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Thursday, April 12, 2012

नइकी दुलहिनिया!

नइकी, पहिले दिन ही आई तो, उसे पता था कि वो, सिर्फ दुबेजी का वंश चलाने के लिए लाई गई है। उस पर हर समय बड़कई के गुस्साने का भी डर था। देखने में बड़कई भी ठीक थी। लेकिन, बड़कई बड़ी थी तो, उमर का भी असर और सबसे बड़ी बात कि बड़कई बच्चा नहीं दे पा रही थी। नइकई, एकदम नई थी। दुबेजी से उमर में लगभग आधी। नई थी, एकदम्मै नई। दुबेजी की जमींदारी थी। पैतृक जमीन इतनी थी कि उसमें काम करने वाली परजा ही दुबेजी के बड़के कच्चे घर और पक्के डाक बंगले के चारो तरफ बस गई थी। लेकिन, चिंता बस वही थी कि आखिर तीन पीढ़ी से एक-एक बच्चे के जरिए चल रहा दुबेजी का वंश और उनकी जमींदारी का क्या होगा। सबसे ज्यादा चिंतित बूढ़ी फुइया थीं। खैर, इसी सब चिंता में नइकई आई। घोर दहेजी समाज में भी नइकी अपने बाबू के लिए गजब खुशकिस्मती निकली कि बिना दहेज शादी हुई। अउर त अउर दुबेजी का हाथ बंटाने के लिए नइकी का भाई भी साथ ही आया। यही दहेज देना पड़ा नइकी के बाबूजी को। नइकी के बाबूजी के लिए इससे बढ़िया क्या हो सकता था कि बिना खर्च किए जमींदार के यहां बेटी जा रही थी और साथ में बेटा भी जमींदार भले न हो लेकिन, जमींदारी संभालने के लिए तो, जा ही रहा था।

नइकी समझदार थी। नइकी काम सबसे संभालकर कर रही थी। बड़की की सेवा। और, दुबेजी के वंश में बढ़ोतरी। बड़की का हाथ-गोड़ मींजने से लेकर, सारी सेवा नइकी कर रही थी। और, इसके बदले उसे बड़की से अभयदान मिला था। क्योंकि, हिंदू संस्कार और कानून त बड़की, नइकी की इजाजत नहीं देते ना। इसीलिए बच्चा न पैदा कर पाने के बाद भी बड़की की इज्जत बनी हुई थी। बड़की भी बड़ी बन गई। अपनी नियति को ही मजबूती बना ली। दुबेजी की सेवा नइकी करेगी और, बाहर का सारा जिम्मा बड़की संभालेगी। वैसे, भी बड़की को पता था कि दुबेजी के पास जाने के लिए उसके पास कोई बहाना भी तो नहीं था। दुबेजी की नजदीकी के लिए ही तो, नइकी आई थी। नजदीकी रंग लाई औ तीन पीढ़ी से एक-एक बच्चे के जरिए चलने वाला दुबेजी का वंश तीन गुना बढ़ गया। अब बड़की ज्यादातर बाहर का ही काम संभालती है। नइकी अभी भी घर के भीतर ही ज्यादा रहती है। बड़की की सेवा भी वैसे ही करती है। हां, अब नइकी के बच्चे बड़े हो गए हैं। बड़की के साथ घर के बाहर के काम में बंटाते हैं। नइकी-बड़की दोनों एक दूसरे की पूरक हो गईं हैं। और, दुबेजी के लिए इससे बढ़िया क्या हो सकता है।

Wednesday, April 11, 2012

सरसों का तेल कैसे बनता है ?

गांव में हमारे दरवाजे पर पीटी जा रही सरसों
गांव खत्म होते जा रहे हैं। हैं भी तो, वो शहर होते जा रहे हैं। पहले गर्मी की छुट्टियों में हर बच्चा अपने गांव जाता था। और, करीब 2 महीने की शानदार छुट्टियां मनाने में पूरा गांव समझ लेता था। गांव के साथ गांव की बातें भी समझ लेता था। खेत भी समझ लेता था। खेती भी समझ लेता था। गाय-भैंस गोबर भी समझ लेता था। लेकिन, अब के बच्चों की न तो उस तरह से गर्मी की छुट्टियां होती हैं। न वो, गांव जाना चाहते हैं। न गांव समझना चाहते हैं। कईयों के तो, गांव ही नहीं रह गए। फिर ऐसे में शहरों के कॉन्वेन्ट स्कूलों में जब कोई संस्था सर्वे करती है तो, बच्चे दूध मदर डेयरी और अमूल की पैदाइश बताते हैं।

इस बार गांव गया तो, हमारी सरसों पीटी जा रही थी। लकड़ी के पटरा चार लकड़ियों पर लगा था। और, पूरी जमीन गोबर से अच्छे से लीप दी गई थी। और, दोनों तरफ से दो लड़कियां लगातार सरसों पीट रही थीं। इस प्रक्रिया में सरसों के दाने गोबर से लीपी जमीन पर गिर रहे थे। बाद में सरसों के खाली पेड़ किनारे करके सरसों के दाने बटोर लिए जाते हैं और इसी सरसों के दाने से सरसों का तेल तैयार। वैसे तो, ये बड़ी सामान्य घटना/ प्रक्रिया है। लेकिन, मैं यही सोच रहा था कि जब बच्चे गर्मी की छुट्टियों में गांव ही नहीं जाएंगे तो, गांव क्या समझेंगे।

Tuesday, April 10, 2012

खाबदान!


बवाली के मेहरारू क तेरही भोज

आखिरकार नंबरदार के घर से केहू नाहीं आए। जबकि, लागत रहा कि एकाध घर छोड़के एह बार सब बवाली के दुआरे खाए अइहैं। मैनेजर साहब से बाबूजी मिलेन त कहेन कि ई जरूरी है कि पूरा गांव एक साथे रहै। कउनौ मतलब थोड़ो न बा। अरे बाबूजी मतलब, नंबरदार का बेटवा। बाबूजी भोपाल नौकरी केहेन। जंगल विभाग म बाबू रहेन। इहीसे उनके घरे वाले सब बाबूजी कहै लागेन। रिटायरमेंट के बाद बाबूजी लउट के अपने गांव के दूसरे लोगन की तरह इलाहाबाद म घर बनवाएन औ हुअंई रहई लागेन। सारी जिंदगी गांव से बाहर रहइ के वजह से बाबूजी क लागत रहा कि का फायदा ई एक दूसरे से झगड़ा करे से। एक के घर मं कुछ सुख-दुख परै औ आधा गांव मुंह फुलाए बइठा रहै। तबै बाबूजी मैनेजर साहब से कहेन वइसेओ गांव में कइउ जने के घरे में रोज ढंग क खाए क जुगाड़ त रहत नाहीं औ उही मं कुछ परे-परोजने खाबदान का झंझट। लेकिन, नंबरदार के घरे से केहू नाहीं आए। जमीन-दुआर क लइके बवाली के घरे से मुकदमा जउन चलत बा। वइसे अब न बवाली अहैं, न नंबरदार। औ इ तो, बवाली के मेहरारू के मरै के तेरही क नेउता रहा।
खैर, ई गांव है। प्रतापगढ़ का ठेठ पारंपरिक पंडितों का गांव। ठसका ई कि हम सोहगौरा त्रिपाठी से श्रेष्ठ कउनौ बाभन होबै नाहीं करतेन। इही से बिटिया के बियाहे से लैके, हर काम मं मेल क श्रेष्ठ बाभन हेरै मं जिउ निकर जाथ। लेकिन, बभनई क ठसका तो, बराबर बना बा। बल्कि, सही मं तो, बढ़तौ जात बा। इही से पूरा गांव कभौ एक नाहीं भ। हमेशा गांव मं दुई पार्टी रही। ई अलग बात है कि राजनीतिक पार्टियों की तरह गांव की पार्टी के नेता भी अदला-बदली का खेल खेलते रहते थे। लेकिन, बहुत दिन से गांव में चल रहा दो पार्टी का झंझट इस बार टूटने की उम्मीद कुछ दिख रही थी। मास्टर साहब के दुआरे प हमेशा की तरह पार्टी मजबूत करने का कार्यक्रम जारी था। पता चला कि जेई क मेहरारू कहिन चाहे जउ होई जाए। मास्टर और मैनेजर के साथे कभौ न जाब। औ जेई क मेहरारू ई सब करत रहिन अपने कक्कू के कहे से। वइसे जेई क मेहरारू कक्कू का पानी गांव के झगड़ा म कइउ दाईं मजे से उतार चुकी रहिन। लेकिन, खाबदान के मामले में कक्कू की काम भर की सुन ली जाती थी। काहेसे के कक्कू इंटर कॉलेज मं लेक्चरर रहेन औ थाना भरे क पत्रकार। एसे तीन घरे क ठेका औनहीं क लगे रहा। केसे खाबदान करैक बा। केसे खाबदान तौरै क बा, ई सबकुछ। वइसे अब कक्कू रिटायर होइ ग अहैं औ कक्कू क थाने वाली पत्रकारिता भी कमजोर हुई। या इ कहें कि कक्कू की थाने वाली पत्रकारिता इसलिए भी कमजोर हो गई कि अब गांव में कई वकील हो गए। जेई के मेहरारू बीजेपी क गांव का नेता होई गईन। लेकिन, एह बार कक्कू रहबौ नाहीं केहेन औ कक्कू क असर घटि ग रहा। तो, बस जेई औ उनके मेहरारू कक्कू के कहे पे बवाली के मेहरारू के तेरही मं नाहीं गए औ नंबरदार के घरे से तो जाहिर है कि जब मुकदमा चलत बा तो काहे केहू आई।
हां, तबौ बवाली के मेहरारू क आत्मा गजब ऊपर कहूं अगर होई तो, हंसत होई कि सारी जिंदगी तो, पूरा गांव उनके दुआरे जाए से बचत रहा औ खाबदान जोड़ै खातिर उनकै तेरहिन गांव भरे क मिली। नंबरदार क पूरा घर औ कक्कू के साथे जेई औ उनकै मेहरारू बस एनहीं क छोड़के पूरा गांव बवाली के मेहरारू क तेरही क भोज खाएस। हियां तक कि जेई क भाए-बाप औ दादा के घरे से सब तेरही खाएन। दरअसल, गांव भरेक बवाली के मेहरारू के तेरही से नीक मौका मिलबौ न करत। बवाली के दुई बिटिया अहैं। उहौ दुइनौ बिटिया सोहगौरा त्रिपाठी के इज्जत क धोती पहराइ देहे रहिन। इही से दुइनौ बिटिया क गांव मं केहू पसंद नाहीं करत रहा। बड़की बिटिया नर्स रही औ एक बस कंडक्टर से बियाह कइ लेहेस। नाम से साधु। लेकिन, बवाली के बिटिया के पहिले 2-3 बियाह केहे रहा। औ छोटकी क खुदै बवाली दुआह केहे रहेन। छोटकी के मंसेधू का नाम विष्णु। वइसे विष्णु क पहली मेहरारू मरि ग रही। औ बवाली क छोटकी बिटियी ननियउरे मं इतना बवाल मचाए रही कि जल्दी से बियाह करब जरूरी रहा औ विष्णु मिली गएन।
लेकिन, बवाली औ उनके मेहरारू क दुर्दशा देखा कि दुइनौ बिटिया जीतौ हैरान किहिन औ मरौ प दुइनौ बिटियन क मंसेधू नहिंयै आएन। हां, बवाली औ उनके मेहरारू क आत्मा क इतनै खुशी भ होई कि पूरा गांव, पड़ानन सहित उनके दुआरे आइके खाएस। पड़ानन श्रेष्ठ सोहगौरा त्रिपाठियों के गांव में पांडे जी लोगों का कुछ परिवार था। बवाली सारी जिंदगी भांग क गोला खाए के मस्त रहेन औ गांव मं बवाली केहूक याद आवत रहेन तो, सिर्फ भांग क गोला उनकै लाठी औ पलरी भ कचौरी खाए तक। या तो, फिर होली प फगुआ। होरी खेलैं रघुबीरा ...।  लेकिन, उही बवाली के मेहरारू के मरे प गांव लगभग एक होइ ग। अब पूरा गांव एक हौइ जाई तो, भला गांव कइसे रहि जाई। औ एक इहू से होइ लेहेन कि भाई कउनौ सोहगौरा के दुआरे थोड़ो न सब सोहगौरा इकट्ठियानेन। इकट्ठियानेन भले बवाली सोहगौरा के दुआरे लेकिन, नेउता त खियावत रहिन बवाली क दुइनौ बिटिया। उहै दुइनौ बिटियन जउन अपने समय मं सोहगौरन क धोती समाज में फहराइ देहे रहिए। होइ ग आधा-अधूरा खाबदान होइ ग। पूरा खाबदान एह गांव मं शायदै होए। इहै गांव है आजकल। अब बतावा काहे केहू गांव म रहे। जब अपने घर-परिवार के दुआरे खाए म एतना झंझट वा तो।

Monday, April 20, 2009

बर्थ, तेरही, ट्रेडिंग टर्मिनल, एसी मंच, सानिया मिर्जा कट नथुनी

सोचा था कि किसी भी हाल में 7 बजे तक ऑफिस से निकल ही जाऊंगा। लेकिन, वोटिंग के दिन चुनाव पर आधे घंटे के स्पेशल बुलेटिन को छोड़कर निकलना थोड़ा मुश्किल था। खैर, 7.20 होते-होते लगाकि अब मामला बिगड़ जाएगा। फिर, झंझट ये कि नोएडा से दिल्ली के लिए ऑटो मिलना भी कम महाभारत तो थी नहीं। फिर एक साथी की मदद से बाल्को पहुंच तो गया। लेकिन, समझ में आया कि इलाहाबाद के लिए ट्रेन का टिकट तो प्रिंट निकालकर प्रिंटर पर ही भूल आया।


खैर, फोन करके छोटे भाई से टिकट का PNR नंबर पूछा और मोबाइल से टिकट का स्टेटस पता किया तो, RB 2-47, 55 दिखा तो, लगा चलो टिकट तो कनफर्म हो गया। लेकिन, RB का रहस्य नहीं समझ में आ रहा था। सीधे गए तो, 47, 55 दोनों नीचे की किनारे वाली सीटें थीं। चलो एक उलझन तो दूर हुई। सामने दो सभ्य जन भिड़े हुए थे। दोनों लोगों के पास अपनी सीट भर से ज्यादा सामान था। और, दोनों ही अपने सामान को अपने ज्यादा से ज्यादा नजदीक चिपकाकर रखने की लड़ाई लड़ रहे थे। दूसरे को किसी और की सीट के नीचे सामान घुसाने की सलाह (धमकी के अंदाज में) दिए जा रहे थे।


मेरे दोस्त GR पांडे और मैं इस झगड़े को देखकर मुस्कुरा रहे थे। मैंने पूरी सहृदयता और बड़प्पन दिखाते हुए कहा। अरे, साहब लड़ना छोड़िए। हमारी 2 सीटें हैं 47, 55 और हम दोनों के पास कुल मिलाकर एक छोटा सा बैग है जो, हम अपनी सीट पर भी रखकर सो सकते हैं जितना सामान है इधर भर दीजिए। बड़े मजे से मैं और मेरे मित्र जो, सुप्रीमकोर्ट में अधिवक्ता हैं 47 नंबर सीट पर बैठ गए। तब तक हमें RB 2-47, 55 का रहस्य समझ में आया नहीं था। तभी एक साहब आए- जिनके चेहरे को देखकर लग रहा था जैसे जमाने से नाराज ही पैदा हुए थे और ऐसे ही निकल भी लेंगे जमाने को छोड़कर- उन्होंने कहा ये मेरी सीट है। मैंने कहा 47 नंबर तो मेरी है। उन्होंने कहा आपकी आधी है, आधी मेरी है। ये था RB 2-47, 55 का रहस्य। सीट RAC ही रह गई थी। उन साहब से निवेदन किया लेकिन, वो माने नहीं। खैर, अब इंतजार टीटी का था।


बुजुर्ग से टीटी महोदय आए मुझे लगा टिकट का प्रिंट भी नहीं है नियमत: 50-100 रु का चूना भी लगेगा। लेकिन, मैंने उनसे पूरे अधिकार के साथ सीट के लिए निवेदन किया तो, उन्होंने टिकट भी नहीं मांगा। आइडेंटिटी प्रूफ मैंने पहले ही दिखा दिया था। 55 नंबर पर आधी सीट के मालिक अंकल से हम लोगों ने निवेदन किया तो, वो मान गए। अब खिसियाई सूरत लेकर जमाने से नाराज साहब कह रहे हैं कि वो मेरा सामान इस सीट के नीचे था न, नहीं तो मैं उधर चला जाता। तब तक हम लोगों का भाग्य चटका और पूरी-पूरी सीट मिल गई। हालांकि, मिडिल सीट पर मैं सारी रात जगता प्रयागराज ट्रेन के झटके से नहीं, नीचे से रह-रहकर आ रहे धमाकेदार खर्राटे की वजह से। और, खर्ऱाटा भरने वाले अंकल और उनका पूरा परिवार अच्छी नींद के आगोश में था।


सुबह-सुबह अपने शहर इलाहाबाद में था। सूबेदारगंज स्टेशन क्रॉस करते ही छोटे भाई को फोन किया पता था- अभी आउटर पर ट्रेन जितनी देर रुकेगी उतने में दारागंज से भाई आ ही जाएगा। आउटर पर रुकी ट्रेन से खट-खट कई सफेद बोरे गिरे। एक बैग लिए मुंशी टाइप आदमी के निर्देश पर 2 मजदूर टाइप लोग जल्दी-जल्दी बगल रुकी मालगाड़ी के नीचे से उन सफेद बोरों को दूसरी पार लगा रहे थे। बोरों पर नीले से DTDC लिखा देख समझ में आया-कुरियर कंपनी के बोरे थे। लेकिन, इतनी प्रतिष्ठित कुरियर कंपनी के पार्सल ऐसे क्यों जा रहे हैं- जवाब बगल से आया- स्टेशन पर पुलिस को चुंगी देने से बच गया।


घर से नहा-धोकर चल पड़े जौनपुर के लिए। रास्ते में एक ढाबे के किनारे खड़ी हाथी झंडा लहराती सफारी और टेंपो ट्रैवलर देखकर छोटे भाई ने कहा- भैया कपिल भाई लग रहा हैं। मिलेंगे क्या। मैंने कहा-आओ मिल लेते हैं। भाई ने सफारी के पीछे सफारी लगा दी। अंदर फूलपुर से बसपा प्रत्याशी कपिलमुनि करवरिया ढाबे के साथ बने एक शीशे वाले कमरे में बैठे थे। उनके सामने एक कंप्यूटर स्क्रीन पर लाल-नीला सा कुछ लगातार चमक रहा था। थोड़ देर में मैं समझ गया कि ये तो ट्रेडिंग टर्मिनल है। ढाबे के मालिक से कुछ छिपी सी टीवी से मोरपंखी का निशान दिखा तो, मैंने देखा कि हमारा चैनल सीएनबीसी आवाज़ चल रहा है (अब मेरी बात को और मजबूती मिलेगी कि आवाज़ सिर्फ गुजरात, मुंबई, दिल्ली का चैनल नहीं है)। कपिलमुनि करवरिया से बात करते मैं बाहर निकल आया लेकिन, बाद में अफसोस हुआ कि ट्रेडिंग टर्मिनल उसके सामने बैठे बसपा प्रत्याशी और ढाबे के मालिक के पीछे टीवी स्क्रीन पर सीएनबीसी आवाज़ की तस्वीर नहीं ले पाया।


तेज रफ्तार में हम जौनपुर की ओर बढ़े जा रहे थे। रास्ता पहले से काफी अच्छा बन गया है। लेकिन, आज दूसरी बाधा थी। सिकरारा थाने से आगे जाम मिलना शुरू हो गया। जौनपुर शहर में घुसते ही लंबी गाड़ियों की लाइन लगी थी। किसी तरह पौन घंटे में शहर के अंदर पहुंचने के बाद मित्र मनीष के घर दीवानी कचहरी पहुंच पाए। मनीष के पिताजी की तेरहवीं में पहुंचने के लिए ही मैं ये सारी दौड़ लगा रहा था। वहां पता चला कि बहनजी की रैली ने मेरे और मेरे जैसे जाने कितने लोगों के 45 मिनट से घंटों जाम में बरबाद कर दिए। साथ में ये भी पता चला कि मायावती के नहाने के लिए महकउवा साबुन की भी व्यवस्था है। साथ में ही ये भी जानकारी हवा में तैरती आई के जिस मंच से मायावती गरीब, दलित जनता को उसके हक के बारे में जागरुक करेंगी उस मंच को ठंडा रखने के लिए 8 स्प्ल्टि एयर कंडीशनर लगाए गए हैं। शुक्रवार को मुझे ये बात जौनपुर में पता चली और, रविवार को नोएडा में घर पर फुर्सत में टीवी देख रहा था तो, हाईप्रोफाइल समाजवादी नेता अमर सिंह, मायावती के आलीशान बाथरूम पर एतराज जताते दिख गए।



17 को मैं जौनपुर में था। 16 को बनारस और गोरखपुर में वोटिंग हो चुकी थी। गोरखपुर से आए मेरे एक मित्र अष्टभुजा नायक गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के कम से कम 50 हजार वोटों से हारने की बाजी लगा रहे थे। हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे। एक बीजेपी नेता भिड़ गए कि योगी खुद तो जीतेंगे ही आसपास की कई सीटें जिताएंगे। बात जातिगत समीकरण पर जाकर टिक गए। तर्क आया अब मंदिर के नाम पर वोट नहीं पड़ेगा। 2,70,000 ब्राह्मण हैं गोरखपुर में और 25,000 ठाकुर। ठाकुर आदित्यनाथ कब तक राज करेगा। बीजेपी नेता ने कहा- आप लोगों जाति की राजनीति करते हैं। हम ये बात नहीं करते। वो, चर्चा खत्म हुई भी नहीं थी किसी ने कहा- राजनाथ ने धनंजय को जिताने के लिए ही सीमा द्विवेदी को जौनपुर से टिकट दिया है। और, इसीलिए टिकट बहुत देरी से घोषित किया गया। अब पता नहीं बीजेपी नेता जाति की राजनीति करते हैं या नहीं।


बनारस में डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी का जीतना 90 प्रतिशत पक्का है। लेकिन, बीजेपी नेता भी ये मान रहे हैं कि जोशी ने इलाहाबाद छोड़कर तीन सीटें खराब कीं। इलाहाबाद, फूलपुर और बनारस। अगर जोशी इलाहाबाद ही रहते तो, कपिलमुनि करवरिया बीजेपी छोड़कर न जाते और फूलपुर से बीजेपी प्रत्याशी होते। बनारस में अजय राय को टिकट मिलता तीनों सीट बीजेपी जीत लेती। अब तीनों ही मुश्किल में हैं। पता नहीं ये कितना सही है। जौनपुर में ही बैठे-बैठे अपने गृह जनपद प्रतापगढ़ सीट का भी विश्लेषण मिल गया। अब तो, रत्ना जीत जइहैं। बीजेपी के पूर्व विधायक शिवाकांत बीएसपी से लड़त अहैं, बीजेपी में फिर से लउटा लक्ष्मीनारायण पांडे उर्फ गुरूजी बीजेपी के टिकट प अहैं औ इलाहाबाद से भागके अतीक प्रतापगढ़ अपना दल क झंडा उठाए अहैं। तब तक नेपथ्य में एक आवाज और आई औ सुने त कि इलाहाबाद मदरसा कांड वाली लड़किया (कौनो मुस्लिम नाम लिए जो, मुझे याद नहीं) खुलेआम घूम-घूमके अतीक के खिलाफ प्रचार करता बा। हम पूछे केकरे समर्थन म। पता चला समर्थन केहू क नाहीं। बस अतीक क हरावा। हम सोचे ईहै जौ सब चेत लेते कि अपराधी न जिताऊब चाहे जे जीतै तो, बड़ी बात बन जात।


खैर, टाइम हो चुका था रात की गरीब रथ से फिर दिल्ली वापसी का टिकट था। बमुश्किल दो-सवा दो घंटे का रास्ता था लेकिन, जौनपुर शहर से इलाहाबाद पहुंचते तक बीसियों बारातों ने हमारे जौनपुर से इलाहाबाद के सफर को 3 घंटे का बना दिया। इलाहाबाद में अलोपी देवी मंदिर के सामने एक बारात के बगल में ज्यादा देर तक फंसे तो, समझ में आया कि इस शादी के सीजन की हॉट धुन कौन सी है। पूरी बारात सानिया मिर्जा कट नथुनी पे जान देने को तैयार थी। गाड़ी के अंदर ही हम लोगों के कंधे भी थोड़े बहुत उचक रहे थे, बैंड और तेज बजने लगा ... सानिया मिर्जा कट नथुनी पे जान जाएला ...। 12.48 की आधे घंटे देर से आई गरीब रथ में 25 रुपए का कंबल चद्दर लेकर हम लोग सो गए। सुबह निजामुद्दीन पहुंच गए। दो रात और एक दिन के सफर ने जाने कितने सामाजिक तथ्यों से रूबरू करा दिया। बस अब सफर खत्म। रविवार को छुट्टी का दिन मिला। ये बकैती (इलाहाबादी में इसे यही कहेंगे) लिख मारी। सोमवार से फिर ऑफिस-ऑफिस और दफ्तर से ही राजनीति समझेंगे वही लोगों को समझाएंगे। जबकि, असली राजनीति तो, कुछ और ही चल रही होगी। जाति के कोई समीकरण बन रहे होंगे कोई टूट रहे होंगे। बस बहुत हो गया ...

Saturday, May 03, 2008

लखनऊ की सत्ता से गांवों में बदलती सामाजिक-आर्थिक हैसियत

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव की इस छठवीं कड़ी में आज कोशिश इस बात को समझने-समझाने की कि आखिर, राजनीतिक पार्टी की सत्ता बदलने से कैसे गांवों में समीकरण बदल जाते हैं। कैसे इज्जत से कोई फूल जाता है और कैसे कोई बाजार में मूछें ऐंठने वाला दुम दबाकर अपने घर में बैठा सरकार के बदलने का इंतजार करता है।)

गांव जब गया तो, हमारे गांव की बाजार में मेडिकल स्टोर चलाने वाले बबलू तिवारी के घर का न्यौता भी करने का इरादा बन गया। बबलू की बहन की शादी थी। लेकिन, चूंकि हम लोगों को शाम को इलाहाबाद भी लौटना था। इसलिए दोपहर में ही जाकर न्यौता देकर लौट आने पर हम लोगों में सहमति बनी। भयानक गरमी में हम लोग अपने गांव से करीब दस किलोमीटर दूर चकवड़ गांव के लिए निकले।

बाघराय बाजार से नहर के बगल-बगल गांव के लिए थोड़ा शॉर्टकट रास्ता जाता है। नहर के दोनों तरफ बबूल के पेड़ लगे थे। मैं ही गाड़ी चला रहा था। बड़ी होने की वजह से टाटा सफारी को बबूल के कांटों से बचाकर चलना थोड़ा सा दुष्कर भी लग रहा था। तभी उस चटकती धूप में गमछा बांधे यामहा मोटरसाइकिल पर आ रहे दो लोगों में से पीछे वाले ने अपनी दुनाली बंदूक हवा में लहराकर गाड़ी किनारे करने का इशारा किया। खैर, न इतनी जगह ही थी नहर की पटरी पर और न ही बंदूक लहराने का अंदाज मुझे डरा पाया कि मैं गाड़ी किनारे करता। उनके मुंह से कुछ अपशब्दों के निकलने का अंदाजा लगा तो, मैंने गाड़ी धीमी कर ली (आखिर, मेरी भी तो पैदाइश प्रतापगढ़ की थी। मैं भला उनके बंदूक के रुतबे में कैसे आ जाता।) लेकिन, वो लोग रुके नहीं। शायद उनको भी लगा होगा कि सफारी में जा रहे हैं तो, कुछ अड़बंग लोग ही होंगे।


खैर, बंदूक के रुतबे से बचते-बचाते हम चकवड़ गांव के मोड़ पहुंचे तो, अंबेडकर ग्राम का चमकता बोर्ड और गांव तक चमकती पक्की सड़क थी। हम सीधे पहुंच गए। हमारे लिए पानी पीने के लिए बढ़िया पेठा आया। तब तक बबलू बाहर निकल आए थे और उन्होंने डांटकर कहा- बरातियन बिना जउन मिठइया आइबा, ओका लावा न यार। अरे, मैनेजर साहब (मेरे पिताजी) इलाहाबाद से इही तक चला आय अहैं। बबलू का छोटा भाई बिना चप्पल पहने ही मोटरसाइकिल लिए कराह और दूसरे जरूरी सामान टेंट में रखवा रहा था। पिताजी का पैर छूने के बाद बबलू ने सीना चौड़ा करके बताया (आखिर छोटे भाई की नौकरी जो, लगवा दी थी)- चाचा महेशौ क जिंदगी बनि ग अब। डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव म मैनेजर पर होई ग बा। हमहूं सोचे रहे कि स्वामी प्रसाद के साथे लाग अही तो, छोट काम न कहब। इहै सोचे रहे होई गवा चाचा आप सबेक आशीर्वाद आ। शुरू म रामपुर जाइ क परी लेकिन, मंत्रीजी कहे अहैं कि जल्दिन इलाहाबाद या प्रतापगढ़ बोलवाए लेब।

दरअसल, ये मंत्रीजी हैं बहनजी की सरकार के बेहद ताकतवर मंत्री और निष्ठावान बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य। यही वजह थी कि ब्राह्मण बहुल गांव होने के बाद भी ये गांव अंबेडकर गांव की श्रेणी में शामिल हो गया था। चूंकि इसी गांव में स्वामी प्रसाद मौर्य का भी घर था। और, सबसे बड़ी बात ये कि स्वामी प्रसाद मौर्य भले ही लखनऊ में बहुत रुतबे वाले हों। अपने गांव के आसपास वो बहुत शांति से रहते हैं, अंग्रेजी में लो प्रोफाइल। उसकी वजह भी साफ है- इसके पहले तक राजा (कुंडा के निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह) की हनक के आगे बेइज्जत होने से बचना चाहते थे। अब बहनजी की सत्ता आने के बाद राजा ठउरुक (शांत) होई ग अहैं। रघुराज प्रताप सिंह यूथ ब्रिगेड के बोर्ड तो पहले ही बाजारों से गायब हो गए थे अब, यूथ ब्रिगेड के कार्यकर्ता (रघुराज प्रताप सिंह के नाम पर प्रतापगढ़ की छोटी बाजारों में लफंगई करने वाले बेरोजगार लड़के) भी नहीं दिखते। अब इस इलाके में प्रमोद की टाटा सफारी पहचानी जाती है। राजा जैसा डर तो नहीं है लेकिन, रुतबा जबरदस्त है। बाभन तो, राज्य भर में बहनजी की सलामी बजा ही रहे हैं। यहां ठाकुर भी स्वामी मौर्य और उनके भतीजे प्रमोद के आगे सलामी बजाते हैं।

समाज बदल रहा है। अगड़े वर्ग के अगुवा बाभन की रोजी-रोटी (नौकरी) का जुगाड़ दलित (मायावती सरकार के मंत्री) की सिफारिश पर हो रहा है। अब बताइए, दलित उत्थान हो रहा है ना। वैसे, कुछ लोग दबी जुबान से ये भी कह रहे हैं कि प्रमोद बहुत बौराइ ग अहैं, ढेर उधरइहैं तो, मराइउ जइहैं। सरकार तो, आवत जात रह थे। खैर, अभी तो मायावती की ही सत्ता है और, बसपा के हाथी लगे नीले झंडे लगी गाड़ियों से उतरने वाले को सलाम-नमस्ते करने वाले ही बाजारों में ज्यादा दिख रहे हैं।

लखनऊ की सत्ता बदलते ही अचानक सबकुछ बदल जाता है। एसपी, डीएम के तबादले सुर्खियों में आते हैं। इससे बड़े लोगों को फरक पड़ता है। लेकिन, गांव में असली फरक पड़ता है ऐसे तबादलों से जिनके बारे में तो मीडिया खबर भी नहीं बनाता। लोक निर्माण विभाग(PWD), ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग(RES), फैक्सपेड, जल निगम, सिंचाई विभाग—के इंजीनियर, प्रोजेक्ट इंजीनियर के चार्ज तेजी में बदल जाते हैं। सपा की सरकार में एक साथ 5 करोड़ रुपए का काम करवा रहा ठेकेदार पैदल हो चुका है (मैं जानबूझकर नाम नहीं लिख रहा हूं), बसपा के निष्ठावान कार्यकर्ता ठेकेदार बन गए हैं (ये सतत प्रक्रिया है, यूपी में हर सरकार बदलने पर चुपचाप सबसे तेज धंधा यही होता है)।

आधी गिरी गिट्टी, डामर कोई दूसरा आकर कब्जा लेता है, काम शुरू करा देता है। पुरानी सरकार के लोगों के पेमेंट रुक गए हैं और नई सरकार के ठेकेदार सिर्फ गिट्टी गिराकर एडवांस पेमेंट पा जा रहे हैं। ये सामाजिक संतुलन है जो, एक सरकार बदलने और दूसरी सरकार बनने से बदल जाता है। यही आगे का मुनाफा पोलिंग बूथ पर अलग-अलग पार्टियों के कार्यकर्ताओं को अपने नेताजी के लिए गोली-बम चलाने, मतपत्र फाड़ने को उकसाता है। उत्तर प्रदेश में राजनीति का ये धंधा पूरी तरह से प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलता है। और, जिस प्राइवेट लिमिटेज कंपनी (पार्टी) से जो, जुड़ा है, उसका फायदा पक्का। बहन-बेटी की शादी में दरवाजे पर सत्ताधारी पार्टी के नेता के आने भर से गांव में मेजबान की काफी दिन तक हवा-पानी बनी रहती है।

सपा नेताओं के गांव तक स्वीकृत पक्की सड़क अब बसपा नेता के गांव तक जा रही है। कांग्रेस-भाजपा के छुटभैये नेता कह रहे हैं कि भई सरकार तो, बहनजी की ही अच्छी है और किसी बसपाई से सटकर अपना छोटा-मोटा काम निकाल ले रहे हैं। कुर्ता-पाजामा तो, सफेद ही रहता है किसी पार्टी की ड्रेस तो, है नहीं, बस थोड़ी जुबान सरका देनी है बहनजी के पक्ष मे। जुबान सरक रही है, ठेका चल रहा है। नीला झंडा लहरा रहा है। दलित उत्थान हो रहा है। और, कुछ लोग अगले चार सालों के लिए राजनीति से तौबा कर चुके हैं। इसीलिए मुझे लगता है कि यूपी के गांवों में तो लोकसभा चुनावों में नीला झंडा ही लहराएगा। 5 साल बाद यूपी के गांव में मुझे सामाजिक संतुलन कुछ इसी तरह दिखा।

अगली कड़ी में
यूपी रोडवेज से सफर, एसी सलून और एटीएम की लाइन

Thursday, May 01, 2008

गांवों में सिकुड़ती, सूखती जमीन का जिम्मेदार कौन


(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये पांचवी कड़ी। इस कड़ी में गांवों में सिकुड़ती, सूखती जमीन और इसकी वजहों की चर्चा। अच्छी बात ये कि बरबादी के बाद थोड़ी उम्मीद की रोशनी भी दिख रही है।)


गांवों से लोग शहरों की तरफ बेतहाशा भाग रहे हैं फिर भी जमीन सिकुड़ती जा रही है। जमीन सिकुड़ती जा रही है यानी जोत का आकार छोटा होता जा रहा है। और, उस पर भी काम करने वाले लोग नहीं मिल रहे हैं। मेरे गांव के आसपास काफी उपजाऊ जमीन है। लेकिन, प्रतापगढ़ के ज्यादा इलाकों में ऊसर (बंजर) जमीन ज्यादा है। और, जिस तरह से जमीन के नीचे का जलस्तर तेजी से और नीचे जा रहा है। वो, भयावह स्थिति बना रहा है।

जलस्तर लगातार घटने के लिए ज्यादातर गांव के लोग ही जिम्मेदार हैं। पानी घटा तो, शहरों से जाकर गावों में जल संरक्षण की बात हो रही है, आंदोलन चल रहे हैं। एनजीओ संगठित तरीके से काम कर रहे हैं। जब पानी ही पानी था तो, जल का अपमान किस तरह हुआ इसका बेहतरीन उदाहरण मैंने देखा है। शायद ये हर किसी को अपने गांव की कहानी लगे। मेरे गांव में तीन कुएं थे। और, गांव के अगल-बगल तीन तालाब थे। एक मेरे घर के सामने की चकरोड के पार और दो गांव के पिछले हिस्से में। तीन कुओं में से एक मेरे दरवाजे पर ही था। हालांकि, हमारी याद में कभी हमारे दरवाजे का कुआं कभी उपयोग में नहीं आया। कच्चा कुआं था और, हमारी बैठकी के पीछे था जो धीरे-धीरे भंठ गया। उसकी बड़ वजह यह भी रही कि, हमारे यहां दरवाजे पर ही ट्यूबवेल हमारी पैदाइश के पहले से लग गई थी। खैर, कच्चा कुआं धीरे-धीरे भंठ गया (कुआं रह ही नहीं गया)। बचा-खुचा कुआं, कुएं के आगे की हमारी बैठकी की मिट्टी से पट गया। हमारा घर पहले ही पक्का था। मिट्टी-गारे से बनी दोनों बैठकी भी धीरे-धीरे करके खत्म हो गई। दूसरी बैठकी की ही जगह पर दादा ने नया पक्का घर बनवाया है। अच्छे कमरे बने हैं। शहरातू लैट्रिन भी बन गई है। हैंडपंप घर के अंदर लग गया है (पहले हैंडपंप बाहर था। कोई बी प्यासा राहगीर दो हाथ चलाकर अपनी प्यास बुझा लेता था)। टुल्लू लगा है जो, लाइट रहने पर टंकी भर देता है और लैट्रिन का दरवाजा बंद करने पर नल से गिरता पानी शहर में होने का अहसास दिलाता है। पहले सुबह जल्दी उठकर खेत में दिशा-मैदान जाना शहर वालों को अचरज में डालता था। अब गांव वाले भी दिशा-मैदान नहीं जाते। लैट्रिन जाते हैं। दिशा-मैदान अब तो पता नहीं कितने लोग ही समझते होंगे।

कच्ची बैठकी-कुएं क साथ दुआरे प खड़ा महुआ औ मदीना क पेडौ समय क भेंट चढ़ि ग। महुआ सूखि ग तो, दूसर लगावा नाहीं ग। औ, पिताजी-दादाजी म बंटवारा के बाद मदीना क पेड़ कटवाए दीन ग। दूसरी कच्ची बैठकी में सिर्फ दो बहुत लंबे-लंबे कमरे ( कमरे क्या बड़े से एरिया को चारों तरफ से घेरकर बीच में एक और मिट्टी की दीवार बनाई गई थी) थे। कच्ची मिट्टी के कमरे खपरैल की छत। कुल मिलाकर इस बैठकी में एक साथ 50 से कुछ ज्यादा ही चारपाई बिछ जाती थी। और, ये ज्यादातर गांव की बारात का जनवासा बन जाती थी। अब तो एक दूसरे से इतने मधुर संबंध भी नहीं रहे कि अपनी बारात रुकवाने के लिए कोई किसी दूसरे की बैठकी मांगे। अब तो, गांव में भी बरात टेंट कनात में रुक रही है।

गरमी कितनी भी हो, कच्ची बैठकी में एयरकंडीशनर जैसी ठंडक का अहसास मिलता था। और, दो महीने की गरमी की छुट्टियों में खेलकूद से फुरसत मिलने पर इसी कच्ची बैठकी में गजब की नींद आती थी। लेकिन, धीरे-धीरे गरमी की छुट्टियों में सबका जाना कम हुआ। मिट्टी-गारा की दीवार और खपरैल की छत का रखरखाव महंगा (झंझटी) लगने लगा। क्योंकि, हर साल गोबर और पिड़ोर (नदी से निकली मिट्टी) से दीवारों की पुताई करनी पड़ती थी। जिससे दीवार कमजोर न पड़े और बाहर के तापमान को संतुलित किए रहे। खपरैल भी हर दूसरी बारिश के पहले फिर से बदलवानी पड़ती थी। लेकिन, खपरा छावै वाले औ मिट्टी-गारा क देवाल बनवै वाले कम होत गएन (ज्यादातर पंजाब से लैके महाराष्ट्र तक टैक्सी, रिक्शा चलाने, फैक्ट्री में काम करने चले गए)।

घर के सामने चकरोड के पार वाले तलाव म बेसरमा क फूल (पता नहीं कितने लोग अब बेशरमा क गोदा औ ओकर फूल देके होइहैं) इतना बढ़िया खिलत रहा कि मन खुश होए जाए। 1991 में मेरी छोटी दीदी की शादी की वीडियो रिकॉर्डिंग में ये तालाब ऐसे दिख रहा था जो, किसी फिल्म में खूबूसरत लोकेशन पर हीरो-हीरोइन के गाने के लिए तैयार की जाती है। इस खूबसूरत का अहसास भी हमें अच्छे से रिकॉर्डिंग का कैसेट टीवी पर देखते ही हुआ। यही तालाब था जिसकी वजह से पांडेजी लोगों के हिस्से (पड़ान) में जाने के लिए थोड़ा घूमकर जाना पड़ता था। लेकिन, इस बार मैं गया तो, चकरोड ने तालाब का कुछ और हिस्सा लील लिया था। और बचा हिस्सा जिनके सामने तलाव रहा उनकर दुआर बनि ग।

गांव के बीच के दोनों कुएं बचे तो हैं लेकिन, उनका इस्तेमाल अब ना के बराबर होता है। रस्सी में बाल्टी बांधकर पानी बांधने से बेहतर गांवावालों को हैंडपंप चलाना लगता है। गांव के पीछे के दोनों तालाब भी सूख गए हैं। इन तालाबों में मैंने भी खूब रंगबिरंगी गुड़िया पिटी है। बांसे क कैनी से गुड़ियां पीटै म खुब मजा आवत रहा।

वैसे, अब पड़ान घूमके जाए क जरूरत नाहीं तालाब पटि ग। दुआरे प मदीना क फूल से गंदगी नाहीं होत। महुआ बिनै वालेन से झगड़ा नाही करै क परत। मिट्टी-गारा क दीवार पोतावै औ खपरा छवावै से मुक्ति मिली। सब बड़ा अच्छा होइ ग। बस गरमी कुछ बढ़ि ग। नवा हैंडपंप म पानी अब 70 मीटर नीचे मिलत बा। 10 साल पहिले तक 30 मीटर पर बढ़िया मीठा पानी मिल जात रहा।

उम्मीद की रोशनी
मैं गांव गया तो, एक निमंत्रण में दिन में ही जाकर लौटा तो, एक बाघराय बाजार से एक नहर के रास्ते जाना था। इस तरफ कुछ ज्यादा ही बंजर जमीन है। दूर-दूर तक ऊसर जमीन की सफेद मिट्टी दिखती है। लेकिन, उसके बीच-बीच में कुछ छोटे-छोटे चौकोर गड्ढे खुदे दिख रहे थे। जहां सरकारी बोर्ड लगा हुआ था। मौसी के लड़के ने जो, रहता तो, इलाहाबाद में है लेकिन, अक्सर गांव आता-जाता रहता है। उससे मैंने पूछा तो, उसने बताया कि सरकारी नियम आए ग बा। जे तलाव भंठवाए के दुआर बनै लेहे रहेन या घर बनवाए लेहे रहे उनकै घर तोड़वाए क तलाव बनावावा जात बा। और, दूसरी जगहों पर भी छोटे-छोटे गड्ढे खुदवा दिए गए हैं कि बारिश में इन तालाबों में कुछ जल संरक्षण हो जाए। जल संरक्षण के जरिए गांव की तकदीर बदलने की एक कहानी मैंने गुजरात के एक गांव में देखी है। अब गुजरात के मुकाबले तो, यूपी के खड़ा होने में बहुत टाइम लगेगा। लेकिन, अगर ये मुहिम कुछ रंग लाई तो, फिर से मीठा पानी तो तीस मीटर पर मिल सकेगा।

अगली कड़ी में गांवों में राजनीति के सहारे बनती-बिगड़ती आर्थिक-सामाजिक हैसियत

Wednesday, April 30, 2008

सरकती जींस के नीचे दिखता जॉकी की ब्रांड और गांव में आधुनिकता

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। शहर वालों जैसे क्यों नहीं रह पाते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। इसी ठहराव-बदलाव का मैं एक बड़ा चित्र खींचने की कोशिश कर रहा हूं। इसी श्रृंखला की ये तीसरी कड़ी।)

तो, मेरी नजदीकी बाजार में एयरटेल का टावर लग गया। अब हर हाथ में काम तो, सिर्फ नेताओं के भाषण में ही रह गया है लेकिन, हर हाथ में मोबाइल जरूर नजर आने लगा है। गांवों में नोकिया के सस्ते मोबाइल और बीएसएनएल के बाद गांव-गांव में पहुंचे एयरटेल, आइडिया के टावर ने सबके मोबाइल में सिगनल दे दिया है। और, जहां हवा, पानी, बिजली तक नहीं है वहां भी रिलायंस की फुल कवरेज मिलने लगी है। मोबाइल के चमत्कार से चमत्कृत होने की 2002 की एक घटना मुझे याद है। तब नया-नया बीएसएनएल का मोबाइल शुरू हुआ था। इलाहाबाद-लखनऊ रूट पर सारे रास्ते मोबाइल मिलता था। और, इसी वजह से मेरे गांव पर भी बीएसएनएल का सिगनल टूट-टूटकर मिल जाता था। मामा की लड़की की शादी में नजदीकी गांव के एक प्रधान के लड़के को सुबह का कुछ जरूरी काम याद आया और उसने आधी रात को कहाकि अब तो घर जाना ही पड़ेगा। हां, अगर बाबू को बताके आए होते तो, कोई बात नहीं थी। मैंने कहा तो, फोन कर लो। चूंकि प्रधानजी के यहां भी एंटीना वाला टेलीफोन लगा हुआ था। मैंने भी डरते-डरते बड़ा सा एंटीना वाला मोबाइल निकाला और इत्तफाकन फोन लग गया।

मोबाइल ने तो गांवों को बदला ही है। टीवी और विज्ञापन के जरिए ब्रांडेड प्रोडक्ट जिस तरह गांव को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं। वो, मेरे लिए थोड़ा चौंकाने वाला अनुभव रहा। मुझे याद है कि पहले मैं एक वुडलैंड के जूते पहनकर गांव गया था तो, उसकी कीमत पूछने के बाद बाजार में गांव के ही एक सज्जन इस बात पर हंसे कि हजार रुपया का जूता पहिरब कउन बुद्धिमानी है। लेकिन, अब गांव के लड़के ब्रांडेड चड्ढियां पहन रहे हैं।

बुजुर्गों के पटरे वाली चड्ढी यानी कपड़े से कटवाकर नाड़ा वाली चड्ढी तो वैसे भी पुराने जमाने की बात हो चुकी ती। उसकी जगह वीआईपी और लड़कों में वीआईपी फ्रेंची ने ले ली थी। लेकिन, अब जॉकी ने सबका खेल बिगाड़ दिया है। और, ये जॉकी गांवों में भी नंगई फैला रहा है। नंगई गांव के लोगों को शहर के साथ आधुनिकता की दौड़ में साथ चलने का झूठा अहसास भी करा रही है। मैं चार साल पहले मुंबई आया था तो, अपने न्यूजरूम से लेकर सड़कों-लोकल में लड़के-लड़कियों की खिसकती पैंट (ज्यादातर जींस) के नीचे लड़कों की ब्रीफ और लड़कियों की पैंटी के ब्रांड दिख गए। और, अब पांच साल बाद गांव गया तो, मेरी मौसी का लड़का अंकुर जो, बेहद शर्मीला है (अभी हाईस्कूल में है) जब हम लोगों का पैर छूने के लिए झुका तो, उसकी आधी सरकी जींस से जॉकी की लाल मोटी पट्टी चमकती दिखी। गांव ने शहरों का ये बदलाव तो आत्मसात कर लिया है।

शहरों से आधुनिकता की दौड़ में साथ देने के लिए और भी बदलाव हुए हैं। प्रतापगढ़ के गावों में अगर बाभन के लड़के के बारे में अगर ये झूठा हल्ला भी उड़ जाए कि वो, सिगरेट, शराब पीता है। अंडा या मास-मच्छी खाता है तो, जिले का कोई बाभन तो, उसे अपनी लड़की देने को तैयार नहीं ही होता था। अब पंडितों की बारात में भी दारू पीकर उत्पात मचाने वाले बारातियों की पूरी जमात आ रही है। अब बस इतना बचाया जा रहा है कि सबके सामने तो नहीं पीता-खाता ना। लेकिन, बाभन होने का ढोल पीटने में कोई कमी नहीं है।

Tuesday, April 29, 2008

बाजार से बदलता गांव में दुराव और प्यार का समीकरण

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। जैसे शहर वाले होते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। मैं पहले एक पोस्ट में समेटने वाला था। अब कोशिश करता हूं कि भले पोस्ट कई हो जाएं, कुछ ज्यादा बड़ा चित्र खींच सकूं।)

तो, मैं 5 साल बाद गांव गया लेकिन, घर की चाभी खो जाने की वजह से करीब दो साल से बंद पड़े घर में नहीं जा पाया। दादा (पिताजी के बड़े भाई) के यहां ही बैठना होता है। दादाजी साल डेढ़ साल पहले प्राइमरी के प्रिंसिपल से रिटायर हुए हैं। गांव में जिसे राजनीति कहा जाता है वो, करना उन्हें खूब आता है। हमारे बाबा स्वर्गीय श्री श्रीकांत त्रिपाठी शास्त्री रेलवे सर्विस कमीशन में थे और पिताजी बैंक में हैं। इसलिए दोनों भाइयों में बंटवारे के पहले तक दादाजी को किसी तरह की कोई चिंता नहीं थी। खेती में लगने वाला खर्च पिताजी देते थे और बदले में खाने भर का राशन शहर (इलाहाबाद) आ जाता था। गांव में एक अजीब से रुतबे की प्रतीक एक बंदूक (वही बंदूक जिसको निकालने की धमकी देने पर हमारा गांव घेरे दूसरे गांव के लोग भाग खड़े हुए और इसके अलावा तो, तीस साल से ज्यादा के समय में मुझे भी उसका इस्तेमाल याद नहीं है) भी दादा के नाम है। गांव की पहली और क्षेत्र में शायद तब गिनी-चुनी बंदूकें रहीं होंगी।

इस बंदूक का कोई इस्तेमाल नहीं होता सिवाय शादी-तिलक में द्वारचार में कुछेक गोलियां दागने के। मैंने भी एकाध बार तिलक में उससे गोली दागी है। अब तो हाल ये है कि शादी-तिलक में गोलियां किसी ने चलाईं तो, सबसे पहले मेरे ही गुस्से का शिकार होता है(गांव में रुतबा बढ़ाने वाली गोलियां अब शहरी जीवन जीते मुझे बुरी लगने लगी हैं)। खैर, दादाजी प्राइमरी में मास्टर थे। ब्राह्मण थे। और, क्षेत्र में अच्छी प्रतिष्ठा होने से हमारी ग्रामसभा में जीतने वाले प्रधान के लिए उनका आशीर्वाद जरूरी होता था। हमारे ट्रैक्टर पर बैठकर कई प्रधानों ने विजय जुलूस निकाला और सबसे पहले दादा का ही आशीर्वाद लेने आए। ये अलग बात है कि पिछले करीब डेढ़ दशक में लगातार उनके आशीर्वाद का मतलब बस कुछ वोटों तक सिमट गया और अब शायद वो अपने परिवार भर का वोट ही रह गया है।

अब हमारे भैया (दादाजी के बड़े लड़के) दादा से कह रहे हैं कि अब आप चुनाव लड़ जाइए। करीब चालीस सालों से सबको चुनाव हराने-जिताने का दम भरने वाले मेरे दादा डर रहे हैं। कहेन चुनावै लड़ै क होई तो, फिर कम से कम जिला पंचायत क लड़ब। प्रधानी लड़के इज्जत थोड़ो न गंवावै क बा। वैसेओ जब तक राजा (कुंडा के विधायक रघुराज प्रताप सिंह) उधरान अहैं इज्जत इही म बा कि चुप मारके बैठा रहा। न जीता तो, समाज में इज्जत जाई औ जीत गया तो, राजा के दरबार में हाजिरी दैके इज्जत गंवावा। इलाहाबाद-लखनऊ के रास्ते पर कुंडा के पहले लालगोपालगंज बाजार से हमारे गांव के लिए मुड़ना होता है। बाजार में सीमेंटेड सड़क बन रही थी। पूछने पर मेरे मौसी के लड़के लवकुश ने बताया कि ये सड़क लालगोपालगंज की स्थानीय परिषद का अध्यक्ष बनवा रहा है। और, ये बस बाजार और उससे थोड़ा आगे तक ही बनेगी। साथ ही खबर ये भी सुनने को मिली कि लालगोपालगंज बाजार से प्रतापगढ़ की डबललेन सड़क राजा ने रुकवा दी। अब ये पता नहीं कितनी सच है लेकिन, हर दूसरे कदम पर एक रजवाड़े वाले प्रतापगढ़ में उन्हीं राजाओं के चुनाव जीतने के बाद बदहाल सड़कें इस खबर पर यकीन करने को कहती हैं। क्योंकि, विकास ऐसे स्वयंभू राजाओं के लिए तो, मुश्किल ही बनता है ना।

और, ये गांव के समाज में इज्जत का मसला भी अजब है। शहर में पैसा, पोस्ट इज्जत दिलाने में मदद करती है। लेकिन, गांव में जाति और जाति के बाद जुड़ा पैसा और विद्वता (पता नहीं आज के संदर्भ में कितनी बची रह गई है) इज्जत दिलाती है। हमारे ही एक चचेरे दादा हैं जो, इलाहाबाद के एक इंटर कॉलज में लेक्चरर हैं। खुद भी अकेले थे, उनके बेटा भी अकेला है। इस वजह से आर्थिक स्थिति भी ठीक-ठाक है। शहर में हिंदी के अध्यापक हैं लेकिन, गांव में पुलिस थाने में उनका बहुत जुगाड़ होता था। जुगाड़ की वजह ये कि वो किसी न किसी अखबार के बिहार संवाददाता बने रहते थे। और, छठहें छमासी अखबार में छपी अपनी एक खबर दिखाकर बाघराय (हमारा पुलिस थाना) में आने वाले हर दरोगा को काबू में किए रहते थे। खैर, गांवों में आए बदलाव की वजह से अब ये हथकंडा थोड़ा काफी कमजोर पड़ गया है।

इस बार मैं गांव गया तो, हमारी नजदीकी सियारामगंज बाजार में ग्रामीण पत्रकार दादा की जमीन पर एयरटेल का टावर खड़ा था। पता चला किराए पर दिया है। आज ये जमीन उनको कमाकर दे रही है लेकिन, इसी जमीन ने उन्हें समाज में हंसी का पात्र बना दिया था। हंस तो सभी जातियां रही थीं। सारे बाभनों और कुछ ठाकुरों ने तो उनको न्यौतना भी बंद कर दिया। दरअसल, दादा को किसी ने कहा कि सुअर पालन से अच्छी कमाई हो सकती है। गांव के बगल के एक पासी को उन्होंने सुअर पालने के लिए रखा और उसे वही जमीन दे दी थी। पता नहीं कमाई कितनी हुई लेकिन, समाज निकाला का दबाव ऐसा बनाकि उन्हें परंपरा से हटकर अपनी कमाई का नुस्खा बंद डब्बे में डालना पड़ा। अब बेटा उसी बाजार में सरिया, सीमेंट, बालू बेच रहा है, अच्छी कमाई कर रहा है।

हमारी नजदीकी बाजार सियारामगंज भी गांवों के सामाजिक बदलाव की गजब की मिसाल है। पंद्रह साल पहले तक एक ठाकुर साहब की तीन दुकानें थीं। जिसमें सीमेंट, सरिया से लेकर घर का हर जरूरी सामान, रस्सी, राशन का तेल सब मिलता था। ठाकुर साहब सेना में सिपाही रहे थे। इसके अलावा बाजार में बस गिनी-चुनी दुकानें थीं। कुछ चाय-समोसा टाइप की। फिर धीरे-धीरे ठाकुर-बाभनों के बेरोजगार लड़कों के लिए उनके घर के लोगों ने, खासकर शहरों में कमा रहे लोगों ने बाजार में ही दुकानें बनवाकर दे दीं। अब एक ही लाइन में बाभन, ठाकुर, बनिया, अहिर, चमार, पासी (इन जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किसी को कमतर या ज्यादा दिखाने के लिए नहीं बल्कि, गांव की सामाजिक स्थिति को शीशे में दिखाने की कोशिश के लिए है) सबकी दुकानें हैं। दुकानों में भी कोई बंटवारा नही। बाभन ठाकुर भी चाय-पान-कपड़ा बेच रहे हैं और दूसरे भी। जाति नहीं काम पैमाना बन रहा है। ऐसा नहीं है कि जाति की ठसक पूरी तरह से खत्म हो गई है लेकिन, काम की जरूरत उसे दबा रही है। अब उसी आधार पर दोस्ती-यारी और दुराव के मापदंड भी बदल रहे हैं।

Monday, April 28, 2008

कहीं कुछ बदल तो रहा है लेकिन, अजीब सा ठहराव आ गया है

(अबकी छुट्टियों में मैं अपने गांव होकर लौटा हूं। शहरों में रहकर बमुश्किल ही ये अंदाजा लग पाता है कि गांव कैसे जी रहे हैं। वहां रहने वाले ऐसे क्यों होते हैं। जैसे शहर वाले होते हैं। दोनों कहां जाकर बंटते हैं। दरअसल यही गांव और शहर का फर्क भारत और इंडिया का फर्क है। बोधिसत्व अपनी एक पोस्ट में मुंबई में इलाहाबाद खोज रहे थे। गांव खोज रहे लिखा था कि उनके गांव में कोई 300 साल से आकर बसा नहीं है। लेकिन, क्या यूपी के गांव ऐसे बचे हैं कि वहां कोई बसने जाए। मैंने उस पोस्ट पर टिप्पणी भी की थी कि दो-चार कदम चल चुके हर आदमी को ऐसे ही गांव याद आता है। और, ये भी कि मैं इस बार गांव जरूर होकर आऊंगा। लेकिन, गांवों में खासकर यूपी के गांवों में तो ऐसा ठहराव दिखता है जिसे, किसी को तोड़ने की भी जल्दी नहीं है। जो, वहां के हैं भी पहला मौका मिलते ही कहीं और किसी शहर में बस जाना चाहते हैं। मैं पहले इसे एक पोस्ट में समेटने वाला था। अब कोशिश करता हूं कि भले पोस्ट कई हो जाएं, कुछ ज्यादा बड़ा चित्र खींच सकूं।)

करीब 5 साल बाद मैं अपने गांव गया। प्रतापगढ़ जिले की कुंडा तहसील मे बिहार ब्लॉक (विधानसभा भी) में मेरा गांव पड़ता है। अपने ब्लॉक में विकास की रुकी गाड़ी देखकर लगता है कि क्या यहीं सोचकर ब्लॉक को हिंदी में विकासखंड कहा जाता है। जबकि, अंग्रेजी में ये block है। सच्चाई में यूपी के ज्यादा विकास खंड अंग्रेजी में blocked ही हैं। इससे पहले बाबा के देहांत के साल भर बाद उनकी बरसी में आखिरी बार गांव गया था। देहरादून में तब अमर उजाला में था। मारामारी में आया और सुबह आया। समजा-जंवार में सबके खाने के बाद मैं भी इलाहाबाद वापस लौट आया था। अगले दिन मेरी वापसी की ट्रेन थी। उसके बाद नौकरी करने मुंबई आ गया। मुंबई से चार सालों में कई बार में इलाहाबाद गया लेकिन, हर बार व्यस्तता की वजह से प्रतापगढ़ अपने गांव जाना नहीं ही हो पाता था। इस बार मैं तय करके गया था कि गांव जाऊंगा ही जाऊंगा।

तय करके गया था इसलिए सायास गांव पहुंचा भी। चिलचिलाती धूप में हमलोग करीब 12 बजे गांव के लिए इलाहाबाद में अपने मोहल्ले दारागंज से निकले। 1.30 बजे मैं अपने गांव चंदई का पुरवा में था। सिया ग्रामसभा के कई पुरवा में से एक हमारा गांव चंदई का पुरवा भी है। हमारे गांव के एक तरफ कोयरानी है जिसमें ज्यादातर यादव जाति के हैं। दूसरी तरफ लाल का पुरवा है जिसमें पिछड़े और दलित जातियों के लोग हैं। बीच में हमारा बाभनों का गांव हैं। इसमें करीब 20-25 घर हम लोगों यानी सोहगौरा त्रिपाठी (ब्राह्मणों में भी खुद को उच्च मानने वाले त्रिपाठी) का है। इसके अलावा एक घर शुक्ला का है। वैसे, पिताजी बताते हैं कि शुक्ला और त्रिपाठी एक-एक घर ही थे लेकिन, त्रिपाठी लोगों का परिवार बढ़ता गया और, शुक्ला थमे रह गए क्योंकि कई पीढ़ियों से उनके यहां एक-एक बेटे ही होते आए। पहली बार मेरी जेनरेशन में दो बेटे हैं। और, थोड़ा सा कटके पड़ान है जिसमें करीब 10 घर पांडे ब्राह्मण हैं।

शुक्लाजी के यहां कभी किसी ने नौकरी नहीं की। या यूं कहें कि अकेले हिस्सेदार होने की वजह से नौकरी वाहियात लगती थी। और, ये भी कि इतनी जमीन है उसे कौन देखेगा। लेकिन, खेती से एक जमाने में होने वाली जबरदस्त कमाई (क्योंकि, तब नौकरी में इतने पैसे नहीं मिलते थे) और उससे भी ज्यादा जमींदारी वाली इज्जत अब बोझ लग रही है। जमीन के ही गरुर में उनके घर में कोई बहुत पढ़ भी नहीं पाया। दूसरी तरफ त्रिपाठी लोगों में पढ़ाई और नौकरी के महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मेरे पिताजी की जेनरेशन में ज्यादातर लोग नौकरी में हैं। और, बड़ी संख्या में एमए किए हुए हैं। उसी नौकरी की कमाई से सबके इलाहाबाद में घर बन गए हैं। गांव में भी अब कच्चा घर तो मुझे किसी का दिखता नहीं। ये अलग बात है कि कई घरों में ईंट जोड़कर छत तो डाल दी गई लेकिन, प्लास्टर और पुताई की बाट घर अब भी जोह रहे हैं। पांडे लोगों का भी हाल शुक्लाजी जैसा ही है। बस एक पांडेजी की थोड़ा ज्यादा इज्जत है भले ही वो गांव 4-6 साल बाद दिखें। वजह ये कि वो, पीडब्ल्यूडी में एकाउंटेंट थे और उनका बेटा रुड़की से इंजीनियरिंग करके बड़ी कंपनी काम कर रहा है।

खैर, जब हम लोग उस दिन गांव पहुंचे तो, दादा (पिताजी के बड़े भाई) नए वाले घर में तखत पर बैठे थे। भैया दही का शरबत बनाकर बाल्टी में ले आए और आग्रह ये कि हम पांच लोग हैं तो, पूरा खत्म ही हो जाना चाहिए। खैर, शरबत खत्म होते-होते दादा ने धीरे से कहानी सुनानी शुरू की। बचि ग नाही तो अन्नू तो गोली चलवाइ देहे होतेन। पिताजी ने पूछा- काहे का भ। अरे कुछ नाही लाल का पुरवा के अहिरन से अन्नू क सियारामगंज बाजार (कई गावों की सामूहिक बाजार) में झगड़ा भ। लपटा-झपटी के बाद अन्नू भागि आइए लेकिन, कई लड़िकन मिलके फिर अन्नू क बांसे क कोठी के लगे लपट लेहेन। ऊ तो, कहा- जेई क मेहरारू देख लीहिन औ गोहार लगाइन तो सब दौड़ेन। औहमू से 100-150 अहिर सब गांव छाप लेहेन। हम पूछत रहि गए का भ बतावा लेकिन, लड़िकन मानै क तैयारै नाहीं। फिर जौ हम कहे निकार बंदूक तौ भगेन सब। अन्नू हमारे ही पट्टीदार का नाती है जो, गांव में सबसे सीधे गिने जाते है। और, जिनके दरवाजे पर सबसे ज्यादा यादव दिन भर आकर बैठे रहते हैं।

खैर, जो पता लगा वो यही था कि झगड़ा बेवजह हुआ था। और, शायद पहले की कोई प्रतिक्रिया थी। प्रधान यादव है उसने हमारे दादाजी से आकर कहा- पंडितजी कोई बात नहीं। दरोगा का फोन आया था रात में 11 बजे। मैंने बता दिया, सब ठीक है। कुछ खास नहीं हुआ था। ये एक बड़ा बदलाव था पहले शायद दरोगा के आसपास भी सिर्फ ब्राह्मण-ठाकुर ही पाए जाते थे। और, दरोगा से फोन पर हुई बातचीत या मुलाकात के जरिए विरोधियों को डराने का काम भी वही करते थे। अब यादवजी, पंडितजी को भरोसा दिला रहे हैं कि दरोगा कुछ नहीं करेगा।

बदलाव बस ऐसा ही है। चिलचिलाती धूप में गांव में वैसे भी कोई न दिखता लेकिन, सच्चाई ये भी है कि गांव में बचे भी वहीं हैं। जिनको कहीं काम नहीं मिला या जिनको वहीं प्राइमरी स्कूल से इंटर कॉलेज तक में अध्यापक की नौकरी मिल गई। नौकरी करने से रिटायर होने तक वही गांव में हैं। गांव में सबसे आगे हमारा ही घर है। बाबा ने बनवाया था। दो मंजिल का शानदार पक्का घर। तब आसपास के इलाके में ऐसा घर नहीं था। करीब 15 साल पहले दादा और पिताजी के बीच बंटवारा हो गया। आधा-आधा बंटा घर रेलगाड़ी के डिब्बे जैसा हो गया। हम लोगों का हिस्सा अकसर बंद ही रहता। क्योंकि, हम लोग गांव जाते भी तो, दादा के ही यहां बैठते। अब तो, हाल ये है कि घर की चाभी खो गई है और दो साल से ताला ही नहीं खुला है।

Friday, January 04, 2008

ये कोई पहेली तो है नहीं जो किसी की समझ में नहीं आती

देश के इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि किसी सांसद के खिलाफ पुलिस ने अपराधियों की तरह स्केच जारीकर उसे भगोड़ा घोषित कर दिया। माननीय (मुझे ये लिखते हुए शर्म आ रही है) सांसदों की सुरक्षा के लिए लगी रहने वाली पुलिस एक सांसद की तलाश में पिछले कई महीनों से घूम रही है। सफलता नहीं मिली तो, सांसद के चेहरे के सात संभव तरीके वाले स्केच जारी किए।

ये सांसद हैं इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सांसद अतीक अहमद। अतीक अहमद पर वैसे तो इतने अपराधिक मामले और आरोप दर्ज हैं कि उनकी बिना पर ही सांसद को दो-तीन जन्म तो जेल में काटने ही पड़ सकते हैं। लेकिन, एक अपराधी से लगातार चार बार विधायक और फिर उसी जिले की एक सीट से अतीक को संसद का भी सफर करने का रास्ता मिल गया।

अतीक उस फूलपुर सीट से सांसद हैं जहां से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु सांसद थे। और, जिस सीट से दलित चेतना के प्रणेता कांशीराम को चुनाव हारना पड़ा था। अतीक पर आरोप सामान्य नहीं है। सांसद अतीक और उनके विधायक भाई अशरफ पर बसपा से विधायक चुने गए राजू पाल की हत्या का आरोप है। इलाहाबाद की शहर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक अतीक ने जब अपनी विधानसभा सीट अपनी पैतृक संपत्ति समझकर आपने छोटे भाई अशरफ को सौंपी तो, समाजवादी पार्टी ने जिताऊ गणित के तहत अशरफ को टिकट भी दे दिया। क्योंकि, 2004 में अतीक को फूलपुर से लोकसभा से चुनाव लड़ना था।

लेकिन, बरसों से अतीक के आतंकराज से डरी-सहमी-ऊबी जनता ने नवंबर 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी था लेकिन, जनता को लगा कि अतीक से तो बेहतर ही होगा। लेकिन, जनता को क्या पता था कि पैतृक विरासत छिनने पर कोई अपराधी क्या-क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और अतीक के छोटे भाई अशरफ ने मिलकर राजू पाल की हत्या की साजिश रची और हत्या करवा दी। सपा के शासन में ये सब हुआ था तो, पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भाई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। कुछ हुआ भी नहीं।

25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या हुई थी उसके बाद हुए दूसरे उपचुनाव में अतीक का छोटा भाई अशरफ जीतकर विधानसभा पहुंच गया। लेकिन, जब 2007में राज्य में विधानसभा के चुनाव हुए तो, अतीक, अशरफ के साथ पूरे राज्य सपा के पापों का घड़ा भर चुका था और पश्चिमी विधानसभा से अपराधी अशरफ और राज्य से अपराधियों की सरकार कही जाने वाली सपा सरकार गायब हो गगई और राजू पाल की पत्नी पूजा पाल विधायक हो गई।

उत्तर प्रदेश में ही एक और फैसला आया है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने फैसला किया है कि उत्तर प्रदेश में पक्षी विहार प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील में बेंती में ही बनेगा। बेंती अब भी रजवाड़ा है और बाहुबली उदय सिंह और सामान्य अपराधी से नेता, विधायक और मंत्री तक बन चुके उनके बेटे रघुराज प्रताप सिंह के आतंक से त्रस्त है। मायावती के शासन में बेंती में रजवाड़े के अवैध कब्जे वाली झील को पक्षी विहार बनाया गया और सरकार ने लाखों रुपए खर्च करके वहां पर पक्षी विहार बनाया। बसपा की सरकार गई और सपा की सरकार आ गई। बस इतने से ही सारा मामला बदल गया अपराधी कहे जा रहे रघुराज प्रताप सिंह सपा की सरकार में मंत्री बन गए। अब सरकारी पैसे से बना पक्षी विहार राजा रघुराज प्रताप सिंह की निजी संपत्ति बन गया । लेकिन, अच्छा हुआ कि मायावती ने फिर से सरकारी पैसे का दुरुपयोग और एक बाहुबली के आतंक को थोड़ा कम करने की कोशिश की।

उत्तर प्रदेश सरकार का इलाहाबाद के एक अपराधी सांसद और उसके छोटे अपराधी भाई और उससे सटे प्रतापगढ़ जिले के एक रजवाड़े (अब विधायक) के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान निश्चित तौर पर काबिले तारीफ है। ये गलत कामों के खिलाफ चल रहा अभियान है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये अभियान इसीलिए चल रहा है क्योंकि, इन दोनों ने समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान मायावती से निजी पंगा ले लिया था। और, एक मुख्यमंत्री की निजी रुचि लेने की वजह से ही ये सब हो पा रहा है।

सवाल ये है कि क्या एक सरकार बदलने की वजह से ही सिर्फ अपराधी है या नहीं ये तय होता है। मायावती की ही सरकार में उनके कई मंत्री, विधायक, नेता अपराध कर रहे हैं और पुलिस उन्हें सलामी बजा रही है। अतीक अहमद और अशरफ को भी पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी। क्या वो पुलिस भी उन्हें बचाने में लगी रही जो, अब तक उन दोनों अपराधियों को पुलिस पकड़ नहीं सकी। सांसद अतीक के खिलाफ यूपी पुलिस ने संसद से अपील की है कि वो, अपराधी अतीक को शरण न दे। लेकिन, देश में उत्कृष्ट मापदंड की बात करने वाले सभी पार्टियों के नेता क्या अतीक जैसे अपराधी को संसद में अब तक शरण नहीं दे रहे थे।

फिर सब कुछ जानते-बूझते इस तरह के सवाल पहेली क्यों बने हुए हैं। जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ता है। लेकिन, शायद जनता खुद ही इसकी जिम्मेदार है क्योंकि, हो सकता है अगले लोकसभा चुनाव में अतीक को वो फिर से सांसद और उसके छोटे भाई अशरफ को विधायक बना दे। साफ है सरकार बदली या फिर केंद्र में कहीं सपा के समर्थन से कोई लंगड़ी सरकार बनने की नौबत आई तो, अतीक जैसे लोग दिल्ली में शाही मेहमाननवाजी का भी मजा पा सकते हैं। लोकतंत्र की कुछ बड़ी खामियों में से ये सबसे बड़ी है।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...