संजय दत्त चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। फिल्म अभिनेता संजय दत्त समाजवादी पार्टी से लखनऊ से प्रत्याशी थे। सुप्रीमकोर्ट ने ये अहम फैसला सुनाते हुए कहाकि वो पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट के खिलाफ फैसला नहीं देंगे। पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती जिसे किसी भी अदालत से दो साल से ज्यादा की सजा दी गई हो। और, संजय दत्त को टाडा कोर्ट ने मुंबई धमाकों के मामले में 6 साल की सजा सुनाई है।
ये फैसला इसलिए भी बेहद अहम है कि संजय दत्त को उस लखनऊ सीट से चुनाव मैदान में उतार रही थी। जहां से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लगातार कई बार से जीतकर संसद में पहुंच रहे थे। वाजपेयी के अस्वस्थ होने की वजह से बीजेपी ने लाजी टंडन को मैदान में उतार दिया है। लालजी टंडन को सिर्फ इसलिए टिकट दिया गया कि वो, वाजपेयी के बेहद नजदीकी थे और लखनऊ में वाजपेयी के प्रतिनिधि भी थे। संजय दत्त के खिलाफ बीएसपी के टिकट पर लड़ रहे अखिलेश दास की भी छवि कोई अच्छी नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री बनारसी दास गुप्ता को बेटे अखिलेश दास पैसे के जोर से कभी इस दल से तो कभी उस दल से सत्ता का सुख लेते रहे हैं। कुल मिलाकर इस सीट से लड़ने वाले दूसरे प्रत्याशी कोई बहुत बेहतर नहीं हैं। कांग्रेस ने सुनील दत्त का बेटा होने की वजह से अब तक कोई प्रत्याशी नहीं उतारा था। अब कांग्रेस भी प्रत्याशी उतारने जा रही है। लेकिन, संजय दत्त के चुनाव लड़ने पर रोक इस लिहाज से बेहद अहम है कि संजय दत्त उस गांधीगीरी की विरासत संभालने का नाटकीय भ्रम फैला रहे थे जिसके सारे उसूलों को संजय दत्त के कर्मों ने चूर-चूर कर दिया था। वैसे अभी भी संजय दत्त संसद पहुंचने की कोशिश करेंगे- मुखौटा भले मान्यता का होगा।
संजय दत्त के ऊपर जो मामला है वो, राष्ट्रद्रोह जैसा है। हालांकि, मुंबई धमाकों के सिलसिले में उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत दोषी पाया गया। कुख्यात माफिया-अपराधियों की तरह संजय दत्त के पास से एके 47 जैसी खतरनाक राइफल पकड़ी गई थी। दाउद से लेकर भारत के खिलाफ हर तरह के कुकर्म करने वाले जाने कितने अपराधियों से संजय के याराने के सबूत मुंबई पुलिस को मिले थे। लेकिन, सुनील दत्त का बेटा होना और सफल फिल्म अभिनेता होने के साथ कांग्रेस और दूसरी राजनीतिक पार्टियों में अच्छे रिश्ते ने ऐसा माहौल बनाया कि देश की जनता संजय दत्त को अपराधी की बजाए गुस्साने के बजाए एक अजब सी सहानुभूति दिखाने लगी। बची-खुची कसर मुन्नाभाई के नाम के उस चरित्र ने कर दी जो, सारी समस्याओं का इलाज गांधीगीरी से कर देता था।
कमाल की बेशर्मी वाली याचिका था संजय दत्त की। वो, सुप्रीमकोर्ट से ये कह रहे थे कि टाडा कोर्ट के उस फैसले पर स्टे दे दे। जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया। वो, स्टे इसलिए नहीं कि वो दोषी नहीं हैं सिर्फ इसलिए कि इस स्टे के आधार पर वो लखनऊ लोकसभा सीट से जीतकर संसद पहुंच जाएं। यानी उस जगह पर जहां से सारे कानून बनते हैं। जहां से तय होता है कि देश कैसे चलेगा। ऐसा नहीं है कि संजय दत्त अकेले के न पहुंचने से संसद स्वच्छ हो जाएगी। लेकिन, संजय दत्त के खिलाफ आया ये फैसला अपराधियों को संसद में पहुंचने से रोकने की एक अच्छी शुरुआत हो सकता है।
वैसे ये शुरुआत अदालतों के बूते पहले ही हो चुकी है। सीवान, बिहार के कुख्यात अपराधी पूर्व सांसद शहाबुद्दीन को अदालत ने चुनाव लड़ने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। बिहार में एक जिलाधिकारी की हत्या के दोषी आनंद मोहन, कुख्यात माफिया सूरजभान सिंह और पप्पू यादव को भी अदालतों ने चुनाव लड़ने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। उत्तर प्रदेश में बीएसपी विधायक राजू पाल की हत्या के आरोपी अतीक अहमद भी जेल में हैं और, अदालत ने उन्हें चुनाव लड़ने की इजाजत तो दे दी है लेकिन, प्रतापगढ़ जाकर पर्चा भरने की इजाजत नहीं दी है। बनारस से बीएसपी टिकट पर चुनाव लड़ रहे मुख्तार अंसारी पर अभी कोई रोक नहीं लगी है।
ऐसा नहीं है कि इससे ये अपराधी पूरी तरह से राजनीति से बाहर हो गए हैं या हो रहे हैं। दरअसल इन सारे अपराधियों ने उसका भी रास्ता निकाल लिया है। शहाबुद्दीन, सूरजभान और पप्पू यादवव की पत्नियां, पति की चरण पादुका लेकर संसद में पहुंचेंगी। मुख्तार अंसारी की पत्नी ने सावधानी वश नामांकन दाखिल कर दिया है कि अगर उन पर कोई अदालती रोक लगे तो, पत्नी का मुखौटा लगाकर वो, संसद में पहुंच जाएं। खुद पर कोई आंच आने पर अतीक भी अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाने की योजना बनाकर तैयार हैं।
कुल मिलाकर ऐसा नहीं है कि इन अदालती फैसलों से ये अपराधी पूरी तरह से राजनीति से बाहर हो गए हैं या हो रहे हैं। दरअसल इन सारे अपराधियों ने उसका भी रास्ता निकाल लिया है। शहाबुद्दीन, सूरजभान और पप्पू यादवव की पत्नियां, पति की चरण पादुका लेकर संसद में पहुंचेंगी। ये अपराधी जैसे पहले जेल से बैठकर गैंग चलाते थे। वैसे ही वो, अब जेल में ही गैंग चलाने के साथ-साथ संसद भी चलाएंगे।
लेकिन, ये एक शुरुआत भर है और चुनाव सुधारों- पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट में एक नया क्लॉज जोड़ने की जरूरत भी बताता है कि सिर्फ दोषी अपराधी ही नहीं उनके उन निकट संबंधियों पर भी रोक कानून बने जिनसे सीधे तौर पर अपराधी जुड़ा हुआ है। लोकतंत्र में ये मांग थोड़ी अजीब हो सकती है। लेकिन, भारतीय लोकतंत्र जिस हद तक बिगड़ गया है उसे सुधारने के लिए कई बड़े सुधारों की जरूरत है जिसमें से एक ये है। कुल मिलाकर शुरुआत अच्छी है और हम सबको इस शुरुआत को और मजबूत करने की कोशिश करनी चाहिए। वो, ये कि आरोपी अपराधी न सही तो, कम से कम दोषी अपराधियों की पत्नियों को भी संसद में नहीं पहुंचने देंगे।
देश की दशा-दिशा को समझाने वाला हिंदी ब्लॉग। जवान देश के लोगों के भारत और इंडिया से तालमेल बिठाने की कोशिश पर मेरे निजी विचार
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Tuesday, March 31, 2009
Friday, January 04, 2008
ये कोई पहेली तो है नहीं जो किसी की समझ में नहीं आती
देश के इतिहास में ये पहली बार हुआ है कि किसी सांसद के खिलाफ पुलिस ने अपराधियों की तरह स्केच जारीकर उसे भगोड़ा घोषित कर दिया। माननीय (मुझे ये लिखते हुए शर्म आ रही है) सांसदों की सुरक्षा के लिए लगी रहने वाली पुलिस एक सांसद की तलाश में पिछले कई महीनों से घूम रही है। सफलता नहीं मिली तो, सांसद के चेहरे के सात संभव तरीके वाले स्केच जारी किए।
ये सांसद हैं इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सांसद अतीक अहमद। अतीक अहमद पर वैसे तो इतने अपराधिक मामले और आरोप दर्ज हैं कि उनकी बिना पर ही सांसद को दो-तीन जन्म तो जेल में काटने ही पड़ सकते हैं। लेकिन, एक अपराधी से लगातार चार बार विधायक और फिर उसी जिले की एक सीट से अतीक को संसद का भी सफर करने का रास्ता मिल गया।
अतीक उस फूलपुर सीट से सांसद हैं जहां से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु सांसद थे। और, जिस सीट से दलित चेतना के प्रणेता कांशीराम को चुनाव हारना पड़ा था। अतीक पर आरोप सामान्य नहीं है। सांसद अतीक और उनके विधायक भाई अशरफ पर बसपा से विधायक चुने गए राजू पाल की हत्या का आरोप है। इलाहाबाद की शहर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक अतीक ने जब अपनी विधानसभा सीट अपनी पैतृक संपत्ति समझकर आपने छोटे भाई अशरफ को सौंपी तो, समाजवादी पार्टी ने जिताऊ गणित के तहत अशरफ को टिकट भी दे दिया। क्योंकि, 2004 में अतीक को फूलपुर से लोकसभा से चुनाव लड़ना था।
लेकिन, बरसों से अतीक के आतंकराज से डरी-सहमी-ऊबी जनता ने नवंबर 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी था लेकिन, जनता को लगा कि अतीक से तो बेहतर ही होगा। लेकिन, जनता को क्या पता था कि पैतृक विरासत छिनने पर कोई अपराधी क्या-क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और अतीक के छोटे भाई अशरफ ने मिलकर राजू पाल की हत्या की साजिश रची और हत्या करवा दी। सपा के शासन में ये सब हुआ था तो, पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भाई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। कुछ हुआ भी नहीं।
25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या हुई थी उसके बाद हुए दूसरे उपचुनाव में अतीक का छोटा भाई अशरफ जीतकर विधानसभा पहुंच गया। लेकिन, जब 2007में राज्य में विधानसभा के चुनाव हुए तो, अतीक, अशरफ के साथ पूरे राज्य सपा के पापों का घड़ा भर चुका था और पश्चिमी विधानसभा से अपराधी अशरफ और राज्य से अपराधियों की सरकार कही जाने वाली सपा सरकार गायब हो गगई और राजू पाल की पत्नी पूजा पाल विधायक हो गई।
उत्तर प्रदेश में ही एक और फैसला आया है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने फैसला किया है कि उत्तर प्रदेश में पक्षी विहार प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील में बेंती में ही बनेगा। बेंती अब भी रजवाड़ा है और बाहुबली उदय सिंह और सामान्य अपराधी से नेता, विधायक और मंत्री तक बन चुके उनके बेटे रघुराज प्रताप सिंह के आतंक से त्रस्त है। मायावती के शासन में बेंती में रजवाड़े के अवैध कब्जे वाली झील को पक्षी विहार बनाया गया और सरकार ने लाखों रुपए खर्च करके वहां पर पक्षी विहार बनाया। बसपा की सरकार गई और सपा की सरकार आ गई। बस इतने से ही सारा मामला बदल गया अपराधी कहे जा रहे रघुराज प्रताप सिंह सपा की सरकार में मंत्री बन गए। अब सरकारी पैसे से बना पक्षी विहार राजा रघुराज प्रताप सिंह की निजी संपत्ति बन गया । लेकिन, अच्छा हुआ कि मायावती ने फिर से सरकारी पैसे का दुरुपयोग और एक बाहुबली के आतंक को थोड़ा कम करने की कोशिश की।
उत्तर प्रदेश सरकार का इलाहाबाद के एक अपराधी सांसद और उसके छोटे अपराधी भाई और उससे सटे प्रतापगढ़ जिले के एक रजवाड़े (अब विधायक) के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान निश्चित तौर पर काबिले तारीफ है। ये गलत कामों के खिलाफ चल रहा अभियान है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये अभियान इसीलिए चल रहा है क्योंकि, इन दोनों ने समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान मायावती से निजी पंगा ले लिया था। और, एक मुख्यमंत्री की निजी रुचि लेने की वजह से ही ये सब हो पा रहा है।
सवाल ये है कि क्या एक सरकार बदलने की वजह से ही सिर्फ अपराधी है या नहीं ये तय होता है। मायावती की ही सरकार में उनके कई मंत्री, विधायक, नेता अपराध कर रहे हैं और पुलिस उन्हें सलामी बजा रही है। अतीक अहमद और अशरफ को भी पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी। क्या वो पुलिस भी उन्हें बचाने में लगी रही जो, अब तक उन दोनों अपराधियों को पुलिस पकड़ नहीं सकी। सांसद अतीक के खिलाफ यूपी पुलिस ने संसद से अपील की है कि वो, अपराधी अतीक को शरण न दे। लेकिन, देश में उत्कृष्ट मापदंड की बात करने वाले सभी पार्टियों के नेता क्या अतीक जैसे अपराधी को संसद में अब तक शरण नहीं दे रहे थे।
फिर सब कुछ जानते-बूझते इस तरह के सवाल पहेली क्यों बने हुए हैं। जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ता है। लेकिन, शायद जनता खुद ही इसकी जिम्मेदार है क्योंकि, हो सकता है अगले लोकसभा चुनाव में अतीक को वो फिर से सांसद और उसके छोटे भाई अशरफ को विधायक बना दे। साफ है सरकार बदली या फिर केंद्र में कहीं सपा के समर्थन से कोई लंगड़ी सरकार बनने की नौबत आई तो, अतीक जैसे लोग दिल्ली में शाही मेहमाननवाजी का भी मजा पा सकते हैं। लोकतंत्र की कुछ बड़ी खामियों में से ये सबसे बड़ी है।
ये सांसद हैं इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से सांसद अतीक अहमद। अतीक अहमद पर वैसे तो इतने अपराधिक मामले और आरोप दर्ज हैं कि उनकी बिना पर ही सांसद को दो-तीन जन्म तो जेल में काटने ही पड़ सकते हैं। लेकिन, एक अपराधी से लगातार चार बार विधायक और फिर उसी जिले की एक सीट से अतीक को संसद का भी सफर करने का रास्ता मिल गया।
अतीक उस फूलपुर सीट से सांसद हैं जहां से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु सांसद थे। और, जिस सीट से दलित चेतना के प्रणेता कांशीराम को चुनाव हारना पड़ा था। अतीक पर आरोप सामान्य नहीं है। सांसद अतीक और उनके विधायक भाई अशरफ पर बसपा से विधायक चुने गए राजू पाल की हत्या का आरोप है। इलाहाबाद की शहर पश्चिमी सीट से लगातार चार बार विधायक अतीक ने जब अपनी विधानसभा सीट अपनी पैतृक संपत्ति समझकर आपने छोटे भाई अशरफ को सौंपी तो, समाजवादी पार्टी ने जिताऊ गणित के तहत अशरफ को टिकट भी दे दिया। क्योंकि, 2004 में अतीक को फूलपुर से लोकसभा से चुनाव लड़ना था।
लेकिन, बरसों से अतीक के आतंकराज से डरी-सहमी-ऊबी जनता ने नवंबर 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा के राजू पाल को जिता दिया। राजू पाल भी अपराधी था लेकिन, जनता को लगा कि अतीक से तो बेहतर ही होगा। लेकिन, जनता को क्या पता था कि पैतृक विरासत छिनने पर कोई अपराधी क्या-क्या कर सकता है। आरोप है कि अतीक अहमद और अतीक के छोटे भाई अशरफ ने मिलकर राजू पाल की हत्या की साजिश रची और हत्या करवा दी। सपा के शासन में ये सब हुआ था तो, पार्टी के ही बाहुबली सांसद और उसके छोटे भाई के खिलाफ कोई कार्रवाई कैसे हो सकती थी। कुछ हुआ भी नहीं।
25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या हुई थी उसके बाद हुए दूसरे उपचुनाव में अतीक का छोटा भाई अशरफ जीतकर विधानसभा पहुंच गया। लेकिन, जब 2007में राज्य में विधानसभा के चुनाव हुए तो, अतीक, अशरफ के साथ पूरे राज्य सपा के पापों का घड़ा भर चुका था और पश्चिमी विधानसभा से अपराधी अशरफ और राज्य से अपराधियों की सरकार कही जाने वाली सपा सरकार गायब हो गगई और राजू पाल की पत्नी पूजा पाल विधायक हो गई।
उत्तर प्रदेश में ही एक और फैसला आया है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने फैसला किया है कि उत्तर प्रदेश में पक्षी विहार प्रतापगढ़ की कुंडा तहसील में बेंती में ही बनेगा। बेंती अब भी रजवाड़ा है और बाहुबली उदय सिंह और सामान्य अपराधी से नेता, विधायक और मंत्री तक बन चुके उनके बेटे रघुराज प्रताप सिंह के आतंक से त्रस्त है। मायावती के शासन में बेंती में रजवाड़े के अवैध कब्जे वाली झील को पक्षी विहार बनाया गया और सरकार ने लाखों रुपए खर्च करके वहां पर पक्षी विहार बनाया। बसपा की सरकार गई और सपा की सरकार आ गई। बस इतने से ही सारा मामला बदल गया अपराधी कहे जा रहे रघुराज प्रताप सिंह सपा की सरकार में मंत्री बन गए। अब सरकारी पैसे से बना पक्षी विहार राजा रघुराज प्रताप सिंह की निजी संपत्ति बन गया । लेकिन, अच्छा हुआ कि मायावती ने फिर से सरकारी पैसे का दुरुपयोग और एक बाहुबली के आतंक को थोड़ा कम करने की कोशिश की।
उत्तर प्रदेश सरकार का इलाहाबाद के एक अपराधी सांसद और उसके छोटे अपराधी भाई और उससे सटे प्रतापगढ़ जिले के एक रजवाड़े (अब विधायक) के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान निश्चित तौर पर काबिले तारीफ है। ये गलत कामों के खिलाफ चल रहा अभियान है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये अभियान इसीलिए चल रहा है क्योंकि, इन दोनों ने समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान मायावती से निजी पंगा ले लिया था। और, एक मुख्यमंत्री की निजी रुचि लेने की वजह से ही ये सब हो पा रहा है।
सवाल ये है कि क्या एक सरकार बदलने की वजह से ही सिर्फ अपराधी है या नहीं ये तय होता है। मायावती की ही सरकार में उनके कई मंत्री, विधायक, नेता अपराध कर रहे हैं और पुलिस उन्हें सलामी बजा रही है। अतीक अहमद और अशरफ को भी पुलिस की सुरक्षा मिली हुई थी। क्या वो पुलिस भी उन्हें बचाने में लगी रही जो, अब तक उन दोनों अपराधियों को पुलिस पकड़ नहीं सकी। सांसद अतीक के खिलाफ यूपी पुलिस ने संसद से अपील की है कि वो, अपराधी अतीक को शरण न दे। लेकिन, देश में उत्कृष्ट मापदंड की बात करने वाले सभी पार्टियों के नेता क्या अतीक जैसे अपराधी को संसद में अब तक शरण नहीं दे रहे थे।
फिर सब कुछ जानते-बूझते इस तरह के सवाल पहेली क्यों बने हुए हैं। जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ता है। लेकिन, शायद जनता खुद ही इसकी जिम्मेदार है क्योंकि, हो सकता है अगले लोकसभा चुनाव में अतीक को वो फिर से सांसद और उसके छोटे भाई अशरफ को विधायक बना दे। साफ है सरकार बदली या फिर केंद्र में कहीं सपा के समर्थन से कोई लंगड़ी सरकार बनने की नौबत आई तो, अतीक जैसे लोग दिल्ली में शाही मेहमाननवाजी का भी मजा पा सकते हैं। लोकतंत्र की कुछ बड़ी खामियों में से ये सबसे बड़ी है।
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