Showing posts with label भारतीय समाज. Show all posts
Showing posts with label भारतीय समाज. Show all posts

Thursday, November 28, 2013

सरकार महंगाई बचत खा रही है!




एक परिचित के यहां शाम के खाने पर गया था वो एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते हैं। चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने अपना दुख दर्द बताना शुरू कर दिया कि किस तरह उनकी इंडस्ट्री में ग्रोथ नहीं रह गई है। इस चर्चा के बाद मेरा ये साहस ही नहीं हुआ कि मीडिया इंडस्ट्री में आए ठहराव या उल्टी ग्रोथ यानी मिल रही तनख्वाह में गिरावट की चर्चा कर सकूं। लेकिन, ये हाल सिर्फ मीडिया या आईटी इंडस्ट्री का नहीं है। ज्यादा क्षेत्रों में ऐसा ही माहौल है। 2008 की मंदी के बाद से अब तक भारतीय अर्थव्यवस्था उबर नहीं सकी है। दरअसल 2008 की मंदी के समय जब अमेरिका और यूरोप धराशायी हो रहे थे तब भी भारतीय काम भर की खरीदारी कर रहे थे। त्यौहार मना रहे थे। नई गाड़ियां (कार-मोटरसाइकिल) खरीद रहे थे और नए नए कपड़े भी। उस समय भारतीयों को एक शब्द सुनने को मिला था जिससे समझ में आया कि आखिर दुनिया के बड़े बैंकों और भारत के बैंकों में मूल रूप से अंतर क्या है। वो अंतर था पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम और इनवेस्टमेंट बैंकिंग सिस्टम का। भारत पूरी तरह से पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम पर चलता है। इसका मतलब ये कि बैंक अपनी बचत को कुछ तय ब्याज पर रखने की जगह है और कभी आपकी जरूरत पड़े तो बैंक बचत पर मिलने वाले ब्याज से कुछ ज्यादा ब्याज पर आपको घर, गाड़ी और दूसरी छोटी-मोटी जरुरतों के लिए कर्ज देता है। जबकि, दुनिया में प्रचलित इनवेस्टमेंट बैंकिंग सिस्टम ये कहता है कि किसी को उसकी हैसियत से कुई गुना ज्यादा कर्ज देना और उस पर मुनाफे के तौर पर तगड़ा ब्याज कमाना। उस समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बड़े बैंकरों की तरफ से भी ये बयान आए थे कि भारत दुनिया की मंदी के दौर में भी अगर ठीक रह गया तो उसकी सबसे बड़ी वजह भारत के लोगों की बचत करने की आदत थी। यानी सच बात ये थी कि सरकार की नीतियों ने नहीं लोगों की आदतों ने इस देश को 2008 की भयानक मंदी से लड़ने की ताकत दी थी।

मंदी में भारतीयों की बचत की आदत से देश को कैसे ताकत मिली थी इसको समझिए। 2008 की मंदी के साल यानी वित्तीय वर्ष 2007-08 की बात करें तो भारतीयों की बचत की आदत चरम पर थी। 2007-08 में भारत घरेलू बचत दर 36.9 प्रतिशत थी। और जब 2008 की मंदी आई नौकरियां गईं। जिनकी नौकरियां बचीं भीं उन्हें कम तनख्वाह पर समझौते करने पड़े तो यही बचत काम आई। लेकिन, अब डराने वाले आंकड़े आ रहे हैं। बचत बढ़ाने का जुगाड़ भारतीयों के पास इसलिए नहीं है क्योंकि, जेब में आने वाली रकम बढ़ी नहीं और उस पर महंगाई लगातार बढ़ी है। पिछले करीब तीन सालों से अगर खाने पीने के सामानों की महंगाई दर देखें तो ये औसत दस प्रतिशत के ऊपर रही है। अगर दूसरे जरूरी सामानों की भी बात करें तो ये महंगाई दर औसतन आठ प्रतिशत के ऊपर ही रही है। अब जरा समझिए कि महंगाई कैसे हमारी आपकी बचत खा रही है। 2007-08 में 36.9 प्रतिशत घरेलू बचत दर वाला भारत 2012 आते-आते तेजी से गिरकर 30.8 प्रतिशत ही बचा पा रहा था। ऐसा नहीं कि भारतीय अचानक बड़े शाहखर्च हो गए या फिर उनकी आदतें यूरोप और अमेरिका के लोगों जैसी हो गईं। दरअसल सच्चाई ये है कि भारतीय की बचत उनकी जरूरतों की महंगाई की भेंट चढ़ गई। 2012 में भारतीयों की बचत पिछले दस सालों में सबसे कम रह गई। क्योंकि, प्रति व्यक्ति आय वित्तीय वर्ष 2012 में सही मायने में सिर्फ 4.7 प्रतिशत ही बढ़ी है जो करीब अड़तीस हजार रुपये होती है। जबकि, 2011 के वित्तीय वर्ष में प्रति व्यक्ति आय बढ़ने की दर 7.2 प्रतिशत थी। मतलब 2008 की मंदी के बाद 2011 में लोगों की कमाई थोड़ी बेहतर हुई लेकिन, 2012 आते आते फिर वही ढाक के तीन पात।

और ऐसा नहीं है कि ये सारी बातें सिर्फ नौकरीपेशा लोगों के संदर्भ में हैं दरअसल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में जबरदस्त गिरावट देखने को मिली है। कारों के सबसे बड़े बाजार बनने की तरफ बढ़ रहे भारत में इस दीपावली वाले समय में भी कारें उतनी नहीं बिक सकीं। कई कंपनियों ने तो अपनी कारों का उत्पादन ही घटा दिया। सितंबर महीने में देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति के पास 5 हफ्ते से ज्यादा की इनवेंट्री थी। वो भी तब जब मारुति ने जून में आठ दिनों के लिए प्लांट बंद कर दिया था। इसका मतलब ये हुआ कि अगर मारुति उत्पादन बंद भी कर दे तो पांच हफ्ते की कारें उसके गोदामों या फिर डीलरों के शोरूम पर खड़ीं थीं। दीपावली भी मारुति का खास भला नहीं कर सकी और इनवेंट्री घटकर चार हफ्ते की रह गई। पिछले साल अक्टूबर में मारुति ने 96002 कारें बेचीं थीं। मारुति इस साल की दीपावली में सिर्फ 60 कारें ही ज्यादा बेच सकी। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि लोगों के पास कारें खरीदने के लिए रकम ही नहीं बची है। जबकि, दीपावली पर कंपनियों ने जमकर तोहफे बांटे, छूट दी। शेयर बाजार भी पिछले तीन साल से वहीं का वहीं है। मतलब लोगों के लिए कमाई बढ़ाने के साधन कम हुए हैं। लेकिन, महंगाई तो कम होने का कोई इशारा भी नहीं कर रही है।

उद्योग संगठन एसचैम का ताजा सर्वे हमारी चिंता और बढ़ाता है। सर्वे में सामने आया है कि बढ़ती महंगाई, महंगे ईंधन और शिक्षा-स्वास्थ्य पर बढ़ते खर्च की वजह से मिडिल क्लास भारतीय परिवारों की कमाई गायब हो रही है। और इस महंगाई की वजह से मिडिल क्लास भारतीय परिवार की बचत पिछले तीन सालों में चालीस प्रतिशत से ज्यादा घटी है। ये आंकड़ा स्तब्ध कर देने वाला है। मतलब ये कि अगर महीने में किसी परिवार में दस हजार बचते थे तो अब वो छे हजार रुपये ही बचा पा रहा है। इसे आगे जाएं तो किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए भारतीय परिवारों के पास रकम तीन साल पहले की करीब आधी ही बच रही है। जनवरी से मार्च 2013 के बीच कराए गए इस सर्वे में ज्यादातर लोगों का यही कहना था कि वो किसी तरह अपने खर्चे घटाने और कमाई बढ़ाने के उपाय खोज रहे हैं। सर्वे में शामिल हर चौथा व्यक्ति बेहतर नौकरी तलाश रहा है। यहां तक कि एक साथ दो नौकरियां और ओवरटाइम करके अपने खर्चे पूरे करने की कोशिश में लगा है। सबसे बड़ी बात कि मनमोहिनी अर्थव्यवस्था का सपना बुरी तरह से ध्वस्त हो रहा है। मेट्रो शहरो में रहने वाले 82 प्रतिशत लोग कह रहे हैं कि उनका जीवन स्तर कम से कम पचीस प्रतिशत गिरा है। और ये कहानी देश के उन शहरों की है जो तरक्की, जीवन स्तर के मामले में भारत का चेहरा हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, चंडीगढ़ और देहरादून जैसे शहरों में सर्वे में भारत की तरक्की की ये तस्वीर दिखी है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम समय समय पर ये कहते रहते हैं कि वित्तीय घाटा घट रहा है। शेयर बाजार में विदेशी निवेशक फिर आ रहे हैं। करीब चार लाख करोड़ की बुनियादी परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई है। सब कुछ पटरी पर आ रहा है। लेकिन, वित्त मंत्री जी ये सब सरकार के लिए दुनिया में अपनी रेटिंग बचाने के लिए जरूरी होगा। इन आंकड़ों के बावजूद यूबीएस ने भारत की रेटिंग गिरा दी। और हम तो मिडिल क्लास इंडियन फेमिली हैं जिसने मनमोहन सरकार के उदारीकरण के सपने को उड़ने की ताकत दी थी। हमारी जेब खाली हो रही है। जरूरी खर्च इतना महंगा हो गया है कि उसे करने के लिए पैसे नहीं हैं। सरकार कुछ करो ये महंगाई हमारी बचत भी खा रही है। अब अगर 2008 दोबारा हुआ तो किसकी बचत के सहारे दुनिया में सिर उठाके घूम पाओगे।

Tuesday, June 29, 2010

तलाक ले लो, तलाक

सरकार का मानना है कि देश में तलाक न मिलने से लोगों की जिंदगी दूभर हो गई है इसलिए वो, हिंदू विवाह कानून में बदलाव करके विवाह विच्छेद यानी पति-पत्नी के बंधन को तोड़ने के 9 आधारों में दसवां आधार शामिल करने जा रही है जिससे लोगों को आसानी से तलाक मिल सके।
भारत में अभी 1.9 प्रतिशत लोग ही हैं जो, शादी करने के बाद उसे तोड़ने का साहस जुटा पाते हैं। अब हमारी सरकार ज्यादा से ज्यादा लोगों में ये साहस भरना चाहती है और इसीलिए शादी तोड़ने के कानून में पश्चिमी देशों की नकल करके बदलाव करना चाहती है। अब अगर वहां की बात करें तो, हम तलाक के मामले में काफी पिछड़े दिखते हैं। जैसे शादी करने वाले 100 अमेरिकियों में से 55 तलाक लेते हैं और शायद फिर शादी करते हैं या बिना शादी किए ही कई शादियों का मजा लेते हैं। शादी तोड़ने का जो दसवां आधार प्रस्तावित है वो, है इनएविटेबल ब्रेकअप- यानी पति-पत्नी अब एक साथ नहीं रह सकते इस आधार पर उन्हें तलाक मिल जाएगा। इसमें ये साबित करने की जरूरत शायद थोड़ी कम रह जाएगी कि आखिर क्यों साथ नहीं रह सकते।

ये जो नया प्रस्ताव है इसे महिलाओं के पक्ष का बताने की कोशिश हो रही है ये कहकर कि ज्यादातर तला न मिलने से महिलाओं का जीवन नर्क हो जाता है। जबकि, सच्चाई इसके ठीक उलट है भारतीय समाज में तलाक के लिए गए मामलों में से सिर्फ दस प्रतिशत ही ऐसे होते होंगे जिसमें महिला जल्दी तलाक चाह रही होगी। क्योंकि, इस समाज में तलाक के बाद पुरुषों के लिए तो दूसरी पत्नी खोज लेना फिर भी आसान होता है लेकिन, किसी तलाकशुदा महिला को एक तलाकशुदा पुरुष भी बमुश्किल ही पत्नी बनाना चाहता है। महिलाओं के पक्ष का ही बताकर इसे प्रगतिशील बताने की कोशिश हो रही है। समाज में जो दबे-छिपे चल रहा है उसे कानूनी मान्यता देकर प्रगतिशील बनने-बताने की परंपरा तेजी से चल रही है। अब परिवार तोड़ने में तेजी दिखाकर प्रगतिशील बनने की कोशिश हो रही है।

ये प्रगतिशील बनने-बनाने का जो, सिलसिला चल रहा है। वो, एकदम से भारत को अमेरिका बनाने पर तुला है। पहले ये कहा गया कि नए बन रहे समाज में लड़के-लड़की जब घर से दूर रह रहे हैं तो, स्वाभाविक हैं कि उनमें निकट के रिश्ते बनेंगे और इसलिए एक प्रगतिशील फैसला आया कि लिव इन रिलेशनशिप में कोई बुराई नहीं है। यहां तक कि अदालत ने भी तथाकथित प्रगतिशील लोगों के फैसले पर मुहर लगा दी।

एक और प्रगतिशील फैसले को कानूनी मान्यता मिलने के बाद देश के मीडिया में ऐसे दिखा जैसे पूरा भारत समलैंगिक (गे-लेस्बियन) संबंधों के लिए मरा जा रहा था और उसे समलैंगिक संबंधों के कानूनी आधार मिल जाने से आस्थावान लोगों के गंगा नहाने जैसा सुख प्राप्त हो गया है। लगा जैसे सब दबे-छिपे सिर्फ समलैंगिक रिश्ते ही बना रहे थे। वो, तो कानून के डर से विवाह जैसे संस्थान चल रहे थे। शायद भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश होगा जहां विवाह जैसी संस्था इतनी मजबूत है। तथाकथित प्रगतिशील, तर्कवान लोग विवाह संस्था की ढेर सारी खामियां तो लगातार खोजते रहते हैं लेकिन, इस बात को नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं कि जिस भारतीय समाज में सिर्फ एक पत्नी की वैधता है उसमें इतने पति-पत्नी के रिश्तों में से सिर्फ 1.9 प्रतिशत ही क्यों कानून के दरवाजे अपने रिश्ते को तोड़ने के लिए पहुंच रहे हैं।

पश्चिमी समाज में तो, पुरुष-स्त्री बस देह के रिश्ते से ही जाने जाते हैं। मुसलमानों तक में एक साथ निकाह वैध होने से एक पुरुष चार स्त्रियों के साथ संबंध बनाने की खुली छूट पा जाता है। लेकिन, भारतीय समाज में सिर्फ एक स्त्री के संबंध कैसे चल रहे हैं इसकी चर्चा दबा दी जाती है। पश्चिमी समाज इनएविटेबल ब्रेक अप के सिद्धांत पर चल रहे हैं तो, मुस्लिम समाज तलाक-तलाक-तलाक कहकर एक नए संबंध की बुनियाद रख लेते हैं। पश्चिमी समाज में पुरुष-स्त्री दोनों के एक साथ कई शारीरिक रिश्ते बनाने और मुस्लिम समाज में एक पुरुष के एक साथ कई स्त्रियों से शारीरिक रिश्ते बनाने की छूट के बावजूद इन समाजों में स्त्रियों के हक की कितनी बात हो पाती है ये छिपी नहीं है।

अब सरकार ऐसा खुलापन और यौन स्वच्छंदता हिंदू समाज को क्यों परोसना चाहती है। क्यों चाहती है कि तलाक-तलाक-तलाक के अंदाज में हिंदू समाज में भी पुरुष-स्त्री सिर्फ देह के रिश्ते से ही बंधे रहें। हिंदू समाज में किसी पुरुष-स्त्री के संबंध में परिवार की जो भूमिका है उसे नजरअंदाज करने की कोशिश क्यों हो रही है। वैसे ही पश्चिमी विकास के मॉडल पर चलते हुए हिंदू परिवार भी एकांगी, न्यूक्लियर होते जा रहे हैं। यानी परिवार तोड़ने का काम तो पहले से ही विकास की नई परिभाषा आसानी से कर रही है। अब लिव इन हो, वयस्क स्त्री-पुरुषों के बीच मनमर्जी से शारीरिक संबंध बनाना हो या फिर दो पुरुषों या दो स्त्रियों के बीच मर्जी से शारीरिक संबंध बनाने को कानूनी मान्यता हो सब परिवार, विवाह की संस्था पर ही तो चोट कर रहे हैं। अब जल्दी से जल्दी तलाक कराकर क्या परिवार, विवाह की संस्था को पूरी तरह से खत्म करने की कोशिश में है सरकार।

लिव इन, वयस्क स्त्री-पुरुष के बीच मनमर्जी से बनाए गए प्रगतिशील संबंधों में हर रोज विवेका बालाजी जैसों के आत्महत्या करने की खबरें आ रही हैं। 2 महीने के बने ब्वॉयफ्रेंड से लेकर पुराने ब्वॉयफ्रेंड की पूरी कतार की तलाश की जा रही है कि किसने इतना तनाव दे दिया कि विवेका को आत्महत्या करनी पड़ी। जरा सोचकर बताइए ना विवाह संस्था में घर में पति से रोज झगड़ने के बावजूद कितनी पत्नियां होंगी जिन्हें तनाव की वजह से आत्महत्या करनी पड़ती है। प्रगतिशील लोगों को आंकड़े कम पड़ने लगेंगे तो, वो घरेलू हिंसा के आंकड़े जुटाकर ले आएंगे और चाहेंगे हर छोटी-मोटी घरेलू हिंसा की शिकार महिला को तलाक मिल जाए। लेकिन, इस बात पर शायद ही बहस करना चाहेंगे कि मनमर्जी से देह के आधार पर बने संबंधों में कितनी हिंसा हो रही है।

सवाल यही है कि हम जब विवाह, परिवार नाम की संस्था का कोई विकल्प नहीं खोज सके हैं तो, फिर इस मजबूत संस्था को पहले ढहा देने की कोशिश क्यों कर रहे हैं। पश्चिमी समाज से नकलकर लाई गई इनएविटेबल ब्रेक अप थियरी ही है कि वहां की सरकारों को ओल्डएज होम पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है।

एक चुटकुला जो, मेरे मोबाइल पर कुछ दिन पहले ही आया कि भारतीय लड़की ने अमेरिकन लड़की से पूछा मेरे 4 भाई और 6 बहनें हैं। आपके कितने हैं। अमेरिकन लड़की ने जवाब दिया—मेरे भाई-बहन नहीं हैं। मैं अकेली हूं लेकिन, मेरी पहली मॉम से 3 पापा और पहले पापा से 4 मॉम हैं। तथाकथित प्रगतिशील फैसलों से परिवार, विवाह संस्था पर चोट से शायद इस चुटकुले की भारतीय लड़की भी अमेरिकन बन जाएगी।

Monday, June 28, 2010

जाति बताइए, जताइए नहीं

भारतीय समाज में कुछ मिथक ऐसे स्थापित हो जाते हैं कि आगे चलकर वो तथ्यों की तरह इस्तेमाल होते हैं। जैसे- कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष पार्टी है, भारतीय जनता पार्टी सांप्रदायिक है और वामपंथ समाजवादियों से भी ज्यादा समाजवादी है। जैसे- मायावती दलितों के हितों की सबसे बड़ी चिंतक हैं। ऐसे ही अब एक नया तथ्य लगभग स्थापित होता जा रहा है। वो, जुड़ा है जनगणना से। जनगणना में अलग-अलग जातियों की संख्या जानने का कोई कॉलम नहीं है और लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव कह रहे हैं कि पिछड़ों की जाति गणना अलग से होनी ही चाहिए जिससे ये साबित हो सके कि पिछड़ों को मिल रहा 27 प्रतिशत आरक्षण उनकी जनसंख्या के लिहाज से काफी कम है। बस इसके बाद तो, उसी सुर में ये भी आवाज तेज होने लगी कि देश के 90 प्रतिशत संसाधनों पर सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों (सवर्ण जातियों) का कब्जा है और ये सवर्ण ही हैं जो, नहीं चाहते कि किसी भी तरह से जातियों की असल संख्या सामने आए। क्योंकि, इससे उनके प्रभुत्व पर खतरा दिखता है।

अब सवाल ये है कि जाति गणना को जरूरी बताने वाले लोग कौन हैं। क्या ये लोग सचमुच जाति गणना इसलिए चाहते हैं कि दबी-कुचली या फिर आर्थिक तौर पर बेहद कमजोर जातियों को उनके अधिकार मिल सकें। इस सवाल का जवाब निश्चित रूप से ना में मिलेगा। जाति गणना की वकालत करने वाले हों या फिर जाति गणना का विरोध करने वाले दोनों ही पक्षों में से ज्यादातर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने या फिर न खिसकने देने की मंशा से जाति गणना के पक्ष में या विरोध में खड़े हैं।

मैं जाति से उच्च कुल का ब्राह्मण हूं और मैं इस जनगणना में जाति के कॉलम को शामिल करने के पक्ष में हूं। लेकिन, ये जाति गणना सिर्फ पिछड़े, दलित या फिर आदिवासियों की नहीं होनी चाहिए। इस जनगणना में हर उस जाति के आंकड़े सामने आने चाहिए जिसके आधार पर समाज में रोटी-बेटी के संबंध बन रहे हैं। जब किसी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी में किसी नेता का राजनीतिक भविष्य इसी से तय हो रहा है कि आखिर उसकी जाति क्या है तो, फिर जनगणना में जाति का कॉलम जुड़ने भर से जातिवाद तेज होने की बात कैसे संभव हो सकती है। क्योंकि, जितना जातिवाद होना है वो, तो बिना जाति बताए भी हो रहा है।

मैं मीडिया में हूं और 12 साल इसमें गुजारने के बाद मेरे मन में एक धारणा मजबूत हो गई है कि जातिवाद जाति बताने से नहीं जाति जताने से बढ़ता है। बल्कि, जाति बताकर तो, जातिवाद कम किया जा सकता है। एक धारणा ये भी है कि दो जातियों के बीच अंतर्जातीय संबंध जातिवाद को तेजी से कम कर सकते हैं। देश के सबसे बड़े गांधी परिवार के बारे में ध्यान करके बताइए ना कि इतने ढेर सारे अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक विवाहों के होने के बाद भी गांधी परिवार को मनुस्मृति के लिहाज से स्थापित सर्वोच्च जाति में ही क्यों माना जाता है। बस इसी बात को अच्छे से समझने की जरूरत है कि आखिर कश्मीरी ब्राह्मण नेहरू के परिवार में गांधी जैसा तटस्थ सरनेम और ढेर सारे गैरब्राह्मण संबंधों के बाद भी प्रियंका-राहुल तक को इस देश में जाति के लिहाज से सर्वोच्च वर्ग अपना मानता है।

अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब बिहार कांग्रेस की लिस्ट में लोकसभा अध्यक्ष के नाम मीरा कुमार के आगे जातिसूचक शब्द छप गया था। मीरा कुमार अपने नाम के आगे जाति सूचक शब्द नहीं लगातीं लेकिन, कांग्रेस को राजनीति करनी है और राजनीति इसी समाज के साथ करनी है इसलिए वो, मीरा कुमार की जाति के लिहाज से ही उनको बढ़ाकर कोटा पूरा कर रही है। मायावती का अपने वारिस के तौर पर खास चमार जाति से एक नौजवान को चुनने का एलान भी मुझे लगता है सबको याद ही होगा। मायावती भी जातिसूचक शब्द नहीं लगाती हैं। लेकिन, मायावती की पूरी राजनीति जातिवाद पर खड़ी है ये कहने से किसे संकोच होगा। राष्ट्रीय पार्टी और सभी जातियों की होने का दम भरने वाली कांग्रेस-बीजेपी से लेकर सिर्फ जाति के आधार पर खड़ी हुई पार्टियों के मुलायम प्रसाद यादव, लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, मायावती जैसे लोग भी टिकट देने में जाति की बात सबसे पहले करते हैं। और, इसमें इन पार्टियों या इन नेताओं का दोष मैं कैसे दे दूं हम और आप यानी हमारा पूरा समाज वोट भी तो इसी आधार पर करता है कि उसकी जाति का प्रत्याशी किस पार्टी से हैं।

एक जमाने में मुलायम सिंह यादव ने ब्राह्मणों पूज्य बताया तो, ब्राह्मणों की जाति की बड़ी जमात मुलायम के पीछे हो ली। वही जब अमर सिंह ताकतवर हुए तो, ठाकुर समाजवादी पार्टी के माने जाने लगे। जबकि, पार्टी सिर्फ यादव नेतृत्व की थी। फिर बसपा के सोशल इंजीनियरिंग में मायावती के चरण स्पर्श के लिए बड़े टीकाधारी ब्राह्मणों की लाइन तो, मीडिया में सर्वाधिक चर्चा का विषय रही ही। ये जाति बताने की नहीं जाति जताने की लड़ाई चल रही है। समाजवादी पार्टी परशुराम सम्मेलन कराती है तो, मायावती हर जाति की अलग कमेटी बनाकर मॉनिटरिंग करती हैं। बीजेपी-कांग्रेस के नेताओं को लग रहा है कि गड़बड़ ज्यादा हो रही है तो, वो मायावती की जाति के लोगों के घर खाना खाकर-रात गुजारकर संतोष कर ले रहे हैं।

जाट पिछड़े हैं लेकिन, हरियाणा में जरा कोई ब्राह्मण अपनी जाति जताकर उनसे ऊपर बैठकर दिखाए। इटावा, एटा में कोई ब्राह्मण अपनी जाति जताकर यादवों से ऊपर बैठकर दिखाए। साफ है देश में पूरी तरह से राजनीतिक ताकत किसी जाति के सर्वोच्च या नीच होने की बात तय कर रही है। लेकिन, सब कुछ चल जाति के पैमाने पर ही रहा है। ये गलतफहमी है कि इस जाति को अंतर्जातीय संबंधों ने मात दे दी है। ज्यादातर मौकों पर अंतर्जातीय विवाह दो जातियों के बीच विद्वेष बढ़ा रहे हैं या फिर मजबूत जाति के सिर के ताज में दो मोती और जड़ रहे हैं। हो सकता है कहीं-कहीं इससे कुछ बात बन रही हो लेकिन, अगर जाति को सचमुच मात दी है तो, वो पैसे ने। जाति को मात दी है तो, बाजार की चमक ने।

लेकिन, जाति की खिलाफत करने वाला उससे तगड़ा कोई सिस्टम अब तक ये समाज दे ही नहीं पाया है। इसलिए धीरे-धीरे ये काम हो रहा है। और, इस धीरे-धीरे होने में किसी के नाम के आगे जातिसूचक शब्द लगे होने या जनगणना के आंकड़ों में किसी जाति की संख्या का पता होने से जातिवाद का बढ़ना-घटना नहीं होने वाला। मैं ब्राह्मण हूं और ब्राह्मणों में भी उच्च कुल से। हमारी नात-रिश्तेदारी भी उतने में ही घूम फिरकर होती रही है। लेकिन, अब प्रभाव और पैसे के महत्व ने धीरे-धीरे उच्च कुलीन ब्राह्मणों को अपने से नीच ब्राह्मणों के यहां भी बेटी देने के लिए तैयार करना शुरू कर दिया है। हमारी नात-रिश्तेदारी में एकाध अपवादों को छोड़ दें तो, अभी कोई दूसरी बिरादरी में शादी-ब्याह करने का साहस नहीं कर पाया है। लेकिन, अब इस पर बात-बहस घरों में होने लगी है।

अच्छा होगा कि इस जनगणना में हर जाति की सही संख्या निकलकर आए और निश्चित मानिए कि जनगणना में सभी जातियों के अलग-अलग आंकड़े आए तो, किसी एक जाति समूह को निशाना बनाकर जातिवादी राजनीति करना ज्यादा मुश्किल हो जाएगा। महादलित और पिछड़ों में भी अतिपिछड़े की राजनीति दरअसल इसी संकट से उपजी थी कि उस खास जाति के नेता का काम सिर्फ अपनी जाति से नहीं चल रहा था। और, इस जनगणना में जातियां जितनी बंटी पता चलेंगी इस समाज से जातिवाद उतना ही कम होगा। शायद ये भी मिथक टूटे कि 90 प्रतिशत संसाधनों पर 10 प्रतिशत लोग (वो भी सिर्फ सवर्ण जातियों के) कब्जा करके बैठे हैं।


जाति के साथ आर्थिक हालात का भी पता लगता चले तो, समझ में आए कि कितने ब्राह्मणों की धोती में पैबंद लगे हैं फिर भी वो, सुबह-सुबह नहा धोकर, कुर्ता-धोती में टीनोपाल देकर, टीका लगाकर चमकता चेहरा लेकर दूसरों की दशा सुधारने का दावा करते घूम रहे हैं और कितने ठाकुर किसी रजवाड़े से खुद को जोड़कर बस खोखली शान बनाए-बचाए पड़े हैं। पता ये भी चल सकता है कि देश में दलितों-आदिवासियों का हाल तो, अब भी बहुत बुरा है लेकिन, आरक्षण के नाम पर असली मलाई खाने वाले तथाकथित पिछड़ों के घर दूध-दही की नदियां हमेशा बहती रहीं। शायद पचास प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण के लिए सुप्रीमकोर्ट को दखल देने की जरूरत भी न पड़े। हर जाति की असल संख्या पता लगी तो, जाति बताने वाले भले ज्यादा दिखेंगे लेकिन, जाति जताने वालों के मन में डर बढ़ेगा। और, असली जातिवाद जाति बताने वालों से नहीं जाति जताने वालों से है। इसलिए मैं हर्षवर्धन त्रिपाठी (सोहगौरा), शांडिल्य गोत्र, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत जाति जनगणना के पक्ष में हूं।

Friday, September 11, 2009

ये मानेगी नहीं जब करेगी नंगई ही करेगी

बहुत दिनों से आपके घर में कोई झगड़ा नहीं हुआ। बहुत दिनों से आपके परिवार के लोगों ने एक दूसरे के खिलाफ साजिश रचनी बंद कर दी है। बहुत दिनों से पड़ोसी के परिवार को देखकर आप बेवजह ईर्ष्या नहीं कर रहे हैं तो, परेशान मत होइए। भारतीय टेलीविजन इतिहास की सबसे बड़ी अदाकारा फिर से अपनी सारी अदा के साथ वापसी कर रही है।


एकदम सही पहचाना आपने- ये हैं क . क . क किरन नहीं। क . क . क K फैक्टर वाली एकता कपूर। वही अपने चिरयुवा जीतेंदर बाबू की काबिल बिटिया। अब एकता कोई ऐसा सीरियल बनाने जा रही हैं जिसमें सिर्फ नंगई होगी। क्यों-क्योंकि, सास-बहू की लड़ाई, पति-पत्नी के ढेरो अवैध संबंधों की चाशनी में भी कपूर साहिबा के धारावाहिक कोई देख नहीं रहा है। सब रियलिटी शो देख लेते हैं या फिर बालिका वधू या लाडो को देख ले रहे हैं।


एकता कपूर दुखी हैं कि सारे टेलीविजन दर्शकों ....

Tuesday, September 08, 2009

भारतीयों में गुलामी का इनबिल्ट सॉफ्टवेयर

YSR रेड्डी की दुखद मौत के बाद आंध्र प्रदेश से करीब 150 लोगों की जान जाने की खबर आई है। कुछ लोगों ने अपने प्रिय नेता की मौत के बाद आत्महत्या कर ली। कुछ इस अंदाज में कि अब मेरे भगवान न रहे तो, हम रहकर क्या करेंगे। और, कुछ बेचारों ने आत्महत्या तो, नहीं की लेकिन, रेड्डी की मौत की खबर सुनने के बाद वो, ये सदमा झेल नहीं पाए। इससे जुड़ी-जुड़ी दूसरी खबर ये कि आंध्र प्रदेश से संदेश साफ है कि YSR रेड्डी का बेटा जगनमोहन रेड्डी की राज्य की बागडोर संभालेगा तो, राज्य का भला हो पाएगा। पिता के अंतिम संस्कार के समय टेलीविजन पर दिखती जगनमोहन की हाथ जोड़े तस्वीरें किसी शोक में डूबे बेटे से ज्यादा राज्य की विरासत संभालने के लिए तैयार खडे, दृढ़ चेहरे वाले प्रशासक की ज्यादा दिख रही है।



हालांकि, कांग्रेस हाईकमान के कड़े इशारे के बाद जगनमोहन का मुख्यमंत्री बनने का सपना फिलहाल हकीकत में बदलता नहीं दिख रहा है। लेकिन, सवाल यहां मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनने का नहीं है। सवाल ये है कि क्या ये नेताओं की भगवान बनने की कोशिश नहीं है जिसमें भगवान के खिलाफ खड़ा हर कोई राक्षस नजर आता है। जैसा दृष्य आज जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने के लिए दिख रहा है ठीक वैसा ही दृष्य आज से कुछ साल पहले दिल्ली में देखने को मिला था जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का त्याग करने का एलान कर दिया था। अब बिना प्रधानमंत्री बने भी देश की सर्वोच्च सत्ता पर सोनिया गांधी ही काबिज हैं लेकिन, जगनमोहन को ये अच्छे से पता है कि कोई दूसरा मुख्यमंत्री बनेगा तो, पिछले 5 सालों से उनके इर्द गिर्द घूम रही राज्य की सत्ता की शक्ति का केंद्र कोई और बन जाएगा।

Monday, September 07, 2009

100 रुपए खुल्ला होता है

करीब 9 महीने बाद मुंबई जाने का मौका मिला। मुंबई राजधानी में दिल्ली से मुंबई के लिए सफर शुरू हुआ। मुंबई का रोमांच- मुंबई की भीड़, गणपति, मुंबई की नई पहचान ताजा बना बांद्रा-वर्ली सी लिंक- अपनी ओर खींच रहा था।



यात्रा शुरू हुई। मेरे सामने की चार सीटों पर सिर्फ एक महिला यात्री थीं। लेकिन, माशाअल्ला पर्सनालिटी क्या पूरा पर्सनालटा था। लंबाई-चौड़ाई सब ऐसी थी कि शायद उन्हें हमारी तरह साइड की बर्थ मिली होती तो, उनके लिए उसमें समाना मुश्किल होता। किसी संभ्रांत मुस्लिम परिवार की बुजुर्ग भद्र महिला थीं। उनको छोड़ने संभवत: उनकी भतीजी और दामाद आए थे। माशाअल्ला भतीजी भी आपा पर ही गई थी। भतीजी के पति ने ऊपर वाली बर्थ एकदम से ऊपर उठा दी जिससे आपा का सर शान से उठा रहे कोई तकलीफ न हो। और, चूंकि चारो सीटों पर वो अकेली ही थीं तो, इस इत्तफाक के बहाने दामाद ने पूरी आत्मीयता उड़ेल दी और आपा के ना-ना करने के बावजूद सीट ऊपर कर दी। एसी द्वितीय श्रेणी के कूपे की ऊपर वाली सीटें फोल्डिंग हैं और, अगर आपको भी संयोग मिले कि नीचे आप हों और ऊपर की सीट खाली हो तो, इसका मजा ले सकते हैं।


कुली आपा का सामान रख चुका था। उसे पैसे देने के लिए भतीजी ने पैसे निकाले तो, आपा ने मीठी आवाज में I have lot of change … कहकर पर्स में से एक साथ निकल आई ढेर सारी नोटों में से एक 100 की नोट कुली को थमा दी। कुली बेचारा इतनी अंग्रेजी अगर समझ गया होगा तो, सोचता कि काश ऐसे ही रोज 5-10 लोग चेंज देने वाले मिल जाते तो, जीवन सुधर जाता। खैर, 100 रुपया चेंज होता है ये जानकर थोड़ा तो मैं भी हदस गया था।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...