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Saturday, May 23, 2015

ऊं नम: शिवाय!

लगभग हर रोज इनसे पार्क में मुलाकात हो जाती थी। इनके सामने से कोई आ रहो वो इनसे बच जाए, संभव ही नहीं है। उसे रोककर ऊं नम: शिवाय बोलकर अभिवादन करेंगे और प्रयास ये कि वो भी यही अभिवादन करके आगे बढ़े। दूध का एक डब्बा इनके हाथ में होता है। वेशभूषा से मुझे हमेशा यही लगा कि किसी बगल के गांव के होंगे और सामने की किसी सोसायटी में दूध देने जा रहे होंगे। खैर, ये न पूछना बनता था। न मैंने कभी पूछा। और ये गजब के शिव भक्त हैं। एक दिन तो मैंने देखा एक मोहतरमा अपने कुत्ते के साथ टहल रहीं थीं। उस कुत्ते को भी इन्होंने ऊं नम: शिवाय बोला। मोहतरमा ने भी मुस्कुराते हुए सकुचाते हुए ऊं नम: शिवाय बोला। एक दिन मैं अपने सामने की सोसायटी में गया। अमोली वहां ओडिशी नृत्य सीख रही है। नीचे लॉबी में वो फिर मिल गए। मेरे साथ छोटी बिटिया नवेली भी थी। उन्होंने मुझे ऊं नम: शिवाय कहा मैंने भी वही अभिवादन किया। फिर वो नवेली से ऊं नम: शिवाय का अभिवादन कर रहे थे। नवेली ने ऊं नम: शिवाय नहीं बोला तो, उन्होंने कहाकि बिटिया को घर में मंत्र सिखाइए। मैंने कहा घर में सीखती है। उन्होंने कहा कि ये बड़ी मुश्किल है आजकल के बच्चे इस सबको समझते ही नहीं। उनके मां बाप भी नहीं समझते। हम तो रोज कम से कम सौ लोगों को ऊं नम: शिवाय का जाप करा देते हैं। मैंने पूछा आपका नाम क्या है। उन्होंने कहा ऊं नम: शिवाय नाम से ही सब जानते हैं। मैंने कहा फिर भी कुछ तो नाम होगा। उन्होंने नाम बताया। लेकिन, मैं भू गया। बात करते पता चला कि वो मेरे सामने की सोसायटी में रहते हैं। बेटा इंजीनियर है। उसी के साथ रहते हैं। मूलत: गाजीपुर के यादव जी है। उन्होंने कहा गााजीपुर बनारस की सीमा पर गांव है। अब लगभग पूरा परिवार यहीं आ गया है। दूसरा बेटा नैनीताल में पंप इंजीनियर है।

Saturday, October 18, 2014

लाइफ इन अ मेट्रो!

मातृशक्ति

आमतौर पर ये धारणा है कि सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं के लिए बड़ी मुश्किल है। उन्हें दुनिया भर की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उनके साथ हर तरह की बद्तमीजी होती है। लेकिन, मेट्रो में उस दिन मुझे दूसरा अनुभव हुआ। एक अधेड़ उम्र दंपति नोएडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन से चढ़े। सीटें भर गईं थीं। लेकिन, अधेड़ उम्र महिला ने दो लोगों को थोड़ा-थोड़ा समेटा और अपने लिए जगह बना ली। महिला निश्चिंत थी। दोनों पुरुष सिमटे बैठे थे। अक्षरधाम स्टेशन पर उनके पति महोदय को मेरे बगल सीट मिल गई। पति को सीट मिलते ही वो अधेड़ उम्र महिला बिजली की गति से मेरे और अपने पति के बीच में जगह बनाने के लिए उपस्थित थी। मुझसे अपना शारीरिक उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं हुआ। मैं तुरंत उठ खड़ा हुआ। पति ने भी खड़े होकर मुझे बैठने को कहा। मैंने जवाब में खड़े रहना ही उचित समझा। पत्नी ने पति का हाथ पकड़ा और लगभग जबरदस्ती बैठा लिया।


बुजुर्ग

दो बुजुर्ग मेट्रो का दरवाजा खुलते ही मेट्रो में वृद्ध एवं विकलांगों के लिए लिखी वाली सीट की ओर दौड़े। एक ने कम उम्र व्यक्ति को उठाकर अपने लिए जगह बना ली। दूसरा बुजुर्ग ही बैठा था। लेकिन, दूसरे बुजुर्ग अतिसाहसी थे। वो दूसरी तरफ गए। और अनारक्षित सीट पर बैठे एक नौजवान को उठाकर अपने लिए सीट आरक्षित कर ली। जबरी।


किस्मत पर भरोसा
वो बुजुर्ग किसी से बात कर रहा था। फोन पर कह रहा था। व्हाट्सएप चेक किया। उधर से जो जवाब आया हो। बुजुर्ग ने कहा। अरे मैंने ग्रुप बना लिया है। रोज रात को एक संदेश भेज देता हूं। अच्छा लगे तो बहुत अच्छा। सिर्फ तीन लोग ही हैं उस ग्रुप में। और मैंने तो फेसबुक अकाउंट भी बना लिया है। मजा आ रहा है। जिंदगी है। उसमें सुबह भी होगी, दोपहर भी, शाम भी और रात भी। तो ऐसे ही जिंदगी चल रही है। मुझे रिटायर हुए 9 साल हुए। मैं अपनी जिंदगी शुरू हुए 9 साल ही मानता हूं। और जवानी में तो नहीं माना लेकिन, अब किस्मत पर भी थोड़ा बहुत भरोसा करने लगा हूं। और जोर से हा हा हा ...

Tuesday, September 16, 2014

लाइफ इन अ मेट्रो!

स्पर्श सुख
वो दोनों शायद इसी इंतजार में केवल महिलाओं के लिए लिखे के नीचे वाली सीट पर बैठे थे। एक स्टेशन बाद ही उनकी इच्छा पूरी हो गई। पिट्ठू बैग लादे हाथ में मोबाइल और इयर फोन कान में लगाए लड़की तेजी से लड़कियों के लिए आरक्षित सीट की तरफ बढ़ी। इसी इंतजार में पहले से बैठे दोनों लड़कों में से एक उठा और दूसरे ने अपने पृष्ठ भाग को थोड़ा तिरछा करते हुए इतनी जगह बना दी कि वो लड़की उसी में समाती हुई बैठ जाए। लड़की धक्कामुक्की करती आई थी। तेजी से वो उस जगह में अपनी जगह बनाने लगी। लेकिन, उसी दौरान उसने शायद उन दोनों लड़कों की आंखें पढ़ लीं। उसने कहा कोई बात नहीं मैं खड़े-खड़े ही ठीक हूं। और खड़े, तिरछे बैठे लड़कों की कोशिश के बाद भी वो नहीं बैठी। दोनों लड़कों की शातिर नजरें, एक दूसरे से मिलकर मुस्कुरा रही थीं। लड़की मेट्रो के दरवाजे के पास की जगह पर टिककर अपने स्मार्टफोन में व्यस्त हो गई। दो स्टेशन बाद। एक अधेड़ उम्र महिला आई। वही महिलाओं के लिए आरक्षित सीट निशाने पर थी। तिरछे बैठे लड़के को महिला ने थोड़ा धकियाया और अपने लिए जगह ज्यादा बनाई। दोनों लड़कों की मुस्कुराहट में से शातिर भाग खड़ा हुआ था। तिरछे से सीधे बैठे लड़के को हालांकि, स्पर्शसुख अब भी मिल रहा था। बिना चाहा।

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आगे बढ़ने का मंत्र

सोनी का बड़ा सा स्मार्टफोन उसके हाथ में था। फोन की घंटी बजी। हां मां। ... मेट्रो में हूं। ... अरे मां सीनियर के पास चला गया था। इसीलिए देर हो गई। ... मां तुम नहीं समझोगी। सीनियर के पास समय बिताना जरूरी होता है। आगे बढ़ने में सीनियर ही तो मदद करते हैं।

Tuesday, July 29, 2014

कतार का कष्ट

नोएडा के सेक्टर 119 में रहता हूं। वहीं एक सोसाइटी के अंदर सुपर मार्केट है। मतलब काम के सारे सामान यहां मिल जाते हैं। दूध लेने के लिए सुबह सुपरमार्केट में गया। एक बिलिंग काउंटर ही काम कर रहा था। लंबी कतार हो गई थी। एक मैडम सीधे आकर हमसे आगे कतार में अनजान बनकर खड़ी हो गईं। हम लोगों ने उन्हें पीछे भेज दिया लेकिन उनके चेहरे पर भाव जरा भी गलती के अहसास के नहीं थे। क्योंकि गलती हुई नहीं थी। जानबूझकर की गई थी। ऐसा करने वालों को भी अपने लिए सब व्यवस्थित की उम्मीद होती है।

इसी सुपर मार्केट की एक दूसरी घटना। दफ्तर से लौटते हुए दूध लेकर जाना था। कतार में था। मेरे आगे जो सज्जन लगे थे उनका भुगतान होता। इससे पहले ही दो शरीर से बलिष्ठ नौजवानों में से एक ने अपना सामान काउंटर पर रख दिया। जल्दी से बिल बना दो। बहुत गुस्सा आने के बावजूद मैं चुप रहा। मेरे आगे वाले का भुगतान पूरा हुआ तो मैंने पूरी कड़ाई से उसकी ओर देखा और बोला पीछे आइए लाइन में। लेकिन, वो पूरी बेशर्मी से मुझे डराने का प्रयास करता रहा। और काउंटर पर खड़े लड़के से बोला जल्दी से कर दे, जाना है। फिर अमूल दूध के पैकेट को देखकर बोला। यू पिन्नी में क्या है दूध। खैर, मेरी कड़ाई से मेरे पीछे खड़ी महिला को भी बल मिला। उन्होंने कहाकि आप लाइन में आइए। मैंने अपना भुगतान किया, फिर पीछे की महिला का भी भुगतान कराया और फिर वहां से निकला। अब मुझे नहीं पता कि मेरे पीछे कतार में खड़े कितने लोगों ने उन्हें रोका होगा। यही सबसे बड़ी समस्या है। और कमाल ये कि कतार तोड़ने वाले उन लोगों को भी नोएडा में सब अच्छा-अच्छा और व्यवस्थित चाहिए होगा। पहली महिला होने का लाभ लेना चाहती थीं। दूसरे नौजवान अपने स्थानीय होने और बलिष्ठ होने के आधार पर कतार तोड़ देना चाहते थे। 

Sunday, July 20, 2014

उस ऑटो वाले की मैं तस्वीर नहीं ले सका

साझा ऑटो से मैं चला लेकिन, अकेला ही था। रास्ते में एक और यात्री उसने बैठाया। हमसे पहले वो यात्री उतर गया। 7 रुपये हुआ था। लेकिन, उसने कहा 3 रुपये छुट्टा नहीं है और ये कहकर 10 रुपये रख लिए। मैंने कहा ये अच्छा किया। तो उसने कहा- कल कम देंगे तो वो भी ले लूंगा। वो जो सामने घर दिख रहा है। उसी के पीछे के घर में रहते हैं। मैंने हंसते हुए कहा तुम तो अपने यात्रियों पर गजब नजर रखते हो। उसने कहा रखना पड़ता है सर। ये जहां खड़े थे वहां से आने के बाद कौन क्या कर जाए, क्या पता। मैंने कहा - कहां खड़े थे। उसने कहा शराब की दुकान के सामने थे। उसने कहा कुछ हो गया तो मैं बता तो सकूंगा। मुझे लगा अगर उस ऑटो वाले जैसे सारे शहरी जागरूक हो जाएं तो पुलिस का आधा काम ही न रह जाए। समाज में बढ़ते अपराध, नौजवानों का गलत राह पर जाना। ये सब इस वजह से भी ज्यादा हो रहा है कि शहरी समाज में अपने पड़ोसी की भी न तो चिंता है। और न ही उसके अच्छे, बुरे से कोई फर्क पड़ता है। समाज ने नजर बंद कर ली है तो, भला समाज का भला कैसे हो सकता है। समाज की आंखें बंद है और समाज चल भी रहा है तो जाहिर है दुर्घटना तो होगी है। जाहिर है दुर्घटना से बचने के लिए समाज को आंख खोलनी होगी और समाज हम सब हैं। उस ऑटो वाले की तरह।

Friday, July 11, 2014

हम सभ्य रहे बेहूदा तो बस ड्राइवर था!

मुश्किल होती है अगर मैं अपनी बेटी के साथ हूं। क्योंकि, खाली भी है रास्ता लेकिन, बत्ती लाल है तो सड़क पार करने पर बहुत कड़ाई से सुनना पड़ता है। उसे मैंने ही सिखाया था शुरू में नर्सरी के लिए स्कूल छोड़ते वक्त। बताया था कि लाल बत्ती मतलब रुकना, हरी बत्ती मतलब चलना। अब कई बार तो ऐसा भी होता है कि हरी बत्ती रही आखिरी 3-4 सेकेंड में गाड़ी निकालने की कोशिश की और बीच चौराहे पर दूसरी कारों से गुंथ गया। बिटिया मुझे ही समझा देती है कि लाल बत्ती थी गाड़ी क्यों निकाली। अगर उसकी गवाही हो तो मेरा चालान कटना पक्का। आमतौर पर मैं भी लाल बत्ती को अनदेखा नहीं करता। लेकिन, आज सुबह दफ्तर आते समय एक चौराहे पर लाल बत्ती पर मैं रुका। तेजी से आती बस के 'बेहूदे' ड्राइवर ने जैसे कुछ देखा ही नहीं। सीधे चौराहा पार करा दिया। उसकी बहुत बड़ी बस के सामने छोटी-बड़ी कारें चुपचाप हरी बत्ती पर भी रुक गईं। और उस 'बेहूदे' ड्राइवर की बड़ी बस की आ़ड़ में हम जैसे लोग भी अपनी सभ्यता छिपाए चौराहा पार कर गए। उसकी 'बेहूदगी' दिख गई हमारी 'सभ्यता' बच गई।

Friday, January 15, 2010

बेवजह नर्वस नहीं हैं शीला दीक्षित


ज्यादातर सरकारी नीतियां शहरों को ही ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं। पिछले बजट में सबसे ज्यादा पैसा जिन मदों में आवंटित किया गया, उनमें शहरों की बेहतरी प्रमुख है। देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहते हुए लगता भी है कि सरकार शहरों की बेहतरी के लिए हर कोशिश कर रही है। ये अलग बात है कि अभी दिल्ली के वर्ल्ड क्लास बनने में अक्टूबर 2010 में होने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन का डर ज्यादा है।

 लेकिन, कॉमनवेल्थ गेम्स की डेडलाइन के डर में सरकार की पूरी ताकत लगा देने के बाद भी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बोल ही पड़ती हैं कि वो, कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों को लेकर नर्वस हैं। और, शीला दीक्षित का इस तरह से नर्वस होना देश के शहरी सिस्टम और सरकार के बेहतर शहर बनाने के फोकस पर काले धब्बे जैसा दिखता है। क्योंकि, दरअसल दिल्ली ही पूरे देश में ऐसा शहर हैराज्य भी कहा जाता हैजहां से शहर बनाने के सारे पैमानों का परीक्षण होकर ही देश के दूसरे शहरों में लागू किया जाता है। यही वजह है कि दूसरे शहरों से काफी ज्यादा चमकती दिल्ली में हर शहर से लोग आकर इस शहरी चमक के हकदार पहले बन जाना चाहते हैं। लेकिन, मुख्यमंत्री का डर दिखा रहा है कि दिल्ली इतना अच्छा शहर नहीं बन सका है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में देश की इज्जत बचा सके। डर लग रहा है कि दुनिया भर से जो खिलाड़ी आएंगे वो, दिल्ली की सड़कों के जाम में कहीं फंस तो नहीं जाएंगे। डर लग रहा है कि दिल्ली का शहरी कहीं विदेशी महिला/पुरुष खिलाड़ियों के साथ ऐसी हरकत न कर दे कि असभ्य शहरी होने का दिल्ली पर ठप्पा लग जाए।

 डर सिर्फ जाम और लोगों के सिविक सेंस का नहीं है। देश के सबसे अच्छे शहर के पुलिस सिस्टम से भी दिल्ली सरकार डर रही है। वो, इस बात से भी डर रही है कि पिछले कई सालों से बिना मीटर के धड़ल्ले से चलने वाले ऑटो चालक कॉमनवेल्थ गेम्स के समय भी अनाप-शनाप मुनाफा कमाने के चक्कर में दिल्ली की इज्जत में पलीता तो नहीं लगा देंगे। दिल्ली की सड़कों पर चमकती लो फ्लोर बसें उतरीं तो लगा कि चलो एक मामला तो जम गया। लेकिन, महीने-सवा महीने में 10-12 लो फ्लोर बसों में लगी आग डराने लगी है कि कहीं कॉमनवेल्थ गेम्स के समय ये लो फ्लोर बसें डरावनी बसों में न तब्दील हो जाएं।

 दिल्ली की मेट्रो ने दुनिया भर में तारीफ पाई। सच्चाई भी यही है कि मेट्रो में यात्रा करके यकीन होने लगता है कि भारत में शानदार शहरी सिस्टम तेजी से अपनी जगह बना रहा है लेकिन, दुर्भाग्य देखिए कि जब दुनिया की नजर कॉमनवेल्थ गेम्स के समय हमारी इस शहरी तरक्की पर होगी उससे ठीक पहले मेट्रो के खंभे में दरार से लेकर मेट्रो के पटरी से उतरने तक की डरावनी खबरें आ गईं। शीला जी का नर्वसनेस बेवजह नहीं है।

 पटरियों पर तो रेड सिगनल के बिना काम नहीं चलने वाला। शीला जी जुट गईं कि कम से कम सड़कों को तो रेड सिगनल फ्री कर दिया जाए। दस साल पहले की दिल्ली और अभी की दिल्ली की तुलना की जाए तो, दिल्ली की सड़कें दोगुनी से ज्यादा हो गई होंगी। ITO चुंगी पास, धौलाकुआं, मूलचंद, DND के फ्लाईओवर देखकर विदेशी शहरों में होने का भ्रम होता है लेकिन, इन चौराहों-दस राहों से आगे बढ़ते ही रेंगती कारों की कतार में फंसी अपनी कार में घिसटते हुए सारा भ्रम टूट जाता है।

शीला दीक्षित इसीलिए नर्वस हैं। वो, नर्वस इसलिए भी हैं कि दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में 8 सबवे बनाने का काम अब शुरू हो पाया है। अब इसके बनते-बनते 8-9 महीने का समय कैसे बीत जाएगा पता ही नहीं चलेगा। अब दिल्ली वालों को तो, इन सबवे के बनते तक कनॉट प्लेस में लिमिटेड एंट्री करके काम चला लेंगे। लेकिन, विदेशी खिलाड़ियों मेहमानों को दिल्ली का दिल देखने से कैसे मना कर सकेंगे। लुटियंस की दिल्ली में तो हर दूसरे चौराहे पर मिट्टी-धूल दिख रही है। एक फ्लाईओवर जाम से बचा रहा है तो, दूसरे फ्लाईओवर बनाने के लिए कार्य प्रगति पर है वाले बोर्ड गाड़ियों का शीशा खोलने तक की इजाजत नहीं दे रहे हैं। फ्लाईओवर पर चढ़ी कारों को और लंबी लाइन जाम में दिखती है और रहा-सहा देश के सबसे शानदार शहर में रहने का भ्रम भी टूट जाता है। हाल ये है कि 4-5 किलोमीटर में एक फ्लाईओवर से दूसरे फ्लाईओवर का सफऱ भी रेंगते हुए तय हो पाता है।

 शीला जी के नर्वस होने की एक वजह हो तो, चल भी जाए। दिल्ली से नोएडा को जोड़ने वाली यूपी लिंक रोड को चौड़ा करने के काम का श्रीगणेश भी ताजा-ताजा ही हुआ है। काम बड़ी तेजी में चल रहा है। लेकिन, बीच में एकाध फ्लाईओवर भी बनने हैं इस सड़क को भी रेड लाइट फ्री करने के लिए। सब मिलाकर इसके भी पूरा होने का समय वही कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के ठीक पहले तक जा रहा है। उस रास्ते से आते-जाते नर्वस तो हम भी हुए जा रहे हैं। शीला जी तो, मुख्यमंत्री हैं उनको तो होना ही चाहिए।

 फिर इन सबके बाद सभ्य शहरी होने का सवाल तो सबसे ज्यादा नर्वसनेस की वजह है ही। पता नहीं कौन अचानक 135 किलोमीटर की रफ्तार से किसी को टक्कर मार दे। पता नहीं कौन सत्ता के रुआब में किसी को सरेराह पीटने लगे, पिस्टल लगा दे या फिर किसी पब-बार में अपनी बीवी-बहन की तथाकथित बेइज्जती का बदला लेने निकल पड़े।

 सरकार शहरों और शहरियों के भरोसे इंडिया ग्रोथ स्टोरी लिखना चाह रही है। लेकिन, देश के सबसे शानदार शहरी मॉडल में इतने छेद दिख रहे हैं कि दुनिया जब इस ओर तकने को तैयारी में है तो, इस शहरी मॉडल को चलाने-बनाने वाले नर्वस हैं। शीला जी की नर्वसनेस बेवजह नहीं है। ये सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या हम आने वाले समय के लिहाज से शहर बना पा रहे हैं। 

Friday, May 22, 2009

ट्रॉमा सेंटर बनते जा रहे हैं शहर

सेक्टर 49 नोएडा में रहता हूं। पॉश कॉलोनी है। सब बड़ी-बड़ी कोठियां हैं। सामने ही प्रयाग हॉस्पिटल है। अभी थोड़ा ही समय हुआ जब प्रयाग हॉस्पिटल में ट्रॉमा सेंटर भी खुल गया है। मेरी डॉक्टर पत्नी ने बताया- मतलब इमर्जेंसी में यहां इलाज कराया जा सकता है।


लेकिन, मुझे तो लग रहा है कि जब पूरा शहर ही ट्रॉमा सेंटर बन गया हो तो, ऐसे सेक्टरों के बीच में खुले एकाध अस्पतालों के ट्रॉमा सेंटर से कैसे काम चल पाएगा। चुनाव में नोएडा (गोतमबुद्ध नगर) से BSP प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नागर जीते हैं। BSP जीती है लेकिन, S से सड़क छोड़कर BP- बिजली, पानी- का बुरा हाल है। इतना कि लोगों का BP- ब्लड प्रेशर इतना बढ़ जाए कि उन्हें ट्रॉमा सेंटर खोजने की जरूरत पड़ जाए।


पता नहीं लोग कह रहे हैं- बार-बार सुनते-सुनते मुझे भी कभी-कभी लगता है- कि अब BSP ही चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा बन रही है। जहां नेता जनता की BSP- बिजली, सड़क,पानी- की जरूरत नहीं पूरी कर रहे हैं। जनता उन्हें लात मारकर भगा रही है। जो, BSP से जनता को संतुष्ट रख पा रहे हैं उन्हें, जनता दोबारा मौका दे रही है।


पता नहीं समझ में तो नहीं आता ये सब। सड़के नोएडा में शानदार हैं तेज रफ्तार से गाड़ियां दौड़ती हैं। लेकिन, बिजली 4 घंटे तो कम से कम कट जाती है। बिजली जाने का तरीका भी गजब है। ऐसा नहीं है कि एक तय समय पर जाए जिससे पता हो कि कब से कब तक बिजली रानी के इंतजार में बैठना है। कभी भी निकल लेती है। रात साढ़े ग्यारह के आसपास लेटा- सोने की कोशिश रंग लाई ही थी कि 11.50 पर बिजली रानी भाग गईं। छत पर गया तो, इतने मच्छर। अब मच्छर पता नहीं कहां से आते हैं मैंने तो, सेक्टर में किसी को गंदगी करते नहीं देखा। समय से कूड़े वाला आता है। सबके डस्टबिन उसकी ट्रॉली में पलट दिए जाते हैं। फिर मच्छर कहां से आए। खैर, जहां से भी आए। मेरे सोने की कोशिश को गजब का असफल कर दिया।


ऐसा गंदे नाले जैसा पानी मैंने अपने अब तक के जीवन में नहीं देखा था जैसा नोएडा में सप्लाई हो रहा है। पीला-काला ये पानी। पता नहीं कौन सी अथॉरिटी इसे साफ करके लोगों के घरों तक भेजती है। और, क्या नोएडा में साफ पानी भेजने के लिए जिम्मेदार सारे अफसर-कर्मचारी नोएडा से बाहर रहते हैं जो, इन्हें पता भी नहीं चलता कि ये क्या सप्लाई कर रहे हैं। ये पानी पीने के लिए एक्वागार्ड वॉटर प्योरीफायर भी कम असरदार होने लगा है। एक दिन एक मार्केटिंग वाला लड़का आया वाला ये तो, पानी को सिर्फ उबालता है। लेकिन, कंकड़-मिट्टी, गंदगी को साफ नहीं कर पाएगा। RO लगवा लीजिए- एक्सचेंज ऑफर भी बता गया। करीब 8000 का प्योरीफायर साल भर बाद 2000 की कीमत का बचा है। RO 10000 रुपए से शुरू ही हो रहा है।


लेकिन, सिर्फ पीने का ही मसला नहीं है। नहाने-कपड़े धोने लायक भी ये पानी नहीं है। अखबारों के साथ आने वाले सप्लीमेंट में ड्रीमगर्ल हेमामालिनी की बिटिया एक मशीन से बने बढ़िया पानी से नहाकर-तरोताजा होकर निकलती हैं। अब बताइए घर में नहाने, कपड़े धोने तक का पानी साफ करने के लिए मशीन चाहिए। बिजली के लिए इनवर्टर से भी काम नहीं चल पाता। खाक BSP मुद्दा है। चलिए फिर भी हम उस जश्न में शामिल होते हैं जो, उत्तर प्रदेश से निकले उस जनादेश की जय हो कर रहा है। जहां राष्ट्रीय पार्टियों के फिर से भरोसेमंद साबित होने पर मनाया जा रहा है।


हम बिजली, पानी जैसे स्थानीय मुद्दों पर बात करके नाहक कलेजा जला रहे हैं। वैसे भी रात भर सो नहीं पाया हूं। आंख जल रही है। ऑफिस भी जाना है। आज सबके मनमोहन प्रधानमंत्री बनने की शपथ लेने वाले हैं। उन पर स्पेशल तैयार करना है। राष्ट्रीय मुद्दों की चिंता करनी है। मेरा क्या अधिक से अधिक यही तो होगा- गंदे पानी से बीमारी मिलेगी। बिजली जाने से रात भर नींद नहीं आएगी- थोड़ा चिड़चिड़ापन होगा। थोड़ा ब्लड प्रेशर बढ़ेगा। कोई बात नहीं ट्रॉमा सेंटर है ना।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...