विकल्पहीनता

किसी से भी पूछकर देखिए। ज्यादातर का जवाब यही आएगा कि विकल्प ही नहीं है। विकल्प होता तो ये थोड़े न करते। नौकरी कर रहे हैं तो कारोबार की बात करेंगे। कारोबार कर रहे हैं  तो नौकरी की बात करेंगे। राजनीति कर रहे हैं तो कुछ समय बाद वही भाव कि विकल्प ही नहीं है। विकल्प बन जाए तो राजनीति छोड़ दें। ऐसे ही कोई दूसरा बोल सकता है कि विकल्प मिल जाए तो कल से राजनीति करनी शुरू कर दें। बात करिए तो ऐसे लगता है कि पूरा समाज ही विकल्पहीनता का शिकार है। 95 प्रतिशत लोगों को विकल्प मिले तो कुछ और करने लगें। फिर इससे दूसरे तरह की भी विकल्पहीनता की बात आती है। लंबे समय तक इस देश में ये सामान्य धारणा बनी रही कि इस देश में राजनीतिक दल के तौर पर कांग्रेस का विकल्प नहीं है। देश बचाना है तो संघ का विकल्प नहीं है। पिछड़ों की राजनीति जारी रखनी है तो लालू-मुलायम-शरद यादव का विकल्प नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों के लिए चौधरी साहब की विरासत का विकल्प नहीं है। दलित राजनीति में उत्तर में मायावती तो दक्षिण में करुणानिधि का विकल्प नहीं है।

ये विकल्पहीनता भी गजब की है। हर दिन विकल्प मिलता जाए तो भी विकल्पहीनता ही रहती है। हमारा भारत गजब विकल्पहीन देश है। ये विकल्पहीनता का भ्रम इस कदर है कि महाराष्ट्र में बाल ठाकरे के जीवित रहते ही कांग्रेस से टूटकर एक और विकल्प राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तैयार हो गया। लेकिन, बाल ठाकरे को लगता रहा कि महाराष्ट्र में उनका कोई विकल्प ही नहीं है। वो भ्रम फिर टूटा। भतीजा राज ठाकरे, बेटे उद्धव ठाकरे से ज्यादा ताकतवर हो गया फिर भी ये भ्रम बना रहा कि शिवसेना का महाराष्ट्र में कोई विकल्प नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय राज ठाकरे को वही बाल ठाकरे वाला भ्रम हो गया कि मराठी माणुष वाली राजनीति के लिए बाल ठाकरे के बाद वही विकल्प हैं। उनका विकल्पहीनता का भ्रम टूटा तो उनके चचेरे भाई उद्धव ठाकरे को ये विकल्पहीनता वाला भ्रम हो गया कि महाराष्ट्र में बीजेपी के पास उनसे गठबंधन के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे ही विकल्प बिहार में नीतीश को हुआ था लोकसभा चुनाव के समय। फिर नरेंद्र मोदी की अगुवाई में ऐसी जीती बीजेपी को उसे भी विकल्पहीनता का भ्रम हो गया। वही वाला भ्रम कांग्रेस के आसपास वाला। तो विधानसभा उपचुनावों में गजब-गजब विकल्प दिखे। हर राज्य में अद्भुत विकल्प। 2012 में ही तो उत्तर प्रदेकी जनता ने ऐसे वोट दे दिया कि लगा समाजवाद के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। ये वही उत्तर प्रदेश की जनता थी जिसने पांच साल पहले ऐसे ही मायावती की दलित-सवर्ण गठजोड़ वाली राजनीति के आगे सबको विकल्पहीन कर दिया था।

ये विकल्पहीनता वाला भ्रम इस देश में इतनी तेजी से फैलता है। उसकी सबसे शानदार उदाहरण हैं अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी। लगा कि अब इस पार्टी की राजनीति का देश में कोई विकल्प ही नहीं है। कुछ इसी तरह बंगाल में वामपंथी सोचते थे। उनका विकल्प ममता बनर्जी हो ही गईं। वहां तक तो फिर भी ठीक था विकल्पहीन बंगाल की राजनीति में ममता के विकल्प के तौर पर भी कोई वामपंथ को जगह देने को तैयार नहीं दिख रहा है। इतना कुछ होने के बाद भी हम सोचते हैं कि विकल्प ही नहीं है। हम भी ऐसे ही सोचते हैं कि हमारे पास पत्रकारिता के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है। वो भी किसी न किसी की नौकरी करते हुए पत्रकारिता। लेकिन, जब इतने भ्रम टूटे हैं तो विकल्पहीनता का ये भ्रम भी टूटेगा। हालांकि, फिर मैं विकल्पहीनता पर ही आ गय। अब मुझे लगता है कि रोटी का जुगाड़ मजे भर का हो जाए तो स्वतंत्र पत्रकारिता का कोई विकल्प नहीं है। अरे मैं अब कुछ ज्यादा भ्रमित हो रहा हूं। फिलहाल इस लेख को यहीं खत्म करने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं है।