तो पहले मामले पर ये कि मोदी-शाह की जोड़ी आज की राजनीति के मामले में सबसे समझदार फैसले लेने वाली है। ये स्थापित होता रहा है। अब सोचिए कि नई दिल्ली सीट से किरन बेदी लड़तीं तो भी जीतता तो कोई एक ही। और मान लीजिए कि बीजेपी को बहुमत मिल जाता लेकिन, सिर्फ नई दिल्ली सीट अरविंद केजरीवाल जीत जाते तो मोदी-शाह के किरन बेदी को नेता चुनने पर ही बड़े सवाल खड़े हो जाते। फिर से बीजेपी में मुख्यमंत्री बनने की अंधी दौड़ शुरू हो जाती। अब दूसरा परिदृष्य मान लीजिए कि अरविंद नूपुर शर्मा से हार गए या जीते भी बहुत मुश्किल से और बीजेपी सरकार बना लेती है। ऐसे में अरविंद को हर रोज किरन बेदी को मुख्यमंत्री के तौर पर झेलना पड़ेगा। और अरविंद के ऊपर जिस तरह से तानाशाही के आरोप लगाकर ढेर सारे आम आदमी पार्टी के नेता बाहर हुए हैं। उसमें अरविंद को किरन बेदी की तथाकथित तानाशाही को झेलना ज्यादा कठिन होगा। अब बात ये कि बहस से भाग रही किरन बेदी जनता की नजरों में कमजोर साबित होंगी और बीजेपी के चुनाव अभियान पर इसका असर पड़ेगा। इसका जवाब सबसे बेहतर भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी दे सकते हैं। वो लालकृष्ण आडवाणी ही थे जिन्होंने मौन रहने वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह को लोकसभा चुनाव से पहले बहस की चुनौती दी थी। इरादा उनका भी वही था कि मैं बहस में मनमोहन सिंह को हराऊंगा और उसी आधार पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने का हक भी मेरा पक्का हो जाएगा। लेकिन, इतिहास गवाह है कि न तो मनमोहन सिंह ने बहस की। न लालकृष्ण आडवाणी बहस कर सके, बहस जीत सके और न ही प्रधानमंत्री बन सके। और किरन बेदी को लाने का फैसला गलत है इसके तर्क देने वाले ज्यादातर वो बीजेपी के नेता हैं जो कभी न कभी मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले बैठे थे। जाहिर है विकल्प ही नहीं है वाले सिद्धान्त के आधार पर दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने की आस रखे भाजपा नेताओं को  अब अनिद्रा की नियमित बीमारी हो गई है। इसलिए वो आधी नींद में बड़बड़ा रहे हैं कि किरन बेदी बीजेपी का बेड़ा गर्क करने आई हैं। लेकिन, टेलीविजन चैनलों के सर्वे साफ दिखा रहे हैं कि अब तक बीजेपी का सबसे बेहतर चेहरा रहे डॉक्टर हर्षवर्धन से भी ज्यादा उत्साह कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में किरन बेदी का चेहरा देखने पैदा हो रहा है। सच्चाई भी यही है कि बीजेपी के कार्यकर्ता किरन बेदी को और किरन बेदी बीजेपी को हमेशा अपना स्वाभाविक विकल्प मानते रहे हैं और उसी स्वाभाविक विकल्प को सही समय पर मोदी-शाह-जेटली की तिकड़ी ने सलीके की पैकेजिंग में परोस दिया है। फिलहाल ब्रांड केजरीवाल पहले से ज्यादा मुश्किल में हैं। वरना तो बीजेपी से पहले ही अरविंद ने जगदीश मुखी को बीजेपी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके उनके साथ लड़ाई भी जीत ली थी।  

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...