नइकी दुलहिनिया!

नइकी, पहिले दिन ही आई तो, उसे पता था कि वो, सिर्फ दुबेजी का वंश चलाने के लिए लाई गई है। उस पर हर समय बड़कई के गुस्साने का भी डर था। देखने में बड़कई भी ठीक थी। लेकिन, बड़कई बड़ी थी तो, उमर का भी असर और सबसे बड़ी बात कि बड़कई बच्चा नहीं दे पा रही थी। नइकई, एकदम नई थी। दुबेजी से उमर में लगभग आधी। नई थी, एकदम्मै नई। दुबेजी की जमींदारी थी। पैतृक जमीन इतनी थी कि उसमें काम करने वाली परजा ही दुबेजी के बड़के कच्चे घर और पक्के डाक बंगले के चारो तरफ बस गई थी। लेकिन, चिंता बस वही थी कि आखिर तीन पीढ़ी से एक-एक बच्चे के जरिए चल रहा दुबेजी का वंश और उनकी जमींदारी का क्या होगा। सबसे ज्यादा चिंतित बूढ़ी फुइया थीं। खैर, इसी सब चिंता में नइकई आई। घोर दहेजी समाज में भी नइकी अपने बाबू के लिए गजब खुशकिस्मती निकली कि बिना दहेज शादी हुई। अउर त अउर दुबेजी का हाथ बंटाने के लिए नइकी का भाई भी साथ ही आया। यही दहेज देना पड़ा नइकी के बाबूजी को। नइकी के बाबूजी के लिए इससे बढ़िया क्या हो सकता था कि बिना खर्च किए जमींदार के यहां बेटी जा रही थी और साथ में बेटा भी जमींदार भले न हो लेकिन, जमींदारी संभालने के लिए तो, जा ही रहा था।

नइकी समझदार थी। नइकी काम सबसे संभालकर कर रही थी। बड़की की सेवा। और, दुबेजी के वंश में बढ़ोतरी। बड़की का हाथ-गोड़ मींजने से लेकर, सारी सेवा नइकी कर रही थी। और, इसके बदले उसे बड़की से अभयदान मिला था। क्योंकि, हिंदू संस्कार और कानून त बड़की, नइकी की इजाजत नहीं देते ना। इसीलिए बच्चा न पैदा कर पाने के बाद भी बड़की की इज्जत बनी हुई थी। बड़की भी बड़ी बन गई। अपनी नियति को ही मजबूती बना ली। दुबेजी की सेवा नइकी करेगी और, बाहर का सारा जिम्मा बड़की संभालेगी। वैसे, भी बड़की को पता था कि दुबेजी के पास जाने के लिए उसके पास कोई बहाना भी तो नहीं था। दुबेजी की नजदीकी के लिए ही तो, नइकी आई थी। नजदीकी रंग लाई औ तीन पीढ़ी से एक-एक बच्चे के जरिए चलने वाला दुबेजी का वंश तीन गुना बढ़ गया। अब बड़की ज्यादातर बाहर का ही काम संभालती है। नइकी अभी भी घर के भीतर ही ज्यादा रहती है। बड़की की सेवा भी वैसे ही करती है। हां, अब नइकी के बच्चे बड़े हो गए हैं। बड़की के साथ घर के बाहर के काम में बंटाते हैं। नइकी-बड़की दोनों एक दूसरे की पूरक हो गईं हैं। और, दुबेजी के लिए इससे बढ़िया क्या हो सकता है।