हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे! दूसरी कड़ी

आज ही सुबह मैंने महाराष्ट्र के डीजीपी पी एस पसरीचा और पंजाब के पूर्व डीजीपी एस एस विर्के के भ्रष्टाचार के किस्से लिखे। शाम को मैं टीवी चैनल देख रहा था तो, एक और राज्य बिहार के डीजीपी के भ्रष्ट आचरण का नमूना सामने आ गया। बिहार के डीजीपी जनता दरबार में फरियादियों से चरण स्पर्श कराकर उन्हें कार्रवाई का आशीर्वाद दे रहे थे। ये भ्रष्टाचार तो ऐसा फैल गया है कि इनके नमूना तो, कहीं से भी कोई भी उठा ले।
हैदराबाद से एक खबर आई कि फ्लाईओवर गिरने से कई लोगों की मौत हो गई। ये फ्लाईओवर अभी बना भी नहीं था। बन रहा था, बन चुका होता तो, न जाने कितने और लोगों को मौत के गाल में ले जाता। फ्लाईओवर कोई छोटा-मोटा ठेकेदार नहीं बना रहा था। ऐसे कामों के लिए कॉन्ट्रैक्ट लेने वाली बड़ी कंपनी गैमन इंडिया के पास इसका काम था।

हैदराबाद से ताजा खबर थी, इसलिए पूरे देश को दिख गया। लेकिन, मैं मुंबई में भ्रष्टाचार के नमूने रोज ही देख लेता हूं। मुबंई से उसके पड़ोसी शहर ठाणे जाने के रास्ते में तो, मुझे भ्रष्टाचार के नमूने ऐसे मिल जाते हैं, जैसे मधुमक्खी के किसी छत्ते से शहद टपक रही हो। मुंबई की सड़कों को दुरुस्त करने को लेकर मुंबई हाईकोर्ट BMC, MMRDA को बुरी तरह से लताड़ चुका है। बावजूद इसके अब तक इन बेशर्म संस्थाओं का भ्रष्टाचार से मोह नहीं छूट पा रहा है।

ठाणे की घोड़बंदर रोड पिछले एक साल से लगातार बन रही है। हाईकोर्ट की कई बार डांट खाने के बाद इसके एक बड़े हिस्से का काम काफी हद तक पूरा हो गया है। लेकिन, मुंबई से ठाणे जाते समय घोड़बंदर के लिए मुड़ते ही किसी भी गाड़ी में बैठे व्यक्ति की सारी हडि्डयां एक दूसरे के साथ मिलकर राग भैरवी गाने लगती हैं। मुंबई में सिर्फ गड्ढों में ही हर साल लाखों-करोड़ो रुपए चले जाते हैं लेकिन, BMC, MMRDA एक ऐसी सड़क नहीं बना पा रहे हैं जिसमें बनने के कुछ ही दिन बाद गड्ढे न हो जाएं। BMC का सालाना बजट 7000 करोड़ रुपए से ज्यादा का है, पता नहीं इसमें से कितना गड्ढों में चला जाता है। मुंबई में भ्रष्टाचार के नमूनों की ऐसी लंबी लिस्ट है।

भ्रष्टाचार है, देश के लोगों को इसमें मजा आ रहा है। हर राज्य में सड़कें बनाने की जिम्मा होता है, लोक निर्माण विभाग यानी PWD के पास। इस विभाग में काम करने वाले छोटे कर्मचारी से इंजीनियर, ठेकेदार सब अपने को खुशकिस्मत मानते हैं। यहां तक कि राज्यों में लोक निर्माण विभाग के मंत्री का पद भी राज्य के सबसे रुतबेदार विधायक को ही मिल पाता है। आपको लग रहा होगा कि जब पूरे राज्य को जोड़ने, सड़क-पुल बनाने का काम इसी विभाग के पास है तो, सबसे जिम्मेदार विधायक को ही ये काम मिलना ही चाहिए।
लेकिन, दरअसल किस्सा कुछ और ही होता है। कहने को तो ये विभाग लोक निर्माण के लिए है। लेकिन, ये विभाग मंत्री, इंजीनियर, ठेकेदार से राज्य के मुख्यमंत्री तक के निजी निर्माण में मददगार होता है।

मैं 2001 के महाकुंभ के दौरान इलाहाबाद में रिपोर्टिंग कर रहा था। इस दौरान मुझे जो जानकारी मिली वो ये कि इस कुंभ मेले में अपनी ड्यूटी लगवाने के लिए इंजीनियरों ने लाखों रुपए मंत्रीजी को चढ़ावे में दिए थे। महाकुंभ में करोड़ो रुपए का काम बिना हुए ही भुगतान कर दिया गया। इसका तरीका भी आसान था, ठेकेदार दो लाख के भुगतान के लिए एडवांस में नकद एक लाख पचीस हजार रुपए चढ़ावे में देता था। वो, मंत्री से लेकर बाबू तक बंट जाता था। बची पचहत्तर हजार की रकम ठेकेदार को बिना कुछ किए फायदे के तौर पर मिल जाती थी।

लोक निर्माण विभाग का मैं सिर्फ उदाहरण दे रहा हूं। हर विभाग में ऐसा ही होता है। कहा न भ्रष्टाचार मजा देने लगा है। हर विभाग में भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी को तेज-तर्रार लोगों में गिना जाता है। जो, भ्रष्टाचार में मददगार न हो उसे, कोई अपने साथ नहीं रखना-देखना चाहता। ऐसे लोग बेकार माने जाते हैं। पैसे लेकर काम करने वाला -मंत्री, सांसद, विधायक, सभासद, अधिकारी, दरोगा, सिपाही- सबको पसंद आता है। पैसे लेकर काम कराने वाला दलाल भी इज्जत की नजर से देखा जाता है। हम तो अब रिश्ते भी यही देखकर करते हैं कि भ्रष्टाचार में हमारा रिश्तेदार कितना आगे है। ये बात पूरी हनक के साथ दूसरों को बताते भी हैं। तो, भ्रष्ट समाज के सम्मान में जोर से बोलो- हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे!