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Thursday, January 14, 2010

शहर तो हमने बनाए ही नहीं

सात साढ़े सात परसेंट की ग्रोथ का भरोसा हमारे प्रधानमंत्री-वित्त मंत्री को फिर होने लगा है। सब ठीक हो रहा है। शहरी अर्थव्यवस्था, शहरी उपभोक्ता पर फिर भरोसा जग रहा है। कंज्यूमर (जिसकी जेब में पैसे हैं और जो सबकुछ खरीद सकता है) फिर महत्व पाने लगा है। लेकिन, सारी तरक्की शहरों के जरिए होते देखने वाली सरकारों ने क्या सचमुच के शहर बनाए भी हैं।


 देश के महानगरों की बात आज मैं छोड़ रहा हूं। अगले लेख में देश का सबसे बड़ा शहर, दिल्ली कितना शहर हो पाया है इसकी बात करूंगा लेकिन, अभी बात देश के दूसरे शहरों की जो, किसी जिले के मुख्यालय होते हैं। कुछ समय पहले जौनपुर गया। वैसे तो, हमेशा ही जौनपुर में गाड़ी चलाना मौत के कुएं में कार चलाने जैसा होता है। जैसे मौत के कुएं में जरा सा चूके तो, जान गई वैसे ही जौनपुर में गाड़ी चलाते जरा सा सावधानी हटी कि बड़ा दुर्घटना घटी। सड़कें तो शहर जैसी हैं नहीं लेकिन, नरसिम्हाराव-मनमोहन की जोड़ी के करीब दो दशक पहले लाए गए उदारीकरण ने सबकी जेब में गाड़ी खरीदने लायक पैसे डाल दिए हैं।


इस बार जौनपुर के प्रशासनिक अधिकारियों ने शहर के तंगहाल ट्रैफिक को सुधारने का नया रास्ता निकाला है- बीच सड़क में पार्किंग। यानी पार्किंग सड़क के बीच डिवाइडर जैसा काम करे। और, दोनों तरफ ट्रैफिक बिना रुके चलता रहे। अब प्रशासनिक अधिकारियों के पास इतना बूता तो है नहीं कि तंग जौनपुर कस्बे की सड़कों को शहर की चौड़ी सड़कों में तब्दील करा सकें तो, बेचारे अपने बस भर का कर रहे हैं। अब इसमें हाल ये कि हमारी गाड़ी बस दोनों तरफ बमुश्किल ही रगड़ाते बच रही थी।


और लगभग जौनपुर जैसा ही हाल देश के सारे शहरों का है। अभी कुछ दिन पहले बालाजी मेंहदीपुर से लौटते समय मथुरा जाना हुआ। लगा बस नाम बदल गया है। वरना तो, गाड़ी चलाने में वैसे ही कौशल की जरूरत है जैसे जौनपुर में। अब देखिए ये साहब हमारी कार के आगे कितने शान से पाइप लादे चले जा रहे हैं। गलती इनकी नहीं है, कहां से ला जाएं।


मथुरा में हाईवे से घुसते ही मिलने वाला ट्रैफिक कृष्ण जन्मभूमि तक पहुंचते-पहुंचते दमघोंटू ट्रैफिक में बदल जाता है। और, कृष्ण जन्मभूमि की डीग गेट पुलिस चौकी के सामने से होली गेट की ओर जाने वाला रास्ता तो, बस सही में भगवान कृष्ण ही मालिक है। कृष्ण की नगरी है तो, यहां लड़ने-भिड़ने पर लोग राधे-राधे करके मुस्कुरा देते हैं। वरना तो, ये शहर और ये ट्रैफिक कब किसकी जान ले लें क्या पता। आजादी के 63 सालों में हमने कौन सा शहर बनाया ये तो, दिख ही रहा है। हां, गांव उजड़ जाएं इसका भरपूर बंदोबस्त हमारी सरकारी नीतियां करती जा रही हैं। देश का दिल दिल्ली सबको भाता है। इसकी चर्चा कल करूंगा कितना दिलवाला है ये दिल्ली शहर।



Monday, April 20, 2009

बर्थ, तेरही, ट्रेडिंग टर्मिनल, एसी मंच, सानिया मिर्जा कट नथुनी

सोचा था कि किसी भी हाल में 7 बजे तक ऑफिस से निकल ही जाऊंगा। लेकिन, वोटिंग के दिन चुनाव पर आधे घंटे के स्पेशल बुलेटिन को छोड़कर निकलना थोड़ा मुश्किल था। खैर, 7.20 होते-होते लगाकि अब मामला बिगड़ जाएगा। फिर, झंझट ये कि नोएडा से दिल्ली के लिए ऑटो मिलना भी कम महाभारत तो थी नहीं। फिर एक साथी की मदद से बाल्को पहुंच तो गया। लेकिन, समझ में आया कि इलाहाबाद के लिए ट्रेन का टिकट तो प्रिंट निकालकर प्रिंटर पर ही भूल आया।


खैर, फोन करके छोटे भाई से टिकट का PNR नंबर पूछा और मोबाइल से टिकट का स्टेटस पता किया तो, RB 2-47, 55 दिखा तो, लगा चलो टिकट तो कनफर्म हो गया। लेकिन, RB का रहस्य नहीं समझ में आ रहा था। सीधे गए तो, 47, 55 दोनों नीचे की किनारे वाली सीटें थीं। चलो एक उलझन तो दूर हुई। सामने दो सभ्य जन भिड़े हुए थे। दोनों लोगों के पास अपनी सीट भर से ज्यादा सामान था। और, दोनों ही अपने सामान को अपने ज्यादा से ज्यादा नजदीक चिपकाकर रखने की लड़ाई लड़ रहे थे। दूसरे को किसी और की सीट के नीचे सामान घुसाने की सलाह (धमकी के अंदाज में) दिए जा रहे थे।


मेरे दोस्त GR पांडे और मैं इस झगड़े को देखकर मुस्कुरा रहे थे। मैंने पूरी सहृदयता और बड़प्पन दिखाते हुए कहा। अरे, साहब लड़ना छोड़िए। हमारी 2 सीटें हैं 47, 55 और हम दोनों के पास कुल मिलाकर एक छोटा सा बैग है जो, हम अपनी सीट पर भी रखकर सो सकते हैं जितना सामान है इधर भर दीजिए। बड़े मजे से मैं और मेरे मित्र जो, सुप्रीमकोर्ट में अधिवक्ता हैं 47 नंबर सीट पर बैठ गए। तब तक हमें RB 2-47, 55 का रहस्य समझ में आया नहीं था। तभी एक साहब आए- जिनके चेहरे को देखकर लग रहा था जैसे जमाने से नाराज ही पैदा हुए थे और ऐसे ही निकल भी लेंगे जमाने को छोड़कर- उन्होंने कहा ये मेरी सीट है। मैंने कहा 47 नंबर तो मेरी है। उन्होंने कहा आपकी आधी है, आधी मेरी है। ये था RB 2-47, 55 का रहस्य। सीट RAC ही रह गई थी। उन साहब से निवेदन किया लेकिन, वो माने नहीं। खैर, अब इंतजार टीटी का था।


बुजुर्ग से टीटी महोदय आए मुझे लगा टिकट का प्रिंट भी नहीं है नियमत: 50-100 रु का चूना भी लगेगा। लेकिन, मैंने उनसे पूरे अधिकार के साथ सीट के लिए निवेदन किया तो, उन्होंने टिकट भी नहीं मांगा। आइडेंटिटी प्रूफ मैंने पहले ही दिखा दिया था। 55 नंबर पर आधी सीट के मालिक अंकल से हम लोगों ने निवेदन किया तो, वो मान गए। अब खिसियाई सूरत लेकर जमाने से नाराज साहब कह रहे हैं कि वो मेरा सामान इस सीट के नीचे था न, नहीं तो मैं उधर चला जाता। तब तक हम लोगों का भाग्य चटका और पूरी-पूरी सीट मिल गई। हालांकि, मिडिल सीट पर मैं सारी रात जगता प्रयागराज ट्रेन के झटके से नहीं, नीचे से रह-रहकर आ रहे धमाकेदार खर्राटे की वजह से। और, खर्ऱाटा भरने वाले अंकल और उनका पूरा परिवार अच्छी नींद के आगोश में था।


सुबह-सुबह अपने शहर इलाहाबाद में था। सूबेदारगंज स्टेशन क्रॉस करते ही छोटे भाई को फोन किया पता था- अभी आउटर पर ट्रेन जितनी देर रुकेगी उतने में दारागंज से भाई आ ही जाएगा। आउटर पर रुकी ट्रेन से खट-खट कई सफेद बोरे गिरे। एक बैग लिए मुंशी टाइप आदमी के निर्देश पर 2 मजदूर टाइप लोग जल्दी-जल्दी बगल रुकी मालगाड़ी के नीचे से उन सफेद बोरों को दूसरी पार लगा रहे थे। बोरों पर नीले से DTDC लिखा देख समझ में आया-कुरियर कंपनी के बोरे थे। लेकिन, इतनी प्रतिष्ठित कुरियर कंपनी के पार्सल ऐसे क्यों जा रहे हैं- जवाब बगल से आया- स्टेशन पर पुलिस को चुंगी देने से बच गया।


घर से नहा-धोकर चल पड़े जौनपुर के लिए। रास्ते में एक ढाबे के किनारे खड़ी हाथी झंडा लहराती सफारी और टेंपो ट्रैवलर देखकर छोटे भाई ने कहा- भैया कपिल भाई लग रहा हैं। मिलेंगे क्या। मैंने कहा-आओ मिल लेते हैं। भाई ने सफारी के पीछे सफारी लगा दी। अंदर फूलपुर से बसपा प्रत्याशी कपिलमुनि करवरिया ढाबे के साथ बने एक शीशे वाले कमरे में बैठे थे। उनके सामने एक कंप्यूटर स्क्रीन पर लाल-नीला सा कुछ लगातार चमक रहा था। थोड़ देर में मैं समझ गया कि ये तो ट्रेडिंग टर्मिनल है। ढाबे के मालिक से कुछ छिपी सी टीवी से मोरपंखी का निशान दिखा तो, मैंने देखा कि हमारा चैनल सीएनबीसी आवाज़ चल रहा है (अब मेरी बात को और मजबूती मिलेगी कि आवाज़ सिर्फ गुजरात, मुंबई, दिल्ली का चैनल नहीं है)। कपिलमुनि करवरिया से बात करते मैं बाहर निकल आया लेकिन, बाद में अफसोस हुआ कि ट्रेडिंग टर्मिनल उसके सामने बैठे बसपा प्रत्याशी और ढाबे के मालिक के पीछे टीवी स्क्रीन पर सीएनबीसी आवाज़ की तस्वीर नहीं ले पाया।


तेज रफ्तार में हम जौनपुर की ओर बढ़े जा रहे थे। रास्ता पहले से काफी अच्छा बन गया है। लेकिन, आज दूसरी बाधा थी। सिकरारा थाने से आगे जाम मिलना शुरू हो गया। जौनपुर शहर में घुसते ही लंबी गाड़ियों की लाइन लगी थी। किसी तरह पौन घंटे में शहर के अंदर पहुंचने के बाद मित्र मनीष के घर दीवानी कचहरी पहुंच पाए। मनीष के पिताजी की तेरहवीं में पहुंचने के लिए ही मैं ये सारी दौड़ लगा रहा था। वहां पता चला कि बहनजी की रैली ने मेरे और मेरे जैसे जाने कितने लोगों के 45 मिनट से घंटों जाम में बरबाद कर दिए। साथ में ये भी पता चला कि मायावती के नहाने के लिए महकउवा साबुन की भी व्यवस्था है। साथ में ही ये भी जानकारी हवा में तैरती आई के जिस मंच से मायावती गरीब, दलित जनता को उसके हक के बारे में जागरुक करेंगी उस मंच को ठंडा रखने के लिए 8 स्प्ल्टि एयर कंडीशनर लगाए गए हैं। शुक्रवार को मुझे ये बात जौनपुर में पता चली और, रविवार को नोएडा में घर पर फुर्सत में टीवी देख रहा था तो, हाईप्रोफाइल समाजवादी नेता अमर सिंह, मायावती के आलीशान बाथरूम पर एतराज जताते दिख गए।



17 को मैं जौनपुर में था। 16 को बनारस और गोरखपुर में वोटिंग हो चुकी थी। गोरखपुर से आए मेरे एक मित्र अष्टभुजा नायक गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के कम से कम 50 हजार वोटों से हारने की बाजी लगा रहे थे। हरिशंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे। एक बीजेपी नेता भिड़ गए कि योगी खुद तो जीतेंगे ही आसपास की कई सीटें जिताएंगे। बात जातिगत समीकरण पर जाकर टिक गए। तर्क आया अब मंदिर के नाम पर वोट नहीं पड़ेगा। 2,70,000 ब्राह्मण हैं गोरखपुर में और 25,000 ठाकुर। ठाकुर आदित्यनाथ कब तक राज करेगा। बीजेपी नेता ने कहा- आप लोगों जाति की राजनीति करते हैं। हम ये बात नहीं करते। वो, चर्चा खत्म हुई भी नहीं थी किसी ने कहा- राजनाथ ने धनंजय को जिताने के लिए ही सीमा द्विवेदी को जौनपुर से टिकट दिया है। और, इसीलिए टिकट बहुत देरी से घोषित किया गया। अब पता नहीं बीजेपी नेता जाति की राजनीति करते हैं या नहीं।


बनारस में डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी का जीतना 90 प्रतिशत पक्का है। लेकिन, बीजेपी नेता भी ये मान रहे हैं कि जोशी ने इलाहाबाद छोड़कर तीन सीटें खराब कीं। इलाहाबाद, फूलपुर और बनारस। अगर जोशी इलाहाबाद ही रहते तो, कपिलमुनि करवरिया बीजेपी छोड़कर न जाते और फूलपुर से बीजेपी प्रत्याशी होते। बनारस में अजय राय को टिकट मिलता तीनों सीट बीजेपी जीत लेती। अब तीनों ही मुश्किल में हैं। पता नहीं ये कितना सही है। जौनपुर में ही बैठे-बैठे अपने गृह जनपद प्रतापगढ़ सीट का भी विश्लेषण मिल गया। अब तो, रत्ना जीत जइहैं। बीजेपी के पूर्व विधायक शिवाकांत बीएसपी से लड़त अहैं, बीजेपी में फिर से लउटा लक्ष्मीनारायण पांडे उर्फ गुरूजी बीजेपी के टिकट प अहैं औ इलाहाबाद से भागके अतीक प्रतापगढ़ अपना दल क झंडा उठाए अहैं। तब तक नेपथ्य में एक आवाज और आई औ सुने त कि इलाहाबाद मदरसा कांड वाली लड़किया (कौनो मुस्लिम नाम लिए जो, मुझे याद नहीं) खुलेआम घूम-घूमके अतीक के खिलाफ प्रचार करता बा। हम पूछे केकरे समर्थन म। पता चला समर्थन केहू क नाहीं। बस अतीक क हरावा। हम सोचे ईहै जौ सब चेत लेते कि अपराधी न जिताऊब चाहे जे जीतै तो, बड़ी बात बन जात।


खैर, टाइम हो चुका था रात की गरीब रथ से फिर दिल्ली वापसी का टिकट था। बमुश्किल दो-सवा दो घंटे का रास्ता था लेकिन, जौनपुर शहर से इलाहाबाद पहुंचते तक बीसियों बारातों ने हमारे जौनपुर से इलाहाबाद के सफर को 3 घंटे का बना दिया। इलाहाबाद में अलोपी देवी मंदिर के सामने एक बारात के बगल में ज्यादा देर तक फंसे तो, समझ में आया कि इस शादी के सीजन की हॉट धुन कौन सी है। पूरी बारात सानिया मिर्जा कट नथुनी पे जान देने को तैयार थी। गाड़ी के अंदर ही हम लोगों के कंधे भी थोड़े बहुत उचक रहे थे, बैंड और तेज बजने लगा ... सानिया मिर्जा कट नथुनी पे जान जाएला ...। 12.48 की आधे घंटे देर से आई गरीब रथ में 25 रुपए का कंबल चद्दर लेकर हम लोग सो गए। सुबह निजामुद्दीन पहुंच गए। दो रात और एक दिन के सफर ने जाने कितने सामाजिक तथ्यों से रूबरू करा दिया। बस अब सफर खत्म। रविवार को छुट्टी का दिन मिला। ये बकैती (इलाहाबादी में इसे यही कहेंगे) लिख मारी। सोमवार से फिर ऑफिस-ऑफिस और दफ्तर से ही राजनीति समझेंगे वही लोगों को समझाएंगे। जबकि, असली राजनीति तो, कुछ और ही चल रही होगी। जाति के कोई समीकरण बन रहे होंगे कोई टूट रहे होंगे। बस बहुत हो गया ...

Monday, May 05, 2008

यूपी रोडवेज का सफर, एसी सलून और एटीएम की लाइन

(इस बार की छुट्टियों में मैं इलाहाबाद गया तो, एक मित्र की शादी में जौनपुर भी जाना हुआ। बस का सफर एक दशक पहले जैसा ही था तो, जौनपुर जैसे छोटे-ठहरे हुए शहर में मुझे कई छोटे-छोटे (सुखद) बदलाव देखने को मिले। उस दौरान के अनुभव का चित्र यहां शब्दों से खींचने की कोशिश कर रहा हूं।)

काफी लंबे समय बाद मैंने इस बार उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की सेवा का आनंद लिया। मुझे याद नहीं है कि इसके पहले मैंने सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल इलाहाबाद में कब किया था। क्योंकि, ज्यादातर मोटरसाइकिल या ज्यादा दूर जाना हुआ तो, गाड़ी से ही निकल जाते थे। लेकिन, घरेलू मित्र की शादी में मुझे एक दिन पहले ही जौनपुर जाना था और घर से सभी लोग जाने के लिए तैयार थे इसलिए दोनों गाड़ी छेड़कर मुझे सुबह की बस पकड़नी पड़ी।

मेरे मित्र मनीष ने कहाकि सुबह सात बजे पवन गोल्ड आती है उसी से आना। वो, नॉन स्टॉप है यानी इलाहाबाद से सीधे जौनपुर पहुंचाएगी- करीब तीन घंटे में। लेकिन, मेरे भाग में तो यूपी रोडवेज का असली मजा बदा था। 7 बजे वाली पवन गोल्ड छूट गई और मैं 2-3 बस छोड़ने के बाद आखिरकार एक सीट पाकर उस पर बैठ गया। बस असली मजा तभी शुरू हुआ।

एक 20-22 साल का लड़का अपनी शर्ट एक तीन लोगों के बैठने वाली सीट पर और दूसरी पर अपने बैग रखकर (छेंककर) अपने परिवार वालों को बैठाने लगा। इसी बीच धीरे से एक महिला ने उसका बैग उतारा और बैठ गई। खाली बनियान में पसीने से तरबतर लड़का तैश में आ गया। लेकिन, क्या संस्कार थे, आप खुद ही देखिए। आंटी आप नीचे उतरो इस सीट पर मेरे घर वाले बैठेंगे, कई लेडीज हैं। बताइए इतनी मुश्किल से चार बस छोड़ने के बाद तो ये जगह मिली है। आंटी भी तैश में आ गई। तो तू ही बता मैं कैसे जाऊं। तुम्हारा परिवार जाएगा तो, मैं भी तो लेडीज हूं। मैं तो, इसी सीट पर जाऊंगी। अब तक लड़के का ताव थोड़ा ठंडा पड़ चुका था क्योंकि, दूसरी सवारियों ने भी आंटी की बात में हां में हां मिलानी शुरू कर दी थीं। खैर, आधे घंटे तक सीट पर, बीच की गैलरी में और ड्राइवर के बगल की सारी जगह भरने के बाद ही बस चली।

अचानक एक साहब उछलकर किनारे खिड़की के पास जगह बनाकर बैठ गए। किसी ने पीछे से जुमला उछाला- बंबई से कमाके आए हैं का। नहीं, दिल्ली से आ रहे हैं। फिर दूसरे सज्जन ने इस बार मोरचा संभाला। तभी तो बड़ी चमक औ ऊर्जा दिख रही है। परदेस की कमाई है ना। तब तक एक नेताजी टाइन सज्जन ने कहा- थोड़ा सरकिए। भाई साहब ने आनाकानी दिखाई तो, नेताजी बोल पड़े यही समस्या है। बंबई के लोकल में कूकुर-बिलार (कुत्ते-बिल्ली) के तरह भरके रोज चलथी। लेकिन, घरे लौटिहैं तो, तनिकौ सीट देए म नानी मरि जाथ। इही से राज ठाकरेवा मारथ लातै लात तो दिमाग ठिकाने रहथ। इतना सुनने के बाद कमाकर घर लौटे भाईसाहब सीट पर थोड़ी जगह छोड़ चुके थे।

बस हर स्टॉपेज पर रुक रही थी। हाल ये था कि बाजार के अलावा भी रास्ते में कोई हाथ दे देता और बस रुक जाती। 100 किलोमीटर का सफर 3 घंटे के बजाए करीब चार घंटे में तय हुआ। अब तौ खैर इलाहाबाद से जौनपुर का रास्ता काफी बन गया है लेकिन, विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान मेरे जौनपुर के मित्र इसे कॉम्बीफ्लेम वाला रास्ता बताते थे। यानी इस रास्ते पर सफर के बाद कॉम्बीफ्लेम (दर्द की दवा) लेना जरूरी हो जाता था। खैर, मैं जौनपुर पहुंचा तो, बस अड्डे से रिक्शा लिया। और, दीवानी कचहरी के लिए चल दिया। रास्ते में एक जगह जाम दिखा तो, रिक्शे वाले ने कहा- किसी साहब की गाड़ी खड़ी है। भइया इहै है अगर कौनो साधारण आदमी होत तो, अब तक ओका पुलिसवाले उठाए के बंद कइ देहे होतेन। लेकिन, अब लाल बत्ती क गाड़ी तो, कहूं खड़ी कइद्या के रोकथ।

खैर, जाम की वजह सिर्फ बेतरतीब खड़ी लाल बत्ती की गाड़ी नहीं थी। दरअसल हम स्टेट बैंक के सामने से गुजर रहे थे और ब्रांच के बगल में ही स्टेट बैंक का एटीएम भी था। एटीएम से पैसा निकालने वालों की लाइन सड़क पर काफी दूर तक लगी थी। और, ट्रैफिक में बाधा बन रही थी। जौनपुर शहर में एटीएम की ये लाइन देखकर थोड़ा आश्चर्य हो रहा था।


जौनपुर में भी दूसरे दिन सुबह मैं दाढ़ी बनवाने गया तो, नजदीक में ही एक लाइन से दो एसी सलून थे। वहां भी लाइन लगी थी। आधे घंटे-पैंतालीस मिनट की वेटिंग थी। वो तो, मित्र हमारे नेताजी थे इसलिए लाइन टूटी और दो कुर्सियां काली होते ही हम लोग उस पर आसीन हो गए। शहनाज की मसाज और ढेर सारे महानगरीय सौंदर्य प्रसाधन उसने बिना कहे ही दाढ़ी बनाने के बाद इस्तेमाल कर दिए।

ये वो जौनपुर है जहां, पता नहीं कितने सालों से कोई नई बाजार नहीं बनी है। कमाई का नया साधन नहीं बना है। अभी भी जाति की अहं सबसे ज्यादा मायने रखता है। ज्यादातर लड़के या तो बेरोजगार हैं या ठेका-पट्टा और राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ सक्रिय होकर खुद को व्यस्त रखे हैं। ऐसे जौनपुर में एटीएम के लिए लगी लंबी लाइन और एसी सलून में 12 रुपए में दाढ़ी बनवाने के बजाए 70 रुपए में मसाज किया चमकता चेहरा लेकर निकलने वाले लोग ही शायद कुछ बदलाव की राह तैयार कर पाएंगे। मुझे लगता है कि यहां परंपरागत भारत का बचत का नहीं नए इंडिया का खर्च वाला फॉर्मूला बदलाव का रास्ता तैयार करेगा।

जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव

  सुप्रभात राम राम भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्र...