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Wednesday, November 11, 2009

अब लगने लगा है कि गरीब रथ है

दिल्ली से राजेंद्र नगर पटना को जाने वाली राजधानी नई दिल्ली स्टेशन से छूटती है और करीब इसी समय शाम को चार बजकर पचास मिनट पर दिल्ली से राजेंद्र नगर पटना को जाने वाली गरीब रथ हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से छूटती है। राजधानी में टिकट वेटिंग था और गरीब रथ में आसानी से टिकट मिल गया तो, तुरंत मैंने आरक्षण करा लिया। लेकिन, स्टेशन से लेकर ट्रेन में बैठने तक गरीब रथ के बुरे हाल का नजारा साफ दिखा।



लालू प्रसाद यादव के रेलमंत्री न रहने से बिहार का कितना नुकसान रेलगाड़ियों के विषय में हुआ ये राजनीतिक बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन, लालू जी के जाने का सबसे बुरा असर पड़ा है तो, उनके सबसे पसंदीदा गरीब रथ प्रोजेक्ट पर। हजरत निजामुद्दीन से राजेंद्र नगर पटना जाने वाली गरीब रथ प्लेटफॉर्म नंबर2 पर आकर लगी तो, लगा कि कौन सी गंधौरी ट्रेन आकर खड़ी हो गई है।



धूल से सनी प्लेट पर पढ़कर यकीन करना पड़ा कि ये गरीब रथ ही है। दरअसल पूरी ट्रेन पर ही धूल-गंदगी की इतनी परतें चढ़ गईं थीं कि लग रहा था महीनों से ट्रेन की सफाई नहीं हुई है। डिब्बों के शीशे तो परादर्शिता का अपना स्वभाव ही एकदम भूल चुके थे।




ट्रेन में ही बैठने पर पता चला कि इस ट्रेन के कुछ डिब्बों में एयर कंडीशनर का पानी भी चूता रहता है। और, लालू की दी हुई दुर्गति के शिकार यात्री गरीब रथ में अभी भी हो रहे हैं कि किनारे की सीटें दो से बढ़कर तीन हो गई हैं। और, ज्यादा सीटें ठेलने के चक्कर में सीटों की संख्या रिजर्वेशन टिकट पर पड़ी संख्या से भी मेल नहीं खातीं। बस भला इतना है कि करीब आधे दाम में राजधानी जैसी सुविधा (खाना-कंबल-चद्दर छोड़कर) गरीब रथ अभी भी दे रही है और टिकट एक दिन पहले भी मिल गया।




अब ये जिस स्टेशन से रवाना हुई उस हजरत निजामुद्दीन स्टेशन का भी हाल जरा देख लीजिए। ये साफ-सफाई पर गर्व करने वाला गंदगी से चमकता बोर्ड आप देख चुके ना। अब देखिए स्टेशन पर इस बोर्ड के लिखे को कीचड़ में मिलाती ये तसवीरें।

Monday, September 07, 2009

100 रुपए खुल्ला होता है

करीब 9 महीने बाद मुंबई जाने का मौका मिला। मुंबई राजधानी में दिल्ली से मुंबई के लिए सफर शुरू हुआ। मुंबई का रोमांच- मुंबई की भीड़, गणपति, मुंबई की नई पहचान ताजा बना बांद्रा-वर्ली सी लिंक- अपनी ओर खींच रहा था।



यात्रा शुरू हुई। मेरे सामने की चार सीटों पर सिर्फ एक महिला यात्री थीं। लेकिन, माशाअल्ला पर्सनालिटी क्या पूरा पर्सनालटा था। लंबाई-चौड़ाई सब ऐसी थी कि शायद उन्हें हमारी तरह साइड की बर्थ मिली होती तो, उनके लिए उसमें समाना मुश्किल होता। किसी संभ्रांत मुस्लिम परिवार की बुजुर्ग भद्र महिला थीं। उनको छोड़ने संभवत: उनकी भतीजी और दामाद आए थे। माशाअल्ला भतीजी भी आपा पर ही गई थी। भतीजी के पति ने ऊपर वाली बर्थ एकदम से ऊपर उठा दी जिससे आपा का सर शान से उठा रहे कोई तकलीफ न हो। और, चूंकि चारो सीटों पर वो अकेली ही थीं तो, इस इत्तफाक के बहाने दामाद ने पूरी आत्मीयता उड़ेल दी और आपा के ना-ना करने के बावजूद सीट ऊपर कर दी। एसी द्वितीय श्रेणी के कूपे की ऊपर वाली सीटें फोल्डिंग हैं और, अगर आपको भी संयोग मिले कि नीचे आप हों और ऊपर की सीट खाली हो तो, इसका मजा ले सकते हैं।


कुली आपा का सामान रख चुका था। उसे पैसे देने के लिए भतीजी ने पैसे निकाले तो, आपा ने मीठी आवाज में I have lot of change … कहकर पर्स में से एक साथ निकल आई ढेर सारी नोटों में से एक 100 की नोट कुली को थमा दी। कुली बेचारा इतनी अंग्रेजी अगर समझ गया होगा तो, सोचता कि काश ऐसे ही रोज 5-10 लोग चेंज देने वाले मिल जाते तो, जीवन सुधर जाता। खैर, 100 रुपया चेंज होता है ये जानकर थोड़ा तो मैं भी हदस गया था।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...